June 16, 2017

Rice Vegetable Dhokli Recipe in Hindi

Rice Vegetable Dhokli Recipe in Hindi

चावल की ढोकली

कुछ दिनों से इडली, खम्मन, हांडवो..आदि से इतर भाप में पका हुआ कुछ नया बनाने/खोजने का मन कर रहा था। इसी दौरान चावल के आटे व सब्जियों के मिश्रण से इस डिश को ट्राई किया। खाने में अच्छी लगी इसलिए  आपके साथ भी रेसिपी शेयर कर रही हूँ। सबसे अच्छी बात यह है कि इसे बनाने के लिए प्री प्लानिंग की जरुरत नहीं है। चावल का आटा उपलब्ध हो तो जब भी इच्छा हो इसे तुरंत बना सकते हैं। इसके अलावा सब्जियां जो खासकर बच्चों को यूँ पसंद नहीं आती, उन्हें भी इस डिश के रूप में आराम से खाया जा सकता है। भाप में पके होने के कारण यह पौष्टिक भी है।

सामग्री :

कद्दूकस हरी शिमला मिर्च : ¼ कप

एकदम बारीक कटी हरी मिर्च या हरी मिर्च का पेस्ट : ¼ कप

कद्दूकस प्याज : ½ कप (वैकल्पिक)

कद्दूकस टमाटर : ½ कप

कद्दूकस अन्य सब्जियां : 1-1 कप ( यहाँ घर में उपलब्ध कद्दूकस की जा सकने वाली सब्जियां जैसे लौकी, टिंडे, आलू, कच्चा केला, गाजर, पत्ता गोभी...आदि में से दो या अधिक अपनी पसंद की सब्जियां ले सकते हैं। )

चावल का आटा : आवश्यकता अनुसार (अलग-अलग सब्जियां अलग-अलग मात्रा में पानी छोड़ती है, इसलिए उसी अनुरूप चावल का आटा मिलाने की जरुरत पड़ेगी।)

हल्दी : ¼ छोटा चम्मच

सौंफ का पाउडर : ½ छोटा चम्मच

नमक : स्वादानुसार

राई के दाने : ½ छोटा चम्मच

हींग : चुटकी भर

घी (पिघला हुआ) : ¼ से ½ कप के बीच ( जिन्हें घी से परहेज हो वे तेल भी इस्तेमाल कर सकते हैं। घी ढोकली को नर्म बनाने का काम करता है। मिश्रण की मात्रा के अनुसार इसकी मात्रा को कम-ज्यादा किया जा सकता है।)

विधि : सबसे पहले एक बर्तन में सभी कद्दूकस की हुई सब्जियां ले लें। अब इसमें नमक, सौंफ पाउडर और हल्दी मिलाकर अच्छी तरह से मिक्स कर लें। अब एक छोटी सी कड़ाई में घी लेकर उसे गर्म करें। घी में राई के दाने और हींग तड़काकर इसे सब्जी वाले मिश्रण में डाल दे और फिर से इसे मिक्स कर दें। अब चावल का आटा एक-एक बड़ा चम्मच करके इतनी मात्रा में डाले कि मिश्रण को अच्छी तरह से मिलाने के बाद उससे आराम से टिक्की (ढोकली) बन सके। मिश्रण को 5 मिनट के लिए ढककर रख दें। अब थोड़ा-थोड़ा मिश्रण हाथ में लेकर उसे लड्डू की तरह गोल-गोल बांधते हुए बीच में से दबाकर टिक्की का आकार दे दें। अब इडली या खम्मन के स्टैंड में नीचे पानी डालकर ऊपर जालीनुमा प्लेट रखकर सभी ढोकली उसमें रख दें। ऊपर से ढककर माध्यम आंच पर 15-20 मिनट तक पका लें। स्टैंड न होने पर एक पतीली में पानी लेकर, जालीनुमा प्लेट रखकर, ऊपर एक ऊंचे ढक्कन से ढककर भी इसे पकाया जा सकता है।

इसे दूध, चाय, लस्सी या छाछ के साथ यूँ ही नाश्ते के रूप में परोसा जा सकता है। हरी चटनी और टमाटर सॉस के साथ खाया जा सकता है। इसके अलावा हल्के डिनर के तौर पर करी या तुअर-मसूर की दाल के साथ भी खाया जा सकता है।

Monika Jain ‘पंछी’
(16/06/2017)

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June 14, 2017

Essay on Criticism in Hindi

ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर

13/06/2016 - वह जो सिर्फ असहमतियों के लिए प्रकट होता था।
वह जो सिर्फ आलोचना की गुंजाईश देखता था।
वह जो सिर्फ विरोध के अवसर ढूंढता था।
उसका विरोध विचारों से नहीं मुझसे था। बहरहाल आलोचनाएँ हँसा भी सकती है। :)

14/06/2017 - कोई जो आपके शब्द-शब्द, विचार-विचार, भाव-भाव, कर्म-कर्म को आलोचनात्मक दृष्टिकोण से पकड़ता है और फिर उनके आधार पर बुरे निष्कर्ष निकालता है, वह कुछ भी कर सकता है लेकिन आपसे प्रेम नहीं कर सकता। और यह भी तय है कि बहुत ज्यादा जजमेंटल बनने की प्रक्रिया में वह आपके विचारों, शब्दों या भावों के सही अर्थ तक भी नहीं पहुँच सकता, आपको समझना तो बहुत दूर की कोड़ी है।

जन्म से लेकर ही बहुत लम्बे समय तक (लगभग पूरे विद्यार्थी जीवन में) मैं बहुत अन्तर्मुखी और शर्मीली थी। बात करने की पहल नहीं कर पाती थी और बहुत ज्यादा बातें भी नहीं होती थी करने को। कुछ अपवाद थे इसमें भी। जो पहल कर लेते थे, उनमें से ही किसी के क्लोज हूँ या किसी के साथ बहुत सहज हूँ तो उससे कभी-कभी बहुत बातें हो जाती थी। और इसके अलावा पब्लिक स्पीकिंग में भी कभी दिक्कत नहीं आई। कई लोग मेरी प्रकृति समझ जाते थे और किसी ख़ास परिचय के बिना भी उनका स्नेह रहता था हमेशा। उन सभी को बहुत मासूम लगती थी। कुछ लोग यह भी मानते थे कि मैं पढ़ाई और अन्य गतिविधियों में अव्वल रहती हूँ, इसलिए बहुत घमंडी हूँ और इसलिए ही ज्यादा बात नहीं करती किसी से।

एक बार नयी स्कूल में मेरी पुरानी स्कूल से क्लास में कोई नहीं था और लड़कियों का एक बड़ा ग्रुप किसी कॉमन स्कूल से ही था, जो सभी पहले से दोस्त थे। उसी ग्रुप में कॉम्पीटिटर भी थी और उस पूरे ग्रुप के पूर्वाग्रह थे मेरे प्रति। और कभी-कभी उनमें से कुछ बेवजह मुझे परेशान करते थे, छेड़ते थे।...और तब मुझे विरोध करना नहीं आता था। ज्यादा से ज्यादा उसके प्रति बस उदासीन हो जाती थी। सिटिंग अरेंजमेंट बदलने के दौरान उसी ग्रुप में से किसी के साथ बैठना हुआ। कुछ ही दिनों में दोस्ती हुई, जो तमाम असमानताओं के बावजूद भी; स्कूल, कॉलेज, शहर...सब बदलने के बावजूद भी; सालों साल गहरी से गहरी होती रही और इस बीच कभी उसने ही बताया था कि वह मुझसे परिचय से पहले मेरे बारे में बहुत गलत सोचती थी, मुझे बहुत घमंडी समझती थी। यह बात जीवन के अलग-अलग समय में कुछ और लोगों ने भी कही है। हम किसी को भी नापसंद न रहें, यह तो संभव है ही नहीं। लेकिन जो लोग किसी पूर्वाग्रह या ग़लतफ़हमी के तहत नापसंद करते हैं, बिना किसी ठोस वजह के नापसंद करते हैं, वे समझ पाए इसके लिए तो उन्हें बहुत बातें करनी होगी, निकट आना होगा, साथ में समय गुजारना होगा...और समस्या यह है कि वर्तमान में मैं एक ओर तो कुछ बहुत गंभीर वजहों से और दूसरी ओर अनासक्ति की वजह से किसी से बहुत ज्यादा परिचय बढ़ा नहीं पाती। ना काहूँ से दोस्ती, ना काहूँ से बैर वाला मामला हो रहा है। :)

खैर! मेरे लिए प्रेम न तो सामान्य परिचय का और न ही किसी प्रगाढ़ परिचय का मोहताज है। परिचित हैं तो भी अच्छा, नहीं है तो भी अच्छा। इसके अलावा कोई हमें बहुत अच्छा समझे तब भी कुछ (कम/ज्यादा) कमियां तो हम सभी में होती ही है। जो प्रेम करते हैं वे कमियों के साथ स्वीकार कर लेते हैं। जरुरी बातें बताते भी हैं, गलतियों पर टोकते भी हैं और प्रेम में ही अच्छे बदलाव भी ले आते हैं। लेकिन जो मन ही मन द्वेष रखते हैं, उनका उद्देश्य सिर्फ कमियां खोजना ही होता है। ऐसे में कुछ अच्छा हो तो वे उसमें भी कमी निकाल लेंगे। वे जो कर रहे होते हैं इस बात का उन्हें भी पता नहीं होता है। पता होने के लिए, प्रेम होने के लिए...खुद को निष्पक्षता से देखने की जरुरत है। पूर्वाग्रहों को छोड़ने की जरुरत है। अपनी कोई प्रच्छन्न अपेक्षा या कुंठा है तो उसे देखने की जरुरत है। कोई नाराजगी है, ग़लतफ़हमी है तो बात करके दूर करने की जरुरत है। बाकी यह सामने वाले से अधिक सिर्फ खुद को पीड़ा देते रहना है। नफ़रत/द्वेष/ईर्ष्या दूसरों पर असर बाद में करेगी, सबसे पहले तो यह इसी बात को दर्शाती है कि कुछ है जो हमारे साथ ही ठीक नहीं।

Monika Jain ‘पंछी’

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May 25, 2017

Poem on Save Earth in English

When Shimmer Turned Dark

Shimmering was the sky, sat I
Was glancing the sudden change in verge of high.

Suddenly!
Shimmer turned to black and dark
Clouds growled at me like some hungry shark.

Then I saw the crying earth
Which was expecting the end of birth.

Then I looked at the restless water
Sea was wild accompanied by breathtaking thunder.

The scene around me was scary and troublesome
I guessed some danger is about to come.

Then attracted sea again towards its condition
Now it was giant wave with great explosion.

I feared to see the height
Which was enough to drown a kite.

Then I looked towards sky to seek for mighty
I failed as a roof of water covered me.

Wave was approaching me and i was helpless
Then I realized it’s all we humans mess.

We disturb and harm mother nature
and expect her to stay calm and bear us butchers.

We seek birth and life from this earth
and selfishly forgot all its worth.

I was about to leave this world
It was then something I heard.

It was monotonous sound of nearby generator
Then I realized it was earth no water.

My eyes were wet with horror
A mingled feeling of relief and terror.

Though virtual but that scene taught me lesson of reality
We though humans but forgot humanity.

Just running after the wealth
Without thinking about nature's death.

Don’t dawdle, think briskly over the condition
Otherwise nature would think 100 times to grant us motion.
Nature would think 100 times to grant us motion.

Rishabh Goel
Kotdwar, Uttarakhand

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