November 24, 2011

Female Infanticide (Foeticide) Poem in Hindi


(1)

माँ! मुझे मत मार

गर्भ मे पलती बेटी, पल-पल करे गुहार
माँ! मुझे मत मार, ओ माँ! मुझे मत मार। 

मैं भी दुनिया देखूँगी, चिड़िया सी मैं चहकूँगी 
तेरे आँगन की बन फुलवारी, फूलों सी मैं महकूँगी। 

गुड़ियों संग मैं खेलूँगी, कोयल सी मीठी बोलूँगी
पायल की छम-छम करती माँ, तेरे आँगन डोलूँगी। 

बन जाऊँगी माँ मैं तेरे, आँगन की झंकार
माँ! मुझे मत मार, ओ माँ! मुझे मत मार। 

मिश्री सी बोली घोलूँगी, माँ तेरे कानों में
आँसू ना कभी आने दूँगी, माँ तेरी आँखों में। 

नन्हें हाथ बटाऊंगी, माँ तेरे कामों में
मलहम सी लग जाऊँगी, माँ तेरे घावों में। 

तेरे सुख की ख़ातिर दूँगी, अपना तन-मन वार
माँ! मुझे मत मार, ओ माँ! मुझे मत मार। 

तेरे आँगन की तुलसी बन, मैं बढ़ती जाऊँगी
पूजा की कलसी का पानी बन, बहती जाऊँगी। 

तेरे घर आँगन की माँ, शोभा मैं बढ़ाऊंगी
बेटी, बहन, माँ, पत्नी, हर रिश्ते को निभाऊँगी। 

रोशन कर दूँगी घर आँगन, बन सूरज की दमकार 
माँ! मुझे मत मार, ओ माँ! मुझे मत मार। 

तेरे भीतर नन्हीं जान हूँ माँ!
तेरी ममता का सम्मान हूँ माँ!
स्नेह, प्यार और दुलार की
मैं ही तो पहचान हूँ माँ! 

बन जाऊँगी माँ मैं तेरी खुशियों का संसार
माँ! मुझे मत मार, ओ माँ! मुझे मत मार। 

Monika Jain 'पंछी'
(24/11/2011) 

(2)

मैं भी जीना चाहती हूँ

माँ, मैं कुछ कहना चाहती हूँ
माँ, मैं भी जीना चाहती हूँ। 

तेरे आँगन की बगिया में
चाहती मैं हूँ पलना
पायल की छमछम करती माँ
चाहती मैं भी चलना। 

तेरी आँखों का तारा बन
चाहती झिलमिल करना
तेरी सखी सहेली बन माँ
चाहती बातें करना। 

तेरे आँगन की बन तुलसी
चाहती मैं हूँ बढ़ना
मान तेरे घर का बन माँ
चाहती मैं भी पढ़ना। 

हाथ बँटाकर काम में तेरे
चाहती हूँ कम करना
तेरे दिल के प्यार का गागर
चाहती मैं भी भरना। 

मिश्री से मीठे बोल बोलकर
चाहती मैं हूँ गाना
तेरे प्यार दुलार की छाया
चाहती मैं भी पाना। 

चहक-चहक कर चिड़िया सी
चाहती मैं हूँ उड़ना
महक-महक कर फूलों सी
चाहती मैं भी खिलना। 

Monika Jain 'पंछी' 
(08/07/2012)

(3)

मैं एक लड़की 

एक ज़िन्दगी नहीं, फिर भी ज़िन्दा हूँ मैं
ख्वामखाह ही खुद से शर्मिंदा हूँ मैं
अपनी अनकही दास्तां तुमसे कहने जा रही हूँ
मैं एक लड़की...जहां में आने से पहले जा रही हूँ। 

मैं नैया पार ना कर सकूंगी
मुझ पर इतना सा ही भरोसा था
मेरे आने की खबर पर
मेरी माँ ने खुद को कोसा था। 

जब-जब तुम थकते मेरी बाहें आगोश होतीं
ज़िन्दगी के हर चौराहे भले ही मैं खामोश होती
जाने कितनी घुटन...मैं ज़माने से सहते आ रही हूँ
मैं एक लड़की...जहां में आने से पहले जा रही हूँ। 

कितनी अंधेरी रातों में, दीये सी जलती मैं
कुछ बेरहम मुट्ठियों से, रेत सी फिसलती मैं
बेशक मुझ पर तुम एक निगाह ना बख्शो
साथ तुम्हारे हर घड़ी किसी साये सी चलती मैं। 
मैं एक दुआ... जो सुर्ख लबों पे रहते आ रही हूँ
मैं एक लड़की...जहां में आने से पहले जा रही हूँ। 

तुम्हें रखती ज़माने से महफ़ूज, वो हिजाब थी मैं
सारी कायनात हो बयां जिसमे, वो किताब थी मैं
जीने की एक तमन्ना लेकर तो चली थी
पर जो उतर न सका कि नज़र में, वो ख़्वाब थी मैं। 
मैं एक नज़र...सब चुपचाप तुमसे कहते आ रही हूँ
मैं एक लड़की...जहां में आने से पहले जा रही हूँ
मैं एक लड़की...जहां में आने से पहले जा रही हूँ। 

Malendra Kumar

November 14, 2011

Children's Day (Childhood) Poem in Hindi


(1)

यादें 

कुछ खट्टी, कुछ मीठी
कुछ कड़वी, कुछ तीखी
यादें तो यादें होती जो
कभी न मन से मिटतीं। 

कॉपी कलम उठा ले हाथ 
भावों को चेताया मैंने
याद आया वह मीठा बचपन
जिसे उतारा पन्नों में मैंने। 

लिखते-लिखते खो गयी मैं
बचपन की रंगीनी में
छिपा-छिपी का खेल खेलने लगी
पूरानी गलियों में। 

कितना सच्चा, कितना अच्छा
जीवन का वह लम्हा था
न तनाव, न चिंता सचमुच!
कितना प्यारा जीवन था। 

खिले फूल सा खिला वो बचपन
याद बहुत आता है
मुरझाये इस जीवन को
ग़मगीन बना जाता है। 

बचपन, बचपन क्यों न रहता 
क्यों बढता जाता है?
समय का पहिया क्यों न थमता 
क्यों चलता जाता है?

हे ईश्वर! मुझको पहुंचा दो
बचपन के उस आँचल में
हे ईश्वर! मुझको दे दो
जीवन के वे सच्चे क्षण। 

Monika Jain 'पंछी' 
(09/05/2002)

(2)

बचपन कितना अच्छा था

दिन वो मस्त मोला मस्तियों के 
जब खुशियों को हमने पुकारा 
आंसुओं को हमने नकारा। 

मस्त रहते अपनी मस्ती में 
चाहे आग लगे बस्ती में। 

झूम-झूम कर झूलों की 
मस्ती में आता था सावन 
हर तरफ मिलता था अपनापन 
कुछ इस तरह बीता मेरा बचपन। 

पहले खिलौना टूटता था 
तो आंसू आते थे 
आज दिल टूटता है 
तो आंसू आते हैं। 

खिलौना तो पापा नया दिलाकर 
समझा देते थे 
पर अब कौन समझाये 
दिल का ये दर्द किसे सुनाये?

सच! बचपन कितना अच्छा था -
बारिश में गीला होना 
दिन भर धूल में खेलना 
बिना किसी चिंता के 
दिन भर घूमते रहना। 

माँ को चिंता मेरे खाने की 
बहन को चिंता मेरे पढ़ने की 
और मुझे पड़ी रहती सिर्फ खेलने की
सच! बचपन कितना अच्छा था। 

Vikas Jain 

(3)

एक दौर था

मायूस जिसके दर से कोई परिंदा नहीं लौटा
ख़ुद में जिंदादिली का वो मकां रखते थे हम
ख़्वाब आँखों में, होठों पे बागबां
एक दौर था मुट्ठी में आसमां रखते थे हम। 

चहचहाते परिंदों से याराना था अपना 
मिट्टी के घरोंदों में आशियाना था अपना
होता था बुजुर्गों की बाहों का बिस्तर 
वो भी क्या खूबसूरत फ़साना था अपना। 

तब ज़िन्दगी कुछ इतनी संजीदा भी नहीं थी
हर कदम पे शौक से इम्तिहाँ रखते थे हम
किसी गिले की शिकन कभी चेहरे पे न रही 
एक दौर था मुट्ठी में आसमां रखते थे हम। 

होता था नशा सा बेखौफ शैतानी में 
था अक्स जिंदगी का दरिया की रवानी में 
छोटी खुशियाँ समेटे वो लमहे भी खूब थे 
जब डुबाते थे कश्ती को बारिश के पानी में। 

तन्हा रात में वो शामें बहुत याद आती हैं
जब साथ हर कदम पे कारवां रखते थे हम
मासूमियत की थी वो कोरी दास्तां 
एक दौर था मुट्ठी में आसमां रखते थे हम। 

Malendra Kumar

05/03/2018 - Note : These are old writings and leading to spirituality today I am not much concerned with such writings. Childhood is the blissful time of anyone’s life. It’s the most joyful time. A time of no stress and no worries, a time full of innocence. We all wish to live those days again. But living in past is not a good thing. It’s better to step towards awakening flawlessness than to ignorant innocence. 

November 7, 2011

Save Animals (Stop Cruelty) Poem in Hindi


(1 )

बलि 

धर्म के नाम पर निर्दोष पशुओं की बलि
रज़ा हो नहीं सकती ये तेरी अली। 

उस निरीह की आँखों मे देखो
जीने का ख़्वाब वहाँ भी पलता है 
उस बेबस के दिल मे झाँको
तुम्हारा ख़ुदा वहाँ भी बसता है। 

दिल के एक कोने में मेरे
टीस सी ये उठ चली
धर्म के नाम पर निर्दोष पशुओं की बलि
रज़ा हो नहीं सकती ये तेरी अली। 

ये ज़मीं उसकी भी है
आसमाँ उसका भी है
चाँद, सूरज और हवा
सब पे हक उसका भी है। 

बन के उसके मन की आवाज़
कलम ये मेरी चली
धर्म के नाम पर निर्दोष पशुओं की बलि
रज़ा हो नहीं सकती ये तेरी अली। 

काट जो देते हो धड़
काँपते नहीं क्या कर
चीख सुनकर उस निरीह की
क्या कुछ भी ना होता असर?

जान लेने की रीत ये कैसी चली
धर्म के नाम पर निर्दोष पशुओं की बलि
रज़ा हो नहीं सकती ये तेरी अली। 

Monika Jain 'पंछी'
(07/11/2011)

(2 )

जीना सबको ही भाता है

एक समय था 
जब पशु थे मानव की जीविका का आधार 
पर जब से इंसान ने की है तरक्की 
पशु हो रहे हैं हिंसा के शिकार।

पशुपालन में रूचि ना रही 
मिलावटी उत्पादों ने जगह बनायी है
जैविक उर्वरकों को छोड़ 
रासायनिक खाद अपनायी है। 

चरागाहों पर भवन निर्माण 
पशु हो रहे बेघर हैं 
मांसाहार का बढ़ता उपभोग 
जबकि शाकाहार ही बेहतर है। 

सम्मान करें जीवों का हम 
प्रकृति उनकी भी माता है 
इतनी निर्दयता ठीक नहीं 
जीना सबको ही भाता है। 

Monika Jain 'पंछी'
(21/07/2013)

13/10/2017 - नोट : कुछ सालों पहले पशु परिवार का हिस्सा हुआ करते थे। लेकिन जिस बेरहमी से आज पशु-पक्षियों को पाला जाता है, उसे देखकर मैं पशु पालन का भी पूर्ण समर्थन नहीं कर सकती। दूसरी ओर प्रकृति की चक्रीय व्यवस्था को देखते हुए मांसाहार कोई भी व्यक्ति ना करे यह अपेक्षा भी सही नहीं है। हम सभी एक दूसरे पर निर्भर हैं। लेकिन हमें जरुरी और गैर जरुरी आवश्यकताओं को पहचानने की जरुरत तो है ही। व्यक्तिगत स्तर पर यदि शाकाहार अपनाया जा सके तो जरूर अपनाया जाना चाहिए, लेकिन हम दूसरों पर प्रतिबन्ध नहीं लगा सकते। पर हाँ, जब पशु हमारी इतनी आवश्यकताएं पूरी करते हैं तो कम से कम उनके प्रति निर्दयता और हिंसा को कम से कम तो किया ही जा सकता है।   

Stop Animal Cruelty Poems in English


(1)

Stop Animal Cruelty

Slaughtering of animals
in the name of religion
It's beyond my thinking
and above my imagination.

It can't be the desire of God
Please make your thinking little bit broad.
Look inside the heart of that creature
What are you doing
for the sake of your pleasure?

See his innocence and feel his pain
By killing an innocent nothing you will gain.
Listen his scream and listen his cry
How can you make your heart so dry?

Seas for the fishes
Air for the birds
Forests for the animals
But their nature is reversed.
For research
they are treated as a scientific tool
For entertainment
they are kept in cages and swimming pools.

They have the same feelings
and experience the same
depth of love and pain
When they are loved deeply
their loyalty, love and affection
in many folds is our gain.

They have the equal right
on earth and sky
They don’t have voice
but they also cry.
Be the voice for creatures
who can not speak up for themselves
Be the strength of those
who are completely helpless.

Respect the rights of other living beings
Stop financing their death trade
Love all creations of nature
and Make sure
no animal around us is being exploited.

Monika Jain 'Panchhi'
(07/11/2011)

(2)

I Don't Need Next Life

My day begins in sorrow
And day ends in tears.

Sitting alone on a lonely tree
My little house on the top branch
Sometimes, I cry.

When I see
My childs are dying
But there's no one who would help.

Humans are not less than animals
Now I'm enough tired to walk
My wing is broken in half.

And now I see
Where I'm heading
And I'll ask this question to my Lord.

Why you created
This monster on earth
Their edacity is out of control.

See, a human hit me with a gun
I didn't hurt him
But he hurted me just for a fun.

I don't need next life on earth
If there is a human
He would not hesitate to kill me twice.

Chetan K Dheer
(08/05/2014)

Animals are beaten for no reason. They are forced to do something they don’t want to do for the entertainment and pleasure of we humans. They are slaughtered for religious practices, fur, skin etc. This must be stopped. Let’s be the voice of these innocent creatures.

November 6, 2011

यादें ~ Poem on Love Memories in Hindi


(1)

तुम याद आते हो

रिमझिम बारिश की बूँदें जब छूती है मेरी पलकें
अश्क बनकर मेरी आँखों से तुम बह जाते हो। 

भीगी मिट्टी की खुशबू जब महकाती मेरी सांसें
बन खुशबू मेरी साँसों में तुम महक जाते हो। 

सूरज की पहली किरण जब दस्तक देती मेरे द्वारे
बन सवेरा हर तरफ बस तुम ही छा जाते हो। 

कोयल की कूँ-कूँ और मयूरे की पीहूं
बन सरगम मेरे दिल के तार छेड़ जाते हो। 

सांझ के सूरज को जब तकती है मेरी आँखें
बन झोंका हवा का मेरी जुल्फें बिखराते हो। 

चांदनी रातों में जब टूटता है कोई तारा
बंद आँखों में तुम मेरी ख्वाहिश बन जाते हो। 

गरजते हैं बादल जब कड़कती हैं बिजलियाँ
काँपते मेरे दिल की तुम धड़कन बन जाते हो। 

नींद जब लेती है आगोश में मेरी आँखों को
बन सपना मेरी आँखों में तुम ही बस जाते हो। 

जब भी उठती है कलम कुछ लिखने की चाहत में
बन शब्द तुम ही मेरी कविता सजाते हो। 

जब भी पढ़ती है कोई कविता मेरी आँखें
हर शब्द में बस मुझे तुम ही नज़र आते हो। 

हर पल, हर घड़ी, हर लम्हा मेरी यादों को
बस तुम याद आते हो, बस तुम याद आते हो। 

Monika Jain 'पंछी'
(11/09/2011)

(2)


मैं याद आऊंगी 

कल-कल करती पानी की धारा जो तुझे छू जाएगी 
बन आँसू तेरी आँखों का मैं धीमे से बह जाऊँगी। 

कूँ-कूँ करती कोयल जब तेरे द्वारे गाएगी 
मिश्री की डली मेरी बोली तेरे कानों में घुल जाएगी। 

फूलों की कोई क्यारी जब तेरे आँगन खिल आएगी 
बन खुशबू तेरी साँसों को मैं महकाती जाऊँगी। 

अनजानी सूनी राहों पे जब हवा तुझे छू जाएगी 
मेरी यादें तेरा हथ थामे दूर तलक तक जाएगी। 

रिमझिम बारिश की बूँदें जब तेरा तन भिगाएगी 
बन सिहरन तेरे तन-मन में मैं अहसास जगाऊँगी। 

साँझ के ढलते सूरज पर जब तेरी नज़रें जाएँगी 
मेरे चहरे की धुँधली सी एक छवि नज़र तुझे आएगी। 

भीड़ में भी जब तनहाई रह रह कर तुझे सताएगी 
मेरी ख़ामोशी तेरी ख़ामोशी से घंटों बतियाएगी। 

इन्द्रधनुषी रंगों को जब तेरी पलकें निहारेगी 
बन गुलाल तेरी यादों को उन रंगों से रंग जाऊँगी। 

हर पल तेरी यादों को हर लम्हा तेरी बातों को 
मैं याद आऊँगी, तुझे मैं याद आऊँगी। 

Monika Jain 'पंछी'
(06/11/2011)

05/03/2018 - Note : Love for your sweetheart is that feeling like someone who owns all the world. When you are away from your beloved, you feel his/her presence in each and everything around you. Nature plays a crucial role for the feeling of attachment with your lover. Sun, moon, rain, rivers, wet soil, birds chirping, cool breeze, clouds all add flavour to love. But living in past is not a good thing. Leading to spirituality today I am not much concerned with such writings. As spiritualism is a journey from dependence to independence.

November 3, 2011

Poem on Child Labour in Hindi


(1)

छोटू

आज जब छोटू को होटल में प्लेट धोते देखा
अपने बचपन के उसी समय में झांक कर मैंने देखा।

रोज नए चमचमाते बर्तनों में
मिल जाता था मुझे मनचाहा खाना
नहीं सोचा कभी भी
कैसे चमकते हैं ये बर्तन रोजाना?

श्रम मेरे लिए होता था बस
अपना स्कूल बैग स्कूल ले जाना
और दोस्तों के साथ
खेलते-खेलते थक जाना।

कागज के नोट तब समझ में न आते थे
पिग्गी बैंक में बस सिक्के ही छनछ्नाते थे।

मेहनत का फल होता है मीठा
माँ ने मुझे सिखाया था
पर मेहनत का मतलब बस
पढ़ना ही तो बताया था।

क्यों छोटू का बचपन, नहीं है बचपन जैसा
काश! न होता इस दुनिया में कोई बच्चा ऐसा।

Monika Jain 'पंछी'
(11/2012)


(2)

फूल जो खिले ही थे

फूल जो खिले ही थे कुम्हला गए
और कहीं से धूल के कण आ गए
भेंट भ्रमरों से भी तो ना हो सकी
कोमल ह्रदय पे शूल कैसे छा गए।

दिन तो थे ये बाग़ में महकने के
पंछियों के संग-संग चहकने के
बहती हवा के संग-संग बहकने के
और सूरज की तरह लहकने के।
फिर कहाँ से ये अँधेरे छा गए
फूल जो खिले ही थे कुम्हला गए।

मासूमियत कहाँ ये इनकी खो गयी
थी जो बचपन की रवानी सो गयी
मुस्कान जाने किधर इनकी बह गयी
इक कहानी जो अधूरी रह गयी।
मोड़ ये जीवन में कैसे आ गए
फूल जो खिले ही थे कुम्हला गए।

Monika Jain 'पंछी'
(02/03/2013)

22/11/2017 - नोट : पुरानी कवितायेँ हैं। कुछ नया जोड़ना चाहती हूँ। छोटे-छोटे बच्चों से बहुत ज्यादा काम करवाकर बच्चों का शोषण तो बिल्कुल गलत है। मैंने बचपन में घर के बहुत ज्यादा काम नहीं किये। अभी सारे काम बहुत अच्छे से आते हैं और जरुरत होने पर कर लेती हूँ। लेकिन हमेशा हर बच्चे के साथ ऐसा नहीं होता। इसलिए मैं समझती हूँ कि बच्चों का (लड़का और लड़की दोनों) बचपन से ही घर और बाहर के छोटे-छोटे काम सीखना और करना जरुरी है। बड़े होने तक हमें घर और बाहर के सभी जरुरी काम आने चाहिए। यह हमें आत्मनिर्भर बनाता है। हम घर के वृद्धों और बड़ों की सहायता से और आवश्यकता होने पर जी नहीं चुराते और आलस आड़े नहीं आता।