June 16, 2014

Poem on Gender Equality in English

(1)

Equality is When...

People are talking about
gender equality since long.
But they are taking
its meaning in wrong.

'Time is bad' by saying this
So many restrictions are
imposed on me.
Equality is when
no fear will torture me.

I will consider the equality
when from college to home
I can go alone...
without facing any gazing eyes
and bad intentions of some morons.

'You are a girl'
by hearing this
I won't have to compromise.
Equality is when
my good and bad I can decide.

When there will be
no discrimination
among girls and boys.
I will consider equality
When I won't be treated as toys.

Only judicial laws
can't give me right of equality.
There is a need of
changing the narrow mentality.

Monika Jain 'Panchhi'
(08/2013)

(2)

Handful of Freedom

Mom! Is there not such sky
from where daily I can bring 
a handful of freedom.

Freedom from those staring eyes
that doesn’t allow me to walk 
unfazed on the paths.

Freedom from those taunts, jokes and teasers
that repeatedly gives me the feeling of 
being only a body, not a soul.

Freedom from those 
thousands of restrictions and advices
where two needles of watch decides 
when I should go out of the house.

Freedom from the terror
 that is constantly growing
while turning the pages of daily newspapers 
filled with bloodstained shouts.

Freedom from that illusion of independence
in which women liberation is defined only by
 showing of her body parts.

Freedom from that narrow minded thinking
where women’s honor and respect is 
linked only with her body.

Freedom from that orthodox opinion
where innocent loses her honor not the guilty.

Freedom from the competition
that is introducing men and women as an opponents
Instead of considering as each other’s complement.

Mom! I have to bring a handful of freedom daily
So that I can make a world
where my thoughts, confidence and abilities can breath freely.

Monika Jain ‘Panchhi’
(16/06/2014)

June 2, 2014

Unity in Diversity Quotes in Hindi

Unity in Diversity / Caste System Quotes

  • 20/08/2016 - भेदों को मिटाने का तरीका कहीं भेदों को मजबूत करने वाला न हो...ख़याल रहे।
  • 16/04/2016 - हर किसी के लिए उस भाव को समझना मुश्किल है, जिसमें कोई व्यक्ति स्वयं में सबको शामिल करने लगता है। 
  • 04/04/2016 - पहले भिन्नता को भेदभाव का आधार बनाना और फिर समानता के लिए संघर्ष...कहीं कुछ चूक रहा है। समानता संभव नहीं है। मुक्ति भेदभाव से चाहिए...अनूठेपन से नहीं। 
  • 20/02/2016 - आग लगने के बाद आग में घी डालने वालों! जलाने में आग भेदभाव नहीं करती...वह बस अपना धर्म निभाती है। 
  • 19/02/2016 - आसपास के बच्चों के खेलने के लिए जिद करने पर कई बार उनके साथ कार्ड्स खेलना भी होता है। उसमें एक गेम है 'ब्लैक क्वीन'। उसमें सब ब्लैक क्वीन से कितना डरते हैं। एक दिन महसूस हुआ इस ब्लैक क्वीन के साथ कितना रंगभेद हो रहा है।...और फिर बच्चे इसी तरह तो बचपन से ही ये सारे भेदभाव सीख जाते हैं। इसलिए मैं बदल-बदल कर 'रेड क्वीन' भी खेल लेती हूँ उनके साथ। अब से ब्लैक और रेड किंग भी खेला करुँगी। :)
  • 09/01/2016 - सब कुछ इतना सतत और सम्बंधित है कि शब्द और श्रेणियां सब मिथ्या लगने लगते हैं। 
  • 02/06/2014 - मतभेद थे, हैं और हमेशा रहेंगे। ऐसा कभी नहीं हो सकता कि आप मेरी सभी बातों से सहमत होंगे। ऐसा भी असंभव है कि मैं सिर्फ आपको खुश करने वाले शब्द ही बोलूं, पर मैंने इतने सालों में यही सीखा है कि मतभेदों को महत्त्व देकर नफ़रत पाल लेना, आक्रामक हो जाना, रिश्तों की तिलांजलि दे देना और संवाद को हमेशा के लिए खत्म कर देना अक्सर बेवकूफी ही होती है। दूरी और मौन कभी-कभी जरुरी भी हो सकता है लेकिन उसका उद्देश्य शान्ति होना चाहिए। 
  • समर्थन और विरोध विचारों का होना चाहिए व्यक्ति का नहीं। मत भेद कभी मन भेद नहीं बनने चाहिए। 
  • किसी को भी भगवान् या शैतान बना देने की जल्दी जितनी जल्दी छूट जाए... बेहतर है इस दुनिया के लिए और हमारे लिए भी।
  • वैदिक काल में, प्राग्वैदिक काल में, आर्यों में, अनार्यों में, सप्त सिन्धु के भीतर, सप्त सिन्धु के बाहर...अपनी और दूसरों की जड़ें खोजते प्रिय बंधुओं! जड़ों तक पहुँचना अच्छी बात है...पर जड़ों की जड़ें कहाँ पहुँचती है, उसका भी ख़याल रखना। अंतत: तो मूल एक ही है। 
  • हम जब-जब अपने आपको श्रेणीबद्ध करने लगते हैं, तब-तब अपनी संभावनाओं के द्वार को बंद करने लगते हैं। 
  • विभाजन सुविधाओं के लिए किये जाते हैं...उन्हें जकड़कर और पकड़कर बैठने के लिए नहीं। वैसे भी सब कुछ इतना अंतर्संबंधित है कि कोई स्पष्ट रेखा खींची ही नहीं जा सकती।
  • श्रेणियां मात्र सुविधा के लिए होती है...लेकिन जो लोग खुद को श्रेणियों में घनघोर रूप से विभाजित करते लगते हैं, वे सभी बस अपने ही प्रतिबिम्बों के विरुद्ध खड़े होने लगते हैं। 
  • जातियां बनाना हम इंसानों की फितरत है। हम हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई नहीं बनायेंगे तो आस्तिक और नास्तिक बना देंगे, वामपंथ और दक्षिणपंथ बना देंगे, शिक्षित और अनपढ़ बना देंगे and so on.... खैर हमने भाषाएँ बनायी है तो उसका उपयोग तो करेंगे ही। सबसे विकसित मस्तिष्क पाया है तो उसका भी उपयोग करेंगे ही। बस इतना भर ख़याल रहे कि किसी भी शब्द से हम इतना अधिक न जुड़ जाएँ कि वह शब्द ही हमारा विधाता बन जाए। उपयोग ठीक है, दुरूपयोग करते समय बार-बार हजार बार सोचना।
  • प्रकट हो या अप्रकट यह जातीय मानसिकता हर दूसरे व्यक्ति में पायी जाती है जिसके पीछे विलुप्त हो जाते हैं इंसान को इंसान बनाने वाले गुण। 
  • ‘फूट डालो, राज करो’ का दंश हम लम्बे समय तक विदेशी ताकतों का गुलाम बनकर झेल चुके हैं। अब देश के भीतर ही देश के अनेकों दुश्मन पैदा हो गए हैं, जो सिर्फ अपने व्यक्तिगत हितों के लिए फिर हमें बांटकर लड़वाना चाहते हैं, और इन दंगों की आग में अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेकना चाहते हैं। 
  • बहुत सोचे-समझे तरीके से हर बात में जाति और धर्म को घुसेड़ दिया जाता है। जातिगत जनगणनाओं का उद्देश्य भी शायद जाति सम्बन्धी आंकड़ों को प्राप्त कर अपनी राजनैतिक लालसाओं को मूर्त रूप देना ही हो। 
  • वर्गों, जातियों, धर्मों और समुदायों में बँटकर कोई भी देश तरक्की नहीं कर सकता, पर राजनैतिक पार्टियाँ अपने राजनीतिक हितों को साधने के लिए डिवाइड एंड रूल का गेम बहुत शातिर तरीके से खेलती आई हैं। राजनेताओं के मंसूबे तो पूरे हो जाते हैं पर जातिगत आरक्षण में फायदा देखने वाले ये भूल जाते हैं कि आरक्षण का लाभ भी उचित दावेदार को नहीं मिल पाता। यहाँ भी दबंगई और पैसे की ताकत ही काम करती है। 
  • ‘फूट डालो और राज करो’ एक ऐसी रणनीति है जो विभिन्न देशों के बीच, देशों के विभिन्न क्षेत्रों के बीच, राजनीति में, समाज में, धर्म में, एक ही समुदाय या जाति में और यहाँ तक कि एक परिवार में भी अपने स्वार्थों को सिद्ध करने के लिए एक व्यक्ति विशेष या कुछ व्यक्तियों के समूह द्वारा अपनाई जाती है। अक्सर कारगर भी सिद्ध होती है। 
  • जब तक पूरे दिन भर जाति-जाति करते रहोगे तब तक तो जाति कभी नहीं जाने वाली।

Monika Jain ‘पंछी’

June 1, 2014

Essay on Religious Extremism (Intolerance) in Hindi

धर्म के रक्षक ही हैं धर्म के भक्षक

14/10/2016 - नास्तिक सम्मलेन पर हुए आक्रमण के बारे में सुनकर यही कह सकती हूँ कि भीतर से इतने डरे हुए लोग खुद को धर्म रक्षक कहते तो जरा भी अच्छे नहीं लगते। हाँ, अपनी सत्ता और भोगों के अवश्य रक्षक हैं तभी कुछ छिन जाने का इतना डर लग रहा है।...और इतना डर है इसलिए ही दूसरों को डरा रहे हैं। मुर्खता की हद पार कर लेने वाले ये नियंत्रण और आक्रमण विद्रोह, चिढ़ और भेदों को बढ़ाते हैं, कम नहीं करते। वाकई धार्मिक होते तो न दूसरों की स्वतंत्रता छीनने की कोशिश करते और न ही अपनी गुलामी और कुंठा का यूँ सरेआम प्रदर्शन! आस्तिक सम्मेलनों की तरह ही नास्तिक सम्मलेन से भी अधिक मतलब था नहीं क्योंकि कई मामलों में विचार नहीं मिलते। लेकिन फिर भी कुछ नया हो रहा था तो रोज पोस्ट पढ़ते-पढ़ते अवचेतन में कहीं जरा सी उत्सुकता तो थी ही कि क्या आउटपुट रहेगा? कुछ मुद्दे वाकई जरुरी भी लगते हैं।...पर लकीर की फ़कीर महान आतंकवादी आत्माओं का क्या किया जाए?

बहुत पहले एक पोस्ट के लिए इनबॉक्स में धमकी मिली थी। पोस्ट कुछ इस तरह से थी :

01/06/2014 - ये धार्मिक आस्था भी बड़े कमाल की चीज है। लोग निम्न समझी जाने वाली जातियों के घरों का पानी तक नहीं पीते, पर कूड़े-करकट, मल-मूत्र से भरी नदियों में स्नान करने से परहेज नहीं करते, चरणामृत के नाम पर पता नहीं कितने गंदे पानी का आचमन कर जाते हैं। है न कितनी अजब-गज़ब की बात।

धमकी मिली तो फिर अगले दिन इससे भी बड़ी पोस्ट की। जो इस तरह थी :

02/06/2014 - सबसे पहले तो मैं ये बता देना चाहती हूँ कि मुझे किसी भी धर्म या जाति विशेष से पहचाना जाना पसंद नहीं है। मैं एक प्राणी मात्र हूँ और मेरा धर्म प्रेम है। ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं ये बात मुझे कभी परेशान नहीं करती। क्योंकि मेरे लिए अच्छाई या सजगता ही ईश्वर का रूप है, और अच्छाई की ओर कदम बढ़ाने के लिए बुराई और बुरे लोग मेरे लिए उत्प्रेरक का काम करते हैं।

धर्म के नाम पर मार-पीट, गाली-गलौच, धमकियों पर उतर आने वाले; आस्था-आस्था का ढोल पीटकर उल्टी-फुल्टी, गलत-सलत सभी बातों को सही ठहराने वाले और उन्हें दूसरों पर थोपने वाले ये बात अच्छी तरह से समझ लें कि ऐसा करके वे खुद अपने ही धर्म के सबसे बड़े दुश्मन बन रहे हैं। आप भले ही इस भ्रम में जीते रहें कि आपके ये कृत्य आपको धर्म का रक्षक कहलवायेंगे, पर सच सिर्फ इतना है कि आपके ऐसे कार्यों से तथाकथित धर्मों के प्रति बस घृणा ही उपजती है। आप आतंकवादियों से जरा भी कम नज़र नहीं आते।

कितनी अजीब बात हैं न! लोग धर्म के लिए जान दे देते हैं, खून की नदियाँ बहा देते हैं, तलवारें उठा लेते हैं, गोलियां चला देते हैं, बस कुछ नहीं करते तो वह है धर्म का अनुसरण। उन्हें सिर्फ और सिर्फ अपने धर्म का तमगा प्यारा है। सिर्फ अपने हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई (अभी तो इनके भी बहुत सारे भेद-विभेद हैं) होने पर गर्व है, और नीचता की सारी हदें पार कर लेने पर भी उनका ये नाम, तमगा और गर्व शर्मसार नहीं होता। जिसे कभी देखा तक नहीं, उस अदृश्य भगवान् के लिए वे अपने भाई-बहनों का खून तक करने को तैयार हो जाते हैं। यही सिखाता है आपका धर्म? इसी से खुश होते हैं आपके ईश्वर?

धर्म का मतलब आप जैसे ढोंगी कभी नहीं जान सकते, कभी भी नहीं। आप या तो धर्म के नाम पर निर्दोष पशुओं की बलि देंगे या फिर प्रतिमाओं का विसर्जन कर जल को प्रदूषित करेंगे। अपनी बुराइयों का विसर्जन आपसे कभी नहीं होगा। दया, करुणा, ममता, सहिष्णुता, समानता ये सब क्या होता है, ये आप नहीं जान सकते। धर्म का पालन करना है तो सबसे पहले दूसरों के साथ वही व्यवहार करना सीखिए जैसा आप खुद के लिए चाहते हैं।

दशहरे पर आप बुराई के प्रतीक रावण को जलाएंगे, होली पर होलिका दहन करेंगे...पर अपने मन की बुराइयों के दाह का उत्सव? क्या कभी वो मनाया जाएगा? ईद पर बकरों की बलि के बारे में आप कुतर्क देंगे कि अल्लाह को अपने प्रिय का अर्पण करना होता है। ये क़ुरबानी है। अरे भाई! अल्लाह को खुश ही करना है तो खुद की बलि क्यों नहीं दे देते? हालाँकि मैं इसके पक्ष में नहीं हूँ लेकिन खुद के प्राणों से भी प्रिय भला कुछ होता है? अब अगर मैं हिन्दू धर्म की बलि की चर्चा नहीं करुँगी तो आप मेरी बलि देने को भी तैयार हो जायेंगे, तो बता दूँ कि बलि तो बलि ही रहेगी। धर्म का तमगा बदलने भर से उसका अर्थ कभी नहीं बदलेगा। ये कौनसे ईश्वर हैं जो किसी के खून से प्रसन्न होते हैं? और अगर ये ईश्वर है तो फिर दानव कौन होते हैं?

और तो और कुछ लोग कहते हैं - ईश्वर की मर्जी से पत्ता तक नहीं हिलता। वाह! कमाल के भगवान् हैं आपके जो अपने मनोरंजन के लिए हत्याएं, बलात्कार, लूटपाट, चोरी, डकैती सब करवाते रहते हैं। क्यों ईश्वर को इतना बदनाम कर रहे हैं आप? अपने किये धरे को क्यों हमेशा ईश्वर पर मढ़ते रहते हैं? रहम करिए अब ईश्वर पर भी और हम पर भी और ये धर्म का झूठा चौला उतार फेंकिये, गिन्न आती है आपके दोहरे आचरण से।

Monika Jain ‘पंछी’