December 28, 2014

Quotes on Ego (Attitude) in Hindi

Ego (Attitude) Quotes

  • 18/02/2017 - जिन्हें ना कहने का घमंड होता है...उन्हें हाँ न कह पाने का पछतावा भी होता है।
  • 17/01/2017 - अगर निर्दोषिता के चरम पर पहुँचे सिद्ध जनों और मासूमियत के चरम पर विद्यमान प्रकृति जैसे पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, बच्चों...आदि के समक्ष भी हमारा अहंकार छोटा नहीं पड़ता तो समझो समस्या बहुत बड़ी है...बहुत बड़ी है। 
  • 24/12/2016 - आप मात्र शब्दों की पोटली लेकर घूमेंगे और चाहेंगे कि विमर्श हो...नहीं हो पायेगा। दरअसल वहां चाहत विमर्श की होती भी नहीं, अहंकार बस येन-केन-प्रकारेण जीतना चाहता है।
  • 03/10/2016 - 'मेरा' से 'मैं' का रास्ता...कितनी मुश्किलों का वास्ता...रोज ही भटक जाते हैं।
  • 10/08/2016 - अहंकार ध्यानाकर्षण चाहता है। इसलिए वह मोह-घृणा, मित्रता-शत्रुता दोनों के साथ सहज रहता है। लेकिन तटस्थता उसे असहज और बैचेन करती है। यही कारण है कि ध्यानमग्न महावीर के कानों में भी कीले ठोक दिए जाते हैं और अकारण मुस्कुराते बुद्ध के मुंह पर भी थूक दिया जाता है। 
  • 07/07/2016 - अहंकार इतने सूक्ष्म छिद्रों से हमारे भीतर प्रवेश कर जाता है कि हमें खुद पता नहीं चलता। यहाँ तक कि अहंकार न होने का अहंकार भी निर्मित हो सकता है। कभी-कभी हमें पता भी होता है पर हम इग्नोर कर जाते हैं। वस्तुत: हमारे होने का कारण अहंकार ही है। हाँ, जहाँ भी जरा सा अतिरेक होता है, यह दूसरों को स्पष्ट नज़र आने लगता है। लेकिन मिथ्यादृष्टि से सम्यकदृष्टि की इस यात्रा में इतने असंख्य स्थान हैं कि हम अहंकारी-निरहंकारी, सज्जन-दुर्जन, अच्छा-बुरा जैसे वर्गों में विभाजन कुछ समझने-समझाने की दृष्टि से तो कर सकते हैं (क्योंकि भाषा के पास और कोई तरीका नहीं) लेकिन किसी के बारे में निष्कर्ष बनाने की इस दृष्टि से हमें जितना संभव हो बचना चाहिए।
  • 05/07/2016 - सबसे गहन बातों के अनर्थ सबसे अधिक होते हैं। क्योंकि अहम् अक्सर यह स्वीकारना नहीं चाहता कि समझ नहीं आया।
  • 16/04/2016 - अहंकार श्रेय नहीं देता, वह सब कुछ अधीन कर लेना चाहता है।
  • 13/02/2016 - अक्सर कोई व्यक्ति किसी बात को उतना और उस तरह ही बताता है जिससे उसका स्वार्थ और अहंकार संतुष्ट हो सके। लेकिन हमेशा याद रखें...आधा सच...पूरा झूठ होता है। 
  • 02/02/2016 - प्रेम ही समाधान है और प्रेम के मार्ग की सिर्फ एक ही बाधा है - अहंकार (मैं का विस्तार)। काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष...सभी अहंकार के ही उप उत्पाद हैं। 
  • 27/01/2016 - जब तक भावनाएं आहत होती रहेगी तब तक सीखना बाधित रहेगा। जब तक महापुरुषों को हम अपनी-अपनी संपत्ति मानकर चलेंगे तब तक उनके विचारों की हत्या करते रहेंगे। जब तक शब्द-शब्द में, भाव-भाव में, कर्म-कर्म में हम अपने अहंकार की तुष्टि खोजते रहेंगे तब तक धर्म से दूर रहेंगे। 
  • 31/08/2015 - एक पुरुष के अहंकार को कभी अनजाने में भी चोट पहुँच जाती है तो वह चोट पहुँचाने वाले के लिए फिर कभी पहले वाला पुरुष नहीं रहता। एक स्त्री का मन जब बुरी तरह छलनी हो जाता है तब वह किसी के लिए भी पहले वाली स्त्री नहीं रहती, खुद के लिए भी नहीं।
  • 06/07/2015 - जो अहंकार या भय के वशीभूत होकर हुआ है वह त्याग नहीं हो सकता। वह तो अहंकार और भय की पकड़ हुई। त्याग (छूटना) साहसी और संवेदनशील ह्रदय का काम है। त्याग दृश्य और अदृश्य को छोड़ने और उनके साथ होने, दोनों में हो सकता है। महत्वपूर्ण बस यह है कि छोड़ा क्या जा रहा है और पकड़ा क्या जा रहा है और दोनों कार्य किये क्यों जा रहे हैं। 
  • 28/05/2015 - अपने अहंकार को ताक पे रखकर जब हम अपनी गलती स्वीकार करते हैं, उसकी जिम्मेदारी लेते हैं, उसे न दोहराने का संकल्प लेते हैं तो यकीन मानिए हम कुछ अच्छा बुन रहे होते हैं।
  • 17/03/2015 - देने का अहंकार कभी इतना ज्यादा न हो कि जो मिल रहा है उसका मूल्य ही समझ न आये। देने के साथ अहंकार शुन्यता और ग्रहण करने के साथ कृतज्ञता न हो तो दोनों ही महत्वहीन है। 
  • 28/12/2014 - 'मेरी पोस्ट पर लाइक और कमेंट ना करने वालों को फ्रेंडलिस्ट से बाहर कर दूंगा/दूंगी।' बड़े-बड़े लोगों के ये बच्चों वाले स्टेटस पढ़कर सच बहुत हँसी आती है। 
  • कोई भी मुद्दा हो सब अपनी अनुकूलताएँ खोजते लगते हैं। हर एक को खुद को सही सिद्ध करना है, अपने सभी विरोधाभासों के साथ और दूसरे को गलत सिद्ध करना है उसके सभी विरोधाभासों के कारण। बस मुद्दे बदलते रहेंगे और वक्तव्यों की अदलाबदली जारी रहेगी। चंद शब्दों और प्रतीकों का मोह इतना ज्यादा है कि उन्हें बचाने के लिए सारे अर्थ अनर्थ हो जाए फर्क नहीं पड़ता। यह सिर्फ और सिर्फ अहंकार की लड़ाई है। बाकी जिस चीज का बचना जरुरी है वह तो सिर्फ ह्रदय में ही बच सकती है...और कोई स्थान उसके लिए है ही नहीं।
  • कुछ पाठक इतने अच्छे लेखक होते हैं कि पोस्ट को पढ़ने से पहले ही अपने विचार रख देते हैं। :) बतौर पाठक अगर हम अपने विचार रखना चाहते हैं तो सबसे पहले पोस्ट को ध्यान से पढ़ना और जिस सन्दर्भ में वह लिखी गयी है, उसे समझने का प्रयास करना जरुरी है। सन्दर्भ तक हम न पहुँच पायें इसकी सम्भावना है। किसी और सन्दर्भ तक हम पहुंचे इसकी भी पूरी सम्भावना है। ऐसे में हम विचार जरुर रखें लेकिन इस तरह से नहीं की वह थोपना या हावी होना लगे। विमर्श विनम्रता के धरातल पर हो...अहंकार के धरातल पर नहीं। 
  • जिन व्यक्तियों की चर्चा का एकमात्र उद्देश्य येन-केन-प्रकारेण जीतना हो, उन्हें जीतने दिया जाना चाहिए। वैसे गंभीर स्थिति होने पर उनके युद्ध का मैदान गायब भी किया जा सकता है।
  • भावुकता और जागरूक संवेदनशीलता का अंतर अहंकार और निरहंकारिता का अंतर है।
  • 'मैं', 'मेरा', 'मुझे' सिर्फ एक भ्रम ही तो है, जिसमें गुजर जाती है सारी ज़िन्दगी। सोचकर देखें तो क्या अस्तित्व है अकेले 'मेरा', 'मैं' या 'मुझे' का? यूँ तो ये जीवन भी 'मेरा' नहीं। अकेले से बन सकता है किसी का जीवन भला? और ये शब्द...ये भी तो उधार के ही हैं। फिर भी 'अहम्' के मारे 'मैं', 'मेरा' और 'मुझे' पीछा नहीं छोड़ते।

Monika Jain ‘पंछी’

December 8, 2014

Understanding Quotes in Hindi

Understanding Quotes

  • 26/03/2017 - तुम्हारी अपने प्रति अकारण चिढ़, नेगेटिव वाइब्स और पूर्वाग्रहों को प्रेम, सहजता और समझ में बदलने की कीमियागिरी मैं न सीख पायी। सारे प्रयास विफल। फिर याद आया कि प्रयास थे इसलिए विफल होने ही थे। कुछ जगह अप्रयास ही हो जाना पड़ता है। फिर सफलता या विफलता का कोई प्रश्न शेष ही नहीं रहता। वैसे भी जिस दिन कोई खुद को समझ लेगा उस दिन वह सबको ही समझ लेगा।
  • 14/03/2017 - बहुत मुश्किल होता है वह समय जब आपको ऐसी चीजें नज़र/समझ आने लगती है जो सामान्यत: औरों को नज़र/समझ नहीं आ रही होती है।
  • 08/03/2017 - 100 में से 99 बार दूसरों की बचकानी प्रॉब्लम्स सुनो। उन्हें आत्महत्या से रोको। उन्हें डिप्रेशन में जाने से रोको। और जब एक बार गलती से भी खुद की किसी सीवियर प्रॉब्लम का जिक्र करने का मन हो तो एक तरफ से किताब कहेगी - तुम्हें सहारा क्यों चाहिए? और दूसरी तरफ से आवाज़ आएगी - तुम्हें सहानुभूति क्यों चाहिए? मतलब बच्ची की जान ही ले लो। क्यों जो समझता है हमेशा बस उसी से और ज्यादा समझ की उम्मीद होती है? :/
  • 31/12/2016 - कभी-कभी मेरा संक्षेप में लिखना बहुत कुछ स्पष्ट नहीं कर पाता। लेकिन वह एकदम सहज अभिव्यक्ति होती है इसलिए अभिव्यक्त हो जाती है। व्याख्या और विस्तार के लिए आप कॉमेंट्स देख सकते हैं और जो वहां नहीं है उस पर विमर्श कर सकते हैं। इसके अलावा किसी को भी पढ़ते समय हम सन्दर्भ समझने की कोशिश करें, भाषा की सीमा के चलते यह जरुरी है। यह सीमा ऐसी है कि किसी विषय पर आप 1000 पन्ने लिख दोगे तब भी यह बनी ही रहेगी। 
  • 24/12/2016 - बहुत सी ऐसी चीजें हैं जो समझ आती है पर समझाई नहीं जा सकती। कोई तरीका ही नहीं। बस एक सांकेतिक कोशिश हो सकती है। तब भी समझेंगे वही जो उस अनुभूति के धरातल पर उतरेंगे...कि शब्द पूरे नहीं पड़ते।
  • 11/08/2016 - स्मृतियों की तुलना में समझ पर निर्भरता का बढ़ते जाना ही वास्तव में बड़े होना है।
  • 03/07/2016 - ओशो, सद्गुरु, महावीर, बुद्ध, कृष्ण...बहुत थोड़ा पढ़ा है, पर सभी को पढ़ते हुए जो मूल, गहन और सूक्ष्म बात है, उसमें हमेशा समानता ही पायी है। और इस समानता को महसूस कर पाना भी एक अद्भुत अनुभव है। अगर अंतर है तो सिर्फ रास्तों में है, तरीकों में है...और ये रास्तें और तरीके भी कई तरह से ओवरलैप कर जाते हैं। बस हर व्यक्ति अनूठा है इसलिए उसे अपनी क्षमताओं, रूचि और परिस्थितियों के अनुरूप अपना रास्ता चुनना होता है। जिसका इस बात से अधिक सम्बन्ध नहीं कि आप किस धर्म के टैग के साथ जन्मे हैं। सबको पढ़िए लेकिन पूर्वाग्रहों और अहंकार से थोड़ा मुक्त होकर। हर जगह बहुत कुछ अच्छा मिल जाएगा, बस उद्देश्य अच्छा तलाशने का होना चाहिए। जिसे विवेक गलत कहता हो, उसे पकड़ने की जरुरत है ही नहीं। इसके अतिरिक्त व्यक्ति भौतिकवादी हो, आध्यात्मिक हो, कट्टर हो, समाज सुधारक हो या कुछ भी...तलाश सभी की एक ही है। अंतर बस इतना ही है कि कुछ भटक रहे हैं, कुछ संभल रहे हैं, कुछ संभल कर भटक रहे हैं। बहुत थोड़े से लोग होते हैं जो भटक कर फिर संभल जाते हैं और सँभलने के बाद फिर नहीं भटकते। मंजिल सभी की एक ही है फिर ये इतनी समस्याएं क्यों आती है? समस्या सिर्फ हमारी ग्रहणशीलता में है, और कहीं भी नहीं। हाँ, इस समस्या के कारण कई सारे हो सकते हैं। 
  • 29/01/2016 - तुम्हें कोई समझेगा...ये अपेक्षा ही बेमानी है। शायद तुम जन्मी ही हो सबको समझने के लिए। (बहुत दिनों से इंतजार में था...आज आखिर छलक ही आया। :’( ) 
  • 28/01/2016 - पढ़ो कम...समझो ज्यादा।
  • 09/02/2015 - ये समझदार और ब्रेव होने का जो ठप्पा होता है न!...कभी-कभी दिल करता है इसे उतार फेंके। क्योंकि ये समझदार और ब्रेव होना कितनी भी बड़ी समस्या हो या कोई भी दूसरी बात, लोगों को हमारे प्रति एकदम निश्चिन्त और बेफिक्र बना देता है : that you are brave and sensible so you can handle anything. पर कभी-कभी (बस कभी-कभी ही) मन करता है काश! हम भी गुस्सैल, जिद्दी, मूडी, बात-बात पे बिगड़ने वाले दुष्ट बच्चों की तरह अपनी हर बात मनवाने वाले होते तो लोगों को हमारी कितनी फ़िक्र होती। समझदार और ब्रेव होकर तो कभी-कभी रो भी नहीं पाते ठीक से। 
  • मानवीय झगड़ों में एक ही दिशा के प्रभाव तो सामान्य हैं : जैसे एक विनम्र और शांत हुआ तो दूसरा भी शांत हो गया। लेकिन ये विपरीत प्रभाव जैसे : जब-जब एक विनम्र और मौन होता है तो दूसरे का अहंकार और झूठ सातवें आसमान पर चढ़ जाता है, यह थोड़ा जटिल मामला है। पहले केस में प्रभावित व्यक्ति थोड़ा सरल जान पड़ता है। लेकिन दूसरे केस में प्रभावित व्यक्ति ग्रंथियों से युक्त मस्तिष्क लगता है। हालाँकि प्रभावों का जीवन सही जीवन नहीं। हम सामान्य व्यक्ति इससे अछूते रह भी नहीं पाते। लेकिन अगर किसी का हर एक कार्य केवल सामने वाले से ही प्रभावित हो रहा है, चाहे वह एक ही दिशा में हो या विपरीत दिशा में तो वहां खुद की समझ तो पूरी तरह से नदारद है। स्पष्टता, समझ और आत्मविश्वास के लिए सम्यक दृष्टि की जरुरत होती है। यह किताबों से या बाहरी प्रभाव से नहीं मिलती। बाह्य साधन समझ के बढ़ने में सहायक अवश्य हो सकते हैं। लेकिन अंतत: स्पष्टता भीतर से ही आती है। 
  • ज्यादातर पोस्ट्स पर कमेंट करने के लिए मेरे पास कुछ होता ही नहीं है। जो बात पसंद आ जाती है या जिससे सहमति अधिक हो उसे लाइक कर देती हूँ। जिससे सहमति कम या न हो उसे छोड़ देती हूँ। बहस या चर्चा में पड़ने के सार्थक परिणाम नगण्य ही देखे हैं। क्योंकि अधिकतर यह अहंकार और हार-जीत का प्रश्न बन जाता है। सार्थक और सीखने के उद्देश्य से की गयी चर्चा वाली परिपक्वता का नितांत अभाव दिखाई पड़ता है। ऐसे में उस क्षण या स्थान विशेष पर अपनी सोच को थोपने की बजाय समझ बढ़ने का समुचित वातावरण पाना और देना अधिक उचित है।
  • सामान्यत: दुनिया में ऐसी कोई चीज नहीं होती जिसका अपवाद नहीं होता। इसलिए व्यर्थ की बहस करने से बेहतर है, अपवादों को हमेशा समाहित माना जाये। हर बार लिखना जरुरी नहीं न 'अपवादों को छोड़कर।' 
  • हर वह पीड़ा जो हमने अतीत में सही...भविष्य उस पर हँस रहा होता है या आज जिन बातों के लिए हम परेशान हैं, कल हम उन पर हंसने वाले हैं। जरुरत बस इस भविष्य के वर्तमान बन जाने की है।

Monika Jain ‘पंछी’

December 5, 2014

Essay on Education System of India in Hindi

और भी लाखों तरीके हैं

भाषा व्याकरण और वर्तनी सम्बन्धी अशुद्धियाँ हममें से अधिकांश लोग करते हैं। कुछ कम, कुछ ज्यादा। अशुद्धियाँ करने वालों का मजाक उड़ाती फेसबुक पोस्ट्स भी कई बार देखी है। यहाँ तक कि यह भी लिखा देखा है कि अशुद्ध लिखने से बेहतर है लिखा ही न जाए। इससे ज्यादा नकारात्मक और निराशवादी कथन और क्या होगा? यह बिल्कुल ऐसा ही है कि अगर आप हकलाते हैं तो बोलना बंद कर दें; लंगड़ाते हैं तो चलना बंद कर दें; कम नज़र आता है तो देखना ही बंद कर दें।

हममें से कईयों की प्रारंभिक शिक्षा ऐसे विद्यालयों में हुई है, जहाँ ये कभी बताया ही नहीं गया कि विराम चिह्न, अनुस्वार, नुक्ता आदि किस बला का नाम है। कहाँ और कैसे इनका प्रयोग करना है। बताया जाता भी कैसे? जिनसे अपेक्षा थी, वे या तो बड़े आलसी थे या फिर उन्हें खुद इनका सही प्रयोग नहीं मालूम था। मतलब यह समस्या अधिकांश मामलों में व्यक्ति विशेष की नहीं, एक तंत्र की है। कमजोर शिक्षा तंत्र की। जिसे केवल ठहाके लगाकर तो कभी भी नहीं सुधारा जा सकता।

कुछ समय पहले पड़ोस में रहने वाली एक 6th क्लास की स्टूडेंट ने बताया कि उनका हिंदी विषय में शब्दार्थ का क्लास टेस्ट था। उसमें एक शब्द था विधाता, जिसका अर्थ वह भगवान लिखकर आ गयी तो उनकी टीचर ने यह कहते हुए गलत कर दिया कि किताब में तो ईश्वर दिया हुआ है और तुम्हारा पर्यायवाची शब्दों का टेस्ट नहीं हो रहा है, शब्दार्थ का हो रहा है। इसलिए वही लिखना है जो किताब में लिखा है। ज्यादा आश्चर्य तो नहीं हुआ क्योंकि ऐसी घटनाएँ तो मैं भी पढ़ाई के दौरान बहुत बार झेल चुकी हूँ। जहाँ शिक्षक सही जवाब को गलत कर देते थे। क्लास के सबसे होशियार बच्चे को ब्लैक बोर्ड पर सबके लिए आंसर्स लिखने को कहकर आराम से कुर्सी पर पसर जाते थे। बच्चों से कॉपीज चेक करवाते थे। पढ़ाई के नाम पर सिर्फ और सिर्फ चैप्टर की रीडिंग। पर मैं एक छोटे से कस्बे की एक सरकारी हिंदी माध्यम स्कूल की छात्रा रही हूँ और ये जो वाकया है ये शहर की एक नामी स्कूल का है जहाँ बच्चों से फीस के नाम पर मोटी-मोटी रकम वसूल की जाती है। इसलिए थोडा आश्चर्य मिश्रित दुःख हुआ और समझ नहीं आया कि क्या कहूँ...हे ईश्वर!...हे भगवान्!...या हे विधाता!

इसी तरह एक बार घर के बाहर एक लड़की आई। मैंने पूछा क्या करती हो? वह बोली, 'बकरियाँ चराते हैं।' मैंने पूछा स्कूल नहीं जाती? उसने कहा, 'स्कूल तो छोड़ दी है। स्कूल वाले कौनसी नौकरी दे रहे हैं, जो स्कूल जाएँ। करना तो खेती और बकरियाँ चराने का काम ही है।' आगे मैं कुछ बोल नहीं पायी, क्योंकि जहाँ दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल हो, वहाँ पर बाल श्रम का विरोध और तथाकथित स्कूली शिक्षा की बातें बेमानी है। क्योंकि जो स्कूली शिक्षा दी जा रही है, वह शिक्षित बेरोजगारों की भीड़ बढ़ाने का काम जरुर कर रही है। ऐसे बेरोजगार जो खेती और पशुपालन के काम को अपने लायक नहीं समझते और सफ़ेद कॉलर वाली नौकरी पा नहीं सकते।

खैर! यह एक अलग मुद्दा है। लेकिन हाँ, बात अगर लेखन सम्बन्धी अशुद्धियों की हो तो बेहतर होगा कि सामान्य अशुद्धियों को इंगित करती हुई पोस्ट्स विद्वजन डालते रहें या फिर जहाँ अशुद्धि दिखे वहीं अशुद्ध और शुद्ध शब्द बता दिया जाए। यह भी जरुरी है कि जिनकी अशुद्धियाँ बतायी जा रही हैं, वे इसे अपने अहम् पर चोट का मसला न बनायें और सहर्ष गलतियों को सुधारने को तैयार रहें। समाज सेवा सिर्फ वृद्धाश्रम या अनाथाश्रम में जाकर फोटो खिंचवाने से ही नहीं होती, और भी लाखों तरीके हैं।

Monika Jain ‘पंछी’ 
(05/12/2014)

November 29, 2014

Makar Sankranti Story on Child Labour in Hindi

Makar Sankranti Story on Child Labour in Hindi
 हरी पतंग और लाल दुपट्टा
(राजस्थान पत्रिका, हेल्थ परिशिष्ट में प्रकाशित)

पतंगों का मौसम आ चुका था। आकाश में लाल, नीली, पीली, हरी, नारंगी ढेर सारे रंगों की पतंगें उड़ते हुए ऐसी लग रही थी, मानो इन्द्रधनुष के सारे रंग आकर आकाश में बिखर गए हों। इन रंगों की सोहबत में सारा आकाश खिलखिलाता सा नज़र आ रहा था। रेवड़ी, तिलपट्टी, मूंगफली, तिल के लड्डू सब थाली में लिए मैं भी छत पर पड़ौस के बच्चों के साथ पतंग उड़ाने पहुँच गयी। तभी छत से नीचे सड़क पर कई दिनों बाद एक चबूतरे पर बैठी रेवती नज़र आई। बड़ी उम्मीद भरी नज़रों से कभी वो आकाश में उड़ती पतंगों को देखती तो कभी मायूस होकर शून्य में ताकने लगती।

रेवती घर से थोड़ी दूर बने आधे कच्चे आधे पक्के घर में रहती थी। कुछ महीनों पहले तक तो जब उसकी माँ झाड़ू-बर्तन करने आती थी, अक्सर उसका घर में आना-जाना होता था। पर पिछले ही महीने उसकी माँ चल बसी। आसपास के लोग बताते हैं कि उसके शराबी पति ने एक रात उसे इतनी बेरहमी से पीटा कि अगली सुबह उसकी आँखें ही ना खुली और वह उस 12-13 साल की बच्ची को अकेला छोड़कर सदा के लिए चली गयी।

रेवती की माँ रेवती से बहुत प्यार करती थी। अक्सर उसकी ही बातें करती रहती थी। रेवती उसकी इकलौती संतान थी। मैं जब भी रेवती की पढ़ाई के बारे में पूछती तो वह बड़े उत्साह से कहती, ‘दीदीजी, रेवती को तो खूब पढ़ा लिखाकर बड़ी अफसरानी बनाना है। उसे ना मांजने पड़ेंगे यूँ घर-घर जाकर बर्तन। समझदार बड़े अफसर से ही उसका ब्याह भी रचाऊँगी। बेटी के जीवन में किसी बात की कमी ना होने दूँगी। चाहे उसके लिए दस घर और क्यों ना पकड़ने पड़े।’

रेवती की माँ का उत्साह देखकर बड़ा अच्छा लगता था। एक अनपढ़ गरीब औरत के दिल में अपनी बच्ची के लिए ऐसे सपने पलते देखकर दिल ख़ुशी से भर जाता। साथ ही ऊंची-ऊंची इमारतों में रहने वाले उन तथाकथित पढ़े-लिखे लोगों पर गुस्सा भी आता जो आज भी लड़की के जन्म पर उदास हो जाते हैं और कुछ तो जन्म से पहले ही उसे मृत्यु की गोद में सुला आते हैं।

रेवती पढ़ने में बहुत होशियार थी। मैं भी अक्सर रेवती को गणित और अन्य विषयों के प्रश्न हल करने में मदद करने लगी। दिल से यही चाहती थी कि रेवती की माँ की आँखों की जो चमक है, वह कभी फीकी ना पड़े। उसके सारे सपने सच हों। पर नियति को जाने क्या मंजूर था जो वो चमक भरी आँखें ही सदा के लिए मूँद गयी और उसके साथ ही रेवती को लेकर देखे सारे सपने भी सो गए।

रेवती की माँ के गुजरने के बाद उसके शराबी पिता ने उसकी स्कूल छुड़वा दी और उसे भी घर-घर जाकर बर्तन मांजने के काम में लगा दिया ताकि उसकी शराब के पैसे जुटाए जा सके। यह सब जानकर मुझे बड़ा दुःख हुआ। एक दिन मैंने रेवती से उसकी सभी कॉपी-किताबें घर मंगवा ली और उसे कहा कि काम के बीच में वह 1 घंटा यहाँ पढ़ने आ जाया करे और किसी को यह बात ना बताये। इससे पिता को शक नहीं होगा, वह यही समझेगा कि यहाँ भी काम करने ही आती है। कुछ दिन तो यह चलता रहा पर एक दिन अचानक उसके पिता को जाने कैसे ख़बर लग गयी और वह जब रेवती पढ़ रही थी तब आया और उसका हाथ पकड़कर पीटते हुए ले जाने लगा। मैंने रोकने की कोशिश की तो उसने रेवती की सारी कॉपी किताबें मुझे घूरते हुए मेरी आँखों के सामने ही माचिस की एक तीली लगाकर जला दी। मानो मुझे कह रहा हो, अब ना करना ऐसी जुर्रत!

उस घटना के कई दिन बाद तक रेवती नज़र नहीं आई। आज अचानक जब रेवती को चबूतरे पर अकेले बैठे देखा तो मन किया उससे बात करने का, उसका हाल पूछने का। यह सोचते हुए मैं कुछ तिल के लड्डू और रेवड़ियाँ एक अख़बार में लपेटकर नीचे आई और रेवती को अपने पास बुलाया। रेवती ने पहले डरते-डरते चारों ओर देखा और फिर दौड़कर मेरे पास आ गयी। मैंने उससे पूछा, ‘कैसी है रेवती? सुबह से कुछ खाया या नहीं?’ रेवती कुछ नहीं बोली। वह तो बार-बार बस आसमान में उड़ती पतंगों को देखे जा रही थी। मैंने उससे पूछा, ‘तुझे पतंग चाहिए?’ उसने बस सहमति में सर हिला दिया। मैंने उसे अख़बार में बंधे लड्डू और रेवड़ियाँ पकड़ाई और कहा, ‘तू पहले इसे खा ले, तब तक मैं लेकर आती हूँ पतंग!’ यह सुनकर रेवती लड्डू-रेवड़ियाँ लेकर तुरंत वापस उसी चबूतरे पर चली गयी और वहां बैठकर मेरे वापस आने का इंतजार करने लगी। मैं छत पर रखी पतंगों में से एक हरी रंग की पतंग और मांझा ले आई और रेवती को दे दिया। मैंने देखा रेवती ने तो अख़बार खोला तक नहीं था। वह तो बस पतंग के ही इंतजार में बैठी थी। मुझे लगा कुछ देर बाद खा लेगी और यह सोचकर मैं भीतर आ गयी।

करीब 1-2 घंटे बाद दरवाजे पर दस्तक हुई। मैंने देखा रेवती खड़ी थी। हाथ में वही पतंग और मांझा लिए हुए। मैंने कहा ये तेरे लिए ही है, तू इसे वापस क्यों लेकर आई है? तब रेवती बोली, ‘दीदीजी, मुझे पतंग उड़ाना नहीं आता। आप प्लीज इसे उड़ा देना और मेरी माँ तक पहुँचा देना। सब कहते हैं कि मरने के बाद लोग ऊपर आसमान में चले जाते हैं। माँ भी तो वहीँ होंगी न! आप बस उन तक ये पतंग पहुँचा दो।’ और यह कहकर वह पतंग मेरे हाथ में थमाकर दौड़ी-दौड़ी चली गयी। मैं हैरत से कुछ देर उसे देखती रही, फिर अचानक पतंग पर मेरी नज़र पड़ी, जिस पर बहुत कुछ लिखा था।

अरे! यह तो रेवती की लिखावट है। यह देखकर मैं उन शब्दों को पढ़ने लगी। ‘माँ! तू मुझे छोड़कर क्यों चली गयी? माँ तेरी बहुत याद आती है। सुबह जब बापू मार-मार कर उठाता है चाय बनाने के लिए तब चाय के हर एक उबाल के नीचे बैठने के साथ तू बहुत याद आती है। जब सुबह-सुबह आसपास के बच्चे स्कूल ड्रेस पहनकर बैग लेकर पढ़ने जाते हैं तो उनके हर एक बढ़ते कदम के साथ तू बहुत याद आती है। माँ, बापू जो भी मैं बनाती हूँ सब खा जाता है। मुझे हमेशा सूखी-ठंडी रोटियाँ खानी पड़ती है। तब हर एक कौर के गले में चुभने के साथ तू बहुत याद आती है। रात को बापू जब शराब पीकर लौटता है तब डर के मारे मैं गुसलखाने में छिप जाती हूँ, तब भी नल से टपकती हर बूँद के साथ तू बहुत याद आती है। माँ तेरे बिना नींद नहीं आती, हर बदलती करवट के साथ तू बहुत याद आती है। माँ, तू वापस आ जा न! या फिर मुझे ही अपने पास बुला ले। तेरे बिना एक दिन भी काटना बहुत मुश्किल है। तू बस वापस आ जा माँ!’

और यह सब पढ़ते-पढ़ते मेरी आँखों से आंसू बहने लगे। विश्वास नहीं हो रहा था यह 12-13 साल की उस मासूम बच्ची के शब्द थे, जो थोड़ी देर पहले मेरे सामने खड़ी थी। मैं दौड़कर बाहर गयी कि शायद रेवती बाहर ही हो, पर वह नज़र नहीं आई। तब मैं पतंग को लेकर छत पर गयी और जाने किस विश्वास में उसे उड़ाने लगी। देखते ही देखते पतंग दूर आसमान में पहुँच कर एक बिंदु की तरह चमकने लगी। डोर का आखिरी सिरा जो हाथ में था वह मैंने छोड़ दिया। कुछ देर पतंग को देखती रही और फिर बुझे मन के साथ नीचे आ गयी।

सुबह अचानक रेवती के घर के पास भीड़ देखी। पता चला रेवती का शराबी पिता बाहर मरा पड़ा था। एक के बाद एक यह सब घटनाएँ मुझे बहुत बैचेन कर रही थी। थोड़ी देर बाद छत पर कपड़े लेने गयी तो देखा शाम को जो पतंग उड़ाई थी उसकी डोर पास ही सूख रहे मेरे लाल दुपट्टे में अटकी हुई थी और पतंग अभी भी वैसे ही उड़ रही थी। शायद यह रेवती की माँ या ईश्वर का संकेत था कि मुझे अब रेवती के लिए बहुत कुछ करना था और यही सोचकर वह लाल दुपट्टा मैंने गले में डाला और रेवती के घर की ओर चल पड़ी।

Monika Jain ‘पंछी’
(29/11/2014)

November 18, 2014

Essay on Women's Rights in Hindi

Essay on Women's Rights in Hindi
मुझे पंख दे दो
(आधी आबादी में प्रकाशित)

पाना चाहती हूँ अपने हिस्से की धूप, छूना है मुझे भी आकाश, सजाने हैं इन्द्रधनुष के रंगों से ख़्वाब, बीनने हैं मुझे सागर की गहराई से मोती, करने हैं अनन्त आकाश पर अपने छोटे से हस्ताक्षर, बिखेरनी है चाँद की चांदनी चहुँ ओर, करना है ब्रह्माण्ड के रहस्यों का उद्गाटन, भरना है कई मुस्कुराहटों में जीवन, अपने उत्साह की किरणों से बनाना है मुझे सम्पूर्ण वातावरण को सजीव और मुखरित, लिखनी है मुझे अपने हाथों से अपनी तकदीर...बस मुझे मेरे पंख दे दो।

मेरी शक्ति, प्रखरता, बुद्धि, कौशल, सुघड़ता और सपने; मेरा स्वाभिमान और आत्मविश्वास...साँस लेने के लिए किसी और की अनुमति का मोहताज क्यों हों? क्यों बनाकर रखना चाहते हो सदा मुझे अपनी अनुगामिनी? क्यों रसोई और बिस्तर के गणित से परे तुम नहीं सोच पाते एक स्त्री के बारे में? मुझे नहीं चाहिए वह प्रेम जो सिर्फ वासना, शोषण, हिंसा, ईर्ष्या और आधिपत्य के इरादों से उपजा हो। मुझे नहीं चाहिए वह वहशी प्रेम जो एसिड फेंकने, बलात्कार, हत्या या अपहरण जैसे दुष्कर्मों से भी नहीं हिचकता। नफ़रत और दर्द देने वाला प्रेम मुझे नहीं चाहिए। मुझे चाहिए ऐसा प्रेम जो मुक्ति के आकाश में जन्मा हो, जिसमें स्वतंत्रता की सांस हो, विश्वास का प्रकाश हो, करुणा की धार हो; जो मेरी बातों, मेरे ख़्वाबों और मेरी मुस्कुराहटों में जीवन भर सके। मुझे प्रेम से भरा प्रेम चाहिए।

हमेशा से उस सहजता की तलाश में हूँ, जहाँ मुझे ये ना सुनना पड़े कि लडकियाँ ये नहीं करती, लडकियाँ वो नहीं करती। मुझे सिर्फ सकुचाती, सबसे नज़र चुराती, सदा अपना दुपट्टा संभालती युवती बनकर नहीं रहना है। क्यों मैं अकेली बेफिक्र होकर सड़क पर नहीं चल सकती? घर से लेकर कार्यस्थल तक कहीं भी तो मैं सुरक्षित नहीं। खाकी वर्दी हो चाहे संसद और न्यायपालिका में बैठे देश के कानून के निर्माता, किसी पर भी तो भरोसा नहीं कर सकती। क्या कभी मुक्त हो पाऊँगी मैं इस आंतक से...जो हर क्षण मेरे जीवन में पसरा हुआ है। कब बदलेगा मेरे प्रति समाज का नज़रिया? कब मिलेगा मुझे सुरक्षित माहौल?

मुझे मुक्ति चाहिए उस असहजता से, उस डर से जो मुझे अपने रिश्तेदारों, दोस्तों और पड़ोसियों पर भी विश्वास करने की इजाजत नहीं देता। मुझे मुक्ति चाहिए उस संकीर्ण सोच और कुप्रथाओं से जो मुझे हमेशा द्वितीय श्रेणी का नागरिक होने का आभास कराती है। मेरे साथ हर स्तर पर भेदभाव करती है। मेरा तिरस्कार करती है। मुझे अवसरों और उपलब्धियों से वंचित रखती है। मुझे पुरुषों की आश्रित और संपत्ति बनाकर रखना चाहती है। मत करो कन्याओं की पूजा, मत चढ़ाओं माँ को नित नया भोग!...बस ये सहजता ला दो, जहाँ खुद को एक इंसान समझकर हम भी खुलकर सांस ले सकें। हमें हमेशा ये याद न रखना पड़े कि हम लड़कियाँ हैं। मुझे माँ और बहन की तरह मत देखो। बस मुझे इंसान समझकर इंसानों सा व्यवहार करो। क्या ला सकते हो ऐसी सहजता? क्या दे सकते हो ऐसा आज़ाद जीवन?

कब मुक्ति मिलेगी मुझे इस बीमार समाज से जो सम्मान के नाम पर घिनौने मानक बनाकर जी रहा है। मुझे आज़ाद कर दो उन तालिबानी फरमानों से जो कभी मेरे कपड़ों को लेकर सुनाये जाते हैं, कभी मुझे मोबाइल रखने को प्रतिबंधित करते हैं तो कभी पुस्तकालय तक में मेरा प्रवेश निषेध करते हैं। धरती से अम्बर तक अपनी ख़ुशबू बिखेरने की ख्वाहिश रखते मेरे प्रेम को कब तुम कौम की कैंची से कुतरना बंद करोगे? कब बंद होगी जाति, धर्म, गौत्र और अपने झूठे सम्मान के अंधे नशे में मेरी और मेरे प्रेम की हत्या? कब?

मुझे मुक्ति चाहिए उस दकियानूसी सोच से जो मेरे शरीर की एक स्वाभाविक प्राकृतिक क्रिया को शुद्धता और अशुद्धता से जोड़कर मुझे अपवित्र करार देती है। क्यों मेरे शरीर के साथ मेरे दिल को छलनी कोई और करता है और इज्जत मेरी चली जाती है? और इतना होने के बाद भी क्यों मैं समाज के ऊटपटांग सवालों का सामना करूँ? क्यों? पहले मेरा बलात्कार, फिर उसके खिलाफ़ आवाज़ उठाने पर अपराधी जैसा व्यवहार! इतनी मानसिक प्रताड़ना और न्याय जीते जी मिल जाएगा इसका भी भरोसा नहीं। बदल डालो ये महज़ डिग्रीयां देने वाली पढ़ाई, जो इंसान को इंसान तक ना बना पायी।

कभी संस्कृति के नाम पर, कभी परम्पराओं के नाम पर, क्यों हमेशा मुझे ही अपनी इच्छाओं और सपनों को त्यागना होता है? जब-जब मैंने वर्जनाओं को तोड़ने की कोशिश की, पितृ सत्ता की बेड़ियों को काटना चाहा, रूढ़ियों और कुत्सित विचारों को मोड़ना चाहा, तब-तब तुम्हारी संस्कृति को ख़तरा महसूस हुआ। जरा से मेरे विद्रोह के स्वर उठे और तुमने मुझे कुल्टा, कलंकिनी, कुलनाशिनी के थप्पड़ जड़ दिए। मेरी जुबान पर जलते अंगारे रख दिए। तुम्हारी संस्कृति को ख़तरा तब क्यों महसूस नहीं होता, जब धर्म की आड़ में मेरी देह का व्यापार किया जाता है, जब दहेज़ की आग में मुझे झुलसा दिया जाता है, जब अंधविश्वासों से गिरा समाज एक विधवा, परित्यक्ता या अकेली औरत को चुड़ैल ठहराकर, उसकी पिटाई कर, उसका बलात्कार कर उसे मौत की सजा देने से भी नहीं हिचकिचाता।...तब तुम्हारी संस्कृति को ख़तरा क्यों नहीं महसूस होता? मुझे मुक्ति दे दो उन धर्म शास्त्रों से जो भरे पड़े हैं मात्र नारी की निंदा से। क्योंकि नहीं लिखा उन्हें किसी भी स्त्री ने।

तुमने मुझे शिक्षित और शक्ति संपन्न बनाने के कानून बनाये। कई सरकारी और गैर सरकारी संगठनों को जागरूकता लाने के लिए खड़ा किया। मेरी रक्षा के लिए कानून के नए समीकरण गढ़े। पर अभी तो मुझे जीवन पाने और जीने का अधिकार भी पूरी तरह से कहाँ मिल पाया है? मेरे लिए तो जन्म से पहले सुरक्षित रह पाना भी चुनौती बन गया है। क्यों मार देना चाहते हो मुझे जन्म से पहले ही कोख में? क्यों फेंक आते हो मुझे कचरे के ढेर में? क्यों कर देते हो कच्ची उम्र में मेरा ब्याह। एक ओर कन्या की पूजा करते हो और दूसरी ओर कन्या के जन्म को ही अभिशाप मानते हो। पैदा होते ही इस तरह मेरी अस्वीकृति और अपमान क्यों?

मुझे नहीं चाहिए वह स्त्री विमर्श जो साहित्य के नाम पर देह व्यापार कर रहा है, जहाँ मुझे बस माँस का टुकड़ा भर बनाकर रख दिया गया है। मुझे ‘मेड टु आर्डर’ व्यंजन बनाकर परोसा जा रहा है। जहाँ रेशमी जुल्फों, नशीली आँखों, छरहरी काया, दहकते होंठ और मादक उभारों से ज्यादा मेरा कोई अस्तित्व नहीं। मुझे नहीं चाहिए ऐसा स्त्री विमर्श!

मेरे सपनों को न जलाओ। चहारदीवारी की अकुलाहट, घुटन और छटपटाहट से मुझे आज़ाद कर दो। चुल्हा, चोका, बर्तन बस यही तो मेरा कर्म नहीं है न? मेरे चेहरे को ढ़ककर मेरी अस्मिता न नापो। मेरे अस्तित्व को छोटे-बड़े कपड़ों में न उलझाओ। मेरी इज्जत को किसी दुष्कर्मी के दुष्कर्मों से परिभाषित न करो। मेरा कार्य सिर्फ पुरुष को संतुष्ट करना और संतानोत्पत्ति कर संतानों का पालन पोषण करना नहीं है। तुम्हारे वंश को बढ़ाने वाले लड़के की चाह में मुझे बच्चों पर बच्चे पैदा करने वाली मशीन मत बनाओ। मैं कोई भिक्षा नहीं मांग रही। सिर्फ अपना हक़ मांग रही हूँ।

मेरे अहसास और जज़्बात भी स्वर पाना चाहते हैं। मेरी रचनात्मकता भी सृजित होना चाहती है। मेरे भी सपने आकार ग्रहण करना चाहते हैं। मेरी खिलखिलाहट भी हर ओर बिखरना चाहती है। देश के सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक विकास में मैं भी योगदान देना चाहती हूँ। सृजनात्मकता की रूपरेखा बनाने में भागीदारी चाहती हूँ। दुनिया के किसी भी हिस्से में बिना किसी खौफ और रोक-टोक के भ्रमण की स्वतंत्रता चाहती हूँ। अपने बारे में, अपने कार्यक्षेत्र के बारे में, अपने धर्म के बारे में, शादी के बारे में, बच्चों के जन्म के बारे में, पहनावे के बारे में और परम्पराओं के अनुसरण के बारे में निर्णय लेने की स्वतंत्रता चाहती हूँ। मैं आर्थिक, मानसिक और भावनात्मक स्वतंत्रता चाहती हूँ।

करोगे अपनी संकीर्ण मानसिकता का बहिष्कार?...जहाँ देह से परे बुद्धि और मन के आधार पर मुझे मेरी निजता और सम्मान का हक़ मिलेगा। दोगे मुझे समानता का अधिकार? बंद करोगे मेरे साथ सौतेला व्यवहार?...जहाँ भाई की इच्छाओं के सामने मुझे किसी अभाव में जीना नहीं पड़ेगा। दोगे मुझे मानवीय दृष्टिकोण की वह जमीन, जहाँ रात के अँधेरे में भी मैं बेख़ौफ़ सड़क पर चल सकूंगी? जहाँ पर मुझे देवी, माँ, बेटी, बहन, पत्नी, प्रेयसी से इतर एक इंसान के रूप में भी देखा और समझा जाएगा। जहाँ मेरे अहसास छल-कपट का शिकार नहीं होंगे। दोगे मुझे मेरे पंख जो एक उन्मुक्त गरिमामय उड़ान के लिए मुझे स्वतंत्रता का आकाश प्रदान करेंगे, जहाँ मैं अपने ख़्वाबों के रंग हकीकत के कैनवास पर उकेर सकूँगी? क्या, दोगे मुझे मेरे पंख?

Monika Jain ‘पंछी’
(18/11/2014)

October 1, 2014

Ghazal on Life in Hindi


ज़िन्दगी

तेज चुभती धूप में कहीं हल चलाती ज़िन्दगी
सागर किनारे रेत में कहीं झिलमिलाती ज़िन्दगी।

कहीं फूल बिखरे हैं पड़े, कहीं काँटें आकर हैं खड़े
कहीं मखमली, कहीं चुभन का अहसास लाती ज़िन्दगी।

एक रोटी बाँटते कहीं चार भूखे नौनिहाल
कहीं हलवा, पूड़ी, खीर से भी मुँह चिढ़ाती ज़िन्दगी।

मंगल विजय के गीत गाये जा रहे हैं एक तरफ
कहीं सर्द बारिश में ठिठुरकर हार जाती ज़िन्दगी।

कहीं आंसुओं से भीगती, कहीं मुस्कुराहटों में खिली
कहीं आसमां को चूमती, कहीं डूब जाती ज़िन्दगी।

कहीं ख़्वाब बुनते दिल यहाँ, कहीं टूटे दिल की किरचियाँ
कहीं नफरतें, कहीं प्रेम के, सुर मिलाती ज़िन्दगी।

कहीं सीढ़ियों पे सीढियाँ चढ़ रहे हैं हौंसले
कहीं आँधियों में उलझकर ठहर जाती ज़िन्दगी।

कहीं भीड़ में तनहा है दिल, कहीं तनहा दिल में शोर है
खोने-पाने के इस भँवर में कसमसाती ज़िन्दगी।

ज़िन्दादिली का नाम है, कहीं बेवजह परेशान है
कहीं दर्द में भी हँसती है, कहीं यूँ ही कराहती ज़िन्दगी।

धूप-छाँव, शीर्ष-गर्त और अँधेरा-रोशनी
नित-नए रंगों में देखो, उभर आती ज़िन्दगी।

Monika Jain ‘पंछी’
(01/10/2014)

Life is beautiful but full of ups and downs just like seesaw. It’s filled with many twist and turns. Happiness-sorrow, victory-defeat, day-night, hopes-depression, comfort-problems, prosperity-poverty all are the two sides of this coin of life. For someone it may be the bed of rose but for the other it may be a way filled of thorns. Even for the same person life is always changing. One should be always ready to face all these challenges of life to make it worth.

September 30, 2014

Poem on Natural Disaster in English

(1)

Think for The Nation

The flood water have throttled so many screams
The temper of this nature swallowed so many dreams.

It's very painful to see this destruction
O nature! Why this exasperation?

Well! It’s not the time to blame or complain
Why this politicization? Don't you feel ashamed?

We must deliver all the possible help to them
Saving their life should be our prime aim.

This is possible only through our mutual cooperation
Forget all the personal differences and think for the nation.

Monika Jain 'Panchhi'
(23/06/2013)

(2)

It Might be Too Late

In this murk night between the whirling blizzards
Every voice is lost somewhere in the desert.

Those who has growled or ever roared
Today they are missing between these windstorms.

I see a light is far away
Perhaps there is a shelter
Preferable to walk in the morning fog
Since this night is hauling the storm.

The cool breezes seem grumbling something
Something is depressing them
and it turned them into deadly weapon.

Storms are like hungry from centuries
and an anger inside the nature
Today it wants to get everything out
Perhaps that's why the ice sheet is laid on all.

The truth is
We do not even learn from our mistakes
Even after of nature's repeatedly warnings
We do not realize our mistakes
until we face our death.

Today I am missing my family
and I'm battling for my life
Maybe this is my last night
But I do not think nature is incorrect in anyway.

Some people will mourn
also ask for forgiveness with folded hands to God
But after a few days, they will be carrying on
Human effigy of mistakes and they will make mistakes again.

Chetan K Dheer
(30/09/2014)

Today climate is changing very fast. Greenhouse gases we are producing having a dangerous impact on environment. Nature is giving all the warning signs in form of frequent flood, windstorm, earthquakes, tsunami, volcanic eruptions, hurricanes, landslides, tornadoes, droughts, famines, cyclones, etc. Mother earth is warning us at an alarming rate. Something needs to be done about it as soon as possible. Otherwise it might be too late leaving us only with regret.

September 28, 2014

Essay on Navratri Durga Pooja Festival in Hindi

नवरात्रि के नौ संकल्प

नवरात्रि शुरू हो गयी है। इन नौ दिनों में आप नारी शक्ति और देवी के नौ रूपों की पूजा करेंगे, नौ दिनों तक अखंड ज्योत जलाएंगे...अच्छी बात! माँ दुर्गा के सम्मान में नौ दिनों तक गरबा, आरती, डांडिया करेंगे, अच्छी बात! नौ दिनों तक उपवास, व्रत, फलाहार आदि करेंगे; नंगे पाँव रहेंगे...अच्छी बात! नौ ही दिन माँ को नए-नए प्रसादों का भोग लगायेंगे, ज्वारे उगायेंगे, प्रतिदिन मंदिर जायेंगे, जल चढ़ाएंगे, माँ का विशेष श्रृंगार करेंगे, कन्यायों की पूजा करेंगे, उन्हें भोजन कराएँगे, नए-नए उपहार देंगे...वह भी अच्छी बात! जप, तप, पूजा, पाठ, भक्ति, आराधना जो कुछ भी आप करेंगे...सब कुछ अच्छी बात!

बस मेरे कुछ सवालों का जवाब दीजिये - पूजा हम उन्हीं की करते हैं ना जिनका हम आदर और सम्मान करते हैं! तो फिर अपनी हर समस्या के लिए देवी की उपासना करने वाले इस भारतीय समाज में कन्या के जन्म को अभिशाप क्यों माना जाता है? क्यों शक्ति के उस अंश को कोख में ही मार डाला जाता है? क्यों एक ओर आप शक्ति के जिस स्वरुप की पूजा करते हैं वहीँ दूसरी ओर उसे सम्मान, अधिकार और बराबरी का दर्जा भी नहीं दे पाते? क्यों हर रोज अख़बार हाथ में उठाते ही न जाने कितनी मासूमों की चीखों और चीत्कारों से घर गूंजने लगता है? क्यों नारी को संकीर्ण सोच, कुप्रथाओं, भेदभाव, अपमान, दूसरे दर्जे का मनुष्य समझे जाने; तिरस्कार, तानों, छेड़छाड़, मार-पिटाई जैसे क्रूर व्यवहार से रूबरू होना पड़ता है? दहेज़, शिक्षा और नौकरी पर मनमाने प्रतिबन्ध, बलात्कार, तेजाब डालना, डायन घोषित कर मारना-पीटना, मासिक चक्र के समय अपवित्र समझा जाना, सिर्फ देह समझा जाना, पराया धन मानना, गालियाँ, भद्दे-फुहड़ मजाक...और भी न जाने क्या-क्या...कितना कहूँ, क्या-क्या बताऊँ?

अगर हम सच में नवरात्रि मनाना चाहते हैं तो आज से और अभी से ये नौ संकल्प लें, हमारा नवरात्रि मनाना सार्थक हो जाएगा, और इससे अच्छी बात और कोई होगी नहीं :

पहला संकल्प कन्या भ्रूण हत्या जैसे क्रूर विचार की हत्या का। कोख में बेटी की हत्या जैसे महापाप के प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कभी भी भागीदार नहीं बनने का। अपने बेटे और बेटी में भेदभाव नहीं करने का। समय की मांग भी यही है कि बेटे और बेटी की परवरिश एक जैसे की जाए। समान प्यार, समान अधिकारों के साथ ही घर और बाहर की सभी जिम्मेदारियों में उन्हें समान रूप से भागीदार बनाया जाए।

दूसरा संकल्प दहेज़ ना देने और ना लेने का। बेटियों को अपनी संपत्ति में बराबर का भागीदार बनाने का, और विवाह को व्यापार और सौदे में ना बदलने का।

तीसरा संकल्प अपनी झूठी शान, इज्जत और अहम् के त्याग का, जिसकी वजह से बेटी को प्यार करने की इजाजत नहीं; अपना मनपसंद जीवन साथी चुनने का अधिकार नहीं।

चौथा संकल्प अपनी माँ और पत्नी को सम्मान और बराबरी का दर्जा देने का। स्वार्थ वश, मोह वश या किसी भी कारण से किसी एक की उपेक्षा ना हो इसका खयाल होना चाहिए।

पाँचवा संकल्प हर ऐसे कार्य की तिलांजलि का जिसमें अंधविश्वासों के नाम पर कभी नारी को अपवित्र समझा जाता है तो कभी अकेली, विधवा, परितक्यता को चुड़ैल या डायन बताकर उसका बलात्कार और मारपीट की जाती है।

छठा संकल्प नारी को सिर्फ देह समझकर यौन उत्पीड़न, छेड़छाड़, बलात्कार, फूहड़ टिप्पणियाँ, तंज, अश्लील इशारों, तेजाब डालना जैसी कलुषित मानसिकता और वृतियों के त्याग का। नारी को एक इंसान समझकर उसके साथ इंसानों से व्यवहार का।

सातवाँ संकल्प नारी को आज़ादी देने का। पर्दा प्रथा, बुरका, सिन्दूर, बिछिया, मंगल सूत्र जैसे प्रतिबन्ध और विवाह के प्रतीक सिर्फ नारी के लिए ही क्यों?

आठवाँ संकल्प नारी को वह सहजता भरा वातावरण उपलब्ध करवाने का जिसमें वह दिन हो या रात, किसी के साथ हो या अकेले, बेफिक्र होकर कहीं भी आ जा सकें। अपने कार्य स्थल पर बिना किसी भय के काम कर सके।

नौवां संकल्प नारी के प्रति प्यार और सम्मान का। उसके त्याग, समर्पण, सहनशीलता का मूल्य समझने का। उसके प्रति किसी भी तरह के अत्याचार और हिंसा के परित्याग का, और इन सभी संकल्पों को याद रखने का।

नवरात्रि के इन दिनों में माँ दुर्गा के प्रति श्रद्धा और सम्मान का इससे अच्छा और क्या तरीका हो सकता है? हमें देवी नहीं बनना है, हमें बस एक इंसान समझकर इंसानों की तरह बराबरी और न्यायोचित व्यवहार चाहिए। क्या ले सकते हैं आप ये संकल्प? क्या दे सकते हैं हमें अपनी पहचान, आज़ादी और अस्तित्व?

Monika Jain ‘पंछी’
(28/09/2014)

September 9, 2014

हिंदी दिवस पर निबंध

हिंदी को बनाएँ रोजगार की भाषा

आज अचानक कहीं नज़र पड़ी तो पता चला कि हिंदी दिवस आने वाला है। सच पूछो तो कभी याद नहीं रहता। रोज हिंदी में लिखते-पढ़ते हिंदी इस कदर दिलोदिमाग में रच बस गयी है कि इसका कोई दिवस भी है, यह ख़याल कैसे रहे? पसंद तो हिंदी बचपन से ही रही है, पर पिछले दो-तीन सालों से लिखना शुरू किया है, तो हिंदी से ये दिल्लगी बढ़ती ही जा रही है। तो अपना तो हर दिन हिंदी दिवस ही है, पर अब चूँकि घोषित हिंदी दिवस आने वाला है तो कुछ विशेष मुद्दों पर बात करना चाहूँगी।

बहुत सी बातें हैं जो बहुत अजीब लगती है। कल की ही बात है, अंग्रेजी माध्यम के कुछ बच्चों से हिंदी में गिनती के बारे में पूछा, तो बड़े फक्र और गर्व से जवाब मिला कि बस 20 तक आती है। आगे सीखने के बारे में कहा तो ऐसे नाक भौहें सिकोड़ी जैसे उनकी शान पर बट्टा लगाने की बात कह दी हो।

‘मात्र 30 दिनों में फर्राटेदार अंग्रेजी बोलिए।’ इस तरह के विज्ञापन बोर्ड आज हर गली-मोहल्ले की शोभा बढ़ा रहे हैं। पैदा होते ही बच्चे को तुतला-तुतलाकर अंग्रेजी सिखाते माँ-बाप आज हर घर में देखे जा सकते हैं। खरपतवार की तरह उग आये अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में हिंदी में बोले जाने पर शुल्क लगाया जाता है।अपने ही देश में अपनी ही भाषा में बात करने पर शुल्क लगाना? अंग्रेज चले गए पर अंग्रेजी मानसिकता से मुक्ति अब मिलती नज़र नहीं आती।

एक और विचित्र बात, अधिकांश लोग जो अंग्रेजी वक्तव्य में कुशल होते हैं, वे अंग्रेजी ना जानने वालों को हेय दृष्टि से देखते हैं। शुद्ध हिंदी भाषा बोलने वालों का मजाक उड़ाया जाता है। इससे बुरी बात और क्या होगी कि एक विदेशी भाषा हमारे यहाँ विभाजक का कार्य कर रही है। यह एक प्रकार का नस्ल भेद ही है जो समाज में भाषा के आधार पर दरार डाल रहा है।

वैसे इन सबके लिए सरकारी नीतियाँ काफी हद तक जिम्मेदार हैं। अगर बिना किसी प्रतिबन्ध या मजबूरी के हमें अख़बारों या टीवी चैनल्स पर भाषा चुनने का अधिकार दिया जाए तो हममें से अधिकांश लोग अपनी-अपनी मातृ भाषा को ही चुनेंगे। फिर भी अंग्रेजी को विशेष दर्जा दिया जाता है। हिंदी दिल की भाषा तो बन गयी पर रोजगार की भाषा नहीं बन पायी। चीन, जर्मनी, जापान और दक्षिणी कोरिया जैसे कई देश हैं, जिन्होंने अपनी स्वयं की भाषा के बल पर अपार सफलता हासिल की है। अंग्रेजी वहाँ सिर्फ अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की भाषा है, पर भारत की सफलता तो अभी भी विदेशी भाषा पर टिकी हुई है।

हमें अगर हिंदी को जिंदा रखना है, इसे जन-जन की भाषा बनाना है तो इसे केवल साहित्य के दायरे से बाहर लाना होगा। हिंदी भाषा में सरल, सहज, बोधगामी, गुणवत्ता युक्त साहित्य जो ज्ञान का विशाल भंडार हो, उसकी जरुरत तो है ही, लेकिन साथ-साथ बहुत जरुरी है विज्ञान, दर्शन, समाज शास्त्र, अर्थशास्त्र आदि सभी विषयों पर अच्छी पठनीय सामग्री भी हो। क्योंकि सिर्फ साहित्य पर केन्द्रित भाषा समूचे राष्ट्र की भाषा नहीं बन सकती। उसका भविष्य अच्छा नहीं हो सकता। वह विकास की सीढ़ी नहीं बन सकती।

बहुत जरुरी है हिंदी को रोजगार की भाषा बनाना। इसके लिए चिकित्सा, अभियांत्रिकी और रोजगार के सभी क्षेत्रों के पाठ्यक्रम हिंदी में होने चाहिए। अन्य भाषाओं का अध्ययन बिल्कुल गलत नहीं है, पर हमारी मूल शिक्षा प्रणाली और कार्य प्रणाली हिंदी व अन्य क्षेत्रीय भाषाओं आधारित होनी चाहिए।

जो अंग्रेजी के शब्दों के हिंदी में लम्बे चौड़े अर्थ निकाल कर हिंदी का मजाक उड़ाते फिरते हैं, उनसे यही कहूँगी कि जैसे हिंदी के कई शब्दों के अंग्रेजी में समानार्थक शब्द नहीं होते, वैसे ही हिंदी में भी हर अंग्रेजी शब्द का समानार्थक शब्द होना जरुरी नहीं है। वैसे भी हिंदी का दिल तो इतना बड़ा है कि उसमें सभी भाषाओँ के जरुरी शब्दों के लिए स्थान है। ऐसे में ये बेवजह का मजाक उड़ाना अपने ही देश का अपमान है। भावी पीढ़ियों पर इसका नकारात्मक असर ही पड़ना है।

हिंदी तो सबसे सरल और सहज भाषा है, जिसे सीखना भी आसान है और व्यवहार में लाना भी आसान है। एक अन्तराष्ट्रीय भाषा बनने के सारे गुण इसमें विद्यमान है। तो आईये हिंदी को हम अपने सपनों, अपने चिंतन, अपने प्रतिरोध, अपने समर्थन, अपने संपर्क, अपने पठन-पाठन और अपने रोजगार की भाषा बनाने की ओर कदम बढ़ाएँ।

मोनिका जैन ‘पंछी’
(14/09/2014)

हिंदी दिवस की सभी को शुभकामनाएं। जितना संभव हो हम हिंदी को दिल और दिमाग से अपनाएँ इसी में इस दिवस की सार्थकता है।

September 2, 2014

Criticism Quotes in Hindi

Criticism Quotes

  • 04/09/2017 - उत्तर जानने की चाह रखे बिना या बिना सोचे-समझे किसी पर बड़े प्रश्न चिह्न लगा देना, तुम पर भी तो प्रश्न चिह्न लगा देता है। 
  • 17/08/2016 - शब्दों से इतना भी क्या प्रेम कि किसी बात का विरोध हम वही बात कहकर कर दें, बस जरा से शब्दों के हेर-फेर के साथ। 
  • 17/08/2016 - यदि आपकी किसी जाति, गौत्र या धर्म विशेष (सामान्यतया जो आपको जन्म से मिला है) के प्रति आसक्ति, गहरा लगाव या कट्टरता है तो आप एकतरफा आलोचना के शिकार हो सकते हैं...लेकिन यदि नहीं है तो आप दो तरफ़ा आलोचना के शिकार होते हैं। :) 
  • 19/02/2016 - हम सब अपनी-अपनी तरह के पागल हैं...फिर भी दूसरों को पागल कहते रहते हैं। 
  • 06/09/2015 - कभी-कभी आलोचनाएँ पढ़कर भी हंसी आ जाती है। हँसाना सिर्फ तारीफों का काम नहीं। 
  • 04/05/2016 - हमारा अहंकार इतना घनीभूत है कि वह बुद्ध पुरुषों को भी पलायनवादी कह देता है। :) 
  • 05/02/2016 - कोई किसी एक अच्छे स्तर तक अच्छा है, समझदार है...तो उस पर और अधिक अच्छा और समझदार बनने की अपेक्षाओं और आलोचनात्मक दृष्टिकोण का इतना ज्यादा बोझ और फ़िल्टर मत डालिए कि उसके लिए जीना ही मुश्किल हो जाए। फिर आप ही में से कोई कहते मिलेगा - अच्छे लोगों को भगवान अपने पास इतना जल्दी क्यों बुला लेते हैं? 
  • 02/09/2014 - कुछ लोग तो बड़े ही अद्भुत होते हैं - लड़के पे लिखा तो कहते हैं लड़की पे क्यों नहीं लिखा, लडकियाँ भी तो ऐसा करती है। लड़की पे लिखा तो कहेंगे लड़के के बारे में क्यों नहीं लिखा, लड़कों के साथ भी तो ऐसा होता है। हिन्दू-मुस्लिम वाली बात तो आप सबको पता ही है। किसी राजनैतिक पार्टी विशेष पर लिख देने की गलती अभी तक हुई नहीं, वर्ना उसके भी परिणाम पता है। अब मैं उन्हें कैसे समझाऊं कि सारे ब्रह्माण्ड के इश्यूज मैं एक 4-5 लाइन्स के स्टेटस में नहीं डाल सकती। गागर में सागर भरना आ भी जाए...पर ये सागर के साथ-साथ व्हेल, डॉलफिन, मगरमच्छ, कछुएँ, जलपरी, समुद्री घोड़ा आदि-आदि इन सबको कैसे डालूँ? और इनको भी डाल दिया तो कहेंगे कि हाथी, अजगर, हिरन, शेर, मोर, बकरी...आदि इन सबको क्यों छोड़ दिया? 
  • कोई भी व्यवस्था परफेक्ट नहीं हो सकती समय के अनुरूप उसे बदलने के लिए आवश्यक फेल्क्सिबिलिटी होनी ही चाहिए लेकिन किसी भी व्यवस्था पर हम सवाल उठाये उससे पहले हमारे पास उससे बेहतर और स्पष्ट विकल्प होना चाहिए, या फिर चर्चाएँ उस बेहतर विकल्प को खोजने के लिए हो सकती है लेकिन जब सब बाँवरे होकर बस शिकायतें, आलोचना और व्यंग्य करने लगते हैं तो वे बस जो है उसे भी बिगाड़ने में योगदान दे रहे होते हैं। समाधान चाहिए तो समस्या से ज्यादा समाधानों पर बात करना जरुरी है।...और समाधानों पर बात करने के लिए तथाकथित व्यक्तिगत हितों से थोड़ा ऊपर उठना ही पड़ेगा।
  • प्रतीकात्मक आलोचना करते समय आलोचकों को बहुत सतर्क रहने की आवश्यकता है क्योंकि होता यूँ हैं कि प्रतीकों के इतने अर्थ निकलते हैं कि कोई एक अर्थ खुद आलोचक पर ही फिट बैठ जाता है। :)

Monika Jain ‘पंछी’ 

August 22, 2014

Break Up Poems in English

(1)

Dry Rose

The rose kept in the pages of my diary
has dried as our relationship
But the fragrance coming from it is still alive
as the memories of our companionship.

How much I cried
So much I screamed
With our separation
I was never agreed.

I felt like my body was being ripped
Emptiness you left behind is still unfilled
You took away my smile, laughter and happiness
When I lost you I lost myself.

Little hopes I had inside you killed
You destroyed more than you helped to built
You left me alone and scared in the rain
What I felt I can’t explain.

Loneliness tortured me every moment
But gradually I tried to live
I didn't forget anything
But I tried my best to forgive.

Now no tears flow from my eyes
Life doesn't stop in absence of your care
I have paid a big amount for it
The smile of my lips has lost forever.

Today when I saw that dried rose
It reminded me of my broken dreams
A tear came from my eyes
That were waiting for years to stream.

Monika Jain 'Panchhi'
(09/2012)

(2)

One Day You Will Come

Do you remember the day
When we met for the last time
Don't know what you were feeling
But for me it was very tough time.

I was feeling like
My soul has been separated out from my body
and my heart was shivering
Because of this unwanted farewell ceremony.

I was gripped with an unknown fear
When you disappeared my eyes filled with tears
I was gazing endlessly upon the way
As it was difficult to accept that you have gone away.

Saying goodbye to you was a heartbreaking moment
A part of mine was being separated, I felt
I wanted to shout, cry and scream
As I was left with only broken dreams.

Endless days and sleepless nights
Without you in my life nothing is right
The wholeness I felt with you is now incomplete
With your own you took my breath.

Remembering every single moment i spend with you
Deep down in my heart so much I love you
I am still waiting with a hope in my heart
One day you will come never to be apart.

Monika Jain 'Panchhi'
(01/04/2013)

(3)

Silent Sacrifice

In the noise of hatred, abuses and sarcasm
Finally I succeeded to hide the too much love for you
I suppressed all those words and feelings
Which were the witness of my love to you.

Tell it a victory
or say it my worst defeat
Why love happens to the person
who is not allowed to
touch the dreams even in sleep.

You may not realise ever
the silent sacrifice of mine
Because you never learned
to look into the heart
Which seemed bitter to you
was just sweet
That was never tart.

I couldn’t tell you, never
That it’s impossible to live without you
But you would move anytime, anywhere
It can’t be ignored too.

Love with you was always a punishment
There is also no reason to live without you
But absence of reason is better than punishment
To live scattered for the whole life is
better than breaking in every moment.

Bitter, sweet whatever it is your memory box
I will make it the support of my life
I would never say anything to you.
While drinking the pain of my silent sacrifice.

Monika Jain ‘Panchhi’
(22/08/2014)

When a relationship ends painfully it feels devastating. Breaking up can literally break your heart. The one who experiences this pain feel like his/her heart has been shattered into millions of pieces. It is most painful when you love someone who used to love you. You may feel like end of your world. Coping with it is the hardest experience. Saying goodbye to the one you loved most is the heartbreaking moment. No matter what the cause if your relationship fails you are likely to feel sadness, anger, hurt, fear, loneliness and a sense of failure. It’s very difficult to give up something that is meaningful and important to you. But some relationships are bound to break, so it’s better to break them at right time, instead of making them more bitter. The above poems are reflecting these overwhelming, emotionally shattering sense of loss that we experience at the end of a relationship.

August 17, 2014

Quotes on Hypocrisy in Hindi

Hypocrisy Quotes

  • 25/05/2017 - एक महिला हैं। महीने भर का झूठ, छल, कपट, गाली-गलौच, दादागिरी, लड़ाई-झगड़ा...etc...etc...सब करके हर महीने गंगा में डुबकी लगा आती हैं। भारत के अलावा पाप धोने की यह सुविधा और कहाँ-कहाँ है? (मने बस पूछ रहे हैं।)
  • 12/04/2017 - यहाँ हमारे शहर में हिन्दुओं और मुस्लिमों के हर धार्मिक जलसे और जुलूस में कोई न कोई हत्या, मारपीट, दंगा या झगड़ा होता ही है और पूरे शहर की सामान्य गति में बाधा। हालाँकि यह पूर्ण समाधान नहीं लेकिन फिर भी बहुत जरुरी लगता है सभी धर्मों (सभी मतलब सभी) के सड़कों पर प्रदर्शन पर रोक। बस तथाकथित धार्मिक लोग यह समझ पाए।
  • 22/03/2016 - आज 'विश्व जल दिवस' है। मैंने सोचा आज जल संरक्षण पर एक कविता लिखूं, पर फिर सोचा आज लिखने वाले बहुत से हैं। मैं किसी और दिन लिखूंगी। जब हम आज के दिन कही बातें भूल जायेंगे। 
  • 21/02/2016 - पता है हमारी सबसे बड़ी समस्या क्या है? पाखण्ड, दोहरा आचरण। अब इससे बड़ा इसका और क्या सबूत हो कि आरक्षण मांगने वालों से ही सुरक्षा और बचाव की जरुरत पड़ जाए। 
  • 26/05/2015 - बड़ी विसंगति है भई! लोग सड़क पर खून से लथपथ इंसान को अनदेखा कर आगे बढ़ सकते हैं। मदद के लिए चिल्ला रही लड़की को अनदेखा कर आगे बढ़ सकते हैं।...और भी न जाने कितनी जरुरी चीजों को अनदेखा कर आगे बढ़ सकते हैं। पर बात जब उनकी जाति, धर्म या संप्रदाय पर किसी टीका टिपण्णी की आती है तो वे तलवारें हाथ में लेकर आलोचकों का सर कलम करने तक का हुनर रखते हैं। तब सारा भय जाने कहाँ काफूर हो जाता है। सच सिर्फ इतना है कि आधी से ज्यादा दुनिया सिर्फ प्रतीकों, दिखावे, ढोंग और आडम्बरों से प्यार करने वाली है। हम जिन्दा नहीं जिन्दा होने का दिखावा करने वाले लोग हैं। 
  • 09/01/2015 - आप किस बात की प्रतिस्प्रधा कर रहे हैं? मेरे धर्म में तुम्हारे धर्म से कम पाखण्ड और कट्टरता है इसका? या फिर मेरे धर्म में तुम्हारे धर्म के बनिस्पत कम खून बहाया जाता है इसका? महानुभावों! धर्म कभी भी बुराइयों और पाखंडों के बल पर बेहतर या कमतर सिद्ध नहीं किये जा सकते। बेहतरी हमेशा अच्छाई के बल पर ही सिद्ध होती है, बुराई के तुलनात्मक अध्ययन से नहीं। वैसे सच तो यह है कि जिसमें बुराई या पाखण्ड का अंश मात्र भी हो, वह धर्म ही कैसा? हँसी बस इसी बात पर आ रही है कि इस तगड़ी प्रतिस्पर्धा की भावना ने बेचारे धर्म का क्या हाल बनाकर रख दिया है। वैसे बात हँसने की नहीं रोने की है। क्योंकि हैवानीयत में भी जो होड़ होने लगी है आजकल, उसकी कितनी बड़ी कीमत समूची मानवता को चुकानी पड़ेगी, इस बात का अंदाज़ा नहीं हमें अभी। 
  • 04/09/2014 - समस्या धर्म ग्रंथों की नहीं, समस्या धर्म के मठाधीशों की है। धर्म ग्रन्थ तो पढ़ते ही कितने लोग हैं? पर ये धर्म के मठाधीश अपने व्यक्तिगत हितों और स्वार्थों के लिए और अपनी-अपनी दुकानें चलाने के लिए कैसे भी हो, बस स्थायी ग्राहक चाहते हैं। मुक्ति इन मठाधीशों से मिलनी चाहिए। वैसे कोई बुरा माने चाहे अच्छा, पर मुझे तो ज्यादातर साधु-संतों-मौलवी-पादरियों (?) के चेहरे से ही शैतानियत टपकती नज़र आती है। 
  • 17/08/2014 - वैसे ये व्रत और उपवास त्याग के लिए होते हैं या भोग के लिए? आलू के चिप्स, साबूदाने की खिचड़ी, आलू, लौकी और सिंघाड़े का हलवा, कुट्टू और राजगिरी के आटे की पूरियाँ, आलू की सब्जी, फ्रूट्स, जूस, मेवे और भी न जाने क्या क्या...:p ऐसे तो ताउम्र व्रत और उपवास किये जा सकते हैं। :)
  • सोच रही थी कि लोगों ने जिन-जिन महापुरुषों को अपनी-अपनी संपत्ति बना रखा है, अगर वे महापुरुष उनके वर्तमान व्यक्तिगत जीवन में निकट सम्बन्धी होते या आसपास ही होते तो उनके उनसे कैसे सम्बन्ध या उनके प्रति कैसे विचार होते? :p 
  • सहानुभूति भी अक्सर वही पाता है जिसे सहानुभूति बटोरने की कला आती है। 
  • ख़ुशी होती है जब संकीर्णता कम होती दिखती है। पर कभी-कभी इस ख़ुशी पर तेज तमाचा भी पड़ता है, जब पता चलता है कि संकीर्णता खत्म नहीं हो रही, बस उसने आधुनिकता और दिखावे का नया लबादा ओढ़ लिया है। गहराई में जाने पर आधुनिक-खुले विचारों का खोखलापन कहीं-कहीं साफ़ नज़र आ जाता है। बहुत जरुरी है, इस खोखलेपन का भरा जाना। 
  • कई लोग गर्व से कहते है कि वे विस्तृत सोच वाले हैं, पर एक कटु सत्य यह है कि इन ज्यादातर विस्तृत सोच वाले लोगों के दिमाग में विस्तृत सोच की संकीर्ण परिभाषा होती है। 
  • उसे नहीं पता था कि अच्छी किताबें सिर्फ मनोरंजन के लिए और अच्छे व्यक्तित्व सिर्फ पूजा के लिए होते हैं, अनुसरण के लिए नहीं। उसे नहीं पता था कि बड़ी-बड़ी बातें सिर्फ लिखने के लिए होती है, अमल करने के लिए नहीं। उसे नहीं पता था कि ऊपर से नीचे तक गहनों से लदी मूर्तियों के सामने फल और पकवानों से सजी थालियाँ लेकर पूजा करना हंसी का पात्र नहीं बनाता लेकिन आदर्शों, नैतिकता और मानवीय मूल्यों की बातें करना बना देता है। उसे नहीं पता था कि मूर्तियों के रूप में जिन आदर्शों की पूजा की जाती है, उन्हीं आदर्शों को वास्तविकता का जामा पहनाने वालों को मौत के घाट तक उतार दिया जाता है। सच! उसे नहीं पता था कि उसे कुछ भी नहीं पता।
  • प्रकृति का दैवीकरण, ईश्वर की कल्पना, उसके प्रति आस्था...यह बहुत बड़ी समस्या नहीं है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब कोई जाने-अनजाने इस आस्था को उल्टा-सीधा कुछ भी कर लेने का लाइसेंस समझने लगता है। धर्म और आस्था अहंकार (जो सभी बुराईयों की जड़ है) के मिट जाने के लिए है, अहंकार को संरक्षण देने के लिए नहीं है। इन्हें प्रदूषित होते देखना अच्छा नहीं लगता। 

Monika Jain ‘पंछी’

August 14, 2014

Poem on Dance in English

(1)

I Wanna Dance

I wanna dance till my last breath...
By drowning in dance
I want to be lost forever
So the suffocation of external world
couldn’t touch my breath ever.

I wanna reach in the world
Where my impressions make my universe
Where the smile
passing through my dancing steps
settles on my lips.

Where the touch of freedom
fills the pore of my body with joy and gladness
Without wings where I fly with
indomitable spirit and confidence.

Dancing is the feeling of rising sun
from a flowing river
Getting the touch of winds
from all the directions
north, east, west and south
It’s the exaltation of soul.

Dancing gives me
the feeling of completeness
Mountains, moon and stars...
All become
the witness of my happiness.

It seems like the whole earth is
fascinating with dance
Flowers, leaves, butterflies
even each particle, moment and living being
are enjoying my dance.

Monika Jain 'Panchhi'
(14/08/2014)

(2)

Love with Dance

The word dance is undefined
It's the expression of heart not of mind.

Dance is the language of soul
It is one of your best pal.

Dance take us in a totally new world
Where we can fly like a bird.

The world of dance is so beautiful
It makes the life very colorful.

You will forget all your pain
Peace and happiness you will gain.

Everyone should take this chance
and You will fall in love with dance.

Monika Jain 'Panchhi'
(05/2012)

Dancing is the way to express and explore ourselves. To feel the perfection, freedom, pleasure, peace and satisfaction, everyone should dance.

July 31, 2014

Essay on Double Standards Society in Hindi

मुखौटों का युग

एक वक्त था जब डर लगता भी था तो चोरी, डकैती, लूट, हफ्ता वसूली, चैन स्नैचिंग आदि वारदातें करने वाले गिरोहों से, जिन्हें हम असामाजिक तत्व कहते हैं। लेकिन आजकल सामाजिक कहलाये जाने वाले तत्वों से और भी ज्यादा सतर्क रहना जरुरी है। क्योंकि आजकल लोग सीधा हाथ में चाकू या छुरा लेकर नहीं आते। चेहरे पर मुस्कुराहट, सौम्यता, आदर भाव, विनम्रता लिए वे बड़े सभ्य जान पड़ते हैं, बहुत मीठा बोलते हैं, साफ़-सुथरे कपड़े पहनते हैं और मौका मिलते ही अपने नापाक इरादों को अंजाम दे देते हैं।

असामाजिक तत्वों की उत्पत्ति कहीं न कहीं गरीबी, बेकारी, शोषण के चलते होती है पर आजकल तो समाज में प्रतिष्ठित, पैसे वाले, धर्म गुरु, समाज सेवक, साहित्यकार, क़ानून के रक्षक किसी का भी भरोसा नहीं। पता चला कब किसने रंग बदल लिया, कौन छलिया और धोखेबाज निकल गया।

एक प्रतिष्ठित पत्रिका जिसका दायित्व ही सच के साथ खड़ा होना और झूठ का पर्दाफाश करना है, उसी के संपादक जो युवाओं के आदर्श हैं, खोजी पत्रिका के सूत्रधार माने जाते हैं वे अपनी ही बेटी की दोस्त का यौन उत्पीड़न करते हैं। जहाँ विश्वास और संरक्षण का भाव होना चहिये वहां पर ऐसे कृत्य और वो भी समाज के तथाकथित प्रतिष्ठित व्यक्ति के द्वारा और उसके बाद अपने ही अपराध को छिपाने के लिए लीपापोती।

रोज मंदिर में जाकर चन्दन का टीका लगाने वाला, भजन संध्या में झूम-झूम कर नाचने वाला, घंटों बैठकर प्रवचन सुनने वाला भी कितना बड़ा पाखंडी हो सकता है हम अनुमान नहीं लगा सकते। और ये तो भक्त की बात है पर यहाँ तो आजकल भगवान की तरह लाखों श्रद्धालुओं द्वारा पूजे जाने वाले; सत्य, त्याग, भक्ति, दान, सेवा, मोक्ष आदि पर बड़े-बड़े प्रवचन देने वाले धर्म गुरु भी कई घिनौने आपराधिक कुकृत्यों में संलग्न हैं। ज्योतिष के रूप में कई पाखंडी अन्धविश्वास का कारोबार कर रहे हैं। मंदिरों, मस्जिदों में करोड़ों का दान करने वाले एक भूखे, गरीब बच्चे को देखकर भड़क जाते हैं।

बाल कल्याण, महिला कल्याण के नाम पर संस्थाएं चलाने वाले समाज सेवा की आड़ में यौन शोषण, सेक्स स्कैंडल जैसे घृणित कार्यों को अंजाम दे रहे हैं। कई ढोंगी नशे की लत को पूरा करने के लिए अध्यात्म का चोला धारण किये हुए हैं। राजनेता धर्म निरपेक्षता का मुखौटा लगाकर सत्ता हथियाने की कोशिश कर रहे हैं। जनता की सेवा को ही अपना धर्म बताने वाले राजनेता चुनाव जीतते ही जनता को भूल अपनी जेबें भरने लग जाते हैं। लोकतंत्र के मुखौटे में तानाशाही जारी है। दूसरी ओर टीवी पर घोटाले की ख़बरें सुनते समय, सोफे और कुर्सी पर बैठे-बैठे नेताओं को कोसने वाले, फेसबुक पर लम्बे-चौड़े स्टेटस डालकर खुद को राष्ट्रवादी समझने लगते हैं। पर इनमें से कई लोग ऐसे हैं जो चुनाव के समय स्वार्थवश या रिश्वत लेकर आपराधिक प्रवृति के लोगों को वोट डाल आते हैं। कानून के रक्षक बने पुलिस, जज, वकील कानून की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं।

अपने माता-पिता का हालचाल जानने का भी जिनके पास समय नहीं, जिन्हें अपने माता-पिता की उपस्थिति अपनी स्वतंत्रता में बाधा लगती है, जो उन्हें वृद्धाश्रम छोड़ आते हैं, या उम्र के आखिरी पड़ाव में भी अकेले रहने को मजबूर कर देते हैं, वे लोग फादर्स डे, मदर्स डे पर इतनी मर्मस्पर्शी कविताएँ लिख देते हैं, जैसे कि उनसे ज्यादा दुनिया में कोई भी अपने माता-पिता को प्यार नहीं करता।

यहाँ जो नारीवाद पर भाषण देते हैं, नारी स्वतंत्रता और अधिकारों की बातें करते हैं, उनमें से कई लोग खुद नारी पर शासन करना चाहते हैं। अपने घरों में अपनी पत्नी पर हाथ उठाते हैं। असल में उनकी नज़र में नारी उनकी कामेच्छाओं को पूरा करने वाले हाड़-मांस के शरीर से ज्यादा कुछ भी नहीं।

प्रेम पर अति मर्मस्पर्शी कवितायेँ लिखने वाले कई साहित्यकार हैं जिनके लिए प्रेम देहिक सुख से ज्यादा और कुछ नहीं। जिन लोगों के लिए प्यार शब्द का मतलब सिर्फ और सिर्फ शारीरिक संतुष्टि है, जिन्हें किसी की भावनाओं से कोई सरोकार नहीं, वे लोग प्रेम पर इतनी बड़ी-बड़ी बातें लिख लेते हैं कि पढ़ने वाला उनके सामने खुद को बोना समझने लगे। माना कि लिखना और बोलना एक कला है, पर हम जो लिख-बोल रहे हैं उसका हमारी सोच और हमारे व्यवहार से कुछ तो तालमेल होना चाहिए? संवेदना से रहित लोगों के मुंह से संवेदनशीलता के फूल झरते देखना मेरी समझ से तो परे है। ऐसा शायद सिर्फ वही लोग कर सकते हैं जिन्होंने खुद से अकेले में कभी भी साक्षात्कार नहीं किया।

गैंग रेप के विरोध में लोग सड़कों पर उतर आते हैं। कड़कड़ाती ठण्ड और पुलिस के डंडे भी उन्हें नहीं रोक पाते। लेकिन राह चलते जब किसी लड़की को मदद की जरुरत होती है, तब वे नहीं रुकते। क्योंकि शायद तब उनके पास समय नहीं होता, या उन्हें कवर करने वाला कोई कैमरा नहीं होता, या फिर कोई शाबासी देने वाला नहीं होता। नारी की स्वतंत्रता, समानता और अधिकारों की बातें करने वाले छद्म नारीवादी खुद नारी के शोषक हैं।

वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, भूमि प्रदूषण पर चिंता व्यक्त करने वाले कई लोग ऐसे हैं, जिन्होंने अपने जीवन में एक पेड़ भी नहीं लगाया। जो हर रोज नहाने, कपड़े धोने में ढेर सारा पानी व्यर्थ बहा देते हैं। जो सड़क पर चलते हुए कहीं भी कूड़ा-कचरा फेंक देते हैं।

अशिक्षा को कई समस्याओं की जड़ बताने वाले कितने लोगों ने कभी किसी अनपढ़ को पढ़ाया या पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया? बिजली, गैस की बढ़ती कीमतों पर चिंता करने वालों के घर में भी पानी, बिजली की बर्बादी नहीं रूकती। जिन्होंने खुद बारह बच्चों की फ़ौज खड़ी कर रखी है, वे परिवार नियोजन पर भाषण देते नज़र आते हैं। अहिंसा, जीवदया, नशाबंदी की बातें करने वाले अगर कत्लखानों और नए बार के उद्घाटन पर जाते दिखे तो कोई आश्चर्य नहीं।

सम्मान पाने की चाह तो हर किसी की होती है, पर सबसे पहले जरुरी है, हम खुद अपनी नज़रों में सम्मानित बनें, पर अपने अन्दर झाँकने की फुर्सत कहाँ हैं किसी के पास। ये मुखौटा संस्कृति का जमाना है। यहाँ पर कायर शेर की खाल ओढ़े रहते हैं, अल्पज्ञ स्वयं को सर्वज्ञ प्रदर्शित करते हैं। आदर्शवाद, सिद्धांतों, मानवीयता की बात करने वाले भीतर से बेहद स्वार्थी और जातिगत मानसिकता वाले होते हैं, जिन्हें अपने स्वार्थों की पूर्ति हेतु सैद्धांतिक पाला बदलते देर नहीं लगती। यहाँ एक ही व्यक्ति का अपनी पत्नी को दिखाने वाला, अपनी प्रेयसी को दिखाने वाला, अपने मालिक, अपने नौकर, अपने से कमजोर को और अपने से शक्तिशाली को दिखाने वाला चेहरा अलग-अलग है। मुखौटों के इस युग में एक सच्चा आदमी खोजना बहुत मुश्किल हो गया है।

Monika Jain ‘पंछी’
(31/07/2014)

July 18, 2014

Essay on Women (Women's Day) in Hindi

सिर्फ जिस्म नहीं हूँ मैं 
(आधी आबादी में प्रकाशित)

कितनी अजीब है न मेरी दास्तान? मेरी शिक्षा, स्वतंत्रता, सम्मान, सत्ता, सुरक्षा और संपत्ति के अधिकारों के लिए वर्षों से चिंतन हो रहा है, आन्दोलन हो रहे हैं, मेरे जीवन में बहुत कुछ बदल रहा है। मेरे पक्ष में एक प्रगतिशील जन चेतना का माहौल बन रहा है। लेकिन एक चीज जो तब से लेकर आज तक नहीं बदली, वह है मुझे देह समझा जाना। सारी आज़ादी, सारे अधिकार और सारे सम्मान उस समय बिल्कुल फीके पड़ जाते हैं, जब मेरा अस्तित्व दुनिया की चुभती निगाहों में सिर्फ एक जिस्म भर का रह जाता है।

टपकती वासना से भरी लालची आँखें मुझे हर गली, नुक्कड़ और चौराहे पर घूरती रहती है। भीड़ में छिप-छिपकर मेरे जिस्म को हाथों से टटोला जाता है। राह चलते मुझ पर अश्लील फब्तियां कसी जाती है। मेरा बलात्कार कर मुझे उम्र भर के लिए समाज के तानों से घुट-घुट कर जीने को मजबूर कर दिया जाता है। मुझ पर तेजाब फेंक कर अपनी भड़ास और कुंठा शांत की जाती है।
 
जब भी मेरे साथ होने वाले इन तमाम दुर्व्यवहारों के खिलाफ मैं आवाज़ उठाती हूँ, तो मेरे अस्तित्व को छोटे-बड़े कपड़ों में उलझा दिया जाता है। फिर से मुझे कपड़ों से झांकती देह बना दिया जाता है। पर उन मासूम बच्चियों का क्या? उनके साथ किये गए दुराचरण का क्या? क्या वे नन्हें-मुन्हें किसी भी प्रकार की उकसाहट का कारण बन सकते हैं? क्या ऊपर से नीचे तक कपड़ों में ढकी औरत कटाक्ष नज़रों, अश्लील इशारों और फब्तियों से बच पाती है? 

सदियों से हर लड़के को भी तो ऐसी ही पत्नी और प्रेमिका चाहिए - जिसका चेहरा चाँद सा उज्ज्वल हो। जिसकी आँखें झील सी निर्मल और सागर सी गहरी हो, हिरणी सी चंचल, बड़ी-बड़ी और नशीली हो। जिसके होंठ गुलाब की पंखुड़ियों से कोमल और रसीले हो। जो रेशमी जुल्फ़ों, छरहरी काया और मादक उभारों की स्वामिनी हो। पर मैं कैसे समझाऊं? मेरी आँखें सिर्फ सागर सी गहरी नहीं है। इनमें गहराई है तुम्हारे अंतर्मन को समझने की; इनमें चमक है कुछ सपनों, ख्वाहिशों और अरमानों की; इनमें आंसू हैं जो तुम्हारी छोटी सी तकलीफ़ में भी बहने लगते हैं; इनमें दर्द है तुम्हारी चाहत पर कुरबान हुई कई उम्मीदों का। मेरे होंठ सिर्फ गुलाब की पंखुड़ियों से कोमल नहीं है। इनसे झरते हैं फूल ममता के; इन पर ठहरे हैं कई शब्द जो मुखरित होना चाहते हैं; इन पर जमी है आँखों से बहते अश्रुओं की कई बूँदें जिन्हें सदियों से मैं पीती आ रही हूँ। मेरा वक्ष तुम्हारी वासना को तुष्ट करने के लिए नहीं है। इनसे बहता है क्षीर ममत्व का जो कारण है तुम्हारे अस्तित्व का। मेरा ह्रदय जिसमें बसता है अतुल्य प्रेम, त्याग, ममत्व, क्षमा, संवेदनशीलता और प्रेरणा...सिर्फ मोम सा नाजुक नहीं है। इसमें भरे हैं कई धधकते हुए ज्वालामुखी! समय आने पर बन सकती हूँ मैं रणचंडी भी! बन सकती हूँ मैं एक मजबूत, स्वावलंबी, अटल स्तम्भ!

मेरे अपने माता पिता और परिजनों ने भी तो मुझे देह बनाने में कोई कसर न छोड़ी। मेरी देह अगर बदरंग है तो उन्हें दिन रात मेरी शादी की चिंता सताएगी। आधुनिकता का लबादा ओढ़े आदिम युग के मानवों सा व्यवहार करने वाले मेरे परिजन जाति, गौत्र, धर्म, अपनी झूठी इज्जत और शान के नाम पर...मेरी, मेरे प्रेम और मेरे विश्वास की हत्या करने में भी नहीं हिचकते। इस बर्बरता को अपना मौन समर्थन देकर जायज ठहराने वालों की आँखों से आंसू नहीं लुढकते। दहेज़ प्रथा, कन्या भ्रूण हत्या, बाल विवाह ये सब कुरुतियाँ मुझे बस जिस्म भर बनाकर रख देने का षड़यंत्र है।

समकालीन हिंदी साहित्य के रचनाकारों! मेरी मुक्ति, सम्मान और स्वाभिमान के पक्ष में बन रही जन चेतना की आड़ में तुमने भी तो मेरी एक पोर्न छवि गढ़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मेरी प्रिय नारीवादी लेखिकाओं! क्या तुम्हें पुरुष के समान अधिकारों के रूप में देह-वृतांत का हक़ ही चाहिए था? अपने लेखन द्वारा गुदगुदी और सनसनी पैदा करने के लिए; प्रकाशित, प्रशंसित, अनुशंसित और पुरस्कृत होने के लिए...क्या तुम जानती हो तुमने न जाने कितनी पीढ़ियों के लिए मुझे फिर से उसी हाड़-मांस के दायरे में सीमित कर दिया है। तुम ही सोचो...देह के बाज़ार और इस उन्मादग्रस्त साहित्य में क्या भर अंतर है, जिसका प्रयोजन सिर्फ काम वासना को बढ़ाने के अलावा और कुछ भी नहीं।

मीडिया, अख़बार और कैमरे के पीछे छिपे संवेदना शून्य पुरुषों! तुम्हें हमेशा ऐसे ही प्रसंगों की तलाश रहती है जिसमें मैं एक देह में तब्दील होकर तुम्हारी सारी पुरुष जमात की यौनिकता को संतुष्ट करती रहूँ। किसी मॉल के चेंजिंग रूम से लेकर किसी होटल के कमरे तक छिपे कैमरे से नारी देह के दृश्यों को चुराकर उन्हें ऊप्स मोमेंट्स और शोइंग एसेट का कैप्शन देते तुम्हें लज्जा नहीं आती? फैशन शो में किसी के कपड़े फटने से लेकर, छेड़छाड़ और रेप जैसी घटनाओं तक का वीडियो तुम बड़ी निर्लज्जता से बना लेते हो। उसे तत्काल प्रसारित कर देते हो ताकि कहीं तुम्हारी एक्सक्लूसिव स्टोरी तुमसे पहले किसी और के हाथ न लग जाए।

मुझे जिस्म समझने वाले इन सब संवेदना शून्य लोगों से मैं पूछना चाहती हूँ - क्या शरीर से इतर मुझमें दिमाग नहीं है? क्या मुझमें भावनाएं नहीं है? क्या कुछ कर दिखाने का माद्दा नहीं है? जल, मिट्टी, अग्नि, आकाश और वायु इन्हीं पंच तत्वों से मुझे भी रचा गया है। मेरी अनुभूतियों के स्वर क्या तुम्हें सुनाई नहीं देते? मेरे भी सपने है जो सफलता के आकाश में साकार होना चाहते हैं। मंदिर की घंटियों सी सुरीली मेरी खिलखिलाहट हर ओर बिखरना चाहती है। महत्वकांक्षा की बेलें मन उपवन में फलना-फूलना चाहती है। क्या है मेरी चाह? एक सुन्दर, संवेदनशील, उच्च मानवीय दृष्टिकोण वाला सभ्य परिवेश ही न? जहाँ मुझे निर्णय लेने की आज़ादी हो, जहाँ मुझे अपने व्यक्तित्व और विशिष्टता को पहचान देने की स्वतंत्रता हो। मैं पुरुष को पछाड़ना नहीं चाहती। उससे आगे निकल जाना भी मेरा मकसद नहीं। मैं बस देह से इतर अपना अस्तित्व चाहती हूँ। एक मुट्ठी भर आसमान चाहती हूँ, जहाँ मैं अपने पखों को उड़ान दे सकूँ। एक चुटकी भर धुप और अंजूरी भर हवा चाहती हूँ, जहाँ मैं बिना किसी घुटन के सांस ले सकूँ। थोड़ी सी जमीन चाहती हूँ, जहाँ मैं बिना किसी भय के आत्मविश्वास से अपने कदम बढ़ा सकूँ। मुझे देवी की तरह पूज्या नहीं बनना है। मुझे बस इंसान समझकर समानता का व्यवहार पाना है।

हे पुरुष! कैसे तुम जब चाहे जब मुझे रौंद सकते हो? अपने अस्तित्व का कारण कैसे तुम भूल सकते हो? जिस्म तो शायद सिर्फ तुम हो जिसमें न संवेदना है, न कोई अहसास। तभी तो देह के छले जाने पर आसमान को भी चीर देने वाली मासूमों की चीखे तुम्हें सुनाई नहीं देती। तुम नहीं महसूस पाते कभी भी स्त्री के भीतर रिसते दर्द को। भावनात्मक जुड़ाव तो बहुत दूर...तुम तो मनुष्य होने के नाते भी स्त्री के प्रति नहीं उपजा पाते संवेदनशीलता।

मेरी प्यारी बहनों! तुम्हें भी अपनी सोच, अपने व्यवहार, अपने दिल और अपने दिमाग से घुट्टी की तरह सदियों से पिलाये इस कड़वे और कसैले स्वाद को निकालना होगा, जो दिन-रात तुम्हें एक जिस्म होने की अनुभूति करवाता रहता है। मुझे बताओ - कुछ लिंगगत विभिन्नताओं के अलावा क्या अंतर है तुममें और एक पुरुष में? तुम्हारी प्रखरता, बौद्धिकता, सुघड़ता और कुशलता क्या किसी रंग, रूप, यौवन, आकार या उभार की मोहताज है? तुम जानती हो न अपनी शक्ति? जिस दिन तुम अपना विस्तार करने की ठान लोगी उस दिन यह कायनात भी छोटी पड़ जायेगी। वह कौनसा स्थान है जहाँ तुम नहीं पहुँच सकती? राजनीति, प्रशासन, समाज सेवा, उद्योग, व्यवसाय, विज्ञान, कला, संगीत, साहित्य, मीडिया, चिकित्सा, इंजीनीयरिंग, वकालत, शिक्षा, सूचना प्रोद्यौगिकी, सेना, खेल-कूद से लेकर अन्तरिक्ष तक तुमने अपनी विजय पताका फहराई है। क्या तुम्हें सच में जरुरत है एक देह में तब्दील होकर अश्लील विज्ञापनों, सिनेमा, गानों और साहित्य का हिस्सा बनने की? क्या सच में तुम्हें जरुरत है अपनी मुक्ति को देह और कपड़ों तक सीमित कर देने की। याद रखो! देह और कपड़ों की चर्चा से स्त्री मुक्ति की जंग नहीं जीती जा सकती है।

जानती हूँ, पुरुष हमेशा से तुम्हें जिस्म के इस दलदल में फंसाए रखने के हजारों यत्न और षड़यंत्र करता रहेगा। तुम चाहे चौबीस घंटे काम करती रहो, दिन रात खपती रहो, फिर भी तुम्हारी तरक्की को तुम्हारी देह से जोड़ कर देखा जाएगा। तुम्हें लाखों डॉलर, पाउंड, दीनार और सोने का लालच दिया जाएगा। लेकिन तुम्हें इन सब षड्यंत्रों में नहीं फंसना है। तुम्हें नया टंच माल, तंदूरी मुर्गी, हॉट, सेक्सी और आइटम गर्ल इन सब तमगों को ना करना है। वस्तुओं के विज्ञापन में तुम्हें वस्तु नहीं बनना है। ये सब उपक्रम तुम्हें आज़ाद करने के नहीं तुम्हें गुलाम बनाने के हैं। तुम्हारे सौन्दर्य की नुमाइश कर तुम्हारे अंगों को खरीदने और बेचने के हैं। इस दलदल से बाहर निकलना बहुत मुश्किल है, पर मैं जानती हूँ कि तुम अगर चाहो तो पुरुषवादी मानसिकता के सारे षड्यंत्रों को धता बताकर अपना अस्तित्व बचा सकती हो, जो देह से परे उस सम्पूर्णता का है जो तुम्हारी शक्ति, बुद्धि, क्षमता, कुशलता, प्रखरता, तुम्हारे सपनों, स्वाभिमान, आत्मनिर्भरता और तुम्हारे आत्मविश्वास की लौ से प्रकाशित होता है।

Monika Jain 'पंछी'
(18/07/2014)
Essay on Women (Women's Day) in Hindi
Essay on Women (Women's Day) in Hindi
Hindi Essay on Women's Role, Status, Position in Indian Society
Hindi Essay on Women's Role, Status, Position in Indian Society

July 15, 2014

Shayari on Khamoshi in Hindi

ख़ामोशी शायरी

(1)

ख़ामोशी सा अपना कोई होता नहीं है
कुछ हो न पास तो कोई कुछ खोता नहीं है।

(27/03/2017)

(2)

ख़ामोशी टूटकर भी ख़ामोशी रह गयी
बहुत कुछ कहा और कहा कुछ भी नहीं।

(26/02/2017)

(3)

ख़ामोशी पी लेती है न जाने कितनी बातें
वो बोले-बोले-बोले...हम बस सुनते ही रह जाते।

(22/09/2016)

(4)

आज फिर शाम में क्यों घुलती सी उदासी है
आज फिर आँख में ठहरी एक बूँद प्यासी है
आज फिर मन क्यों चुप्पा-चुप्पा सा खोया है
जैसे कोई नन्हा बड़ी देर तक रोया है।

(23/09/2015)

(5)

मेरी इस ख़ामोशी से, किसे क्या हासिल होना था
वक्त ही बेरहम था शायद, उसे बस कातिल होना था।

(15/06/2015)

(6)

तुमसे बात भी करनी है
और कुछ कहने को भी नहीं।

(13/03/2015)

(7)

रहती है खुद से अक्सर एक शिकायत
कि ये शिकायत भला हम क्यों कर नहीं पाते?
खामोशियाँ यहाँ कभी भी सुनी नहीं जाती
और ये शोर के हिस्से हम बस बन नहीं पाते।

(02/03/2015)

(8)

ना बादलों के गरजने से, ना बिजलियों के कड़कने से
सहम जाती हूँ, जब भीतर में एक चुप्पा सा शोर होता है
ना ना करके भी अक्सर सुन लेती है मेरी साँसे
इस चुप्पी में छिपकर एक दिल बहुत रोता है।

(15/07/2014)

(9)

मेरे गुस्से पर तेरी ख़ामोशी
चुभती है कुछ इस कदर
कि दिल तरसता है कभी-कभी
बस एक तेरे गुस्से के लिए।

(10)

बुलाना छोड़कर कुछ वक्त गर ख़ामोश हो जायें
तड़पकर आयेंगे वो ऐसे कि फिर लौट जाना न बने।

(11)

किसको होता है पसंद खामोश होना
यूँ ही नहीं लगते किसी की जुबा पे ताले।

(12)

इन चुप्पियों का भी अपना ही एक किस्सा है
ना जाने कितना शोर इनका एक हिस्सा है
यूँ ही नहीं पसर जाती यहाँ-वहाँ खामोशियाँ
तड़पती है जब आवाज़ कोई, सन्नाटा तभी तो रिसता है।

(13)

दुआ आज भी रहती है, बसता अब भी खुदा है
ख़ामोश हैं दोनों क्योंकि हम खुद से जुदा हैं।

(14)

क्या चाहती हूँ, यह जाहिर करना ही नहीं मुझे
तुम समझ सके तो अच्छा, न समझे तो और भी अच्छा।

(15)

सन्नाटों ने फिर से एक आवाज़ लगाई है
तंग दिल बस्तियों के शोर अब सहे नहीं जाते
जहाँ मेरी खामोशियाँ सांस ले सके
ऐसे लफ़्ज अब कहीं भी तो कहे नहीं जाते।

(16)

कुछ ना कहना भी तो कहना ही होता है
हमेशा लफ्ज़ों की जरुरत नहीं होती बातों को।

(17)

ना आसूंओं से छलकते हैं
ना कागज पर उतरते हैं
दर्द कुछ होते हैं ऐसे
जो बस भीतर ही भीतर पलते हैं।

(18)

उफ़! ये सन्नाटे कितना शोर करते हैं
ना होठों से कुछ कहते, ना कागज पे उतरते हैं
किसने कहा दिल हल्का होता है लिखने वालों का
कितने ही है दर्द जो बस रूह से गुजरते हैं।

Monika Jain ‘पंछी’

(19)

किसी ख़ामोशी का एक सफ़हा पलट कर देखो तुम
जाने कितने अल्फाज़ों के रंग हथेली पे उतर आयेंगे।

(20)

वो लफ्ज़ जो ज़बान पर आकर ठहरा था
कौन जाने उसका किरदार कितना गहरा था
फ़ासिला क्या रहा होगा लबों से जुबां का
दम दरिया में तोड़ा और पास एक सेहरा था।

Malendra Kumar

July 11, 2014

Poem on Patriotism (Patriotic) in English

Be Patriot in True Sense

Mother’s day, father’s day, valentine’s day or independence day
All the important things are shrinking in particular one day
Writing poems, giving speeches, making posters and banners
Competitions, meetings, having snacks and the day is over.

Watching the patriotic movies and shedding a tear or two
Playing on mobiles patriotic hello tunes
Painting the screen savers with the colors of nation
Hoisting the flag and singing the national anthem
Showering the abuses on china and Pakistan
Filling the whole body with the colors of the flag of Hindustan.
Nowadays
Our patriotism has been concentrated in only few days
To show our patriotism, are these the only ways?

No, this is not the patriotism.

Towards motherland
Patriotism is the consistence sense of loyalty and respect
That is not reflected by just our words or ideas
but by our actions and interests.

Patriotism is not only sacrificing our life for the nation
It’s a broader term which is reflected by each of our action
We can truly be called patriot by building
a healthy, beautiful, rich, educated, crime free and ethical nation.

Whatever profession we are in
We should faithfully discharge our duties
Instead of talking about the love affairs of actors and actresses
We should keep an eye on political and social changes
and should stand against the wrong attitude and policies.

Be patriot in a true sense
Don’t make it mere a bookish word
Don’t do anything against national interest
And spread the glory of our nation in the whole world.

Monika Jain ‘Panchhi’
(11/07/2014)

July 9, 2014

Essay on Sense of Humor in Hindi

सेंस ऑफ़ ह्यूमर

मुझे अक्सर लड़कों या लड़कियों या दोनों के ग्रुप में चल रहे हंसी-मजाक समझ नहीं आते थे। शायद मेरे स्तर से ऊपर होते थे। सब को हंसी आ जाती थी पर मुझे हंसी ही नहीं आती थी। ज्यादातर बहुत छोटी सी या बच्चों वाली बातों पर ही हंसी आती थी और उसी के साथ रहते हुए बिना किसी ख़ास बात के भी बहुत ज्यादा हँसती थी जिसके साथ बिल्कुल सहज रहती थी। एक बार तो इतनी देर तक हंसी आई थी कि दोस्त ने हँसी को रिकॉर्ड कर लिया था। लेकिन ग्रुप वाली बातों में कभी-कभी ऐसा नहीं होता था तो किसी ने एक दिन कहा भी था - मोनिका, तुममें सेंस ऑफ़ ह्यूमर नहीं है। कई बातों के लिए तो आज भी नहीं है। 90% जोक्स या व्यंग्य (जिन्हें जोक्स माना जाता है) पर हंसी नहीं आती। लेकिन आजकल बिना बात के ही इतना हंस लेती हूँ कि कमी पूरी हो जाती है। लेकिन सेंस ऑफ़ ह्यूमर का तमगा लेकर फिरने वालों के सेंसेस कैसे हैं इस पर भी विचार करना बनता है :

07/03/2017 - गर्लफ्रेंड द्वारा फोन रिचार्ज और अपने बॉयफ्रेंड से सारा खर्चा करवाने के कई सारे जोक्स और किस्से यहाँ पढ़ने में आते हैं। कुछ तो बहुत निर्दयी किस्से होते हैं। बचपन से ग्रुप्स में बहुत कम रही हूँ और बोलती भी कम ही हूँ। व्यर्थ चर्चाओं में बहुत ज्यादा इंटरेस्ट भी नहीं आता तो मन कभी इस तरह से संस्कारित हुआ ही नहीं। लड़कियों के जो गुण अक्सर लड़कों द्वारा मजाक-मजाक में बताये जाते हैं उनमें से कई चीजों से खुद को रिलेट भी नहीं कर पाती। इन सब किस्सों के पीछे सच कितना है यह तो नहीं पता और लड़के कोई इतने भोले तो नहीं ही होते। कुछ मामले बेशक ऐसे हो सकते हैं। बाकी मेरे खुद के जीवन का उदाहरण तो हमेशा दोनों ओर से खर्चे वाला रहा है। इसमें हिसाब-किताब रखने की जरुरत नहीं होती। आप बस अपनी ओर से देने का ध्यान रखिये। निकट संबंधों में तो सामने वाला भी रख ही लेता है। और जहाँ शुद्ध प्रेम होता है (लगाव से रहित) वहां तो वैसे भी वापस कुछ पाने की कोई अपेक्षा रहती ही नहीं। बाकी कहीं आपकी बदले में कुछ पाने की अपेक्षा है और नहीं मिल रहा तो वैसे ही आप देना बंद ही कर देंगे।

अपने घर में भी मैं अपनी पीढ़ी में सबसे छोटी सदस्य हूँ। लेकिन छोटा होने या लड़की होने के नाम से यह सोचना कि बड़े भाई-बहनों को आप पर हमेशा खर्च ही करना चाहिए यह गलत है। उम्र या जेंडर कैसे आपको सिर्फ लेनदार बना सकता है? जितना और जिस भी रूप में आप देने में सक्षम हैं आपको देना भी चाहिए। हाँ, जहाँ आप सक्षम नहीं तो परिवार संस्था इसलिए ही होती है ताकि वहां पूरा सहयोग और सुरक्षा प्रदान की जाए।

तो लड़कों! तुम ये घिसे-पिटे जोक्स बनाना बंद करो और ऐसा अगर वाकई में कहीं हो रहा है जहाँ अनावश्यक फायदा उठाया जा रहा है तो सलाह यही है कि फायदा मत उठाने दो। सिंपल!

और लड़कियों! लड़कों को ऐसे जोक्स बनाने का मौका क्यों दिया जाए? या तो अपनी जरूरतों को थोड़ा सीमित करो या फिर अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए खुद सक्षम बनो।

13/08/2016 - कुछ दिनों से यहाँ रक्षाबंधन और गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड को लेकर बहुत जोक्स बन रहे हैं। राखी पर मैं मम्मी-पापा, भाई-भाभी, दीदी, भतीजियों सबको राखी बांध देती हूँ। कुछ सोचकर नहीं, किसी उम्मीद में नहीं...उस दिन का प्रभाव होता है और अच्छा लगता है इसलिए। बॉयफ्रेंड या पति होता तो उसको भी बाँध देती।...और यह सोचते हुए मुझे जरा भी अजीब नहीं लग रहा। आप चाहें तो इस बात के लिए मुझ पर हंस सकते हैं। लेकिन प्रेम तो बस प्रेम ही होता है, उसे बस बहाना चाहिए प्रकट होने का...रिश्ता चाहे कोई भी हो। शेष भावनाएं अपनी-अपनी जगह होती हैं। लेकिन मेरे लिए रक्षा सूत्र बस उस प्रेम को दर्शाने का एक तरीका भर है। कोई इसे सिर्फ भाई-बहन के त्यौहार के रूप में मनाये इस बात से कोई आपत्ति नहीं लेकिन जोक्स तो थोड़े स्टैण्डर्ड के बनाये जाए।

01/04/2015 - एक दो-तीन साल की बच्ची नमकीन के लगभग खाली पाउच से थोड़ी बची हुई नमकीन को हाथों से चाट-चाट कर इस तरह खा रही है जिसे हम तथाकथित सभ्य लोगों की भाषा में गँवारों की तरह खाना कहते हैं। उसके चारों तरफ खड़े उसके कुछ सभ्य रिश्तेदार उसको देख-देखकर हँस रहे हैं। कोई यह सोचकर हँस रहा है कि कितनी गँवार हैं, मम्मी-पापा ने खाने के मैनर्स तक नहीं सिखाये, खाने के लिए मरी जा रही है। कोई फोटो पे फोटो शूट कर रहा है और फनी से फनी फोटो के लिए उसे प्रेरित का रहा है। कोई ठहाकों पे ठहाकें लगाए जा रहा है, और वह इन सबसे बेखबर अपने काम में मस्त है। उसे समझ नहीं आ रहा कि ये लोग मुझपे क्यों हँस रहे हैं।

कई लोगों के लिए यह सामान्य हँसी-मजाक की बात है। यूँ तो मैं भी बहुत हँसती-मुस्कुराती हूँ पर पता नहीं क्यों मुझे दूसरों की ऐसी बातों पर कभी हँसी नहीं आती। इन ठहाकों के बीच उसे देखते हुए मेरे दिमाग में सिर्फ एक बात चल रही थी कि बच्चे कितने मासूम होते हैं। उन्हें नहीं आता किसी की हँसी उड़ाना। उन्हें नहीं पता होता कि कौन उनके लिए कैसे भाव रखता है। उन्हें नहीं आता झूठ बोलना या सभ्य होने का दिखावा मात्र करना। दिखावा इसलिए क्योंकि जो लोग सभ्यता से ऊपर से नीचे तक नहाये हुए हैं, उनके मन में कितनी ज्यादा और किस-किस तरह की भूख होती है, यह मैं बेहतर जानती हूँ, जिसके सामने किसी की यह असभ्य भूख तो कुछ भी नहीं है।

09/07/2014 - ये अधिकांश फेसबुक कविताओं को सस्ती तुकबंदी, घटिया जोड़-तोड़, जबरदस्ती की कविता, सरदर्द और भी बहुत कुछ उल्टा-सीधा कहने वाले विद्वान जन खुद को समझते क्या हैं? ये बेवजह का मजाक उड़ाने वाले लोग मुझे आज तक समझ नहीं आये। कोई कुछ सीख रहा है, लिखने की कोशिश कर रहा है तो पहले ही उसका गला घोंट दो? आप लोग क्या अपनी माँ के गर्भ से महान लेखक/कवि बनकर ही जन्में थे? अगर इतने ही साहित्य के हितैषी हैं तो अच्छा नहीं लिखने वालों को सुधार करने में मदद कीजिये, उन्हें उनकी कमी बताइए और वह नहीं कर सकते तो पढ़िए ही मत, अनफॉलो कर दीजिये। ये बार-बार हंसी उड़ाने का क्या फायदा है? वैसे सच कहूँ तो जिन्हें आप सस्ती कवितायेँ कहते हैं उन्हें पढ़कर इतना सरदर्द नहीं होता जितना आपकी इस तरह की पोस्ट्स से आती अहंकार और जलन की बदबू से होता है। हाँ, मेरे पास भी अनफॉलो का विकल्प है, पर क्या हैं न कि मुझे देखना होता है कि ये महँगी कवितायेँ आखिर होती कैसी हैं?

Monika Jain ‘पंछी’

July 8, 2014

Quotes on India (Indian) in Hindi

India and Indians Quotes 

  • 30/11/2016 - भारत जो इतनी विविधताओं वाला देश है; जहाँ शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत आवश्यकताएं सबको समान रूप से उपलब्ध नहीं वहां कैशलेस इकॉनमी के डंडे से सबको हांका नहीं जा सकता। कैशलेस इकॉनमी कई मायनों में अच्छा ऑप्शन है लेकिन सबसे पहले यूजर्स तो कम्पेटिबल हो। आधार आपने वैसा उपलब्ध करवाया नहीं और अचानक लोगों से टेक्निकली साउंड बनने की अपेक्षा भय पैदा करने के अलावा और क्या करेगी? पापा जो मैथ्स के लेक्चरर हैं, हालाँकि मैं उनसे एक-दो बार से ज्यादा कभी पढ़ी नहीं, क्योंकि उनका सारा समय उनके स्टूडेंट्स में ही चला जाया करता था/है। लेकिन वे हमेशा से अपने स्टूडेंट्स के बीच एक बेहतर शिक्षक के रूप में मान्य रहे हैं। लेकिन अगर बात तकनीक की हो तो आये दिन उनके फ़ोन में कोई ना कोई दिक्कत होती रहती है। बार-बार प्रक्रिया बताने के बाद भी उनके इन्टरनेट सम्बन्धी जितने भी काम है, वो ज्यादातर मैं ही करती हूँ। और यह कोई हंसने वाली बात नहीं है। उम्र के इस पड़ाव में एकाएक किसी से टेक्निकली साउंड बनने की अपेक्षा नहीं की जा सकती है। इसके अलावा पृष्ठभूमि और रूचि भी मायने रखती है। मेरी खुद की भी कोई टेक्निकल एजुकेशन कभी भी नहीं रही। हाँ, सामने फ़ोन, कंप्यूटर हो तो हम कई सारी चीजें खुद सीख जाते हैं लेकिन यह चीज थोड़ा सा समय मांगती है और इसके बाद भी सबके लिए खुद-ब-खुद सीख पाना संभव हो ऐसा जरुरी नहीं। ऐसे में अंतराष्ट्रीय स्तर पर हवा में उड़ने के सपने देखने और दिखाने वाले पहले पाँव के नीचे की जमीं मजबूत करने की कार्यवाही करते तो बेहतर होता। जहाँ शिक्षा के माध्यम, स्तर, सुविधाएँ कुछ भी एक सी नहीं वहां यह तथाकथित तकनीकी क्रांति पता नहीं क्या गुल खिलाएगी? 
  • 07/05/2016 - हम भारतीय बाहरी संस्कृतियों से भी कचरा लेते हैं और अपनी संस्कृति से भी कचरा ही...और उस कचरे को बचाने के लिए जान लेने और देने को उतारू भी रहते हैं।
  • 15/08/2014 - अब तक सब कहते आये हैं 'हमें भारतीय होने पर गर्व है।' मुझे उस दिन का इंतजार है जब भारत हम पर गर्व महसूस करेगा।
  • 08/07/2014 - सामान्यत: जितने भी कदम उठाये जाते हैं वे आर्थिक विषमता को बढ़ावा देने वाले ही होते हैं। आर्थिक समानता का सपना क्या कभी साकार हो पायेगा? आर्थिक विषमता की खाइयों से उपजे विकास का खोखलापन किसी को नज़र आता क्यों नहीं?
  • 16/11/2013 - हमारे देशवासियों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि बिना अपना दिमाग इस्तेमाल किये वे बस भेड़ चाल का हिस्सा बन जाते हैं। प्रकृति ने कान दिए हैं सुनने के लिए, आँखें दी है देखने के लिए और दिमाग दिया है सुने और देखे हुए पर सोचने के लिए...पर सोचने का काम तो हमें करना ही नहीं। कोई बात सुनी नहीं कि बस अंधविश्वासियों की भीड़ उमड़ पड़ी। नमक की कमी की अफ़वाह फैली तो लोग 150 और 300 रुपये किलो पर नमक खरीदने पहुँच गए। सुनी सुनाई बातों पर भरोसा करने का ही दुष्परिणाम है कि हमारे देश में हत्यारे, बलात्कारी, रिश्वतखोर, चोर, भ्रष्टाचारी और मानवता को शर्मशार कर देने वाले लोग भी भगवान की उपाधि पा लेते हैं और भगवान की तरह पूजे भी जाते हैं। किसी देश के नागरिकों के लिए इससे ज्यादा शर्म की बात और क्या हो सकती है? 

Monika Jain ‘पंछी’

June 16, 2014

Poem on Gender Equality in English

(1)

Equality is When...

People are talking about
gender equality since long.
But they are taking
its meaning in wrong.

'Time is bad' by saying this
So many restrictions are
imposed on me.
Equality is when
no fear will torture me.

I will consider the equality
when from college to home
I can go alone...
without facing any gazing eyes
and bad intentions of some morons.

'You are a girl'
by hearing this
I won't have to compromise.
Equality is when
my good and bad I can decide.

When there will be
no discrimination
among girls and boys.
I will consider equality
When I won't be treated as toys.

Only judicial laws
can't give me right of equality.
There is a need of
changing the narrow mentality.

Monika Jain 'Panchhi'
(08/2013)

(2)

Handful of Freedom

Mom! Is there not such sky
from where daily I can bring 
a handful of freedom.

Freedom from those staring eyes
that doesn’t allow me to walk 
unfazed on the paths.

Freedom from those taunts, jokes and teasers
that repeatedly gives me the feeling of 
being only a body, not a soul.

Freedom from those 
thousands of restrictions and advices
where two needles of watch decides 
when I should go out of the house.

Freedom from the terror
 that is constantly growing
while turning the pages of daily newspapers 
filled with bloodstained shouts.

Freedom from that illusion of independence
in which women liberation is defined only by
 showing of her body parts.

Freedom from that narrow minded thinking
where women’s honor and respect is 
linked only with her body.

Freedom from that orthodox opinion
where innocent loses her honor not the guilty.

Freedom from the competition
that is introducing men and women as an opponents
Instead of considering as each other’s complement.

Mom! I have to bring a handful of freedom daily
So that I can make a world
where my thoughts, confidence and abilities can breath freely.

Monika Jain ‘Panchhi’
(16/06/2014)

June 2, 2014

Unity in Diversity Quotes in Hindi

Unity in Diversity / Caste System Quotes

  • 20/08/2016 - भेदों को मिटाने का तरीका कहीं भेदों को मजबूत करने वाला न हो...ख़याल रहे।
  • 16/04/2016 - हर किसी के लिए उस भाव को समझना मुश्किल है, जिसमें कोई व्यक्ति स्वयं में सबको शामिल करने लगता है। 
  • 04/04/2016 - पहले भिन्नता को भेदभाव का आधार बनाना और फिर समानता के लिए संघर्ष...कहीं कुछ चूक रहा है। समानता संभव नहीं है। मुक्ति भेदभाव से चाहिए...अनूठेपन से नहीं। 
  • 20/02/2016 - आग लगने के बाद आग में घी डालने वालों! जलाने में आग भेदभाव नहीं करती...वह बस अपना धर्म निभाती है। 
  • 19/02/2016 - आसपास के बच्चों के खेलने के लिए जिद करने पर कई बार उनके साथ कार्ड्स खेलना भी होता है। उसमें एक गेम है 'ब्लैक क्वीन'। उसमें सब ब्लैक क्वीन से कितना डरते हैं। एक दिन महसूस हुआ इस ब्लैक क्वीन के साथ कितना रंगभेद हो रहा है।...और फिर बच्चे इसी तरह तो बचपन से ही ये सारे भेदभाव सीख जाते हैं। इसलिए मैं बदल-बदल कर 'रेड क्वीन' भी खेल लेती हूँ उनके साथ। अब से ब्लैक और रेड किंग भी खेला करुँगी। :)
  • 09/01/2016 - सब कुछ इतना सतत और सम्बंधित है कि शब्द और श्रेणियां सब मिथ्या लगने लगते हैं। 
  • 02/06/2014 - मतभेद थे, हैं और हमेशा रहेंगे। ऐसा कभी नहीं हो सकता कि आप मेरी सभी बातों से सहमत होंगे। ऐसा भी असंभव है कि मैं सिर्फ आपको खुश करने वाले शब्द ही बोलूं, पर मैंने इतने सालों में यही सीखा है कि मतभेदों को महत्त्व देकर नफ़रत पाल लेना, आक्रामक हो जाना, रिश्तों की तिलांजलि दे देना और संवाद को हमेशा के लिए खत्म कर देना बेवकूफी है। 
  • समर्थन और विरोध विचारों का होना चाहिए व्यक्ति का नहीं। मत भेद कभी मन भेद नहीं बनने चाहिए। 
  • किसी को भी भगवान् या शैतान बना देने की जल्दी जितनी जल्दी छूट जाए... बेहतर है इस दुनिया के लिए और हमारे लिए भी।
  • वैदिक काल में, प्राग्वैदिक काल में, आर्यों में, अनार्यों में, सप्त सिन्धु के भीतर, सप्त सिन्धु के बाहर...अपनी और दूसरों की जड़ें खोजते प्रिय बंधुओं! जड़ों तक पहुँचना अच्छी बात है...पर जड़ों की जड़ें कहाँ पहुँचती है, उसका भी ख़याल रखना। अंतत: तो मूल एक ही है। 
  • हम जब-जब अपने आपको श्रेणीबद्ध करने लगते हैं, तब-तब अपनी संभावनाओं के द्वार को बंद करने लगते हैं। 
  • विभाजन सुविधाओं के लिए किये जाते हैं...उन्हें जकड़कर और पकड़कर बैठने के लिए नहीं। वैसे भी सब कुछ इतना अंतर्संबंधित है कि कोई स्पष्ट रेखा खींची ही नहीं जा सकती।
  • श्रेणियां मात्र सुविधा के लिए होती है...लेकिन जो लोग खुद को श्रेणियों में घनघोर रूप से विभाजित करते लगते हैं, वे सभी बस अपने ही प्रतिबिम्बों के विरुद्ध खड़े होने लगते हैं। 
  • जातियां बनाना हम इंसानों की फितरत है। हम हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई नहीं बनायेंगे तो आस्तिक और नास्तिक बना देंगे, वामपंथ और दक्षिणपंथ बना देंगे, शिक्षित और अनपढ़ बना देंगे and so on.... खैर हमने भाषाएँ बनायी है तो उसका उपयोग तो करेंगे ही। सबसे विकसित मस्तिष्क पाया है तो उसका भी उपयोग करेंगे ही। बस इतना भर ख़याल रहे कि किसी भी शब्द से हम इतना अधिक न जुड़ जाएँ कि वह शब्द ही हमारा विधाता बन जाए। उपयोग ठीक है, दुरूपयोग करते समय बार-बार हजार बार सोचना।
  • प्रकट हो या अप्रकट यह जातीय मानसिकता हर दूसरे व्यक्ति में पायी जाती है जिसके पीछे विलुप्त हो जाते हैं इंसान को इंसान बनाने वाले गुण। 
  • ‘फूट डालो, राज करो’ का दंश हम लम्बे समय तक विदेशी ताकतों का गुलाम बनकर झेल चुके हैं। अब देश के भीतर ही देश के अनेकों दुश्मन पैदा हो गए हैं, जो सिर्फ अपने व्यक्तिगत हितों के लिए फिर हमें बांटकर लड़वाना चाहते हैं, और इन दंगों की आग में अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेकना चाहते हैं। 
  • बहुत सोचे-समझे तरीके से हर बात में जाति और धर्म को घुसेड़ दिया जाता है। जातिगत जनगणनाओं का उद्देश्य भी शायद जाति सम्बन्धी आंकड़ों को प्राप्त कर अपनी राजनैतिक लालसाओं को मूर्त रूप देना ही हो। 
  • वर्गों, जातियों, धर्मों और समुदायों में बँटकर कोई भी देश तरक्की नहीं कर सकता, पर राजनैतिक पार्टियाँ अपने राजनीतिक हितों को साधने के लिए डिवाइड एंड रूल का गेम बहुत शातिर तरीके से खेलती आई हैं। राजनेताओं के मंसूबे तो पूरे हो जाते हैं पर जातिगत आरक्षण में फायदा देखने वाले ये भूल जाते हैं कि आरक्षण का लाभ भी उचित दावेदार को नहीं मिल पाता। यहाँ भी दबंगई और पैसे की ताकत ही काम करती है। 
  • ‘फूट डालो और राज करो’ एक ऐसी रणनीति है जो विभिन्न देशों के बीच, देशों के विभिन्न क्षेत्रों के बीच, राजनीति में, समाज में, धर्म में, एक ही समुदाय या जाति में और यहाँ तक कि एक परिवार में भी अपने स्वार्थों को सिद्ध करने के लिए एक व्यक्ति विशेष या कुछ व्यक्तियों के समूह द्वारा अपनाई जाती है। अक्सर कारगर भी सिद्ध होती है। 
  • जब तक पूरे दिन भर जाति-जाति करते रहोगे तब तक तो जाति कभी नहीं जाने वाली।

Monika Jain ‘पंछी’

June 1, 2014

Essay on Religious Extremism (Intolerance) in Hindi

धर्म के रक्षक ही हैं धर्म के भक्षक

14/10/2016 - नास्तिक सम्मलेन पर हुए आक्रमण के बारे में सुनकर यही कह सकती हूँ कि भीतर से इतने डरे हुए लोग खुद को धर्म रक्षक कहते तो जरा भी अच्छे नहीं लगते। हाँ, अपनी सत्ता और भोगों के अवश्य रक्षक हैं तभी कुछ छिन जाने का इतना डर लग रहा है।...और इतना डर है इसलिए ही दूसरों को डरा रहे हैं। मुर्खता की हद पार कर लेने वाले ये नियंत्रण और आक्रमण विद्रोह, चिढ़ और भेदों को बढ़ाते हैं, कम नहीं करते। वाकई धार्मिक होते तो न दूसरों की स्वतंत्रता छीनने की कोशिश करते और न ही अपनी गुलामी और कुंठा का यूँ सरेआम प्रदर्शन! आस्तिक सम्मेलनों की तरह ही नास्तिक सम्मलेन से भी अधिक मतलब था नहीं क्योंकि कई मामलों में विचार नहीं मिलते। लेकिन फिर भी कुछ नया हो रहा था तो रोज पोस्ट पढ़ते-पढ़ते अवचेतन में कहीं जरा सी उत्सुकता तो थी ही कि क्या आउटपुट रहेगा? कुछ मुद्दे वाकई जरुरी भी लगते हैं।...पर लकीर की फ़कीर महान आतंकवादी आत्माओं का क्या किया जाए?

बहुत पहले एक पोस्ट के लिए इनबॉक्स में धमकी मिली थी। पोस्ट कुछ इस तरह से थी :

01/06/2014 - ये धार्मिक आस्था भी बड़े कमाल की चीज है। लोग निम्न समझी जाने वाली जातियों के घरों का पानी तक नहीं पीते, पर कूड़े-करकट, मल-मूत्र से भरी नदियों में स्नान करने से परहेज नहीं करते, चरणामृत के नाम पर पता नहीं कितने गंदे पानी का आचमन कर जाते हैं। है न कितनी अजब-गज़ब की बात।

धमकी मिली तो फिर अगले दिन इससे भी बड़ी पोस्ट की। जो इस तरह थी :

02/06/2014 - सबसे पहले तो मैं ये बता देना चाहती हूँ कि मुझे किसी भी धर्म या जाति विशेष से पहचाना जाना पसंद नहीं है। मैं एक प्राणी मात्र हूँ और मेरा धर्म प्रेम है। ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं ये बात मुझे कभी परेशान नहीं करती। क्योंकि मेरे लिए अच्छाई या सजगता ही ईश्वर का रूप है, और अच्छाई की ओर कदम बढ़ाने के लिए बुराई और बुरे लोग मेरे लिए उत्प्रेरक का काम करते हैं।

धर्म के नाम पर मार-पीट, गाली-गलौच, धमकियों पर उतर आने वाले; आस्था-आस्था का ढोल पीटकर उल्टी-फुल्टी, गलत-सलत सभी बातों को सही ठहराने वाले और उन्हें दूसरों पर थोपने वाले ये बात अच्छी तरह से समझ लें कि ऐसा करके वे खुद अपने ही धर्म के सबसे बड़े दुश्मन बन रहे हैं। आप भले ही इस भ्रम में जीते रहें कि आपके ये कृत्य आपको धर्म का रक्षक कहलवायेंगे, पर सच सिर्फ इतना है कि आपके ऐसे कार्यों से तथाकथित धर्मों के प्रति बस घृणा ही उपजती है। आप आतंकवादियों से जरा भी कम नज़र नहीं आते।

कितनी अजीब बात हैं न! लोग धर्म के लिए जान दे देते हैं, खून की नदियाँ बहा देते हैं, तलवारें उठा लेते हैं, गोलियां चला देते हैं, बस कुछ नहीं करते तो वह है धर्म का अनुसरण। उन्हें सिर्फ और सिर्फ अपने धर्म का तमगा प्यारा है। सिर्फ अपने हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई (अभी तो इनके भी बहुत सारे भेद-विभेद हैं) होने पर गर्व है, और नीचता की सारी हदें पार कर लेने पर भी उनका ये नाम, तमगा और गर्व शर्मसार नहीं होता। जिसे कभी देखा तक नहीं, उस अदृश्य भगवान् के लिए वे अपने भाई-बहनों का खून तक करने को तैयार हो जाते हैं। यही सिखाता है आपका धर्म? इसी से खुश होते हैं आपके ईश्वर?

धर्म का मतलब आप जैसे ढोंगी कभी नहीं जान सकते, कभी भी नहीं। आप या तो धर्म के नाम पर निर्दोष पशुओं की बलि देंगे या फिर प्रतिमाओं का विसर्जन कर जल को प्रदूषित करेंगे। अपनी बुराइयों का विसर्जन आपसे कभी नहीं होगा। दया, करुणा, ममता, सहिष्णुता, समानता ये सब क्या होता है, ये आप नहीं जान सकते। धर्म का पालन करना है तो सबसे पहले दूसरों के साथ वही व्यवहार करना सीखिए जैसा आप खुद के लिए चाहते हैं।

दशहरे पर आप बुराई के प्रतीक रावण को जलाएंगे, होली पर होलिका दहन करेंगे...पर अपने मन की बुराइयों के दाह का उत्सव? क्या कभी वो मनाया जाएगा? ईद पर बकरों की बलि के बारे में आप कुतर्क देंगे कि अल्लाह को अपने प्रिय का अर्पण करना होता है। ये क़ुरबानी है। अरे भाई! अल्लाह को खुश ही करना है तो खुद की बलि क्यों नहीं दे देते? हालाँकि मैं इसके पक्ष में नहीं हूँ लेकिन खुद के प्राणों से भी प्रिय भला कुछ होता है? अब अगर मैं हिन्दू धर्म की बलि की चर्चा नहीं करुँगी तो आप मेरी बलि देने को भी तैयार हो जायेंगे, तो बता दूँ कि बलि तो बलि ही रहेगी। धर्म का तमगा बदलने भर से उसका अर्थ कभी नहीं बदलेगा। ये कौनसे ईश्वर हैं जो किसी के खून से प्रसन्न होते हैं? और अगर ये ईश्वर है तो फिर दानव कौन होते हैं?

और तो और कुछ लोग कहते हैं - ईश्वर की मर्जी से पत्ता तक नहीं हिलता। वाह! कमाल के भगवान् हैं आपके जो अपने मनोरंजन के लिए हत्याएं, बलात्कार, लूटपाट, चोरी, डकैती सब करवाते रहते हैं। क्यों ईश्वर को इतना बदनाम कर रहे हैं आप? अपने किये धरे को क्यों हमेशा ईश्वर पर मढ़ते रहते हैं? रहम करिए अब ईश्वर पर भी और हम पर भी और ये धर्म का झूठा चौला उतार फेंकिये, गिन्न आती है आपके दोहरे आचरण से।

Monika Jain ‘पंछी’