November 3, 2011

Poem on Child Labour in Hindi

(1)

छोटू

आज जब छोटू को होटल में प्लेट धोते देखा
अपने बचपन के उसी समय में झांक कर मैंने देखा।

रोज नए चमचमाते बर्तनों में
मिल जाता था मुझे मनचाहा खाना
नहीं सोचा कभी भी
कैसे चमकते हैं ये बर्तन रोजाना?

श्रम मेरे लिए होता था बस
अपना स्कूल बैग स्कूल ले जाना
और दोस्तों के साथ
खेलते-खेलते थक जाना।

कागज के नोट तब समझ में न आते थे
पिग्गी बैंक में बस सिक्के ही छनछ्नाते थे।

मेहनत का फल होता है मीठा
माँ ने मुझे सिखाया था
पर मेहनत का मतलब बस
पढ़ना ही तो बताया था।

क्यों छोटू का बचपन, नहीं है बचपन जैसा
काश! न होता इस दुनिया में कोई बच्चा ऐसा।

Monika Jain 'पंछी'
(11/2012)

(2)

फूल जो खिले ही थे

फूल जो खिले ही थे कुम्हला गए
और कहीं से धूल के कण आ गए
भेंट भ्रमरों से भी तो ना हो सकी
कोमल ह्रदय पे शूल कैसे छा गए।

दिन तो थे ये बाग़ में महकने के
पंछियों के संग-संग चहकने के
बहती हवा के संग-संग बहकने के
और सूरज की तरह लहकने के।
फिर कहाँ से ये अँधेरे छा गए
फूल जो खिले ही थे कुम्हला गए।

मासूमियत कहाँ ये इनकी खो गयी
थी जो बचपन की रवानी सो गयी
मुस्कान जाने किधर इनकी बह गयी
इक कहानी जो अधूरी रह गयी।
मोड़ ये जीवन में कैसे आ गए
फूल जो खिले ही थे कुम्हला गए।

Monika Jain 'पंछी'
(02/03/2013)

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