September 21, 2012

Story of Sparrow and Squirrel in Hindi

Story of Sparrow and Squirrel in Hindi
Story of Sparrow and Squirrel in Hindi

चूंचूं

छत पर सूखे कपड़े लेने गयी तो देखा मोज़े की जोड़ी में से एक मोज़ा गायब था। इधर-उधर तलाश किया पर कहीं भी नज़र नहीं आया। अगले दिन कुछ सामान निकालने के लिए छत पर बने स्टोर को खोला तो अचानक एक गिलहरी फुदकती हुई बाहर निकली। एक पल के लिए मैं चौंक उठी। दूजे ही पल एक पुराने टायर के बीचोंबीच चूं-चूं की आवाज़ करते गिलहरी के चार-पांच नन्हें बच्चे दिखाई पड़े। उन्हीं बच्चों के नीचे मेरा कल का खोया मोज़ा, कुछ दिन पहले खोया एक रुमाल और छोटी-छोटी रंग-बिरंगी कपड़ों की कई कतरने पड़ी थी। उन नन्हें मासूमों को देखकर एक पल के लिए प्यार उमड़ आया पर तभी गिलहरी से अपनी सालों पुरानी दुश्मनी को याद कर मैंने मुंह फेर लिया।

बात तब की है जब मैं पांचवी कक्षा में पढ़ती थी। सर्दी के दिन थे। रोज की तरह मैं सड़क पर हमउम्र बच्चों के साथ खेल रही थी। खेलते-खेलते पानी की प्यास लगी तो दौड़कर घर आ गयी। बरामदे से गुजरते हुए पानी के टैंक के पास कुछ अजीब सा काला-काला नज़र आया। पास गयी तो देखा चिड़िया का एक नन्हा गुलाबी बच्चा जिसके पंख भी नहीं आये थे, ढेर सारी चींटियों से गिरा पड़ा था। शायद ऊपर रोशनदान में बने घोंसले से गिर गया था।

एक पल को मुझे लगा इतना ऊपर से गिरने और इतनी सारी चींटियों के चिपकने से यह तो मर चुका होगा और यह सोचकर मैं उदास हो गयी पर अगले ही पल उस चूजे की हल्की सी हलचल से मन में आशा की एक किरण जागी और मैंने किसी भी तरह उस बच्चे को बचाने के जतन करने शुरू कर दिए।

सबसे पहले फूंक मार-मारकर कई सारी चींटियों को उसके नाजुक गुलाबी शरीर से हटाया। पर इसके बाद भी कुछ चींटियाँ उस पर जस की तस चिपकी हुई थी। मैं भीतर दौड़कर रुई लेकर आई और रुई की मदद से उसके शरीर पर से बाकी चींटियाँ हटाने लगी। किसी चींटी को मारना नहीं था इसलिए लगभग ½ घंटे की मशक्कत के बाद मैं उसके शरीर पर से सारी चींटियाँ हटाने में कामयाब हो गयी। उसके बाद भीतर से दो गत्ते लायी और डरते-कांपते हाथों से उस चूजे को एक गत्ते की मदद से दूसरे गत्ते पर लिया और धीरे-धीरे चलते हुए उसे घर के भीतर ले आई।

उस चूजे की हालत बहुत ख़राब थी। वह एकदम दुबका हुआ था। शायद उसके दिमाग में अभी भी चींटियों का आतंक छाया होगा और उसे दर्द भी तो हो रहा होगा यही सोचते-सोचते मैंने उसे अपने कमरे की स्टडी टेबल पर एक रोयेदार नरम मोटा रुमाल बिछाकर उस पर रख दिया।

मैं रसोई में गयी और रुई का फाहा और एक कटोरी में दूध लेकर आई। डरते-कांपते हाथों से मैं दूध से भरा रुई का फाहा उस चूजे के मुंह के पास ले गयी। लेकिन वह तो डर के मारे टस से मस नहीं हो रहा था। हाथों की कंपकंपी की वजह से दूध कभी दायें गिरता कभी बाएं। कभी इत्तेफाकन उसकी चोंच पर गिरकर दोनों ओर लुढ़क जाता। पर उसने दूध पीने में रूचि नहीं दिखाई। थक हार कर थोड़ी देर मैं पास ही रखे पलंग पर बैठ गयी। फिर कुछ देर बाद रसोई से एक छोटा सा चम्मच लेकर आई और फिर उसे दूध पिलाने की कोशिश करने लगी। कई बार की नाकामयाबियों के बाद एक बार अचानक उसने इतना बड़ा मुंह खोला कि डर के मारे मेरे हाथों से दूध का चम्मच छिटक कर नीचे गिर गया। चम्मच की आवाज़ से कुछ देर वो भी सहम गया पर इसके बाद जब भी मैं दूध से भरा चम्मच उसके पास ले जाती वह धीरे-धीरे अपनी चोंच में भरकर दूध पीने लगता।

मेरे लिए तो यह खेल सा बन गया था। थोड़ी-थोड़ी देर में मैं कभी दूध, कभी पानी तो कभी पानी में आटा गोलकर उसे खिलाने को लाने लगी। अब उसे मुझसे कोई डर नहीं था। मुझे भी उसमें अपना दोस्त नज़र आने लगा और मैं प्यार से उसे चूंचूं कहकर बुलाने लगी। पूरे दिन उसी में लगे रहने के बाद रात में जब सोने के लिए माँ की डांट पड़ी, तब जाकर उसे स्टडी टेबल पर रखकर मैं सो गयी।

सुबह उठी तो सबसे पहले नज़र स्टडी टेबल पर पड़ी। वहां जगह-जगह चूंचूं की बीठ नज़र आ रही थी पर चूंचूं कहीं नहीं दिख रहा था। मैं घबरा कर उठ खड़ी हुई और टेबल के ऊपर-नीचे, दायें-बाएं सब जगह चूंचूं को तलाश करने लगी। तभी नज़र पास ही लगे दरवाजे के पीछे पड़ी जहाँ चूंचूं कोने में दुबका बैठा था। एक गत्ते में उठाकर मैं उसे बाहर खुले आँगन में ले आई। कुछ देर तक यह सोचकर वहां उसे रखा कि उसकी माँ उसे तलाश रही होगी और वहाँ आ जायेगी। पर काफी देर इंतजार के बाद भी कोई चिड़िया नज़र नहीं आई।

पापा तब बाहर थे। मैंने यही सोचा कि जब पापा वापस आयेंगे तो इसे घोंसले में रख देंगे ताकि यह अपनी माँ से भी मिल पायेगा और यह सोचते-सोचते मैं फिर उसे कुछ खिलाने-पिलाने के उपक्रम करने लगी। खिलाने-पिलाने के इस उपक्रम में अचानक चूंचूं पर कुछ दूध गिर गया। वह थोड़ा भीग गया। सर्दियों के दिन थे। खुद भी धूप खाने और चूंचूं को भी थोड़ी सुबह की गुनगुनी धूप खिलाने की सोचकर मैं उसे छत पर ले आई। छत पर मैंने उसे बीच में बनी एक दिवार पर रख दिया और खुद टहलने लगी।

कुछ देर बाद सामने से एक गिलहरी आते हुए नज़र आई। गिलहरी से चूंचूं को किसी भी ख़तरे से मैं अनभिज्ञ थी इसलिए मैंने गिलहरी को नहीं भगाया। पर यह क्या...पलक झपकते ही वह गिलहरी सर्र सी दौड़ती हुई चूंचूं के पास आई और उसे मुंह में दबाकर उसी तेजी से दौड़ गयी। मेरी आँखें और मुंह खुला का खुला रह गया। मैं तेज दौड़कर गिलहरी के पीछे गयी पर कुछ ही देर में वह जाने कहाँ गायब हो गयी। नीचे आकर पीछे गली में जिस ओर गिलहरी गयी थी मैंने चूंचूं को बहुत तलाशा पर चूंचूं मुझे कहीं भी नज़र नहीं आया। मेरा गला रुंध गया और आँखों में आंसू भर आये। मुझे खुद पर बहुत गुस्सा आ रहा था। बार-बार एक ही ख़याल दिमाग में आ रहा था कि काश! मैं चूंचूं को लेकर छत पर ना जाती। उस गिलहरी पर भी बहुत गुस्सा आया। पूरा दिन मैं बहुत उदास रही। अकेले अपने कमरे मैं बैठी रही। आँखें बार-बार कमरे में चूंचूं को तलाश रही थी। सुबह जो हुआ उस पर विश्वास नहीं हो रहा था। रात में सोते समय भी बार-बार नज़रे स्टडी टेबल पर जा रही थी, जिसे चूंचूं ने अपनी बीठ से कितना गन्दा कर दिया था। अचानक नज़र फिर दरवाजे के पीछे गयी, पर चूंचूं वहां नहीं था। मैंने करवट बदली और आँखों से आंसू लुढ़क पड़े।

आज उन नन्हें-मुन्हें गिलहरी के बच्चों को देख सालों पुरानी बात याद आ गयी। गिलहरी से सालों पुरानी उस नाराजगी की वजह से मुंह तो फेर लिया पर उनकी चूं-चूं की आवाज़ सुन ज्यादा देर उन्हें देखे बिना नहीं रह पायी। सोचा, क्या पता इन्हीं में से कोई चूंचूं हो जो आज फिर मुझसे मिलने आया हो और इस तरह सालों बाद आज फिर मेरी गिलहरी से दोस्ती हो गयी।

Monika Jain ‘पंछी’
(21/09/2012)

September 14, 2012

हिंदी दिवस पर कविता


(1)

जन-जन तक हिंदी पहुँचा दूँ

कल रात हिंदी को 
मैंने सपने में देखा 
उसके मुखमंडल पर छायी थी 
गहरी उदासी की रेखा। 

मैंने पूछा हिंदी से - 
इतनी गुमसुम हो कैसे?
अब तो हिंदी दिवस है आना
सम्मान तुम्हे सब से है पाना। 

हिंदी बोली यही गिला है
वर्ष का इक दिन मुझे मिला है
अपने देश में मैं हूँ परायी
ऐसा मान न चाहूँ भाई। 

मेरे बच्चे मुझे न जाने
लोहा अंग्रेजी का माने
सीखे लोग यहाँ जापानी
पर मैं हूँ बिल्कुल अनजानी। 

हिंदी की ये बात सुनी जब
ग्लानि से भर उठी मैं तब
सोचा माँ की पीर बटा दूँ
जन-जन तक हिंदी पहुँचा दूँ। 

मोनिका जैन 'पंछी'
(09/2012)

(2)

हिंदी है उत्थान की भाषा 

शब्दों, वर्णों और छंदों की 
हिंदी है अनंत धरोहर 
है असीम इसकी प्रस्तुति 
अनुपम है इसका हर स्वर। 

हिंदी बहता नीर है 
धीर, वीर, गंभीर है 
नहीं है यह मात्र एक भाषा 
हिंदी है जन-जन की आशा।

भाषा नहीं भावना है यह 
अभिव्यक्ति का है आसमान 
परिवर्तन की चिर शक्ति इसमें 
यह है देश का स्वाभिमान। 

स्वतंत्रता आन्दोलन में उभरी 
बन हिंदी एक सशक्त हथियार 
राष्ट्रीय एकता और क्रांति की 
थी यह अनोखी सूत्रधार।

हिंदी है विज्ञान की भाषा 
कला और ज्ञान की भाषा 
जन-जन के उत्थान की भाषा 
गौरव और सम्मान की भाषा। 

मोनिका जैन 'पंछी'
(14/07/2013)

19/03/2018 - नोट : पुरानी कवितायेँ हैं। थोड़ी अतिश्योक्ति है। निश्चित रूप से हिंदी एक समृद्ध भाषा है, लेकिन जबरन उसे पूरे राष्ट्र पर थोपा नहीं जाना चाहिए। न ही किसी अन्य भाषा की प्रतिद्वंदी के रूप में इसे उभारना चाहिए। सभी भाषाएँ अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं। हाँ, हम हिंदी से प्रेम करते हैं, उसे बचाना चाहते हैं तो उसके प्रसार में, उसे और अधिक समृद्ध करने में, ज्ञान-विज्ञान के सभी क्षेत्रों का साहित्य और सूचना हिंदी भाषा में उपलब्ध करवाने में हमें प्रयासरत रहना चाहिए। 

September 4, 2012

Poem on Parents (Home, Family) in Hindi


(1)

अपना घर है सबसे प्यारा

घर से निकली पंख पसार
देख लिया सारा संसार
उत्तर, दक्षिण, पूरब, पश्चिम
कर आई चहुँ ओर भ्रमण।

सुन्दर था जग का हर कोना
फिर भी मुझको पड़ा लौटना
सुन्दरता जग की ना भायी
घर की मुझको याद सतायी।

नैना मेरे थे बेचैन
घर लौटी तब आया चैन
माना मेरे दिल ने यारा
अपना घर है सबसे प्यारा।

Monika Jain 'पंछी'
(22/01/2013)


(2)

मेरा आसमां 

घर मेरा एक बरगद है
मेरे पापा जिसकी जड़ हैं 
घनी छाँव है मेरी माँ
यही है मेरा आसमां। 

पापा का है प्यार अनोखा
जैसे शीतल हवा का झोंका
माँ की ममता सबसे प्यारी
सबसे सुन्दर, सबसे न्यारी।

हाथ पकड़ चलना सिखलाते
पापा हमको खूब घुमाते
माँ मलहम बनकर लग जाती
जब भी हमको चोट सताती। 

माँ पापा बिन दुनिया सूनी
जैसे तपती आग की धूनी
माँ ममता की धारा है
पिता जीने का सहारा है। 

Monika Jain 'पंछी' 
(09/2012)

September 3, 2012

Breakup (Separation) Poem in Hindi


(1)

क्यों बदल गयी ये कहानी? 

एक दौर था जब
हर बात मेरी
तारीफ़ तेरी पा जाती थी
एक दौर था जब…

फूलों से भी ज़्यादा मेरी
ख़ुशबू तुझको भाती थी
कोयल से भी ज्यादा मीठी
मेरी बोली तुझे लुभाती थी
एक दौर था जब…

मोती बिखर पड़े हों जैसे
मेरी हंसी तुझे यूँ रिझाती थी
जैसे चंदा ने बरसाई चांदी
मुस्कान मेरी यूँ लुभाती थी
एक दौर था जब...

आँखों में मेरी एक गहरा सा
तुझे सागर नज़र जो आता था
घंटो देखा करता मुझको
और मुझमे डूब जाता था
एक दौर था जब…

तेरी ग़लती पर मेरा गुस्साना 
तेरा हँसना और मनाना था
मेरी चुप्पी, मेरा गाना
हर बात का तू ही दीवाना था
एक दौर था जब…

क्यों बदल गया है दौर वो अब?
क्यों बदल गया है पानी?
क्यों बदल गया है तू बिल्कुल?
क्यों बदल गयी ये रवानी?

तेरा ख़्वाब हुआ करती थी मैं
क्यों वहां रही न ये दीवानी?
कुछ भी न रहा पहले जैसा
क्यों बदल गयी ये कहानी?
क्यों बदल गयी ये कहानी?

Monika Jain 'पंछी'
(01/06/2012)

(2)

सूखा गुलाब 

डायरी के पन्नों में रखा वह गुलाब
सूख गया है हमारे रिश्ते की तरह
पर उसमे से आती भीनी ख़ुशबू
आज भी ज़िन्दा है तेरी यादों की तरह। 

ख़ामोश ही रोई, ख़ामोश ही चिल्लाई 
नामंजूर थी मुझे तेरी जुदाई 
हर पल तड़पाती रही मुझे तनहाई
पर कम्बख़्त मौत फिर भी न आई। 

धीरे-धीरे कोशिश की जीने की 
तेरी याद में आया हर आँसू
बिना बहाये पीने की
मनाया दिल को
प्यार सभी का ना पूरा होता है
इसका तो पहला अक्षर ही अधूरा होता है। 

नहीं बहते अश्क अब मेरी आँखों से
जीवन नहीं रुकता
रह-रह कर याद आती तेरी यादों से
रोना भूलने का एक बड़ा दाम जो चुकाया है
मुस्कान को भी सदा के लिए
मेरे होंठों ने भुलाया है। 

आज जब देखा उस सूखे गुलाब को
धीरे-धीरे दम तोड़ते, मेरे हर ख़्वाब को 
आँसू का एक मोती, जाने कहाँ से बह आया
शायद बरसों के इंतज़ार में बहने से रुक ना पाया। 

Monika Jain 'पंछी' 
(09/2012)

09/12/2017 - Note : These are my old writings and leading to spirituality, today I am not concerned with such writings. As spiritualism is a journey from expectations to acceptance, from complaints to responsibility, from dependence to independence, from innocence to flawlessness and from ignorance to awakening. No matter, whoever is in front of us, whatever wrong he did with us, how difficult our situations are, in spiritualism there is no other.

September 2, 2012

Poem on Education System in Hindi


हम हैं पढ़े लिखे अनपढ़

हम पढ़े लिखे सभ्य
अपनी एसी गाड़ियों में चलते हुए
फेंकते हैं कूड़ा-करकट सड़कों पर
मानो फेंक रहे हैं 
अपनी नकली सभ्यता का 
मुखौटा उतार कर। 

हम पढ़े लिखे साक्षर
'यहाँ थूकना मना है' पढ़कर भी
सालों से वहीँ थूकते आ रहे हैं
मानो थूक रहे हैं
अपने साक्षर होने के 
प्रमाण पत्र पर। 

हम पढ़े लिखे शिक्षित
डॉक्टर, इंजीनियर, सीए बनकर
बिकते हैं दहेज के बाजार में ऊँचे दामों पर
हम तो उनसे भी आगे हैं जो
बेचती हैं अपने शरीर को
रोटी के दो टुकड़ों की चाह में। 

क्या सच में हैं हम सभ्य?
क्या सच में हैं हम शिक्षित?
क्या सच में हैं हम साक्षर?

नहीं, हम हैं पढ़े लिखे अनपढ़। 
हाँ, हम हैं पढ़े लिखे अनपढ़। 

Monika Jain 'पंछी'
(09/2012) 

Lack of proper education is the reason of all sorts of evils in our country. Learning should be closely linked to nature and life. But the modern education system is confined to classrooms only, so the link with nature is broken. Education should develop a spirit of rational thinking among people but today's education just help the students to acquire degrees and jobs. Current education system is not able to teach moral values, ethics and humanity. Teaching moral values is very necessary for the overall development of a person. It includes discipline, manners, control over oneself, love, care, sensitivity, politeness, speaking truth, no stealing, being a good citizen etc. To make the children responsible citizens, moral values should be imparted through education. Only then we can fulfill the dream of making India incredible. 

September 1, 2012

Poem on Parents in English

Parents the Unsung Heroes

My house is a banyan tree
My father is the root of this
My mother is the dense shade
It remains till my last breath
It’s my only wish.

Father’s love is unique
Soft as the breeze
Mother’s love is sweetest
Distinct and prettiest.

Mom and Dad
You are the unsung heroes of my life
When I am in dark
You are always there to show me light.

You encourage me
When I am crashing in
You always turn to me
to forgive all my sins.

To fight with my fears
When I am lonely with my tears
To care when I am ill
You are always there
to fulfill my wills.

You both are the reason
Why I’m so strong
With your blessings
Nothing could go wrong.

You are irreplaceable
Your love will never pale
I know, no one can love me
more than you mom and dad
So I need forever
again and again your lovely shade.

Thank you for giving birth to me
Thank you for coloring the rainbow of my life
Thank you for putting the rhythm in my soul
Thank you for standing always by my side.

Monika Jain ‘Panchhi’
(09/2012)

05/03/2018 - Note : These poems are from a kid point of view. As we grow we come to know that our parents are a normal human beings with their good and bad. Expecting idealism from them is not right. Better we improve ourselves for the better tomorrow.