July 31, 2014

Essay on Double Standards Society in Hindi

मुखौटों का युग

एक वक्त था जब डर लगता भी था तो चोरी, डकैती, लूट, हफ्ता वसूली, चैन स्नैचिंग आदि वारदातें करने वाले गिरोहों से, जिन्हें हम असामाजिक तत्व कहते हैं। लेकिन आजकल सामाजिक कहलाये जाने वाले तत्वों से और भी ज्यादा सतर्क रहना जरुरी है। क्योंकि आजकल लोग सीधा हाथ में चाकू या छुरा लेकर नहीं आते। चेहरे पर मुस्कुराहट, सौम्यता, आदर भाव, विनम्रता लिए वे बड़े सभ्य जान पड़ते हैं, बहुत मीठा बोलते हैं, साफ़-सुथरे कपड़े पहनते हैं और मौका मिलते ही अपने नापाक इरादों को अंजाम दे देते हैं।

असामाजिक तत्वों की उत्पत्ति कहीं न कहीं गरीबी, बेकारी, शोषण के चलते होती है पर आजकल तो समाज में प्रतिष्ठित, पैसे वाले, धर्म गुरु, समाज सेवक, साहित्यकार, क़ानून के रक्षक किसी का भी भरोसा नहीं। पता चला कब किसने रंग बदल लिया, कौन छलिया और धोखेबाज निकल गया।

एक प्रतिष्ठित पत्रिका जिसका दायित्व ही सच के साथ खड़ा होना और झूठ का पर्दाफाश करना है, उसी के संपादक जो युवाओं के आदर्श हैं, खोजी पत्रिका के सूत्रधार माने जाते हैं वे अपनी ही बेटी की दोस्त का यौन उत्पीड़न करते हैं। जहाँ विश्वास और संरक्षण का भाव होना चहिये वहां पर ऐसे कृत्य और वो भी समाज के तथाकथित प्रतिष्ठित व्यक्ति के द्वारा और उसके बाद अपने ही अपराध को छिपाने के लिए लीपापोती।

रोज मंदिर में जाकर चन्दन का टीका लगाने वाला, भजन संध्या में झूम-झूम कर नाचने वाला, घंटों बैठकर प्रवचन सुनने वाला भी कितना बड़ा पाखंडी हो सकता है हम अनुमान नहीं लगा सकते। और ये तो भक्त की बात है पर यहाँ तो आजकल भगवान की तरह लाखों श्रद्धालुओं द्वारा पूजे जाने वाले; सत्य, त्याग, भक्ति, दान, सेवा, मोक्ष आदि पर बड़े-बड़े प्रवचन देने वाले धर्म गुरु भी कई घिनौने आपराधिक कुकृत्यों में संलग्न हैं। ज्योतिष के रूप में कई पाखंडी अन्धविश्वास का कारोबार कर रहे हैं। मंदिरों, मस्जिदों में करोड़ों का दान करने वाले एक भूखे, गरीब बच्चे को देखकर भड़क जाते हैं।

बाल कल्याण, महिला कल्याण के नाम पर संस्थाएं चलाने वाले समाज सेवा की आड़ में यौन शोषण, सेक्स स्कैंडल जैसे घृणित कार्यों को अंजाम दे रहे हैं। कई ढोंगी नशे की लत को पूरा करने के लिए अध्यात्म का चोला धारण किये हुए हैं। राजनेता धर्म निरपेक्षता का मुखौटा लगाकर सत्ता हथियाने की कोशिश कर रहे हैं। जनता की सेवा को ही अपना धर्म बताने वाले राजनेता चुनाव जीतते ही जनता को भूल अपनी जेबें भरने लग जाते हैं। लोकतंत्र के मुखौटे में तानाशाही जारी है। दूसरी ओर टीवी पर घोटाले की ख़बरें सुनते समय, सोफे और कुर्सी पर बैठे-बैठे नेताओं को कोसने वाले, फेसबुक पर लम्बे-चौड़े स्टेटस डालकर खुद को राष्ट्रवादी समझने लगते हैं। पर इनमें से कई लोग ऐसे हैं जो चुनाव के समय स्वार्थवश या रिश्वत लेकर आपराधिक प्रवृति के लोगों को वोट डाल आते हैं। कानून के रक्षक बने पुलिस, जज, वकील कानून की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं।

अपने माता-पिता का हालचाल जानने का भी जिनके पास समय नहीं, जिन्हें अपने माता-पिता की उपस्थिति अपनी स्वतंत्रता में बाधा लगती है, जो उन्हें वृद्धाश्रम छोड़ आते हैं, या उम्र के आखिरी पड़ाव में भी अकेले रहने को मजबूर कर देते हैं, वे लोग फादर्स डे, मदर्स डे पर इतनी मर्मस्पर्शी कविताएँ लिख देते हैं, जैसे कि उनसे ज्यादा दुनिया में कोई भी अपने माता-पिता को प्यार नहीं करता।

यहाँ जो नारीवाद पर भाषण देते हैं, नारी स्वतंत्रता और अधिकारों की बातें करते हैं, उनमें से कई लोग खुद नारी पर शासन करना चाहते हैं। अपने घरों में अपनी पत्नी पर हाथ उठाते हैं। असल में उनकी नज़र में नारी उनकी कामेच्छाओं को पूरा करने वाले हाड़-मांस के शरीर से ज्यादा कुछ भी नहीं।

प्रेम पर अति मर्मस्पर्शी कवितायेँ लिखने वाले कई साहित्यकार हैं जिनके लिए प्रेम देहिक सुख से ज्यादा और कुछ नहीं। जिन लोगों के लिए प्यार शब्द का मतलब सिर्फ और सिर्फ शारीरिक संतुष्टि है, जिन्हें किसी की भावनाओं से कोई सरोकार नहीं, वे लोग प्रेम पर इतनी बड़ी-बड़ी बातें लिख लेते हैं कि पढ़ने वाला उनके सामने खुद को बोना समझने लगे। माना कि लिखना और बोलना एक कला है, पर हम जो लिख-बोल रहे हैं उसका हमारी सोच और हमारे व्यवहार से कुछ तो तालमेल होना चाहिए? संवेदना से रहित लोगों के मुंह से संवेदनशीलता के फूल झरते देखना मेरी समझ से तो परे है। ऐसा शायद सिर्फ वही लोग कर सकते हैं जिन्होंने खुद से अकेले में कभी भी साक्षात्कार नहीं किया।

गैंग रेप के विरोध में लोग सड़कों पर उतर आते हैं। कड़कड़ाती ठण्ड और पुलिस के डंडे भी उन्हें नहीं रोक पाते। लेकिन राह चलते जब किसी लड़की को मदद की जरुरत होती है, तब वे नहीं रुकते। क्योंकि शायद तब उनके पास समय नहीं होता, या उन्हें कवर करने वाला कोई कैमरा नहीं होता, या फिर कोई शाबासी देने वाला नहीं होता। नारी की स्वतंत्रता, समानता और अधिकारों की बातें करने वाले छद्म नारीवादी खुद नारी के शोषक हैं।

वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, भूमि प्रदूषण पर चिंता व्यक्त करने वाले कई लोग ऐसे हैं, जिन्होंने अपने जीवन में एक पेड़ भी नहीं लगाया। जो हर रोज नहाने, कपड़े धोने में ढेर सारा पानी व्यर्थ बहा देते हैं। जो सड़क पर चलते हुए कहीं भी कूड़ा-कचरा फेंक देते हैं।

अशिक्षा को कई समस्याओं की जड़ बताने वाले कितने लोगों ने कभी किसी अनपढ़ को पढ़ाया या पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया? बिजली, गैस की बढ़ती कीमतों पर चिंता करने वालों के घर में भी पानी, बिजली की बर्बादी नहीं रूकती। जिन्होंने खुद बारह बच्चों की फ़ौज खड़ी कर रखी है, वे परिवार नियोजन पर भाषण देते नज़र आते हैं। अहिंसा, जीवदया, नशाबंदी की बातें करने वाले अगर कत्लखानों और नए बार के उद्घाटन पर जाते दिखे तो कोई आश्चर्य नहीं।

सम्मान पाने की चाह तो हर किसी की होती है, पर सबसे पहले जरुरी है, हम खुद अपनी नज़रों में सम्मानित बनें, पर अपने अन्दर झाँकने की फुर्सत कहाँ हैं किसी के पास। ये मुखौटा संस्कृति का जमाना है। यहाँ पर कायर शेर की खाल ओढ़े रहते हैं, अल्पज्ञ स्वयं को सर्वज्ञ प्रदर्शित करते हैं। आदर्शवाद, सिद्धांतों, मानवीयता की बात करने वाले भीतर से बेहद स्वार्थी और जातिगत मानसिकता वाले होते हैं, जिन्हें अपने स्वार्थों की पूर्ति हेतु सैद्धांतिक पाला बदलते देर नहीं लगती। यहाँ एक ही व्यक्ति का अपनी पत्नी को दिखाने वाला, अपनी प्रेयसी को दिखाने वाला, अपने मालिक, अपने नौकर, अपने से कमजोर को और अपने से शक्तिशाली को दिखाने वाला चेहरा अलग-अलग है। मुखौटों के इस युग में एक सच्चा आदमी खोजना बहुत मुश्किल हो गया है।

Monika Jain ‘पंछी’
(31/07/2014)

July 18, 2014

Essay on Women (Women's Day) in Hindi

सिर्फ जिस्म नहीं हूँ मैं 
(आधी आबादी में प्रकाशित)

कितनी अजीब है न मेरी दास्तान? मेरी शिक्षा, स्वतंत्रता, सम्मान, सत्ता, सुरक्षा और संपत्ति के अधिकारों के लिए वर्षों से चिंतन हो रहा है, आन्दोलन हो रहे हैं, मेरे जीवन में बहुत कुछ बदल रहा है। मेरे पक्ष में एक प्रगतिशील जन चेतना का माहौल बन रहा है। लेकिन एक चीज जो तब से लेकर आज तक नहीं बदली, वह है मुझे देह समझा जाना। सारी आज़ादी, सारे अधिकार और सारे सम्मान उस समय बिल्कुल फीके पड़ जाते हैं, जब मेरा अस्तित्व दुनिया की चुभती निगाहों में सिर्फ एक जिस्म भर का रह जाता है।

टपकती वासना से भरी लालची आँखें मुझे हर गली, नुक्कड़ और चौराहे पर घूरती रहती है। भीड़ में छिप-छिपकर मेरे जिस्म को हाथों से टटोला जाता है। राह चलते मुझ पर अश्लील फब्तियां कसी जाती है। मेरा बलात्कार कर मुझे उम्र भर के लिए समाज के तानों से घुट-घुट कर जीने को मजबूर कर दिया जाता है। मुझ पर तेजाब फेंक कर अपनी भड़ास और कुंठा शांत की जाती है।
 
जब भी मेरे साथ होने वाले इन तमाम दुर्व्यवहारों के खिलाफ मैं आवाज़ उठाती हूँ, तो मेरे अस्तित्व को छोटे-बड़े कपड़ों में उलझा दिया जाता है। फिर से मुझे कपड़ों से झांकती देह बना दिया जाता है। पर उन मासूम बच्चियों का क्या? उनके साथ किये गए दुराचरण का क्या? क्या वे नन्हें-मुन्हें किसी भी प्रकार की उकसाहट का कारण बन सकते हैं? क्या ऊपर से नीचे तक कपड़ों में ढकी औरत कटाक्ष नज़रों, अश्लील इशारों और फब्तियों से बच पाती है? 

सदियों से हर लड़के को भी तो ऐसी ही पत्नी और प्रेमिका चाहिए - जिसका चेहरा चाँद सा उज्ज्वल हो। जिसकी आँखें झील सी निर्मल और सागर सी गहरी हो, हिरणी सी चंचल, बड़ी-बड़ी और नशीली हो। जिसके होंठ गुलाब की पंखुड़ियों से कोमल और रसीले हो। जो रेशमी जुल्फ़ों, छरहरी काया और मादक उभारों की स्वामिनी हो। पर मैं कैसे समझाऊं? मेरी आँखें सिर्फ सागर सी गहरी नहीं है। इनमें गहराई है तुम्हारे अंतर्मन को समझने की; इनमें चमक है कुछ सपनों, ख्वाहिशों और अरमानों की; इनमें आंसू हैं जो तुम्हारी छोटी सी तकलीफ़ में भी बहने लगते हैं; इनमें दर्द है तुम्हारी चाहत पर कुरबान हुई कई उम्मीदों का। मेरे होंठ सिर्फ गुलाब की पंखुड़ियों से कोमल नहीं है। इनसे झरते हैं फूल ममता के; इन पर ठहरे हैं कई शब्द जो मुखरित होना चाहते हैं; इन पर जमी है आँखों से बहते अश्रुओं की कई बूँदें जिन्हें सदियों से मैं पीती आ रही हूँ। मेरा वक्ष तुम्हारी वासना को तुष्ट करने के लिए नहीं है। इनसे बहता है क्षीर ममत्व का जो कारण है तुम्हारे अस्तित्व का। मेरा ह्रदय जिसमें बसता है अतुल्य प्रेम, त्याग, ममत्व, क्षमा, संवेदनशीलता और प्रेरणा...सिर्फ मोम सा नाजुक नहीं है। इसमें भरे हैं कई धधकते हुए ज्वालामुखी! समय आने पर बन सकती हूँ मैं रणचंडी भी! बन सकती हूँ मैं एक मजबूत, स्वावलंबी, अटल स्तम्भ!

मेरे अपने माता पिता और परिजनों ने भी तो मुझे देह बनाने में कोई कसर न छोड़ी। मेरी देह अगर बदरंग है तो उन्हें दिन रात मेरी शादी की चिंता सताएगी। आधुनिकता का लबादा ओढ़े आदिम युग के मानवों सा व्यवहार करने वाले मेरे परिजन जाति, गौत्र, धर्म, अपनी झूठी इज्जत और शान के नाम पर...मेरी, मेरे प्रेम और मेरे विश्वास की हत्या करने में भी नहीं हिचकते। इस बर्बरता को अपना मौन समर्थन देकर जायज ठहराने वालों की आँखों से आंसू नहीं लुढकते। दहेज़ प्रथा, कन्या भ्रूण हत्या, बाल विवाह ये सब कुरुतियाँ मुझे बस जिस्म भर बनाकर रख देने का षड़यंत्र है।

समकालीन हिंदी साहित्य के रचनाकारों! मेरी मुक्ति, सम्मान और स्वाभिमान के पक्ष में बन रही जन चेतना की आड़ में तुमने भी तो मेरी एक पोर्न छवि गढ़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मेरी प्रिय नारीवादी लेखिकाओं! क्या तुम्हें पुरुष के समान अधिकारों के रूप में देह-वृतांत का हक़ ही चाहिए था? अपने लेखन द्वारा गुदगुदी और सनसनी पैदा करने के लिए; प्रकाशित, प्रशंसित, अनुशंसित और पुरस्कृत होने के लिए...क्या तुम जानती हो तुमने न जाने कितनी पीढ़ियों के लिए मुझे फिर से उसी हाड़-मांस के दायरे में सीमित कर दिया है। तुम ही सोचो...देह के बाज़ार और इस उन्मादग्रस्त साहित्य में क्या भर अंतर है, जिसका प्रयोजन सिर्फ काम वासना को बढ़ाने के अलावा और कुछ भी नहीं।

मीडिया, अख़बार और कैमरे के पीछे छिपे संवेदना शून्य पुरुषों! तुम्हें हमेशा ऐसे ही प्रसंगों की तलाश रहती है जिसमें मैं एक देह में तब्दील होकर तुम्हारी सारी पुरुष जमात की यौनिकता को संतुष्ट करती रहूँ। किसी मॉल के चेंजिंग रूम से लेकर किसी होटल के कमरे तक छिपे कैमरे से नारी देह के दृश्यों को चुराकर उन्हें ऊप्स मोमेंट्स और शोइंग एसेट का कैप्शन देते तुम्हें लज्जा नहीं आती? फैशन शो में किसी के कपड़े फटने से लेकर, छेड़छाड़ और रेप जैसी घटनाओं तक का वीडियो तुम बड़ी निर्लज्जता से बना लेते हो। उसे तत्काल प्रसारित कर देते हो ताकि कहीं तुम्हारी एक्सक्लूसिव स्टोरी तुमसे पहले किसी और के हाथ न लग जाए।

मुझे जिस्म समझने वाले इन सब संवेदना शून्य लोगों से मैं पूछना चाहती हूँ - क्या शरीर से इतर मुझमें दिमाग नहीं है? क्या मुझमें भावनाएं नहीं है? क्या कुछ कर दिखाने का माद्दा नहीं है? जल, मिट्टी, अग्नि, आकाश और वायु इन्हीं पंच तत्वों से मुझे भी रचा गया है। मेरी अनुभूतियों के स्वर क्या तुम्हें सुनाई नहीं देते? मेरे भी सपने है जो सफलता के आकाश में साकार होना चाहते हैं। मंदिर की घंटियों सी सुरीली मेरी खिलखिलाहट हर ओर बिखरना चाहती है। महत्वकांक्षा की बेलें मन उपवन में फलना-फूलना चाहती है। क्या है मेरी चाह? एक सुन्दर, संवेदनशील, उच्च मानवीय दृष्टिकोण वाला सभ्य परिवेश ही न? जहाँ मुझे निर्णय लेने की आज़ादी हो, जहाँ मुझे अपने व्यक्तित्व और विशिष्टता को पहचान देने की स्वतंत्रता हो। मैं पुरुष को पछाड़ना नहीं चाहती। उससे आगे निकल जाना भी मेरा मकसद नहीं। मैं बस देह से इतर अपना अस्तित्व चाहती हूँ। एक मुट्ठी भर आसमान चाहती हूँ, जहाँ मैं अपने पखों को उड़ान दे सकूँ। एक चुटकी भर धुप और अंजूरी भर हवा चाहती हूँ, जहाँ मैं बिना किसी घुटन के सांस ले सकूँ। थोड़ी सी जमीन चाहती हूँ, जहाँ मैं बिना किसी भय के आत्मविश्वास से अपने कदम बढ़ा सकूँ। मुझे देवी की तरह पूज्या नहीं बनना है। मुझे बस इंसान समझकर समानता का व्यवहार पाना है।

हे पुरुष! कैसे तुम जब चाहे जब मुझे रौंद सकते हो? अपने अस्तित्व का कारण कैसे तुम भूल सकते हो? जिस्म तो शायद सिर्फ तुम हो जिसमें न संवेदना है, न कोई अहसास। तभी तो देह के छले जाने पर आसमान को भी चीर देने वाली मासूमों की चीखे तुम्हें सुनाई नहीं देती। तुम नहीं महसूस पाते कभी भी स्त्री के भीतर रिसते दर्द को। भावनात्मक जुड़ाव तो बहुत दूर...तुम तो मनुष्य होने के नाते भी स्त्री के प्रति नहीं उपजा पाते संवेदनशीलता।

मेरी प्यारी बहनों! तुम्हें भी अपनी सोच, अपने व्यवहार, अपने दिल और अपने दिमाग से घुट्टी की तरह सदियों से पिलाये इस कड़वे और कसैले स्वाद को निकालना होगा, जो दिन-रात तुम्हें एक जिस्म होने की अनुभूति करवाता रहता है। मुझे बताओ - कुछ लिंगगत विभिन्नताओं के अलावा क्या अंतर है तुममें और एक पुरुष में? तुम्हारी प्रखरता, बौद्धिकता, सुघड़ता और कुशलता क्या किसी रंग, रूप, यौवन, आकार या उभार की मोहताज है? तुम जानती हो न अपनी शक्ति? जिस दिन तुम अपना विस्तार करने की ठान लोगी उस दिन यह कायनात भी छोटी पड़ जायेगी। वह कौनसा स्थान है जहाँ तुम नहीं पहुँच सकती? राजनीति, प्रशासन, समाज सेवा, उद्योग, व्यवसाय, विज्ञान, कला, संगीत, साहित्य, मीडिया, चिकित्सा, इंजीनीयरिंग, वकालत, शिक्षा, सूचना प्रोद्यौगिकी, सेना, खेल-कूद से लेकर अन्तरिक्ष तक तुमने अपनी विजय पताका फहराई है। क्या तुम्हें सच में जरुरत है एक देह में तब्दील होकर अश्लील विज्ञापनों, सिनेमा, गानों और साहित्य का हिस्सा बनने की? क्या सच में तुम्हें जरुरत है अपनी मुक्ति को देह और कपड़ों तक सीमित कर देने की। याद रखो! देह और कपड़ों की चर्चा से स्त्री मुक्ति की जंग नहीं जीती जा सकती है।

जानती हूँ, पुरुष हमेशा से तुम्हें जिस्म के इस दलदल में फंसाए रखने के हजारों यत्न और षड़यंत्र करता रहेगा। तुम चाहे चौबीस घंटे काम करती रहो, दिन रात खपती रहो, फिर भी तुम्हारी तरक्की को तुम्हारी देह से जोड़ कर देखा जाएगा। तुम्हें लाखों डॉलर, पाउंड, दीनार और सोने का लालच दिया जाएगा। लेकिन तुम्हें इन सब षड्यंत्रों में नहीं फंसना है। तुम्हें नया टंच माल, तंदूरी मुर्गी, हॉट, सेक्सी और आइटम गर्ल इन सब तमगों को ना करना है। वस्तुओं के विज्ञापन में तुम्हें वस्तु नहीं बनना है। ये सब उपक्रम तुम्हें आज़ाद करने के नहीं तुम्हें गुलाम बनाने के हैं। तुम्हारे सौन्दर्य की नुमाइश कर तुम्हारे अंगों को खरीदने और बेचने के हैं। इस दलदल से बाहर निकलना बहुत मुश्किल है, पर मैं जानती हूँ कि तुम अगर चाहो तो पुरुषवादी मानसिकता के सारे षड्यंत्रों को धता बताकर अपना अस्तित्व बचा सकती हो, जो देह से परे उस सम्पूर्णता का है जो तुम्हारी शक्ति, बुद्धि, क्षमता, कुशलता, प्रखरता, तुम्हारे सपनों, स्वाभिमान, आत्मनिर्भरता और तुम्हारे आत्मविश्वास की लौ से प्रकाशित होता है।

Monika Jain 'पंछी'
(18/07/2014)
Essay on Women (Women's Day) in Hindi
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Hindi Essay on Women's Role, Status, Position in Indian Society
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July 15, 2014

Shayari on Khamoshi in Hindi

ख़ामोशी शायरी

(1)

ख़ामोशी सा अपना कोई होता नहीं है
कुछ हो न पास तो कोई कुछ खोता नहीं है।

(27/03/2017)

(2)

ख़ामोशी टूटकर भी ख़ामोशी रह गयी
बहुत कुछ कहा और कहा कुछ भी नहीं।

(26/02/2017)

(3)

ख़ामोशी पी लेती है न जाने कितनी बातें
वो बोले-बोले-बोले...हम बस सुनते ही रह जाते।

(22/09/2016)

(4)

आज फिर शाम में क्यों घुलती सी उदासी है
आज फिर आँख में ठहरी एक बूँद प्यासी है
आज फिर मन क्यों चुप्पा-चुप्पा सा खोया है
जैसे कोई नन्हा बड़ी देर तक रोया है।

(23/09/2015)

(5)

मेरी इस ख़ामोशी से, किसे क्या हासिल होना था
वक्त ही बेरहम था शायद, उसे बस कातिल होना था।

(15/06/2015)

(6)

तुमसे बात भी करनी है
और कुछ कहने को भी नहीं।

(13/03/2015)

(7)

रहती है खुद से अक्सर एक शिकायत
कि ये शिकायत भला हम क्यों कर नहीं पाते?
खामोशियाँ यहाँ कभी भी सुनी नहीं जाती
और ये शोर के हिस्से हम बस बन नहीं पाते।

(02/03/2015)

(8)

ना बादलों के गरजने से, ना बिजलियों के कड़कने से
सहम जाती हूँ, जब भीतर में एक चुप्पा सा शोर होता है
ना ना करके भी अक्सर सुन लेती है मेरी साँसे
इस चुप्पी में छिपकर एक दिल बहुत रोता है।

(15/07/2014)

(9)

मेरे गुस्से पर तेरी ख़ामोशी
चुभती है कुछ इस कदर
कि दिल तरसता है कभी-कभी
बस एक तेरे गुस्से के लिए।

(10)

बुलाना छोड़कर कुछ वक्त गर ख़ामोश हो जायें
तड़पकर आयेंगे वो ऐसे कि फिर लौट जाना न बने।

(11)

किसको होता है पसंद खामोश होना
यूँ ही नहीं लगते किसी की जुबा पे ताले।

(12)

इन चुप्पियों का भी अपना ही एक किस्सा है
ना जाने कितना शोर इनका एक हिस्सा है
यूँ ही नहीं पसर जाती यहाँ-वहाँ खामोशियाँ
तड़पती है जब आवाज़ कोई, सन्नाटा तभी तो रिसता है।

(13)

दुआ आज भी रहती है, बसता अब भी खुदा है
ख़ामोश हैं दोनों क्योंकि हम खुद से जुदा हैं।

(14)

क्या चाहती हूँ, यह जाहिर करना ही नहीं मुझे
तुम समझ सके तो अच्छा, न समझे तो और भी अच्छा।

(15)

सन्नाटों ने फिर से एक आवाज़ लगाई है
तंग दिल बस्तियों के शोर अब सहे नहीं जाते
जहाँ मेरी खामोशियाँ सांस ले सके
ऐसे लफ़्ज अब कहीं भी तो कहे नहीं जाते।

(16)

कुछ ना कहना भी तो कहना ही होता है
हमेशा लफ्ज़ों की जरुरत नहीं होती बातों को।

(17)

ना आसूंओं से छलकते हैं
ना कागज पर उतरते हैं
दर्द कुछ होते हैं ऐसे
जो बस भीतर ही भीतर पलते हैं।

(18)

उफ़! ये सन्नाटे कितना शोर करते हैं
ना होठों से कुछ कहते, ना कागज पे उतरते हैं
किसने कहा दिल हल्का होता है लिखने वालों का
कितने ही है दर्द जो बस रूह से गुजरते हैं।

Monika Jain ‘पंछी’

(19)

किसी ख़ामोशी का एक सफ़हा पलट कर देखो तुम
जाने कितने अल्फाज़ों के रंग हथेली पे उतर आयेंगे।

(20)

वो लफ्ज़ जो ज़बान पर आकर ठहरा था
कौन जाने उसका किरदार कितना गहरा था
फ़ासिला क्या रहा होगा लबों से जुबां का
दम दरिया में तोड़ा और पास एक सेहरा था।

Malendra Kumar

July 11, 2014

Poem on Patriotism (Patriotic) in English

Be Patriot in True Sense

Mother’s day, father’s day, valentine’s day or independence day
All the important things are shrinking in particular one day
Writing poems, giving speeches, making posters and banners
Competitions, meetings, having snacks and the day is over.

Watching the patriotic movies and shedding a tear or two
Playing on mobiles patriotic hello tunes
Painting the screen savers with the colors of nation
Hoisting the flag and singing the national anthem
Showering the abuses on china and Pakistan
Filling the whole body with the colors of the flag of Hindustan.
Nowadays
Our patriotism has been concentrated in only few days
To show our patriotism, are these the only ways?

No, this is not the patriotism.

Towards motherland
Patriotism is the consistence sense of loyalty and respect
That is not reflected by just our words or ideas
but by our actions and interests.

Patriotism is not only sacrificing our life for the nation
It’s a broader term which is reflected by each of our action
We can truly be called patriot by building
a healthy, beautiful, rich, educated, crime free and ethical nation.

Whatever profession we are in
We should faithfully discharge our duties
Instead of talking about the love affairs of actors and actresses
We should keep an eye on political and social changes
and should stand against the wrong attitude and policies.

Be patriot in a true sense
Don’t make it mere a bookish word
Don’t do anything against national interest
And spread the glory of our nation in the whole world.

Monika Jain ‘Panchhi’
(11/07/2014)

July 9, 2014

Essay on Sense of Humor in Hindi

सेंस ऑफ़ ह्यूमर

मुझे अक्सर लड़कों या लड़कियों या दोनों के ग्रुप में चल रहे हंसी-मजाक समझ नहीं आते थे। शायद मेरे स्तर से ऊपर होते थे। सब को हंसी आ जाती थी पर मुझे हंसी ही नहीं आती थी। ज्यादातर बहुत छोटी सी या बच्चों वाली बातों पर ही हंसी आती थी और उसी के साथ रहते हुए बिना किसी ख़ास बात के भी बहुत ज्यादा हँसती थी जिसके साथ बिल्कुल सहज रहती थी। एक बार तो इतनी देर तक हंसी आई थी कि दोस्त ने हँसी को रिकॉर्ड कर लिया था। लेकिन ग्रुप वाली बातों में कभी-कभी ऐसा नहीं होता था तो किसी ने एक दिन कहा भी था - मोनिका, तुममें सेंस ऑफ़ ह्यूमर नहीं है। कई बातों के लिए तो आज भी नहीं है। 90% जोक्स या व्यंग्य (जिन्हें जोक्स माना जाता है) पर हंसी नहीं आती। लेकिन आजकल बिना बात के ही इतना हंस लेती हूँ कि कमी पूरी हो जाती है। लेकिन सेंस ऑफ़ ह्यूमर का तमगा लेकर फिरने वालों के सेंसेस कैसे हैं इस पर भी विचार करना बनता है :

07/03/2017 - गर्लफ्रेंड द्वारा फोन रिचार्ज और अपने बॉयफ्रेंड से सारा खर्चा करवाने के कई सारे जोक्स और किस्से यहाँ पढ़ने में आते हैं। कुछ तो बहुत निर्दयी किस्से होते हैं। बचपन से ग्रुप्स में बहुत कम रही हूँ और बोलती भी कम ही हूँ। व्यर्थ चर्चाओं में बहुत ज्यादा इंटरेस्ट भी नहीं आता तो मन कभी इस तरह से संस्कारित हुआ ही नहीं। लड़कियों के जो गुण अक्सर लड़कों द्वारा मजाक-मजाक में बताये जाते हैं उनमें से कई चीजों से खुद को रिलेट भी नहीं कर पाती। इन सब किस्सों के पीछे सच कितना है यह तो नहीं पता और लड़के कोई इतने भोले तो नहीं ही होते। कुछ मामले बेशक ऐसे हो सकते हैं। बाकी मेरे खुद के जीवन का उदाहरण तो हमेशा दोनों ओर से खर्चे वाला रहा है। इसमें हिसाब-किताब रखने की जरुरत नहीं होती। आप बस अपनी ओर से देने का ध्यान रखिये। निकट संबंधों में तो सामने वाला भी रख ही लेता है। और जहाँ शुद्ध प्रेम होता है (लगाव से रहित) वहां तो वैसे भी वापस कुछ पाने की कोई अपेक्षा रहती ही नहीं। बाकी कहीं आपकी बदले में कुछ पाने की अपेक्षा है और नहीं मिल रहा तो वैसे ही आप देना बंद ही कर देंगे।

अपने घर में भी मैं अपनी पीढ़ी में सबसे छोटी सदस्य हूँ। लेकिन छोटा होने या लड़की होने के नाम से यह सोचना कि बड़े भाई-बहनों को आप पर हमेशा खर्च ही करना चाहिए यह गलत है। उम्र या जेंडर कैसे आपको सिर्फ लेनदार बना सकता है? जितना और जिस भी रूप में आप देने में सक्षम हैं आपको देना भी चाहिए। हाँ, जहाँ आप सक्षम नहीं तो परिवार संस्था इसलिए ही होती है ताकि वहां पूरा सहयोग और सुरक्षा प्रदान की जाए।

तो लड़कों! तुम ये घिसे-पिटे जोक्स बनाना बंद करो और ऐसा अगर वाकई में कहीं हो रहा है जहाँ अनावश्यक फायदा उठाया जा रहा है तो सलाह यही है कि फायदा मत उठाने दो। सिंपल!

और लड़कियों! लड़कों को ऐसे जोक्स बनाने का मौका क्यों दिया जाए? या तो अपनी जरूरतों को थोड़ा सीमित करो या फिर अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए खुद सक्षम बनो।

13/08/2016 - कुछ दिनों से यहाँ रक्षाबंधन और गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड को लेकर बहुत जोक्स बन रहे हैं। राखी पर मैं मम्मी-पापा, भाई-भाभी, दीदी, भतीजियों सबको राखी बांध देती हूँ। कुछ सोचकर नहीं, किसी उम्मीद में नहीं...उस दिन का प्रभाव होता है और अच्छा लगता है इसलिए। बॉयफ्रेंड या पति होता तो उसको भी बाँध देती।...और यह सोचते हुए मुझे जरा भी अजीब नहीं लग रहा। आप चाहें तो इस बात के लिए मुझ पर हंस सकते हैं। लेकिन प्रेम तो बस प्रेम ही होता है, उसे बस बहाना चाहिए प्रकट होने का...रिश्ता चाहे कोई भी हो। शेष भावनाएं अपनी-अपनी जगह होती हैं। लेकिन मेरे लिए रक्षा सूत्र बस उस प्रेम को दर्शाने का एक तरीका भर है। कोई इसे सिर्फ भाई-बहन के त्यौहार के रूप में मनाये इस बात से कोई आपत्ति नहीं लेकिन जोक्स तो थोड़े स्टैण्डर्ड के बनाये जाए।

01/04/2015 - एक दो-तीन साल की बच्ची नमकीन के लगभग खाली पाउच से थोड़ी बची हुई नमकीन को हाथों से चाट-चाट कर इस तरह खा रही है जिसे हम तथाकथित सभ्य लोगों की भाषा में गँवारों की तरह खाना कहते हैं। उसके चारों तरफ खड़े उसके कुछ सभ्य रिश्तेदार उसको देख-देखकर हँस रहे हैं। कोई यह सोचकर हँस रहा है कि कितनी गँवार हैं, मम्मी-पापा ने खाने के मैनर्स तक नहीं सिखाये, खाने के लिए मरी जा रही है। कोई फोटो पे फोटो शूट कर रहा है और फनी से फनी फोटो के लिए उसे प्रेरित का रहा है। कोई ठहाकों पे ठहाकें लगाए जा रहा है, और वह इन सबसे बेखबर अपने काम में मस्त है। उसे समझ नहीं आ रहा कि ये लोग मुझपे क्यों हँस रहे हैं।

कई लोगों के लिए यह सामान्य हँसी-मजाक की बात है। यूँ तो मैं भी बहुत हँसती-मुस्कुराती हूँ पर पता नहीं क्यों मुझे दूसरों की ऐसी बातों पर कभी हँसी नहीं आती। इन ठहाकों के बीच उसे देखते हुए मेरे दिमाग में सिर्फ एक बात चल रही थी कि बच्चे कितने मासूम होते हैं। उन्हें नहीं आता किसी की हँसी उड़ाना। उन्हें नहीं पता होता कि कौन उनके लिए कैसे भाव रखता है। उन्हें नहीं आता झूठ बोलना या सभ्य होने का दिखावा मात्र करना। दिखावा इसलिए क्योंकि जो लोग सभ्यता से ऊपर से नीचे तक नहाये हुए हैं, उनके मन में कितनी ज्यादा और किस-किस तरह की भूख होती है, यह मैं बेहतर जानती हूँ, जिसके सामने किसी की यह असभ्य भूख तो कुछ भी नहीं है।

09/07/2014 - ये अधिकांश फेसबुक कविताओं को सस्ती तुकबंदी, घटिया जोड़-तोड़, जबरदस्ती की कविता, सरदर्द और भी बहुत कुछ उल्टा-सीधा कहने वाले विद्वान जन खुद को समझते क्या हैं? ये बेवजह का मजाक उड़ाने वाले लोग मुझे आज तक समझ नहीं आये। कोई कुछ सीख रहा है, लिखने की कोशिश कर रहा है तो पहले ही उसका गला घोंट दो? आप लोग क्या अपनी माँ के गर्भ से महान लेखक/कवि बनकर ही जन्में थे? अगर इतने ही साहित्य के हितैषी हैं तो अच्छा नहीं लिखने वालों को सुधार करने में मदद कीजिये, उन्हें उनकी कमी बताइए और वह नहीं कर सकते तो पढ़िए ही मत, अनफॉलो कर दीजिये। ये बार-बार हंसी उड़ाने का क्या फायदा है? वैसे सच कहूँ तो जिन्हें आप सस्ती कवितायेँ कहते हैं उन्हें पढ़कर इतना सरदर्द नहीं होता जितना आपकी इस तरह की पोस्ट्स से आती अहंकार और जलन की बदबू से होता है। हाँ, मेरे पास भी अनफॉलो का विकल्प है, पर क्या हैं न कि मुझे देखना होता है कि ये महँगी कवितायेँ आखिर होती कैसी हैं?

Monika Jain ‘पंछी’

July 8, 2014

Quotes on India (Indian) in Hindi

India and Indians Quotes 

  • 30/11/2016 - भारत जो इतनी विविधताओं वाला देश है; जहाँ शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत आवश्यकताएं सबको समान रूप से उपलब्ध नहीं वहां कैशलेस इकॉनमी के डंडे से सबको हांका नहीं जा सकता। कैशलेस इकॉनमी कई मायनों में अच्छा ऑप्शन है लेकिन सबसे पहले यूजर्स तो कम्पेटिबल हो। आधार आपने वैसा उपलब्ध करवाया नहीं और अचानक लोगों से टेक्निकली साउंड बनने की अपेक्षा भय पैदा करने के अलावा और क्या करेगी? पापा जो मैथ्स के लेक्चरर हैं, हालाँकि मैं उनसे एक-दो बार से ज्यादा कभी पढ़ी नहीं, क्योंकि उनका सारा समय उनके स्टूडेंट्स में ही चला जाया करता था/है। लेकिन वे हमेशा से अपने स्टूडेंट्स के बीच एक बेहतर शिक्षक के रूप में मान्य रहे हैं। लेकिन अगर बात तकनीक की हो तो आये दिन उनके फ़ोन में कोई ना कोई दिक्कत होती रहती है। बार-बार प्रक्रिया बताने के बाद भी उनके इन्टरनेट सम्बन्धी जितने भी काम है, वो ज्यादातर मैं ही करती हूँ। और यह कोई हंसने वाली बात नहीं है। उम्र के इस पड़ाव में एकाएक किसी से टेक्निकली साउंड बनने की अपेक्षा नहीं की जा सकती है। इसके अलावा पृष्ठभूमि और रूचि भी मायने रखती है। मेरी खुद की भी कोई टेक्निकल एजुकेशन कभी भी नहीं रही। हाँ, सामने फ़ोन, कंप्यूटर हो तो हम कई सारी चीजें खुद सीख जाते हैं लेकिन यह चीज थोड़ा सा समय मांगती है और इसके बाद भी सबके लिए खुद-ब-खुद सीख पाना संभव हो ऐसा जरुरी नहीं। ऐसे में अंतराष्ट्रीय स्तर पर हवा में उड़ने के सपने देखने और दिखाने वाले पहले पाँव के नीचे की जमीं मजबूत करने की कार्यवाही करते तो बेहतर होता। जहाँ शिक्षा के माध्यम, स्तर, सुविधाएँ कुछ भी एक सी नहीं वहां यह तथाकथित तकनीकी क्रांति पता नहीं क्या गुल खिलाएगी? 
  • 07/05/2016 - हम भारतीय बाहरी संस्कृतियों से भी कचरा लेते हैं और अपनी संस्कृति से भी कचरा ही...और उस कचरे को बचाने के लिए जान लेने और देने को उतारू भी रहते हैं।
  • 15/08/2014 - अब तक सब कहते आये हैं 'हमें भारतीय होने पर गर्व है।' मुझे उस दिन का इंतजार है जब भारत हम पर गर्व महसूस करेगा।
  • 08/07/2014 - सामान्यत: जितने भी कदम उठाये जाते हैं वे आर्थिक विषमता को बढ़ावा देने वाले ही होते हैं। आर्थिक समानता का सपना क्या कभी साकार हो पायेगा? आर्थिक विषमता की खाइयों से उपजे विकास का खोखलापन किसी को नज़र आता क्यों नहीं?
  • 16/11/2013 - हमारे देशवासियों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि बिना अपना दिमाग इस्तेमाल किये वे बस भेड़ चाल का हिस्सा बन जाते हैं। प्रकृति ने कान दिए हैं सुनने के लिए, आँखें दी है देखने के लिए और दिमाग दिया है सुने और देखे हुए पर सोचने के लिए...पर सोचने का काम तो हमें करना ही नहीं। कोई बात सुनी नहीं कि बस अंधविश्वासियों की भीड़ उमड़ पड़ी। नमक की कमी की अफ़वाह फैली तो लोग 150 और 300 रुपये किलो पर नमक खरीदने पहुँच गए। सुनी सुनाई बातों पर भरोसा करने का ही दुष्परिणाम है कि हमारे देश में हत्यारे, बलात्कारी, रिश्वतखोर, चोर, भ्रष्टाचारी और मानवता को शर्मशार कर देने वाले लोग भी भगवान की उपाधि पा लेते हैं और भगवान की तरह पूजे भी जाते हैं। किसी देश के नागरिकों के लिए इससे ज्यादा शर्म की बात और क्या हो सकती है? 

Monika Jain ‘पंछी’