August 17, 2017

Save Nature Quotes in Hindi

Save Nature Quotes

  • 25/05/2017 - कल नदियों को बचाने से सम्बंधित एक आर्टिकल पढ़ रही थी। बहुत सी बातें निकल कर आई। घर में तो पानी खर्च को लेकर हम सामान्यत: अच्छे से ख़याल रखते हैं, चाहे जितना भी उपलब्ध हो। लेकिन मम्मा की अच्छी बातों में से एक बात है - कहीं भी, कभी भी पानी व्यर्थ बह रहा होगा तो घर की ही तरह मम्मा को फ़िक्र होती है। लोग बोरवेल या मोटर चलाकर भुलक्कड़, कुम्भकर्ण या दुनिया के सबसे व्यस्त आदमी बन जाएँ, लेकिन माँ बिना किसी संकोच के उन्हें घर पर कह आती हैं। दुनिया-जहाँ के सारे मुद्दे हमें याद रहते हैं, लेकिन कभी-कभी हवा, पानी, पशु-पक्षी और पेड़-पौधें जो सबसे जरुरी हैं, उन्हें भी याद कर लेना चाहिए। क्योंकि पानी आँख का हो चाहे ग्लास का...बचे रहना जरुरी है।
  • 20/05/2017 - हमारे भारत में कुछ भी संभव है। मसलन एक डॉक्टर (आयुर्वेदिक) अपने घर में लगे घने छायादार पेड़ को पत्तियों से होने वाले कचरे की वजह से कटवाकर, फिर अपनी गाड़ी की धूप से सुरक्षा के लिए दूसरे घरों के बाहर लगे पेड़ों की शरण स्थली खोजता है।
  • 06/05/2017 - कुछ दिन पहले घर में शौकिया तौर पर मिट्टी का एक प्याला लाया गया था। उसे देखते ही मैंने कहा इसमें तो दही जमायेंगे। आज किचन में काम करते समय वह पास में ही रखा था तो माँ ने कहा, इसी में साफ़ कर लेती हूँ सब्जी तो मेरे मुंह से बरबस निकल पड़ा, 'इसे क्यों दु:खी कर रही हो?' और इसके बाद हम लोग न जाने कितनी देर तक हँसते ही रहे। मैंने ऐसा क्यों कहा मुझे समझ नहीं आया। लेकिन हाँ जिन चीजों से सदा-सदा का नाता लगता है उनमें से मिट्टी भी एक है। 
  • 17/04/2017 - सब कुछ कितना सरल हो सकता था लेकिन जटिल हृदयों और जटिल बुद्धियों से निकले धर्म और कर्म सब जटिल ही होने हैं। एक तो पहले से ही ये दुनिया गोल, ऊपर से ये मनुष्य इतने गोले (जाल) बनाता है कि उनमें गोल-गोल घूमते-घूमते जो असल गोल (शांति और सुकून) है वह पूरी तरह गोल हो जाता है। और पता है जोक ऑफ़ द सेंचुरी क्या है? इतने तामझाम के बाद भी लोगों का यह कहना कि वे बोर हो रहे हैं। और जब नन्हें-नन्हें से बच्चे भी थोड़ी-थोड़ी देर में कहते पाए जाते हैं कि वे बोर हो रहे हैं, तो फिर मानव जाति की सारी सफलता अपनी असफलता की कहानी कहने लगती है। छोटे से बच्चों का बोर होना बहुत बड़े ख़तरे की घंटी है। काश! मनुष्य यह समझ पाता कि अपनी जड़ों (प्रकृति) से कटकर वह कोई समाधान कभी नहीं पा सकता।
  • 09/02/2017 - किसी पेड़ को कटते देखना कुछ-कुछ खुद को कटते देखना है।
  • 28/01/2017 - कितना अच्छा होता न!...गर हम सारी दुनिया के प्राणी अपनी-अपनी मूलभूत जरूरतें पूरी होने के बाद...गिल्ली डंडा खेलते, कंचे खेलते, पहाड़ों पर चढ़ते, झरनों में नहाते, बारिश में नाचते, प्रकृति का संगीत सुनते, जंगल में पकड़नी और छिपा-छिपी खेलते...और भी बहुत कुछ। प्रकृति के पास तो इतना सारा आनंद है। कितना अच्छा होता...न यह कंप्यूटर होता और न मुझे यह पोस्ट लिखनी पड़ती। इससे अच्छा तो मैं कंचे में जीतने के बाद सबको वापस खेलने के लिए कंचे बाँट रही होती। (कोई लूटता भी नहीं फिर तो।) :p ^_^
  • 11/09/2016 - अजीब है न! हमें लगभग हर एक उत्सव को इको फ्रेंडली मनाने की अपील जारी करनी पड़ती है...और हम उन्हें उत्सव कहते हैं। 
  • 04/09/2016 - मिट्टी का जब-जब स्पर्श हुआ तब वह इतनी अपनी लगी कि बाकी सब अजनबी हो गए।
  • 01/09/2016 - पौधे की पत्तियां तोड़ने की उसकी तीव्र इच्छा को देखते हुए मैं उसे रोक तो नहीं पायी...पर मैंने कहा, 'बाबू, बस थोड़ी सी तोड़ना।' उसने पूछा, 'क्यों?' मैंने कहा, 'पौधे को भी दर्द होता है न!'...और वह टूटी हुई पत्ती को वापस पौधे पर जोड़ने लगी। :) बच्चे तो शायद ऐसे ही होते हैं। लेकिन कुछ दृश्य कितना कुछ कह जाते हैं।
  • 20/04/2016 - डिअर पेरेंट्स! आपके बच्चों के साथ हुए वार्तालाप को सुनकर कभी-कभी समझ नहीं आता कि आप कुछ बना रहे हैं या बिगाड़ रहे हैं। प्रकृति कैसे कृत्रिम बना दी जाती है, यह देखना हो तो एक बच्चे को बड़ा होते हुए देखिये। 
  • 18/09/2015 - यहाँ लोगों की लाउड स्पीकर वाली भक्ति ने प्रकृति से पंछियों की सुरीली चहचहाहट के साथ शुरू होने वाली सुबहों को भी छीन लिया। कहीं तो, कभी तो, कुछ तो प्राकृतिक रहने दिया होता, प्रकृति के सबसे बुद्धिमान (?) प्राणी!
  • हम जब प्रकृति के संरक्षण की बात कहते हैं तो हम अपने ही संरक्षण की बात कह रहे होते हैं। बाकी मनुष्य रहे न रहे...प्रकृति या इस पूरे ब्रह्माण्ड को रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ने वाला। 
  • यहाँ एक ओर परंपरा, धर्म और संस्कृति का शोर सुनाई देता है जो मात्र दिखावा बनकर रह गये हैं, तो दूसरी ओर पाश्चात्य संस्कृति हावी है, जो मात्र भ्रम लगती है। इन दोनों से इतर कोई प्रकृति की बात क्यों नहीं करता? कितना आकर्षित करती है वह। 
  • प्रकृति के संरक्षण के लिए मिट्टी के गणेश जी के विसर्जन की बात चल रही है। बहुत अच्छी बात है। (बुरी बात यह है कि पहले आग लगाओ और फिर कुआँ खोदो) खैर! यहाँ तो मिट्टी ही गणेश जी है। विसर्जित क्या करें? 
  • सारी कायनात में मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी है जो समूची प्रकृति और इसके समस्त जीवों का क्रूर से क्रूरतम तरीके से शोषण करता है।...और ताज्जुब यह है कि इसी शोषण के आधार पर वह प्रकृति के सबसे श्रेष्ठ और बुद्धिमान प्राणी होने का दंभ भरता है। मनुष्य नामक प्राणी होने के नाते चारो तरफ यह जितना भी विकास है...कई बार इसे देखकर मुझे आत्मग्लानि महसूस होती है। प्रकृति को निचोड़-निचोड़ कर अपने अधीन कर लेने का मनुष्य का सपना तो हमेशा सपना ही रहना है, क्योंकि इस सपने को पूरा होते हुए देखने के लिए वह शेष रहेगा नहीं। पर काश! वह समझ पाता कि अपने अहंकार और महत्वकांक्षाओं के चलते किसी और का अपराधी वह खुद को माने न माने लेकिन खुद अपना तो सबसे बड़ा अपराधी है ही।
  • बारिश के बाद पेड़-पौधों की ख़ुशी देखते ही बनती है। पत्ते-पत्ते से झलकता है प्रकृति का अनुपम सौन्दर्य!... तिस पर इस सौन्दर्य को चार चाँद लगाती कोयल की स्वर लहरियां और मयूरों का अद्भुत नृत्य; नदियों, झीलों, पोखरों में भर आये स्वच्छ जल की कल-कल और पहाड़ों की निराली छटा…! ऐसा लगता है मानों प्रकृति का कण-कण प्रेम से अभिभूत होकर आसमां की ओर अपनी कृतज्ञता प्रकट कर रहा हो। बस यहाँ-तहाँ हम मनुष्यों द्वारा फैलाये गए कूड़ा-करकट, प्लास्टिक, पॉलीथिन आदि यह संकेत जरुर देते नज़र आते हैं कि हम मनुष्य प्रकृति की सबसे नालायक औलादें हैं।

Monika Jain ‘पंछी’

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August 14, 2017

Quotes on Change in Hindi

Change Quotes

  • 14/08/2017 - कुछ ही दिन पहले पास में एक मॉल खुला था। वॉशरूम, पानी की अच्छी व्यवस्था थी वहां, लेकिन फिर भी कुछ लोगों ने टॉयलेट गन्दा कर रखा था। एक कोने में बच्चों के डायपर गिराए हुए थे। स्वच्छता और साफ़-सफाई की उम्मीद हम करते हैं, लेकिन उसके योग्य बनने के बारे में नहीं सोचते। जिस देश के लोगों में सही व्यवस्थाओं की कद्र ही ना हो वहां व्यवस्था सही हो भी कैसे?
  • 12/08/2017 - कुछ महीनों पहले यह ख़याल आया था कि मनोविज्ञान (संवेदना पर आधारित) एक ऐसा विषय है जो बहुत जरुरी है और इसे बचपन से ही पाठ्यक्रम में किसी ना किसी रूप में शामिल होना चाहिए। बड़े होने के बाद बदलाव मुश्किल होते हैं, आदतों और कंडीशनिंग से छुटकारा भी मुश्किल, लेकिन बचपन वह समय होता है जब अगर सही शिक्षा मिले तो बहुत कुछ बदल सकता है। नैतिक शिक्षा और उससे जुड़ी कहानियां पर्याप्त नहीं है। कहानियों से इतर भी बहुत सरल रूप में कांसेप्ट क्लियर करते हुए इस विषय का समावेश होना चाहिए। हर अपराध, लापरवाही, क्रूरता के पीछे मन की विकृतियाँ ही काम करती हैं और इनके बारे में जितना जल्दी और जितना ज्यादा इंसान समझे और जाने उतना ही बेहतर है। पाठ्यक्रम में कैसे आ सकती हैं इसका मुझे आईडिया नहीं लेकिन गिफ्ट्स के रूप में बच्चों को ऐसी पुस्तकें देने का प्रचलन शुरू होना चाहिए।
  • 21/05/2017 - केवल समस्यायों के एक, दो, हजार, दस हजार और लाख रूप गिनाने से हल नहीं मिलेगा। सभी समस्यायों के मूल में असंवेदनशीलता और जागरूकता का अभाव है। जब तक हम इन पर काम नहीं करेंगे, तब तक समाधान भी फौरी और इधर से उधर शिफ्टिंग वाले ही होंगे। 
  • 16/02/2017 - मुझे हैरानी होती है। कितनी सारी चीजें हैं जिन पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगना चाहिए...मसलन पटाखे, शराब, सिगरेट, तम्बाकू, गुटखा...आदि आदि। नशेड़ियों को तो क्या कहा जाए (किसी और दिन अच्छे से कहूँगी) लेकिन राजस्व के लिए ये सब चलने देना...मतलब पागलपंती की भी कोई सीमा होती है।
  • 23/01/2017 - यहाँ हम घर में कुल तीन सदस्य हैं। जब कभी भी घर में किसी को बर्तन साफ़ करने के लिए रखा जाता है तब भी मम्मी और मेरा ख़याल हमेशा यही रहता है कि बर्तन कम से कम हो। अभी जो आती हैं, वे बुजुर्ग हैं तो थोड़ा एक्स्ट्रा ख़याल रहता है। उनका मेहनताना, समय-समय पर दी जाने वाली खाने-पीने की चीजें और पहनने के कपड़े देना ये सब तो बहुत आम सी बातें हैं। मुझे जो चीज अच्छी लगती है वो है मम्मा द्वारा बराबर उनका हालचाल और परेशानियाँ पूछते रहना। उनका हल बताते रहना। एक दिन बर्तन साफ़ करते समय उनके हाथों में हल्की सी खरोंच आ गयी तो मम्मा अपने हाथों से उनको दवाई लगा रही थी और पट्टी बाँध रही थी। मैं सीढ़ियों से नीचे आ रही थी। पता नहीं क्यों उस दृश्य में अद्भुत सा सम्मोहन था। दोनों के एक्सप्रेशन्स देखते ही बनते थे। जैसे माँ-बेटी हों। मेरी आँखें ऐसे दृश्यों के लिए कैमरे का काम करती है। :) कभी-कभी सोचती हूँ : क्रांति और सुधार के हौव्वे से इतर सभी को कितनी छोटी-छोटी सी चीजों को समझ लेने की जरुरत भर है।
  • 11/03/2016 - प्रकृति के मूल तत्व/स्रोत से जुड़े बिना भेद समाप्त हो ही नहीं सकते। एक जगह से धुंधले होंगे तो दूसरी जगह उभर आयेंगे। बाहर की क्रांतियाँ कभी-कभी ठीक होती है, लेकिन उससे पहले जरुरत भीतरी क्रांति की है। भीतर जो बदलेगा वह स्वाभाविक और स्थायी होगा। केवल बाहर जो बदलेगा वह बस रूप बदलेगा। 
  • 13/03/2015 - किसी भी इमेज में सिर्फ इसलिए बंधकर रहना क्योंकि आपकी वह स्थापित छवि है...सही नहीं है। समय के साथ-साथ विचार बदलते हैं, धारणाएं बदलती है, हमारे सपने, हमारी रुचियाँ बदलती है और उसी के अनुसार बदलते हैं हम भी। और इन सब बदलावों के लिए हमें बाहर के शोर को नहीं अपने भीतर की आवाज़ को सुनना होता है, और यह भीतर तब तक रहता है जब तक हम रहते हैं। तो बदलने की प्रक्रिया भी तब तक जारी रहती है जब तक हमारा अस्तित्व है। तो खुद को इतनी सीमाओं में क्यों बाँधना? हाँ, बस अवसरवादी बनकर बार-बार रंग नहीं बदलना है। 
  • 03/03/2015 - दूसरों की बजाय अपने विचारों, अपने व्यवहार और अपने कार्यों की निगरानी रखना हमनें जिस दिन से शुरू कर दिया, त्वरित बदलाव की प्रक्रिया शुरू हो जायेगी। 
  • 14/12/2013 - लोग कहते हैं लिखने से क्या होता है? बिल्कुल लिखने से कुछ नहीं होता पर पढ़ने से होता है, बिल्कुल होता है। और अगर दुनिया की 7 अरब की आबादी में से 1 इंसान की सोच भी अगर कुछ पढ़कर सकारात्मक दिशा में बढ़ती है तो लिखना सार्थक है। शत प्रतिशत सार्थक है। 
  • शब्दों की विचार परिवर्तन में अहम् भूमिका है। हम जो पढ़ते हैं, सुनते हैं, उनका हमारे विचारों पर प्रभाव पड़ता है। वैसे तो हम कुछ सोचे उसके लिए भी किसी भाषा की जरुरत तो होती ही है। रही बात संकीर्णता की, तो जैसा हम सोचेंगे, जो हमारे विचार होंगे वही हमारे व्यवहार और कार्यों में भी परिलक्षित होंगे। तो यह सोचना कि कहने से क्या होगा, गलत है। सही दिशा में सोचना भी जरुरी है, कहना भी और करना भी।
  • बाहर तो जब-जैसा अवसर मिल जाए। कभी-कभी जरुरी होने पर बीच सड़क भी बहस की है। लेकिन घर में हम कुल तीन सदस्य हैं तो वर्जनाओं और सीमाओं को तोड़ने को लेकर मेरी आध्यात्मिक चर्चाएँ सबसे अधिक माँ के साथ होती है। उसके बाद जब-जब अवसर मिलता है तो बच्चों के साथ और कभी-कभी बाकियों के साथ भी। वर्जनाओं और सीमाओं को टूटते हुए भी देखा है। समाज सुधार के लिए किसी हौव्वे की जरुरत नहीं होती। आप जिस क्षण दुनिया के जिस स्थान पर खड़े या बैठे हैं वहां ही आपके पास कई अवसर होते हैं। 
  • नौकर मालिक बन सकता है और मालिक नौकर। स्त्री पुरुष की जगह पा सकती है और पुरुष स्त्री की। सवर्ण दलित बन जायेंगे और दलित सवर्ण। लेकिन समानता हमेशा एक दिवा स्वप्न ही रहेगी।...तब तक, जब तक कि मालकियत और नियंत्रण की भावना खत्म नहीं हो जाती।
  • हर क्षण आदमी एक नया आदमी होता है। वो जो भी होता है...हर आदमी के लिए वह अलग-अलग होता है। यही सापेक्षता है।
 
Monika Jain ‘पंछी’

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August 11, 2017

Help (Charity) Quotes in Hindi

Help Quotes

  • 22/07/2017 - वो वाला हवन तो कभी किया नहीं और आगे भी करने का कोई इरादा नहीं। लेकिन ‘हवन करते हाथ जलना’ वाली कहावत बहुत चरितार्थ हो रही है कुछ समय से। :’( सच्ची! सब मोह माया है। :/
  • 18/02/2017 - बस यही तो अजीब है न!...कि जो बड़े वाले फैन होने का दावा करते हैं, जो प्यार का दावा करते हैं, जो हमेशा साथ देने का दावा करते हैं, जो बड़ी-बड़ी तारीफें करते हैं, इसकी-उसकी-न जाने किस-किस की उपाधियों से नवाजते हैं...अक्सर वे एक छोटी सी मदद या समस्या के समय भी घोर लापरवाह बन जाते हैं।...और दूसरी ओर कभी-कभी कोई घोर अज़नबी जिसे लेना-देना नहीं...कौन मोनिका, कहाँ की मोनिका, कैसी मोनिका, होगी कोई मोनिका...वे भी बहुत बड़ी वाली मदद कर देते हैं। ये भी शायद एक वजह हो सकती है (हालाँकि है नहीं :p ) कि क्यों मुझे चींटी, कीड़े-मकोड़े, छिपकली, चिड़िया, कबूतर....सबमें अपने दोस्त और रिश्तेदार नज़र आते हैं।
  • 14/01/2017 - वास्तव में परमार्थ क्या है, इसे समझने के लिए और इसके होने के लिए बेहद सूक्ष्म दृष्टि चाहिए...बेहद सूक्ष्म। महावीर, बुद्ध, जीसस, नानक, मीरा...जो भी मुक्त हुए उनके पास यही दृष्टि थी। 
  • 14/10/2016 - दान (दाता भाव के अभाव में) अपने आप में एक आनंद है। उससे किसी अतिरिक्त फल की आशा उसे महज व्यापार बना देती है। 
  • 28/12/2014 - हम नहीं जानते देने का सुख। हम सिर्फ पाना चाहते हैं।...और यही सारी समस्यायों की जड़ है। अक्सर लोग सोचते हैं उन्हें यह मिल जाए, वह मिल जाए, वह भी और वह भी...पर बहुत कम देखा है किसी को कहते हुए कि वह देना चाहता है। हम प्यार चाहते हैं, देना नहीं। हम सम्मान चाहते हैं, करना नहीं। हम चाहते हैं हमें समझा जाए पर हम दूसरों को समझना नहीं चाहते। हमारी गलतियाँ नजरंदाज की जाए पर दूसरों की गलतियाँ हम भूलते नहीं। सारी ख्वाहिशें, सारी इच्छाएं और सारे सपने जब 'मैं' से आगे बढ़ ही नहीं पाते तो उनका होना न होना मायने ही कहाँ रखता है? 
  • 25/07/2014 - जब कोई व्यक्ति हमसे मदद चाहता है, तो हमें इसे एक अवसर के रूप में देखना चाहिए। क्योंकि हमारे ना करने के बावजूद भी अरबों की आबादी की इस दुनिया में उस व्यक्ति को निश्चित रूप से कोई और मदद करने वाला मिल ही जाएगा (अपवादों को छोड़कर)। अपने अहंकार, ईर्ष्या, आलस, स्वार्थ या अन्य किसी भी वजह से पूर्ण सक्षम होते हुए भी अगर हम किसी की छोटी सी मदद भी जान-बूझकर नहीं करते, तो यह निश्चित रूप से हमारा दुर्भाग्य है। 
  • 02/10/2012 - कुछ लोग बिना मांगे मदद करने आते हैं और फिर मदद करने की कुछ अप्रत्यक्ष शर्तें भी बताते हैं, और खुद को मददगार भी कहते हैं। भई, चाहे जो हो पर शर्तों वाली मदद तो बिल्कुल भी नहीं चाहिए और ना ही ऐसे मददगार। दुनिया की कोई भी समस्या इतना कमजोर कभी नहीं बना सकती कि दूसरों की उन शर्तों पर मदद लेनी पड़े, जिन्हें मानने को दिल नहीं कहता। फिर चाहे शर्त टिन्नी-मिन्नी सी ही क्यों ना हो। 
  • ऐसा सबके साथ कभी ना कभी जरुर हुआ होगा - किसी समस्या को लेकर मन बहुत परेशान है, उससे उभरने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा...तभी अचानक कोई अजनबी हमारी सारी परेशानी छू कर जाता है। बिना किसी अपेक्षा के, बिना किसी रिटर्न की चाह के, ज़िन्दगी के रास्तों में हमें ऐसे ढेर सारे अजनबी मिलते हैं, जो हमारी कई छोटी-मोटी समस्यायों को सुलझाते हुए, हमें जाने-अनजाने आगे बढ़ने का हौसला देते हैं, हमारे रास्तों को आसान बना देते हैं। कई बार उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का हमें मौका नहीं मिल पाता। पर क्या आपको नहीं लगता, उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का सबसे अच्छा तरीका है कि हम भी किसी के लिए ऐसे अजनबी दोस्त बन जाएँ। नफा-नुकसान, जान-पहचान, जाति-धर्म, ऊँच-नीच का आकलन किये बिना दूसरों की मदद के लिए तत्पर रहें। अब ये न कहियेगा कि मौका नहीं मिला। मौके तो हमें घर बैठे भी हजार मिलते हैं, बस जरूरत है मौके को पहचानने और उसे भुनाने की।
 
Monika Jain ‘पंछी’

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