March 30, 2018

अच्छे दिन ~ Poem on Good Days in Hindi

अच्छे दिन 

सबसे अच्छे होते हैं वे दिन 
जब पढ़ती/सुनती हूँ मैं अपनी आलोचना 
और मन के तार जरा भी नहीं झन्नाते। 
कितने अच्छे होते हैं वे दिन 
जब शिकायतों और शिकवों के भाव 
आसपास नहीं मंडराते। 

जब कहीं तारीफ़ कर आती हूँ मैं उसकी 
जिससे अक्सर अपनी बुराई सुनी। 
कितने अच्छे होते हैं वे दिन 
जब प्रेम से भरकर मैंने कोई कहानी बुनी। 

स्वीकार से भरे वे दिन 
जब अपने हर परिचित अपरिचित दुर्भाग्य को 
मैं अपनी ज़िम्मेदारी मान आती हूँ। 
अच्छे होते हैं वे दिन 
जब मैं उससे प्रेम करना सीखती हूँ 
जिससे प्रेम करना सबसे मुश्किल पाती हूँ। 

जब आकाश तले मेरे कदम 
बिना संगीत के भी थिरकने लगते हैं 
अच्छे होते हैं वे दिन 
जब चाँद, तारे, जमीं…सब अपने लगते हैं। 

अजनबी और अपने का 
जब कोई भेद नहीं पाती 
अच्छे लगते हैं वे दिन 
जब मैं खुद को क़ैद नहीं पाती। 

मोनिका जैन ‘पंछी’
(30/03/2018)

March 21, 2018

Ignorance Quotes in Hindi

Ignorance Quotes

  • 21/03/2018 - यह कहानी आज की नहीं सदियों से चल रही है। एक चिड़िया ने अपने अण्डों की सुरक्षा के लिए एक ऐसी जगह खोजी जो उसके अनुसार संदिग्ध तत्वों की नज़रों से दूर थी। थोड़ी गोपनीय थी। पर वह जगह फिसलन वाली थी और एक-एक करके उसके अंडे गिर गए। सुरक्षा की तलाश में यह असुरक्षा को पाना था। जीवन की चाह में यह मृत्यु का वरण था। हम मनुष्य भी यही करते रहे हैं। अपनी असुरक्षाओं के चलते हम हजार सुरक्षाएं हर रोज खोजते हैं। कहानी आगे बढ़ती रहती है। बीच बीच में आये स्पीड ब्रेकर हमें सुरक्षा का अहसास करवाते हैं जो कहानी को आगे बढ़ने की प्रेरणा देने के लिए जरुरी है। लेकिन एक दिन कहानी को रुकना होगा। एक दिन असल ब्रेक को आना ही होगा। वह दिन जब कोई सुरक्षा में असुरक्षा का संदेह और असुरक्षा में सुरक्षा की तलाश छोड़ देगा। वह दिन जब कोई जान जाएगा कि सुरक्षा उसके पास सदा से है, उसे कहीं पाना नहीं है।
  • 23/08/2017 - किताबें पढ़ना अभी भी निरंतरता में नहीं आया और लम्बे समय से कोई किताब हाथ में नहीं ली थी। फिर एक दिन लाइब्रेरी में भेंट हेतु किताबें पैक कर रही थी तो उन्हें देखकर कुछ प्रेरित हुई और सोचा अब तो कोई खरीद ही लूँ। और इस तरह हाथ में आई ‘जहं जहं चरन परे गौतम के’। गौतम बुद्ध के जीवन को जानना एक पुरानी ख़्वाहिश है जो अब जाकर पूरी हो रही है। अपने कई विचारों और अनुभवों को बुद्ध से प्रामाणिकता मिलते देखकर ख़ुशी तो होती है लेकिन साथ ही कुछ इतनी गूढ़ बातें हैं कि उन्हें ना समझ पाने पर अपने असीम अज्ञान का बोध भी होता है। कुछ सालों में दैनिक और गैर दैनिक जीवन में अनावश्यक जान कई चीजें छूटती तो जा रही है लेकिन वह पर्याप्त नहीं। और गौतम बुद्ध की इतनी कठिन साधना और मन के विकारों पर पूर्ण विजय के बारे में सोच-सोचकर अपनी निस्सहायता पर दुःख भी होता है। बहुत लम्बे समय से किसी के सामने रोई नहीं लेकिन कल मन किया कि बस बुद्ध आ जाए सामने तो रो ही पडूं। विशुद्ध समझ और प्रेम की अपेक्षा उनके सिवा किसी और से की भी तो नहीं जा सकती।
  • 25/07/2017 - जड़ता तेरे रूप अनेक।
  • 29/11/2016 - किसी को बेवकूफ बनाकर ख़ुश होने वाले लोगों की बेवकूफी पर दुःख होता है। चालाकी एक किस्म की बेवकूफी से इतर है भी क्या? 
  • 22/10/2016 - सोच रही थी सबसे बुद्धिमान प्राणी से थोड़ी सी बुद्धि लेकर प्रकृति को जीव जंतुओं में बाँट देनी चाहिए। अब जैसे ये छिपकली आहट सुनकर कई बार खुले दरवाजे के पीछे बनी जगह में छिप जाती है। उसे कैसे समझाऊँ कि मैं नुकसान नहीं पहुँचा रही उसको। उसे चोट न लग जाए या वह मर न जाए इसलिए दरवाजा भी बंद नहीं कर सकते। क्योंकि बंद करने पर वहीँ उसकी समाधि बन जायेगी। एक रात तो पूरे दो घंटे तक उसने सोने नहीं दिया। क्योंकि मैं घर में अकेली थी तो अपनी सुरक्षा के चलते दरवाजा बंद करना जरुरी था। पर वो खुले दरवाजे की आड़ से अंदर/बाहर नहीं ही निकली और दरवाजा भी खुला ही रखना पड़ा। पर अब लग रहा है कि मनुष्य से बुद्धि लेकर क्या करेगी? हम मनुष्य भी तो यही करते हैं। कई बार जिसे हम अपनी सुरक्षा समझ रहे होते हैं दरअसल वहीँ ख़तरा होता है।
  • 07/04/2016 - हम पूछ लेते हैं तो ज्यादा से ज्यादा उस समय मूर्ख साबित हो सकते हैं (वह भी किससे पूछा जा रहा है उसके व्यवहार और सोच पर निर्भर करता है)। लेकिन नहीं पूछते तो हमेशा मूर्ख ही रह जाते हैं। इसके अलावा किसी को कुछ बताना और समझाना स्वयं हमें सीखने में काफी मदद करता है। जो न समझ आये बेझिझक पूछिए और इंतजार करिए...उत्तर अवश्य मिलेगा। लेकिन सिर्फ पूछने के लिए पूछने से बचिए। वहां उत्तर मिलने की कोई गारंटी नहीं। 
  • चेतना (अर्ध) ही सबसे अधिक द्वंदों का सामना करती है। जड़ता तो बस एक प्रवाह में बह जाती है। 
  • खुद को ज्यादा समझदार समझना तो नासमझी है ही लेकिन दूसरों को ज्यादा समझदार समझ लेना भी अक्सर नासमझी ही है।  
  • अपनी अज्ञानता (बंधनों) को पहचानना ज्ञान (मुक्ति) की दिशा में बढ़ाया गया पहला कदम है।

Monika Jain ‘पंछी’

March 20, 2018

Poem on Self Realization in Hindi

अवकाश

वह कुछ जो विचलित कर रहा था 
उसी में शांति का आकाश था मेरे लिए। 

वह कुछ जो अजनबी था 
चिर जुड़ाव का अहसास था मेरे लिए।  

वह कुछ जिसे नकारा जा सकता था 
पर फिर भी कहीं स्वीकार था मेरे लिए।  

वह कुछ जिसे देखना और देखते जाना 
अपना ही साक्षात्कार था मेरे लिए।  

कुछ दिन आत्म अवलोकन के 
मैंने गुजारे थे जिसके तले।  

वह कुछ जो मुझे समझ न पाया (आया)
उसे समझना ही अवकाश था मेरे लिए। 

Monika Jain ‘पंछी’
(20/03/2018)