December 28, 2014

Quotes on Ego (Attitude) in Hindi

Ego (Attitude) Quotes

  • 24/03/2018 - “When we connect to our true self we connect to each and everyone.” 
  • “पर ऐसा हमेशा क्यों नहीं रहता?”
    “क्योंकि अहंकार को 9,99,999…बहाने हैं।”
  • 18/02/2017 - जिन्हें ना कहने का घमंड होता है...उन्हें हाँ न कह पाने का पछतावा भी होता है।
  • 17/01/2017 - अगर निर्दोषिता के चरम पर पहुँचे सिद्ध जनों और मासूमियत के चरम पर विद्यमान प्रकृति जैसे पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, बच्चों...आदि के समक्ष भी हमारा अहंकार छोटा नहीं पड़ता तो समझो समस्या बहुत बड़ी है...बहुत बड़ी है। 
  • 24/12/2016 - आप मात्र शब्दों की पोटली लेकर घूमेंगे और चाहेंगे कि विमर्श हो...नहीं हो पायेगा। दरअसल वहां चाहत विमर्श की होती भी नहीं, अहंकार बस येन-केन-प्रकारेण जीतना चाहता है।
  • 03/10/2016 - 'मेरा' से 'मैं' का रास्ता...कितनी मुश्किलों का वास्ता...रोज ही भटक जाते हैं।
  • 10/08/2016 - अहंकार ध्यानाकर्षण चाहता है। इसलिए वह मोह-घृणा, मित्रता-शत्रुता दोनों के साथ सहज रहता है। लेकिन निरपेक्षता उसे असहज और बैचेन करती है। यही कारण है कि ध्यानमग्न महावीर के कानों में भी कीले ठोक दिए जाते हैं और अकारण मुस्कुराते बुद्ध के मुंह पर भी थूक दिया जाता है। 
  • 07/07/2016 - अहंकार इतने सूक्ष्म छिद्रों से हमारे भीतर प्रवेश कर जाता है कि हमें खुद पता नहीं चलता। यहाँ तक कि अहंकार न होने का अहंकार भी निर्मित हो सकता है। कभी-कभी हमें पता भी होता है पर हम इग्नोर कर जाते हैं। वस्तुत: हमारे होने का कारण अहंकार ही है। हाँ, जहाँ भी जरा सा अतिरेक होता है, यह दूसरों को स्पष्ट नज़र आने लगता है। लेकिन मिथ्यादृष्टि से सम्यकदृष्टि की इस यात्रा में इतने असंख्य स्थान हैं कि हम अहंकारी-निरहंकारी, सज्जन-दुर्जन, अच्छा-बुरा जैसे वर्गों में विभाजन कुछ समझने-समझाने की दृष्टि से तो कर सकते हैं (क्योंकि भाषा के पास और कोई तरीका नहीं) लेकिन किसी के बारे में निष्कर्ष बनाने की इस दृष्टि से हमें जितना संभव हो बचना चाहिए।
  • 05/07/2016 - सबसे गहन बातों के अनर्थ सबसे अधिक होते हैं। क्योंकि अहम् अक्सर यह स्वीकारना नहीं चाहता कि समझ नहीं आया।
  • 16/04/2016 - अहंकार श्रेय नहीं देता, वह सब कुछ अधीन कर लेना चाहता है।
  • 13/02/2016 - अक्सर कोई व्यक्ति किसी बात को उतना और उस तरह ही बताता है जिससे उसका स्वार्थ और अहंकार संतुष्ट हो सके। लेकिन हमेशा याद रखें...आधा सच...पूरा झूठ होता है। 
  • 02/02/2016 - प्रेम ही समाधान है और प्रेम के मार्ग की सिर्फ एक ही बाधा है - अहंकार (मैं का विस्तार)। काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष...सभी अहंकार के ही उप उत्पाद हैं। 
  • 27/01/2016 - जब तक भावनाएं आहत होती रहेगी तब तक सीखना बाधित रहेगा। जब तक महापुरुषों को हम अपनी-अपनी संपत्ति मानकर चलेंगे तब तक उनके विचारों की हत्या करते रहेंगे। जब तक शब्द-शब्द में, भाव-भाव में, कर्म-कर्म में हम अपने अहंकार की तुष्टि खोजते रहेंगे तब तक धर्म से दूर रहेंगे। 
  • 31/08/2015 - एक पुरुष के अहंकार को कभी अनजाने में भी चोट पहुँच जाती है तो वह चोट पहुँचाने वाले के लिए फिर कभी पहले वाला पुरुष नहीं रहता। एक स्त्री का मन जब बुरी तरह छलनी हो जाता है तब वह किसी के लिए भी पहले वाली स्त्री नहीं रहती, खुद के लिए भी नहीं।
  • 06/07/2015 - जो अहंकार या भय के वशीभूत होकर हुआ है वह त्याग नहीं हो सकता। वह तो अहंकार और भय की पकड़ हुई। त्याग (छूटना) साहसी और संवेदनशील ह्रदय का काम है। त्याग दृश्य और अदृश्य को छोड़ने और उनके साथ होने, दोनों में हो सकता है। महत्वपूर्ण बस यह है कि छोड़ा क्या जा रहा है और पकड़ा क्या जा रहा है और दोनों कार्य किये क्यों जा रहे हैं। 
  • 28/05/2015 - अपने अहंकार को ताक पे रखकर जब हम अपनी गलती स्वीकार करते हैं, उसकी जिम्मेदारी लेते हैं, उसे न दोहराने का संकल्प लेते हैं तो यकीन मानिए हम कुछ अच्छा बुन रहे होते हैं।
  • 17/03/2015 - देने का अहंकार कभी इतना ज्यादा न हो कि जो मिल रहा है उसका मूल्य ही समझ न आये। देने के साथ अहंकार शुन्यता और ग्रहण करने के साथ कृतज्ञता न हो तो दोनों ही महत्वहीन है। 
  • 28/12/2014 - 'मेरी पोस्ट पर लाइक और कमेंट ना करने वालों को फ्रेंडलिस्ट से बाहर कर दूंगा/दूंगी।' बड़े-बड़े लोगों के ये बच्चों वाले स्टेटस पढ़कर सच बहुत हँसी आती है। 
  • कोई भी मुद्दा हो सब अपनी अनुकूलताएँ खोजते लगते हैं। हर एक को खुद को सही सिद्ध करना है, अपने सभी विरोधाभासों के साथ और दूसरे को गलत सिद्ध करना है उसके सभी विरोधाभासों के कारण। बस मुद्दे बदलते रहेंगे और वक्तव्यों की अदलाबदली जारी रहेगी। चंद शब्दों और प्रतीकों का मोह इतना ज्यादा है कि उन्हें बचाने के लिए सारे अर्थ अनर्थ हो जाए फर्क नहीं पड़ता। यह सिर्फ और सिर्फ अहंकार की लड़ाई है। बाकी जिस चीज का बचना जरुरी है वह तो सिर्फ ह्रदय में ही बच सकती है...और कोई स्थान उसके लिए है ही नहीं।
  • कुछ पाठक इतने अच्छे लेखक होते हैं कि पोस्ट को पढ़ने से पहले ही अपने विचार रख देते हैं। :) बतौर पाठक अगर हम अपने विचार रखना चाहते हैं तो सबसे पहले पोस्ट को ध्यान से पढ़ना और जिस सन्दर्भ में वह लिखी गयी है, उसे समझने का प्रयास करना जरुरी है। सन्दर्भ तक हम न पहुँच पायें इसकी सम्भावना है। किसी और सन्दर्भ तक हम पहुंचे इसकी भी पूरी सम्भावना है। ऐसे में हम विचार जरुर रखें लेकिन इस तरह से नहीं की वह थोपना या हावी होना लगे। विमर्श विनम्रता के धरातल पर हो...अहंकार के धरातल पर नहीं। 
  • जिन व्यक्तियों की चर्चा का एकमात्र उद्देश्य येन-केन-प्रकारेण जीतना हो, उन्हें जीतने दिया जाना चाहिए। वैसे गंभीर स्थिति होने पर उनके युद्ध का मैदान गायब भी किया जा सकता है।
  • भावुकता और जागरूक संवेदनशीलता का अंतर अहंकार और निरहंकारिता का अंतर है।
  • 'मैं', 'मेरा', 'मुझे' सिर्फ एक भ्रम ही तो है, जिसमें गुजर जाती है सारी ज़िन्दगी। सोचकर देखें तो क्या अस्तित्व है अकेले 'मेरा', 'मैं' या 'मुझे' का? यूँ तो ये जीवन भी 'मेरा' नहीं। अकेले से बन सकता है किसी का जीवन भला? और ये शब्द...ये भी तो उधार के ही हैं। फिर भी 'अहम्' के मारे 'मैं', 'मेरा' और 'मुझे' पीछा नहीं छोड़ते।

Monika Jain ‘पंछी’

December 24, 2014

He She Love Conversation (Dialogues) in Hindi

प्रेममय संवाद 

(1)

He : तुम्हें पता है जब तुम बोलती हो तो हवाओं में रूमानियत की बूंदे तैरने लगती है। जब खिलखिलाकर हँसती हो तो प्यार की ये बूंदे बरसने लगती है। मैं बस खो जाता हूँ तुम्हारी मासूम आँखों की गहराइयों में, जो समेट लेती है इन बारिशों को।...और फिर मोती बनकर तुम्हारी आँखों में चमकती इन बूंदों में मुझे सारा जहाँ प्यार में डूबा नज़र आने लगता है। तुम्हारी आँखें, तुम्हारी बातें और तुम्हारी ये मुस्कुराहटें जीना सिखाती है। तुम प्यार में समायी हो या प्यार तुममें...नहीं पता...पर तुमसे ही जाना है मैंने प्यार को...बस तुमसे ही...। 

She : मेरे शब्दों से हवाओं में रूमानियत की रंगत है...क्योंकि ये शब्द बस तुम्हारे लिए हैं। मेरी खिलखिलाहट से भरी हंसी तुम्हें बारिश सी लगती है...पर इस बारिश को बरसाने वाले बादल तुम ही तो हो। मेरी आँखों में तुम्हें जो मासूमियत दिखती है...वह तुम पर मेरा विश्वास है।...और तुम्हें सारे जहाँ का प्यार मेरी आँखों में इसलिए नज़र आता है, क्योंकि इन्हें देखने वाली आँखें तुम्हारी है। मेरे पंखों को उड़ान देने वाले आकाश! तुमने भले ही मुझसे प्यार को जाना होगा...पर मैंने तुम्हारे साथ प्यार को जीया है...हर पल...हर लम्हा! मेरी आँखों, मेरी बातों और मेरी मुस्कुराहटों में जीवन भरने वाले सिर्फ तुम हो...सिर्फ तुम!

(2)

He : तुम्हें पता है तुम्हारी सबसे अच्छी बात क्या है? 

She : क्या? 

He : यही कि तुम बहुत-बहुत अच्छी हो। 

She : और तुम्हें पता है तुममें सबसे अच्छा क्या है? 

He : क्या? 

She : तुम्हें सिर्फ अच्छाई को सराहना ही नहीं आता। उसे सहेजना और संवारना भी आता है। 

He : वो इंसा ही क्या जो अच्छाई की कद्र ना जाने
        तुझसे जुड़े कोई और तुझे ना चाहे
        वो प्यार करना भी भला कहाँ जाने?

She : तेरे प्यार की गहराइयों की कायल हूँ मैं
         होठ सिल देती है अक्सर तेरी बातें
         खैर! तेरी तो खामोशियों की भी घायल हूँ मैं। 

(3)

She : तुमने सुनी है कभी खामोशियों की आवाज़? 

He : हाँ, बहुत बार। 

She : क्या कहती है खामोशियाँ? 

He : खामोशियाँ अक्सर करती हैं तुम्हारी बातें
        पता ही नहीं चलता
        कब जागता है दिन और कब सोती हैं रातें। 

He : अच्छा! तुमने भी सुना है कभी ख़ामोशी को? 

She : हाँ, सुना है न!

ये शोर भी लगते हैं मुझे 
अब खामोशियों के हिस्से
इन खामोशियों में सुनती हूँ मैं
हमारी खामोशियों के किस्से। 

(4)

He : किसी के इश्क में होना रूई के फाहों के बीच होने जैसा है। 

She : और खुद इश्क होना रूई का फाहा होना है। :) 

(5)

He : तुम नदी हो।

She : डूब जाओगे। नाव का इंतजार करो।

He : तुम नदी और नाव दोनों हो। :) 

(6)

He : तुम्हारी बातें बहुत हाई लेवल की होती है। ज्यादा नहीं पच पाती।

She : इसलिए तो तुम्हें बोलने को कहती हूँ। तुम अपने लेवल की बात करो।

He : क्या बात करूँ, तुम ही बताओ।

She : मैं तो अपने लेवल की ही बताऊंगी न? अच्छा, तुम तो मुझे हमेशा बच्ची कहते हो। तो पहले तुम ये डीसाइड करो कि मैं हाई लेवल की हूँ या बच्चों के लेवल की।

He : तुम हाई लेवल की बच्ची हो। :p :D 

(7)

He : कैसी हो?

She : अच्छी हूँ।

He : जब देखो तब बस अपनी तारीफ़ करवा लो। :/ 

Monika Jain ‘पंछी’

December 18, 2014

Quotes on Humanity in Hindi

Humanity Quotes

  • 22/05/2017 - बंदर के हाथ में उस्तरा देने से पहले बंदर का इंसान बन जाना जरुरी है। इधर उस्तरे ने तो खूब प्रगति, तरक्की और उन्नति कर ली है, लेकिन बंदर का इंसान बनना कहीं छूट गया है। वह पता नहीं क्या-क्या बनने लगा है। 
  • 18/01/2017 - अभी-अभी सॉलिड बेइज्जती करवाकर आ रही हूँ। कहीं पढ़ा कि दुनिया से इंसानों को हटा दो फिर कहीं कोई कचरा नहीं दिखेगा। 
  • 25/06/2015 - कमजोर पक्ष के साथ हमारा व्यवहार ही हमारे चरित्र को सही रूप में प्रकट करता है। हम उसका शोषण करेंगे, अपनी कुंठा बाहर निकालेंगे, उदासीन रहेंगे, या सद्व्यवहार से उसमें साहस, प्रेरणा और शक्ति का संचार करेंगे...यही तय करेगा हम कैसे इन्सान हैं। 
  • 22/03/2015 - कुछ लोगों को कैलकुलेटर बनना चाहिए था इंसान नहीं। 
  • 18/12/2014 - कुछ ख़बरों, कुछ घटनाओं और कुछ लोगों पर कुछ नहीं लिखा जाता...शब्द नहीं बनते। बस इतना ही - हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई....न बनो, न बनाओ। इस दुनिया को इंसानों की बेहद जरूरत है। बेहद! 
  • विरोधी विचारों को देखकर हम जितने अधिक बेचैन होते हैं, चिढ़ते हैं, कुढ़ते हैं, गुस्से में लाल-पीले होते हैं, तमतमाते हैं, आक्रामक होते हैं, हम उतने ही ज्यादा हिंसक और अहंकारी हैं, मानवता तो बहुत दूर की बात है।
  • कोई कहता है, 'दूसरी दुनिया की लगती हो', कोई 'एलियन', कोई 'आध्यात्मिक देवी' तो कोई ’बोधिसत्व’ कहता है। मैं तो इंसानियत की असीमित संभावनाओं को तलाश रही हूँ बस। पर समस्या यह है कि जैसे कुछ लोगों के लिए 'धर्म की परिभाषा बदल गयी है, वैसे ही 'इंसान' होने के मापदंड भी बदल गए हैं शायद। 
  • व्यक्ति एकांत क्यों चुनता है? जब उसे पता चलता है कि आसपास जो लोग हैं उनसे उसके विचार नहीं मिलते। जब उसे ना किसी पर नियंत्रण करने की इच्छा है और ना ही वह खुद पर किसी का नियंत्रण चाहता है। जब वह व्यर्थ की बहस, विवादों, लड़ाई-झगड़ों से खुद को दूर रखना चाहता है।...पर समस्या यह है कि जब आप एकांत और निरपेक्षता चुनेंगे, तब भी आप लोगों की आँखों में चुभेंगे। क्योंकि यहाँ हर कोई सिर्फ नियंत्रण चाहता है। 
  • एक किताब लिखी जानी चाहिए, जो सिर्फ नैतिकता और मानवता सिखाये...पढ़ी जाए, अमल की जाए, बस पूजी ना जाए। 
  • मनुष्य के मनुष्य बन जाने से बड़ी शायद ही इस जगत के लिए कोई और उपलब्धि होगी। 

Monika Jain ‘पंछी’

December 14, 2014

Spring Season (Basant Ritu Panchami) Poem in Hindi


(1)

ऋतुओं की रानी है आई

ऋतुओं की रानी है आई
धानी चुनर अपने संग लायी
जिसे ओढ़ धरती मुस्काई
कण-कण में उमंग है छायी।

डाल-डाल नव पल्लव आया
जैसे बचपन फिर खिल आया
रंग-बिरंगे फूलों पर
देखो! भँवरा फिर मंडराया।

तितली भी मुस्काती है
बहती हवा बासंती है
नील गगन में उड़ते पंछी
के मन को हर्षाती है।

रंग-बिरंगे फूल खिले हैं
पीले, लाल, गुलाबी, हरे हैं
कोयल की कूंकूं के संग
स्वर गीतों के भी बिखरे हैं

Monika Jain 'पंछी'
(19/03/2013)

(2)

मन गाये बसंत का राग

हाँ! 
मैंने उतार दिए हैं परेशानियों के केंचुल 
कर रही हूँ सामना मुश्किलों का हर पल 
चिंताओं के पत्ते झरा दिए हैं 
भय के सब बीज जला दिए हैं। 

अब पतझड़ में भी मैं 
आशाओं के गीत गा सकती हूँ 
फूल खिले ना खिले 
बसंत का उत्सव मना सकती हूँ। 

क्योंकि,
बाहर के बसंत से पहले 
भीतर एक बसंत का खिलना जरुरी है 
चाहे पसरा हो कितना भी सन्नाटा 
पर सृजन बिना ये जिंदगी अधूरी है। 

चाहे फूल ना खिलें सरसों के मेरे आँगन में 
पर सौन्दर्य को विस्तार तो पाना ही है 
चाहे सूख चूका हो मेरे लिए हर सरोवर 
पर प्रेम का झरना मुझे बहाना है। 

चाहे कोहरे की धुंध कभी हटे ना हटे 
एक आग को भीतर जलना ही होगा 
ना हो कोयल, तितलियाँ और भौंरे कहीं 
पर ह्रदय के गीतों को मचलना ही होगा। 

बेरंग और उदास जीवन में भी 
रंगों का सृजन हो सकता है 
जीवन हो चाहे दोधारी तलवार 
पर सपनों का वरण हो सकता है। 

तो क्यों ना 
भर दें अपने तन और मन को
हम बासंती बहार से 
नफरत और घृणा को जीतें 
प्रेम की फुहार से। 

सर्दी की ठिठुरन हो चाहे 
गर्मी की हो भीषण आग 
पतझड़ के मौसम में भी 
मन गाये बसंत का राग। 

लाल, नीले, हरे और पीले 
रंग सब खिलते रहें 
सपनों की बुझी चिताओं में भी 
बीज अंकुरण के मिलते रहें। 

Monika Jain ‘पंछी’
(14/12/2014)

December 8, 2014

Understanding Quotes in Hindi

Understanding Quotes

  • 21/04/2018 - तर्क किसी भी बात के पक्ष या विपक्ष में दिए जा सकते हैं। लेकिन समझ से निकले तर्क और कला से निकले तर्क में अंतर होता है। तर्क और कुतर्क में अंतर होता है। खुलेपन और कट्टरता में अन्तर होता है। इरादतन कुछ सिद्ध करने और विषय को समझने की इच्छा और विमर्श में अंतर होता है। समझ का उद्देश्य मूल रूप से किसी को गलत या सही सिद्ध करना नहीं होता, बल्कि हर पक्ष, हर दृष्टिकोण को समझना होता है। क्योंकि अपनी जगह तो सब सही ही होते हैं। न होते तो एक कदम भी न उठ सकता था, एक सांस भी न ली जा सकती थी। कोई अपराध भी नहीं हो सकता था। ऐसे में जब हम एक घोर अपराधी पर भी विमर्श करते हैं तो हम उसकी मनोदशा को समझने का प्रयास कर रहे होते हैं, न कि उसके कृत्य को जायज ठहरा रहे होते हैं। किसी में भी सुधार यदि संभव हो, वह तभी हो सकता है जब सबसे पहले उसका पक्ष, उसका मनोविज्ञान समझा जाएगा। सजा अस्थायी तौर पर ठीक है, क्योंकि सुधार के लिए एक मुकम्मल व्यवस्था और विशेषज्ञ नहीं है हमारे पास। और कई बार जड़ता इतनी अधिक होती है कि सुधार संभव ही नहीं लगता। फिर जो कम दोषी है उसे अधिक दोषी पर प्राथमिकता मिलनी ही चाहिए। लेकिन फिर भी सजा स्थायी समाधान नहीं है। 
  • 26/03/2017 - तुम्हारी अपने प्रति अकारण चिढ़, नेगेटिव वाइब्स और पूर्वाग्रहों को प्रेम, सहजता और समझ में बदलने की कीमियागिरी मैं न सीख पायी। सारे प्रयास विफल। फिर याद आया कि प्रयास थे इसलिए विफल होने ही थे। कुछ जगह अप्रयास ही हो जाना पड़ता है। फिर सफलता या विफलता का कोई प्रश्न शेष ही नहीं रहता। वैसे भी जिस दिन कोई खुद को समझ लेगा उस दिन वह सबको ही समझ लेगा।
  • 14/03/2017 - बहुत मुश्किल होता है वह समय जब आपको ऐसी चीजें नज़र/समझ आने लगती है जो सामान्यत: औरों को नज़र/समझ नहीं आ रही होती है।
  • 08/03/2017 - 100 में से 99 बार दूसरों की बचकानी प्रॉब्लम्स सुनो। उन्हें आत्महत्या से रोको। उन्हें डिप्रेशन में जाने से रोको। और जब एक बार गलती से भी खुद की किसी सीवियर प्रॉब्लम का जिक्र करने का मन हो तो एक तरफ से किताब कहेगी - तुम्हें सहारा क्यों चाहिए? और दूसरी तरफ से आवाज़ आएगी - तुम्हें सहानुभूति क्यों चाहिए? मतलब बच्ची की जान ही ले लो। क्यों जो समझता है हमेशा बस उसी से और ज्यादा समझ की उम्मीद होती है? :/
  • 31/12/2016 - कभी-कभी मेरा संक्षेप में लिखना बहुत कुछ स्पष्ट नहीं कर पाता। लेकिन वह एकदम सहज अभिव्यक्ति होती है इसलिए अभिव्यक्त हो जाती है। व्याख्या और विस्तार के लिए आप कॉमेंट्स देख सकते हैं और जो वहां नहीं है उस पर विमर्श कर सकते हैं। इसके अलावा किसी को भी पढ़ते समय हम सन्दर्भ समझने की कोशिश करें, भाषा की सीमा के चलते यह ज़रुरी है। यह सीमा ऐसी है कि किसी विषय पर आप 1000 पन्ने लिख दोगे तब भी यह बनी ही रहेगी। 
  • 24/12/2016 - बहुत सी ऐसी चीजें हैं जो समझ आती है पर समझाई नहीं जा सकती। कोई तरीका ही नहीं। बस एक सांकेतिक कोशिश हो सकती है। तब भी समझेंगे वही जो उस अनुभूति के धरातल पर उतरेंगे...कि शब्द पूरे नहीं पड़ते।
  • 11/08/2016 - स्मृतियों की तुलना में समझ पर निर्भरता का बढ़ते जाना ही वास्तव में बड़े होना है।
  • 03/07/2016 - ओशो, सद्गुरु, महावीर, बुद्ध, कृष्ण...बहुत थोड़ा पढ़ा है, पर सभी को पढ़ते हुए जो मूल, गहन और सूक्ष्म बात है, उसमें हमेशा समानता ही पायी है। और इस समानता को महसूस कर पाना भी एक अद्भुत अनुभव है। अगर अंतर है तो सिर्फ रास्तों में है, तरीकों में है...और ये रास्तें और तरीके भी कई तरह से ओवरलैप कर जाते हैं। बस हर व्यक्ति अनूठा है इसलिए उसे अपनी क्षमताओं, रूचि और परिस्थितियों के अनुरूप अपना रास्ता चुनना होता है। जिसका इस बात से अधिक सम्बन्ध नहीं कि आप किस धर्म के टैग के साथ जन्मे हैं। सबको पढ़िए लेकिन पूर्वाग्रहों और अहंकार से थोड़ा मुक्त होकर। हर जगह बहुत कुछ अच्छा मिल जाएगा, बस उद्देश्य अच्छा तलाशने का होना चाहिए। जिसे विवेक गलत कहता हो, उसे पकड़ने की जरुरत है ही नहीं। इसके अतिरिक्त व्यक्ति भौतिकवादी हो, आध्यात्मिक हो, कट्टर हो, समाज सुधारक हो या कुछ भी...तलाश सभी की एक ही है। अंतर बस इतना ही है कि कुछ भटक रहे हैं, कुछ संभल रहे हैं, कुछ संभल कर भटक रहे हैं। बहुत थोड़े से लोग होते हैं जो भटक कर फिर संभल जाते हैं और सँभलने के बाद फिर नहीं भटकते। मंजिल सभी की एक ही है फिर ये इतनी समस्याएं क्यों आती है? समस्या सिर्फ हमारी ग्रहणशीलता में है, और कहीं भी नहीं। हाँ, इस समस्या के कारण कई सारे हो सकते हैं। 
  • 29/01/2016 - तुम्हें कोई समझेगा...ये अपेक्षा ही बेमानी है। शायद तुम जन्मी ही हो सबको समझने के लिए। (बहुत दिनों से इंतजार में था...आज आखिर छलक ही आया। :’( ) 
  • 28/01/2016 - पढ़ो कम...समझो ज्यादा।
  • 09/02/2015 - ये समझदार और ब्रेव होने का जो ठप्पा होता है न!...कभी-कभी दिल करता है इसे उतार फेंके। क्योंकि ये समझदार और ब्रेव होना कितनी भी बड़ी समस्या हो या कोई भी दूसरी बात, लोगों को हमारे प्रति एकदम निश्चिन्त और बेफिक्र बना देता है : that you are brave and sensible so you can handle anything. पर कभी-कभी (बस कभी-कभी ही) मन करता है काश! हम भी गुस्सैल, जिद्दी, मूडी, बात-बात पे बिगड़ने वाले दुष्ट बच्चों की तरह अपनी हर बात मनवाने वाले होते तो लोगों को हमारी कितनी फ़िक्र होती। समझदार और ब्रेव होकर तो कभी-कभी रो भी नहीं पाते ठीक से। 
  • ज्यादातर पोस्ट्स पर कमेंट करने के लिए मेरे पास कुछ होता ही नहीं है। जो बात पसंद आ जाती है या जिससे सहमति अधिक हो उसे लाइक कर देती हूँ। जिससे सहमति कम या न हो उसे छोड़ देती हूँ। बहस या चर्चा में पड़ने के सार्थक परिणाम नगण्य ही देखे हैं। क्योंकि अधिकतर यह अहंकार और हार-जीत का प्रश्न बन जाता है। सार्थक और सीखने के उद्देश्य से की गयी चर्चा वाली परिपक्वता का नितांत अभाव दिखाई पड़ता है। ऐसे में उस क्षण या स्थान विशेष पर अपनी सोच को थोपने की बजाय समझ बढ़ने का समुचित वातावरण पाना और देना अधिक उचित है।
  • सामान्यत: दुनिया में ऐसी कोई चीज नहीं होती जिसका अपवाद नहीं होता। इसलिए व्यर्थ की बहस करने से बेहतर है, अपवादों को हमेशा समाहित माना जाये। हर बार लिखना जरुरी नहीं न 'अपवादों को छोड़कर।' 
  • हर वह पीड़ा जो हमने अतीत में सही...भविष्य उस पर हँस रहा होता है या आज जिन बातों के लिए हम परेशान हैं, कल हम उन पर हंसने वाले हैं। जरुरत बस इस भविष्य के वर्तमान बन जाने की है।

Monika Jain ‘पंछी’

December 5, 2014

Essay on Education System of India in Hindi

और भी लाखों तरीके हैं

भाषा व्याकरण और वर्तनी सम्बन्धी अशुद्धियाँ हममें से अधिकांश लोग करते हैं। कुछ कम, कुछ ज्यादा। अशुद्धियाँ करने वालों का मजाक उड़ाती फेसबुक पोस्ट्स भी कई बार देखी है। यहाँ तक कि यह भी लिखा देखा है कि अशुद्ध लिखने से बेहतर है लिखा ही न जाए। इससे ज्यादा नकारात्मक और निराशवादी कथन और क्या होगा? यह बिल्कुल ऐसा ही है कि अगर आप हकलाते हैं तो बोलना बंद कर दें; लंगड़ाते हैं तो चलना बंद कर दें; कम नज़र आता है तो देखना ही बंद कर दें।

हममें से कईयों की प्रारंभिक शिक्षा ऐसे विद्यालयों में हुई है, जहाँ ये कभी बताया ही नहीं गया कि विराम चिह्न, अनुस्वार, नुक्ता आदि किस बला का नाम है। कहाँ और कैसे इनका प्रयोग करना है। बताया जाता भी कैसे? जिनसे अपेक्षा थी, वे या तो बड़े आलसी थे या फिर उन्हें खुद इनका सही प्रयोग नहीं मालूम था। मतलब यह समस्या अधिकांश मामलों में व्यक्ति विशेष की नहीं, एक तंत्र की है। कमजोर शिक्षा तंत्र की। जिसे केवल ठहाके लगाकर तो कभी भी नहीं सुधारा जा सकता।

कुछ समय पहले पड़ोस में रहने वाली एक 6th क्लास की स्टूडेंट ने बताया कि उनका हिंदी विषय में शब्दार्थ का क्लास टेस्ट था। उसमें एक शब्द था विधाता, जिसका अर्थ वह भगवान लिखकर आ गयी तो उनकी टीचर ने यह कहते हुए गलत कर दिया कि किताब में तो ईश्वर दिया हुआ है और तुम्हारा पर्यायवाची शब्दों का टेस्ट नहीं हो रहा है, शब्दार्थ का हो रहा है। इसलिए वही लिखना है जो किताब में लिखा है। ज्यादा आश्चर्य तो नहीं हुआ क्योंकि ऐसी घटनाएँ तो मैं भी पढ़ाई के दौरान बहुत बार झेल चुकी हूँ। जहाँ शिक्षक सही जवाब को गलत कर देते थे। क्लास के सबसे होशियार बच्चे को ब्लैक बोर्ड पर सबके लिए आंसर्स लिखने को कहकर आराम से कुर्सी पर पसर जाते थे। बच्चों से कॉपीज चेक करवाते थे। पढ़ाई के नाम पर सिर्फ और सिर्फ चैप्टर की रीडिंग। पर मैं एक छोटे से कस्बे की एक सरकारी हिंदी माध्यम स्कूल की छात्रा रही हूँ और ये जो वाकया है ये शहर की एक नामी स्कूल का है जहाँ बच्चों से फीस के नाम पर मोटी-मोटी रकम वसूल की जाती है। इसलिए थोडा आश्चर्य मिश्रित दुःख हुआ और समझ नहीं आया कि क्या कहूँ...हे ईश्वर!...हे भगवान्!...या हे विधाता!

इसी तरह एक बार घर के बाहर एक लड़की आई। मैंने पूछा क्या करती हो? वह बोली, 'बकरियाँ चराते हैं।' मैंने पूछा स्कूल नहीं जाती? उसने कहा, 'स्कूल तो छोड़ दी है। स्कूल वाले कौनसी नौकरी दे रहे हैं, जो स्कूल जाएँ। करना तो खेती और बकरियाँ चराने का काम ही है।' आगे मैं कुछ बोल नहीं पायी, क्योंकि जहाँ दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल हो, वहाँ पर बाल श्रम का विरोध और तथाकथित स्कूली शिक्षा की बातें बेमानी है। क्योंकि जो स्कूली शिक्षा दी जा रही है, वह शिक्षित बेरोजगारों की भीड़ बढ़ाने का काम जरुर कर रही है। ऐसे बेरोजगार जो खेती और पशुपालन के काम को अपने लायक नहीं समझते और सफ़ेद कॉलर वाली नौकरी पा नहीं सकते।

खैर! यह एक अलग मुद्दा है। लेकिन हाँ, बात अगर लेखन सम्बन्धी अशुद्धियों की हो तो बेहतर होगा कि सामान्य अशुद्धियों को इंगित करती हुई पोस्ट्स विद्वजन डालते रहें या फिर जहाँ अशुद्धि दिखे वहीं अशुद्ध और शुद्ध शब्द बता दिया जाए। यह भी जरुरी है कि जिनकी अशुद्धियाँ बतायी जा रही हैं, वे इसे अपने अहम् पर चोट का मसला न बनायें और सहर्ष गलतियों को सुधारने को तैयार रहें। समाज सेवा सिर्फ वृद्धाश्रम या अनाथाश्रम में जाकर फोटो खिंचवाने से ही नहीं होती, और भी लाखों तरीके हैं।

Monika Jain ‘पंछी’ 
(05/12/2014)

December 2, 2014

Poem on Love and Hate in Hindi


(1)

प्यार की फुहार

कल रात जब पढ़ा मैंने हम सब के मन को
तो एक सिहरन सारे तन में दौड़ गयी
कंपकंपाती ठण्ड में भी एक परेशानी
मेरे माथे पर छलकता पसीना छोड़ गयी।

घबराहट और बेचैनी के साथ
न जाने कब तक मैं जागती रही
नफरत की आग से उड़ रहा था जो धुआँ
उसमें सारी रात मैं खांसती रही।

असंख्य विचारों की विरोधाभासी आंधियाँ
धर्म, संप्रदाय, नीति और मतों के उड़ते पत्ते
नफरत की उस आग को हर एक पत्ता
अपने-अपने तरीके से हवा दे रहा था
मानो दुनिया का हर एक दिल
प्रेम को अलविदा कह रहा था।

क्या इसी तरह हो जाएगा
एक दिन इस दुनिया का अंत?
मेरा मन बस यही सोचकर बैठा जा रहा था
एक अजीब सा खौफ मेरे दिल और दिमाग में
पल-पल पैठा जा रहा था।

मैंने बहुत ढूंढा, हाँ मैंने बहुत ढूंढा 
मिल जाए कहीं प्यार की एक मीठी बूँद
जो ठंडा करदे इस कड़वाहट की आग को
विचारों में हो चाहे जितनी भी विविधताएँ
पर बस थाम ले इस भीषण विवाद को।

सूरज की किरण ने अचानक मेरा दरवाजा खटखटाया
पर मेरे दिल का खौफ अभी तक भी कहाँ मिट पाया?

बाहर निकलकर देखा -
कबूतरों का एक जोड़ा दुनिया से बेखबर
प्यार में खोया हुआ था
सड़क पर दूसरे शहर को जा रही
एक औरत के आँचल में
उसका नन्हा सा बच्चा चैन से सोया हुआ था।

प्रेम और सुरक्षा के इन भावों ने
दिल को जैसे एक गर्माहट दी
दूर हुआ सारा खौफ और
तन-मन की घबराहट भी।

प्यार की यही फुहार
बस अब हर जगह बरस जाए
नफरत में हर पल जलती ये दुनिया
बस किसी भी तरह से बच जाए।
बस किसी भी तरह से बच जाए।

Monika Jain ‘पंछी’
(12/2014)

(2)

प्रेम 

जब भी लिखना चाहती हूँ उदासी
ये अंगुलियाँ सारे शब्द मिटा देती हैं 
आंसू, बेचैनी और गमों के
सारे अक्स मिटा देती हैं। 

मैं हैरत में पड़ देखती हूँ उन्हें
तो मुस्कुराकर कहती हैं - 

जिसे बांटनी हो मुस्कुराहट
उसे अपने गम पीने पड़ते हैं
जिसे लिखना हो बस प्रेम ही प्रेम
उसे नफ़रत के सारे पैबंद
खुद ही सीने पड़ते हैं। 

Monika Jain ‘पंछी’

20/11/2017 : Note : Worldly things (about pigeon and mother love) that i described in first poem are just relative positive signs. Actually they are not true love. But when slowly-slowly we understand the meaning of true love, we will know that the immense power of love can solve all the problems of this world. We just need to generate everyone’s faith in love. 

November 30, 2014

Poem on Wait (Waiting for Love) in Hindi

(1)

किसी के इंतजार में दो आँखें 

अँधेरे में वो दो आँखें 
कुछ हैरान, कुछ परेशान 
सहमी हुई और दबी हुई उसकी आवाज़
कुछ कहने को थी। 

जैसे एक सदी बीत गयी हो और 
पलकों पर कोई सपना सजा रखा हो 
किसी के इंतजार में 
जिंदगी जैसे थम सी गयी हो। 

इन टूटे हुए शीशों के टुकड़ों ने 
ना जाने कितने राज़ दबा रखे हो 
होंठ है कि हँसना भूल चुके हो 
आंसू लगता है जैसे सूख चुके हो। 

पास ना होकर भी क्यों वो पास लगते हैं 
कानों में उनकी आवाज़ क्यों गूंजती है 
बीत गए वो दिन जब हम थे यहाँ 
अब तो बस ये जिंदगी वीरानी सी लगती है। 

थक गए यूँ चलते चलते 
भटक से गए अपनी मंजिलों से 
वो हवाएं भी अब रोती है 
जो कभी ख़ुशी-ख़ुशी गुनगुनाती हुई मिलती थी हमसे। 

राख हो गए सपने जो सजाये थे कभी 
दिल है कि अब भी अंधेरो में रोशनी ढूंढता है 
दबी हुई यादों में अब भी जिंदा हो तुम कहीं
धुल गए आंसूओ में सब रंग 
पर उमंगें है कि बुझती ही नहीं। 

ऐसा लगता है वो खफ़ा पहले से था 
दर्द सुनने से पहले उन्होंने अपने शिकवे सुना दिए 
खुशियाँ कभी हमारी किसी को रास ना आई 
ज़माने के सामने हम हँसे और घर आकर हम रो दिए। 

हारकर भी उम्मीद अभी जिंदा है 
इसको जिद कहूँ या फिर नज़ाकत दिल की 
मालूम है जबकि वो मेरी तकदीर में नहीं 
फिर भी उनका इंतजार क्यों है। 

शायद ऐसा पहले भी कहीं सुना हो 
एक टूटे दिल की कविता किसी ने लिखी हो 
पर दर्द सबका एक सा नहीं होता 
सब का प्यार सच्चा होता नहीं। 

माना कि आरज़ू मेरी दिल में रह गयी 
ज़िन्दगी तन्हा और वीरानी सी बन गयी 
बरसों से कोशिश में हैं कि उनको भूल जाएँ 
चलो इसी कोशिश में एक और रात कट गयी। 

Chetan Dheer 

(2)

तू आएगा एक दिन पक्का 

धरती की प्यास बुझाने को
रिमझिम बादल तो बरसे हैं 
मेरे दिल की बंझर जमीन पर 
जाने कबसे तरसे है
तू आएगा एक दिन पक्का
इस दिल की प्यास बुझाने को 
बस जीती हूँ एक दिन तेरी ही 
बाहों में मर जाने को। 

ये सर्दी की जो रातें हैं 
होठों पे जमी कुछ बातें हैं
कितना कुछ कहने को है पर 
बन धुआँ शब्द खो जाते हैं 
तू आएगा एक दिन पक्का 
इन लफ्ज़ों को पिघलाने को 
बस जीती हूँ एक दिन तेरी ही 
बाहों में मर जाने को। 

ये गर्म हवा जब बहती है 
मेरी आहें भी संग रहती है 
आँखों से टपकती बूँदें भी 
बस नाम तेरा ही लेती है
तू आएगा एक दिन पक्का 
इन बूंदों को पी जाने को 
बस जीती हूँ एक दिन तेरी ही 
बाहों में मर जाने को। 

तेरी ख़ामोशी खलती है 
पर आग अभी भी जलती है 
मेरे ख़्वाबों की दुनिया में 
उम्मीद अभी भी पलती है 
तू आएगा एक दिन पक्का 
सब सपने सच कर जाने को 
बस जीती हूँ एक दिन तेरी ही 
बाहों में मर जाने को। 

Monika Jain ‘पंछी’
(30/11/2014)

22/10/2017 : Note : Leading to spirituality, today I am not much concerned with such writings. As spirituality is a journey from dependence to independence.

November 29, 2014

Makar Sankranti Story on Child Labour in Hindi

Makar Sankranti Story on Child Labour in Hindi
 हरी पतंग और लाल दुपट्टा
(राजस्थान पत्रिका, हेल्थ परिशिष्ट में प्रकाशित)

पतंगों का मौसम आ चुका था। आकाश में लाल, नीली, पीली, हरी, नारंगी ढेर सारे रंगों की पतंगें उड़ते हुए ऐसी लग रही थी, मानो इन्द्रधनुष के सारे रंग आकर आकाश में बिखर गए हों। इन रंगों की सोहबत में सारा आकाश खिलखिलाता सा नज़र आ रहा था। रेवड़ी, तिलपट्टी, मूंगफली, तिल के लड्डू सब थाली में लिए मैं भी छत पर पड़ौस के बच्चों के साथ पतंग उड़ाने पहुँच गयी। तभी छत से नीचे सड़क पर कई दिनों बाद एक चबूतरे पर बैठी रेवती नज़र आई। बड़ी उम्मीद भरी नज़रों से कभी वो आकाश में उड़ती पतंगों को देखती तो कभी मायूस होकर शून्य में ताकने लगती।

रेवती घर से थोड़ी दूर बने आधे कच्चे आधे पक्के घर में रहती थी। कुछ महीनों पहले तक तो जब उसकी माँ झाड़ू-बर्तन करने आती थी, अक्सर उसका घर में आना-जाना होता था। पर पिछले ही महीने उसकी माँ चल बसी। आसपास के लोग बताते हैं कि उसके शराबी पति ने एक रात उसे इतनी बेरहमी से पीटा कि अगली सुबह उसकी आँखें ही ना खुली और वह उस 12-13 साल की बच्ची को अकेला छोड़कर सदा के लिए चली गयी।

रेवती की माँ रेवती से बहुत प्यार करती थी। अक्सर उसकी ही बातें करती रहती थी। रेवती उसकी इकलौती संतान थी। मैं जब भी रेवती की पढ़ाई के बारे में पूछती तो वह बड़े उत्साह से कहती, ‘दीदीजी, रेवती को तो खूब पढ़ा लिखाकर बड़ी अफसरानी बनाना है। उसे ना मांजने पड़ेंगे यूँ घर-घर जाकर बर्तन। समझदार बड़े अफसर से ही उसका ब्याह भी रचाऊँगी। बेटी के जीवन में किसी बात की कमी ना होने दूँगी। चाहे उसके लिए दस घर और क्यों ना पकड़ने पड़े।’

रेवती की माँ का उत्साह देखकर बड़ा अच्छा लगता था। एक अनपढ़ गरीब औरत के दिल में अपनी बच्ची के लिए ऐसे सपने पलते देखकर दिल ख़ुशी से भर जाता। साथ ही ऊंची-ऊंची इमारतों में रहने वाले उन तथाकथित पढ़े-लिखे लोगों पर गुस्सा भी आता जो आज भी लड़की के जन्म पर उदास हो जाते हैं और कुछ तो जन्म से पहले ही उसे मृत्यु की गोद में सुला आते हैं।

रेवती पढ़ने में बहुत होशियार थी। मैं भी अक्सर रेवती को गणित और अन्य विषयों के प्रश्न हल करने में मदद करने लगी। दिल से यही चाहती थी कि रेवती की माँ की आँखों की जो चमक है, वह कभी फीकी ना पड़े। उसके सारे सपने सच हों। पर नियति को जाने क्या मंजूर था जो वो चमक भरी आँखें ही सदा के लिए मूँद गयी और उसके साथ ही रेवती को लेकर देखे सारे सपने भी सो गए।

रेवती की माँ के गुजरने के बाद उसके शराबी पिता ने उसकी स्कूल छुड़वा दी और उसे भी घर-घर जाकर बर्तन मांजने के काम में लगा दिया ताकि उसकी शराब के पैसे जुटाए जा सके। यह सब जानकर मुझे बड़ा दुःख हुआ। एक दिन मैंने रेवती से उसकी सभी कॉपी-किताबें घर मंगवा ली और उसे कहा कि काम के बीच में वह 1 घंटा यहाँ पढ़ने आ जाया करे और किसी को यह बात ना बताये। इससे पिता को शक नहीं होगा, वह यही समझेगा कि यहाँ भी काम करने ही आती है। कुछ दिन तो यह चलता रहा पर एक दिन अचानक उसके पिता को जाने कैसे ख़बर लग गयी और वह जब रेवती पढ़ रही थी तब आया और उसका हाथ पकड़कर पीटते हुए ले जाने लगा। मैंने रोकने की कोशिश की तो उसने रेवती की सारी कॉपी किताबें मुझे घूरते हुए मेरी आँखों के सामने ही माचिस की एक तीली लगाकर जला दी। मानो मुझे कह रहा हो, अब ना करना ऐसी जुर्रत!

उस घटना के कई दिन बाद तक रेवती नज़र नहीं आई। आज अचानक जब रेवती को चबूतरे पर अकेले बैठे देखा तो मन किया उससे बात करने का, उसका हाल पूछने का। यह सोचते हुए मैं कुछ तिल के लड्डू और रेवड़ियाँ एक अख़बार में लपेटकर नीचे आई और रेवती को अपने पास बुलाया। रेवती ने पहले डरते-डरते चारों ओर देखा और फिर दौड़कर मेरे पास आ गयी। मैंने उससे पूछा, ‘कैसी है रेवती? सुबह से कुछ खाया या नहीं?’ रेवती कुछ नहीं बोली। वह तो बार-बार बस आसमान में उड़ती पतंगों को देखे जा रही थी। मैंने उससे पूछा, ‘तुझे पतंग चाहिए?’ उसने बस सहमति में सर हिला दिया। मैंने उसे अख़बार में बंधे लड्डू और रेवड़ियाँ पकड़ाई और कहा, ‘तू पहले इसे खा ले, तब तक मैं लेकर आती हूँ पतंग!’ यह सुनकर रेवती लड्डू-रेवड़ियाँ लेकर तुरंत वापस उसी चबूतरे पर चली गयी और वहां बैठकर मेरे वापस आने का इंतजार करने लगी। मैं छत पर रखी पतंगों में से एक हरी रंग की पतंग और मांझा ले आई और रेवती को दे दिया। मैंने देखा रेवती ने तो अख़बार खोला तक नहीं था। वह तो बस पतंग के ही इंतजार में बैठी थी। मुझे लगा कुछ देर बाद खा लेगी और यह सोचकर मैं भीतर आ गयी।

करीब 1-2 घंटे बाद दरवाजे पर दस्तक हुई। मैंने देखा रेवती खड़ी थी। हाथ में वही पतंग और मांझा लिए हुए। मैंने कहा ये तेरे लिए ही है, तू इसे वापस क्यों लेकर आई है? तब रेवती बोली, ‘दीदीजी, मुझे पतंग उड़ाना नहीं आता। आप प्लीज इसे उड़ा देना और मेरी माँ तक पहुँचा देना। सब कहते हैं कि मरने के बाद लोग ऊपर आसमान में चले जाते हैं। माँ भी तो वहीँ होंगी न! आप बस उन तक ये पतंग पहुँचा दो।’ और यह कहकर वह पतंग मेरे हाथ में थमाकर दौड़ी-दौड़ी चली गयी। मैं हैरत से कुछ देर उसे देखती रही, फिर अचानक पतंग पर मेरी नज़र पड़ी, जिस पर बहुत कुछ लिखा था।

अरे! यह तो रेवती की लिखावट है। यह देखकर मैं उन शब्दों को पढ़ने लगी। ‘माँ! तू मुझे छोड़कर क्यों चली गयी? माँ तेरी बहुत याद आती है। सुबह जब बापू मार-मार कर उठाता है चाय बनाने के लिए तब चाय के हर एक उबाल के नीचे बैठने के साथ तू बहुत याद आती है। जब सुबह-सुबह आसपास के बच्चे स्कूल ड्रेस पहनकर बैग लेकर पढ़ने जाते हैं तो उनके हर एक बढ़ते कदम के साथ तू बहुत याद आती है। माँ, बापू जो भी मैं बनाती हूँ सब खा जाता है। मुझे हमेशा सूखी-ठंडी रोटियाँ खानी पड़ती है। तब हर एक कौर के गले में चुभने के साथ तू बहुत याद आती है। रात को बापू जब शराब पीकर लौटता है तब डर के मारे मैं गुसलखाने में छिप जाती हूँ, तब भी नल से टपकती हर बूँद के साथ तू बहुत याद आती है। माँ तेरे बिना नींद नहीं आती, हर बदलती करवट के साथ तू बहुत याद आती है। माँ, तू वापस आ जा न! या फिर मुझे ही अपने पास बुला ले। तेरे बिना एक दिन भी काटना बहुत मुश्किल है। तू बस वापस आ जा माँ!’

और यह सब पढ़ते-पढ़ते मेरी आँखों से आंसू बहने लगे। विश्वास नहीं हो रहा था यह 12-13 साल की उस मासूम बच्ची के शब्द थे, जो थोड़ी देर पहले मेरे सामने खड़ी थी। मैं दौड़कर बाहर गयी कि शायद रेवती बाहर ही हो, पर वह नज़र नहीं आई। तब मैं पतंग को लेकर छत पर गयी और जाने किस विश्वास में उसे उड़ाने लगी। देखते ही देखते पतंग दूर आसमान में पहुँच कर एक बिंदु की तरह चमकने लगी। डोर का आखिरी सिरा जो हाथ में था वह मैंने छोड़ दिया। कुछ देर पतंग को देखती रही और फिर बुझे मन के साथ नीचे आ गयी।

सुबह अचानक रेवती के घर के पास भीड़ देखी। पता चला रेवती का शराबी पिता बाहर मरा पड़ा था। एक के बाद एक यह सब घटनाएँ मुझे बहुत बैचेन कर रही थी। थोड़ी देर बाद छत पर कपड़े लेने गयी तो देखा शाम को जो पतंग उड़ाई थी उसकी डोर पास ही सूख रहे मेरे लाल दुपट्टे में अटकी हुई थी और पतंग अभी भी वैसे ही उड़ रही थी। शायद यह रेवती की माँ या ईश्वर का संकेत था कि मुझे अब रेवती के लिए बहुत कुछ करना था और यही सोचकर वह लाल दुपट्टा मैंने गले में डाला और रेवती के घर की ओर चल पड़ी।

Monika Jain ‘पंछी’
(29/11/2014)

November 23, 2014

Broken Promises (Promise Day) Poem in Hindi

People eager to make promises are often irresponsible. They are careless to think that a broken promise can break a person too. Dreams and expectations attached with a promise are fully shattered when a promise turns into a fake bubble. One should not make any empty promise that he/she is not going to keep. One should also expect less from others and trust more in himself/herself. And the most important thing, promises should not be made, they should only be fulfilled. 

(1)

क्यों कुछ लोग?

कइयों के हिस्से आयी 
टूटे वादों की किरचों को देख
सोचती हूँ -

क्यों कुछ लोग बिन सोचे समझे 
अक्सर वादों पर वादे कर जाते हैं 
कैसे किसी के जीवन और सपनों को 
इतना हलके से ले पाते हैं?

वे क्यों नहीं समझ पाते -
हर एक वादे से जुड़ती है 
कुछ मासूम उम्मीदें 
न जाने कितने ख़्वाब सजाती हैं 
हर रात ये मीठी नींदें। 

पर इन नींदों को क्या पता 
एक दिन ये कुछ ऐसे उड़ जानी हैं 
इनकी बनायी ख़्वाबों की दुनिया 
मिट्टी के घरोंदों सी 
बस मिट्टी में मिल जानी है। 

तो क्यों कुछ लोग बिन सोचे समझे 
अक्सर वादों पर वादे कर जाते हैं 
कैसे किसी की सारी दुनिया 
फ़क़त उदासी से भर जाते हैं?

वे क्यों नहीं समझ पाते -
टूटे वादों की किरचों से 
आती है विश्वास के दर्पण पर
ना जाने कितनी खरोंचें 
जिसका टूटा हो दिल 
वो फिर से प्यार करने की 
भला कैसे सोचे? 

Monika Jain ‘पंछी’ 
(23/11/2014)

(2)

प्यार मेरे लिए बस प्यार ही है

मैंने कहा था न -
न करना ऐसे वादे
जो निभा न सको
न कहना ऐसी बातें
जो सिर्फ बातें बनकर रह जाये
न करना ऐसा प्यार
जो प्यार न रह सके।

हर रोज़ तो कहती थी तुम्हें
क्योंकि डरती हूँ मैं खुद से
नहीं समझा पाती खुद को
जब मेरा भरोसा टूटता है
नहीं बहला पाती खुद को
जब कुछ अपना छूटता है।

मेरे इनकार को बदल ही दिया
तुमने इकरार में
और अपनी प्यार भरी बातों से
कैद कर लिया मुझे अपने प्यार में।

पर अब तुम्हारी बदलती फीलिंग्स
कैसे मैं भी अपना लूँ?
नहीं तुम्हे अब प्यार
ये कैसे खुद को समझा लूँ?

तुम कहते हो - प्रैक्टिकल बनो!
पर तुम्हारे हाथों की मैं कोई गुड़िया तो नहीं?
जब चाहो बदल जाऊं वो जादू की पुड़िया तो नहीं?

मेरी आज़ाद सोच से प्यार था न तुम्हें?
अब तुम्हारी सोच में कैद हो जाऊं
मैं वो चिड़िया तो नहीं?

मैंने कहा था न कई बार
प्यार मेरे लिए कोई मज़ाक नहीं है
प्यार मेरे लिए बस प्यार ही है।

Monika Jain ‘पंछी’
(30/12/2012)

(3)

झूठा तेरा प्यार था

जानती हूँ तुमने मुझसे कभी 
प्यार किया ही नहीं 
किया था तुमने जो इज़हार 
वैसा कुछ कभी था ही नहीं।

जानती हूँ 
झूठी थी तुम्हारी सारी बातें 
और खोखले थे 
तुम्हारे सारे वादे।

जानती हूँ तुम्हारा मेरी परवाह करना 
बस एक दिखावा था 
हाँ, जानती हूँ मैं तुम्हारा प्यार 
बस कोरा छलावा था।

लिखी थी तुमने जो प्रेम कवितायेँ
आज मुझ पर अट्टाहस कर रही हैं 
मेरी मासूमियत और पागलपन पर 
देखो, आज वो भी हँस रही हैं। 

हर हाल में मुझको चाहने के 
जीवन भर साथ निभाने के 
वादे तेरे बड़े-बड़े 
थे बस मुझको बहलाने के।

मेरी ना को हाँ में बदलना 
बस यही जुनून तुझ पर सवार था 
जानती हूँ इश्क़ तेरा एक धोखा 
और झूठा तेरा प्यार था।

सब जानते हुए भी ये पागल दिल 
क्यों अनजान बनना चाहता है 
झूठा ही सही लेकिन तेरा 
क्यों प्यार पाना चाहता है?

Monika Jain ‘पंछी’
(25/08/2013)

09/12/2017 - Note : These are my old writings and leading to spirituality, today I am not concerned with such writings. As spiritualism is a journey from expectations to acceptance, from complaints to responsibility, from dependence to independence, from innocence to flawlessness and from ignorance to awakening. No matter, who the person is in front of us, what wrong he did, how difficult our situations are, in spiritualism there is no other. 

November 18, 2014

Essay on Women's Rights in Hindi

Essay on Women's Rights in Hindi
मुझे पंख दे दो
(आधी आबादी में प्रकाशित)

पाना चाहती हूँ अपने हिस्से की धूप, छूना है मुझे भी आकाश, सजाने हैं इन्द्रधनुष के रंगों से ख़्वाब, बीनने हैं मुझे सागर की गहराई से मोती, करने हैं अनन्त आकाश पर अपने छोटे से हस्ताक्षर, बिखेरनी है चाँद की चांदनी चहुँ ओर, करना है ब्रह्माण्ड के रहस्यों का उद्गाटन, भरना है कई मुस्कुराहटों में जीवन, अपने उत्साह की किरणों से बनाना है मुझे सम्पूर्ण वातावरण को सजीव और मुखरित, लिखनी है मुझे अपने हाथों से अपनी तकदीर...बस मुझे मेरे पंख दे दो।

मेरी शक्ति, प्रखरता, बुद्धि, कौशल, सुघड़ता और सपने; मेरा स्वाभिमान और आत्मविश्वास...साँस लेने के लिए किसी और की अनुमति का मोहताज क्यों हों? क्यों बनाकर रखना चाहते हो सदा मुझे अपनी अनुगामिनी? क्यों रसोई और बिस्तर के गणित से परे तुम नहीं सोच पाते एक स्त्री के बारे में? मुझे नहीं चाहिए वह प्रेम जो सिर्फ वासना, शोषण, हिंसा, ईर्ष्या और आधिपत्य के इरादों से उपजा हो। मुझे नहीं चाहिए वह वहशी प्रेम जो एसिड फेंकने, बलात्कार, हत्या या अपहरण जैसे दुष्कर्मों से भी नहीं हिचकता। नफ़रत और दर्द देने वाला प्रेम मुझे नहीं चाहिए। मुझे चाहिए ऐसा प्रेम जो मुक्ति के आकाश में जन्मा हो, जिसमें स्वतंत्रता की सांस हो, विश्वास का प्रकाश हो, करुणा की धार हो; जो मेरी बातों, मेरे ख़्वाबों और मेरी मुस्कुराहटों में जीवन भर सके। मुझे प्रेम से भरा प्रेम चाहिए।

हमेशा से उस सहजता की तलाश में हूँ, जहाँ मुझे ये ना सुनना पड़े कि लडकियाँ ये नहीं करती, लडकियाँ वो नहीं करती। मुझे सिर्फ सकुचाती, सबसे नज़र चुराती, सदा अपना दुपट्टा संभालती युवती बनकर नहीं रहना है। क्यों मैं अकेली बेफिक्र होकर सड़क पर नहीं चल सकती? घर से लेकर कार्यस्थल तक कहीं भी तो मैं सुरक्षित नहीं। खाकी वर्दी हो चाहे संसद और न्यायपालिका में बैठे देश के कानून के निर्माता, किसी पर भी तो भरोसा नहीं कर सकती। क्या कभी मुक्त हो पाऊँगी मैं इस आंतक से...जो हर क्षण मेरे जीवन में पसरा हुआ है। कब बदलेगा मेरे प्रति समाज का नज़रिया? कब मिलेगा मुझे सुरक्षित माहौल?

मुझे मुक्ति चाहिए उस असहजता से, उस डर से जो मुझे अपने रिश्तेदारों, दोस्तों और पड़ोसियों पर भी विश्वास करने की इजाजत नहीं देता। मुझे मुक्ति चाहिए उस संकीर्ण सोच और कुप्रथाओं से जो मुझे हमेशा द्वितीय श्रेणी का नागरिक होने का आभास कराती है। मेरे साथ हर स्तर पर भेदभाव करती है। मेरा तिरस्कार करती है। मुझे अवसरों और उपलब्धियों से वंचित रखती है। मुझे पुरुषों की आश्रित और संपत्ति बनाकर रखना चाहती है। मत करो कन्याओं की पूजा, मत चढ़ाओं माँ को नित नया भोग!...बस ये सहजता ला दो, जहाँ खुद को एक इंसान समझकर हम भी खुलकर सांस ले सकें। हमें हमेशा ये याद न रखना पड़े कि हम लड़कियाँ हैं। मुझे माँ और बहन की तरह मत देखो। बस मुझे इंसान समझकर इंसानों सा व्यवहार करो। क्या ला सकते हो ऐसी सहजता? क्या दे सकते हो ऐसा आज़ाद जीवन?

कब मुक्ति मिलेगी मुझे इस बीमार समाज से जो सम्मान के नाम पर घिनौने मानक बनाकर जी रहा है। मुझे आज़ाद कर दो उन तालिबानी फरमानों से जो कभी मेरे कपड़ों को लेकर सुनाये जाते हैं, कभी मुझे मोबाइल रखने को प्रतिबंधित करते हैं तो कभी पुस्तकालय तक में मेरा प्रवेश निषेध करते हैं। धरती से अम्बर तक अपनी ख़ुशबू बिखेरने की ख्वाहिश रखते मेरे प्रेम को कब तुम कौम की कैंची से कुतरना बंद करोगे? कब बंद होगी जाति, धर्म, गौत्र और अपने झूठे सम्मान के अंधे नशे में मेरी और मेरे प्रेम की हत्या? कब?

मुझे मुक्ति चाहिए उस दकियानूसी सोच से जो मेरे शरीर की एक स्वाभाविक प्राकृतिक क्रिया को शुद्धता और अशुद्धता से जोड़कर मुझे अपवित्र करार देती है। क्यों मेरे शरीर के साथ मेरे दिल को छलनी कोई और करता है और इज्जत मेरी चली जाती है? और इतना होने के बाद भी क्यों मैं समाज के ऊटपटांग सवालों का सामना करूँ? क्यों? पहले मेरा बलात्कार, फिर उसके खिलाफ़ आवाज़ उठाने पर अपराधी जैसा व्यवहार! इतनी मानसिक प्रताड़ना और न्याय जीते जी मिल जाएगा इसका भी भरोसा नहीं। बदल डालो ये महज़ डिग्रीयां देने वाली पढ़ाई, जो इंसान को इंसान तक ना बना पायी।

कभी संस्कृति के नाम पर, कभी परम्पराओं के नाम पर, क्यों हमेशा मुझे ही अपनी इच्छाओं और सपनों को त्यागना होता है? जब-जब मैंने वर्जनाओं को तोड़ने की कोशिश की, पितृ सत्ता की बेड़ियों को काटना चाहा, रूढ़ियों और कुत्सित विचारों को मोड़ना चाहा, तब-तब तुम्हारी संस्कृति को ख़तरा महसूस हुआ। जरा से मेरे विद्रोह के स्वर उठे और तुमने मुझे कुल्टा, कलंकिनी, कुलनाशिनी के थप्पड़ जड़ दिए। मेरी जुबान पर जलते अंगारे रख दिए। तुम्हारी संस्कृति को ख़तरा तब क्यों महसूस नहीं होता, जब धर्म की आड़ में मेरी देह का व्यापार किया जाता है, जब दहेज़ की आग में मुझे झुलसा दिया जाता है, जब अंधविश्वासों से गिरा समाज एक विधवा, परित्यक्ता या अकेली औरत को चुड़ैल ठहराकर, उसकी पिटाई कर, उसका बलात्कार कर उसे मौत की सजा देने से भी नहीं हिचकिचाता।...तब तुम्हारी संस्कृति को ख़तरा क्यों नहीं महसूस होता? मुझे मुक्ति दे दो उन धर्म शास्त्रों से जो भरे पड़े हैं मात्र नारी की निंदा से। क्योंकि नहीं लिखा उन्हें किसी भी स्त्री ने।

तुमने मुझे शिक्षित और शक्ति संपन्न बनाने के कानून बनाये। कई सरकारी और गैर सरकारी संगठनों को जागरूकता लाने के लिए खड़ा किया। मेरी रक्षा के लिए कानून के नए समीकरण गढ़े। पर अभी तो मुझे जीवन पाने और जीने का अधिकार भी पूरी तरह से कहाँ मिल पाया है? मेरे लिए तो जन्म से पहले सुरक्षित रह पाना भी चुनौती बन गया है। क्यों मार देना चाहते हो मुझे जन्म से पहले ही कोख में? क्यों फेंक आते हो मुझे कचरे के ढेर में? क्यों कर देते हो कच्ची उम्र में मेरा ब्याह। एक ओर कन्या की पूजा करते हो और दूसरी ओर कन्या के जन्म को ही अभिशाप मानते हो। पैदा होते ही इस तरह मेरी अस्वीकृति और अपमान क्यों?

मुझे नहीं चाहिए वह स्त्री विमर्श जो साहित्य के नाम पर देह व्यापार कर रहा है, जहाँ मुझे बस माँस का टुकड़ा भर बनाकर रख दिया गया है। मुझे ‘मेड टु आर्डर’ व्यंजन बनाकर परोसा जा रहा है। जहाँ रेशमी जुल्फों, नशीली आँखों, छरहरी काया, दहकते होंठ और मादक उभारों से ज्यादा मेरा कोई अस्तित्व नहीं। मुझे नहीं चाहिए ऐसा स्त्री विमर्श!

मेरे सपनों को न जलाओ। चहारदीवारी की अकुलाहट, घुटन और छटपटाहट से मुझे आज़ाद कर दो। चुल्हा, चोका, बर्तन बस यही तो मेरा कर्म नहीं है न? मेरे चेहरे को ढ़ककर मेरी अस्मिता न नापो। मेरे अस्तित्व को छोटे-बड़े कपड़ों में न उलझाओ। मेरी इज्जत को किसी दुष्कर्मी के दुष्कर्मों से परिभाषित न करो। मेरा कार्य सिर्फ पुरुष को संतुष्ट करना और संतानोत्पत्ति कर संतानों का पालन पोषण करना नहीं है। तुम्हारे वंश को बढ़ाने वाले लड़के की चाह में मुझे बच्चों पर बच्चे पैदा करने वाली मशीन मत बनाओ। मैं कोई भिक्षा नहीं मांग रही। सिर्फ अपना हक़ मांग रही हूँ।

मेरे अहसास और जज़्बात भी स्वर पाना चाहते हैं। मेरी रचनात्मकता भी सृजित होना चाहती है। मेरे भी सपने आकार ग्रहण करना चाहते हैं। मेरी खिलखिलाहट भी हर ओर बिखरना चाहती है। देश के सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक विकास में मैं भी योगदान देना चाहती हूँ। सृजनात्मकता की रूपरेखा बनाने में भागीदारी चाहती हूँ। दुनिया के किसी भी हिस्से में बिना किसी खौफ और रोक-टोक के भ्रमण की स्वतंत्रता चाहती हूँ। अपने बारे में, अपने कार्यक्षेत्र के बारे में, अपने धर्म के बारे में, शादी के बारे में, बच्चों के जन्म के बारे में, पहनावे के बारे में और परम्पराओं के अनुसरण के बारे में निर्णय लेने की स्वतंत्रता चाहती हूँ। मैं आर्थिक, मानसिक और भावनात्मक स्वतंत्रता चाहती हूँ।

करोगे अपनी संकीर्ण मानसिकता का बहिष्कार?...जहाँ देह से परे बुद्धि और मन के आधार पर मुझे मेरी निजता और सम्मान का हक़ मिलेगा। दोगे मुझे समानता का अधिकार? बंद करोगे मेरे साथ सौतेला व्यवहार?...जहाँ भाई की इच्छाओं के सामने मुझे किसी अभाव में जीना नहीं पड़ेगा। दोगे मुझे मानवीय दृष्टिकोण की वह जमीन, जहाँ रात के अँधेरे में भी मैं बेख़ौफ़ सड़क पर चल सकूंगी? जहाँ पर मुझे देवी, माँ, बेटी, बहन, पत्नी, प्रेयसी से इतर एक इंसान के रूप में भी देखा और समझा जाएगा। जहाँ मेरे अहसास छल-कपट का शिकार नहीं होंगे। दोगे मुझे मेरे पंख जो एक उन्मुक्त गरिमामय उड़ान के लिए मुझे स्वतंत्रता का आकाश प्रदान करेंगे, जहाँ मैं अपने ख़्वाबों के रंग हकीकत के कैनवास पर उकेर सकूँगी? क्या, दोगे मुझे मेरे पंख?

Monika Jain ‘पंछी’
(18/11/2014)

November 4, 2014

Essay on Life is a Struggle in Hindi

जीवन एक संघर्ष : हारना भी तो नहीं है न!

हर दिन मुश्किलें परवान चढ़ती हैं, और किसी दिन हौसला टूट जाता है। फिर से सब कुछ जोड़ती हूँ, फिर किसी दिन सब कुछ बिखर जाता है। बहुत मुश्किल है ऐसे जीना...तब, जब दर्द का कोई अंत न हो, कोई सीमा नहीं, खत्म होने की कोई तारीख़ भी नहीं! तब, जब उसे सिर्फ बढ़ना ही है, तो जीतना कैसे हो पायेगा? जानती हूँ नहीं हो पायेगा। हाँ, पर हारना भी तो नहीं है न! बिल्कुल नहीं! किसी कीमत पर नहीं!

चाहे कोई कितना भी निडर और हिम्मती कहे...चाहे मैं खुद कितना भी बे ख़ौफ़ रहना चाहूँ...पर ये जो रात के सन्नाटे होते हैं न, कभी-कभी बड़े जालिम होते हैं। न चाहते हुए भी न जाने कितने ख़ौफ़ एक-एक करके सामने ला खड़े करते हैं।

काश! ये ख़ौफ़ निरे ख़ौफ़ होते। पर ये डर ऐसे वैसे भी तो कहाँ हैं? दिल को चीरकर रूह को भी कंपा देने वाले ये डर एक दिन मेरी नियति है। एक कठोर सच! नहीं जानती कैसे कर पाऊँगी इन सच्चाइयों का सामना? नहीं जानती कैसे जी पाऊँगी इन सच्चाइयों के साथ? सच! नहीं जानती।

कभी-कभी समझ नहीं आता क्यों कुछ जीवन सिर्फ संघर्षों से भरे होते हैं? क्यों किसी के हिस्से सिर्फ दर्द ही आता है? क्यों आंसूओं से भीगी कलम से ही किसी की किस्मत लिखी जाती है? क्यों किसी का जीवन सिर्फ परीक्षा बनकर रह जाता है? क्यों?

हिम्मत, साहस, विश्वास सबको मैंने बहुत लिखा, बहुत जीया, बहुत दिया, पर कब तक? कोई तो सीमा हो? कभी तो दिल करेगा न टूट कर बिखर जाने को। पर नहीं! शायद कुछ लोगों को टूटने और बिखरने का अधिकार भी नहीं होता। मैं जानती हूँ, मुझे भी यह अधिकार नहीं। मुझे भी तो सिर्फ डंटे रहना है, अपनी आखिरी सांस तक...इस विश्वास के साथ कि जीतना या हारना मायने नहीं रखता, मायने रखता है सिर्फ चुनौतियों को स्वीकार करना और उनका सामना करना। ज़िन्दगी का सफ़र कितना लम्बा हो, ये मायने नहीं रखता, मायने रखता है हर पल में जीया गया जीवन। 

Monika Jain ‘पंछी’
(04/11/2014)

27/02/2018 - नोट : अध्यात्म से जुड़कर मैंने जाना कि अध्यात्म वाकई असहनीय से असहनीय दर्द को भी मुस्कुराते हुए स्वीकार कर लेने की क्षमता और शक्ति देता है। वह आध्यात्मिक प्रेरणा ही है जो इतने वर्षों के कठिनतम जीवन में भी अक्सर मेरी मुस्कुराहट और शान्ति को बनाये रखती है। बस सीखना अब यह है कि यह शांति हर क्षण कायम रह सके, चाहे जो भी परिस्थिति आये, चाहे जितना भी दर्द उठे, चाहे यह जीवन चला जाए, पर शांति कायम रह सके। 

October 31, 2014

Poem on Festivals in Hindi


आत्मिक पर्व 

बाहरी उत्सव तो हमने खूब मनाये हैं
कभी खेले होली के रंग 
तो कभी दिवाली के दीप जलाएँ हैं 
पर क्या मनाया है हमने 
कभी कोई आत्मिक पर्व? 
जिस पर करे हमारा रोम-रोम हर्ष। 

नहीं न! 
तो चलो कुछ नया करते हैं 
बसंत के फूलों की महक 
अब हम दिल में भरते हैं। 
बसंत त्योहार है प्रेम का 
तो चलो दिल को अपने 
प्रेम में सराबोर करते हैं। 

दिवाली की अमावस को हर 
कर दिया हमने प्रकाश ही प्रकाश 
चलो इस बार भर लेते हैं 
अपने मन में भी थोड़ी सी उजास। 

होली के रंगों से हमने 
रंग दी दुनिया सारी 
क्यों ना मन में भी भर लें 
थोड़ी प्रेम की पिचकारी। 

जब बसंत की ख़ुशबू, होली के रंग 
और दिवाली की रोशनी 
हमारे दिल में उतर आएगी
उस दिन से ही ना जाने 
कितनी और ज़िंदगियाँ भी 
रंगों, ख़ुशबू और रोशनी से 
संवर जायेंगी। 

उस दिन पहली बार लगेगा 
कि त्योहारों को जी लिया हमने 
जब सपनों की खिलखिलाती टोकरी 
हम बाँट आयेंगे अनजाने अपनों के बीच
जब विश्वास की रोशनी फैला आयेंगे 
हम उन सारे सपनों के बीच। 

तो बसा लेते हैं यूँ मन में उत्सव 
कि दिल सदा लोरियों से भरा रहे
दीप जलाएँ कुछ ऐसे 
कि हर घर में सवेरा रहे। 
रंग उड़ायें कुछ ऐसे 
कि मन कोई बेरंग ना हो 
हर तरफ हो बस प्यार ही प्यार
नफ़रत की कहीं कोई गंध ना हो। 

Monika Jain ‘पंछी’ 
(31/10/2014)

October 30, 2014

Bewafa Ghazal (Betrayal Poem) in Hindi

(1)

आज वह गुमनाम है

पंख सारे कुतर डाले, थम गयी उड़ान है
उस बेवफ़ा की बेवफ़ाई जा चढ़ी परवान है।

फूल से कोमल कभी जिसके सब अहसास थे
अब फूल पे पत्थर गिराना, उस शख्स की पहचान है।

चाँद, तारे, तितलियाँ शब्द मुखरित थे कभी
प्यार की महफ़िल पे अब सज रहा शमशान है।

आँखों में बनकर सितारे टिमटिमाते स्वप्न थे
अब आँसुओं से भीगता दिल का हर अरमान है।

सुर्ख़ियों में थे कभी मोहब्बत के किस्से सभी
अब नफ़रतों में जल रहा प्यार का पैगाम है।

जिसके सीने से कभी बहते थे झरने प्यार के
अब वहाँ बसने लगी बस सख्त एक चट्टान है।

हर कदम पे साथ चलने की कसम खायी थी जिसने
आज वो उन रास्तों से हो गया अनजान है।

क्या कहूँ, क्या करूँ, क्या मैं अब सोचूँ भला
खिलखिलाती थी जो कल तक, आज वह गुमनाम है।

Monika Jain ‘पंछी’
(11/2014) 

(2)

तू अगर बेवफ़ा ना होता

इन पलकों में भी सपनों की लड़ियाँ होतीं 
खुशियों से भरे कुछ पल और घड़ियाँ होतीं
अरमानों की बिखरी कुछ फुलझड़ियाँ होतीं
हर दिन मीठी सी इक पुड़िया होतीं। 

मेरी उम्मीदों का आसमां कभी ना रोता 
सुन, तू अगर बेवफ़ा ना होता। 

तितलियाँ मुझको भी प्यारी लगतीं 
गूँज भ्रमरों की कुछ न्यारी लगती
मेरे दिल में फूलों की इक क्यारी उगती
तेरे प्यार की ओस जिस पर फबती। 

हर रंग बेरंग सा कभी ना होता 
सुन, तू अगर बेवफ़ा ना होता। 

अहसासों की खनक मुझे भी महसूस होती
मेरी आँखों की चमक भी तो महफूज़ होती
दिल होता रोशन, जो तेरे प्यार की खिली धूप होती
थिरकते से कदम और मखमली दूब होती। 

मेरी आशाओं का तारा टूटा ना होता 
सुन, तू अगर बेवफ़ा ना होता। 

होठों पर मेरे खिलखिलाहट होती
रोम-रोम से छलकी मुस्कुराहट होती
आवाज़ में चिड़ियों सी चहचहाहट होती
दिल में रूमानी सी कोई आहट होती। 

मेरा मन मरघट सा कभी ना होता
सुन, तू अगर बेवफ़ा ना होता। 

Monika Jain ‘पंछी’ 
(30/10/2014)

21/11/2017 - Note : These are my old writings and leading to spirituality, today I am not concerned with such writings. As spiritualism is a journey from expectations to acceptance, from complaints to responsibility, from dependence to independence, from innocence to flawlessness and from ignorance to awakening. No matter, who the person is in front of us, what wrong he did, how difficult our situations are, in spiritualism there is no other.

October 1, 2014

Ghazal on Life in Hindi


(1)

ज़िन्दगी

तेज चुभती धूप में कहीं हल चलाती ज़िन्दगी
सागर किनारे रेत में कहीं झिलमिलाती ज़िन्दगी।

कहीं फूल बिखरे हैं पड़े, कहीं काँटें आकर हैं खड़े
कहीं मखमली, कहीं चुभन का अहसास लाती ज़िन्दगी।

एक रोटी बाँटते कहीं चार भूखे नौनिहाल
कहीं हलवा, पूड़ी, खीर से भी मुँह चिढ़ाती ज़िन्दगी।

मंगल विजय के गीत गाये जा रहे हैं एक तरफ
कहीं सर्द बारिश में ठिठुरकर हार जाती ज़िन्दगी।

कहीं आंसुओं से भीगती, कहीं मुस्कुराहटों में खिली
कहीं आसमां को चूमती, कहीं डूब जाती ज़िन्दगी।

कहीं ख़्वाब बुनते दिल यहाँ, कहीं टूटे दिल की किरचियाँ
कहीं नफरतें, कहीं प्रेम के, सुर मिलाती ज़िन्दगी।

कहीं सीढ़ियों पे सीढियाँ चढ़ रहे हैं हौंसले
कहीं आँधियों में उलझकर ठहर जाती ज़िन्दगी।

कहीं भीड़ में तनहा है दिल, कहीं तनहा दिल में शोर है
खोने-पाने के इस भँवर में कसमसाती ज़िन्दगी।

ज़िन्दादिली का नाम है, कहीं बेवजह परेशान है
कहीं दर्द में भी हँसती है, कहीं यूँ ही कराहती ज़िन्दगी।

धूप-छाँव, शीर्ष-गर्त और अँधेरा-रोशनी
नित-नए रंगों में देखो, उभर आती ज़िन्दगी।

Monika Jain ‘पंछी’
(01/10/2014)

(2)

चंद उम्र की ज़िन्दगी

चंद उम्र की ज़िन्दगी हवा सी बेलगाम गुजरी
किसी मोड़ पर जश्न कहीं ये इंतकाम गुजरी। 

ज़िंदगी को जीने की फुर्सत ही यहाँ कब मिली
कैसे जीना है सीखने में, उम्र ये तमाम गुजरी। 

किसे खबर दिन भर का हासिल भी क्या रहा
फिर एक शब की जुगत में एक और शाम गुजरी। 

चार दिन की ज़िंदगी में दो रात अपनी रही
एक उसकी याद में तो एक उसके नाम गुजरी। 

एक कतरा ज़िंदगी में क्या पर्दा क्या झरोखा
होंगे तुम्हारे राजदार अपनी तो सरे आम गुजरी। 

जिस्मानी घर में रूह की कितनी ही तफ़तीश की
रहकर गयी वो उम्र भर जाते हुए गुमनाम गुजरी। 

Malendra Kumar

Life is beautiful but full of ups and downs just like seesaw. It’s filled with many twist and turns. Happiness-sorrow, victory-defeat, day-night, hopes-depression, comfort-problems, prosperity-poverty all are the two sides of this coin of life. For someone it may be the bed of rose but for the other it may be a way filled of thorns. Even for the same person life is always changing. One should be always ready to face all these challenges of life to make it worth. Feel free to add your views about this ghazal on life.

September 30, 2014

Poem on Natural Disaster in English

(1)

Think for The Nation

The flood water have throttled so many screams
The temper of this nature swallowed so many dreams.

It's very painful to see this destruction
O nature! Why this exasperation?

Well! It’s not the time to blame or complain
Why this politicization? Don't you feel ashamed?

We must deliver all the possible help to them
Saving their life should be our prime aim.

This is possible only through our mutual cooperation
Forget all the personal differences and think for the nation.

Monika Jain 'Panchhi'
(23/06/2013)

(2)

It Might be Too Late

In this murk night between the whirling blizzards
Every voice is lost somewhere in the desert.

Those who has growled or ever roared
Today they are missing between these windstorms.

I see a light is far away
Perhaps there is a shelter
Preferable to walk in the morning fog
Since this night is hauling the storm.

The cool breezes seem grumbling something
Something is depressing them
and it turned them into deadly weapon.

Storms are like hungry from centuries
and an anger inside the nature
Today it wants to get everything out
Perhaps that's why the ice sheet is laid on all.

The truth is
We do not even learn from our mistakes
Even after of nature's repeatedly warnings
We do not realize our mistakes
until we face our death.

Today I am missing my family
and I'm battling for my life
Maybe this is my last night
But I do not think nature is incorrect in anyway.

Some people will mourn
also ask for forgiveness with folded hands to God
But after a few days, they will be carrying on
Human effigy of mistakes and they will make mistakes again.

Chetan K Dheer
(30/09/2014)

Today climate is changing very fast. Greenhouse gases we are producing having a dangerous impact on environment. Nature is giving all the warning signs in form of frequent flood, windstorm, earthquakes, tsunami, volcanic eruptions, hurricanes, landslides, tornadoes, droughts, famines, cyclones, etc. Mother earth is warning us at an alarming rate. Something needs to be done about it as soon as possible. Otherwise it might be too late leaving us only with regret.

September 29, 2014

Poem on Attraction in Hindi


(1)

आकर्षण 

आकर्षण का असल आकर्षण भी 
तब तक ही है 
जब तक वह प्रत्यक्ष प्रकट न हो 
फिर भी 
महसूस किया जा सके 
स्वतंत्र रूप से 
अपने-अपने अनुशासन
और सहजता में रहते हुए। 

Monika Jain ‘पंछी’
(18/02/2017)

(2) 

कशिश 

इस कशिश को बस कशिश ही रहने दो 
ना तुम कुछ कहो 
ना मुझे कुछ कहने दो। 

कि अहसासों की स्वीकारोक्ति 
खत्म कर देगी तिलिस्म 
उन खुबसूरत पलों का 
जो जन्म ले रहे हैं 
तेरी-मेरी बातों के बीच। 

कि आगे बढ़ने की चाहत 
कर देगी हमें बहुत दूर 
जहाँ से नामुमकिन होगा वह सामीप्य 
जो दूर रहकर भी 
अब तक होता रहा महसूस। 

कि जिस सुकून की तलाश में 
बढ़ना चाहते हैं कदम 
वह है मृग मरीचिका सा 
जो सिर्फ बढ़ाएगा हमारी बेचेनियाँ 
और भर देगा हमारे बीच 
सदा का खालीपन। 

कि कैसे बताऊँ तुम्हें 
कि इन रंगीन ख्वाबों और अक्सों को 
छूने को जैसे ही बढ़ेंगे हाथ 
बुलबुलों से हो जायेंगे ये अदृश्य 
और रह जायेगी 
फकत बेरंग, उदासीन खामोशियाँ। 

मैं नहीं चाहती 
उस मुस्कुराहट को खोना 
जो रहती है मेरे होठों पर 
जब महसूस होते हो तुम आसपास। 

मैं नहीं चाहती 
उस मीठे इंतजार का कत्ल 
जिसे रहती है हमेशा 
तुम्हारे कुछ कहने की आस। 

मैं नहीं चाहती 
जन्म लें वे अपेक्षाएँ 
जिन्हें पूरा ना कर पाने की मजबूरी 
बिखेर दे हर ओर 
शिकायतों से भरी एक चुप्पी। 

मैं नहीं चाहती 
कि एक दूसरे को पाने की चाहत में 
हम खो दें सदा के लिए
ये खूबसूरत से अहसास भी 
जो ले आते हैं तुम्हें 
मेरे दिल के पास। 

कि रहने दो मुझे इस नशे में चूर 
जीने दो बनकर सिर्फ तुम्हारे ख्वाबों की हूर 
कि होती है ख्वाबों की दुनिया अक्सर 
हकीकत से बेहत सुन्दर 
कि झूठ ही सही 
कम से कम यहाँ 
मैं महसूस तो सकती हूँ तुम्हें 
अपनी रूह के अन्दर। 

Monika Jain ‘पंछी’ 
(29/09/2014)

September 28, 2014

Essay on Navratri Durga Pooja Festival in Hindi

नवरात्रि के नौ संकल्प

नवरात्रि शुरू हो गयी है। इन नौ दिनों में आप नारी शक्ति और देवी के नौ रूपों की पूजा करेंगे, नौ दिनों तक अखंड ज्योत जलाएंगे...अच्छी बात! माँ दुर्गा के सम्मान में नौ दिनों तक गरबा, आरती, डांडिया करेंगे, अच्छी बात! नौ दिनों तक उपवास, व्रत, फलाहार आदि करेंगे; नंगे पाँव रहेंगे...अच्छी बात! नौ ही दिन माँ को नए-नए प्रसादों का भोग लगायेंगे, ज्वारे उगायेंगे, प्रतिदिन मंदिर जायेंगे, जल चढ़ाएंगे, माँ का विशेष श्रृंगार करेंगे, कन्यायों की पूजा करेंगे, उन्हें भोजन कराएँगे, नए-नए उपहार देंगे...वह भी अच्छी बात! जप, तप, पूजा, पाठ, भक्ति, आराधना जो कुछ भी आप करेंगे...सब कुछ अच्छी बात!

बस मेरे कुछ सवालों का जवाब दीजिये - पूजा हम उन्हीं की करते हैं ना जिनका हम आदर और सम्मान करते हैं! तो फिर अपनी हर समस्या के लिए देवी की उपासना करने वाले इस भारतीय समाज में कन्या के जन्म को अभिशाप क्यों माना जाता है? क्यों शक्ति के उस अंश को कोख में ही मार डाला जाता है? क्यों एक ओर आप शक्ति के जिस स्वरुप की पूजा करते हैं वहीँ दूसरी ओर उसे सम्मान, अधिकार और बराबरी का दर्जा भी नहीं दे पाते? क्यों हर रोज अख़बार हाथ में उठाते ही न जाने कितनी मासूमों की चीखों और चीत्कारों से घर गूंजने लगता है? क्यों नारी को संकीर्ण सोच, कुप्रथाओं, भेदभाव, अपमान, दूसरे दर्जे का मनुष्य समझे जाने; तिरस्कार, तानों, छेड़छाड़, मार-पिटाई जैसे क्रूर व्यवहार से रूबरू होना पड़ता है? दहेज़, शिक्षा और नौकरी पर मनमाने प्रतिबन्ध, बलात्कार, तेजाब डालना, डायन घोषित कर मारना-पीटना, मासिक चक्र के समय अपवित्र समझा जाना, सिर्फ देह समझा जाना, पराया धन मानना, गालियाँ, भद्दे-फुहड़ मजाक...और भी न जाने क्या-क्या...कितना कहूँ, क्या-क्या बताऊँ?

अगर हम सच में नवरात्रि मनाना चाहते हैं तो आज से और अभी से ये नौ संकल्प लें, हमारा नवरात्रि मनाना सार्थक हो जाएगा, और इससे अच्छी बात और कोई होगी नहीं :

पहला संकल्प कन्या भ्रूण हत्या जैसे क्रूर विचार की हत्या का। कोख में बेटी की हत्या जैसे महापाप के प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कभी भी भागीदार नहीं बनने का। अपने बेटे और बेटी में भेदभाव नहीं करने का। समय की मांग भी यही है कि बेटे और बेटी की परवरिश एक जैसे की जाए। समान प्यार, समान अधिकारों के साथ ही घर और बाहर की सभी जिम्मेदारियों में उन्हें समान रूप से भागीदार बनाया जाए।

दूसरा संकल्प दहेज़ ना देने और ना लेने का। बेटियों को अपनी संपत्ति में बराबर का भागीदार बनाने का, और विवाह को व्यापार और सौदे में ना बदलने का।

तीसरा संकल्प अपनी झूठी शान, इज्जत और अहम् के त्याग का, जिसकी वजह से बेटी को प्यार करने की इजाजत नहीं; अपना मनपसंद जीवन साथी चुनने का अधिकार नहीं।

चौथा संकल्प अपनी माँ और पत्नी को सम्मान और बराबरी का दर्जा देने का। स्वार्थ वश, मोह वश या किसी भी कारण से किसी एक की उपेक्षा ना हो इसका खयाल होना चाहिए।

पाँचवा संकल्प हर ऐसे कार्य की तिलांजलि का जिसमें अंधविश्वासों के नाम पर कभी नारी को अपवित्र समझा जाता है तो कभी अकेली, विधवा, परितक्यता को चुड़ैल या डायन बताकर उसका बलात्कार और मारपीट की जाती है।

छठा संकल्प नारी को सिर्फ देह समझकर यौन उत्पीड़न, छेड़छाड़, बलात्कार, फूहड़ टिप्पणियाँ, तंज, अश्लील इशारों, तेजाब डालना जैसी कलुषित मानसिकता और वृतियों के त्याग का। नारी को एक इंसान समझकर उसके साथ इंसानों से व्यवहार का।

सातवाँ संकल्प नारी को आज़ादी देने का। पर्दा प्रथा, बुरका, सिन्दूर, बिछिया, मंगल सूत्र जैसे प्रतिबन्ध और विवाह के प्रतीक सिर्फ नारी के लिए ही क्यों?

आठवाँ संकल्प नारी को वह सहजता भरा वातावरण उपलब्ध करवाने का जिसमें वह दिन हो या रात, किसी के साथ हो या अकेले, बेफिक्र होकर कहीं भी आ जा सकें। अपने कार्य स्थल पर बिना किसी भय के काम कर सके।

नौवां संकल्प नारी के प्रति प्यार और सम्मान का। उसके त्याग, समर्पण, सहनशीलता का मूल्य समझने का। उसके प्रति किसी भी तरह के अत्याचार और हिंसा के परित्याग का, और इन सभी संकल्पों को याद रखने का।

नवरात्रि के इन दिनों में माँ दुर्गा के प्रति श्रद्धा और सम्मान का इससे अच्छा और क्या तरीका हो सकता है? हमें देवी नहीं बनना है, हमें बस एक इंसान समझकर इंसानों की तरह बराबरी और न्यायोचित व्यवहार चाहिए। क्या ले सकते हैं आप ये संकल्प? क्या दे सकते हैं हमें अपनी पहचान, आज़ादी और अस्तित्व?

Monika Jain ‘पंछी’
(28/09/2014)

September 9, 2014

हिंदी दिवस पर निबंध

हिंदी को बनाएँ रोजगार की भाषा

आज अचानक कहीं नज़र पड़ी तो पता चला कि हिंदी दिवस आने वाला है। सच पूछो तो कभी याद नहीं रहता। रोज हिंदी में लिखते-पढ़ते हिंदी इस कदर दिलोदिमाग में रच बस गयी है कि इसका कोई दिवस भी है, यह ख़याल कैसे रहे? पसंद तो हिंदी बचपन से ही रही है, पर पिछले दो-तीन सालों से लिखना शुरू किया है, तो हिंदी से ये दिल्लगी बढ़ती ही जा रही है। तो अपना तो हर दिन हिंदी दिवस ही है, पर अब चूँकि घोषित हिंदी दिवस आने वाला है तो कुछ विशेष मुद्दों पर बात करना चाहूँगी।

बहुत सी बातें हैं जो बहुत अजीब लगती है। कल की ही बात है, अंग्रेजी माध्यम के कुछ बच्चों से हिंदी में गिनती के बारे में पूछा, तो बड़े फक्र और गर्व से जवाब मिला कि बस 20 तक आती है। आगे सीखने के बारे में कहा तो ऐसे नाक भौहें सिकोड़ी जैसे उनकी शान पर बट्टा लगाने की बात कह दी हो।

‘मात्र 30 दिनों में फर्राटेदार अंग्रेजी बोलिए।’ इस तरह के विज्ञापन बोर्ड आज हर गली-मोहल्ले की शोभा बढ़ा रहे हैं। पैदा होते ही बच्चे को तुतला-तुतलाकर अंग्रेजी सिखाते माँ-बाप आज हर घर में देखे जा सकते हैं। खरपतवार की तरह उग आये अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में हिंदी में बोले जाने पर शुल्क लगाया जाता है। अपने ही देश में अपनी ही भाषा में बात करने पर शुल्क लगाना? अंग्रेज चले गए पर अंग्रेजी मानसिकता से मुक्ति अब मिलती नज़र नहीं आती।

एक और विचित्र बात, अधिकांश लोग जो अंग्रेजी वक्तव्य में कुशल होते हैं, वे अंग्रेजी ना जानने वालों को हेय दृष्टि से देखते हैं। शुद्ध हिंदी भाषा बोलने वालों का मजाक उड़ाया जाता है। इससे बुरी बात और क्या होगी कि एक विदेशी भाषा हमारे यहाँ विभाजक का कार्य कर रही है। यह एक प्रकार का नस्ल भेद ही है जो समाज में भाषा के आधार पर दरार डाल रहा है।

वैसे इन सबके लिए सरकारी नीतियाँ काफी हद तक जिम्मेदार हैं। अगर बिना किसी प्रतिबन्ध या मजबूरी के हमें अख़बारों या टीवी चैनल्स पर भाषा चुनने का अधिकार दिया जाए तो हममें से अधिकांश लोग अपनी-अपनी मातृ भाषा को ही चुनेंगे। फिर भी अंग्रेजी को विशेष दर्जा दिया जाता है। हिंदी दिल की भाषा तो बन गयी पर रोजगार की भाषा नहीं बन पायी। चीन, जर्मनी, जापान और दक्षिणी कोरिया जैसे कई देश हैं, जिन्होंने अपनी स्वयं की भाषा के बल पर अपार सफलता हासिल की है। अंग्रेजी वहाँ सिर्फ अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की भाषा है, पर भारत की सफलता तो अभी भी विदेशी भाषा पर टिकी हुई है।

हमें अगर हिंदी को जिंदा रखना है, इसे जन-जन की भाषा बनाना है तो इसे केवल साहित्य के दायरे से बाहर लाना होगा। हिंदी भाषा में सरल, सहज, बोधगामी, गुणवत्ता युक्त साहित्य जो ज्ञान का विशाल भंडार हो, उसकी जरुरत तो है ही, लेकिन साथ-साथ बहुत जरुरी है विज्ञान, दर्शन, समाज शास्त्र, अर्थशास्त्र आदि सभी विषयों पर अच्छी पठनीय सामग्री भी हो। क्योंकि सिर्फ साहित्य पर केन्द्रित भाषा समूचे राष्ट्र की भाषा नहीं बन सकती। उसका भविष्य अच्छा नहीं हो सकता। वह विकास की सीढ़ी नहीं बन सकती।

बहुत जरुरी है हिंदी को रोजगार की भाषा बनाना। इसके लिए चिकित्सा, अभियांत्रिकी और रोजगार के सभी क्षेत्रों के पाठ्यक्रम हिंदी में होने चाहिए। विदेशी भाषाओं का अध्ययन बिल्कुल गलत नहीं है, पर हमारी मूल शिक्षा प्रणाली और कार्य प्रणाली हिंदी व अन्य क्षेत्रीय भाषाओं आधारित होनी चाहिए।

जो अंग्रेजी के शब्दों के हिंदी में लम्बे चौड़े अर्थ निकाल कर हिंदी का मजाक उड़ाते फिरते हैं, उनसे यही कहूँगी कि जैसे हिंदी के कई शब्दों के अंग्रेजी में समानार्थक शब्द नहीं होते, वैसे ही हिंदी में भी हर अंग्रेजी शब्द का समानार्थक शब्द होना जरुरी नहीं है। वैसे भी हिंदी का दिल तो इतना बड़ा है कि उसमें सभी भाषाओँ के जरुरी शब्दों के लिए स्थान है। ऐसे में ये बेवजह का मजाक उड़ाना अपने ही देश का अपमान है। भावी पीढ़ियों पर इसका नकारात्मक असर ही पड़ना है।

हिंदी तो सबसे सरल और सहज भाषा है, जिसे सीखना भी आसान है और व्यवहार में लाना भी आसान है। एक अन्तराष्ट्रीय भाषा बनने के सारे गुण इसमें विद्यमान है। तो आईये हिंदी को हम अपने सपनों, अपने चिंतन, अपने प्रतिरोध, अपने समर्थन, अपने संपर्क, अपने पठन-पाठन और अपने रोजगार की भाषा बनाने की ओर कदम बढ़ाएँ।

मोनिका जैन ‘पंछी’
(14/09/2014)

हिंदी दिवस की सभी को शुभकामनाएं। जितना संभव हो हम हिंदी को दिल और दिमाग से अपनाएँ इसी में इस दिवस की सार्थकता है।