November 30, 2014

Poem on Wait (Waiting for Love) in Hindi

(1)

किसी के इंतजार में दो आँखें 

अँधेरे में वो दो आँखें 
कुछ हैरान, कुछ परेशान 
सहमी हुई और दबी हुई उसकी आवाज़
कुछ कहने को थी। 

जैसे एक सदी बीत गयी हो और 
पलकों पर कोई सपना सजा रखा हो 
किसी के इंतजार में 
जिंदगी जैसे थम सी गयी हो। 

इन टूटे हुए शीशों के टुकड़ों ने 
ना जाने कितने राज़ दबा रखे हो 
होंठ है कि हँसना भूल चुके हो 
आंसू लगता है जैसे सूख चुके हो। 

पास ना होकर भी क्यों वो पास लगते हैं 
कानों में उनकी आवाज़ क्यों गूंजती है 
बीत गए वो दिन जब हम थे यहाँ 
अब तो बस ये जिंदगी वीरानी सी लगती है। 

थक गए यूँ चलते चलते 
भटक से गए अपनी मंजिलों से 
वो हवाएं भी अब रोती है 
जो कभी ख़ुशी-ख़ुशी गुनगुनाती हुई मिलती थी हमसे। 

राख हो गए सपने जो सजाये थे कभी 
दिल है कि अब भी अंधेरो में रोशनी ढूंढता है 
दबी हुई यादों में अब भी जिंदा हो तुम कहीं
धुल गए आंसूओ में सब रंग 
पर उमंगें है कि बुझती ही नहीं। 

ऐसा लगता है वो खफ़ा पहले से था 
दर्द सुनने से पहले उन्होंने अपने शिकवे सुना दिए 
खुशियाँ कभी हमारी किसी को रास ना आई 
ज़माने के सामने हम हँसे और घर आकर हम रो दिए। 

हारकर भी उम्मीद अभी जिंदा है 
इसको जिद कहूँ या फिर नज़ाकत दिल की 
मालूम है जबकि वो मेरी तकदीर में नहीं 
फिर भी उनका इंतजार क्यों है। 

शायद ऐसा पहले भी कहीं सुना हो 
एक टूटे दिल की कविता किसी ने लिखी हो 
पर दर्द सबका एक सा नहीं होता 
सब का प्यार सच्चा होता नहीं। 

माना कि आरज़ू मेरी दिल में रह गयी 
ज़िन्दगी तन्हा और वीरानी सी बन गयी 
बरसों से कोशिश में हैं कि उनको भूल जाएँ 
चलो इसी कोशिश में एक और रात कट गयी। 

Chetan Dheer 

(2)

तू आएगा एक दिन पक्का 

धरती की प्यास बुझाने को
रिमझिम बादल तो बरसे हैं 
मेरे दिल की बंझर जमीन पर 
जाने कबसे तरसे है
तू आएगा एक दिन पक्का
इस दिल की प्यास बुझाने को 
बस जीती हूँ एक दिन तेरी ही 
बाहों में मर जाने को। 

ये सर्दी की जो रातें हैं 
होठों पे जमी कुछ बातें हैं
कितना कुछ कहने को है पर 
बन धुआँ शब्द खो जाते हैं 
तू आएगा एक दिन पक्का 
इन लफ्ज़ों को पिघलाने को 
बस जीती हूँ एक दिन तेरी ही 
बाहों में मर जाने को। 

ये गर्म हवा जब बहती है 
मेरी आहें भी संग रहती है 
आँखों से टपकती बूँदें भी 
बस नाम तेरा ही लेती है
तू आएगा एक दिन पक्का 
इन बूंदों को पी जाने को 
बस जीती हूँ एक दिन तेरी ही 
बाहों में मर जाने को। 

तेरी ख़ामोशी खलती है 
पर आग अभी भी जलती है 
मेरे ख़्वाबों की दुनिया में 
उम्मीद अभी भी पलती है 
तू आएगा एक दिन पक्का 
सब सपने सच कर जाने को 
बस जीती हूँ एक दिन तेरी ही 
बाहों में मर जाने को। 

Monika Jain ‘पंछी’
(30/11/2014)

22/10/2017 : Note : Leading to spirituality, today I am not much concerned with such writings. As spirituality is a journey from dependence to independence.

November 29, 2014

Makar Sankranti Story on Child Labour in Hindi

Makar Sankranti Story on Child Labour in Hindi
 हरी पतंग और लाल दुपट्टा
(राजस्थान पत्रिका, हेल्थ परिशिष्ट में प्रकाशित)

पतंगों का मौसम आ चुका था। आकाश में लाल, नीली, पीली, हरी, नारंगी ढेर सारे रंगों की पतंगें उड़ते हुए ऐसी लग रही थी, मानो इन्द्रधनुष के सारे रंग आकर आकाश में बिखर गए हों। इन रंगों की सोहबत में सारा आकाश खिलखिलाता सा नज़र आ रहा था। रेवड़ी, तिलपट्टी, मूंगफली, तिल के लड्डू सब थाली में लिए मैं भी छत पर पड़ौस के बच्चों के साथ पतंग उड़ाने पहुँच गयी। तभी छत से नीचे सड़क पर कई दिनों बाद एक चबूतरे पर बैठी रेवती नज़र आई। बड़ी उम्मीद भरी नज़रों से कभी वो आकाश में उड़ती पतंगों को देखती तो कभी मायूस होकर शून्य में ताकने लगती।

रेवती घर से थोड़ी दूर बने आधे कच्चे आधे पक्के घर में रहती थी। कुछ महीनों पहले तक तो जब उसकी माँ झाड़ू-बर्तन करने आती थी, अक्सर उसका घर में आना-जाना होता था। पर पिछले ही महीने उसकी माँ चल बसी। आसपास के लोग बताते हैं कि उसके शराबी पति ने एक रात उसे इतनी बेरहमी से पीटा कि अगली सुबह उसकी आँखें ही ना खुली और वह उस 12-13 साल की बच्ची को अकेला छोड़कर सदा के लिए चली गयी।

रेवती की माँ रेवती से बहुत प्यार करती थी। अक्सर उसकी ही बातें करती रहती थी। रेवती उसकी इकलौती संतान थी। मैं जब भी रेवती की पढ़ाई के बारे में पूछती तो वह बड़े उत्साह से कहती, ‘दीदीजी, रेवती को तो खूब पढ़ा लिखाकर बड़ी अफसरानी बनाना है। उसे ना मांजने पड़ेंगे यूँ घर-घर जाकर बर्तन। समझदार बड़े अफसर से ही उसका ब्याह भी रचाऊँगी। बेटी के जीवन में किसी बात की कमी ना होने दूँगी। चाहे उसके लिए दस घर और क्यों ना पकड़ने पड़े।’

रेवती की माँ का उत्साह देखकर बड़ा अच्छा लगता था। एक अनपढ़ गरीब औरत के दिल में अपनी बच्ची के लिए ऐसे सपने पलते देखकर दिल ख़ुशी से भर जाता। साथ ही ऊंची-ऊंची इमारतों में रहने वाले उन तथाकथित पढ़े-लिखे लोगों पर गुस्सा भी आता जो आज भी लड़की के जन्म पर उदास हो जाते हैं और कुछ तो जन्म से पहले ही उसे मृत्यु की गोद में सुला आते हैं।

रेवती पढ़ने में बहुत होशियार थी। मैं भी अक्सर रेवती को गणित और अन्य विषयों के प्रश्न हल करने में मदद करने लगी। दिल से यही चाहती थी कि रेवती की माँ की आँखों की जो चमक है, वह कभी फीकी ना पड़े। उसके सारे सपने सच हों। पर नियति को जाने क्या मंजूर था जो वो चमक भरी आँखें ही सदा के लिए मूँद गयी और उसके साथ ही रेवती को लेकर देखे सारे सपने भी सो गए।

रेवती की माँ के गुजरने के बाद उसके शराबी पिता ने उसकी स्कूल छुड़वा दी और उसे भी घर-घर जाकर बर्तन मांजने के काम में लगा दिया ताकि उसकी शराब के पैसे जुटाए जा सके। यह सब जानकर मुझे बड़ा दुःख हुआ। एक दिन मैंने रेवती से उसकी सभी कॉपी-किताबें घर मंगवा ली और उसे कहा कि काम के बीच में वह 1 घंटा यहाँ पढ़ने आ जाया करे और किसी को यह बात ना बताये। इससे पिता को शक नहीं होगा, वह यही समझेगा कि यहाँ भी काम करने ही आती है। कुछ दिन तो यह चलता रहा पर एक दिन अचानक उसके पिता को जाने कैसे ख़बर लग गयी और वह जब रेवती पढ़ रही थी तब आया और उसका हाथ पकड़कर पीटते हुए ले जाने लगा। मैंने रोकने की कोशिश की तो उसने रेवती की सारी कॉपी किताबें मुझे घूरते हुए मेरी आँखों के सामने ही माचिस की एक तीली लगाकर जला दी। मानो मुझे कह रहा हो, अब ना करना ऐसी जुर्रत!

उस घटना के कई दिन बाद तक रेवती नज़र नहीं आई। आज अचानक जब रेवती को चबूतरे पर अकेले बैठे देखा तो मन किया उससे बात करने का, उसका हाल पूछने का। यह सोचते हुए मैं कुछ तिल के लड्डू और रेवड़ियाँ एक अख़बार में लपेटकर नीचे आई और रेवती को अपने पास बुलाया। रेवती ने पहले डरते-डरते चारों ओर देखा और फिर दौड़कर मेरे पास आ गयी। मैंने उससे पूछा, ‘कैसी है रेवती? सुबह से कुछ खाया या नहीं?’ रेवती कुछ नहीं बोली। वह तो बार-बार बस आसमान में उड़ती पतंगों को देखे जा रही थी। मैंने उससे पूछा, ‘तुझे पतंग चाहिए?’ उसने बस सहमति में सर हिला दिया। मैंने उसे अख़बार में बंधे लड्डू और रेवड़ियाँ पकड़ाई और कहा, ‘तू पहले इसे खा ले, तब तक मैं लेकर आती हूँ पतंग!’ यह सुनकर रेवती लड्डू-रेवड़ियाँ लेकर तुरंत वापस उसी चबूतरे पर चली गयी और वहां बैठकर मेरे वापस आने का इंतजार करने लगी। मैं छत पर रखी पतंगों में से एक हरी रंग की पतंग और मांझा ले आई और रेवती को दे दिया। मैंने देखा रेवती ने तो अख़बार खोला तक नहीं था। वह तो बस पतंग के ही इंतजार में बैठी थी। मुझे लगा कुछ देर बाद खा लेगी और यह सोचकर मैं भीतर आ गयी।

करीब 1-2 घंटे बाद दरवाजे पर दस्तक हुई। मैंने देखा रेवती खड़ी थी। हाथ में वही पतंग और मांझा लिए हुए। मैंने कहा ये तेरे लिए ही है, तू इसे वापस क्यों लेकर आई है? तब रेवती बोली, ‘दीदीजी, मुझे पतंग उड़ाना नहीं आता। आप प्लीज इसे उड़ा देना और मेरी माँ तक पहुँचा देना। सब कहते हैं कि मरने के बाद लोग ऊपर आसमान में चले जाते हैं। माँ भी तो वहीँ होंगी न! आप बस उन तक ये पतंग पहुँचा दो।’ और यह कहकर वह पतंग मेरे हाथ में थमाकर दौड़ी-दौड़ी चली गयी। मैं हैरत से कुछ देर उसे देखती रही, फिर अचानक पतंग पर मेरी नज़र पड़ी, जिस पर बहुत कुछ लिखा था।

अरे! यह तो रेवती की लिखावट है। यह देखकर मैं उन शब्दों को पढ़ने लगी। ‘माँ! तू मुझे छोड़कर क्यों चली गयी? माँ तेरी बहुत याद आती है। सुबह जब बापू मार-मार कर उठाता है चाय बनाने के लिए तब चाय के हर एक उबाल के नीचे बैठने के साथ तू बहुत याद आती है। जब सुबह-सुबह आसपास के बच्चे स्कूल ड्रेस पहनकर बैग लेकर पढ़ने जाते हैं तो उनके हर एक बढ़ते कदम के साथ तू बहुत याद आती है। माँ, बापू जो भी मैं बनाती हूँ सब खा जाता है। मुझे हमेशा सूखी-ठंडी रोटियाँ खानी पड़ती है। तब हर एक कौर के गले में चुभने के साथ तू बहुत याद आती है। रात को बापू जब शराब पीकर लौटता है तब डर के मारे मैं गुसलखाने में छिप जाती हूँ, तब भी नल से टपकती हर बूँद के साथ तू बहुत याद आती है। माँ तेरे बिना नींद नहीं आती, हर बदलती करवट के साथ तू बहुत याद आती है। माँ, तू वापस आ जा न! या फिर मुझे ही अपने पास बुला ले। तेरे बिना एक दिन भी काटना बहुत मुश्किल है। तू बस वापस आ जा माँ!’

और यह सब पढ़ते-पढ़ते मेरी आँखों से आंसू बहने लगे। विश्वास नहीं हो रहा था यह 12-13 साल की उस मासूम बच्ची के शब्द थे, जो थोड़ी देर पहले मेरे सामने खड़ी थी। मैं दौड़कर बाहर गयी कि शायद रेवती बाहर ही हो, पर वह नज़र नहीं आई। तब मैं पतंग को लेकर छत पर गयी और जाने किस विश्वास में उसे उड़ाने लगी। देखते ही देखते पतंग दूर आसमान में पहुँच कर एक बिंदु की तरह चमकने लगी। डोर का आखिरी सिरा जो हाथ में था वह मैंने छोड़ दिया। कुछ देर पतंग को देखती रही और फिर बुझे मन के साथ नीचे आ गयी।

सुबह अचानक रेवती के घर के पास भीड़ देखी। पता चला रेवती का शराबी पिता बाहर मरा पड़ा था। एक के बाद एक यह सब घटनाएँ मुझे बहुत बैचेन कर रही थी। थोड़ी देर बाद छत पर कपड़े लेने गयी तो देखा शाम को जो पतंग उड़ाई थी उसकी डोर पास ही सूख रहे मेरे लाल दुपट्टे में अटकी हुई थी और पतंग अभी भी वैसे ही उड़ रही थी। शायद यह रेवती की माँ या ईश्वर का संकेत था कि मुझे अब रेवती के लिए बहुत कुछ करना था और यही सोचकर वह लाल दुपट्टा मैंने गले में डाला और रेवती के घर की ओर चल पड़ी।

Monika Jain ‘पंछी’
(29/11/2014)

November 23, 2014

Broken Promises (Promise Day) Poem in Hindi

People eager to make promises are often irresponsible. They are careless to think that a broken promise can break a person too. Dreams and expectations attached with a promise are fully shattered when a promise turns into a fake bubble. One should not make any empty promise that he/she is not going to keep. One should also expect less from others and trust more in himself/herself. And the most important thing, promises should not be made, they should only be fulfilled. 

(1)

क्यों कुछ लोग?

कइयों के हिस्से आयी 
टूटे वादों की किरचों को देख
सोचती हूँ -

क्यों कुछ लोग बिन सोचे समझे 
अक्सर वादों पर वादे कर जाते हैं 
कैसे किसी के जीवन और सपनों को 
इतना हलके से ले पाते हैं?

वे क्यों नहीं समझ पाते -
हर एक वादे से जुड़ती है 
कुछ मासूम उम्मीदें 
न जाने कितने ख़्वाब सजाती हैं 
हर रात ये मीठी नींदें। 

पर इन नींदों को क्या पता 
एक दिन ये कुछ ऐसे उड़ जानी हैं 
इनकी बनायी ख़्वाबों की दुनिया 
मिट्टी के घरोंदों सी 
बस मिट्टी में मिल जानी है। 

तो क्यों कुछ लोग बिन सोचे समझे 
अक्सर वादों पर वादे कर जाते हैं 
कैसे किसी की सारी दुनिया 
फ़क़त उदासी से भर जाते हैं?

वे क्यों नहीं समझ पाते -
टूटे वादों की किरचों से 
आती है विश्वास के दर्पण पर
ना जाने कितनी खरोंचें 
जिसका टूटा हो दिल 
वो फिर से प्यार करने की 
भला कैसे सोचे? 

Monika Jain ‘पंछी’ 
(23/11/2014)

(2)

प्यार मेरे लिए बस प्यार ही है

मैंने कहा था न -
न करना ऐसे वादे
जो निभा न सको
न कहना ऐसी बातें
जो सिर्फ बातें बनकर रह जाये
न करना ऐसा प्यार
जो प्यार न रह सके।

हर रोज़ तो कहती थी तुम्हें
क्योंकि डरती हूँ मैं खुद से
नहीं समझा पाती खुद को
जब मेरा भरोसा टूटता है
नहीं बहला पाती खुद को
जब कुछ अपना छूटता है।

मेरे इनकार को बदल ही दिया
तुमने इकरार में
और अपनी प्यार भरी बातों से
कैद कर लिया मुझे अपने प्यार में।

पर अब तुम्हारी बदलती फीलिंग्स
कैसे मैं भी अपना लूँ?
नहीं तुम्हे अब प्यार
ये कैसे खुद को समझा लूँ?

तुम कहते हो - प्रैक्टिकल बनो!
पर तुम्हारे हाथों की मैं कोई गुड़िया तो नहीं?
जब चाहो बदल जाऊं वो जादू की पुड़िया तो नहीं?

मेरी आज़ाद सोच से प्यार था न तुम्हें?
अब तुम्हारी सोच में कैद हो जाऊं
मैं वो चिड़िया तो नहीं?

मैंने कहा था न कई बार
प्यार मेरे लिए कोई मज़ाक नहीं है
प्यार मेरे लिए बस प्यार ही है।

Monika Jain ‘पंछी’
(30/12/2012)

(3)

झूठा तेरा प्यार था

जानती हूँ तुमने मुझसे कभी 
प्यार किया ही नहीं 
किया था तुमने जो इज़हार 
वैसा कुछ कभी था ही नहीं।

जानती हूँ 
झूठी थी तुम्हारी सारी बातें 
और खोखले थे 
तुम्हारे सारे वादे।

जानती हूँ तुम्हारा मेरी परवाह करना 
बस एक दिखावा था 
हाँ, जानती हूँ मैं तुम्हारा प्यार 
बस कोरा छलावा था।

लिखी थी तुमने जो प्रेम कवितायेँ
आज मुझ पर अट्टाहस कर रही हैं 
मेरी मासूमियत और पागलपन पर 
देखो, आज वो भी हँस रही हैं। 

हर हाल में मुझको चाहने के 
जीवन भर साथ निभाने के 
वादे तेरे बड़े-बड़े 
थे बस मुझको बहलाने के।

मेरी ना को हाँ में बदलना 
बस यही जुनून तुझ पर सवार था 
जानती हूँ इश्क़ तेरा एक धोखा 
और झूठा तेरा प्यार था।

सब जानते हुए भी ये पागल दिल 
क्यों अनजान बनना चाहता है 
झूठा ही सही लेकिन तेरा 
क्यों प्यार पाना चाहता है?

Monika Jain ‘पंछी’
(25/08/2013)

09/12/2017 - Note : These are my old writings and leading to spirituality, today I am not concerned with such writings. As spiritualism is a journey from expectations to acceptance, from complaints to responsibility, from dependence to independence, from innocence to flawlessness and from ignorance to awakening. No matter, who the person is in front of us, what wrong he did, how difficult our situations are, in spiritualism there is no other. 

November 18, 2014

Essay on Women's Rights in Hindi

Essay on Women's Rights in Hindi
मुझे पंख दे दो
(आधी आबादी में प्रकाशित)

पाना चाहती हूँ अपने हिस्से की धूप, छूना है मुझे भी आकाश, सजाने हैं इन्द्रधनुष के रंगों से ख़्वाब, बीनने हैं मुझे सागर की गहराई से मोती, करने हैं अनन्त आकाश पर अपने छोटे से हस्ताक्षर, बिखेरनी है चाँद की चांदनी चहुँ ओर, करना है ब्रह्माण्ड के रहस्यों का उद्गाटन, भरना है कई मुस्कुराहटों में जीवन, अपने उत्साह की किरणों से बनाना है मुझे सम्पूर्ण वातावरण को सजीव और मुखरित, लिखनी है मुझे अपने हाथों से अपनी तकदीर...बस मुझे मेरे पंख दे दो।

मेरी शक्ति, प्रखरता, बुद्धि, कौशल, सुघड़ता और सपने; मेरा स्वाभिमान और आत्मविश्वास...साँस लेने के लिए किसी और की अनुमति का मोहताज क्यों हों? क्यों बनाकर रखना चाहते हो सदा मुझे अपनी अनुगामिनी? क्यों रसोई और बिस्तर के गणित से परे तुम नहीं सोच पाते एक स्त्री के बारे में? मुझे नहीं चाहिए वह प्रेम जो सिर्फ वासना, शोषण, हिंसा, ईर्ष्या और आधिपत्य के इरादों से उपजा हो। मुझे नहीं चाहिए वह वहशी प्रेम जो एसिड फेंकने, बलात्कार, हत्या या अपहरण जैसे दुष्कर्मों से भी नहीं हिचकता। नफ़रत और दर्द देने वाला प्रेम मुझे नहीं चाहिए। मुझे चाहिए ऐसा प्रेम जो मुक्ति के आकाश में जन्मा हो, जिसमें स्वतंत्रता की सांस हो, विश्वास का प्रकाश हो, करुणा की धार हो; जो मेरी बातों, मेरे ख़्वाबों और मेरी मुस्कुराहटों में जीवन भर सके। मुझे प्रेम से भरा प्रेम चाहिए।

हमेशा से उस सहजता की तलाश में हूँ, जहाँ मुझे ये ना सुनना पड़े कि लडकियाँ ये नहीं करती, लडकियाँ वो नहीं करती। मुझे सिर्फ सकुचाती, सबसे नज़र चुराती, सदा अपना दुपट्टा संभालती युवती बनकर नहीं रहना है। क्यों मैं अकेली बेफिक्र होकर सड़क पर नहीं चल सकती? घर से लेकर कार्यस्थल तक कहीं भी तो मैं सुरक्षित नहीं। खाकी वर्दी हो चाहे संसद और न्यायपालिका में बैठे देश के कानून के निर्माता, किसी पर भी तो भरोसा नहीं कर सकती। क्या कभी मुक्त हो पाऊँगी मैं इस आंतक से...जो हर क्षण मेरे जीवन में पसरा हुआ है। कब बदलेगा मेरे प्रति समाज का नज़रिया? कब मिलेगा मुझे सुरक्षित माहौल?

मुझे मुक्ति चाहिए उस असहजता से, उस डर से जो मुझे अपने रिश्तेदारों, दोस्तों और पड़ोसियों पर भी विश्वास करने की इजाजत नहीं देता। मुझे मुक्ति चाहिए उस संकीर्ण सोच और कुप्रथाओं से जो मुझे हमेशा द्वितीय श्रेणी का नागरिक होने का आभास कराती है। मेरे साथ हर स्तर पर भेदभाव करती है। मेरा तिरस्कार करती है। मुझे अवसरों और उपलब्धियों से वंचित रखती है। मुझे पुरुषों की आश्रित और संपत्ति बनाकर रखना चाहती है। मत करो कन्याओं की पूजा, मत चढ़ाओं माँ को नित नया भोग!...बस ये सहजता ला दो, जहाँ खुद को एक इंसान समझकर हम भी खुलकर सांस ले सकें। हमें हमेशा ये याद न रखना पड़े कि हम लड़कियाँ हैं। मुझे माँ और बहन की तरह मत देखो। बस मुझे इंसान समझकर इंसानों सा व्यवहार करो। क्या ला सकते हो ऐसी सहजता? क्या दे सकते हो ऐसा आज़ाद जीवन?

कब मुक्ति मिलेगी मुझे इस बीमार समाज से जो सम्मान के नाम पर घिनौने मानक बनाकर जी रहा है। मुझे आज़ाद कर दो उन तालिबानी फरमानों से जो कभी मेरे कपड़ों को लेकर सुनाये जाते हैं, कभी मुझे मोबाइल रखने को प्रतिबंधित करते हैं तो कभी पुस्तकालय तक में मेरा प्रवेश निषेध करते हैं। धरती से अम्बर तक अपनी ख़ुशबू बिखेरने की ख्वाहिश रखते मेरे प्रेम को कब तुम कौम की कैंची से कुतरना बंद करोगे? कब बंद होगी जाति, धर्म, गौत्र और अपने झूठे सम्मान के अंधे नशे में मेरी और मेरे प्रेम की हत्या? कब?

मुझे मुक्ति चाहिए उस दकियानूसी सोच से जो मेरे शरीर की एक स्वाभाविक प्राकृतिक क्रिया को शुद्धता और अशुद्धता से जोड़कर मुझे अपवित्र करार देती है। क्यों मेरे शरीर के साथ मेरे दिल को छलनी कोई और करता है और इज्जत मेरी चली जाती है? और इतना होने के बाद भी क्यों मैं समाज के ऊटपटांग सवालों का सामना करूँ? क्यों? पहले मेरा बलात्कार, फिर उसके खिलाफ़ आवाज़ उठाने पर अपराधी जैसा व्यवहार! इतनी मानसिक प्रताड़ना और न्याय जीते जी मिल जाएगा इसका भी भरोसा नहीं। बदल डालो ये महज़ डिग्रीयां देने वाली पढ़ाई, जो इंसान को इंसान तक ना बना पायी।

कभी संस्कृति के नाम पर, कभी परम्पराओं के नाम पर, क्यों हमेशा मुझे ही अपनी इच्छाओं और सपनों को त्यागना होता है? जब-जब मैंने वर्जनाओं को तोड़ने की कोशिश की, पितृ सत्ता की बेड़ियों को काटना चाहा, रूढ़ियों और कुत्सित विचारों को मोड़ना चाहा, तब-तब तुम्हारी संस्कृति को ख़तरा महसूस हुआ। जरा से मेरे विद्रोह के स्वर उठे और तुमने मुझे कुल्टा, कलंकिनी, कुलनाशिनी के थप्पड़ जड़ दिए। मेरी जुबान पर जलते अंगारे रख दिए। तुम्हारी संस्कृति को ख़तरा तब क्यों महसूस नहीं होता, जब धर्म की आड़ में मेरी देह का व्यापार किया जाता है, जब दहेज़ की आग में मुझे झुलसा दिया जाता है, जब अंधविश्वासों से गिरा समाज एक विधवा, परित्यक्ता या अकेली औरत को चुड़ैल ठहराकर, उसकी पिटाई कर, उसका बलात्कार कर उसे मौत की सजा देने से भी नहीं हिचकिचाता।...तब तुम्हारी संस्कृति को ख़तरा क्यों नहीं महसूस होता? मुझे मुक्ति दे दो उन धर्म शास्त्रों से जो भरे पड़े हैं मात्र नारी की निंदा से। क्योंकि नहीं लिखा उन्हें किसी भी स्त्री ने।

तुमने मुझे शिक्षित और शक्ति संपन्न बनाने के कानून बनाये। कई सरकारी और गैर सरकारी संगठनों को जागरूकता लाने के लिए खड़ा किया। मेरी रक्षा के लिए कानून के नए समीकरण गढ़े। पर अभी तो मुझे जीवन पाने और जीने का अधिकार भी पूरी तरह से कहाँ मिल पाया है? मेरे लिए तो जन्म से पहले सुरक्षित रह पाना भी चुनौती बन गया है। क्यों मार देना चाहते हो मुझे जन्म से पहले ही कोख में? क्यों फेंक आते हो मुझे कचरे के ढेर में? क्यों कर देते हो कच्ची उम्र में मेरा ब्याह। एक ओर कन्या की पूजा करते हो और दूसरी ओर कन्या के जन्म को ही अभिशाप मानते हो। पैदा होते ही इस तरह मेरी अस्वीकृति और अपमान क्यों?

मुझे नहीं चाहिए वह स्त्री विमर्श जो साहित्य के नाम पर देह व्यापार कर रहा है, जहाँ मुझे बस माँस का टुकड़ा भर बनाकर रख दिया गया है। मुझे ‘मेड टु आर्डर’ व्यंजन बनाकर परोसा जा रहा है। जहाँ रेशमी जुल्फों, नशीली आँखों, छरहरी काया, दहकते होंठ और मादक उभारों से ज्यादा मेरा कोई अस्तित्व नहीं। मुझे नहीं चाहिए ऐसा स्त्री विमर्श!

मेरे सपनों को न जलाओ। चहारदीवारी की अकुलाहट, घुटन और छटपटाहट से मुझे आज़ाद कर दो। चुल्हा, चोका, बर्तन बस यही तो मेरा कर्म नहीं है न? मेरे चेहरे को ढ़ककर मेरी अस्मिता न नापो। मेरे अस्तित्व को छोटे-बड़े कपड़ों में न उलझाओ। मेरी इज्जत को किसी दुष्कर्मी के दुष्कर्मों से परिभाषित न करो। मेरा कार्य सिर्फ पुरुष को संतुष्ट करना और संतानोत्पत्ति कर संतानों का पालन पोषण करना नहीं है। तुम्हारे वंश को बढ़ाने वाले लड़के की चाह में मुझे बच्चों पर बच्चे पैदा करने वाली मशीन मत बनाओ। मैं कोई भिक्षा नहीं मांग रही। सिर्फ अपना हक़ मांग रही हूँ।

मेरे अहसास और जज़्बात भी स्वर पाना चाहते हैं। मेरी रचनात्मकता भी सृजित होना चाहती है। मेरे भी सपने आकार ग्रहण करना चाहते हैं। मेरी खिलखिलाहट भी हर ओर बिखरना चाहती है। देश के सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक विकास में मैं भी योगदान देना चाहती हूँ। सृजनात्मकता की रूपरेखा बनाने में भागीदारी चाहती हूँ। दुनिया के किसी भी हिस्से में बिना किसी खौफ और रोक-टोक के भ्रमण की स्वतंत्रता चाहती हूँ। अपने बारे में, अपने कार्यक्षेत्र के बारे में, अपने धर्म के बारे में, शादी के बारे में, बच्चों के जन्म के बारे में, पहनावे के बारे में और परम्पराओं के अनुसरण के बारे में निर्णय लेने की स्वतंत्रता चाहती हूँ। मैं आर्थिक, मानसिक और भावनात्मक स्वतंत्रता चाहती हूँ।

करोगे अपनी संकीर्ण मानसिकता का बहिष्कार?...जहाँ देह से परे बुद्धि और मन के आधार पर मुझे मेरी निजता और सम्मान का हक़ मिलेगा। दोगे मुझे समानता का अधिकार? बंद करोगे मेरे साथ सौतेला व्यवहार?...जहाँ भाई की इच्छाओं के सामने मुझे किसी अभाव में जीना नहीं पड़ेगा। दोगे मुझे मानवीय दृष्टिकोण की वह जमीन, जहाँ रात के अँधेरे में भी मैं बेख़ौफ़ सड़क पर चल सकूंगी? जहाँ पर मुझे देवी, माँ, बेटी, बहन, पत्नी, प्रेयसी से इतर एक इंसान के रूप में भी देखा और समझा जाएगा। जहाँ मेरे अहसास छल-कपट का शिकार नहीं होंगे। दोगे मुझे मेरे पंख जो एक उन्मुक्त गरिमामय उड़ान के लिए मुझे स्वतंत्रता का आकाश प्रदान करेंगे, जहाँ मैं अपने ख़्वाबों के रंग हकीकत के कैनवास पर उकेर सकूँगी? क्या, दोगे मुझे मेरे पंख?

Monika Jain ‘पंछी’
(18/11/2014)

November 4, 2014

Essay on Life is a Struggle in Hindi

जीवन एक संघर्ष : हारना भी तो नहीं है न!

हर दिन मुश्किलें परवान चढ़ती हैं, और किसी दिन हौसला टूट जाता है। फिर से सब कुछ जोड़ती हूँ, फिर किसी दिन सब कुछ बिखर जाता है। बहुत मुश्किल है ऐसे जीना...तब, जब दर्द का कोई अंत न हो, कोई सीमा नहीं, खत्म होने की कोई तारीख़ भी नहीं! तब, जब उसे सिर्फ बढ़ना ही है, तो जीतना कैसे हो पायेगा? जानती हूँ नहीं हो पायेगा। हाँ, पर हारना भी तो नहीं है न! बिल्कुल नहीं! किसी कीमत पर नहीं!

चाहे कोई कितना भी निडर और हिम्मती कहे...चाहे मैं खुद कितना भी बे ख़ौफ़ रहना चाहूँ...पर ये जो रात के सन्नाटे होते हैं न, कभी-कभी बड़े जालिम होते हैं। न चाहते हुए भी न जाने कितने ख़ौफ़ एक-एक करके सामने ला खड़े करते हैं।

काश! ये ख़ौफ़ निरे ख़ौफ़ होते। पर ये डर ऐसे वैसे भी तो कहाँ हैं? दिल को चीरकर रूह को भी कंपा देने वाले ये डर एक दिन मेरी नियति है। एक कठोर सच! नहीं जानती कैसे कर पाऊँगी इन सच्चाइयों का सामना? नहीं जानती कैसे जी पाऊँगी इन सच्चाइयों के साथ? सच! नहीं जानती।

कभी-कभी समझ नहीं आता क्यों कुछ जीवन सिर्फ संघर्षों से भरे होते हैं? क्यों किसी के हिस्से सिर्फ दर्द ही आता है? क्यों आंसूओं से भीगी कलम से ही किसी की किस्मत लिखी जाती है? क्यों किसी का जीवन सिर्फ परीक्षा बनकर रह जाता है? क्यों?

हिम्मत, साहस, विश्वास सबको मैंने बहुत लिखा, बहुत जीया, बहुत दिया, पर कब तक? कोई तो सीमा हो? कभी तो दिल करेगा न टूट कर बिखर जाने को। पर नहीं! शायद कुछ लोगों को टूटने और बिखरने का अधिकार भी नहीं होता। मैं जानती हूँ, मुझे भी यह अधिकार नहीं। मुझे भी तो सिर्फ डंटे रहना है, अपनी आखिरी सांस तक...इस विश्वास के साथ कि जीतना या हारना मायने नहीं रखता, मायने रखता है सिर्फ चुनौतियों को स्वीकार करना और उनका सामना करना। ज़िन्दगी का सफ़र कितना लम्बा हो, ये मायने नहीं रखता, मायने रखता है हर पल में जीया गया जीवन। 

Monika Jain ‘पंछी’
(04/11/2014)

27/02/2018 - नोट : अध्यात्म से जुड़कर मैंने जाना कि अध्यात्म वाकई असहनीय से असहनीय दर्द को भी मुस्कुराते हुए स्वीकार कर लेने की क्षमता और शक्ति देता है। वह आध्यात्मिक प्रेरणा ही है जो इतने वर्षों के कठिनतम जीवन में भी अक्सर मेरी मुस्कुराहट और शान्ति को बनाये रखती है। बस सीखना अब यह है कि यह शांति हर क्षण कायम रह सके, चाहे जो भी परिस्थिति आये, चाहे जितना भी दर्द उठे, चाहे यह जीवन चला जाए, पर शांति कायम रह सके।