December 2, 2011

Moral Story on Beauty in Hindi

Moral Story on Beauty in Hindi
 नयना
(बालहंस में प्रकाशित)

मायूस सा चेहरा और कांपते से कदम उठाये वह अपने स्कूल की तरफ बढ़ रही थी। आज नयना का नए स्कूल में पहला दिन था। कुदरत ने भी क्या भद्दा मजाक किया था नयना के साथ। बचपन में एक हादसे में उसने अपनी एक आँख खो दी थी और एक तरफ का चेहरा पूरा जल गया था। तभी से हमेशा खिलखिला कर हँसते रहने वाली नयना के जीवन में उदासी छा गयी थी।

कई बार वह अपना उपहास बनते हुए देखती। अपने सहपाठियों को हँस-हँस कर कानों में फुसफुसाते हुए देखा था उसने। इन सब बातों ने उसके मनोबल और आत्मविश्वास को खत्म सा कर दिया था। पर एक चीज ऐसी थी जो नयना में नयी स्फूर्ति भर देती थी, वह था नृत्य से उसका लगाव। मानो नृत्य में उसकी आत्मा बसती हो। नयना घंटों अकेले कमरे में नृत्य का अभ्यास करती थी। नृत्य ही उसके जीवन में अब उसका सबसे सच्चा और अच्छा साथी था।

नयना के नए स्कूल में एक जिला स्तरीय नृत्य प्रतियोगिता का आयोजन होने वाला था। जब क्लास में एक टीचर नृत्य प्रतियोगिता में इच्छुक विद्यार्थियों के नाम लिखने आई तो नयना से बड़ी हिम्मत से अपना हाथ खड़ा किया। अध्यापिका विचित्र सी नजरों से उसे घूरकर और नाम लिखकर चली गयी। पीछे से एक छात्र बोला, ‘अब यह एक आँख वाली डांस करेगी। कहीं किसी से टकराकर गिर पड़ी तो?’ उस लड़के की बात सुन क्लास के सभी विद्यार्थी जोर-जोर से हंसने लगे। नयना को रोना आ गया।

विद्यालय की ओर से प्रतिनिधित्व करने के लिए एक छात्र/छात्रा को नृत्य के लिए चुना जाना था। अगले दिन सभी रूचि रखने वाले विद्यार्थियों को बारी-बारी से अपनी प्रस्तुति देने के लिए कहा गया। आखिर में नयना की बारी थी। पर उसका नाम आते ही टीचर ने कहा, ‘आज समय खत्म हो चुका है और नृत्य प्रतियोगिता के लिए उमा को चुन लिया गया है।’ यह कहकर अध्यापिका चली गयी। नयना उदास मन से घर आ गयी।

नृत्य प्रतियोगिता का दिन भी आ गया। उमा जिसे प्रस्तुति देनी थी वह नयना की पड़ौसी थी और उसने नृत्य के कई गुर नयना से ही सीखे थे। वह जानती थी नृत्य में नयना का कोई सानी नहीं था। उमा प्रतियोगी कक्ष में पहुँच गयी। तैयार होने में उसकी मदद के लिए नयना उसके साथ थी। अचानक उमा का पाँव फिसल गया और उसके पाँव में भयंकर मोच आ गयी। वह ठीक से खड़ी भी नहीं हो पा रही थी। अपने दर्द से ज्यादा उसे इस बात का भय सता रहा था कि अब वह नृत्य कैसे करेगी और टीचर से क्या कहेगी। उसमें किसी को भी चोट के बारे में बताने की हिम्मत नहीं थी। अचानक उसकी नज़र नयना पर पड़ी। उसने नयना से कहा, ‘तुम तुरंत मेरी पोशाक पहन लो और तैयार हो जाओ। आज मेरी जगह तुम्हें ही नृत्य करना होगा।’ यह कहते हुए उसने पोशाक नयना के हाथों में थमा दी।

नयना के हाथ कांपने लगे। उसके अन्दर छिपी प्रतिभा बाहर आने को छटपटाने लगी पर वह इतना साहस नहीं जुटा पा रही थी कि उमा की जगह नृत्य करने चली जाए। जब उमा रोने लगी तो नयना को वह पोशाक पहननी पड़ी। उसने जब दर्पण में अपना चेहरा देखा तो उसका मनोबल फिर गिरने लगा। लेकिन उमा के आसुंओं को देखकर उसने अपनी आँखों पर एक पट्टी बाँधी और जब उमा का नाम पुकारा गया तो वह मंच पर चली आई।

संगीत बजता इससे पहले ही उसने नृत्य करना शुरू कर दिया। उसके घुँघरू वैसे भी संगीत की ही रचना कर रहे थे। किसी को आभास भी नहीं हुआ कि संगीत नहीं बज रहा। उसकी प्रस्तुति में सभी मंत्र मुग्ध हो गए। ऐसा लग रहा था मानों वर्षों से नयना के ह्रदय में बसा तूफ़ान आज नृत्य के माध्यम से निकल रहा था। अपमान के कड़वे घूंट पीते-पीते जो दुःख, दर्द और रोष उसके अन्दर बसा था आज उसकी दासता उसका नृत्य सुना रहा था। बहुत देर हो गयी पर उसके पाँव नहीं रुके।

नयना की माँ भी नृत्य प्रतियोगिता देखने वहां आई थी। माँ की नज़र नयना के पांवों से बहते खून पर पड़ी। वह दौड़कर तुरंत मंच पर पहुंची और अपनी बेटी को गले से लगा लिया। माँ का स्पर्श पाते ही अपनी आँखों पर बंधी पट्टी हटाकर नयना फफक-फफककर रो पड़ी और बोली, ‘माँ, ईश्वर ने मुझसे मेरी सुन्दरता क्यों छीन ली? मैं थक चुकी हूँ लोगों के ताने सुन-सुनकर। मेरे साथ से सभी को शर्म महसूस होती है। इससे पहले कि सब मुझपे हंसने लगे आप मुझे घर ले चलो।’

माइक की वजह से नयना की आवाज़ सभी को सुनाई पड़ रही थी। उसका उपहास करने वाले सभी विद्यार्थी और अध्यापिका शर्म से सर नीचे झुकाए खड़े थे। सभागार जो पहले नयना की प्रस्तुति देखकर तालियों की घड़घड़ाहट से गूँज रहा था, नयना के शब्द सुनकर चारों तरफ चुप्पी छा गयी और सभी की आँखें भर आई।

प्रतियोगिता का मूल्यांकन करने वाली जज महोदया अपनी कुर्सी से खड़ी हुई और नयना को गले लगाकर बोली ‘बेटी, तुम कुरूप नहीं तुम तो सुन्दरता का प्रतीक हो। तुम्हारे नृत्य की सुन्दरता ने सभी का मन मोह लिया है। तुम तो इस विद्यालय के प्रांगण में चमकने वाला सूरज हो, इस विद्यालय का सम्मान हो।’

यह कहकर जज महोदया ने जैसे ही प्रथम पुरस्कार की घोषणा करने के लिए माइक हाथ में लिया, चारों ओर से नयना-नयना के स्वर सुनाई देने लगे। जज महोदया ने नयना के हाथ में पुरस्कार थमाया और प्यार से उसके सर पर हाथ फेर उसे आगामी जीवन के लिए शुभकामनाएं दी। इतना प्यार और सम्मान देखकर नयना ख़ुशी से फूली नहीं समा रही थी। अब वह विद्यालय में सबकी चहेती बन गयी थी। नृत्य ने उसे नया जीवन जो दे दिया था।

Monika Jain ‘पंछी’
(02/12/2011)