December 3, 2017

Story on Fear (Snake Phobia) in Hindi

भय 

हम मनुष्य कभी-कभी कितने बेकार के डर पाल लेते हैं। कभी जानकारी और जागरूकता की कमी के चलते तो कभी कुछ खो देने की आशंका के चलते। मैंने गहरे चिंतन की मुद्रा में कहा। 

एक लम्बी यात्रा रही है मनुष्य के विकास की। आनुवंशिकता, परिवेश, परिवार, मूल प्रकृति, परस्पर प्रभाव...बहुत सी चीजें हैं। मनुष्य अपने और दूसरों के लिए जितना अच्छा हो सकता है, वह उतना ही बुरा भी हो सकता है। उसने बात आगे बढ़ाते हुए कहा। 

हाँ, यह विकल्प बस मनुष्य के ही पास है। 

मेरा एक सहपाठी था। उसे रास्ते में चलते हुए हमेशा साँप के काट खाने का भय रहता था। उसे लगता था कि अभी अचानक कहीं से सांप आ जाएगा और उसे काट खायेगा। उसके इस डर के चलते कुछ लोग उसका मजाक भी उड़ाते थे। 

इस तरह मजाक उड़ाना तो गलत है न! हम सभी मनुष्यों के जीवन में न्यूनाधिक कोई न कोई भय विद्यमान रहते ही हैं। हाँ, यह अतिरिक्त रूप से पाला-पोसा गया भय था। क्या उसे या उसके किसी परिचित को बचपन या कभी और किसी सांप ने काटा था? 

हाँ, उसके साथ बचपन में सर्पदंश की घटना हुई थी और तभी से यह डर उसके साथ हर रास्ते (विशेष रूप से सुनसान) पर चलता था। 

अवचेतन में बैठे कुछ डर बचपन की किसी घटना या दृश्य से संबंधित ही होते हैं। तुमने उसे समझाया नहीं कि इस तरह डरना फ़िजूल है? इस तरह तो वह हर रोज उस घटना को जी रहा है। 

मैंने समझाया था। उसने कहा कि वह सब कोशिशें कर चुका है, लेकिन पूरी तरह इस डर को काबू नहीं कर पाता। 

शायद उसे किसी जानकार के परामर्श की जरुरत है। बाकी मुझे लगता है उसे अपने मन में सांप के साथ थोड़ा सहज-सतर्क रिश्ता कायम करने की कोशिश करनी चाहिए कि बेवजह काटना उसका शौक नहीं। वह खुद भी तो भय और असुरक्षा के चलते ही काटता है। वह हमारा शत्रु नहीं है। हम मनुष्यों के पास जरूर यह विकल्प होता है कि हम अपने भयों से छुटकारा पा सकते हैं। कम से कम अतिरिक्त भयों से तो पा ही सकते हैं। 

अच्छा जैसे तुम्हें तो सांप से डर लगता ही नहीं। उसने हंसकर मुझे चिढ़ाते हुए कहा। 

मैंने कहा तो सबके अपने-अपने न्यूनाधिक डर रहते हैं। मेरे भी कुछ थे और कुछ हैं। सांप से भी लगता है। पर इस तरह साथ नहीं रहता। सांप के बच्चों से तो नहीं लगता। कभी-कभी बारिश के दिनों में घर में भी आ जाते थे और तब मैं उन्हें बाहर छोड़ आती थी। पर एक बार माँ ने बाहर सड़क पर थोड़ा दूर एक बड़े से सांप को बहुत तेज रेंगते हुए देखा था और अंदर आकर मुझे बताया था। मैं उत्सुकता से उसे देखने बाहर आयी तब तक वह सांप हमारे घर की सीढ़ियों के बिल्कुल पास से गुजर रहा था। वह बहुत लम्बा, मोटा और इतने गहरे काले रंग का था कि उसे देखते ही मन में डर की एक लहर कौंध पड़ी। मैंने जरा सा ध्यान हटाया जितने में वह जाने कहाँ चला गया। फिर कुछ देर में मैंने बाहर की फाटक खोली तो अचानक एक लहराता हुआ फन मेरे करीब आया। वह फाटक से सटी दीवार में बनी ताक में बैठा था। मैं तुरंत पीछे हट गयी और फाटक बंद कर दी। कुछ देर बाद वह चला गया। पर बाद में मैं यह सोच रही थी कि शुरू में जब मैंने उसे सड़क पर घर के पास से गुजरते हुए देखा था तब मुझमें डर की लहर क्यों कौंधी थी? जबकि वह तो उस समय मेरे साथ कुछ कर भी नहीं रहा था। कंडीशनिंग ही सही पर यह अनावश्यक भय है न! और तब मैंने सोचा था कि अगली बार मैंने सांप को सिर्फ गुजरते देखा तो कोशिश करुँगी कि डरूं नहीं। 

हाँ, बहादुर हो तुम तो। फिर थोड़ी देर चुप रहकर वह बोला - अरे! तुम्हारे पीछे साँप! 

मैंने थोड़ा चौंक कर पीछे देखा। और फिर आगे मुड़ी तो उसे हँसता हुआ देख मुंह बनाकर उसके साथ खिलखिलाकर हंस पड़ी। 

Monika Jain ‘पंछी’
(03/12/2017)

November 21, 2017

Poem on Gautam Buddha (Buddha Purnima) in Hindi

बुद्ध 

सुनो बुद्ध -

हो चुके होंगे तुम मुक्त
अभी मनुष्यों ने नहीं दिया है निर्वाण तुम्हें
आये दिन तुम खड़े होते हो मुजरिम बनकर
किसी न किसी गृहस्थ प्रबुद्ध के कटघरे में।
कसूर वही चिरंतन स्त्री पलायन।

पर तुम समझते हो
सिद्धार्थ भी तो अटका था दो ही चीजों में
धन और काम
इन ही दो पाटों के बीच पिस जाते हैं
सभी सांसारिक बोधिसत्व।
पर तुम कह तो सकते हो
वो तुम नहीं सिद्धार्थ था
चलो मैं कह देता हूँ।

सुनो गृहस्थ प्रबुद्धों -

कोई बुद्ध नहीं करता पलायन
सिद्धार्थ ही करते हैं।
बुद्ध पकड़ते ही नहीं
तो त्यागने का प्रश्न नहीं
सिद्धार्थ को लगता है
कि उसने पकड़ा है
सो वो ही त्यागता है
फिर सभी कुछ तो त्यागता है वो भी
तुम ही क्यूँ अटक जाते हो स्त्री पर?

फिर ये भी तो बताओ
कि लौट आये थे बुद्ध!
हर सिद्धार्थ का बुद्ध जब जन्मता है
तो स्वीकारता है वो सब
जो भूल गया था सिद्धार्थ
नि:शब्द खड़े सुनते भी तो हैं
यशोधरा के व्यथित ह्रदय को
क्या सिद्धार्थ सुन पाता?

बुद्ध के शून्य में ही समा पाता है
हर यशोधरा का प्रेम; जानती है
सिद्धार्थ में कुछ तो भोग था ही
अब यशोधरा भी समर्पित है भिक्षुणी होकर।

बस मानवों तुम्हारा ही शूल नही निकलता
पूछो अपने अंदर के सिद्धार्थ से
कितना बुद्ध पनपा है अभी
उत्तर में पाओगे स्वयं को नतमस्तक
बुद्ध के बुद्धत्व के सम्मुख
और वो शांत होंगे सदा की भाँति
इक मद्धिम मुस्कान लिए।

Sushil Kumar

November 10, 2017

Essay on Truth in Hindi

सत्य

07/03/2017 - बीते एक साल से ऐसा लगभग हर दूसरे दिन होता है कि इस अस्तित्व को लेकर मेरे मन में कोई प्रश्न खड़ा होता है और अगले ही पल या कुछ समय बाद मेरे सामने उसी से जुड़ी कोई बात पढ़ने को आ जाती है। जैन दर्शन में मैंने कालचक्र की अवधारणा पढ़ी थी। जिसके अनुसार सम्पूर्ण कालचक्र को दो भागों में बाँटा जाता है - उत्सर्पिणी (आरोही) काल और अवसर्पिणी (अवरोही) काल। दोनों हिस्सों के 6 भाग हैं। हर आधे चक्र में 63 शलाका पुरुष होते हैं। जिनका सम्बन्ध धर्म की स्थापना और मनुष्यों को संसार चक्र से मुक्त कराने से होता है। हिन्दू दर्शन में भी कालचक्र की ऐसी ही मिलती-जुलती अवधारणा है। बाकी पंथों का मुझे पता नहीं। यह अवधारणा कितनी सही है या गलत इस बारे में मुझे बिल्कुल नहीं पता। धर्म का जो विद्रूप रूप कभी-कभी सामने आता है, उसे देखकर मन कभी-कभी बेवजह के कर्म-कांडों के प्रति वितृष्णा से भी भर उठता है। सरलता और  गहनता मुझे पसंद है, लेकिन अगर कुछ पलों के लिए सही माने तो कालचक्र की यह अवधारणा पढ़कर मन में यही विचार आया कि इसका मतलब सब कुछ एक निश्चित नियम से अनन्त काल से चल रहा है। फिर अगला प्रश्न यह कि जब सबको मुक्त ही होना है तो फिर ये बेवजह की नौटंकी क्यों चल रही है? हर जीव के लिए कितना संघर्ष है यहाँ और हासिल तो कुछ भी नहीं। कल यही सोच रही थी, फिर आज सुबह अचानक पढ़ने में आया कि माया सत्य की शक्ति है स्वयं को भूल जाने की। सत्य पूर्ण है। सत्य की प्रत्येक शक्ति अपरीमित है, असीमित। और उसे प्रत्येक शक्ति हासिल है। प्रत्येक शक्ति उसी से है, उसी में निहित है, उसी की है। जब उसे सारी शक्तियां और सारे अधिकार हैं तो उसे यह भी अधिकार है न कि वह खुद को भूल जाए। बस सत्य का खुद को भूल जाना ही संसार का रूप ले लेता है।

कालचक्र की इस तरह से अवधारणा को मैं अभी सच नहीं मानती। और क्योंकि पता नहीं तो पूरी तरह नकार भी नहीं सकती। लेकिन जैसे समय, स्थान और बाकी सब चीजें सापेक्ष हैं तो चिंतन के तौर पर यह विश्वास पक्का हुआ जाता है कि पूर्ण सत्य की अनुभूति समय और स्थान की सीमाओं से परे जाने पर होती ही होगी। अनंत और शून्य का जिक्र भी इस सन्दर्भ में समझ आता है।

अक्सर नास्तिकों द्वारा यह सवाल उठता है कि आपका ईश्वर इतना बेरहम क्यों है जो यह सब होने देता है? सवाल वाजिब है। और आस्तिक कहते हैं कि ईश्वर की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता मतलब सब कुछ उसकी ही मर्जी से होता है। मैं यहाँ पर बस इतना कहूँगी कि ईश्वर (सत्य) अलग से कोई व्यक्ति नहीं है। वह आप, मैं या जो कुछ भी इस दुनिया में है और नहीं है...सब कुछ है। बात मुझे अब सही भी लगती है कि सत्य अच्छे-बुरे या उचित-अनुचित की सीमाओं में बंध ही कैसे सकता है? बंध सकता होता तो सत्य कैसे होता? वह तो माया के रूप में इन्हें समाहित करता हुआ भी इनसे परे (अछूता) ही होगा। तो पूर्ण सत्य जैसा कुछ होना तो चाहिए ही। मुख्य बात यह है कि हमें उसकी स्थायी अनुभूति कब होती है। 

10/11/2017 - कई लोगों को लगता है कि सापेक्षता को समझते हुए निरपेक्षता की ओर कदम बढ़ना (जो कि स्वत: ही होता है, समझ के अनुपात में) उदासीनता है, समस्यायों से मुंह चुराना है, पल्ला झाड़ना है, पलायन है और कुछ लोगों के दृष्टिकोण से असंवेदनशीलता भी। लेकिन वास्तव में निरपेक्षता की ओर बढ़ना जागरूकता ही है। बस इतना अंतर है कि हर व्यक्ति/स्तर/क्षण की अपनी-अपनी समस्याएं होती है और उसी अनुरूप समाधान और जागरूकतायें भी। आवेश दो प्रकार के होते हैं : धनात्मक, ऋणात्मक और इसके अलावा एक स्थिति आवेश रहित होती है : उदासीन। मन के विचार/भाव भी तीन प्रकार के होते हैं : सकारात्मक, नकारात्मक और उदासीन। शब्दों और भाषा की सीमा है, लेकिन वास्तव में निरपेक्षता उदासीनता नहीं है। यह जागरूकता है तीनों के प्रति भी और तीनों से परे भी। 

भूखा पेट भगवान नहीं समझता, उसे रोटी की ही जरुरत होगी - यह सच है। उसे रोटी खिलाना या अपनी रोटी कमाने में सक्षम बनाना संवेदनशीलता है। लेकिन एक सच यह भी है कि जो ईश्वर के निकटतम हो, उसे कोई भी भूख विचलित नहीं करती। मुझे यह संवेदना की पराकाष्ठा लगती है। हम भावुकता को संवेदनशीलता समझने लगते हैं, इसलिए धोखा खा जाते हैं। बाकी ऐसा व्यक्ति तो किसी के भी और सबके ही प्रति सबसे अधिक संवेदनशील होगा। इन दोनों स्थितियों के बीच मन की एक लम्बी यात्रा है। पहला सच हम सभी समझते हैं, उसे जीते हैं, बल्कि अलग-अलग रूपों और मात्राओं में जीते हैं। उसे ही जीते-जीते मर भी जाते हैं। लेकिन दूसरे सच को समझने और जीने की चाह पहले वाले सच से पलायन नहीं, बल्कि स्थायी समाधान तक पहुँचने की चाह है। 

कुछ लोगों को मेरा अध्यात्म पर लिखना अखरता है। हालाँकि मैंने कई बार कहा है कि मैं कोई बुद्ध, प्रबुद्ध, मनीषी या ज्ञानी नहीं हूँ। सीख रही हूँ। भौतिकता से पूरी तरह दूर भी नहीं। कई कमियां भी होंगी। लेकिन अध्यात्म मुझे कुछ गंभीर व्यक्तिगत समस्यायों को समभाव से लेना सिखाता है, जिनका समाधान किसी के पास नहीं है। इसलिए इस पर मेरी अभिव्यक्ति विशेष रूप से स्वाभाविक है, सहज है, इरादतन नहीं। लिखते-पढ़ते मैंने खुद में कई बेहतर बदलाव महसूस किये हैं। अपनी रोजमर्रा की जरूरतों और दूसरों से अपेक्षाओं को कम से कम होते देखा है। निश्छलता और निर्दोषिता के सौंदर्य को सजगता से महसूस किया है। इसके अलावा जब आप क्रिया-प्रतिक्रिया के इस खेल को कुछ-कुछ समझने लगते हैं तो विचारों की चक्की घूम-फिरकर एक ही बात पर पहुँचती है। आस्तिकों की कट्टरता से मेरा कोई वास्ता नहीं है, तो मैं नास्तिक कट्टरता (बात जिन पर लागू बस उनके लिए ही) का भी समर्थन नहीं कर सकती। श्रेणियों के साथ यह ख़तरा सदैव ही रहता है। लेकिन श्रेणीकरण सुविधा के लिए होता है, वह सत्य नहीं होता। क्योंकि किसी भी विषय का कोई स्वतंत्र अस्तित्व संभव ही नहीं। 

Monika Jain ‘पंछी’