August 31, 2013

Poem on Religion in English

Find Your Lord

We spend millions of rupees
to make magnificent temples for god
But there are millions of people
who spend their whole lives on roads.

We offer to god variety of sweets
But there are many people
who don't have anything to eat.

We devote expensive clothes and jewelry to lord
But millions of people wear clothes
that are torn and old.

We are proud of our religion
But we never see that man
sitting on the road in isolation.

We take up swords in the name of religion
But we don't even notice that lady
struggling with her starvation.

Religious extremists are destroying
our peace, freedom and happiness
We should understand
what the religion originally desire from us.

Religious Hypocrites are developing
religion as a business
For their personal interests
they are dividing us.

We all the living beings are
constituent of five elements
kept alive by heat and light
Our source and destination is one
then why to choose different paths?

The message given by every religion
is of love and humanity
Then why this pomp and why this hypocrisy?

Love, peace, happiness and god all are within us
Sow the seeds of love and happiness
and reap again in tons.
Choose the true path of devotion towards god
Love every creature and you will truly find your lord.

Monika Jain 'Panchhi'
(31/08/2013)

Religious hypocrites have made the religion just a product to sell and market. This hypocrisy is making the people narrow minded and prejudice towards others and this is destroying our peace, freedom and happiness. We should understand the true meaning of religion. Love and humanity is the essence of all the religions. So by filling the heart with love for everyone and by following humanity we can become religious in true sense.

August 22, 2013

Poem on Diwali in Hindi


(1)

इस दिवाली

इस दिवाली दिया जलाना
प्रेम और विश्वास का
हर चेहरे पर झलके जो
बन मधुर गीत उल्लास का।

तेल स्नेह का भरती बाती
हर आँगन रोशन कर आती
काश! दिवाली की थाली
कुछ ऐसे सजायी जाती।

इस दिवाली मीठा करना
मुंह धरती से आकाश का
कोई रहे न भूखा-प्यासा
हर मुख हो चाँद उजास का।

धरती के तारों से रौशन
हो अम्बर भी इतराए
जब भूखा-नंगा हर बच्चा
भर किलकारी मुस्काए।

इस दिवाली खूब छुड़ाना
मन से बैर खटास का
हिल-मिल कर सब गीत सुनाना
सुकूं और मिठास का।

Monika Jain ‘पंछी’
(01/10/2016)


(2)

सार्थक दिवाली 
 (Published in India Link, Grand Rapids, Michigan)

अपने घर को तो हमने
चिरागों से रौशन कर दिया
दिये जलाए ढ़ेरों
और अमावस का सारा तम
पल भर में हर लिया।

माँ लक्ष्मी के स्वागत की
सारी तैयारी कर ली
मिठाई और मेवों से
पूजा की थालियाँ भर ली।

छोड़े ढ़ेर सारे पटाखे
और फुलझड़ियाँ
दोस्तों और रिश्तेदारों को दी
ढ़ेरों बधाईयाँ।

कर दी मीठे पकवानों की
थालियाँ खाली
लो मन गयी हमारी
एक और दिवाली।

पर न जाने कितने घर हैं
जहाँ आज भी दिया जला नहीं
न जाने कितनी हैं आँखें
जिनमें कोई ख़्वाब अब तक पला नहीं।

क्या सिर्फ अपने घर को रौशन कर देने से
दिवाली मन जाती है?
दिवाली है बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक
क्या सिर्फ लक्ष्मी पूजन से
हमारे कर्तव्यों की छुट्टी हो जाती है?

रौशन कर दो इस दिवाली
अपने-अपने अंतर्मन को
और हर लो उन सबके अंधरे
जो जीते हैं सुबह शाम तम को।
ताकि बन जाए उनकी भी ये शाम निराली
और मन जाए हमारी एक सार्थक दिवाली।

Monika Jain 'पंछी'
(22/08/2013)


Diwali is the festival of light, the symbol of victory of truth over lies. What can be the best way to celebrate this festival? I think the best way to celebrate deepavali is to light our soul first. There are many houses in our country filled with darkness. There are many people who even don’t have money to buy a single lamp. Isn’t our duty to share a little light with them also. It’s the best time to distribute happiness among needy ones. So let’s celebrate this deepawali in a unique and meaningful way. Wish you all a very Happy Deepawali.

August 18, 2013

Anjaan Ajnabi Shayari in Hindi

अजनबी / अनजान शायरी

(1)

फेसबुकिया आकर्षण की बस यही कहानी है
उसका लाइक नहीं आया मतलब पोस्ट ही बेमानी है। :’(
मेरी नहीं यह किसी और की कहानी है। :D

(15/02/2017)

(2)

चाहे तुम अजनबी बनकर ही रहो…
पर तुम्हारा होना तसल्ली देता है।

(22/04/2015)

(3)

जो तुम अजनबी ही रहते तो जिंदा होता मुझमें बहुत कुछ
तुम्हें जानने की कीमत मैंने खुद को खोकर चुकाई है।
कैसे माफ़ कर दूँ तुम्हें, कैसे भूल जाऊँ सब कुछ?
फितरत तो आज भी तेरी खुदगर्जी में लिपटी बेवफ़ाई है।

(28/06/2014)

(4)

अजनबी ही हैं सब इस दुनिया में मेरे दोस्त!
किसी को जान पाना उफ! एक उम्र भी काफी नहीं होती।

(18/08/2013)

(5)

इतना इंतजार ना कराओ अजनबी
कहकर तो जाओ गर जा रहे हो कहीं।

(6)

अक्सर ये भरोसे टूट जाते हैं
जो दिल के हैं करीब
फिर अजनबी बन छूट जाते हैं।

(7)

सच! कुछ लोग होते हैं जादूगर
हर पल को दीवाना बना जाते हैं
जाते हैं जब तो ऐसे जाते हैं
हमें खुद से भी अनजाना बना जाते हैं।

(8)

अपने नहीं बदलते कभी भी, कहीं भी
पर अफ़सोस कि अक्सर अपना कोई होता ही नहीं।

(9)

ख़्वाब बुनना कब का भुला चुके हैं
अपने और अजनबी का भेद हम मिटा चुके हैं
अब तो हर अपना अजनबी और हर अजनबी है अपना
किसी को खास बनाने का अब रहा ना कोई सपना।

(10)

तुम जब भी मिलो तो अजनबी बनकर ही मिलो
ये जान-पहचान मुझसे अब हो ना पाएगी
टूटे सपनों की किरचे अब तक चुभी हैं आँखों में
नयी उम्मीदें फिर से पाली ना जायेगी।

(11)

तुम कहते हो तो कर लेते हैं
उस अजनबी से हम बात
पर डरते हैं अब अजनबियों से
इस मासूम दिल के जज्बात।

(12)

चलो फिर से अजनबी बन जाएँ हम
गिले-शिकवे सारे भूल जाएँ हम
शुरुआत करे एक नयी दोस्ती की
हुई जो गलतियाँ वो फिर ना दोहराएँ हम।

(13)

अजनबी में अपनापन हम भी तलाशते हैं
जीने की आरजू को कुछ यूँ तराशते हैं।

(14)

अपनों की कमी कुछ यूँ छिपा लेती हूँ
किसी अजनबी को देखकर मैं मुस्कुरा लेती हूँ।

Monika Jain ‘पंछी’

August 7, 2013

Story on Parents in Hindi

नया घर

नौकर ने आकर शमशेर सिंह को बताया कि आपसे कोई मिलने आया है। शमशेर सिंह ने दरवाजे की ओर देखा तो उनके दफ़्तर का एक साथी मिठाई का डिब्बा और निमत्रंण पत्र हाथ में लिये खड़ा था। अपने मित्र से बातचीत करते हुए मालूम हुआ कि उसने अपना नया घर बनाया है और उसी के लिये न्योता देने आया है। शमशेर सिंह ने अपना दिल खोलते हुए उससे कहा कि मैं भी अगले साल रिटायर हो रहा हूँ, लेकिन मैने तो अभी तक अपना घर बनाने के बारे में सोचा ही नही। शमशेर सिंह जी के बेटे और बहू ने कहा कि हम तो आपसे कई बार कह चुके हैं कि आप भी जल्दी से अपना एक नया घर बना लो। जब तक आप नौकरी में हो तब तक घर बनाने में किसी किस्म की कोई परेशानी नहीं होगी। उसके बाद तो कई लोग टांग अड़ाने के लिये खड़े हो जाते हैं। शमशेर सिंह ने अपने बेटे से कहा कि आज कल घर बनाने के लिये बहुत सारे पैसों की जरूरत पड़ती है। बेटे ने झट से कह दिया कि आप एक बार आवाज तो दे कर देखो, बैंक वाले घर आकर कर्ज दे जायेंगे। आपको किसी प्रकार की जोड़-तोड़ करने की जरूरत ही नहीं। इसी बात को लेकर उनकी पत्नी ने भी दबाव बनाना शुरू कर दिया। भोले-भाले शमशेर सिंह जी अपनी पत्नी और बच्चो को खुशियाँ देने के लिये उनकी इस मांग के आगे झुक गये। 

अगले दिन से ही बेटे ने कुछ लोगो से सलाह-मशविरा करते हुए घर बनवाने का काम शुरू करवा दिया। घर बनाने के लिये बैंक से मोटा कर्ज भी शमशेर सिंह ने लेकर अपने बेटे को दे दिया। जैसे-जैसे शमशेर सिंह जी का सेवानिवृत्ति का समय नजदीक आने लगा, बेटे ने काम और तेज करवा दिया ताकि सरकारी बंगला छोड़ कर सीधा अपने घर में ही प्रवेश किया जा सके। एक दिन अचानक बैठे हुए शमशेर सिंह ने अपनी पत्नी से कहा कि हम लोग कई सालों से घूमने नही गये। अगर तुम चाहो तो रिटायर होने से पहले हम सरकारी खर्चे पर घूमने जा सकते हैं। बहू और बेटे ने कहा कि नेकी और पूछ-पूछ। इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है। जब तक आप लोग घूम-फिर कर वापिस आओगे तब तक घर भी बन कर तैयार हो जायेगा। उसने झट से एक ट्रैवल एजेंसी से कह कर उनका बढ़िया सा घूमने का प्रोग्राम बना दिया। टूर के दौरान बहू-बेटे से घर बनने के बारे में बात लगातार होती रही। कुछ समय बाद जब शमशेर सिंह जी अपना टूर पूरा करके वापिस आये तो अपने आलिशान घर को देख कर फूले नही समा रहे थे। अच्छे से सारे घर को निहारने के बाद इन्होने घर में प्रवेश किया। 

घर की खूबसूरती देखने के बाद शमशेर सिंह जी ने पूछा कि हमारा कमरा कौन सा है? बेटे ने कहा कि यह आप क्या कह रहे हो? सारा घर ही आपका है, आप अलग से कमरे की क्या बात कर रहे हो? बहू ने जब खाना खाने के लिये कहा तो शमशेर सिंह जी ने कहा कि मैं काफी थका हुआ हूँ। जरा पहले नहा लूं फिर आराम से खाना खायेंगे। इसी के साथ उन्होंने कहा कि जरा हमारा सामान हमारे कमरे में रखवा दो। इतना सुनते ही शमशेर जी का बेटा फोन का बहाना बना कर बाहर निकल गया। बहू भी कमरे के नाम पर टाल-मटोल करने लगी। शमशेर सिंह की पत्नी ने कहा कि क्या बात है? परेशान क्यूं हो रही हो? बहू ने घर के ड्राईवर को बुला कर इशारे से कहा कि इनका सामान घर के पीछे बने हुए कमरे में ले जाओ। इतना सुनते ही शमशेर सिंह जी और उनकी पत्नी के पैरों तले जमीन खिसक गई। बहू ने सफाई देते हुए कहा कि असल में जो कमरा आपके लिये बनाया था उसमें आपके बेटे ने अपना दफ़्तर बना लिया है। इस वजह से आपके लिये घर के पीछे अलग से एक कमरा बनवाना पड़ा है। सारी उम्र शानोशौकत के साथ सरकारी बंगले में राज करने वाले शमशेर सिंह जी चुपचाप घर के पिछवाड़े में नौकरों के लिये बने हुए कमरे में रहने के लिये चले गये। 

कमरे में दाखिल होते ही शमशेर सिंह की पत्नी ने उनसे कहा कि मैं सारी जिंदगी आपको समझाती रही हूँ कि इतने नर्म मत बनो नहीं तो एक दिन यह दुनियां आपको खा जायेगी। यह आपके सीधेपन का ही नतीजा है कि आज आपके अपने बहू-बेटे आपको इस तरह से नचा रहे हैं। शमशेर सिंह ने अपनी पत्नी को दिलासा देते हुए कहा लगता है, तूने वो कहावत नही सुनी कि अगर कोई आपका दिल दुखाए तो उसका बुरा मत मानो, क्योंकि यह कुदरत का नियम है कि जिस पेड़ पर सबसे ज्यादा मीठे फल होते हैं, उसी को सबसे अधिक पत्थर लगते हैं। शमशेर सिंह जी के धैर्य को सलाम करते हुए जौली अंकल उनके बेटे और बहू को बताना चाहते हैं कि मां-बाप तो वो अनमोल नगीने होते है जो हमें मुफ्त में मिलते हैं, मगर इनकी कीमत का उस दिन पता चलता है जब यह खो जाते हैं। आप लोगो ने जिस प्रकार छल-कपट करके अपने माता-पिता से उनका नया घर छीना है, उसके बदले में आज से ही सावधान हो जाओ क्योंकि बहुत जल्द आपका भी नया घर कोई न कोई आपसे छीन सकता है। 

Jolly Uncle
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August 1, 2013

Story on Knowledge in Hindi

भूल

ज्ञानप्रकाश जी आज तकरीबन 35-40 साल बाद अपने पौते के साथ शहर से पैतृक गांव जा रहे थे। रास्ते में पुलिस वाले ने उनकी गाड़ी को रोककर चालान कटवाने को कहा। ज्ञान प्रकाश जी ने कहा कि भाई हमसे क्या भूल हो गयी है? पुलिस वाले ने अपनी भाषा में डांटते हुए कहा कि अब तुम गलती नही करोगे तो क्या हम चालान काटने के लिये तुम्हारी गलती का इंतजार करते रहेंगे? जैसे-तैसे इस किस्से को निपटा कर गांव की जमीन पर कदम रखते ही उनकी आखों से आंसू बहने लगे। उनके पोते ने थोड़ा हैरान होकर अपने दादा से कहा कि क्या बात है? आपकी तबीयत तो ठीक है? आप बच्चो की तरह क्यूं रो रहे हैं? ज्ञान प्रकाश जी ने आखें साफ करते हुए कहा, ‘बेटा मेरा सारा बचपन इस गांव की मिट्टी में खेलते हुए बीता है।’ पोते ने कहा, ‘तो क्या हुआ, आप तो बहुत हिम्मत रखते हो, आप जैसे इंसान की आखों में आसूं अच्छे नही लगते।’ बातचीत करते-करते ज्ञानप्रकाश जी की नज़र सामने लगे हाई स्कूल के बोर्ड पर पड़ गयी। चंद पल उसे अच्छे से निहारने के बाद ज्ञानप्रकाश जी ने अपने पोते से कहा कि बेटा मैंने अपनी स्कूल की सारी पढ़ाई इसी स्कूल से की थी। मैं जब इस स्कूल से पढ़ाई पूरी करके निकला था तो उस समय कभी सोचा भी नही था कि दौबारा इस गांव मे इतने अरसे तक आना ही ना होगा।

यदि तू बुरा न माने तो कुछ देर इस स्कूल के अंदर घूम आयें। पोते ने कहा, ‘लेकिन अब आपको यहां कौन पहचानता होगा? खामख्वाह अंदर जाकर समय बर्बाद करने वाली बात है।’ ज्ञानप्रकाश जी ने कहा, ‘एक बार अंदर जा कर स्कूल देखने का बहुत मन कर रहा है।’ दादा के कहने पर उनका पोता उन्हें अंदर ले गया। ज्ञानप्रकाश जी थोड़ी देर इधर-उधर घूमने के बाद सीधा प्रिंसिपल के कमरे की ओर बढ़ गये। दरवाजे पर चपरासी ने रोकते हुए कहा कि साहब अभी मीटिंग में है, आप थोड़ा इंतजार करो। कुछ देर बाद प्रिंसिपल ने चपरासी को कह कर उन्हें अंदर आने को कहा। ज्ञान प्रकाश जी ने अपना परिचय देने के साथ बताया कि समाज की बेहतरी के लिये वे कहानियां और अनेक किताबे लिख चुके हैं। प्रिंसिपल ने कुछ मशहूर पुस्तकों के नाम लेकर जब पूछा कि क्या यह सारी आपकी ही लिखी हुई है? ज्ञानप्रकाश जी के हां कहते ही प्रिंसिपल साहब अपनी कुर्सी छोड़ कर उनके पैर छूने के लिये आगे आ गये।

ज्ञानप्रकाश जी ने भी आशीर्वाद देते हुए कहा कि आप जैसे अध्यापक को यहाँ देख कर सच में मन बहुत खुश हो गया। प्रिंसिपल ने हाथ जौड़ कर ज्ञानप्रकाश जी से कहा, ‘मैंने तो कभी सपने में भी नही सोचा था कि जिस महान लेखक की पुस्तकें हम बरसों से बच्चों को पढ़ा रहे हैं उस महान लेखक से अचानक इस तरह से मुलाकात हो जायेगी।’ इतनी देर में चाय-नाश्ता आ गया। चाय पीते-पीते प्रिंसिपल ने ज्ञानप्रकाश जी से कहा, ‘आपकी किताबों को एक नज़र देखते ही कोई भी कह सकता है कि आपने जिंदगी को बहुत ही करीब और अच्छे से समझा है। अगर आपकी इजाजत हो तो मैं आपसे एक बात जानना चाहता हूँ।’ ज्ञान प्रकाश जी ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा, ‘आपके मन में जो कोई भी शंका हो आप खुलकर मुझ से बात कर सकते हैं।’ प्रिंसिपल ने कहा, ‘जीवन में सब कुछ पा लेने के बाद भी ऐसी कौन सी चीज है जो हमें चैन से नही रहने देती?’ बिना एक पल की देरी किये ज्ञान प्रकाश जी ने प्रिंसिपल साहब को कहना शुरू किया, ‘हमारी छोटी-छोटी गलतियां ही हमें जीवन में सबसे अधिक परेशान करती है। हम लोग अक्सर भूल कर बैठते हैं, जब हम यह मानने लगते हैं कि हम सब कुछ जानते हैं। जबकि असलियत तो यह है कि दुनियां में कोई भी इंसान ऐसा नही है जो सब कुछ जानता हो। इसी के साथ हमें यह नही भूलना चाहिये कि हर इंसान कुछ न कुछ जरूर जानता है। आमतौर पर हम एक और बड़ी भूल यह करते हैं कि हम किसी भी बात को आधा-अधूरा सुनते हैं, उसके चौथाई हिस्से को भी ढंग से नही समझते और उस बात पर बिना विचार किये झट से अपनी प्रतिक्रिया देने लगते हैं।’

अब प्रिंसिपल साहब ने कहा कि इस परेशानी से बचा कैसे जा सकता है? ज्ञान प्रकाश जी ने अपने ज्ञान का खज़ाना खोलते हुए कहा, ‘भूल छोटी हो या बड़ी उसे सुधारने का एक मात्र तरीका यही होता है कि उस विषय के बारे में पूर्ण रूप से ज्ञान प्राप्त किया जाये। वैसे सही समय और समझ दोनो एक साथ खुशकिस्मत लोगों को ही मिलते हैं। इतना तो आपने भी देखा होगा कि अक्सर समय पर समझ नही आती और समझ आने तक समय निकल जाता है। इसलिये जीवन में कभी भी दूसरों के दोष और कमियां ढूंढने की भूल मत करो, क्योकि जब तक आप ऐसा करते रहोगे उस समय तक आप किसी दूसरे की भूल तो क्या अपनी भूल भी नही सुधार पाओगे।’

ज्ञान प्रकाश जी से ज्ञान की झलक पाने के बाद जॉली अंकल को तो यही ज्ञान समझ आ रहा है कि उम्र भर यही भूल हम करते रहे हैं , धूल तो थी चेहरे पर और हम आईने को साफ करते रहे।

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