February 10, 2018

Quotes on Enlightenment in Hindi

Enlightenment Quotes

  • 10/02/2018 - ‘बुद्ध और महावीर’ ये दो नाम अक्सर मैं लेती हूँ। जिसका तात्पर्य यह बिल्कुल भी नहीं कि और कोई जाग्रत आत्माएं हुई ही नहीं। बहुत सी होती हैं, सदा होती हैं। कुछ गुमनाम, कुछ जिन्हें हम पहचान नहीं पाते, कुछ जिनकी हमें जानकारी नहीं होती, हमने पढ़ा और खोजा नहीं होता, कुछ जिन पर हम भरोसा कर नहीं पाते और कुछ जो बाहर से विवादास्पद लगती हैं (भीतर से हो ही ये सदा जरुरी नहीं)। ये दो नाम बस प्रतीकात्मक हैं मेरे लिए, क्योंकि इनसे जुड़े व्यक्तित्व विवादित नहीं। मैं उनकी सभी बातों से सहमत होऊं, ये जरुरी नहीं। उनके बताये रास्ते पर ही चलूँ, यह भी जरुरी नहीं। लेकिन सैद्धांतिक तौर पर उनसे सहमति रहती है। बाक़ी सच यह है कि जब भी किसी पुरुष/स्त्री की बातों में (भौतिक सानिध्य में रही नहीं कभी) बुद्धत्व झलकता है तो मुझे तुरंत उससे प्रेम हो जाता है। और प्रेम का यह स्वरुप सबसे पवित्र होता है। वास्तव में ‘उससे’ शब्द भी गलत है। क्योंकि वह प्रेम एक ही क्षण में खुद से और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड से होता है, जिसे बिना किसी माध्यम के भी हम कई बार हम महसूस करते ही हैं। अध्यात्म इतना-इतना सुंदर है कि इसके लिए वाकई मैं ‘सब कुछ’ निस्तार किया जा सकता है और ‘सब कुछ’ स्वीकार भी किया जा सकता है। वस्तुत: ये तो परिणाम होते हैं। और दोनों ही विरोधी नहीं। कमी तो बस हमारे साहस और सहजता में हैं। 
  • 03/02/2018 - अख़बार न पढ़ना, टीवी न देखना, मूवीज न देखना, दुनिवायी समस्यायों पर अधिक चर्चा न करना, रोज होने वाली दुर्घटनाओं पर चिंता न प्रकट करना...ये सब चीजें किसी पर तटस्थ, उदासीन, लापरवाह, आत्ममुग्ध का तमगा चिपकाने के लिए काफी हैं। पर इसके बावजूद भी मुझे सबसे अधिक महत्वपूर्ण लगता है, उन सभी मनुष्यों, पशु-पक्षियों, जीव-जंतुओं, पेड़-पौधों से यथासंभव करुणापूर्ण सम्बन्ध स्थापित करना, जो मेरे आसपास हैं, जिनके मैं संपर्क में हूँ। वैसे तो किसी भी क्षण जब मन करुणामय हो तो उसका सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के ही साथ करुणापूर्ण सम्बन्ध होता है। पर मन में कई विकारों के रहते हुए, सामाजिक छवि या प्रतिष्ठा के लिए, भावुकता या अहंकार की वजह से, अपनी धन-संपत्ति और बल के चलते...कोई समाज सुधार या समाज सेवा कर मसीहाई छवि पा भी ले, लेकिन जाने क्यों मन वहां अधिक नहीं ठहर पाता। मन को वहीँ विश्राम मिलता है जहाँ किसी ने सदा के लिए सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड से करुणापूर्ण सम्बन्ध स्थापित कर लिया हो। वहीँ जाकर मन सबसे अधिक निर्मल और समर्पित हो पाता है। हम समस्या बने रहकर समाधान कैसे हो सकते हैं? पलायन और समाधान केंद्रित होने में एक बहुत बड़ा अंतर है। कुछ लोगों को बुद्ध (सभी) पलायनवादी लगते हैं, लेकिन मुझे वे सबसे अधिक समाधान केंद्रित लगते हैं। वे जिन्होंने सीधे समस्यायों की जड़ पर प्रहार किया। हम तो समस्यायों के सघन वन के एकाध पत्ते तोड़कर ही ख़ुश हो लेते हैं और यह भूल जाते हैं कि पत्ते फिर उग आएंगे, अलग-अलग रंग और रूप में। समस्यायों की शिफ्टिंग और समस्यायों के खात्मे में यही अंतर है। फिर कोई कहेगा कि जब कई बुद्ध हुए दुनिया में तो फिर समस्याएं क्यों हैं? मैं बस इतना ही कह सकती हूँ कि समस्याएं ‘मैं’ से शुरू होती हैं और समस्याएं ‘मैं’ पर ही आकर खत्म होती है। पहले 'मैं' का सम्बन्ध छद्म अहंकार से है और दूसरे 'मैं' का सम्बन्ध हमारे मूल स्वभाव (परम तत्व) से है। 
  • 24/01/2018 - बुद्ध के मामले में अक्सर यह प्रश्न उठता है कि उन्होंने प्रकृति के लिए या समाज के लिए कुछ ख़ास क्या किया? इस पर पहला जवाब मन में यही आता है कि उनके बाह्य तरीके उस समय के हिसाब से जो भी रहे हों, उनसे कुछ असहमतियां भी हो सकती हैं, लेकिन मानसिक मदद का कोई सानी कहाँ है? हम सामान्य जन जब तक या जिस क्षण इच्छाओं और हिंसा की दौड़ में हैं, किसी भी तरह से, तो हम किसी की मदद करते हुए भी उन्हें कम-ज्यादा इच्छाओं और हिंसा की दौड़ में ही लगायेंगे। वह जो रेस से बाहर हो चुका है, सभी को समझ तो सिर्फ वही ही पायेगा। अकर्मण्यता और अकर्ता (भाव) में बड़ा अंतर भी है। बाह्य कर्म आवश्यक होते हुए भी बहुत स्थूल भी हैं, भ्रम भी हैं।

Monika Jain ‘पंछी’

January 29, 2018

Quotes on Mother (Mother's Day) in Hindi

Mother Quotes

  • 15/02/2018 - कबूतर या कबूतरी जैसे ही अपने घोंसले पर आते हैं, बच्चे इस कदर उसकी चोंच में अपनी चोंच डालते हैं, मानों कच्चा ही चबा जायेंगे। मानव और प्राणी जगत के भूख के ऐसे कई दृश्य मुझमें अनासक्ति को बढ़ाते हैं। भूख वृत्ति या प्रकृति है। ममता भी कोई महानता नहीं, वह प्रकृति का एक रूप है - लेकिन एक सुंदर रूप। ममता और करुणा को कई जगह हम समानार्थी शब्दों की तरह प्रयुक्त कर देते हैं। लेकिन दोनों में अंतर है। ममता का सम्बन्ध आसक्ति से है, करुणा का अनासक्ति से। हाँ, ममता जब रक्त संबंधों और मोह से आगे बढ़ने लगती है, तब वह करुणा की ओर चल पड़ती है। 
  • 29/01/2018 - गाय जब बछड़े को जन्म देती है तो उसकी ममता उफान पर होती है। वह चाट-चाट कर बछड़े को नहला देती है। किसी संदिग्ध तत्व को आसपास फटकने नहीं देती/देना चाहती। इधर कबूतरी भी प्रकृति प्रदत्त ममत्व से उपजी तपस्या में लीन है। दिन-रात अंडे सेती रहती है। कबूतर कुछ दिनों से गायब है। बाहर तो खोज नहीं पाऊँगी तो सोचा गूगल करूँ। और फिर पता चला कि अंडे सेने के लिए कबूतर और कबूतरी दोनों प्रतिदिन निश्चित समयावधि की शिफ्ट करते हैं। पर दो-तीन दिनों से मैंने जब भी देखा, बस एक को ही देखा। दूसरा आसपास कहीं नज़र ही नहीं आता। नीचे कल का दाना-पानी भी जस का तस रखा है। माजरा क्या है? कुछ सालों से मैं यह तो समझ गयी हूँ कि न मेरे किये कुछ होने वाला है और ना ही मेरे ना करने से कुछ होगा। बल्कि सारी समस्या ही इस कर्ता भाव में है। क्योंकि कुछ होने और न होने के पीछे कार्य-कारण का एक अनन्त चक्र है। इसलिए मोह का कोई मतलब नहीं। बस समझ, उससे उपजा कर्म/अकर्म और स्वीकार्यता जरुरी है। वही सबसे दुर्लभ भी है। लेकिन बहरहाल मन में दो बातें हैं - एक यह कि बस धागे पर टिका है उनका आशियाना (क्योंकि उस दिन दोनों ओर चढ़कर सुई-धागे से ही डिब्बा फिक्स हो पाया), तो धागे की सलामती का सवाल है। और दूसरा यह कि जो दूसरा कबूतर अपनी शिफ्ट के लिए ना आ पाया तो यह वाला खाना कैसे खायेगा? 
  • 09/09/2017 - तुम्हें पता है कोई भी माँ अपने बच्चे की मृत्यु की कामना कब करती है? या तो उसका बच्चा इतना बुरा इंसान बन चुका हो कि उसका दुनिया से चले जाना ही सबके लिए श्रेयस्कर हो, या फिर उसका बच्चा बहुत-बहुत ज्यादा कष्ट में हो और उस कष्ट को दूर करने का कोई रास्ता ना हो। माँ जब अपने बच्चे को रोज-रोज अनगिनत संघर्षों तले जीते और मरते न देख सकती हो, तब माँ को लगता है कि बच्चे की मृत्यु ही उसकी कष्टों से मुक्ति है। और मेरी माँ दूसरी वाली है। 
  • 14/05/2017 - ...और कभी-कभी मैंने किसी-किसी को कहा है, 'मेरी मम्मा को आप कुछ नहीं बोल सकते।' (एक बार मम्मा की मम्मा को भी) 
  • 19/09/2016 - माँ की चोटी बनाना...जैसे बच्चे से अचानक बड़ा हो जाना।
  • 02/08/2016 - सीक्रेटली मैं इतनी नारीवादी हूँ कि घर में बड़ों से नेक्स्ट जनरेशन में सिर्फ लड़कियां ही लड़कियां हैं तब भी एक माँ के रूप में अगर कभी मैं किसी बच्चे की कल्पना करूँ तो वह लड़की ही होगी। :p (अब कोई कल्पना नहीं रही।)
  • 24/03/2016 - माँ की गोद सिर्फ बचपन में नहीं, हमेशा सबसे सुरक्षित जगह लगती है। (अब सहमत नहीं। अंतत: सुरक्षा भीतर ही मिलती है।) 
  • 07/03/2015 - थोड़े से दिन घर में अकेले रहना पड़ता है और पता चलता है कि माँ क्या होती है।
  • 04/02/2015 - जब भी मैं बच्चों के साथ अपने फोटोज शेयर करती हूँ तो शायद मेरे फेस एक्सप्रेशन्स की वजह से कुछ लोग मुझे उनकी माँ समझ लेते हैं। एक बार सोचती हूँ ग़लतफ़हमी दूर करूँ पर फिर दिल नहीं करता। कुछ ग़लतफ़हमियाँ अच्छी लगती है न? वैसे 2-3 बार ऐसा हुआ भी है जब मेरी नीसेज ने मुझे मम्मा बोल दिया, और तब कुछ पलों के लिए जो महसूस हुआ उसे शब्दों में जाहिर नहीं कर सकती। 'माँ' शब्द ही शायद इतना चमत्कारी है और इससे जुड़े अहसास भी। दूसरी और बच्चा बनकर रहना भी मेरा सबसे फेवरेट काम है। कभी-कभी समझ नहीं आता एक ही दिल में माँ-बच्चा सब कैसे रह लेते हैं? एक ही दिल में कितने सारे रिश्ते जी लेते हैं हम लोग।
  • माँ और पापा की लड़ाई में मैं थोड़ी सी पक्षपाती हूँ। मैं माँ की साइड ज्यादा लेती हूँ। लेकिन अकेले में समझाती भी अक्सर माँ को ही हूँ। 

Monika Jain ‘पंछी’

December 3, 2017

Story on Fear (Snake Phobia) in Hindi

भय 

हम मनुष्य कभी-कभी कितने बेकार के डर पाल लेते हैं। कभी जानकारी और जागरूकता की कमी के चलते तो कभी कुछ खो देने की आशंका के चलते। मैंने गहरे चिंतन की मुद्रा में कहा। 

एक लम्बी यात्रा रही है मनुष्य के विकास की। आनुवंशिकता, परिवेश, परिवार, मूल प्रकृति, परस्पर प्रभाव...बहुत सी चीजें हैं। मनुष्य अपने और दूसरों के लिए जितना अच्छा हो सकता है, वह उतना ही बुरा भी हो सकता है। उसने बात आगे बढ़ाते हुए कहा। 

हाँ, यह विकल्प बस मनुष्य के ही पास है। 

मेरा एक सहपाठी था। उसे रास्ते में चलते हुए हमेशा साँप के काट खाने का भय रहता था। उसे लगता था कि अभी अचानक कहीं से सांप आ जाएगा और उसे काट खायेगा। उसके इस डर के चलते कुछ लोग उसका मजाक भी उड़ाते थे। 

इस तरह मजाक उड़ाना तो गलत है न! हम सभी मनुष्यों के जीवन में न्यूनाधिक कोई न कोई भय विद्यमान रहते ही हैं। हाँ, यह अतिरिक्त रूप से पाला-पोसा गया भय था। क्या उसे या उसके किसी परिचित को बचपन या कभी और किसी सांप ने काटा था? 

हाँ, उसके साथ बचपन में सर्पदंश की घटना हुई थी और तभी से यह डर उसके साथ हर रास्ते (विशेष रूप से सुनसान) पर चलता था। 

अवचेतन में बैठे कुछ डर बचपन की किसी घटना या दृश्य से संबंधित ही होते हैं। तुमने उसे समझाया नहीं कि इस तरह डरना फ़िजूल है? इस तरह तो वह हर रोज उस घटना को जी रहा है। 

मैंने समझाया था। उसने कहा कि वह सब कोशिशें कर चुका है, लेकिन पूरी तरह इस डर को काबू नहीं कर पाता। 

शायद उसे किसी जानकार के परामर्श की जरुरत है। बाकी मुझे लगता है उसे अपने मन में सांप के साथ थोड़ा सहज-सतर्क रिश्ता कायम करने की कोशिश करनी चाहिए कि बेवजह काटना उसका शौक नहीं। वह खुद भी तो भय और असुरक्षा के चलते ही काटता है। वह हमारा शत्रु नहीं है। हम मनुष्यों के पास जरूर यह विकल्प होता है कि हम अपने भयों से छुटकारा पा सकते हैं। कम से कम अतिरिक्त भयों से तो पा ही सकते हैं। 

अच्छा जैसे तुम्हें तो सांप से डर लगता ही नहीं। उसने हंसकर मुझे चिढ़ाते हुए कहा। 

मैंने कहा तो सबके अपने-अपने न्यूनाधिक डर रहते हैं। मेरे भी कुछ थे और कुछ हैं। सांप से भी लगता है। पर इस तरह साथ नहीं रहता। सांप के बच्चों से तो नहीं लगता। कभी-कभी बारिश के दिनों में घर में भी आ जाते थे और तब मैं उन्हें बाहर छोड़ आती थी। पर एक बार माँ ने बाहर सड़क पर थोड़ा दूर एक बड़े से सांप को बहुत तेज रेंगते हुए देखा था और अंदर आकर मुझे बताया था। मैं उत्सुकता से उसे देखने बाहर आयी तब तक वह सांप हमारे घर की सीढ़ियों के बिल्कुल पास से गुजर रहा था। वह बहुत लम्बा, मोटा और इतने गहरे काले रंग का था कि उसे देखते ही मन में डर की एक लहर कौंध पड़ी। मैंने जरा सा ध्यान हटाया जितने में वह जाने कहाँ चला गया। फिर कुछ देर में मैंने बाहर की फाटक खोली तो अचानक एक लहराता हुआ फन मेरे करीब आया। वह फाटक से सटी दीवार में बनी ताक में बैठा था। मैं तुरंत पीछे हट गयी और फाटक बंद कर दी। कुछ देर बाद वह चला गया। पर बाद में मैं यह सोच रही थी कि शुरू में जब मैंने उसे सड़क पर घर के पास से गुजरते हुए देखा था तब मुझमें डर की लहर क्यों कौंधी थी? जबकि वह तो उस समय मेरे साथ कुछ कर भी नहीं रहा था। कंडीशनिंग ही सही पर यह अनावश्यक भय है न! और तब मैंने सोचा था कि अगली बार मैंने सांप को सिर्फ गुजरते देखा तो कोशिश करुँगी कि डरूं नहीं। 

हाँ, बहादुर हो तुम तो। फिर थोड़ी देर चुप रहकर वह बोला - अरे! तुम्हारे पीछे साँप! 

मैंने थोड़ा चौंक कर पीछे देखा। और फिर आगे मुड़ी तो उसे हँसता हुआ देख मुंह बनाकर उसके साथ खिलखिलाकर हंस पड़ी। 

Monika Jain ‘पंछी’
(03/12/2017)