September 19, 2017

Peace (Silence) Quotes in Hindi

Peace (Silence) Quotes

  • 19/09/2017 - सबकी अपनी-अपनी रूचि है पर मेरे लिए किसी भी लेखक के लेखन की उत्कृष्टता न शब्दों में निहित है और ना ही शब्दों के निहितार्थ में। यह निहितार्थ से परे स्रोत से प्रस्फुटित प्रेम, शांति, समझ और निश्चलता से है। किसी भी लेखक का यह पाठक को सबसे बड़ा उपहार होता है और यही पाठक द्वारा सबसे बड़ा प्रति उपहार भी है। ऐसे लेखक या लेखन के समक्ष मन स्वत: ही छोटा कृतज्ञ बालक बन जाता है। 
  • 08/09/2017 - हर घटना, हर दुर्घटना, हर मौत पर यहाँ राजनीति होती है। आरोप-प्रत्यारोप का वीभत्स खेल चलता है। गैर जिम्मेदार पोस्ट्स की बाढ़ आ जाती है। प्रेम, शान्ति, स्वस्थ चर्चा और समाधान किसी को नहीं चाहिए। फेसबुक मिल तो गयी है सबको अपनी-अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नॉन स्टॉप पोस्ट्स की निकासी के लिए, लेकिन सच यही है कि हम भारतीय किसी चीज के लायक नहीं। बस कोलाहल, कोलाहल और कोलाहल...यही हमारी पहचान है।
  • 02/09/2017 - आत्म कल्याण हो चाहे जगत कल्याण...हमें शून्यता को ही बढ़ाना होता है, सभी द्वैतों की तीव्रता को कम करके। यह शून्यता ही महावीर की अहिंसा, बुद्ध की करुणा और मीरा का प्रेम है।
  • 31/08/2017 - जो नाराज़ होती तो शायद मान भी जाती, पर कुछ टूट/छूट गया था उस दिन और मुझे बहुत हल्का महसूस हुआ था। अब चाहकर भी कुछ कर नहीं सकती। 
  • 29/08/2017 - हालाँकि कहानी प्रतीकात्मक रही होगी, लेकिन सीता ने जिस पल धरती को पुकारा होगा उसकी गोद में समा जाने के लिए, वह शायद उनके जीवन का सबसे सुकून वाला पल रहा होगा। 
  • 08/01/2017 - दुनिया के लिए अगर कोई कुछ भी बेहतर कर सकता है तो वह बस यही है कि वह स्वयं शांत(मुक्त) हो और उसकी शांति दूसरों तक पहुंचे (इसके लिए भी वह कुछ करे यह बहुत जरुरी नहीं। यह स्वत: ही होगा।) 
  • 21/11/2016 - विश्व शांति में फेसबुकियों का योगदान देखते ही बनता है। 
  • 17/09/2016 - जब भी 'मैं' बहुत 'मैं-मैं' करने लगे तो घर से बाहर निकलकर आकाश में चांदनी बरसाते चाँद की छटा में कुछ देर नहा लेना चाहिए। सूरज की रौशनी में खुद को कुछ सुखा लेना चाहिए। पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों से कुछ देर बातें कर लेनी चाहिए। मिट्टी में खेल लेना चाहिए। पर्वतों, पहाड़ों, चट्टानों, नहरों, झरनों, सागर, घाटियों, जंगलों...तक खुद या मन को पहुँचा देना चाहिए। अस्तित्व की प्रक्रियायों, ब्रह्माण्ड के चल-चित्रों, जीवन-मृत्यु के इस विस्मित कर देने वाले खेल के बारे में कुछ देर सोच लेना चाहिए। मैं 'क्यों' हूँ और 'कौन' हूँ...ऐसे ही कुछ रहस्यमयी प्रश्नों पर विचार कर लेना चाहिए। इस कदर अनंत विराटता, विशालता और रहस्य है हमारे चारों ओर कि 'मैं' के पास अपनी बोलती बंद करने के सिवा और कोई चारा है नहीं। वैसे यहाँ तो अगर फेसबुक पर आते ही सबसे पहले न्यूज़ फीड पढ़ ली जाए तब भी अक्सर बोलती बंद हो जाती है। :p बाकी प्रकृति की गोद...हम हैं ही क्या, अहसास करा जाती है।...और जितना अहसास उतनी ही शांति भी दे जाती है। 
  • 04/09/2016 - कभी-कभी हमारे पास बहुत सटीक ज़वाब होता है...फिर भी मौन रहना अधिक तार्किक होता है। 
  • 08/06/2016 - जितना अर्थ को जाना, शब्द उतने ही खोते चले गए। 
  • 19/01/2016 - बहुत जरुरी है यह सीख जाना कि कब बोलना है और कब चुप रहना है। 
  • 04/12/2014 - मौन जहाँ कई समस्यायों का कारण बनता है, वहीं मौन कई संभावित समस्यायों का निवारण/बचाव भी है। बस हमें इतना पता हो कि कब मौन रहना है और कब मुखर। 
  • जब-जब मैंने (अहम् ने) कुछ भी सोचा, कहा और किया तब-तब मैंने (दृष्टा ने) जाना मौन ही अंतिम समाधान है। हमारा कुछ भी करना पहले वाले 'मैं' की अभिव्यक्ति है, तब तक जब तक वह मिट नहीं जाता और सिर्फ दूसरा 'मैं' बच नहीं जाता। हमारा प्रयास बस यह रहे कि पहला 'मैं' दूसरे 'मैं' की निगरानी में रहे। क्योंकि दूसरे 'मैं' की निगरानी में रहा पहला 'मैं' यथासंभव किसी को नुकसान नहीं पहुँचाता। वह सिर्फ अपनी जरुरत तक सीमित रहता है। शेष वह सिर्फ प्रेम और शान्ति जानता है। 
  • लोग जैसे है उन्हें वैसे ही स्वीकार करना विवादों की सम्भावना को कम कर देता है। (अपवाद शामिल नहीं)

Monika Jain ‘पंछी’

September 11, 2017

Mind and Thinking Quotes in Hindi

Mind and Thinking Quotes

  • 06/09/2017 - अपने से इतर सभी विचारधाराएँ और विचारधारी नहीं रहेंगे तो फिर अकेले क्या अपनी विचारधारा का अचार डालोगे?
  • 15/01/2017 - किसी के मन में कोई विचार उठा और उसने शेयर कर दिया, इसमें कोई समस्या नहीं है। बहुत सारे विरोधी विचारों को पढ़कर ही तो समझ आता है कि विचार सिर्फ विचार हैं और सापेक्ष हैं। लेकिन बात यहाँ उनके लिए है जो हावी होने की कोशिश करते हैं। जिन्हें लगता है कि दुनिया में एकमात्र सही सिर्फ वे ही हैं और बाकी सबको उनका अनुसरण करना चाहिए और ऐसा करवाकर वे सारी दुनिया को बदल देंगे। समस्या कट्टरता और तानाशाही में है।
  • 19/03/2017 - एक ही बात पर कुछ लोग ख़ुश होते हैं, कुछ उदास, कुछ गुस्सा, कुछ क्या, कुछ कुछ नहीं...बस यहीं से मुझे ये 'मन' नामक प्राणी संदिग्ध लगने लगता है। 
  • 08/01/2017 - प्रेम के मार्ग का बस एक ही काँटा है : वृत्तियाँ। सामान्य और सरल से सरलतम को भी मानव मन की ग्रंथियां कितना जटिल और जटिलतम बना देती है। 
  • 13/06/2016 - किसी का ख़याल भर और उसका प्रकट हो जाना...बड़े ख़तरनाक हैं ये ख़याल। :p :) 
  • 05/06/2016 - फ्रॉक पहनकर कितनी छोटी हो जाती हूँ मैं...फिर खेलने का मन करने लगता है। ^_^ (तितली मन!) 
  • 02/06/2016 - अतीत के चलचित्र वर्तमान के चलचित्रों से मिल बैठते हैं और फिल्म बिगड़ जाती है। (मन तू होजा कोरा कागज।) 
  • 28/04/2016 - जब तक कुछ भी नया पढ़कर और जानकर हमारी सोच बेहतर न बनें और चीजों को देखने और समझने का नजरिया विस्तृत न हो, तब तक हमने कुछ नया जाना और सीखा नहीं है। 
  • 17/04/2016 - तुम्हारा मुझे इतने दिनों बाद अचानक कुछ लिख भेजना अनायास ही न था। कुछ ही देर पहले मन की गहराईयों ने तुम्हें याद किया था। 
  • 16/04/2016 - लोग अक्सर द्वैत के बारे में विचार करते हैं। जबकि 'कुछ होने' से 'कुछ न होने' तक का सफ़र बहुत लम्बा है। किसी क्षण कोई बीच रास्ते में कहीं पर भी हो सकता है, जहाँ प्रगमन और प्रतिगमन दोनों ही संभावनाएं हैं। 
  • 10/04/2016 - तुम्हारा दृष्टिकोण तुम्हारे बारे में बहुत कुछ बता देता है।
  • 17/03/2016 - जरुरत से अधिक सक्रिय दिमाग और जाग्रत मन में अंतर है। एक जहाँ राय कायम करने और निष्कर्षों की जल्दबाजी में सोये हुए जड़ मन की तरह ही पूर्वाग्रहों, धारणाओं, अंधविश्वासों और रूढ़ियों की गठरी बन सकता है, वहीँ दूसरा इन सबसे मुक्त हो सकता है। 
  • 04/01/2016 - न आस्तिक कहलाने की जरुरत है...न नास्तिक कहलाने की। जरुरत बस खुले दिमाग की है। किसी श्रेणी से बंध जाना अक्सर उन असीम क्षमताओं से दूर कर देता है जो हमारे भीतर विद्यमान है। कम से कम जो विज्ञान प्रेमी है उसे तो ऐसा नहीं ही करना चाहिए। 
  • 26/09/2015 - शब्दों के मनमाने अर्थ और व्याख्याएं नहीं बदल सकते सच्चाईयाँ। जिसे जानना हो सच उसे मन के धरातल पर उतरना पड़ता है। 
  • 13/08/2015 - किसी से आपका एक विचार मिलता है, अच्छी बात। दूसरा भी मिलता है, और भी अच्छी बात। तीसरा भी मिलता है, कुछ ज्यादा ही अच्छी बात। पर चौथा भी मिलना ही चाहिए यह अपेक्षा ज्यादती है। 
  • छोटी-छोटी सी बातों पर दंगे क्यों भड़क जाते हैं? विचार संक्रमण इसका मुख्य कारण है। जब विचारों, मन और आवेशों पर नियंत्रण ना हो, सतर्कता और जागरूकता की अनुपस्थिति हो तो ऐसे में किसी नकारात्मक विचार का आग की तरह फैलना और सब कुछ तबाह कर देना संभव है। 
  • शब्द, विचार और भाव इतने ज्यादा सापेक्ष हैं कि जो सन्दर्भ न समझा तो सब मिथ्या हो जाता है। 
  • बनावटी और झूठे शब्द अक्सर साफ-साफ पकड़ में आ जाते हैं, बस जाहिर नहीं करती। इनोसेंट होने का मतलब बेवकूफ होना नहीं होता। :) हालाँकि, बेवकूफियों के भी अपने अलग किस्से हैं...एक ही मन में हमारे कितने हिस्से हैं। 


Monika Jain ‘पंछी’

September 6, 2017

Essay on Nonviolence in Hindi

अंतस का बदलना जरुरी है

05/09/2017 - जैन समाज द्वारा बकरों को खरीद-खरीद कर बचाने की मुहिम मूर्खता और अहंकार से ज्यादा नहीं नज़र आती। हिंसा और जड़ता बाहर-बाहर से नहीं खत्म होती, अंतस का बदलना जरुरी है।

06/09/2017 - फेसबुक पर की गयी उपर्युक्त पोस्ट पर मूर्खता शब्द पर कुछ मित्रों ने आपत्ति दर्ज की है। कोई इस शब्द से आहत हुआ है तो उसके लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूँ। लेकिन यह वक्तव्य जल्दबाजी वाला नहीं था। मूर्खता से मेरा आशय अबोधता से ही था और किसी को मूर्ख या अहंकारी कह देने का तात्पर्य यह बिल्कुल भी नहीं कि मैं मूर्खता या अहंकार से मुक्त हो चुकी हूँ। बल्कि अक्सर मेरा द्वंद्व खुद के साथ यही चलता है कि जब मैं मन के विकारों से पूर्ण रूप से मुक्त हूँ ही नहीं तो मुझे किसी और को कुछ कहने का अधिकार है ही कहाँ? यहाँ मैं इस बात से भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो पाती कि मैं मन के विकारों को विषय या तीव्रता के आधार पर अलग-अलग खांचों में बाँट लूं कि जिस जड़ता विशेष से मैं मुक्त हूँ, उस पर कह सकती हूँ। मेरे लिए मन के विकार मन के विकार हैं फिर वे चाहे आत्मघाती हो या परघाती हो, कम हो या ज्यादा हो, कुछ मामलों में हो और कुछ मामलों में न हो। लम्बे समय बाद भी अगर किसी दिन मुझे तेज गुस्सा आया है या किसी मामले में मैं ज्यादा भावुक हुई हूँ और कोई मूर्खता या गलती कर दी है तो मुझे अपनी सारी की सारी तपस्या व्यर्थ नज़र आती है। लेकिन मैं कुछ कृष्ण की गीता और कुछ अपने मौलिक अधिकारों व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से अपने मन को बहला लेती हूँ और मेरा लिखना और कहना इस बहलाव में जारी रहता है। जिसका उद्देश्य यहाँ किसी पर कुछ थोपना बिल्कुल नहीं है। अभिव्यक्ति मेरी अपनी जरूरत है।

अब आते हैं पिछली पोस्ट के मुद्दे पर। किसी व्यक्ति विशेष द्वारा संवेदना के चलते किसी जानवर को बचाना या किसी की कैद से मुक्त करवाना एक अलग बात है और किसी समाज या संगठन द्वारा सम्पूर्ण समाज के योगदान से जानवरों की रक्षार्थ किसी मुहिम को चलाना एक दूसरी बात। पहले मामले में भी समझ जरुरी है लेकिन कृत्य के पीछे के भाव और उद्देश्य ज्यादा महत्वपूर्ण है, लेकिन दूसरे मामले में बात को हर दृष्टिकोण से देखा और समझा जाना ज्यादा जरुरी हो जाता है, तब जबकि आपकी मुहिम एक ऐसी रूढ़ि के विरुद्ध है जो किसी समाज विशेष का अनिवार्य हिस्सा बन चुकी है। जानवरों को खरीद कर, उनके जीवन पर्यंत पालन-पोषण का जिम्मा उठाकर आप उन जानवरों को बचा लेंगे, यह अच्छी बात है लेकिन इसके दूरगामी और अप्रत्यक्ष प्रभाव क्या होंगे यह समझा जाना जरुरी है।

जब कोई प्रथा या कोई जरुरत किसी समाज का अनिवार्य हिस्सा बन चुकी हो तो ऐसे में पूर्ति को कम कर देना लोगों को उसके अप्राकृतिक उत्पादन को बढ़ावा देने की ओर अग्रसर करता है। अक्सर मेरी आँखों के सामने हिलने-डुलने का एक इंच भी स्पेस न दी गयी मुर्गियां, सूअर और अन्य जानवर नज़र आते हैं। सामान की तरह भरे गए या एक कोने से दूसरे कोने में जोर से पटके गए जानवर नज़र आते हैं। जबरदस्ती दूध, बच्चे या अंडे पैदा करवाने के लिए किये गए अप्राकृतिक कृत्य नज़र आते हैं...और भी ऐसी कई चीजें...बस यही सोचकर मुझे इस कदम में कोई सार्थकता नज़र नहीं आई, बल्कि यह मुझे जानवरों और प्रकृति के विरुद्ध जाता नज़र आता है। मनुष्य बहुत चालाक और धूर्त प्राणी है, उस पर ये तरीके काम नहीं करते। उसे अपनी जनसँख्या की चिंता नहीं रहती लेकिन जानवरों की जनसँख्या की चिंता रहती है इसलिए वह उन्हें जबरदस्ती पैदा करवाता है और बिल्कुल गैर जरुरी कारणों से भी मारता है। यहाँ मैं पिछली पोस्ट पर आये मनीष जी के कॉमेंट को भी पोस्ट कर रही हूँ :

“कुछ सालों पहले तक अपने कुछ परिचित काफी समय से पर्युषण, संवत्सरी व अनंत चतुर्दशी पर बहेलियों से कबूतर, तीतर, तोते...आदि आजाद कराते थे। मालूम हुआ कि उन लोगों को इन त्योहारों की जानकारी पहले से होने लगी और उनका सारा परिवार कबूतर, तीतर, तोते पकड़ कर इकट्ठे करता (उनकी बिक्री की जरूरत से कई गुना ज्यादा) क्योंकि उनको पता था कि उनके मुंह मांगे पैसों से उनका माल बिकेगा और हमारे जैन बंधु इस बात से ही मुग्ध कि हम कितना महान कार्य कर रहे हैं, जीव दया कर रहे हैं। जबकि वो हमारे ही निमित्त अधिक कबूतर तीतर तोते आदि पकड़ते थे। बकरे काटने वाले कसाईयों को उनकी दिन भर की कमाई देकर उनसे वादा करवाते थे कि इन दिनों वो हिंसा नहीं करेंगे, लेकिन वो दुकान के शटर बन्द रख कर अपना कार्य जारी रखते थे। उस सब का दोषी कौन? क्या आज तक कसाई और बहेलियों ने अपना व्यवसाय बदल लिया?”

जैन समाज में ही कई संत ऐसे हुए हैं जिन्होंने कई जगह बलि प्रथा बंद करवायी है। एक हमारे आसपास का ही एक स्थान है जहाँ माता जी के मंदिर में हर साल भैंसों की बलि दी जाती थी। वहां एक साध्वी जी गयीं और मंदिर में बलि वाले स्थान पर खड़े होकर उन्होंने कहा कि इन्हें मारने से पहले मेरी बलि देनी होगी। हालाँकि कुछ लोग इस तरीके से भी सहमत नहीं होंगे, लेकिन मैं इसे व्यक्तिगत निर्णय और व्यक्तिगत साहस मानती हूँ। अच्छी बात यह कि उस समय और बाद में उन्होंने कई सालों तक वहां चातुर्मास करके अपने प्रवचनों के माध्यम से जागरूकता फैलाई और वहां बलि प्रथा पूरी तरह से बंद हो गयी। सभी धर्मों की बलि प्रथाओं के विरोध में अगर कानून बने तो मैं उससे सहमत हूँ। लेकिन कानून भी बस बहुत थोड़ी सी मदद ही करता है, बाकी का सारा काम जागरूकता ही करती है।

Monika Jain ‘पंछी’