April 27, 2014

Essay on Development of India in Hindi

साठ सालों के विकास का सफ़र : क्या खोया, क्या पाया?

शायद वृद्धावस्था में दिमाग खाली रहने के कारण भूत और वर्तमान के बीच भटकता रहता है। यही कारण है कि विगत दिनों से कई बार जीवन काल में आये बदलावों पर मन भटकता रहता है। बचपन से आज तक सामाजिक, आर्थिक व शैक्षणिक मूल्यों में बदलाव के साथ विकास का यह 60 सालों का सफ़र कितना कुछ अपने साथ लाया व कितना कुछ अपने साथ ले गया, इस पर प्राय: मन भटकता रहता है।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि पिछले सात दशकों में भारत ने प्रशंसनीय प्रगति की है। शिक्षा, सुख-सुविधा के साधन, उपचार की उपलब्धता, कमाने के अवसर, संचार माध्यम तथा मनोरंजन के साधनों का तेजी से विस्तार एक बहुत बड़ी उपलब्धि है।

लोगों के आर्थिक विकास और क्रय शक्ति में वृद्धि से आज भारत विकासशील देशों में अग्रिम पंक्ति में खड़ा है। आने वाले बीस से पच्चीस वर्षों में भविष्य का अध्ययन करने वाले विद्वान भारत को जापान व अमेरिका से सम्पन्नता में आगे निकल जाने की भविष्यवाणी करने लगे हैं। सभी भारतीयों को देश की इस उपलब्धि पर गर्व महसूस होना चाहिए।

किन्तु विकास के इस सफ़र में हमने क्या खोया है? इस पर लोगों का ध्यान शायद बहुत कम ही जाता है। मेरे अनुसार सबसे महत्वपूर्ण पांच मनुष्यता के आधार मूल्य जो हमने इस विकास यात्रा में गवाएं हैं, वे इस उपलब्धि को बौना बनाने के लिए पर्याप्त हैं।

1. संतोष : हमारे मनीषीयों ने संतोष को परम धन की संज्ञा दी है। किन्तु प्रबंधन विशेषज्ञों ने प्रगति के लिए इसे बाधक बतलाकर लोगों को भौतिकवाद की ओर इस प्रकार दौड़ने के लिए मजबूर कर दिया कि इतना कुछ पा लेने के पश्चात् भी और पाने की लालसा खत्म ही नहीं होती। इस अतृप्त लालसा का ही परिणाम है कि लोगों का सुख चैन गायब हो गया है। पहले जहाँ एक सब्जी रोटी खाकर मन तृप्त हो जाता था, आज कुछ भी खाने से पहले यह सोचना पड़ता है कि इसका सेहत पर क्या असर होगा। अधिक कमाने के फेर में आज लोग मिलावट, बेईमानी, लूट, धोखेबाजी, भ्रष्टाचार आदि को जायज मानने लगे हैं। वैसे देखा जाए तो हम बाजारवाद के मायाजाल में जकड़ दिए गए हैं। परिणाम स्वरुप अधिकतर लोग मानसिक तनाव से जनित बीमारियों जैसे रक्तचाप व मधुमेह से जूझ रहे हैं। संक्षेप में कहा जाए तो हम आज पहले की अपेक्षा अधिक गरीब ही हुये हैं, क्योंकि आज हम पैसों की भूख ज्यादा महसूस करते हैं।

2. समाज : मनुष्य खुद को सामाजिक प्राणी मानकर गर्व महसूस करता है। सामाजिक होने का मतलब समाज के अन्य लोगों के प्रति संवेदनशील होना है। मुझे अच्छी तरह याद है कि बचपन में पूरा मोहल्ला एक परिवार की तरह रहता था। सभी परिवारों में एक पारदर्शिता व अपनापन था। हम बच्चे लोग आसपास के सभी लोगों को भैया, दीदी, काकाजी, ताईजी आदि संबोधनों से न सिर्फ बुलाते थे बल्कि मान भी देते थे। हम बच्चों से कभी कोई गलती हो जाती थी तो मोहल्ले का कोई भी बड़ा व्यक्ति अधिकार से डांट देता था। डांट में छुपे स्नेह के कारण बुरा मानने का तो सवाल ही पैदा नहीं था। यह अपनापन सिर्फ मोहल्ले तक ही सीमित नहीं था बल्कि उस समय के सामाजिक बंधन का स्थानीय प्रतिरूप था। इस मजबूत सामाजिक बंधन का ही परिणाम था कि लोग गलत काम करने से डरते थे। अपनी समस्या को बांटने के लिए कई विकल्प थे इसलिए मानसिक तनाव जनित बीमारी कभी सुनने में नहीं आती थी। बढ़ते भोगवाद व सीमित परिवार की सोच ने इस सामाजिक बंधन को आज इतना कमजोर कर दिया है कि बाहरी व्यक्ति तो दूर घर के किसी बड़े व्यक्ति को भी आज किसी को टोकने में डर लगता है कि बुरा ना मान जाए। सामाजिक बंधन के कमजोर होने के साथ ही लोगों के व्यवहार में आज एक स्वच्छंदता व उच्श्रंखलता दिखाई देती है। निंदनीय कार्य व दुष्कर्म भी आज लोग नि:सहाय से देखकर चुप रह जाते हैं।

3. सच्चाई : हमारे मनीषीयों ने सच्चाई को सबसे अधिक महत्त्व दिया है। सीधे शब्दों में सच्चाई अंतरात्मा की आवाज़ है। सच्चाई का पालन करने वाले सरल ह्रदय लोग होते हैं। आजकल हर कोई एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा में लगा हुआ है, चाहे वह बच्चों की शिक्षा हो, सुख-सुविधा के साधन जुटाने की बात हो अथवा धन कमाने की दौड़। इस प्रतियोगिता में हर कोई सिर्फ आगे निकलना चाहता है। इस चाह में अंतरात्मा को कुचल डाला है। लोग दूसरों से आगे निकलने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। विकास की इस चाहत ने समाज में एक ऐसी बीमारी फैला दी है, जिसका इलाज फ़िलहाल किसी के पास नहीं है।

4. सम्मान : बड़ों व अथितियों का सम्मान करना हमारी संस्कृति का एक गौरवशाली अंग रहा है। बचपन से ही बच्चों को सवेरे उठकर घर में बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लेना सिखाया जाता था। आशीर्वाद लेते समय पूरा झुककर पैरों को छूना पड़ता था। यह एक प्रकार के व्यायाम से कम नहीं था। साथ ही बड़े लोग जो सहज भाव से आशीष वचन बोलते थे वे मनोबल को बढ़ाने वाले होते थे। प्यार व सम्मान की यही डोर परिवार व समाज को बांधे रखती थी। बिखरते परिवार व जीवन की व्यस्तता ने इस परंपरा को लगभग समाप्त ही कर दिया है। ऐसा नहीं है कि बच्चे आजकल बड़ों के पैर नहीं छूते हैं। लेकिन झुकने में कष्ट अधिक सम्मान कम झलकता है। यह प्रथा आज सिर्फ एक दिखावा बनकर रह गयी है वह भी सिर्फ गिनेचुने लोगों तक सीमित। अथिति तो आजकल पहले से सूचित करके ही आ सकते हैं। कई अवसरों पर बोझ समझकर झेल लिए जाते हैं व कई अवसरों पर बहाने बनाकर टाल दिए जाते हैं। अनजान व्यक्ति को तो आजकल घर में बैठाकर पानी पिलाने से भी डर लगता है। भरोसे की इस कमी ने समाज में एक बिखराव पैदा कर दिया है। जिसके दुष्परिणाम हम सभी जानते हैं।

5. संवेदना : दूसरों के प्रति संवेदनशील होना एक स्वस्थ समाज की पहचान है। मुझे बचपन की बातें आज तक अच्छी तरह याद हैं। दया, ममता, स्नेह आदि भावनाओं को हमारे मनीषियों ने मानवता का अभिन्न अंग माना है। ऐसा नहीं है कि आज ये भावनाएं लोगों में नहीं है। हम आज भी लोगों में ये भावनाएं देख सकते हैं, किन्तु इनका दायरा प्राय: अपने परिवार, नजदीकी मित्रों और सम्बन्धियों तक ही सीमित रह गया है। इन भावनाओं को डर, अविश्वास, असुरक्षा और स्वार्थ ने काफ़ी हद तक दबा दिया है। किसी अपरिचित व्यक्ति की मुसीबत में सहायता करने से हम लोग सामान्यतः कतराने लगे हैं। शायद यही कारण है कि जो अपराध पहले रात में चोरी छिपे किये जाते थे, आजकल खुलेआम दिन-दहाड़े हो रहे हैं।

मैं यह बिल्कुल नहीं कहना चाह रहा हूँ कि आजकल सब कुछ गलत हो रहा है। आज का युवा अधिक बुद्धिमान, सृजनशील, मेहनती व खुली मानसिकता वाला है। किन्तु वृहद परिप्रेक्ष्य में मानव मूल्यों में गिरावट साफ़ नज़र आती है। ऐसा भी नहीं है कि ये मूल्य लुप्तप्राय: ही हो गए हैं, किन्तु इस सत्य को नकारा नहीं जा सकता कि पहले की अपेक्षा बहुत अल्प मात्रा में देखने को मिलते हैं। इस पर हमारे आर्थिक विकास का कितना योगदान है इस पर बहस की जा सकती है।

Devendra Joshi
(27/04/2014)

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April 26, 2014

Essay on Eve Teasing in Hindi

विरोध प्रकट करना जरुरी है

इसे मेरी बेफिक्री कहूँ, बेवकूफ़ी, मासूमियत या फिर बहादुरी ये तो नहीं पता पर बचपन से मेरे दिमाग में ये अक्सर नहीं आया कि मैं लड़की हूँ इसलिए मुझे अँधेरे में अकेले बाहर नहीं निकलना चाहिए। यहाँ नहीं जाना चाहिए, वहां नहीं जाना चाहिए, इस टाइम नहीं जाना चाहिए या फिर किसी ना किसी का साथ होना चाहिए।

घर से दूर किसी अजनबी शहर में रहते हुए भी मैं किसी भी वक्त अकेले ही बाहर निकल जाया करती थी। अंधेरों से मुझे कभी डर लगा ही नहीं। रास्ते मुझे अक्सर याद नहीं रहते थे इसलिए 2-3 बार ऐसा हुआ जब मुझे पहुंचना कहीं और था और पहुँच गयी कहीं और। एक बार वक्त था सुबह के 6 बजे का और एक बार वक्त था रात के 10 बजे, पर डर कभी नहीं लगा।

एक बार लाइट चली गयी थी, बारिश हो रही थी, रात के दस बजे थे। बाहर एकदम भयानक अँधेरा था। अगले दिन एग्जाम था और मैं अकेले ही कैंडल लेने के लिए एक शॉप पर चली गयी। रात के दो-तीन बजे भी मुझे अकेले बाहर जाने को कह दिया जाए तो भी मुझे डर नहीं लगता था, और यह वह एरिया था जहाँ पर ज्यादातर कॉलेज के स्टूडेंट्स रहते थे। जिनमें कई बिगड़े हुए शहजादे भी थे। जब छोटी थी तब भी परीक्षाओं के समय अक्सर रात के 2:30 - 3 बजे तक खुले छत पर अकेले पढ़ती थी जब सब घर वाले सो जाते थे। चोरों का भी डर नहीं लगता था। :p

शायद वो मासूमियत और बचपना था जिसकी वजह से मैंने दुनिया और दुनिया वालों को हमेशा सकारात्मक नजरिये से देखा। अनिष्ट की आशंका कभी हुई ही नहीं और भाग्य से ऐसा कुछ बुरा कभी हुआ भी नहीं। आज भी ऐसी ही हूँ। प्रतिबन्ध आज भी पसंद नहीं। अकेले कहीं भी जाने से डर नहीं लगता लेकिन अब थोड़ी बेवकूफ़ी वाली बहादुरी कम हो गयी है।

पहले बहुत ज्यादा अंतर्मुखी थी इसलिए राह चलते बिगड़े हुए लड़कों की फब्तियों, जानकार टकराने की कोशिश, कहीं भी छू कर निकल जाना आदि को बस इग्नोर कर देती थी। जब मैं 5th क्लास में पढ़ती थी तो किसी लड़के ने उल्टी-सीधी, अश्लील बातें लिखकर एक लैटर मेरे बैग में डाल दिया था। मैंने किसी को भी नहीं बताया और छत पर जाकर रोने लगी और चुपचाप उस लैटर के बारीक-बारीक टुकड़े करके फेंक दिए। यह सबसे बड़ी बेवकूफ़ी थी, पर तब इतनी समझ नहीं थी। कुछ दिनों बाद फिर से लैटर मिला। इस बार मैंने घर पे बता दिया। प्रिंसिपल मेम को शिकायत कर दी गयी और वह हरकत फिर कभी नहीं हुई।

कुछ सालों से एक अच्छा परिवर्तन आया है। अब तो सरे बाजार किसी को भी भाषण सुनाने का मादा रखती हूँ। कईयों को सुना भी चुकी हूँ। सच बहुत मजा आता है। :p एक बार रात का समय था। मैं अकेली अपने रूम पे आ रही थी। पीछे 10-12 आवारा लड़कों का ग्रुप चल रहा था। कुछ बोलते जा रहे थे। अचानक किसी चीज ने मुझे छुआ। शायद कुछ फेंका गया था। मैं पीछे पलटी और तेज आवाज़ में उन्हें कुछ सुनाया। क्या सुनाया वो तो याद नहीं पर मेरे बोलने के बाद उन्होंने वैसी हरकत दुबारा नहीं की। ऐसे ही एक बार दशहरे के मेले में भीड़ का फायदा उठाते हुए लड़कों की टोली ने हमारे ग्रुप की लड़कियों को बुरे इरादे से छूने की कोशिश की। भीड़ की वजह से पता तो नहीं चला कौन है पर मैंने फिर भी तेज आवाज़ में विरोध प्रकट किया और वहां भी वह हरकत दुबारा नहीं हुई।

यहाँ मैं बस इतना कहना चाहती हूँ कि लड़कियों! छेड़खानी, फब्तियों और लड़कों की उल्टी सीधी हरकतों को बिल्कुल भी नज़रंदाज़ मत करो। जब हम इग्नोर करते हैं तो ऐसी हरकते हमारे साथ बार-बार होगी और अगर हम दुनिया, समाज की परवाह किये बगैर तुरंत अपना विरोध प्रकट करते हैं तो यकीन मानिए ना केवल हम अपना भला कर रहे हैं बल्कि कई और लड़कियों का भी भला कर रहे हैं। और हाँ, बेवकूफ़ी वाली बहादुरी नहीं दिखानी है। सावधान हमेशा रहना है। :)

Monika Jain ‘पंछी
(26/04/2014)

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April 24, 2014

Letting Go of a Bad Relationship Advice in Hindi

एक पैगाम टूटे दिल के नाम

कोमल : वह हमेशा खुद को प्यार कहता रहा पर उसने कभी धोखे, नफ़रत, झूठ, अपमान, चालाकी और दर्द के सिवा कुछ भी नहीं दिया।

रश्मि : देता भी कैसे? जिसके पास जो होगा वही तो देगा।

कोमल : तो वह खुद को प्यार क्यों कहता फिरता है?

रश्मि : तुमने ऐसे लोगों के बारे में जरुर सुना होगा जो अपने पुराने, नकली, सड़े-गले बेकार सामान को बेचने के लिए एक अच्छी सी कंपनी का सुन्दर और आकर्षक लेबल चिपका लेते हैं। बस वह भी यही करता है। अपनी गले तक भर आई नफ़रत, झूठ, चालाकी, फ़रेब आदि को बाहर निकालने के लिए उसने प्यार का चोला ओढ़ रखा है। जिसका शिकार तुम जैसे कई लोग बन जाते हैं।

कोमल : लेकिन, मैं ही क्यों?

रश्मि : तुम ही इसलिए क्योंकि तुम्हारी अच्छाई में ऐसे बुरे लोगों से लड़ने की शक्ति है। तुम कभी टूट नहीं सकती...कभी नहीं!...और तुम उदास क्यों होती हो? तुम्हें तो खुश होना चाहिए कि तुम्हें सच पता चल गया। वैसे भी कोई कितने भी खुशबूदार, सुन्दर और आकर्षक चोले से खुद को ढक ले, ज्यादा देर तक वह अपनी दुर्गन्ध छिपा नहीं सकता।

कोमल : पर वह कहता है कि वह कभी गलती नहीं करता। वह तो हमेशा दूसरों को ही दोष देता है। अपनी गलती कभी नहीं मानता।

रश्मि : जो ऊपर से नीचे तक कीचड़ से सना हो, उसके पास दूसरों को देने के लिए और क्या होगा? अफ़सोस! उसने कभी आइना देखा ही नहीं।

कोमल : हम्म!...प्यार और नफरत कुछ भी नहीं, वह तो बस दया का पात्र है।

रश्मि : एकजेक्ट्ली! देखो, बुरा जो छूट रहा है, उसे छूटने दो। बुरे को छोड़ने का गम न करो। यह समय दु:ख मनाने का है भी नहीं, बल्कि जश्न मनाने का है। जश्न अपनी आज़ादी का! आज़ादी उस घुटन से जो तुमने कई बार उस रिश्ते में महसूस की। आज़ादी उस दर्द से जो तुम्हें हमेशा अपने प्यार के बदले मिलता रहा। आज़ादी उस दुर्गन्ध से जो उसकी घिनौनी सोच से निकल तुम्हारे फूल सरीखे जीवन में पसरती रही। आज़ादी उन आँसुओं से जो तुम्हारी आँखों में इरादतन भरे गए, जिनके लिए तुम कभी बनी ही नहीं थी। आज़ादी उस अपमान से जो वह खुद को श्रेष्ठ साबित करने की होड़ में वक्त-बेवक्त तुम्हें देता रहा। आज़ादी उस बर्बर, धूर्त और स्वार्थी बंधन से जो तुम्हारी मासूमियत के लिए सजाये मौत था। इतनी आज़ादी और खुशियाँ एक साथ मिलने का भी कोई गम करता है भला?

उसका अहम् और दिखावा रिश्ते से ज्यादा जरुरी था, पर तुम्हारे आत्मसम्मान से ज्यादा नहीं। जो रिश्ता सिर्फ नाम का था, सिर्फ स्वार्थ पर टिका...प्यार, विश्वास, परवाह, समझ से पूरी तरह नदारद...और जो भीतर से पूरी तरह खोखला था, उस रिश्ते का बोझ ढ़ोना कहाँ की बुद्धिमानी है? याद रखो! आज़ादी हर हाल में सुकून देने वाली है; जरुरत बस हिम्मत, साहस और अडिग फैसलों की है।

तुम्हारे लिए उसे भूल पाना मुश्किल होगा, लेकिन नामुमकिन नहीं। सुनो, यह मानव का स्वभाव है...वह हमेशा उन चीजों के पीछे भागता है जो उसकी पहुँच से बाहर होती है। तुम अच्छी तरह जानती हो जिस प्यार को सिर्फ तुम उससे पाना चाहती हो, वह तुम्हें कभी मिल नहीं सकता, तो फिर क्यों तुम अपनी ख़ुशी को किसी की कृपा का गुलाम बनाना चाहती हो? याद रखो! यह कतई जरुरी नहीं है कि जो चीजें आसानी से मिल जाए, उनका मोल कम है और जो ना मिले, उनका ज्यादा। जो हमसे सच्चा प्यार करते हैं, जो निस्वार्थ भाव से हमारी मदद करते हैं, जो हमारी मजबूरियों का फायदा नहीं उठाते, जो हमारी समस्याओं को समझते हैं, जिन्हें हमारी परवाह होती है...या यूँ कहूँ कि जो सच्चे अर्थों में हमारे दोस्त होते हैं, कई बार हम उन्हें वह महत्व नहीं दे पाते जिनके वे हकदार होते हैं। क्योंकि हम तो उन लोगों के पीछे भाग रहे होते हैं, जो हमें आकर्षित करते हैं, जो हमें कभी नहीं समझते, जो हमें धोखा दे रहे होते हैं।

तुम समझ रही हो न! इसलिए फिर कहती हूँ, बुरा जो छूट रहा है, उसे छूटने दो। बुरे को छोड़ने का गम ना करो। सामंजस्य गलत नहीं, लेकिन यह तुम्हारी मुस्कुराहट की कीमत पर तो नहीं होना चाहिए न! किसी को माफ़ कर देना भी गलत नहीं है, पर कई बार हमारी माफ़ी को हमारी कमजोरी समझ लिया जाता है और सामने वाला इसे अपने उचित-अनुचित हर तरह के व्यवहार पर हमारा समर्थन समझने लगता है।...और फिर माफ़ कर देने का मतलब स्वीकार करना तो नहीं होता।

जो टूट गया है, वह व्यर्थ नहीं गया, उसने तुम्हें ज़िन्दगी जीने के कई सबक सिखाएँ हैं। तुम बस स्वागत करो उस खुले आकाश का जो तुम्हारे पंखों को उड़ान देने को व्याकुल है। जो तुम्हारी बातों, आँखों और मुस्कुराहटों को जीवन देने वाला है। जो तुम्हें सही मायनों में प्यार करना सिखाने वाला है। पहले खुद से प्यार और फिर सबसे प्यार!

Monika Jain ‘पंछी’
(24/04/2014)

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April 10, 2014

Inner vs Outer Beauty Essay in Hindi

सुन्दरता : सुन्दर दिलों का अहसास 

‘सुन्दरता’ एक सुन्दर शब्द!...पर सौन्दर्य के सिर्फ कुछ मापदंड तय करके हमने अपनी संकीर्ण बुद्धि से इस शब्द की असीमितता को कितना सीमित कर दिया है। आज सुन्दरता की परिभाषा बस एक आकर्षक देह तक सिमट कर रह गयी है। शरीर के लिए रंग, लम्बाई, वजन, विभिन्न अंगों का आकार ऐसे ही कुछ पैमाने हमने तय कर दिए हैं...पर अधिकाशतः ये चीजे इंसान को प्रकृति प्रदत्त होती है जिसमें उसका स्वयं का हाथ नहीं होता। ऐसे में जिन चीजों को पाना इंसान के बस में ना हो उनके आधार पर बेहतरी या सुन्दरता का आंकलन कैसे किया जा सकता है?

अब अगर नारी सौन्दर्य की ही बात की जाए तो अधिकांश पुरुषों के लिए नारी उस किताब की तरह है जिसका सिर्फ कवर पेज खूबसूरत होना चाहिए। क्या नारी की सुन्दरता का मापदंड बस उसका बाहरी रंग रूप ही होता है? क्या दया ममता, त्याग, संवेदनशीलता, सहनशक्ति, सामंजस्य जैसे नारी के मूलभूत गुणों का कोई महत्व नहीं?

एक माँ के रूप में अपने बच्चे के लिए ममत्व भाव, एक पत्नी के रूप में अपने पति के लिए प्यार, परवाह और समर्पण, एक बहन के रूप में अपने भाई के लिए किये गए त्याग क्या इनका कोई मोल नहीं? सच तो यह है कि बाहरी रंग रूप के सामने इन भावों की सुन्दरता अनमोल है। खैर! ये तो अपनों की बात है पर सोचिये वे लोग कितने सुन्दर होते होंगे जिन्होंने मानवता की सेवा को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया है।

मदर टेरेसा एक ऐसी महिला जिन्होंने अपना सारा जीवन दूसरों के नाम कर दिया। जिन्होंने कोढ़ झरते हुए, फुटपाटों पर पड़े मरणासन्न, असहाय, गन्दी से गन्दी बस्ती के लोगों की सेवा की, उनका उपचार कर उन्हें स्वस्थ बनाया। उन्हें उन लोगों की गंदगी नहीं दिखाई दी बल्कि उनकी सेवा से मिलने वाला आत्मिक सुख दिखाई दिया। इस सेवा भाव में है सुन्दरता! इसी तरह महात्मा गाँधी, तिलक, राजा राममोहन राय, स्वामी विवेकानंद जैसे कई महापुरुष हुए हैं जिन्होंने तत्कालीन समाज की रूढ़िवादिता, कट्टरवादिता, अंधविश्वासों आदि को दूर कर मानवता को एक नयी दिशा दी। उनकी इस सोच और इन कार्यों में है सुन्दरता!

सुन्दर हैं वे लब जिनसे दूसरों के लिए दुआएं निकलती है, दूसरों को खुश देखकर खिलने वाली मुस्कान भी सुन्दर है। सुन्दर है वह दिल जो दूसरों का दर्द समझे, दूसरों के गम में बहने वाले आंसू भी सुन्दर है। सुन्दर हैं वे हाथ जो दूसरों की मदद के लिए उठते हैं और सोचिये ये सब करने वालों की सोच कितनी सुन्दर होगी?

हमारे देश की विडंबना है कि करोड़ों रुपये लेकर हमारा मनोरंजन करने वाले सचिन, शाहरुख़, सलमान, कैटरीना, ऐश्वर्या के हम दीवाने हैं जो हर वक्त हमारे दिलोदिमाग पर छाए रहते हैं, पर मानवता की सेवा करने वाले असली महानायक हमारी चर्चा का विषय नहीं बनते। मुन्नी बदनाम हुई, शीला की जवानी इन आइटम सोंग के ठुमके हमें पागल कर देते हैं पर कई मुन्नियों और शीलाओं जिनका जीवन दलदल बना हुआ है उनकी मसीहा बनकर आई नारी शक्ति की हम बात नहीं करते। वे हमारी प्रेरणा नहीं बनती।

आज हर किसी में बस अपने बाहरी रंग रूप को संवारने की होड़ लगी हुई है। सुन्दरता को सफलता का शॉर्टकट माना जा रहा है। विज्ञापनों में भी गोरा रंग पाने की क्रीम, साबुन, रेशमी घने बालों के लिए शैम्पू, कंडीशनर आदि को सफलता पाने के साधनों के रूप में परोसा जा रहा है...और हम इन्हें सहर्ष सुन्दरता वर्धक मानकर ग्रहण भी करते जा रहे हैं। पर वास्तविक सुन्दरता का आंकलन व्यक्ति की सोच, उसके व्यवहार और उसके कार्यों के आधार पर ही किया जा सकता है। सच तो यह है कि सुन्दरता एक अहसास है जो देखने से भी ज्यादा महसूस करने की चीज है...और यह बसती है लोगों के दिलों में जिसे महसूस करने के लिए भी एक सुन्दर दिल चाहिए।

Monika Jain ‘पंछी’
(10/04/2014)

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April 8, 2014

Pseudo Feminism (Feminist) Poem in Hindi

छद्म नारीवादी

तुम क्यों भूल जाती हो
वह प्यार का नहीं
है नफरत का सौदागर
और उससे स्नेह की आकांक्षा
है जलते अंगारों में ढूंढना सागर।

तुम क्यों भूल जाती हो
वह विश्वास का नहीं
है झूठ का पुलिंदा
जब वो कहता है खुद को सच्चा
खुद झूठ हो जाता है शर्मिंदा।

तुम क्यों भूल जाती हो
स्त्री उसके लिए स्त्री नहीं
बस देह है एक करारी
रेशमी जुल्फ़े, नशीली आँखें, दहकते होठ,
छरहरी काया, और मादक उभारों से ज्यादा
कुछ भी नहीं है उसके लिए एक नारी।

तुम क्यों भूल जाती हो
वह है स्वार्थ से भरा एक घड़ा
तुम्हारे प्यार, विश्वास और समर्पण के
नहीं है कोई भी मायने
क्योंकि उसका अहंकार और मतलब है
उसके लिए सबसे बड़ा।

तुम क्यों भूल जाती हो
उसकी मासूम, मोहक मुस्कान के पीछे
छिपे हैं ख़तरनाक इरादे
खुद चल कर आये शिकार पिंजरे में
बस इसलिए वो करता है मीठी-मीठी बातें।

तुम क्यों भूल जाती हो
उसका नारीवादी भाषण
है महज एक ढ़कोसला
केवल मासूमों को ही नहीं
तेज तर्रार स्त्रियों को भी
उसने है छला।

उसके दिमाग में छिपी अश्लीलता जानती हो न!
एक छद्म नारीवादी है वो पहचानती हो न!
उसके झूठे प्यार में हर बार तुम बस छली ही जाओगी
वह है देह का भूखा, ना मिटाओगी उसकी प्यास
तो उसकी नफ़रत की आग में जलायी जाओगी।

दिल को जरा अपने आराम दो
और दिमाग को अपने ये काम दो
प्यार की भाषा नहीं समझते हैं ऐसे जानवर
इसलिए सुधरेंगे वो, ऐसी उम्मीद कभी ना कर
छोड़ दो उन्हें उनके हाल पर
वक्त लिख रहा है उनके भी अपराध
फिरेगा पानी उनकी हर चाल पर।

Monika Jain ‘पंछी’
(07/04/2014)

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April 7, 2014

Feminist Poem in English


(1)

Why Do You Forget?

Why do you forget?
He is trader of hate not of love
Expecting affection from him
is searching ocean in burning coals.

Why do you forget?
He is bunch of lies not of faith
When he calls himself truthful,
the lie itself becomes ashamed.

Why do you forget?
Woman is not a woman
just a stunning body for him
Your love, faith and devotion make
no sense to him.

Why do you forget?
He is a pitcher full of selfishness
For him,
his ego and mean is most important
Your sacrifice makes no sense.

Why do you forget his dangerous intentions
behind his innocent, seductive smile.
Victim herself will walk in his cage
that's why he talks so sweet and polite.

Why do you forget?
His feminist speech is merely a charade
Not only the innocent,
he also deceived the women who are firebrand.

Don’t you recognize the hidden obscenity of his mind?
Don’t you know he is a pseudo-feminine?
Every time you will be cheated in his fake love
He is just the carving of your body,
If you won’t quench his thirst
he will burn you in the fire of his disgust.

Relax your heart and let the brain work
Such people don’t understand the language of love
So never expect that one day they will change
Just leave them on their condition and state
Time is writing all their crimes
Water will cast on their artifice.

Monika Jain ‘Panchhi’
(07/04/2014)

(2)

It's Time to Awake

Your love, your care
I searched everywhere
Here and there
I found that nowhere.

I kept crying
but you didn't care
How cheap you are
you made me aware.

Promises you made
all proved fake
It's time to awake
now no one can me break.

I am not a toy
with which you can enjoy
My dreams, Oh boy!
you never can destroy.

I can walk alone
Who cares you're gone
If you think I'm forlorn
then you are a moron.

Monika Jain 'Panchhi'
(08/2012)

The first poem is making us aware about pseudo feminism and the second one is about a girl who is turning into a feminist. These are my old poems about transient emotions of girls passing through a situation of broken heart. At present I am not so much concern about this kind of writing. As now I believe the only thing that is needed to deal with such situations is being aware and conscious about your’s and other’s emotions and feelings. Such complaints makes no sense but right actions do. So take these poems just as a different color of life.