December 26, 2013

Essay on Violence against Women in Hindi

नारी कैसे बच पाएगी?

08/01/2013 - उस देश में नारी कैसे बच पाएगी जहाँ जन्म लेने से पहले ही उसे कोख में इसलिए मार दिया जाता है क्योंकि वह एक लड़की है और ये न हो पाया तो उसे कचरे के ढेर में फेंक दिया जाता है। जहाँ विवाह के बाद भी उसे इसलिए जला दिया जाता है क्योंकि वह दहेज लोभियों की भूख शांत नहीं कर पाती।

उस देश में नारी स्वतंत्रता की बातें बेमानी है जहाँ सड़क पर कई गिद्ध उस पर दृष्टि जमाए हुए हैं और मौका मिलते ही उसे नोच खाते हैं। जहाँ राजनेता कहते हैं कि जब मर्यादा का उल्लंघन होता है तो सीता हरण होता है। कोई मुझे ये बताए कि सीता जी ने अपने जीवन में कौनसी मर्यादा का उल्लंघन किया? 

उस देश में न्याय की आशा करना बेकार है जहाँ की पुलिस न्याय की गुहार लगाने वाले पीड़ित को इतनी मानसिक प्रताड़ना देती है कि वह अपने साथ हुए अन्याय को नियति मानकर चुपचाप स्वीकार कर लेता है। जहाँ साधु बने बहरूपिये दोषियों को माफ़ करने और पीड़िता को दोषी कहने का साहस रखते हैं। ताली एक हाथ से नहीं बजती ये कहने वाले आसाराम जी के कहने का तो यही तात्पर्य है कि लड़की खुद जाती है बलात्कारियों के पास और कहती है, 'मेरा बलात्कार करो'!

जिस देश में शीर्ष पर बैठे लोग इतने संवेदना शून्य हो और उनकी मानसिकता इतनी संकीर्ण और कलुषित हो चुकी हो कि वे अपराध का ख़ात्मा कैसे हो ये सोचने की बजाय मुद्दे को लड़की के कपड़ों की साइज़ में उलझा देते हो या क्षेत्रवाद की राजनीति चमकाने लगते हो ऐसे देश में नारी नहीं बच सकती...बिल्कुल भी नहीं। 

07/12/2013 - हमारे घर पर जो काम वाली दीदी आती हैं, वह अपने साथ अपनी 2-3 साल की बेटी को भी लाती हैं। बहुत प्यारी दिखती है। 'सपना' नाम है उसका। बच्चे मुझे हमेशा से आकर्षित करते हैं। उससे बात करने और दोस्ती करने की कोशिश की पर बात करना तो दूर वह तो पास भी नहीं आती और डर से दूसरी ओर देखने लगती है। मेरे जीवन की यह पहली घटना है जब किसी बच्चे ने लगातार इस तरह का बर्ताव किया हो, क्योंकि बच्चे कैसे भी हो मुझसे बहुत जल्दी घुलमिल जाते हैं और मेरे बहुत अच्छे दोस्त भी बन जाते हैं। इसलिए थोड़ा बुरा महसूस होना स्वाभाविक था। उसकी मम्मी से बातों ही बातों में पता चला कि एक दिन उसके पिता ने उसे बहुत बेरहमी से पीटा था। तब से ही वह सबसे डरती है और किसी के पास नहीं जाती। कारण पूछने पर बताया उसका लड़का ना होकर लड़की के रूप में पैदा होना। लड़के-लड़की की समानता को लेकर बहुत से लेक्चर पहले हो चुके हैं। निष्कर्ष यह है कि कुछ लोगों की सोच कभी नहीं बदलती। ऐसे में खुद को बहुत असहाय महसूस करती हूँ। खैर! अच्छी बात यह है कि दूर से ही सही पर कुछ दिनों से 'सपना' मुझे देखकर हल्का-हल्का सा मुस्कुराने लगी है। :)

26/12/2013 - आज मैं खुश नहीं हूँ। वह औरत जो भयंकर सर्दी में भी अपनी दो-तीन साल की बेटी को साथ में लेकर घर-घर काम करती है, जिसके चेहरे पर मैंने कभी शिकन या थकावट नहीं देखी, हमेशा हँसता मुस्कुराता चेहरा...आज सुबह अचानक आई और बोली - मैं गाँव जा रही हूँ। मम्मी से कहो जितने दिन के भी पैसे बने हैं वे दे दें।

मैंने पूछा वापस कब आओगे? अपनी भीगी हुई आँखों को चुराती हुई बोली - एक-दो महीने बाद। मैं समझ गयी कुछ गलत हुआ है। पति ने शाम को उसे और उसकी बच्ची को बहुत पीटा था, इसलिए वह पीहर जा रही थी कभी वापस न आने की सोचकर।

पति ठीक-ठाक कमा लेता है पर एक अँधेरी कोठरी किराये पर ले रखी है जिसमें वह खाने-पीने के जरुरी सामान के अलावा और कुछ नहीं लाता। बेटी जिसे देखते ही किसी का भी प्यार उमड़ आये उसके लिए भी कुछ नहीं। शायद बाहरी औरतों से सम्बन्ध हैं उसके और आये दिन बेटी को भी पीटता रहता है।

अपने थोड़े से पैसों की कमाई से कुछ दिन पहले ही वह अपनी उस छोटी सी कोठरी को सजाने के लिए स्टील के बर्तन खरीद कर लायी थी। कितनी खुश थी उस दिन। लेकिन आज पहली बार उसकी भीगी हुई आँखें देखी। उसके चेहरे की चमक आज नदारद थी, जिसकी जगह मानों सालों की थकावट ने ले ली हो। उस स्वाभिमानी औरत के फैसले का सम्मान करती हूँ, पर कबसे उसकी वो भीगी हुई आँखें मेरे दिल और दिमाग में छाई हुई है। मन बहुत बेचैन है। 

Monika Jain ‘पंछी’

December 11, 2013

Women (Women's Day) Quotes in Hindi

Women Quotes

  • 05/01/2017 - मनुष्य जीवन की सार्थकता इसी में है कि हम मनुष्य होने के भाव से ऊपर उठ सकें। उससे पहले स्त्री स्त्री होने के भाव से और पुरुष पुरुष होने के भाव से...लेकिन यहाँ तो अभी तक कपड़ा पुराण ही चल रहा है।  
  • 30/11/2016 - बात आज की नहीं है, सदियों से यही हो रहा है। स्त्री का मुंह बंद करवाना हो, उससे बदला लेना हो, उसके प्रति अपनी नफ़रत उगलनी हो...तथाकथित पुरुषों के पास कुछ गिने-चुने तरीके होते हैं : उसका बलात्कार कर दो, उसे बदनाम करने की धमकी दे दो या उसके चरित्र की बखिया उधेड़ डालो। लेकिन प्यारे तथाकथित पुरुषों! Who the hell you are to define our character? तुम्हारा दिया चरित्र प्रमाण पत्र अपने पास रखो और कागज़ पर बनाया हो तो रद्दी में बेचकर थोड़े छुट्टे इकट्ठे कर लो। इससे ज्यादा तो कोई कीमत नहीं ही है उसकी। 
  • 09/03/2015 - आज कुछ लड़कियों ने कुछ लड़कों की लगातार घूरने और पीछा करने की वही परंपरागत समस्या शेयर की। पेरेंट्स को इसलिए नहीं बता सकती क्योंकि पेरेंट्स को बतायेंगी तो घर से निकलना बंद या कम करवा देंगे। उन्हें जो समाधान सुझाना था वह तो सुझा दिया, पर कब से यही सोच रही हूँ कि ये घूरने वाले लड़कों की दुर्बुद्धि तो समझ आती है, पर ये उल्टी गंगा बहाकर ऐसे असामाजिक तत्वों को बढ़ावा देने वाले पेरेंट्स की समझ समझ नहीं आती। चिंता और सतर्कता जायज है लेकिन लड़कियों के घूमने पर पाबंदी तो समाधान नहीं। 
  • 07/03/2015 - अच्छी-खासी, भोली-भाली, गंभीर-मासूम टाइप पोस्ट पे थर्ड ग्रेड शायरी चिपकाकर इश्क फरमाने वालों! भगवान करे तुम्हें कोई ऐसा मिले जो सुबह से शाम, शाम से रात और फिर रात से सुबह तक इतनी शायरी सुनाये, इतनी शायरी सुनाये कि तुम ये जगह-जगह शायरी चिपकाना जन्मजन्मान्तरों तक भूल जाओ। 
  • 30/11/2014 - अभी किसी का कमेंट देखा 'अब लड़कियां हमें धर्म सिखाएंगी? ' अब उस महाशय को कौन बताये कि खाने का पहला निवाला गले में उतारना भी उसे किसी लड़की ने ही सिखाया था। बल्कि नौ महीने उसका भार वहन कर इस दुनिया को देखने का मौका भी उसे किसी लड़की ने ही दिया था। पुरुष के योगदान को नकार नहीं रही। पर ऐसी सोच का क्या किया जाए? 
  • 01/06/2014 - अक्सर यह पोस्ट पढ़ने को मिलती है कि लड़कियों की तो hi, hello, hru पर भी 100-200 लाइक्स आ जाते हैं। कौन होती हैं ये लड़कियां? हमने तो नहीं देखी कभी। और होती भी है तो ये लाइक करने वाले कौन होते हैं? लड़को को ये क्यूँ लगता है कि लड़कियों को सब यूँ ही आसानी से मिल जाता हैं? एक बार पेज पर 8000+ लाइक्स देखकर एक लड़का बोला कि तुम लड़की हो इसलिए तुम्हारे इतने सारे फॉलोअर्स हैं। सच में? अरे भाई! तुम बस यही क्यों देखते हो कि लड़की है। मेहनत और गुण नहीं दिखाई देते तुम्हें? मैंने तो हमेशा यही महसूस किया है कि लड़की होना बहुत मुश्किल होता है। अगर आप अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करते तो आपके लिए रास्ते बहुत मुश्किल होते हैं, बहुत ज्यादा। मेरी कभी यह तमन्ना तो नहीं रही कि काश! मैं लड़का होती, पर हाँ मैं इतना अच्छे से जानती हूँ कि अगर मैं लड़का होती तो मेरी ज़िन्दगी अभी जो है उससे बहुत आसान होती, बहुत ज्यादा आसान। 
  • 02/06/2014 - कमाल है! क्या ये भी कोई रूल होता है कि लड़की लड़कों को फ्रेंड रिक्वेस्ट नहीं भेज सकती? मुझे तो जिनका भी लेखन प्रभावित करता है...मैं चाहे उन्हें जानती हूँ...चाहे नहीं जानती हूँ..ऐड कर लेती हूँ। ये तो कभी सोचती ही नहीं कि वो लड़का है या लड़की, और ये भी नहीं सोचती कि मैं लड़की हूँ। 
  • 31/05/2014 - किसी के पति का किसी और महिला से अफेयर है तो खुद पत्नी द्वारा भी सबसे पहले दोष उस दूसरी महिला को दिया जाएगा। उसे डायन, कुल्टा और न जाने क्या-क्या कहा जाएगा। वह महिला बेशक गलत है, पर सबसे पहला अपराधी तो यहाँ पर खुद उसका पति है। इसी तरह जब शादी करके ससुराल में आई कोई लड़की अगर माँ-बेटे के रिश्तों में फूट डालने का काम करती है और इसमें कामयाब भी हो जाती है, तो यहाँ माँ द्वारा सारा दोष बहु को दिया जाता है, पर यहाँ भी बेटे की गलती ज्यादा है। मेरा मानना है कि अगर अपना ही सिक्का खोटा हो तो दूसरे को दोष देना व्यर्थ है...और अगर हम खुद बुराई को पोषित करने में भागीदार हैं तो हमें हक़ नहीं बुराइयों के खिलाफ़ आवाज़ उठाने का। 
  • 11/12/2013 - कई लोग कहते हैं, आजकल लड़कियां भी कम नहीं है। सहमत हूँ...कम नहीं है, पर हर अपराध में लड़कों का प्रतिशत लड़कियों से कई गुना ज्यादा है...बहुत ज्यादा। कल ही अख़बार में एक खबर पढ़ी कि एक लड़की की सहेली के भाई ने उसकी शादी वाले दिन जब वह तैयार होने के लिए पार्लर के यहाँ गयी उस पर एसिड फेंक दिया...कारण उसका उस लड़के के शादी के प्रपोजल को एक्सेप्ट न करना। ऐसी न जाने कितनी ख़बरों से अखबार भरे पड़े हैं। मार-पीट, बलात्कार, हत्या, एसिड अटैक, इस्तेमाल करके छोड़ देना, छेड़छाड़, फब्तियां कसना और न जाने कितनी तरह से महिलाओं का उत्पीड़न मामूली सी बातें है, जिन्हें लड़कों ने अपना एकाधिकार क्षेत्र समझ रखा है। 99 % ऐसे मामले लड़कों के नाम पर है, और अगर कोई इक्की-दुक्की लड़की भी ऐसा कुछ कर देती है तो लड़कों का ईगो हर्ट हो जाता है, उनके एकाधिकार का हनन हो जाता है। इसलिए सब चिल्लाने लगते हैं कि लड़कियां भी कम नहीं है। अगर लड़कियां भी ऐसा करती हैं तो वे बिल्कुल अपराधी हैं, सजा की हकदार हैं। सब लड़के एक से नहीं होते ये भी मानती हूँ, पर कुछ भी कहने से पहले आंकड़ों पर एक नज़र जरुर डालिए। 
  • आज जब महिला पुरुष समान अधिकारों की बात हो रही है। ऐसे मैं न केवल लड़के और लड़कियों को समान रूप से आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए तैयार करने की जरुरत है, बल्कि उन्हें घर और बाहर की जिम्मेदारियों के प्रति भी समान रूप से तैयार करना जरुरी है। 

Monika Jain ‘पंछी’

December 1, 2013

World HIV Aids Awareness Day Poem in English


Why this Cruelty?

A little girl was playing alone in a garden
I went to her attracted by her innocence
But she was scared with my presence. 

I caressed her head with affection 
But she got up suddenly and ran away in fear 
'Children are moody' 
considering this I returned from there.

From a group of kids playing in the garden 
a child came to me 
Pointing towards that little girl 
he told me - 

Sister! never touch that girl 
She is suffering from aids 
Playing with that girl is not
permitted by our parents.

After saying this 
that child ran to play again 
But his statement left 
so many questions in my brain.

Who made no mistake 
Why this cruelty with that innocent?
and Why this narrow mindedness of society 
to this extent?

Monika Jain 'Panchhi'
(01/12/2013) 

The above poem shows the ignorance and narrow mentality of our society, where HIV positive people are seen by hatred and they are neglected, abandoned and ignored. It’s a foolish behavior. As HIV is not transmitted by casual contacts like touching, holding and shaking hands, hugging, kissing, working and playing together, coughing, sneezing, spitting, sharing food, clothes, toilets etc. 

HIV is transmitted through unprotected sex with an infected partner, from an infected mom to her unborn child, from transfusion of HIV infected blood and blood products and from infected needles and syringes.

Aids infected people need more care and affection. So we should treat them friendly and We should bring them in the mainstream of our society so that they never feel isolated and ignored and can bravely fight with this disease.

World Aids Awareness Day Story in Hindi

अंधेरों में गुम न हो रोशनी

कुछ महीनों पहले ही इस नए शहर में शिफ्ट किया है। घर के पास ही बच्चों का एक पार्क है। शाम होते ही खेलते हुए बच्चों का शोर चिड़ियों की चहचहाहट की तरह हवा में घुल जाता है। बच्चों को इस तरह खिलखिलाकर खेलते हुए देखना मुझे बहुत सुकून देता है। अक्सर जब काम करते-करते थक जाती हूँ तो पार्क की ओर अपना रुख कर लेती हूँ। कभी बच्चों से बातें, कभी उनके साथ खेलना, कभी यूँ ही उन्हें बैठे-बैठे निहारना और अपने बचपन में खो जाना मुझमें एक नयी ही ऊर्जा भर देता है।

पर कल शाम पार्क से लौटने के बाद मन बहुत बेचैन था। तरह-तरह के सवाल मन में उठ रहे थे और बार-बार उस मासूम बच्ची का चेहरा मेरे दिल और दिमाग में उभर रहा था। करीब 7-8 साल की होगी वो। पहली बार ही उसे पार्क में देखा था।

काम करने में मन नहीं लग रहा था सो मेरे कदम पार्क की ओर बढ़ गए। पार्क में सारे बच्चे ग्रुप्स बनाकर खेल रहे थे। कोई पकड़म-पकड़ाई, कोई रुमाल झपट्टा तो कोई आँख मिचौनी। कुछ बच्चे पार्क के झूलों में झूल रहे थे, कुछ फिसल पट्टी पर फिसल रहे थे। सब अपने में मग्न थे। मैं भी उन्हें देखते-देखते टहल रही थी, तभी सहसा पार्क के एक कोने में नज़र पड़ी जहाँ एक प्यारी सी बच्ची अकेले ही मिट्टी से खेल रही थी।

उसके बार-बार आँखों पर गिरते बाल, मिट्टी से सने हाथों से उन्हें हटाने की कोशिश, बीच-बीच में खेलते हुए बच्चों को बड़ी उम्मीद भरी नजरों से देखते हुए मुस्कुरा जाना और फिर उदास होकर मिट्टी के घरौंदे बनाने में लग जाना, यह सब मुझे उसकी ओर खींच रहा था। ऐसा महसूस हुआ जैसे वह बच्चों के साथ खेलना चाह रही है पर कुछ सहमी हुई सी है।

मुझे लगा नयी बच्ची होगी, सबके साथ घुलने-मिलने में शर्मा रही होगी सो उससे दोस्ती करने और सबसे उसकी दोस्ती करवाने की सोचकर मैंने उसकी ओर रुख किया। मुझे अपनी और आता देखकर उसने खेलना एकदम से बंद कर दिया और सहमी हुई नज़रों से मुझे देखने लगी। मैंने उसके पास बैठकर ज्यों ही उसके सर पर प्यार से हाथ फेरा। वह एक दम हड़बड़ाहट में उठ खड़ी हुई। उसके हाथों की मिट्टी चारों ओर बिखर गयी। मैं कुछ बोलती इससे पहले ही वह डरते हुए वहां से तेजी से दौड़ कर भाग गयी।

‘बच्चे मूडी होते हैं। अजनबी हूँ सो घबरा गयी होगी।’, यह सोचते हुए मैं वापस अपनी जगह पर आ गयी। पर ना जाने क्यूँ उसके बारे में जानने की जिज्ञासा में मैंने एक बच्चे को आवाज़ दी और अपने पास बुलाया। पार्क के कई बच्चों से दोस्ती हो गयी थी। बच्चा बुलाते ही दौड़ा-दौड़ा चला आया।

‘अभी थोड़ी देर पहले वह छोटी सी लड़की जो उस कोने में खेल रही थी, क्या तुम उसे जानते हो? मैंने उसे पहले कभी यहाँ देखा नहीं, क्या वह यहाँ नयी है? तुम लोग उसे अपने साथ क्यूँ नहीं खिला रहे थे और वह इतना डर क्यों रही थी?’ एक ही सांस में न जाने कितने सवाल पूछ डाले मैंने।

बच्चा थोड़ा सकपकाया हुआ बोला, ‘ रोssशनी, क्या आप रोशनी के बारे में पूछ रहे हो दीदी? वह जो मिट्टी में खेल रही थी? मैंने सहमति में सर हिला दिया और कहा, ‘हाँ! मैं उसके पास भी गयी पर वह भाग कर चली गयी।’

बच्चा घबराया हुआ सा बोला, ‘दीदी! आपको उसके पास नहीं जाना चाहिए था। मम्मी कहती है, उसे कोई भयंकर बीमारी है। हम उसके साथ खेलेंगे तो वह हमें भी बीमार कर देगी, इसलिए हममें से कोई भी उसके पास नहीं जाता। कल भी वह हमारे ग्रुप के पास आ गयी थी तो हमने उसे भगा दिया। आप भी उसके पास मत जाया करो।’ यह कहकर बच्चा तो दौड़ कर चला गया और अपने ग्रुप में शामिल होकर फिर से खेलने लगा पर मेरे दिल और दिमाग में न जाने कितने सवाल छोड़ गया।

मैं एकदम निश्चेत सी बैठे कभी उस ग्रुप को तो कभी उस कोने को देखती रही जहाँ अब रोशनी की जगह बस अँधेरा ही अँधेरा नज़र आ रहा था।

मैंने आसपास के लोगों से मालूम किया तो पता चला उसके मम्मी, पापा और उसे एड्स है। सब लोग उसके परिवार से दूर रहते हैं। यहाँ तक कि उन पर कॉलोनी को खाली करने का दबाव भी बनाया जा रहा है।

मेरे मन में बहुत से सवाल उठे, ‘इतनी सी बच्ची जो बिल्कुल निर्दोष है उसे इतनी भयानक बीमारी? ऊपर से इस तथाकथित पढ़े लिखे समाज की अज्ञानता और संकीर्णता से भरी यह मानसिकता जो पीढ़ी दर पीढ़ी थोपी जा रही है। आखिर क्यों?’

मैंने तुरंत निश्चय किया कि उस परिवार की मदद करुँगी और एड्स को लेकर जो भी भ्रम और भ्रांतियां लोगों के दिमाग में हैं, उसे दूर करुँगी। उन्हें बताऊँगी कि एड्स छूने से नहीं होता। साथ-साथ उठने-बैठने, खाना खाने, एक दूसरे के कपड़े इस्तेमाल करने से भी एड्स नहीं फैलता। बल्कि एड्स के मरीज के प्रति नम्र व्यवहार जरुरी है ताकि उसकी हिम्मत और हौंसला बना रहे और वह भी एक आम जीवन जी सके। रोशनी की किरणें उसके जीवन में सदा बिखरी रहे और कभी अँधेरा न हो।

Monika Jain ‘पंछी’
(01/12/2013)

World Aids Day is held on the 1st december every year. Let we unite to fight against aids and show our support towards people suffering from aids.

November 29, 2013

Moral Story of a Mischievous Rat in Hindi

डालू चूहे का नया जन्म
(नन्हें सम्राट में प्रकाशित)

डालू चूहा बड़ा ही शैतान था। दूसरों को परेशान करने में उसे बड़ा मजा आता था। अपने चमकीले, सफ़ेद, पैने दांतों पर उसे बड़ा घमंड था। अपने नुकीले दांतों से वह कभी किसी के कपड़े कुतर आता तो कभी खाने-पीने की चीजों की बर्बादी कर देता। चंपक वन में किसी के भी घर में कोई भी नया सामान आता और डालू को उसकी ख़बर लग जाती तो वह पहुँच जाता अपनी शरारत करने। शातिर इतना था कि कभी किसी के भी पकड़ में नहीं आता और बस हीही करके दौड़ जाता।

चंपक वन के सभी जानवर डालू चूहे की हरकतों से बहुत परेशान थे। डालू के माता-पिता भी रोज-रोज के उलाहनों से तंग आ चुके थे। वे डालू को कभी प्यार से समझाते और कभी डांटते पर उस पर किसी भी बात का कोई असर नहीं पड़ता। एक छोटे से चूहे ने सबकी नाक में दम कर रखा था।

शाम को चौपाल पर चर्चा चल रही थी। डालू की बात आई तो गोलू खरगोश बोला, ‘अभी कुछ ही दिन पहले डालू छुपके से मेरे कपड़ों की दूकान में आया और हजारों का नुकसान करके चला गया।’

हीरू हिरण ने कहा, ‘आज मैं अपने खेत में सिंचाई कर रहा था तब ना जाने कब डालू ने नली को बीच में से काट दिया और बहुत सारा पानी बेकार चला गया। मैं उसके पीछे दौड़ा पर हँसते-हँसते जाने कहाँ ओझल हो गया।’
‘मेरी मिठाई की दूकान में तो वह कभी भी आ धमकता है और बहुत सारी मिठाई खाकर और बर्बाद करके चला जाता है। उसे पकड़ने के लिए पिंजरा भी रखा पर शैतान कभी भी पकड़ नहीं आता।’ मोलू कछुएं ने गुस्से में कहा।

सबकी बातें सुनकर भोलू भालू परेशान हो गया। कुछ ही दिन बाद उसकी बेटी की शादी थी। पिछली बार मोंटी बन्दर की शादी में उसने सारे नए-नए कपड़े कुतर डाले थे। इस बार वह कोई गड़बड़ ना कर दे यही सोचकर भोलू भालू चिंता में पड़ गया।

गिन्नी लोमड़ी भोलू भालू की चिंता को भांप गयी। वह बोली, ‘काका ! आप परेशान ना हों। हम मिलकर जल्द ही इस समस्या का कोई हल निकाल लेंगे। डालू के माता-पिता का हम सुंदरवन के निवासियों पर बहुत अहसान है। कई बार वे शहर से आये शिकारियों के जाल को काटकर हमें मुक्त कराते हैं। इसलिए हम डालू के खिलाफ कोई सख्त कदम उठाकर या उसे कड़ी सजा देकर उन्हें दुखी नहीं कर सकते पर डालू को सबक सिखाना बहुत जरुरी है और इसके लिए मैंने कुछ सोचा है।’

गिन्नी ने सभी को अपनी योजना बताई। सभी ने उसकी योजना से सहमति जताई। डालू के माता-पिता को भी इस बारे में बता दिया गया।

योजना के अनुसार दो दिन के बाद गज्जू हाथी के जन्मदिन का उत्सव मनाया जाना था। जिसके लिए एक बहुत बड़ा आकर्षक और सुन्दर केक बनाया गया। इस केक को बनाने में गोंद जैसे एक चिपकाने वाले पदार्थ का उपयोग किया गया। सभी को पता था जैसे ही डालू को खबर मिलेगी कि चंपक वन में अब तक का सबसे बड़ा और स्वादिष्ट केक बनाया जा रहा है तो वह खुद को रोक नहीं पायेगा और केक को खाने और ख़राब करने जरुर आएगा।

डालू को जब केक के बारे में पता चला तो वह पार्टी शुरू होने के कुछ देर पहले ही आयोजन स्थल पर पहुँच गया। इतना बड़ा और सुन्दर केक देखकर उसका मन ललचा गया और खुराफात भी सूझने लगी। वह केक काटने से पहले ही छुपके से केक पर चढ़ गया और उसे खाने लगा। जैसे ही उसने केक खाना शुरू किया तो कभी उसके हाथ तो कभी उसके पाँव केक में चिपकने लगे। वह एक पाँव छुड़ाता तो दूसरा चिपक जाता और दूसरा छुड़ाता तो पहला। यहाँ तक कि उसके दांत भी आपस में चिपकने लगे जिसकी वजह से वह मदद के लिए चिल्ला भी नहीं पा रहा था।

धीरे-धीरे सभी मेहमान आने लगे। डालू बस धीमी सी आवाज़ में चींचीं कर पा रहा था, पर जान बूझकर कोई भी उस ओर ध्यान नहीं दे रहा था। सभी आपस में बातचीत करने में व्यस्त थे। एक ओर भूख-प्यास और दूसरी ओर केक से बाहर ना निकल पाने के कारण उसका रोना छूट रहा था। उसे अपने माता-पिता और सभी की दी गयी सलाहें और सीखे याद आ रही थी। सब उससे कहते थे जो दूसरों का बुरा करता है उसके साथ भी बुरा होता है...पर उसने कभी किसी की भी नहीं सुनी। वह मन ही मन पछता रहा था और भगवान् से प्रार्थना कर रहा था, ‘हे ईश्वर! बस इस बार मुझे बचा लो। आज के बाद मैं किसी को परेशान करने का ख्याल भी अपने दिमाग में नहीं आने दूंगा।’

कुछ देर बाद डालू चूहे की दबी-दबी आवाजें सुनकर उसके माता-पिता और सभी जानवर केक के पास आये। डालू बार-बार हाथ जोड़कर मदद की गुहार कर रहा था। वह ठीक से कुछ बोल नहीं पा रहा था पर उसका पछतावा उसकी बातों में साफ़-साफ़ झलक रहा था।

डालू का हुलिया देखकर वहां खड़े सभी जानवरों के बच्चे उस पर हंस रहे थे।

डालू के माता-पिता ने कहा, ‘यही तुम्हारी सजा है। अब तुम यही रहो और अपने नुकीले दांतों और फुर्तीले शरीर पर घमंड करते रहो।’

डालू को अपने किये पर बहुत अफ़सोस हो रहा था। उसका सर शर्म से नीचे झुका हुआ था। कुछ जानवरों से देखा ना गया और उन्होंने एक लकड़ी के डंडे की सहायता से डालू को केक से बाहर निकाला। इसके बाद थोड़ा गुनगुना पानी मंगवाया गया और डालू को उससे नहलाया गया। वह बिल्कुल साफ़ हो गया और अब वह चल भी पा रहा था और बोल भी।

वह दौड़ा-दौड़ा अपने मम्मी-पापा के पास गया और उनसे लिपट कर रो पड़ा। उसने सभी से काम पकड़कर अपने किये की माफ़ी मांगी और वादा किया कि अब वह किसी को भी कभी भी परेशान नहीं करेगा और सबकी मदद करेगा।

यह कहकर वह पार्टी में आये सभी मेहमानों को नाश्ता और चाय सर्व करने लगा। डालू में आये बदलाव को देखकर उसके माता-पिता और सुंदरवन के सभी वासी बहुत खुश थे। गज्जू हाथी ने जल्दी से नया केक मंगवाया और कहा, ‘आज तो डालू का भी नया जन्म है इसलिए हम दोनों मिलकर केक काटेंगे।’ गज्जू हाथी ने डालू को अपनी सूंड पर बैठा लिया और फिर दोनों ने मिलकर केक काटा। इसके बाद सबने केक खाया और मिलकर डांस किया। अँधेरा होने पर सभी ख़ुशी-ख़ुशी अपने घर चले गए।

Monika Jain ‘पंछी’
(29/11/2013)

November 19, 2013

Poem on Indian Army Soldiers in English

India has one of the best armies in the world. Soldiers are the pride of our nation. They are the backbone of our country. They defend the country with their life and blood. Their life is very difficult and hard just like a bed of thorns. They fight to the last in order to save the motherland. The sacrifice of the Indian soldiers and their family members is incomparable. The below poem is dedicated to the indian army soldiers and their family members. I know words can never describe the courage, bravery and sacrifice of our Indian army. It’s just a salute to all the soldiers. Jai Hind!



Salute to The Soldiers

Defender of borders
I salute to the Indian soldiers.

Words can never describe
What a soldier and his sacrifice.

They put on hold their dreams and lives
They die so that we can survive.

They are the most disciplined persons
On them depend the security and stability of our nation.

They are the true sons of our country
Who fight to protect us from all the enemies.

They are the real heroes of the nation
Serving the motherland is their only passion.

Whether it’s the blood freezing cold or the scorching sun’s rays
They are protecting us without any holidays.

Whether the icy wind or the storms
They face all the challenges like the rocks.

They are pride of our nation
Their life is a source of inspiration.

Away from the mother, kids and wife
They are fulfilling their duty for the sake of our life.

We are grateful to the mothers
Who give birth to these soldiers.

We are obliged to the wives and kids
Who sacrifice their rights for the national deeds.

Monika Jain ‘Panchhi’
(19/11/2013)

15/11/2017 - Note : This is my old poem. After understanding the game of politics and slavery, I am not concerned with such writings. I am not the supporter of war and violence and unnecessary killing of people for power and politics. It depends on time, place and situation but still violence should be minimum. 

October 29, 2013

Poem on Old Age People in English

Our Elders

Today rhythms of children, youth and elders are distorted
Youth are indulged in themselves
and old age people seems them outdated.

Nuclear families are far away
from the intimate company of elders
‘Senior citizens are a problem’
this is the thinking of our youngers.

Those who send to their elders to old age homes
Forget one day they will also get old
and their children may do the same to get rid of them.

The old age people can fire the flame
in the light of which our society can success
With the knowledge and experience of senior citizens
our country can also progress.

It’s our duty to give our elders
emotional security and respect
We should bring them in the mainstream of society
and They should not be ignored and insulted.

The old people also have to understand
that change is the law of nature.
They have to accept the changes in the
thinking of new young generation being their elders.

Monika Jain ‘Panchhi’
(29/10/2013)

Old age people are our guide. They are our true pioneer. Direction they give us can change our destiny and their teachings can fill our life with happiness and peace. Elders are trees of rituals and values. In the shadow of senior citizens we can get the precious treasure of knowledge, experience and rites. So we should never ignore elderly people. Our existence is only because of our elders so we should provide them love, respect and protection. We should bring them in the mainstream of our society so that they never feel isolated and ignored. With their experience and with our new approach, creativity and hard work we can contribute in national development.

October 22, 2013

Poem on Moon (Karva Chauth) in Hindi


मेरा चाँद 

ऐ चाँद! 
क्या मेरा एक काम करोगे?
वो जो दूर चला गया है मुझसे 
क्या उसकी एक झलक मुझे ला दोगे? 

देखो न! कितने साल हो गए हैं 
उसे देखे हुए, उससे मिले हुए 
एक अरसा हो गया 
उससे लड़े और झगड़े हुए। 

आज मुझे उससे जुड़ी हर बात 
बहुत याद आ रही है 
सबके पास होगा अपना चाँद 
और मेरे हिस्से आई बस ये तनहाई है। 

तुम तो गवाह हो न 
हर उस रात के 
जब हाथों में डाले हाथ 
अँधेरी सुनसान राहों पर 
हम बेख़ौफ़ निकलते थे 
रास्ते हो जाते थे कितने छोटे 
जब प्यार के दो मुसाफिर 
हर कदम साथ-साथ चलते थे। 

वह था घोर लापरवाह और एकदम शांत 
बिल्कुल तुम्हारे जैसा 
इसलिए लड़ाई का बहाना 
हमेशा मुझे ही ढूंढना होता था 
और लड़ने-झगड़ने के बाद 
बच्चों की तरह मेरा ही रोना छूटता था। 

बस वो भीगे पल 
और उसका प्यार भरा स्पर्श 
बयां करना चाहूँ 
तो भी नहीं कर सकती 
प्यार बस किया जा सकता है महसूस 
इससे ज्यादा कुछ और 
मैं कह भी तो नहीं सकती। 

याद करने लगी जो सारी बातें 
और कर दी बयां जो सारी मुलाकातें 
तो सच आज फिर से रो पडूँगी 
मचल रहा है कब से जो यादों का तूफ़ान 
बन कर झरना आज मैं बिखर ही पडूँगी। 

पढ़ेगा जब वो मेरी तड़प 
जानती हूँ आँखें उसकी भी भीग जायेगी 
और उसकी आँखों में जो आये आंसू 
तो सच मेरी जान ही निकल जायेगी। 

ऐ चाँद! बस तुम इतना कर दो 
या तो मेरा चाँद ले आओ 
या फिर आज मेरे लिए अमावस कर दो 
क्यूंकि आज की रात जो तुम्हे देखा 
तो अपना दर्द छिपा नहीं पाऊंगी 
गर ना आया मेरा चाँद 
तो सच आज मैं टूट ही जाऊंगी। 

Monika Jain ‘पंछी’ 
(22/10/2013)

21/11/2017 - Note : This poem is a mixture of reality and imagination both, not fully relevant to my life. Specially the reference of unnecessary fighting is not at all relevant to me. I am a quiet girl since my childhood and disputes are a rare thing for me. They occurs when there is a valid reason. Besides it I am not much familiar with karva chauth. In this poem moon and the ambience of karva chauth is just playing the role of awakening the memories of beloved for a girl. The poem has nothing to do with fasting and supporting any tradition. Again for others who follow, I am not totally against too. We just need improvements in our traditions and festivals. Besides it, this is my old writing and leading to spirituality I am not much concerned with such writings today.

Poem on Moon in English


O Moon!

O Moon!
Will you do a favor for me?
The one who is far away from me
A glimpse of him, will you bring me?

Look!
So many years have been passed
Neither I met him, nor i saw him
It’s been a long time since I fought him.
Today I am missing everything associated with him
Loneliness is killing me deep within.

You are the witness of every night
When by holding hands in hands
We used to walk on dark and deserted paths.
Long ways turned into short
When two love birds started their journey
on a completely unknown path.

He was calm and careless just like you
So the excuse of fighting always I had to find
and After having a fight I used to cry like a child.
Those wet moments and his loving touch
Even if i wish I can not express
Love can be just felt
To describe it I am completely wordless.

Today I will start crying
If I will remember all the things.
The storm of memories will shatter me
if I will begin to tell about every meeting.

When he will read my sufferings
He will also start crying
and If I will see tears in his eyes
Literally I will start dying.

O moon!
Do a little favor for me -
Either bring my moon or
Do it moonless today for me.

Because seeing you tonight
My pain, I won’t be able to hide
and If my moon won’t come
It will be impossible to survive.
It will be impossible to survive.

Monika Jain ‘Panchhi’
(22/10/2013)

21/11/2017 - Note : This poem is a mixture of reality and imagination both, not fully relevant to my life. Specially the reference of unnecessary fighting is not at all relevant to me. I am a quiet girl since my childhood and disputes are a rare thing for me. They occurs when there is a valid reason. Besides it I am not much familiar with karva chauth. In this poem moon and the ambience of karva chauth is just playing the role of awakening the memories of beloved for a girl. The poem has nothing to do with fasting and supporting any tradition. Again for others who follow, I am not totally against too. We just need improvements in our traditions and festivals. Besides it, this is my old writing and leading to spirituality I am not much concerned with such writings today.

October 12, 2013

Story on Female Foeticide in Hindi

Story on Female Foeticide in Hindi
 वंशिका
(ललकार टुडे में प्रकाशित)

‘वंशिका! अच्छा नाम है न?’ अपनी मासूम सी बच्ची जिसने आज ही जन्म लिया था उसे अपने हाथों में उठा उसका माथा चूमते हुए दामिनी ने रश्मि से कहा।

कहते हैं जब एक औरत माँ बनती है तो उसका दूसरा जन्म होता है। वंशिका की माँ के रूप में तो दामिनी का दूसरा जन्म था ही साथ ही कुछ समय से उसकी दुनिया भी बदल चुकी थी।

अपने पति, सास-ससुर सभी को छोड़कर कुछ महीने पहले ही वह इस नए शहर में आकर बसी थी, सिर्फ और सिर्फ अपनी बेटी के लिए।

कितनी खुश थी वह जिस दिन उसे डॉक्टर से पता चला कि वह माँ बनने वाली है। ना जाने कितने सपने संजोये थे उसने अपनी पहली संतान को लेकर। पर जब उसे यह पता चला कि उसके पति और सास-ससुर चाहते हैं कि पहली संतान लड़का ही होनी चाहिए तो उसका मन एक अनजाने से भय से आतंकित हो गया।

घर वालों के दबाव में आकर उसे अपने गर्भ की जांच करानी ही पड़ी और जब उसे पता चला कि उसके गर्भ में एक लड़की पल रही है तो उसे उसके सारे सपने बिखरते नज़र आये।

उस पर बार-बार बच्चे को गिराने का दबाव डाला जाने लगा। पर इस कुकृत्य के लिए दामिनी बिल्कुल भी तैयार नहीं थी। एक नन्हीं सी कली जो अभी खिली भी नहीं, जिसने दुनिया देखी भी नहीं और जो उसके शरीर का एक हिस्सा थी उसे वह अपने से कैसे अलग कर सकती थी?

घर में रोज कलह होने लगी। उसने अपने पति अनिल और सास-ससुर को समझाने की बहुत कोशिश की पर उन पर कोई असर ना पड़ा और उन्होंने अपना फैसला सुना दिया, ‘तुम्हें घर और बच्ची दोनों में से किसी एक को चुनना होगा। अगर तुम्हें इस घर में रहना है तो बच्चा गिरवाना होगा वरना यह घर छोड़कर जाना होगा।’

दामिनी के पैरों तले जमीन खिसक गयी। दामिनी के माता-पिता नहीं थे। मायके में बस उसके दो बड़े भाई और उनके बीवी-बच्चे थे। उसने अपने मायके में बात की तो वहां से भी यही सलाह मिली, ‘जैसा ससुराल वाले कहते हैं वैसा ही कर। जिसने जन्म ही नहीं लिया उसके लिए तू अपने पति को कैसे छोड़ सकती है? बच्चे तो और भी हो जायेंगे पर शादी कोई बच्चों का खेल नहीं है जो तू इतना बड़ा फैसला अकेले ले ले।’

मायके से भी निराश दामिनी के लिए अब कोई भी फैसला करना बहुत मुश्किल था। पर किसी भी कीमत पर वह एक मासूम बच्ची की जान नहीं ले सकती थी। उसने अपनी बचपन की पक्की सहेली रश्मि से बात की और उसी के शहर में अपने रहने का इंतजाम करवाया और अपनी सारी हिम्मत जुटाकर कपड़ों से भरा सूटकेस और अपने जमा कुछ पैसे लेकर निकल पड़ी एक नए शहर के लिए।

अपनी सहेली के घर के पास ही एक छोटे से कमरे में उसने अपनी नयी दुनिया बसाई। दामिनी पढ़ी लिखी थी। वहीँ उसने एक स्कूल ज्वाइन कर लिया और किसी तरह अपना नया जीवन शुरू किया। आसान तो कुछ भी नहीं था पर अपनी हिम्मत और रश्मि से मिली मदद के बल पर उसने सारी मुश्किलों को पार किया और कुछ महीने बाद एक बहुत ही सुन्दर फूल सी बच्ची को जन्म दिया।

दामिनी वंशिका को प्यार से वंशु कहकर बुलाती थी। एक छोटी सी बच्ची के साथ जॉब और घर के सारे काम बहुत मुश्किल थे पर दामिनी को कुछ अच्छे लोगों का साथ मिला और मुश्किलों से उसकी लड़ाई जारी रही। दामिनी ने वंशिका की पढ़ाई-लिखाई और पालन-पोषण में कोई कसर नहीं छोड़ी। वंशिका भी अपनी माँ से बहुत प्यार करती थी। दामिनी सिर्फ उसकी माँ ही नहीं बल्कि उसकी सबसे अच्छी दोस्त भी थी, जिससे वह अपने स्कूल, दोस्तों सबकी बातें शेयर करती थी।

वंशिका को अपने पिता का सच नहीं पता था। उसे यही बताया गया कि एक हादसे में उसके पिता और दादा-दादी की मौत हो गयी। क्योंकि दामिनी नहीं चाहती थी कि अपने पिता का सच जानकर वंशिका का दिल टूट जाए और वह अपने पिता से नफरत करने लगे।

उधर दामिनी के जाने के एक साल के भीतर ही उसके पति अनिल ने दूसरी शादी कर ली। नयी पत्नी से दो जुड़वा बेटे हुए आकाश और विकास।

समय बीतता गया और बच्चे बड़े हो गए।

वंशिका ने PMT की परीक्षा पास की और मेडिकल कॉलेज से अपनी पढ़ाई पूरी कर वह डॉक्टर बन गयी। वंशिका की पोस्टिंग उसी शहर में हुई जहाँ उसके पिता रहते थे। दामिनी को जब पता चला तो अतीत की सारी स्मृतियाँ उसकी आँखों के सामने छाने लगी। वह घबरा भी गयी पर बेटी के करियर का सवाल था सो अपनी भावनाओं पर काबू कर वह बेटी के साथ उसी शहर चली आई जहाँ से कभी शादी के बाद उसने अपना नया जीवन शुरू किया था।

उधर अनिल की दूसरी पत्नी निशा की कुछ साल पहले एक कार एक्सीडेंट में मौत हो गयी थी। आकाश और विकास दोनों ने अमेरिका में एम.बी.ए. किया और वहीँ की लड़कियों से शादी कर वहीँ सेटल हो गए। इधर दामिनी का पति अनिल अपने बूढ़े माता-पिता के साथ अकेला रह गया।

अनिल की तबियत बहुत ख़राब रहने लगी। जांच कराने पर पता चला उसे ब्लड कैंसर है। जिन बेटों की चाह में उसने अपनी पहली पत्नी को घर से निकाल दिया उन्हीं को उसकी कोई परवाह नहीं थी। अकेलापन उसे सालने लगा और वह अपराध बोध से भर गया पर अब पछताने के अलावा उसके पास कुछ था भी नहीं। मरने से पहले उसकी बस एक ही ख्वाहिश थी दामिनी और अपनी बेटी से माफ़ी मांगना।

एक दिन वंशिका जब अपने घर से हॉस्पिटल के लिए रवाना हो रही थी तो उसने देखा पास ही में एक आदमी चक्कर खा कर गिर गया और बेहोश हो गया। लोगों की मदद से वह उसे अपने घर तक लायी। माँ से पानी मंगवाया और उस आदमी की जांच करने लगी। माँ वंशिका को पानी का गिलास देकर ज्यों ही वापस मुड़ी अचानक उसके कदम रुक गए। उसने उस आदमी को ध्यान से देखा। वह और कोई नहीं बल्कि उसका पति अनिल ही था। वह एकदम स्तब्ध रह गयी। अनिल को भी होश आ गया था। उसके सामने दामिनी खड़ी थी। उसने अपनी आँखों को मसला और फिर से उसे देखा। जब उसने दामिनी को पहचान लिया तो वह अपनी भावनाओं पर काबू ना कर सका और फूट फूट कर रोने लगा। वह हाथ जोड़कर बोला, ‘दामिनी! प्लीज मुझे माफ़ कर दो। मैं तुम्हारा बहुत बड़ा अपराधी हूँ पर हो सके तो मुझे माफ़ कर दो।’

वंशिका को कुछ समझ नहीं आया तो उसने माँ से पूछा, ‘माँ क्या आप इन्हें जानती हो?’

वंशिका के माँ कहते ही अनिल ने अपने आंसू पौंछे और एक बार वंशिका को और फिर सवाल भरी निगाह से दामिनी की ओर देखा। दामिनी ने सहमति में सर हिला दिया।

अनिल को खांसी चलने लगी। वंशिका पानी का गिलास लेकर अनिल को पानी पिलाने लगी। पानी पीकर अनिल ने बड़े प्यार से उसके सर पे हाथ फेरा और पूछा, ‘बेटा! तुम्हारा नाम क्या है?

‘वंशिका!’ और इस शब्द के साथ ही अनिल की आँखें झुक गयी और फिर से अविरल आंसू बह पड़े।

Monika Jain ‘पंछी’
(12/10/2013)

October 10, 2013

Poem on Old Age People in Hindi

बुजुर्ग 

आज बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों के
लय ताल बिगड़े हुए हैं 
युवा और बच्चे हैं अपने में मग्न 
और बुजुर्ग उन्हें आउटडेटेड लग रहे हैं। 

एकल परिवारों ने बुजुर्गों के 
आत्मीय सानिध्य को 
कर दिया है दूर 
बुजुर्ग हैं एक आफत 
यह सोचती है आज की पीढ़ी 
होकर मगरूर। 

बुजुर्गों को वृद्धाश्रम भेज 
उनसे छुटकारा पाने वाले 
भूल जाते हैं 
होंगे वे भी एक दिन बूढ़े 
जो आज हो रहे हैं 
जवानी में मतवाले। 

नहीं है उन्हें भान कि
बुजुर्ग जला सकते हैं वह मशाल 
जिसकी रौशनी में समाज 
तरक्की कर सकता है 
बुजुर्गों के ज्ञान और अनुभव से 
हमारा देश आगे बढ़ सकता है। 

बुजुर्ग संस्कारों का वृक्ष हैं 
अनुभव और ज्ञान में वे दक्ष हैं
उनकी छाया में हम पायेंगे 
अनमोल खजाना 
भूल कर भी अपने बड़ो से 
दूर ना जाना। 

बुजुर्ग हमारे मार्गदर्शक है 
वे ही हमारे पथ प्रदर्शक है
उनसे मिली दिशा 
बहुत कुछ बदल सकती है 
बजुर्गों की सीख, हमारा जीवन 
खुशियों से भर सकती है। 

हमारा कर्त्तव्य है बुजुर्गो को दें 
भावनात्मक सुरक्षा और सम्मान 
उन्हें जोड़े समाज की मुख्य धारा से 
और ना करें उनकी उपेक्षा व अपमान। 

बुजुर्गों को भी समझना होगा 
बदलाव है प्रकृति का नियम 
कोई मनमानी नहीं 
आज की पीढ़ी में होते 
बदलाव को अस्वीकृति
बुद्धिमानी नहीं। 

गर ना समझे वे तो भी 
एक बात पर देना तुम सब ध्यान 
हमारा अस्तित्व है हमारे बड़ो से 
सो उनको प्यार, सुरक्षा और देकर सम्मान 
कर रहे हैं हम अपना ही उत्थान। 

Monika Jain ‘पंछी’
(10/10/2013)

25/10/2017 : नोट : पुरानी कविता है, बच्चों के लिए है और उस समय की समझ और बुजुर्गों के प्रति कुछ बुरी घटनाओं और बर्ताव को देखकर लिखी गयी है। निष्पक्ष रूप से अभी यह कह सकती हूँ कि न तो बुजुर्ग होना सही का प्रमाण है और ना ही युवा होना। जन्म दे देने से कोई महान नहीं बनता और ना ही हमारा अस्तित्व कोई उपलब्धि जैसी चीज है। इसके अलावा सही और गलत समझ, परिस्थितियों और समय पर निर्भर करते हैं। कई मामलों में बुजुर्ग गलत हो सकते हैं और कई मामलों में युवा भी। हाँ, लेकिन हम सब आपस में जुड़े हुए हैं, सभी में कमियां हैं। ऐसे में जहाँ तक और जितना संभव हो सभी के प्रति समझ और संवेदनशीलता जरुरी है। जहाँ अपवाद स्वरुप सख्त रवैये की जरुरत हो वहां वह भी हो लेकिन उसका भी आधार कोरा निजी स्वार्थ न होकर समझ और संवेदनशीलता हो यह बेहद जरुरी है। इसके अलावा एक महत्वपूर्ण बात यह है कि बड़ों का बदलना मुश्किल होता है, लेकिन छोटी उम्र में खुद में बदलाव उतने ही आसान होते हैं, इसलिए कई मामलों में वृद्ध लोगों से बदलने की अपेक्षा नहीं रखी जा सकती है। बेहतर यह है कि हम खुद को सुधारें ताकि आने वाली पीढ़ियों को एक बेहतर माहौल मिले।

Poem on Women Empowerment in Hindi

(1)

आज़ादी का हक़

मैं शादी में विश्वास करती हूँ 
पर शादी की प्रमाणिकता के लिए 
अपनी मांग में सिन्दूर 
गले में मंगलसूत्र
हाथों में चूड़ियाँ 
पाँव में पायल और 
बिछिया पहनने में नहीं।

ये शृंगार के लिए पहने जाए 
इसमें मुझे आपत्ति नहीं 
पर शादी के नाम पर 
इन्हें थोपा जाए 
ये मुझे मंजूर नहीं।

बेटी को जायदाद में 
बराबर का हक़ मिले 
इसमें मेरा विश्वास है 
पर शादी के नाम पर 
होने वाले लेनदेन और 
दहेज़ में नहीं।

जीवनसाथी के प्रति 
सम्मान को मैं जरुरी मानती हूँ 
पर अपने पति को 
नाम से ना बुला सकने के 
रिवाज को नहीं।

पति की लम्बी उम्र 
कौन नहीं चाहेगी?
पर इसके लिए 
परंपरा के तौर पर किये जाने वाले 
व्रत और उपवास में 
मेरी मान्यता नहीं। 

परिधान में शालीनता की बात 
मैं अवश्य मानती हूँ 
पर शादी के बाद ससुराल में 
साड़ी ही पहनी जाये 
ये बिल्कुल भी नहीं।

संयुक्त परिवार
आपस में प्यार 
हर रिश्ते को दिल से अपनाना 
अपने उचित कर्तव्यों को निभाना 
प्रेम और समर्पण की भावना 
परिवार को एक सुत्र में बांधना 
इन सबमें विश्वास करती हूँ 
पर बेवजह के अन्याय 
और परम्पराओं को ढोने में नहीं। 

क्योंकि में आज़ादी का हक़ चाहती हूँ 
बहु नहीं, मैं एक बेटी बनना चाहती हूँ।

Monika Jain 'पंछी'
(10/08/2013)

(2)

मैं हूँ एक विलुप्त प्रजाति 

हाँ, मैं हूँ एक विलुप्त प्रजाति 
जिसकी सुरक्षा और सशक्तिकरण की 
बातें हो रही है, देश भर में।

जिसे इंसाफ़ दिलाने के लिए 
बन रहे हैं महिला कोर्ट 
जिसके अस्तित्त्व की रक्षा के लिए 
गढ़े जा रहे हैं कानून के नए समीकरण।

लेकिन सच तो सिर्फ इतना है कि 
चुनौती बन गया है मेरे लिए 
जन्म से पहले ही सुरक्षित रह पाना।

मैं पूछना चाहती हूँ 
इस पुरुष प्रधान समाज से 
क्या अपनी सभ्यता के विकास के लिए 
वो बना पाएंगे ऐसे कारखाने 
जहाँ खत्म हो जाती है 
जरुरत एक औरत की।

Monika Jain 'पंछी'
(24/01/2013)

October 9, 2013

Poem on Discipline in Hindi

अनुशासन

स्वयं पर स्वयं का शासन 
कहलाता है अनुशासन। 

यह कोई पराधीनता नहीं 
ना ही है कोई बंधन
यह है नियमों का अनुसरण 
बनता है जिससे आदर्श जीवन। 

अनुशासन चेतना का परिष्करण है 
अनुशासन सिद्धांतों का अनुकरण है 
अनुशासन सुसंस्कार है 
सफल जीवन का यही आधार है। 

अच्छे विद्यालय ही 
अनुशासन के निर्माता है 
सुसंस्कृत परिवार में ही बालक 
अनुशासन पाता है। 

अनुशासित विद्यार्थी 
बढ़ाते हैं देश का मान 
जो दिखाते हैं अनुशासनहीनता 
नहीं पाते कहीं भी सम्मान। 

समाज में बढती अव्यवस्था 
अनुशासनहीनता का परिणाम है 
नियमों को जो करते हैं दरकिनार 
बुद्धिमान नहीं वे नादान है। 

अनुशासन राष्ट्र हित में जरुरी है 
ना सोचो कि यह कोई मजबूरी है 
कर्तव्यों का पालन हमारी जिम्मेदारी है 
अनुशासित रहना ही सच्ची समझदारी है। 

अनुशासन सफलता की धुरी है 
प्रशासन, स्कूल, समाज और परिवार 
सबकी सफलता के लिए 
अनुशासन जरुरी है। 

अनुशासन परिवार, समाज और राष्ट्र की आवश्यकता है 
बिना अनुशासन कोई भी आगे नहीं बढ़ सकता है 
अनुशासन से ही समस्यायों का समाधान है 
अनुशासन में ही विकसित होता ज्ञान है। 

अनुशासन जीवन का प्राण है 
सफलता के लिए अनुशासन रामबाण है
अनुशासन पशुता से ऊपर उठाता है 
अनुशासन ही मानव को मानव बनाता है। 

Monika Jain ‘पंछी’ 
(09/10/2013)

In short, discipline is controlling our mind. Self discipline in every field of life helps us to get good health, true happiness, peace, success and enlightenment. It has a great role in students life. The best place to learn discipline is our schools. Children are same as raw pitcher. Discipline helps to give them good shape and turned them into good and responsible citizens, who help in building a good and developed nation. 

Poem on Discipline in English

Discipline

Discipline means a good awareness of 
our duties and obligations
Discipline is necessary for the 
growth and development of our nation.

Discipline plays an important role
 in every walk of life
Discipline is the refinement of 
our inner and conscience.

Whether It’s academic, sports or 
any other field
There are countless benefits that
 a disciplined approach can yield.

Today’s students are tomorrow's leaders
It’s the discipline that is 
backbone of their character.

Discipline demands 
self control, dedication and patience
It’s the discipline that makes the learning 
effective, lasting and efficient.

Disciplined life gives us 
health and happiness
It’s the discipline that always 
leads to success.

Discipline is the essential quality
 that picks up over brutality
It’s the discipline that adds color and charm to 
everyone’s personality.

Discipline works everywhere
Whether it’s our body, universe or 
any other sphere.

. The earth and the moon revolve around the sun
 in a disciplined way
As a result after every twelve hours 
we can see night and day.

Discipline is the law of nature
and It is also necessary for the
whole social structure.

Increasing chaos in society is the 
result of indiscipline
To have a happy, peaceful and prosperous life 
we have to inculcate discipline

Without discipline society will become 
devil’s paradise
It’s the discipline that determines
 what is wrong and what is right.

Discipline is the bridge between 
goals and accomplishment
It’s the discipline that directs work
 making it fruitful and excellent.

Self discipline is the best way to achieve 
complete discipline
It’s the ability to conquer oneself 
and getting true independence.

Monika Jain ‘Panchhi’
(09/10/2013)

October 1, 2013

Poem on Diwali in English


The Festival of Lights

We have brighten up our home with so many lamps
All the darkness of this moonless night is turned away in an instant.

To welcome Maa Lakshmi we have made all the arrangements
With sweets, nuts and fruits we have filled our worship plates.

We are burning so many firecrackers
and Emptying the plates of sweets and desserts.

We are wishing our friends with a great delight
and This way we have celebrated the another festival of lights.

But there are thousands of homes where there is no light
There are so many eyes without any dreams of flight.

Merely by lightning our homes the motive of diwali is not achieved
Deepawali is the sign of triumph of good over evil,
By only worshipping Maa Lakshmi our duties are not fulfilled.

Let’s Brighten up this diwali our own inner and conscience
and Remove the darkness of people who are living miserable life.

Let’s make their diwali so bright
and Celebrate in true sense this festival of light.

Monika Jain ‘Panchhi’
(10/2013)

‘Diwali’ the festival of lights is one of the most important festival of Hindus celebrated all over the India. Each and every festival comes with a great message imbibed in it. The festivals should not be celebrated just for the sake of celebration. We should try to celebrate every festival in its true sense. So let’s this Deepawali we bring light in the life of people who are helpless, poor and living their life in darkness, who don’t have enough money to buy even a single lamp and a single piece of sweets. It’s not only our duty, in fact it’s our right too, to make this diwali more joyous and bright. Wish you all a very Happy Diwali.

September 18, 2013

Funny Poem (Hasya Kavita) in Hindi


हास्य कविता 

दोस्तों ने कहा -
ट्राय करो कभी हास्य व्यंग्य!
हमने कहा -
इसमें है हमारा हाथ तंग! 

अरे! एक कोशिश तो 
करके देखो। 
थोड़े हंसी के फव्वारे भी कभी 
अपनी वॉल पे फेंको। 

हमनें कहा -
पढ़कर हमारी हास्य कविता 
गर किसी को हंसी ना आई 
तो बैठे बिठाये हो जाएगी 
हमारी जग हंसाई। 

अब वॉल पर हम 
बैकग्राउंड हंसी तो चला नहीं सकते 
हँसना मना है कहकर 
लोगों को जबरन हंसा तो नहीं सकते। 

यहाँ लाफ्टर शोज के जजेज
नहीं बैठे हैं 
बिन बात के हा-हा-हा करने के 
किसी ने पैसे नहीं ऐंठे हैं। 

गर एक को भी हंसी ना आई 
तो हमारी आँखें भर आएगी 
झाँसी की रानी बनकर 
पायी है हमने जो इज्जत 
तुम्हारे इस हास्य व्यंग्य के आईडिया से 
मिट्टी में मिल जाएगी। 

तम्हारा आईडिया मुझे 
लग रहा फ्लॉप है 
सड़े अंडे और टमाटर खाने का 
हमें नहीं शौक है। 

दोस्त ने कहा -
तो चलो हम एक काम करते हैं 
तुम्हारी पहली कविता का टाइटल 
हँसना जरुरी है रखते हैं। 

कोई तो
तुम पर तरस खा ही लेगा 
दांत दिखाए ना दिखाए 
पर जरा सा मुस्कुरा ही लेगा। 

नहीं तो हम एक झकास काम करेंगे 
फर्जी आई-डी से कॉमेंट बॉक्स को 
हा-हा-हा से भर देंगे। 

न तुम्हारी कमाई इज्जत कहीं जाएगी 
हंसी ना आई किसी को तो भी 
तुम्हारी कविता 
हास्य कविता कहलाएगी। 

Monika Jain 'पंछी'
(18/09/2013)

September 16, 2013

Poem on Bravery (Courage) in Hindi

(1)

हम मगर चलते रहे

जिन मुश्किलों में मुस्कुराना था मना 
उन मुश्किलों में मुस्कुराते हम रहे।
जिन रास्तों की थी नहीं मंजिल कोई 
उन रास्तों पे हम मगर चलते रहे।
जिस दर्द को दरकार थी आंसुओं की 
उस दर्द में आंसू हमारे ना बहे।
जो ख़्वाब रूठे थे हमारी जिंदगी से 
वो ख़्वाब आँखों में मगर पलते रहे।
मुंह मोड़ के अपने हमारे चल पड़े 
यादों में उनकी हम मगर जीते रहे।
आते रहे तूफ़ान हमको लीलने को 
हम मगर लहरों के संग लड़ते रहे।
जिंदगी ने कर दिया इंकार जीने से मगर 
मौत को भी हर कदम पे, मात हम देते रहे। 

Monika Jain 'पंछी'
(03/03/2013)

(2)

सुनो दर्द!

दर्द ने हंस कर कहा मुझसे 
एक दिन तुझे जिंदगी से रूठना होगा 
चाहे कितना भी लड़ ले तू मुझसे 
पर एक दिन तुझे टूटना होगा। 

तेरी कोशिशे बेकार हैं 
तेरे सपने निराधार हैं 
मेरी ताकत के आगे 
तेरी जिद लाचार है। 

तू नही सह पायेगी मुझे 
जब मैं हद से गुजर जाऊंगा 
रूह काँप उठेगी तेरी 
जब मैं अपना कहर ढ़ाउंगा। 

कोई ना देगा तेरा साथ
तेरे अपने छोड़ देंगे तेरा हाथ
तब तू कैसे सांस ले पायेगी 
कुछ भी कर तेरी आस टूट ही जाएगी।

सुनो दर्द!
तुम चाहे हद से गुजर जाओ 
चाहे कितना भी कहर बरसाओ 
जुल्म करो ढेरों मुझ पर 
चाहे कितना भी सितम ढाओ

पर लडूंगी मैं तुमसे 
जब तक चल रही मेरी साँस है 
तुम्हें हो न हो 
मुझे खुद पर इतना तो विश्वास है। 

मेरी कमजोरियों को 
अपनी ताकत ना समझना 
मेरी मजबूरियों को 
अपनी हिमाकत ना समझना

क्योंकि हिम्मत ही मेरी 
सबसे बड़ी आस है 
तुम्हें हो न हो 
मुझे खुद पर इतना तो विश्वास है। 

हार मान लेना 
ये मुझसे हो ना पायेगा 
लडती रहूंगी मैं हर पल 
चाहे तू कितना भी मुझे सताएगा 

क्योंकि मनोबल के सिवा 
कुछ भी नहीं मेरे पास है 
तुम्हें हो न हो 
मुझे खुद पर इतना तो विश्वास है। 

हाँ, जीतना मेरा कोई 
ख़्वाब नहीं है 
पर रुक कर बैठ जाना 
ये भी तो कोई बात नहीं है 

चलती रहूंगी निरंतर 
क्योंकि चलना ही मेरे लिए खास है 
तुम्हें हो न हो 
मुझे खुद पर इतना तो विश्वास है। 

Monika Jain 'पंछी'
(16/09/2013)

04/11/2017 - नोट : थोड़ी भावुकता में लिखी गयी पुरानी कवितायेँ हैं। पूरी तरह तो सहमत नहीं लेकिन मूल सन्देश लेकर चलें तो जीवन और मृत्यु क्या लेकर आएगी, यह हम तय नहीं कर सकते। हम बस यह तय कर सकते हैं कि हम उनका स्वागत कैसे करेंगे। ‘खुद’ से यहाँ आशय आत्म/परम तत्व से लेना बेहतर होगा। हम बस आत्म/परम तत्व में श्रद्धा रखें, जागरूक रहें। जो भी विषम स्थितियां हैं, सबसे पहले उन्हें स्वीकार करें और जो बदल सकते हैं, उन्हें बदलने का प्रयास करें। 

September 13, 2013

Poem on Stop Rape in Hindi

(1)

बलात्कार

बलात्कार नहीं होता
सिर्फ शरीर का
कभी-कभी होता है बलात्कार
विश्वास और भावनाओं का भी
चाहे शरीर छलनी हो चाहे मन
दोनों में ही मैंने
मुस्कुराहटों को सदा के लिए
गुम होते देखा है
और सपनों से भरे जीवन को
ज़िंदा लाश में बदलते देखा है। 

Monika Jain ‘पंछी’

(2)

सजा 

चलो हो गयी फांसी की सजा 
कह रहे कुछ लोग कि इस धरती से 
चार दरिंदों का बोझ 
कम हो जायेगा 
पर कुकुरमुत्तों की तरह 
उग आये बलात्कारियों 
के मन में ये फैसला 
क्या कोई ख़ौफ़ जगा पायेगा?

ना जाने कितने बलात्कार हैं ऐसे 
जिनकी चीखें बंद दीवारों में 
कैद होकर रह जाती हैं 
और ना जाने कितने मासूम हैं ऐसे 
जिनकी रूह को 
हर रोज सजा-ए-मौत दी जाती है। 

सिर्फ एक फैसले में सजा
ऊँट के मुंह में जीरे सी अटक रही है 
ना जाने कितने दरिन्दे 
घूम रहे हैं खुलेआम 
बस यही बात मुझे 
दिन-रात खटक रही है। 

और फिर फांसी समस्या का 
कोई समाधान नहीं है 
जब तक ना बदलेगी मानसिकता 
तब तक अपराधों पर 
कोई लगाम नहीं है। 

सबसे पहले बदल डालो
ये महज़ डिग्रियां देने वाली पढ़ाई
जिसने साक्षर कर दिया सबको 
पर इंसान को इंसान तक ना बना पाई। 

मेरे देश के पिता और माताओं 
तुम भी कुछ अपनी भूमिका निभाओ 
भेद ना करो अपने बच्चों में 
और बचपन से ही 
समता की पौध उगाओ। 

नेता, पुलिस और 
कानून के ठेकेदारों 
जरा तुम भी लाज खाओ 
अपने पेशे और पद को 
अब इतना भी ना लजाओ। 
इन्साफ करो अपने पद 
और कुर्सी के साथ 
मरने से पहले थोड़ा पुण्य 
तुम भी कमा कर जाओ। 

Monika Jain 'पंछी'
(13/09/2013)

13/01/2018 : Note : Every crime is somehow a crime of we all. Judicial system should be honest and strict, but I am not in favor of capital punishment. That’s not the solution.

September 10, 2013

Poem on Hate (Hatred) in Hindi

(1)

वह

गलतफहमियों की 
गगन चुम्बी इमारतें बनाता वो 
जो कभी ढह जाए सत्य की गहराई में 
तो क्या शर्मिंदा होगा वह? 
नफरत की दीवारें खूब सजाता वो 
जो गर देख पाए प्रेम 
तो क्या संजीदा होगा वह? 

Monika Jain ‘पंछी’

(2)

नफ़रत की राह 

नफ़रत की आग दिलों में जल रही है 
ईर्ष्या, द्वेष और घृणा हृदयों में पल रही है 
प्यार के लिए छोटी है जिंदगी 
और नफ़रत की राह मनुजता चल रही है। 

जाति, धर्म के झंझावातों में उलझ 
खो रहे हैं हम अपनी पहचान 
ना हिन्दू, ना मुस्लिम, ना ही ईसाई
सबसे पहले हैं हम एक से इंसान। 

धर्म की दूकान सब को छल रही है 
अपराधियों की राजनीति इसमें फल रही है 
प्यार के लिए छोटी है जिंदगी 
और नफ़रत की राह मनुजता चल रही है। 

तुम बनते हो साधन उनका 
पैसा, सत्ता सपना जिनका 
झोंक तुम्हे हिंसा की आग 
चमक रहा है सिक्का उनका। 

ऐसे ही अवसरवादियों की दाल गल रही है 
निर्दोष जनता बस अपने हाथ मल रही है 
प्यार के लिए छोटी है जिंदगी 
और नफ़रत की राह मनुजता चल रही है। 

निर्दोषों का खून बहा 
राजनीति की रोटियां सेकी जाती हैं 
वोट बैंक के खातिर ही 
भूखी जनता को बोटियाँ फैंकी जाती हैं। 

इंसानियत की उम्र अब ढल रही है 
हैवानियत इसे निगल रही है 
प्यार के लिए छोटी है जिंदगी 
और नफ़रत की राह मनुजता चल रही है। 

Monika Jain 'पंछी'
(10/09/2013)

September 7, 2013

Poem on Chandrashekhar Azad in Hindi


चंद्रशेखर आज़ाद

गुलाम देश में भी जीता था 
जो बन आज़ादी का परवाज़ 
नहीं हुआ है, कभी ना होगा 
कोई चंद्रशेखर सा आज़ाद।

सहनशीलता की पहचान 
साहस का था दूजा नाम 
देश की आज़ादी के खातिर 
सर्वस्व किया जिसने बलिदान।

जिसकी रग-रग में आज़ादी 
बनकर खून बहा करती थी 
जिसके जज़्बे और हिम्मत की 
चर्चा चहुँओर हुआ करती थी।

गोरों को भी डर लगता था 
जिसके क्रांति अभियान से 
जन-जन में अलख जगाई जिसने 
निज प्राणों के बलिदान से।

आज़ादी जिसको अपने 
प्राणों से ज्यादा प्यारी थी 
जिसने अपनी सारी खुशियाँ 
माँ धरती पर वारी थी।

उस भारत माँ के वीर सपूत को 
मेरा शत-शत अभिनन्दन 
देश की माटी जिसके मस्तक 
पर सजती थी बन चन्दन। 

Monika Jain 'पंछी'
(07/09/2013)

21/11/2017 - नोट : बचपन से ही देश की गुलामी के समय आज़ादी के लिए संघर्षरत क्रांतिकारियों के प्रति मन में एक सहज सम्मान आता रहा है। प्रस्तुत कविता चंद्रशेखर आज़ाद के चरित्र के उज्जवल पक्ष को देखते हुए लिखी गयी है। हालाँकि मैं हिंसात्मक कार्यवाहियों की समर्थक नहीं हूँ, अहिंसा मेरा मार्ग है, लेकिन देश-काल-परिस्थिति को भी समझती हूँ। इतिहास के वीरों या महापुरुषों के विरोध में भी कई तर्क रखे जाते हैं। वे अपनी जगह सही हो सकते हैं। यह पुरानी कविता है, जिससे अब वैचारिक रूप से खुद को पूरी तरह सम्बद्ध नहीं पाती हूँ।  

September 5, 2013

Poem on Teacher (Teacher's Day) in Hindi


(1)

सच्चे शिक्षक 

ताउम्र मुझे तलाश रही 
एक सच्चे शिक्षक की 
और ना मिलने पर
मैंने बना ली थी एक धारणा 
कि आसान नहीं है इस युग में 
एक अच्छा गुरु मिल पाना। 

पर मैं अबोध!
ये कहाँ जानती थी 
कि हर रोज मैं मिल रही हूँ 
कई गुरुओं से 
जो रूबरू करवा रहे हैं मुझे 
जीवन के अनभिज्ञ पहलुओं से। 

मेरी असफलताएं!
क्या नहीं हैं मेरी शिक्षक? 
उन्होंने ही तो मुझे दिखाई है 
मेरी वो कमियां 
जहाँ सुधार कर चढ़नी है 
मुझे सफलता की सीढ़ियाँ। 

ये प्रकृति! 
ये तो सबसे बड़ी गुरु है। 
जिसके हर कण-कण में बिखरी है 
ज्ञान की कड़ियाँ 
जिन्हें जोड़कर बनती है 
रोशनी की एक नयी दुनिया। 

हमारे जीवन से जुडा हर व्यक्ति 
हमारा शिक्षक ही तो है। 
क्योंकि हर कोई कुछ नया सिखा जाता है 
एक दगाबाज भी सच्चाई दिखा जाता है। 

आज मेरी तलाश खत्म हो गयी है 
किसी एक गुरु की मुझे जरुरत नही है। 
मुझे सीखना है जीवन के हर क्षण से 
मुझे पाना है ज्ञान प्रकृति के कण कण से। 

Monika Jain 'पंछी' 
(05/09/2013)

(2)

शिक्षक 

माँ है मेरी जीवन दाता 
पिता है पालक पोषक 
पर जीने की राह दिखाते 
मुझको मेरे शिक्षक। 

अनुशासन का पाठ पढ़ाते
अच्छी-अच्छी बात सिखाते 
कठिन-कठिन लगते सवाल जो 
सरल बनाकर हल करवाते। 

सच्चा मार्ग दिखाते हमको 
यश की ना वो करते चाह 
ईश्वर से भी ऊपर दर्जा 
दिखलाते जीवन की राह। 

Monika Jain 'पंछी' 

September 3, 2013

क्षमा ~ Poem on Forgiveness in Hindi


क्षमा

क्षमा से नफ़रत के शूल गलते हैं
क्षमा से ही प्यार के फूल खिलते हैं
क्षमा का प्रभाव है कुछ ऐसा
दुश्मन भी बन दोस्त गले मिलते हैं।

जितना सुन्दर शब्द है ये
उतना ही सुन्दर इसका होना
क्षमा बनाती है निर्मल
मन मंदिर का हर एक कोना।

क्षमा मांगने और कर देने से
बनता है एक पूर्ण व्यक्तित्व
अहंकार न टिक पाता
जहाँ होता है क्षमा का अस्तित्व।

न देकर गलतियों की माफ़ी
कर रहे हम अपने साथ नाइंसाफी
घूम रहे हैं लेकर बोझ
बने हुए खुद के अपराधी।

तो आओ इस क्षमा दिवस पर
कर दे हम एक दूजे को माफ़
दिल में भरा जो कूड़ा करकट
कर दे उसको बिल्कुल साफ़।

Monika Jain 'पंछी'
(09/2013)

September 2, 2013

Essay on Forgiveness in Hindi

क्षमा

क्षमा कर देने और क्षमा मांगने, दोनों के ही लिए एक साहसी, संवेदनशील, साफ़ और बड़े दिल की जरुरत होती है। क्षमा मांगना कायरता की निशानी बिल्कुल भी नहीं है बल्कि यह तो अहंकार का नाश है। दूसरी ओर क्षमा कर देना भी बड़प्पन, सकारात्मकता और महानता को ही दर्शाता है। देखा जाए तो दोनों ही चीजे प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से हमें ही फायदा पहुंचाती है। न किसी से नफरत, द्वेष और ईर्ष्या रखकर हम खुश रह सकते हैं और ना ही कोई हमें नफरत करे यह बात हमें अच्छी लगती है।

अपनी गलतियों को स्वीकारने और किसी को माफ़ कर देने के लिए दिन विशेष की जरुरत नहीं होती, पर हाँ, दिन विशेष हमें ठहरकर सोचने का समय देता है। जीवन की भागदौड़ में जो कुछ छूटता जा रहा है, उसे सहेजने का अवसर देता है। लेकिन अक्सर महज औपचारिकताओं में यह दिन भी निकल जाता है। संवत्सरी की संध्या से शुरू हुआ सिलसिला अगले 1-2 दिनों में खत्म हो जाता है, और हम वहीँ के वहीँ रह जाते हैं, फिर से ढेर सारी गलतियाँ करने की तैयारी के साथ।

अगर किसी चीज की सबसे ज्यादा जरूरत है तो वह है आत्मविश्लेषण की, खुद में झाँकने की, अपनी गलतियों को पहचानने की, उन्हें स्वीकार करने की और इस संकल्प के साथ क्षमा मांगने की कि भविष्य में ये गलतियाँ नहीं दोहराई जायेगी। हम जैसा व्यवहार दूसरों से अपने लिए चाहते हैं, वैसा ही व्यवहार सबके साथ करें, यह बदलाव ही इस दिन की सार्थकता है।

अगर हमने गलती की है तो उसे स्वीकार करने और क्षमा मांगने से हमें कतराना नहीं चाहिए। क्षमा का उम्र से भी कोई लेना देना नहीं होता। अगर आप ऐसा सोचते हैं कि आप बड़े हैं इसलिए आप क्षमा नहीं मांगेंगे तो ये आपकी छोटी सोच और अहंकार को दर्शाता है। जो सच में बड़े होते हैं वहीँ क्षमा मांग सकते हैं और क्षमा कर भी सकते हैं। क्षमा आत्मग्लानि से मुक्ति दिलाती है, टूटे रिश्तों को जोड़ती है, अहंकार का नाश करती है और हमारे जीवन में सकारात्मकता की वृद्धि करती है।

कोई भी पूर्ण दोषमुक्त नहीं होता। हर व्यक्ति में कोई ना कोई कमी होती है, और छोटी-मोटी गलतियाँ सभी से होती है। अगर हमें हमारी गलतियों के लिए हमारे माता-पिता, शिक्षकों ने माफ़ ना किया होता तो? इसलिए इंसान की गलतियों और कमियों को देखने की बजाय उसकी अच्छाइयों को देखना जरुरी है। अगर हम छोटी-छोटी बातों पर मन में बैरभाव लेकर बैठ जायेंगे तो सबसे ज्यादा नुकसान हमारा ही होगा।

किसी को क्षमा करके हम सबसे बड़ा उपकार खुद पर करते हैं, क्योंकि हमारे अन्दर पल रही नफ़रत, द्वेष और घृणा दूसरे को तनिक भी क्षति नहीं पहूँचाती बल्कि हमारे स्वयं के लिए विष का कार्य जरुर करती है। जब तक हम क्षमा नहीं करते तब तक हम नकारात्मक विचारों का बोझ अपने दिल और दिमाग पर ढ़ोते रहते हैं। क्षमा करना स्वयं को इस बेवज़ह के बोझ से मुक्ति प्रदान करना है। क्षमा करने से क्षमा पाने की तुलना में ज्यादा ख़ुशी और हल्कापन महसूस होता है।

खुद को अक्सर माफ़ नहीं कर पाती इसलिए आज क्षमा दिवस के अवसर पर सबसे पहले मेरी क्षमा खुद से है। उन सभी गलतियों के लिए मैं खुद को माफ़ करना चाहती हूँ, जिन्होंने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मुझे, मेरे व्यक्तित्व और मेरे चरित्र को क्षति पहुँचाई हो, इस संकल्प के साथ कि भविष्य में उनका दोहराव नहीं होगा। इसके पश्चात् मैं इस सृष्टि के समस्त जीवों से क्षमा याचना करती हूँ, जिन्हें भी मेरे शब्दों, मेरे व्यवहार या मेरे किसी भी कार्य से ठेस पहुंची हो। साथ ही जिन्होंने भी मेरा दिल दुखाया है, उन सबके प्रति मन में उपजे नकारात्मक विचारों का त्याग करने की मैं सच्चे दिल से पूरी कोशिश करुँगी। क्षमत क्षमापना! मिच्छामी दुक्कड़म्!

Monika Jain 'पंछी'
(09/2013)

September 1, 2013

Poem on Forgiveness in English

Let's Forgive Each Other

Forgiveness blossom flowers of love
Forgiveness melt prong of hate
The effect of forgiveness is such that
Enemies hug each other and become friends.

As much as this word is beautiful
its presence is equally fine
Forgiveness cleans
every single corner of our mind.

To apologize and to forgive
makes a complete personality
Ego doesn't stay
in the presence of sorry.

By not forgiving others mistake
we are doing injustice with ourself
We are moving with a heavy burden
remaining the offender of ourself.

So on the day of forgiveness
Let’s come together and forgive each other
Filth that is loaded in our heart
Let’s make it perfectly clear.

Monika Jain ‘Panchhi’
(09/2013)

To forgive and to ask for forgiveness, both need a courageous, sensitive, clean and a big heart. To apologize is not the sign of cowardice. In fact it destroys our ego. On the other hand to forgive is also the sign of nobility and greatness. Directly or indirectly both these things benefit us. The biggest favor by forgiving someone we do on ourselves. Because the hate, malice and envy dwells within us do not harm others but it definitely work as a poison for us. Forgiveness releases us from the captivity of these negative thoughts and their unnecessary burden. The thing which is most needed for us is to introspect, to become introvert, to recognize our mistakes, to accept them and to ask for forgiveness with a resolution that these mistakes will not be repeated in future. Behavior we expect from others should be our behavior towards others.