February 28, 2014

Tit for Tat Story in Hindi

सबक

आज स्कूल की छुट्टी थी। विकास, आयुष, विविधा, अंकुर और रजत जो कि पड़ौसी थे पास ही के एक पार्क में पकड़म–पकड़ाई खेल रहे थे। पार्क का गेट खुला हुआ था और गाय का एक छोटा सा बछड़ा पार्क के अन्दर आ गया। बच्चे बड़े शैतान थे। सभी उस बछड़े को सताने लगे। कोई उसकी पूँछ खींचने लगा, तो कोई उसके पैर, कोई उसे पास पड़ा डंडा उठाकर मारने लगा।

बच्चों के ग्रुप में से विविधा जिसे यह सब बहुत बुरा लग रहा था, बार-बार अपने साथियों को यह सब करने से रोक रही थी। वह बोली, ‘किसी निर्दोष जानवर को इस तरह परेशान करना अच्छी बात नहीं है। अगर कोई हमारे साथ ऐसा करे तो हमें कैसा लगेगा? कितना प्यारा बछड़ा है और कितना छोटा भी। इसे परेशान करके तुम सबको क्या मिलेगा? प्लीज, इसे जाने दो।’

तभी विकास बोला, ‘तू अपना ज्ञान अपने पास रख! डरपोक कहीं की। आई बड़ी हमें अच्छा-बुरा सिखाने।’

यह कहकर विकास बछड़े को मारते हुए उसके पीछे दौड़ने लगा। बाकी बच्चे भी शोर मचाते हुए उसके पीछे हो लिए। विविधा उदास मन से घर आ गयी।

बच्चे दौड़ते-दौड़ते एक सुनसान रास्ते पे आ गए। बछड़ा झाड़ियों की ओट में छिपकर जाने कहाँ निकल गया। शाम हो गयी थी और अँधेरा होने लगा था। चारो बच्चे वापस घर की ओर लौटने लगे। अचानक बहुत सारे कुत्तों का समूह वहां आ गया। बच्चों को देखकर सब कुत्ते भौंकने लगे। बच्चे बहुत ज्यादा डर गए। वे सहम-सहम कर चलने लगे। कुत्तों ने वापस जाने वाले रास्ते को घेर लिया था। बच्चों के पसीने छूटने लगे।

उन्हीं में से आयुष डरते-डरते बोला, ‘हमने आज उस छोटे से बछड़े को बहुत सताया। हमने विविधा दीदी की बात भी नहीं मानी। इसलिए हमारे साथ यह सब हो रहा है। अब हम क्या करेंगे? ये कुत्ते तो हमें काट खायेंगे।’ और यह कहते-कहते वह जोर-जोर से रोने लगा।

उसे रोता देख सभी का रोना छूट गया। सभी को अपने मम्मी, पापा और घर की याद सताने लगी। कुत्ते भौंकते जा रहे थे और बच्चे डर के मारे एक दूसरे से चिपक कर खड़े हो गए।

तभी सामने से स्कूटर पर विविधा के पापा आते दिखाई दिए। बच्चों की जान में जान आ गयी। रोते-बिलखते बच्चों और कुत्तों को देख उन्होंने स्कूटर रोका और सब कुत्तों को डराकर भगा दिया। जब सब कुत्ते भाग गए तो बच्चों ने राहत की सांस ली और दौड़कर वे विविधा के पापा से लिपट गए।

‘अंकल आपका बहुत-बहुत शुक्रिया। आज आप ना होते तो पता नहीं हमारा क्या होता।’ रजत ने अपने आंसू पौंछते हुए कहा।

‘कुछ नहीं होता। हाथों में पत्थर लेकर तुम उन्हें भगा सकते थे। सामान्यतया वे हम इंसानों को नहीं काटते। हाँ कभी-कभी खतरा होता है। खैर! अब चिंता की कोई बात नहीं है। अब सब ठीक हो गया है, लेकिन तुम सब यहाँ इस सुनसान रास्ते पर क्या कर रहे हो?’ विविधा के पापा ने पूछा।

बच्चों ने सारी बात अंकल को बताई और अपनी गलती पर बहुत पछतावा भी जताया।

अंकल ने कहा, ‘बच्चों! यह जरुरी नहीं कि तुमने बछड़े को परेशान किया इसलिए तुम्हारे साथ ऐसा हुआ। यह कभी भी हो सकता है। लेकिन हाँ, यह बात समझना बहुत जरुरी है कि जैसा तुम अपने साथ नहीं चाहते, वैसा तुम्हें दूसरों के साथ भी नहीं करना चाहिए। उस बछड़े को भी तुम लोगों से ऐसा ही डर लगा होगा जैसा अभी तुम्हें इन जानवरों से लग रहा था। अपने से निर्बल की हमें हमेशा रक्षा करनी चाहिए। हम मनुष्य सबसे समझदार और बुद्धिमान प्राणी माने जाते हैं तो कम से कम हम से तो यही अपेक्षित है। आज जो हुआ उसे एक सबक की तरह याद रखो और अब आगे से किसी भी मासूम को परेशान मत करना, और कोई तुम्हें परेशान करे तो भी इतना घबराने की जरुरत नहीं। हिम्मत और समझदारी से परिस्थति का सामना करो। बाकी हमेशा कोई ना कोई रास्ता निकल ही आता है।’

सभी बच्चों ने अंकल से वादा किया कि वे आगे से ऐसा कभी नहीं करेंगे।

‘चलो अब सब घर चलते हैं।’ अंकल ने कहा।

‘हाँ-हाँ अंकल जल्दी चलिए। हमें विविधा दीदी से माफ़ी भी मांगनी है।’ अंकुर बोला।

और सभी ख़ुशी-ख़ुशी घर के लिए रवाना हो गए।

Monika Jain ‘पंछी’
(28/02/2014)

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February 21, 2014

Story on Ideal (Best) Student in Hindi

Story on Ideal (Best) Student in Hindi
 
सर्वश्रेष्ठ छात्र
(नन्हें सम्राट में प्रकाशित)

आज स्कूल का वार्षिकोत्सव था। हर क्षेत्र में प्रतिभा दिखाने वाले बच्चों को पुरस्कारों का वितरण हो रहा था। रोहन बहुत खुश और उत्साहित नजर आ रहा था। उसे पूरा विश्वास था कि इस साल उसे ही स्कूल के बेस्ट स्टूडेंट का अवार्ड मिलेगा। उसने स्कूल टॉप किया था और बैडमिंटन में भी राज्य स्तर पर प्रथम स्थान पाया था। वह बहुत सुन्दर भी था। पर इन सब बातों पर उसे बहुत घमंड था। अपने सामने वह किसी को कुछ नहीं समझता था। सामने रखी ट्रॉफी की ओर इशारा करते हुए बार-बार दोस्तों से कह रहा था, ‘देखना, यह ट्रॉफी थोड़ी देर बाद मेरी ही बगल में होगी।’

‘पर स्कूल तो अमित ने भी टॉप किया है तो उसे भी तो अवार्ड मिल सकता है।’ रोहन का एक दोस्त डरते-डरते बोला।

‘तू चुप कर! वह लंगड़ा पढ़ाई के अलावा और कर ही क्या सकता है? मैं तो खेलकूद में भी अव्वल हूँ, इसलिए इनाम तो मुझे ही मिलेगा।’ रोहन इतराते हुए बोला।

सभी पुरस्कारों के वितरण के बाद अंत में जब बेस्ट स्टूडेंट के पुरस्कार की बारी आई तो अमित के नाम की घोषणा हुई। तालियों की गड़गड़ाहट से हॉल गूँज उठा। पर रोहन के चेहरे की ख़ुशी और उत्साह नाराजगी, गुस्से और ईर्ष्या में बदल गयी। वह अपने दोस्तों से कहने लगा, ‘इस टकले प्रिंसिपल ने इस लंगड़े में जाने क्या देख लिया कि इसे बेस्ट स्टूडेंट बना दिया। जरुर तरस खाकर ही यह इनाम दिया होगा। वरना इस अवार्ड पर तो पूरी तरह से मेरा ही हक़ था।’

रोहन के चापलूस दोस्त उसकी हाँ में हाँ मिलाने लगे। पर अंशुल को रोहन की यह बात बहुत बुरी लगी।

वह बोला, ‘रोहन यह अच्छी बात नहीं है। तुम एक तरफ बेस्ट स्टूडेंट का अवार्ड चाहते हो और दूसरी तरफ किसी के लिए कैसे शब्दों का प्रयोग करना चाहिए ये भी तुम्हें नहीं पता। शारीरिक कमजोरी तो किसी में कभी भी आ सकती है, पर इसका यह आशय नहीं कि हम किसी की कमजोरी का मजाक उड़ायें। और किसी को सिर्फ उसकी शारीरिक दुर्बलता की वजह से कमतर आंके। अमित सिर्फ पढ़ाई में होशियार ही नहीं उसका आचरण भी बहुत अच्छा है। अपनी शारीरिक कमजोरी के बावजूद भी वह हमेशा सबकी मदद के लिए तैयार रहता है। पढ़ाई में कमजोर छात्रों को पढ़ाता है। छोटे, बड़े सभी का कितना आदर करता है और यही सब बातें उसे स्कूल का सर्वश्रेष्ठ छात्र बनाती है।’

‘वह ढंग से चल फिर नहीं सकता। इसलिए सबकी सहानुभूति पाने के लिए ऐसा करता है। खैर! उसे तो मैं अगले साल देख लूँगा।’ यह कहकर रोहन अपने दोस्तों के साथ घर की ओर निकल पड़ा।

गर्मी की छुट्टियों के बाद स्कूल वापस शुरू हुए। रोहन अमित को नीचा दिखाने का कोई भी मौका नहीं छोड़ता था। उसकी हमेशा यही कोशिश रहती कि अमित पढ़ाई में ज्यादा ध्यान ना दे पाए। एक बार तो उसने अमित की कुछ नोटबुक्स भी उसके बैग से चुराकर कहीं छिपा दी। ताकि वह परेशान रहे।

वार्षिक परीक्षा में तीन महीने बचे थे। एक दिन रास्ते में रोहन की साइकिल का एक कार से एक्सीडेंट हो गया और वह लहूलुहान सड़क पर बेहोश होकर गिर पड़ा। अस्पताल में जब उसे होश आया तो पता चला उसके दोनों पांवों की हड्डियाँ टूट गयी है और दोनों में प्लास्टर बंध गया है। वह बहुत डर गया। वह माँ से पूछने लगा, ‘माँ मेरे पैर सही तो हो जायेंगे ना? मैं फिर से चल तो सकूँगा ना? और माँ मैं अपना एग्जाम तो दे पाऊंगा ना?’

माँ ने उसे भरोसा दिलाया कि सब कुछ ठीक हो जाएगा और उसे आँखें बंद कर आराम करने को कहा।

पर जैसे ही उसने अपनी आँखें बंद की उसकी आंखों के सामने स्कूल का वार्षिकोत्सव, अंशुल और अमित का चेहरा घूमने लगा। उसे अंशुल की कही हुई सब बातें याद आने लगी और वह सब हरकतें भी जो उसने अमित को परेशान करने के लिए की थी। ज्यों ही उसने आँखें खोली अपने सामने उसने अंशुल और अमित को पाया, जो उसकी तबियत पूछने के लिए वहां आये थे। उन्हें देखकर रोहन का रोना छूट गया। वह अपने किये पर बहुत शर्मिंदा था। उसने अपनी सारी गलतियाँ स्वीकार की और अमित से माफ़ी मांगी।

अमित ने उसे चुप करवाते हुए कहा, ‘तुम बिल्कुल चिंता मत करो। तुम बहुत जल्द ठीक हो जाओगे और रही स्कूल और पढ़ाई की बात तो स्कूल में अब जो भी पढ़ाया जाएगा वो मैं तुम्हें घर आकर समझा दूंगा और तुम्हें नोट्स भी दे दूंगा। तुम बस समय पर दवा लो और जल्दी से ठीक हो जाओ।’

अमित की बातों से रोहन को बहुत हिम्मत मिली और साथ ही उसे आत्मग्लानि भी हुई, ‘जिस लड़के का वह हमेशा मजाक उड़ाता रहा, परेशान करता रहा आज वही उसकी मदद के लिए सबसे पहले आया। वह सचमुच सर्वश्रेष्ठ है।’

डॉक्टर ने रोहन को दो महीने घर पर ही आराम के लिए कहा। उधर अमित स्कूल के बाद अक्सर रोहन के घर आ जाता और उसे स्कूल में पढ़ाया हुआ सब कुछ समझा देता। अमित और रोहन बहुत अच्छे दोस्त बन गए। परीक्षा तक रोहन बिल्कुल ठीक हो गया। अमित की मदद से उसने अच्छे अंकों से परीक्षा पास की।

आज फिर से वार्षिकोत्सव था। सर्वश्रेष्ठ छात्र के नाम की घोषणा होने वाली थी। हर ओर से अमित का ही नाम गूँज रहा था और जब अमित को पुरस्कार मिला तो रोहन सबसे ज्यादा खुश नज़र आ रहा था।

Monika Jain ‘पंछी’
(21/02/2014)

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