September 30, 2014

Poem on Natural Disaster in English

(1)

Think for The Nation

The flood water have throttled so many screams
The temper of this nature swallowed so many dreams.

It's very painful to see this destruction
O nature! Why this exasperation?

Well! It’s not the time to blame or complain
Why this politicization? Don't you feel ashamed?

We must deliver all the possible help to them
Saving their life should be our prime aim.

This is possible only through our mutual cooperation
Forget all the personal differences and think for the nation.

Monika Jain 'Panchhi'
(23/06/2013)

(2)

It Might be Too Late

In this murk night between the whirling blizzards
Every voice is lost somewhere in the desert.

Those who has growled or ever roared
Today they are missing between these windstorms.

I see a light is far away
Perhaps there is a shelter
Preferable to walk in the morning fog
Since this night is hauling the storm.

The cool breezes seem grumbling something
Something is depressing them
and it turned them into deadly weapon.

Storms are like hungry from centuries
and an anger inside the nature
Today it wants to get everything out
Perhaps that's why the ice sheet is laid on all.

The truth is
We do not even learn from our mistakes
Even after of nature's repeatedly warnings
We do not realize our mistakes
until we face our death.

Today I am missing my family
and I'm battling for my life
Maybe this is my last night
But I do not think nature is incorrect in anyway.

Some people will mourn
also ask for forgiveness with folded hands to God
But after a few days, they will be carrying on
Human effigy of mistakes and they will make mistakes again.

Chetan K Dheer
(30/09/2014)

Today climate is changing very fast. Greenhouse gases we are producing having a dangerous impact on environment. Nature is giving all the warning signs in form of frequent flood, windstorm, earthquakes, tsunami, volcanic eruptions, hurricanes, landslides, tornadoes, droughts, famines, cyclones, etc. Mother earth is warning us at an alarming rate. Something needs to be done about it as soon as possible. Otherwise it might be too late leaving us only with regret. Feel free to add your views about these poems on Natural Disaster and Calamities.

September 28, 2014

Essay on Navratri Durga Pooja Festival in Hindi

नवरात्रि के नौ संकल्प

नवरात्रि शुरू हो गयी है। इन नौ दिनों में आप नारी शक्ति और देवी के नौ रूपों की पूजा करेंगे, नौ दिनों तक अखंड ज्योत जलाएंगे...अच्छी बात! माँ दुर्गा के सम्मान में नौ दिनों तक गरबा, आरती, डांडिया करेंगे, अच्छी बात! नौ दिनों तक उपवास, व्रत, फलाहार आदि करेंगे; नंगे पाँव रहेंगे...अच्छी बात! नौ ही दिन माँ को नए-नए प्रसादों का भोग लगायेंगे, ज्वारे उगायेंगे, प्रतिदिन मंदिर जायेंगे, जल चढ़ाएंगे, माँ का विशेष श्रृंगार करेंगे, कन्यायों की पूजा करेंगे, उन्हें भोजन कराएँगे, नए-नए उपहार देंगे...वह भी अच्छी बात! जप, तप, पूजा, पाठ, भक्ति, आराधना जो कुछ भी आप करेंगे...सब कुछ अच्छी बात!

बस मेरे कुछ सवालों का जवाब दीजिये - पूजा हम उन्हीं की करते हैं ना जिनका हम आदर और सम्मान करते हैं! तो फिर अपनी हर समस्या के लिए देवी की उपासना करने वाले इस भारतीय समाज में कन्या के जन्म को अभिशाप क्यों माना जाता है? क्यों शक्ति के उस अंश को कोख में ही मार डाला जाता है? क्यों एक ओर आप शक्ति के जिस स्वरुप की पूजा करते हैं वहीँ दूसरी ओर उसे सम्मान, अधिकार और बराबरी का दर्जा भी नहीं दे पाते? क्यों हर रोज अख़बार हाथ में उठाते ही न जाने कितनी मासूमों की चीखों और चीत्कारों से घर गूंजने लगता है? क्यों नारी को संकीर्ण सोच, कुप्रथाओं, भेदभाव, अपमान, दूसरे दर्जे का मनुष्य समझे जाने; तिरस्कार, तानों, छेड़छाड़, मार-पिटाई जैसे क्रूर व्यवहार से रूबरू होना पड़ता है? दहेज़, शिक्षा और नौकरी पर मनमाने प्रतिबन्ध, बलात्कार, तेजाब डालना, डायन घोषित कर मारना-पीटना, मासिक चक्र के समय अपवित्र समझा जाना, सिर्फ देह समझा जाना, पराया धन मानना, गालियाँ, भद्दे-फुहड़ मजाक...और भी न जाने क्या-क्या...कितना कहूँ, क्या-क्या बताऊँ?

अगर हम सच में नवरात्रि मनाना चाहते हैं तो आज से और अभी से ये नौ संकल्प लें, हमारा नवरात्रि मनाना सार्थक हो जाएगा, और इससे अच्छी बात और कोई होगी नहीं :

पहला संकल्प कन्या भ्रूण हत्या जैसे क्रूर विचार की हत्या का। कोख में बेटी की हत्या जैसे महापाप के प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कभी भी भागीदार नहीं बनने का। अपने बेटे और बेटी में भेदभाव नहीं करने का। समय की मांग भी यही है कि बेटे और बेटी की परवरिश एक जैसे की जाए। समान प्यार, समान अधिकारों के साथ ही घर और बाहर की सभी जिम्मेदारियों में उन्हें समान रूप से भागीदार बनाया जाए।

दूसरा संकल्प दहेज़ ना देने और ना लेने का। बेटियों को अपनी संपत्ति में बराबर का भागीदार बनाने का, और विवाह को व्यापार और सौदे में ना बदलने का।

तीसरा संकल्प अपनी झूठी शान, इज्जत और अहम् के त्याग का, जिसकी वजह से बेटी को प्यार करने की इजाजत नहीं; अपना मनपसंद जीवन साथी चुनने का अधिकार नहीं।

चौथा संकल्प अपनी माँ और पत्नी को सम्मान और बराबरी का दर्जा देने का। स्वार्थ वश, मोह वश या किसी भी कारण से किसी एक की उपेक्षा ना हो इसका खयाल होना चाहिए।

पाँचवा संकल्प हर ऐसे कार्य की तिलांजलि का जिसमें अंधविश्वासों के नाम पर कभी नारी को अपवित्र समझा जाता है तो कभी अकेली, विधवा, परितक्यता को चुड़ैल या डायन बताकर उसका बलात्कार और मारपीट की जाती है।

छठा संकल्प नारी को सिर्फ देह समझकर यौन उत्पीड़न, छेड़छाड़, बलात्कार, फूहड़ टिप्पणियाँ, तंज, अश्लील इशारों, तेजाब डालना जैसी कलुषित मानसिकता और वृतियों के त्याग का। नारी को एक इंसान समझकर उसके साथ इंसानों से व्यवहार का।

सातवाँ संकल्प नारी को आज़ादी देने का। पर्दा प्रथा, बुरका, सिन्दूर, बिछिया, मंगल सूत्र जैसे प्रतिबन्ध और विवाह के प्रतीक सिर्फ नारी के लिए ही क्यों?

आठवाँ संकल्प नारी को वह सहजता भरा वातावरण उपलब्ध करवाने का जिसमें वह दिन हो या रात, किसी के साथ हो या अकेले, बेफिक्र होकर कहीं भी आ जा सकें। अपने कार्य स्थल पर बिना किसी भय के काम कर सके।

नौवां संकल्प नारी के प्रति प्यार और सम्मान का। उसके त्याग, समर्पण, सहनशीलता का मूल्य समझने का। उसके प्रति किसी भी तरह के अत्याचार और हिंसा के परित्याग का, और इन सभी संकल्पों को याद रखने का।

नवरात्रि के इन दिनों में माँ दुर्गा के प्रति श्रद्धा और सम्मान का इससे अच्छा और क्या तरीका हो सकता है? हमें देवी नहीं बनना है, हमें बस एक इंसान समझकर इंसानों की तरह बराबरी और न्यायोचित व्यवहार चाहिए। क्या ले सकते हैं आप ये संकल्प? क्या दे सकते हैं हमें अपनी पहचान, आज़ादी और अस्तित्व?

Monika Jain ‘पंछी’
(28/09/2014)

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