May 10, 2018

Poem on Non Existence of God in Hindi

(1)

ईश्वर नहीं है 

काल से सम्बद्ध 
उस त्रिविमीय आकाश में
एक कण की स्थिति 
जो तुम्हारे लिए थी 
वह मेरे लिए नहीं थी
जो मेरे लिए थी 
वह तुम्हारे लिए नहीं थी 
ईश्वर का अस्तित्व प्रश्न के घेरे में था 
भीतर बैठे नास्तिक मन ने उद्घोष किया -
बताओ अब कैसे संभव होगा 
एक निरपेक्ष ईश्वर का अस्तित्व?
पर ईश्वर की इस अस्तित्वहीनता पर 
मन का आस्तिक कोना ख़ुश था
क्योंकि यह अस्तित्वहीनता 
ईश्वरत्व के पक्ष में जाती थी
और ‘ईश्वर नहीं है’ यह वाक्य 
मेरे खोजी मन को 
‘ईश्वर है’ से सदा अधिक प्रिय रहा। 

मोनिका जैन ‘पंछी’
(10/05/2018)

(2)

ईश्वर की कविताएँ

(i)

एक विशाल नरकट के कंडे से 
लिखनी थी मुझे ईश्वर की कविता!
मैं एक बच्चे की हथेली में 
अपनी उंगली देकर 
थोड़ी दूर टहल आया।

(ii)

तुम्हारी हर एक कृति पर 
महसूसा मैंने एक महाकाव्य! 
बस उसे लिख नहीं पाया।
तुम कैसे बन गए 
लिब, खुसरो, पिकासो, 
मीर, वॉन गॉग, टैगोर,
गांधी या कन्फ्यूशियस,
बुद्ध या रामकृष्ण 
या जितनी भी-कैसी भी 
चीज़ेें देखी सुनी हैं?

सब तुम ही तो हो 
उन सब के रूप में।

महसूस होने की हद तक 
जा जा के लौट आए तुम! 
हर एक भाव की 
ख़ूबसूरती देखी मैंने, 
बस लिख नहीं पाया।

ईश्वर! 
तुम में लिखे जाने की 
इच्छा नहीं होती क्या?

(iii)

अरे ओ ईश्वर! 
चाय पीयोगे? 
चलो बन-बटर ही खा लो। 
नहीं?
बड़े बोर हो यार! 
बिना चाय सिर दर्द नहीं होता?
लो मूंगफली ही खाओ - 
इसे रिश्वत समझना हो तो समझो/ले लो 
और किसी को भूखा मत मारो ईश्वर!
चाहो तो दो तीन फलियाँ और ले लो...

अमन त्रिपाठी 

April 29, 2018

Free Will, Matter and Consciousness (in Hindi)

जड़, चेतन व स्वतंत्र इच्छा

विज्ञान अभिव्यक्ति (भाषा) के स्तर पर यूनिवर्सल है और दर्शन (अपने विशुद्ध रूप में) अनुभूति के स्तर पर यूनिवर्सल है। दर्शन ने कभी अभिव्यक्ति पर ढंग से ध्यान ही नहीं दिया। अभिव्यक्ति यहाँ हमेशा व्यक्ति की प्रकृति, शिक्षा व परिवेश से प्रभावित होती है। दर्शन में भी जो लोग बाहर भी ग्रूम कर लेते हैं, उनकी अभिव्यक्ति उतनी ही स्पष्ट व तर्क संगत होती है। कुछ दार्शनिक रहे हैं ऐसे। पूर्ण स्पष्टता भाषा व मन की सीमाओं के चलते संभव नहीं। इसके अलावा समझ के हर स्तर पर हर व्यक्ति का दर्शन अलग होता है जो समझ बढ़ने के साथ बेहतर होता है और उसमें बदलाव आते हैं। दर्शन शरीर को भी साधन मानता है और मन को भी। यही कारण है कि योग शुरुआत होती है अक्सर, जिसका सम्बन्ध मुख्यत: शरीर से है। कारण शारीरिक बाधाओं का मिटना मानसिक बाधाओं के मिटने में सहयोगी है। पर एक बार मानसिक बाधा मिट गयी तो उसके बाद शारीरिक बाधाएं बाधा नहीं रहती। मन इसलिए महत्वपूर्ण है वहां। मन को विशुद्द चेतना माना ही नहीं गया है। उसका भौतिक पक्ष भी है जो परमाणुओं/रसायनों से ही बना है, जो निरंतर परिवर्तनशील है। पुद्गल, परमाणु, अणु जैसे शब्दों का प्रयोग होता रहा है इसके लिए। 

रसायन प्रतिक्रिया देते हैं और बोध प्रत्युत्तर। प्रतिक्रिया और प्रत्युत्तर दोनों ही मौन भी हो सकते हैं और मुखर भी। अंतर विचलन और अविचलन का है बस। जब जड़ चेतना पर हावी होता है तो मन (प्रतिक्रियावादी) होता है। जब चेतना जड़ से मुक्त होती है तो अमन (प्रत्युत्तर) की स्थिति होती है। जड़ और चेतन के समिश्रण में कौन प्रभावी है इसी से सुषुप्ति और जागृति के विभिन्न स्तर तय होते हैं। प्रश्न यह ज़रूर है कि चेतन से जड़ की उत्पत्ति हुई या जड़ से चेतन की या दोनों सदा से रहे हैं। 

सामान्यत: मनुष्य सहित सभी प्राणियों के मामले में अर्धचेतना (अलग-अलग स्तर) की स्थिति होती है, विशुद्ध चेतना नहीं। डर, घृणा, ईर्ष्या, मोह...ऐसे जितने भी संस्कारित भाव हैं, ये सभी चेतना पर जड़ का हावी होना है। चेतना की उत्पत्ति पदार्थ से यहाँ सिद्ध नहीं हो रही है। पदार्थ ही विभिन्न प्रभावों में आकर रूप बदलता है। ऐसे में एक विश्वव्यापी चेतना या बोध होना तो चाहिए, अन्यथा सब कुछ सिर्फ पदार्थ के बूते चलना संदिग्ध लगता है। वह चेतना किसी भी व्यक्ति के मामले में कब कितनी एक्सेस हो पाती है, यह अलग-अलग है। जैसे निडरता सजग भी होती है और बेहोशी में भी। छोटा सा बच्चा सांप को पकड़ सकता है। ये निडरता नहीं, अर्धचेतना या बेहोशी है। असल निर्भयता, प्रेम, शांति, सुकून सजग होते हैं, कंडिशन्ड या रासायनिक नहीं। यही से स्वतंत्र इच्छा का प्रश्न उत्पन्न होता है।

मैं और एक मित्र जब भी आध्यात्मिक विषयों पर कुछ चर्चा करते हैं तो अंत में वह यही कहता है कि कुछ भी हमारे हाथ में कहाँ है? हमारा जो भी जीवन है वह तय है। उसे वैसा ही होना था। कोई बुद्ध बनेगा या अंगुलिमाल ये वे तय नहीं कर सकते थे। विज्ञान भी अब तक यही कहता है कि ‘स्वतंत्र इच्छा’ जैसा कुछ नहीं होता। सब कुछ पहले ही रसायनों द्वारा तय हो चुका होता है। इसी बात पर अक्सर यह कहा जाता है कि ऐसे तो पूरी न्याय व्यवस्था ही ढह जायेगी। क्योंकि कोई भी अपराधी यह तर्क देगा कि उसने कुछ नहीं किया, जो भी किया रसायनों ने किया। 

बहुत से बिंदु हैं जो इस विमर्श में अनदेखे रह जाते हैं। सबसे पहले तो यह कि जब हम कहते हैं कि ‘हमारे’ हाथ में कुछ नहीं, ‘हम’ तय नहीं करते...तो यहाँ ‘हमारे’ या ‘हम’ से हमारा आशय क्या होता है? निश्चित रूप से हम खुद को यहाँ रसायन तो नहीं ही मान रहे हैं। बल्कि एक व्यक्तिगत चेतना मान रहे हैं। इस तरह से कोई भी सामान्य मनुष्य अपनी पहचान व्यक्तिगत चेतना के रूप में महसूस करता है। अध्यात्म इससे थोड़ा इतर यह भी कहता है कि व्यक्तिगत चेतना छद्म अहंकार है। हम सभी का असल स्वरुप एक ही है। और उस स्तर पर जो विशुद्ध चेतना है उसे कोई कष्ट या दुःख नहीं होता, क्योंकि वह प्रकृति से परे या मुक्त है। बस हमें उस स्तर तक पहुँचना होता है, जो कि कोSहम का उत्तर है। 

फिर यह कि इच्छा स्वतंत्र कैसे हो सकती है, वह सम्बंधित ही होगी। भविष्य भूत से ही निकलता है। स्वतंत्र होना तो वर्तमान होना है, चेतना होना है। और इस तरह चेतना द्वारा इच्छा से स्वतंत्र हुआ जा सकता है, लेकिन इच्छा स्वतंत्र नहीं हो सकती, सबंधित ही होगी, सापेक्ष ही होगी। हाँ, यह ज़रूर है कि चेतना का इच्छा से स्वतंत्र होना व्यक्तिगत चेतना को तो नियति ही लगता है। कोई बुद्ध होता है, इसके पीछे भी कारण-प्रभाव की एक लम्बी शृंखला होती है। लेकिन यह भी व्यक्तिगत चेतना का दृष्टिकोण है। विशुद्ध चेतना का नहीं। क्योंकि वह तो समय और स्थान से परे है। 

बाक़ी करने वाले तो रसायन ही होते हैं, प्रकृति ही होती है, जड़ का चेतना पर प्रभाव होता है, व्यक्तिगत चेतना, मन या छद्दम अहंकार होता है। क्योंकि विशुद्ध चेतना को अकर्ता ही कहा गया है। दृष्टा होना या साक्षित्व इसलिए इतना महत्वपूर्ण है, जहाँ आप यह देख पाते हैं कि जो कर रहा है वह आप नहीं है। और फिर भोगने वाले भी तो रसायन, व्यक्तिगत चेतना, मन या छद्म अहंकार ही हैं। विशुद्ध चेतना भोक्ता भी नहीं है। कोई यह कहकर बच तो नहीं सकता कि सब कुछ रसायनों ने किया, क्योंकि सजा का अनुभव भी तो रसायनों का ही खेल है। 

अहंकार खुद को बहुत चालाकी से बचाता है। वह करने के समय चेतना को नहीं मानना चाहता, लेकिन भोगने के समय उसे चेतना का अहसास होता है। हालाँकि दोनों क्षणों पर मनुष्य चेतना के अलग-अलग स्तरों पर भी हो सकता है, इसलिए भी। जिसने किया और जो भोग रहा है वे वाकई अलग-अलग हैं। और कई ऐसे फल होते हैं, जिसमें व्यक्ति का कोई हाथ नज़र आता ही नहीं। इसके अलावा सब कुछ सम्बंधित है, इसलिए न किसी एक का कोई दोष होता है और न ही कोई एक भोक्ता होता है। फिर भी व्यक्ति के स्तर पर कर्ता और भोक्ता व्यक्तिगत चेतना, मन या छद्म अहंकार ही है। विशुद्ध चेतना करने और भोगने से मुक्त है। पर यहाँ अध्यात्म में व्याख्या में कुछ भेद हैं। बाक़ी सारे दर्शनों से इतर बुद्ध का दर्शन विभिन्न सापेक्षताओं से उपजी शून्यता की बात करता है। किसी निरपेक्ष सत्ता को वह नहीं स्वीकारता। पर शून्य और विशुद्ध चेतना को एक ही समझा जाता है। क्योंकि बुद्ध में भी वही रूपांतरण आता है जो महावीर या किसी अन्य सिद्ध स्त्री/पुरुष में आता है। और विशुद्ध चेतना का कोई भौतिक अस्तित्व होता भी नहीं तो उसे शून्य कहा जा सकता है। पर ये दोनों एक हैं या अलग यह स्पष्टत: तो तभी पता चलेगा जब उस स्तर तक पहुँचेंगे। खैर! यह कुछ अनुभूतियों और समझ से उपजा विमर्श और चिंतन है, कोई घोषणा नहीं। देखते हैं आगे क्या होता है। 

मोनिका जैन ‘पंछी’
(29/04/2018)

April 27, 2018

Knowledge vs Information Essay in Hindi (Truth vs Fact)

सत्य सूचनाओं का ख़ज़ाना नहीं 

मैं मान लेती उन तमाम तर्कों को...गर सत्य सूचना होता और खोज के बाद सब में प्रसाद की तरह बाँटा जा सकता होता। पर अफ़सोस कि यह सर्वव्याप्त होकर भी नितांत वैयक्तिक है। और यह मन कितना फरेबी है। यह खुद को कायम रखते हुए भी सच जान लेना चाहता है। यह जानते हुए भी कि सत्य को मुक्ति, आनंद, अमन...से अलग रखा भी कैसे जा सकता है? 

धर्म/अध्यात्म/दर्शन ने बाह्य जगत, सृष्टि की उत्पत्ति, विकास और विनाश को कितना सही जाना, पता नहीं। उस ओर कभी अधिक रूचि रही भी नहीं। बहुत सी मान्यताएं गलत भी सिद्ध होती रही हैं। हम खुले रहते हैं तो नया जो अधिक तर्कसंगत हो उसे अपनाने में कोई समस्या कभी आती भी नहीं। पृथ्वी गोल हो पर उसे हर हाल में चपटी ही माना और मनवाया जाये, पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती हो पर इस बात पर किसी को सजा हो जाए, वहां वास्तविक धर्म था ही कब? कोरी कट्टरता थी, अन्धता थी, गहरे संस्कार थे। धर्म/दर्शन/अध्यात्म आंतरिक जगत के क्षेत्र अधिक रहे हैं। वहां भी सभी के लिए सब कुछ स्पष्ट नहीं। बहुत सी मान्यताएं गलत भी हो सकती हैं। लेकिन प्राचीनता और नवीनता का सम्बन्ध समय से है, बीतने से है। मन भी बीतता ही है, उसे समय कहा भी गया है। लेकिन मनोजगत के द्वंद्व तो हर युग में एक से ही रहे हैं। 

वृत्तियों की सत्ता हर कोई क्यों स्वीकार करे? कबूतर के लिए जो डिब्बा फिक्स किया था, वहां इतने से महीनों में नन्हें कबूतर शृंखला तीन शुरू हो चुकी है। मुझे थोड़ा आश्चर्य हो रहा है यह देखकर कि ये कबूतर-कबूतरी क्या पूरा जीवन ऐसे ही अण्डों को सेते-सेते बिताने वाले हैं? चींटियों और मधुमक्खियों को देखें तो वहां पर नर की उपयोगिता सिर्फ रानी के गर्भाधान की और उसका जीवन भी बस उतना ही क्योंकि आगे उसकी कोई उपयोगिता नहीं। मकड़ियों की मैटिंग के दौरान तो नर को मर जाते देखा भी है। ऐसे ही भूख, प्यास, हिंसा, लालच, संग्रह, क्रोध, मोह, लगाव, भावुकता, अज्ञान...और ढेरों ऐसी जटिलताएं हैं, सभी के जीवन की अलग-अलग, अलग-अलग तरह के लोगों से घिरी हुई। हम जन्म नहीं चुन सकते, मृत्यु नहीं चुन सकते, अपने जीवन के कई लोगों को नहीं चुन सकते, परिस्थितियों को नहीं चुन सकते। और दर्शन की किसी मान्यता अनुसार यदि हमने चुना भी हो तो वो चुनाव तो बेहोशी में था।

कोई जिसका सामना जन्म से ही कई मोर्चों पर अपार मुश्किलों से हो रहा हो और वह यह जानता भी न हो कि उसके ही साथ ऐसा क्यों? फिर उसमें जरा सी कमी भी लोगों को स्वीकार न हो। उस इंसान को हौसला कहाँ से मिलेगा? सिर्फ विज्ञान देगा? बिन सोचे-समझे-जाने होती आलोचनाएँ, पूर्वाग्रह और परफेक्शन की अपेक्षाएं देंगी? बीच मुश्किल में छोड़ जाने वाले मतलबी लोगों के मतलबी वादे देंगे? निरंतर मदद मांगती आवाजें देंगी? वे लोग जो प्यार तो करते हैं, जानते और समझते भी हैं, लेकिन चाहकर भी मदद कर नहीं सकते, वे देंगे? नहीं! अंतत: मदद उसे आंतरिक जगत में ही मिलेगी। अपने जीवन में समस्याएं न भी हों, सब कुछ बेहतर हो तब भी आसपास चलती समस्याएं जब विचलित करती हैं, तब उन समस्यायों का मूल भी सम्यक दर्शन या अध्यात्म ही समझाता है। पर अध्यात्म कोई सहारा नहीं समस्त सहारों से मुक्त होने की प्रक्रिया है। अध्यात्म कोई जड़ता नहीं, समस्त जड़ताओं के छूटने की प्रक्रिया है। यह आत्मकेंद्रित होने की नहीं, कण-कण में आत्म की अनुभूति का मार्ग है। 

कोई व्यक्ति जिसके पास ढेरों सूचनाएँ हों, पूरे ब्रह्माण्ड का ज्ञान हो और कोई ऐसा व्यक्ति जो अनपढ़ हो, जिसे विज्ञान और इसके तथ्यों का कुछ खास पता न हो। संभव है कि पहला व्यक्ति जड़ और आत्मकेंद्रित ही रहे, जबकि दूसरा व्यक्ति चेतना के उच्चतम स्तर तक पहुँच जाए, जहाँ उसके लिए कोई पराया रहे ही नहीं। सूचना और सच का यह अंतर है। बुद्धि और बोध का यह अंतर है। क्योंकि सूचनाओं और घटनाओं का तो कोई अंत है ही नहीं। हम मर जायेंगे लेकिन इन्हें जानना कभी खत्म नहीं होगा। ऐसे में जिन्हें सत्य चाहिए, मुक्ति चाहिए, वे क्या केवल सूचनाओं और मशीनों के भरोसे बैठे रहेंगे? सूचनाओं और घटनाओं की उपयोगिता भी बस इतनी ही है कि वे हमें हमारे मूल स्वरुप तक पहुँचने के लिए प्रेरित करे। बाक़ी जिस युग में मशीनों पर भरोसे बढ़ते हैं, उस युग में तो इंसानी विश्वास भी दरकते हैं। ऐसे में मेरा भरोसा सहज ज्ञान पर मशीनों से कुछ अधिक ही रहेगा। सहज ज्ञान कहा संस्कारित ज्ञान नहीं। संस्कारित तो फिर एक ख़तरनाक मशीन है। 

मुझे नहीं पता कि अध्यात्म का मार्ग किसी को किन्हीं वैज्ञानिक तथ्यों तक पहुँचा सकता है या नहीं, क्योंकि यह सूचनाओं का नहीं सत्य का अन्वेषण है। पर यह आत्म विकास की राह देता है, संस्कारों से मुक्ति व स्वतंत्रता की राह भी। इसका प्राचीनता से क्या सम्बन्ध है यह समझ से परे है। यह तो नित नूतन नवीन है। और फिर वह सत्य ही क्या जो बाहर मिल जाए पर खुद से प्रकट और प्रतिबिंबित भी न हो। सत्य सत्य में रुपांतरण है, सूचनाओं का ख़ज़ाना नहीं। 

मोनिका जैन ‘पंछी’
(27/04/2018)