January 31, 2011

Poem on Change in Hindi

(1)

बदलेगा

कुछ मैं बदलूं, कुछ वो बदलेगा
यूँ ही तो सारा जहाँ बदलेगा 
अँधेरी स्याह कितनी हो रात 
सुबह यह आसमाँ बदलेगा। 

शर्त यह की राह में थकना नहीं
हो के मायूस कहीं रुकना नहीं
कुछ ख़ुशी के फिर तराने भी होंगे 
सब्र करो यह बोझिल समां बदलेगा। 

मुश्किलें भी सताएंगी, खिलाफत भी होगी
फूल चुनोगे तो कांटो की सियासत भी होगी 
बदलनी पड़े तो राह बदल लेंगे
मंजिल मिलेगी बस कारवां बदलेगा। 

चैन-ओ-अमन की बातें भी होंगी 
सुकून से भरी रातें भी होंगी 
लड़ कर भी जाना पड़े तो जायेंगे 
ये हौसला ये ज़ज़्बा कहाँ बदलेगा? 

Suchhit Kapoor 

(2)

गुलज़ार

खोये रहो तुम खयालों में ऐसे ही 
ये गुलशन वीरान हो जायेगा 
यूँ ही बैठे रहो तुम इंतज़ार में ही 
पूरा शहर ही शमशान हो जायेगा 
कब तलक तुम रहोगे उनके भरोसे 
जो करते भ्रमित, खुद भी रहते भ्रमित 
तोड़ों भ्रमों को और आगे बढ़ो तुम 
ये गुलशन गुलज़ार हो जायेगा।

Dr Dhirendra Shriwastava 

(3)

परिवर्तन 

परिवर्तन के अपरिवर्तनीय सिद्धांत को 
यदि एक प्रक्रिया से घटना बनाना है
तो परिवर्तन का यह पाठ
पहले स्वयं को पढ़ाना है। 

बुझे दीयों से कहाँ जग में
उजाला होता है
काला जिसपे चढ़ा हो रंग 
काला होता है। 

विजय करना हो तम तो 
सूरज बनना होगा
कुछ बदलना है तो पहले 
खुद को बदलना होग। 

हम दीप बन जलें तो 
जोत से जोत जल जाएगी
हम एक-एक कर बदलें तो 
दुनिया बदल जाएगी। 

आशा की एक किरण बनें 
घनघोर भले अँधियारा हो
हम जो अपना दीप बनें तो 
हर तरफ उजियारा हो। 

Suchhit Kapoor 

January 1, 2011

Story on Happiness in Hindi

सच्ची ख़ुशी

एक दिन सवेरे-सवेरे जब छत पर पहुँची तो कुछ ही दूरी पर नगरपालिका द्वारा रखे गये कचरे के पात्र के पास कुछ छोटे-छोटे ग़रीब बच्चों को इकठ्ठा देखा। वो बच्चे उस कचरे के ढ़ेर में से कुछ प्लास्टिक की थैलियाँ और कुछ दूसरा सामान चुन-चुन कर अपने पास रखे एक बोरी के थैले में इकठ्ठा कर रहे थे। बच्चों को देश का भविष्य कहा जाता है, पर देश के ये भावी कर्णधार जिन्हें विद्यालय की पोशाक पहन अभी अपनी कक्षा में होना चाहिए था, वो नन्हें-मुन्हें कूड़े-कचरे के ढ़ेर में अपना भविष्य तलाश कर रहे थे।

दिल पसीज सा गया और शर्मिंदगी भी महसूस हुई क्योंकि हम सच्चे अर्थों में कुछ भी तो नहीं करते समाज के इस तबके के लिए। शादी, पार्टीस और अन्य समारोह में कितना पैसा बहाते हैं, सिर्फ़ खुशी के कुछ पल पाने के लिए, पर ये खुशी उस खुशी के सामने तुच्छ है, गोण है जो किसी ग़रीब को एक वक्त का खाना खिलाने से मिल सकती है। उसके अधनंगे तन को कुछ कपड़ों से ढकने पर मिल सकती है और सबसे ज़्यादा उसे स्वाभिमान के साथ जीवन जीने का पथ दिखा कर मिल सकती है। ये बाते सिर्फ़ कहने के लिए नहीं कह रही मैं। जीवन में सच में इसे अनुभव भी किया है।

कुछ महीनों पहले की ही बात है, जब मैं घर के कुछ कामों में व्यस्त थी। मुझे देखकर बाहर खड़ी दो ग़रीब लड़कियाँ दीदी-दीदी पुकारने लगी। खाना बना नहीं था अभी, पर नज़रे उनके फटे कपड़ों पे पड़ी। भीतर गयी और उनके आ सकने लायक कुछ कपड़ें निकाल लाई। उन्हें दिए और फिर से अपने काम में लग गयी। कमरे की खिड़की से सहसा उन बच्चियों पर नज़र पड़ी। वे बार बार चहचहाते हुए उन कपड़ों को खुद पे सजाकर देख रही थी। उनकी मुस्कुराहट देखकर मेरे चहरे पर भी मुस्कुराहट आ गयी। कुछ देर बाद बाहर से तेज आवाज़ आई, दीदी ठंकु। वो मुझे थैंक्यू कहना चाहती थी पर उनके इन आभार और खुशी भरे शब्दों में कितनी मासूमियत थी। उनके ये शब्द दिल को छू गये।

मैं तत्काल बाहर गयी। मुझे देख हाथ हिला कर वे मुझे अलविदा कर रही थी। मुस्कुराते हुए मैनें भी अपना हाथ हिला दिया। सोचने लगी कुछ भी तो नहीं किया था मैनें। कुछ ऐसे कपड़े जो शायद किसी के काम के भी नहीं थे, वे ही तो दिए थे उन्हें। पर पता नहीं क्यों उस दिन उन दोनों बच्चियों के चहरे की खुशी पूरे दिन मेरे चहरे पर मुस्कुराती रही। सोचा कि अगर सच्चे अर्थों में किसी के लिए कुछ करूँगी तो कितना सुकून और कितनी खुशी मिलेगी। उस दिन जाना की सच्ची खुशी क्या होती है। अक्सर कोई अच्छा कार्य करना हम अपना दायित्व मानते हैं, पर मुझे लगता है कि ज़रूरतमंद की मदद के लिए किया गया अच्छा कार्य हमारा दायित्व नहीं हमारा अधिकार है। सच्चे अर्थों में ख़ुशी पाने का अधिकार।

Monika Jain 'पंछी'
(01/2011)