December 28, 2014

Quotes on Ego (Attitude) in Hindi

Ego (Attitude) Quotes

  • 18/02/2017 - जिन्हें ना कहने का घमंड होता है...उन्हें हाँ न कह पाने का पछतावा भी होता है।
  • 17/01/2017 - अगर निर्दोषिता के चरम पर पहुँचे सिद्ध जनों और मासूमियत के चरम पर विद्यमान प्रकृति जैसे पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, बच्चों...आदि के समक्ष भी हमारा अहंकार छोटा नहीं पड़ता तो समझो समस्या बहुत बड़ी है...बहुत बड़ी है। 
  • 24/12/2016 - आप मात्र शब्दों की पोटली लेकर घूमेंगे और चाहेंगे कि विमर्श हो...नहीं हो पायेगा। दरअसल वहां चाहत विमर्श की होती भी नहीं, अहंकार बस येन-केन-प्रकारेण जीतना चाहता है।
  • 03/10/2016 - 'मेरा' से 'मैं' का रास्ता...कितनी मुश्किलों का वास्ता...रोज ही भटक जाते हैं।
  • 10/08/2016 - अहंकार ध्यानाकर्षण चाहता है। इसलिए वह मोह-घृणा, मित्रता-शत्रुता दोनों के साथ सहज रहता है। लेकिन तटस्थता उसे असहज और बैचेन करती है। यही कारण है कि ध्यानमग्न महावीर के कानों में भी कीले ठोक दिए जाते हैं और अकारण मुस्कुराते बुद्ध के मुंह पर भी थूक दिया जाता है। 
  • 07/07/2016 - अहंकार इतने सूक्ष्म छिद्रों से हमारे भीतर प्रवेश कर जाता है कि हमें खुद पता नहीं चलता। यहाँ तक कि अहंकार न होने का अहंकार भी निर्मित हो सकता है। कभी-कभी हमें पता भी होता है पर हम इग्नोर कर जाते हैं। वस्तुत: हमारे होने का कारण अहंकार ही है। हाँ, जहाँ भी जरा सा अतिरेक होता है, यह दूसरों को स्पष्ट नज़र आने लगता है। लेकिन मिथ्यादृष्टि से सम्यकदृष्टि की इस यात्रा में इतने असंख्य स्थान हैं कि हम अहंकारी-निरहंकारी, सज्जन-दुर्जन, अच्छा-बुरा जैसे वर्गों में विभाजन कुछ समझने-समझाने की दृष्टि से तो कर सकते हैं (क्योंकि भाषा के पास और कोई तरीका नहीं) लेकिन किसी के बारे में निष्कर्ष बनाने की इस दृष्टि से हमें जितना संभव हो बचना चाहिए।
  • 05/07/2016 - सबसे गहन बातों के अनर्थ सबसे अधिक होते हैं। क्योंकि अहम् अक्सर यह स्वीकारना नहीं चाहता कि समझ नहीं आया।
  • 16/04/2016 - अहंकार श्रेय नहीं देता, वह सब कुछ अधीन कर लेना चाहता है।
  • 13/02/2016 - अक्सर कोई व्यक्ति किसी बात को उतना और उस तरह ही बताता है जिससे उसका स्वार्थ और अहंकार संतुष्ट हो सके। लेकिन हमेशा याद रखें...आधा सच...पूरा झूठ होता है। 
  • 02/02/2016 - प्रेम ही समाधान है और प्रेम के मार्ग की सिर्फ एक ही बाधा है - अहंकार (मैं का विस्तार)। काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष...सभी अहंकार के ही उप उत्पाद हैं। 
  • 27/01/2016 - जब तक भावनाएं आहत होती रहेगी तब तक सीखना बाधित रहेगा। जब तक महापुरुषों को हम अपनी-अपनी संपत्ति मानकर चलेंगे तब तक उनके विचारों की हत्या करते रहेंगे। जब तक शब्द-शब्द में, भाव-भाव में, कर्म-कर्म में हम अपने अहंकार की तुष्टि खोजते रहेंगे तब तक धर्म से दूर रहेंगे। 
  • 31/08/2015 - एक पुरुष के अहंकार को कभी अनजाने में भी चोट पहुँच जाती है तो वह चोट पहुँचाने वाले के लिए फिर कभी पहले वाला पुरुष नहीं रहता। एक स्त्री का मन जब बुरी तरह छलनी हो जाता है तब वह किसी के लिए भी पहले वाली स्त्री नहीं रहती, खुद के लिए भी नहीं।
  • 06/07/2015 - जो अहंकार या भय के वशीभूत होकर हुआ है वह त्याग नहीं हो सकता। वह तो अहंकार और भय की पकड़ हुई। त्याग (छूटना) साहसी और संवेदनशील ह्रदय का काम है। त्याग दृश्य और अदृश्य को छोड़ने और उनके साथ होने, दोनों में हो सकता है। महत्वपूर्ण बस यह है कि छोड़ा क्या जा रहा है और पकड़ा क्या जा रहा है और दोनों कार्य किये क्यों जा रहे हैं। 
  • 28/05/2015 - अपने अहंकार को ताक पे रखकर जब हम अपनी गलती स्वीकार करते हैं, उसकी जिम्मेदारी लेते हैं, उसे न दोहराने का संकल्प लेते हैं तो यकीन मानिए हम कुछ अच्छा बुन रहे होते हैं।
  • 17/03/2015 - देने का अहंकार कभी इतना ज्यादा न हो कि जो मिल रहा है उसका मूल्य ही समझ न आये। देने के साथ अहंकार शुन्यता और ग्रहण करने के साथ कृतज्ञता न हो तो दोनों ही महत्वहीन है। 
  • 28/12/2014 - 'मेरी पोस्ट पर लाइक और कमेंट ना करने वालों को फ्रेंडलिस्ट से बाहर कर दूंगा/दूंगी।' बड़े-बड़े लोगों के ये बच्चों वाले स्टेटस पढ़कर सच बहुत हँसी आती है। 
  • कोई भी मुद्दा हो सब अपनी अनुकूलताएँ खोजते लगते हैं। हर एक को खुद को सही सिद्ध करना है, अपने सभी विरोधाभासों के साथ और दूसरे को गलत सिद्ध करना है उसके सभी विरोधाभासों के कारण। बस मुद्दे बदलते रहेंगे और वक्तव्यों की अदलाबदली जारी रहेगी। चंद शब्दों और प्रतीकों का मोह इतना ज्यादा है कि उन्हें बचाने के लिए सारे अर्थ अनर्थ हो जाए फर्क नहीं पड़ता। यह सिर्फ और सिर्फ अहंकार की लड़ाई है। बाकी जिस चीज का बचना जरुरी है वह तो सिर्फ ह्रदय में ही बच सकती है...और कोई स्थान उसके लिए है ही नहीं।
  • कुछ पाठक इतने अच्छे लेखक होते हैं कि पोस्ट को पढ़ने से पहले ही अपने विचार रख देते हैं। :) बतौर पाठक अगर हम अपने विचार रखना चाहते हैं तो सबसे पहले पोस्ट को ध्यान से पढ़ना और जिस सन्दर्भ में वह लिखी गयी है, उसे समझने का प्रयास करना जरुरी है। सन्दर्भ तक हम न पहुँच पायें इसकी सम्भावना है। किसी और सन्दर्भ तक हम पहुंचे इसकी भी पूरी सम्भावना है। ऐसे में हम विचार जरुर रखें लेकिन इस तरह से नहीं की वह थोपना या हावी होना लगे। विमर्श विनम्रता के धरातल पर हो...अहंकार के धरातल पर नहीं। 
  • जिन व्यक्तियों की चर्चा का एकमात्र उद्देश्य येन-केन-प्रकारेण जीतना हो, उन्हें जीतने दिया जाना चाहिए। वैसे गंभीर स्थिति होने पर उनके युद्ध का मैदान गायब भी किया जा सकता है।
  • भावुकता और जागरूक संवेदनशीलता का अंतर अहंकार और निरहंकारिता का अंतर है।
  • 'मैं', 'मेरा', 'मुझे' सिर्फ एक भ्रम ही तो है, जिसमें गुजर जाती है सारी ज़िन्दगी। सोचकर देखें तो क्या अस्तित्व है अकेले 'मेरा', 'मैं' या 'मुझे' का? यूँ तो ये जीवन भी 'मेरा' नहीं। अकेले से बन सकता है किसी का जीवन भला? और ये शब्द...ये भी तो उधार के ही हैं। फिर भी 'अहम्' के मारे 'मैं', 'मेरा' और 'मुझे' पीछा नहीं छोड़ते।

Monika Jain ‘पंछी’

December 8, 2014

Understanding Quotes in Hindi

Understanding Quotes

  • 26/03/2017 - तुम्हारी अपने प्रति अकारण चिढ़, नेगेटिव वाइब्स और पूर्वाग्रहों को प्रेम, सहजता और समझ में बदलने की कीमियागिरी मैं न सीख पायी। सारे प्रयास विफल। फिर याद आया कि प्रयास थे इसलिए विफल होने ही थे। कुछ जगह अप्रयास ही हो जाना पड़ता है। फिर सफलता या विफलता का कोई प्रश्न शेष ही नहीं रहता। वैसे भी जिस दिन कोई खुद को समझ लेगा उस दिन वह सबको ही समझ लेगा।
  • 14/03/2017 - बहुत मुश्किल होता है वह समय जब आपको ऐसी चीजें नज़र/समझ आने लगती है जो सामान्यत: औरों को नज़र/समझ नहीं आ रही होती है।
  • 08/03/2017 - 100 में से 99 बार दूसरों की बचकानी प्रॉब्लम्स सुनो। उन्हें आत्महत्या से रोको। उन्हें डिप्रेशन में जाने से रोको। और जब एक बार गलती से भी खुद की किसी सीवियर प्रॉब्लम का जिक्र करने का मन हो तो एक तरफ से किताब कहेगी - तुम्हें सहारा क्यों चाहिए? और दूसरी तरफ से आवाज़ आएगी - तुम्हें सहानुभूति क्यों चाहिए? मतलब बच्ची की जान ही ले लो। क्यों जो समझता है हमेशा बस उसी से और ज्यादा समझ की उम्मीद होती है? :/
  • 31/12/2016 - कभी-कभी मेरा संक्षेप में लिखना बहुत कुछ स्पष्ट नहीं कर पाता। लेकिन वह एकदम सहज अभिव्यक्ति होती है इसलिए अभिव्यक्त हो जाती है। व्याख्या और विस्तार के लिए आप कॉमेंट्स देख सकते हैं और जो वहां नहीं है उस पर विमर्श कर सकते हैं। इसके अलावा किसी को भी पढ़ते समय हम सन्दर्भ समझने की कोशिश करें, भाषा की सीमा के चलते यह जरुरी है। यह सीमा ऐसी है कि किसी विषय पर आप 1000 पन्ने लिख दोगे तब भी यह बनी ही रहेगी। 
  • 24/12/2016 - बहुत सी ऐसी चीजें हैं जो समझ आती है पर समझाई नहीं जा सकती। कोई तरीका ही नहीं। बस एक सांकेतिक कोशिश हो सकती है। तब भी समझेंगे वही जो उस अनुभूति के धरातल पर उतरेंगे...कि शब्द पूरे नहीं पड़ते।
  • 11/08/2016 - स्मृतियों की तुलना में समझ पर निर्भरता का बढ़ते जाना ही वास्तव में बड़े होना है।
  • 03/07/2016 - ओशो, सद्गुरु, महावीर, बुद्ध, कृष्ण...बहुत थोड़ा पढ़ा है, पर सभी को पढ़ते हुए जो मूल, गहन और सूक्ष्म बात है, उसमें हमेशा समानता ही पायी है। और इस समानता को महसूस कर पाना भी एक अद्भुत अनुभव है। अगर अंतर है तो सिर्फ रास्तों में है, तरीकों में है...और ये रास्तें और तरीके भी कई तरह से ओवरलैप कर जाते हैं। बस हर व्यक्ति अनूठा है इसलिए उसे अपनी क्षमताओं, रूचि और परिस्थितियों के अनुरूप अपना रास्ता चुनना होता है। जिसका इस बात से अधिक सम्बन्ध नहीं कि आप किस धर्म के टैग के साथ जन्मे हैं। सबको पढ़िए लेकिन पूर्वाग्रहों और अहंकार से थोड़ा मुक्त होकर। हर जगह बहुत कुछ अच्छा मिल जाएगा, बस उद्देश्य अच्छा तलाशने का होना चाहिए। जिसे विवेक गलत कहता हो, उसे पकड़ने की जरुरत है ही नहीं। इसके अतिरिक्त व्यक्ति भौतिकवादी हो, आध्यात्मिक हो, कट्टर हो, समाज सुधारक हो या कुछ भी...तलाश सभी की एक ही है। अंतर बस इतना ही है कि कुछ भटक रहे हैं, कुछ संभल रहे हैं, कुछ संभल कर भटक रहे हैं। बहुत थोड़े से लोग होते हैं जो भटक कर फिर संभल जाते हैं और सँभलने के बाद फिर नहीं भटकते। मंजिल सभी की एक ही है फिर ये इतनी समस्याएं क्यों आती है? समस्या सिर्फ हमारी ग्रहणशीलता में है, और कहीं भी नहीं। हाँ, इस समस्या के कारण कई सारे हो सकते हैं। 
  • 29/01/2016 - तुम्हें कोई समझेगा...ये अपेक्षा ही बेमानी है। शायद तुम जन्मी ही हो सबको समझने के लिए। (बहुत दिनों से इंतजार में था...आज आखिर छलक ही आया। :’( ) 
  • 28/01/2016 - पढ़ो कम...समझो ज्यादा।
  • 09/02/2015 - ये समझदार और ब्रेव होने का जो ठप्पा होता है न!...कभी-कभी दिल करता है इसे उतार फेंके। क्योंकि ये समझदार और ब्रेव होना कितनी भी बड़ी समस्या हो या कोई भी दूसरी बात, लोगों को हमारे प्रति एकदम निश्चिन्त और बेफिक्र बना देता है : that you are brave and sensible so you can handle anything. पर कभी-कभी (बस कभी-कभी ही) मन करता है काश! हम भी गुस्सैल, जिद्दी, मूडी, बात-बात पे बिगड़ने वाले दुष्ट बच्चों की तरह अपनी हर बात मनवाने वाले होते तो लोगों को हमारी कितनी फ़िक्र होती। समझदार और ब्रेव होकर तो कभी-कभी रो भी नहीं पाते ठीक से। 
  • मानवीय झगड़ों में एक ही दिशा के प्रभाव तो सामान्य हैं : जैसे एक विनम्र और शांत हुआ तो दूसरा भी शांत हो गया। लेकिन ये विपरीत प्रभाव जैसे : जब-जब एक विनम्र और मौन होता है तो दूसरे का अहंकार और झूठ सातवें आसमान पर चढ़ जाता है, यह थोड़ा जटिल मामला है। पहले केस में प्रभावित व्यक्ति थोड़ा सरल जान पड़ता है। लेकिन दूसरे केस में प्रभावित व्यक्ति ग्रंथियों से युक्त मस्तिष्क लगता है। हालाँकि प्रभावों का जीवन सही जीवन नहीं। हम सामान्य व्यक्ति इससे अछूते रह भी नहीं पाते। लेकिन अगर किसी का हर एक कार्य केवल सामने वाले से ही प्रभावित हो रहा है, चाहे वह एक ही दिशा में हो या विपरीत दिशा में तो वहां खुद की समझ तो पूरी तरह से नदारद है। स्पष्टता, समझ और आत्मविश्वास के लिए सम्यक दृष्टि की जरुरत होती है। यह किताबों से या बाहरी प्रभाव से नहीं मिलती। बाह्य साधन समझ के बढ़ने में सहायक अवश्य हो सकते हैं। लेकिन अंतत: स्पष्टता भीतर से ही आती है। 
  • ज्यादातर पोस्ट्स पर कमेंट करने के लिए मेरे पास कुछ होता ही नहीं है। जो बात पसंद आ जाती है या जिससे सहमति अधिक हो उसे लाइक कर देती हूँ। जिससे सहमति कम या न हो उसे छोड़ देती हूँ। बहस या चर्चा में पड़ने के सार्थक परिणाम नगण्य ही देखे हैं। क्योंकि अधिकतर यह अहंकार और हार-जीत का प्रश्न बन जाता है। सार्थक और सीखने के उद्देश्य से की गयी चर्चा वाली परिपक्वता का नितांत अभाव दिखाई पड़ता है। ऐसे में उस क्षण या स्थान विशेष पर अपनी सोच को थोपने की बजाय समझ बढ़ने का समुचित वातावरण पाना और देना अधिक उचित है।
  • सामान्यत: दुनिया में ऐसी कोई चीज नहीं होती जिसका अपवाद नहीं होता। इसलिए व्यर्थ की बहस करने से बेहतर है, अपवादों को हमेशा समाहित माना जाये। हर बार लिखना जरुरी नहीं न 'अपवादों को छोड़कर।' 
  • हर वह पीड़ा जो हमने अतीत में सही...भविष्य उस पर हँस रहा होता है या आज जिन बातों के लिए हम परेशान हैं, कल हम उन पर हंसने वाले हैं। जरुरत बस इस भविष्य के वर्तमान बन जाने की है।

Monika Jain ‘पंछी’

December 5, 2014

Essay on Education System of India in Hindi

और भी लाखों तरीके हैं

भाषा व्याकरण और वर्तनी सम्बन्धी अशुद्धियाँ हममें से अधिकांश लोग करते हैं। कुछ कम, कुछ ज्यादा। अशुद्धियाँ करने वालों का मजाक उड़ाती फेसबुक पोस्ट्स भी कई बार देखी है। यहाँ तक कि यह भी लिखा देखा है कि अशुद्ध लिखने से बेहतर है लिखा ही न जाए। इससे ज्यादा नकारात्मक और निराशवादी कथन और क्या होगा? यह बिल्कुल ऐसा ही है कि अगर आप हकलाते हैं तो बोलना बंद कर दें; लंगड़ाते हैं तो चलना बंद कर दें; कम नज़र आता है तो देखना ही बंद कर दें।

हममें से कईयों की प्रारंभिक शिक्षा ऐसे विद्यालयों में हुई है, जहाँ ये कभी बताया ही नहीं गया कि विराम चिह्न, अनुस्वार, नुक्ता आदि किस बला का नाम है। कहाँ और कैसे इनका प्रयोग करना है। बताया जाता भी कैसे? जिनसे अपेक्षा थी, वे या तो बड़े आलसी थे या फिर उन्हें खुद इनका सही प्रयोग नहीं मालूम था। मतलब यह समस्या अधिकांश मामलों में व्यक्ति विशेष की नहीं, एक तंत्र की है। कमजोर शिक्षा तंत्र की। जिसे केवल ठहाके लगाकर तो कभी भी नहीं सुधारा जा सकता।

कुछ समय पहले पड़ोस में रहने वाली एक 6th क्लास की स्टूडेंट ने बताया कि उनका हिंदी विषय में शब्दार्थ का क्लास टेस्ट था। उसमें एक शब्द था विधाता, जिसका अर्थ वह भगवान लिखकर आ गयी तो उनकी टीचर ने यह कहते हुए गलत कर दिया कि किताब में तो ईश्वर दिया हुआ है और तुम्हारा पर्यायवाची शब्दों का टेस्ट नहीं हो रहा है, शब्दार्थ का हो रहा है। इसलिए वही लिखना है जो किताब में लिखा है। ज्यादा आश्चर्य तो नहीं हुआ क्योंकि ऐसी घटनाएँ तो मैं भी पढ़ाई के दौरान बहुत बार झेल चुकी हूँ। जहाँ शिक्षक सही जवाब को गलत कर देते थे। क्लास के सबसे होशियार बच्चे को ब्लैक बोर्ड पर सबके लिए आंसर्स लिखने को कहकर आराम से कुर्सी पर पसर जाते थे। बच्चों से कॉपीज चेक करवाते थे। पढ़ाई के नाम पर सिर्फ और सिर्फ चैप्टर की रीडिंग। पर मैं एक छोटे से कस्बे की एक सरकारी हिंदी माध्यम स्कूल की छात्रा रही हूँ और ये जो वाकया है ये शहर की एक नामी स्कूल का है जहाँ बच्चों से फीस के नाम पर मोटी-मोटी रकम वसूल की जाती है। इसलिए थोडा आश्चर्य मिश्रित दुःख हुआ और समझ नहीं आया कि क्या कहूँ...हे ईश्वर!...हे भगवान्!...या हे विधाता!

इसी तरह एक बार घर के बाहर एक लड़की आई। मैंने पूछा क्या करती हो? वह बोली, 'बकरियाँ चराते हैं।' मैंने पूछा स्कूल नहीं जाती? उसने कहा, 'स्कूल तो छोड़ दी है। स्कूल वाले कौनसी नौकरी दे रहे हैं, जो स्कूल जाएँ। करना तो खेती और बकरियाँ चराने का काम ही है।' आगे मैं कुछ बोल नहीं पायी, क्योंकि जहाँ दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल हो, वहाँ पर बाल श्रम का विरोध और तथाकथित स्कूली शिक्षा की बातें बेमानी है। क्योंकि जो स्कूली शिक्षा दी जा रही है, वह शिक्षित बेरोजगारों की भीड़ बढ़ाने का काम जरुर कर रही है। ऐसे बेरोजगार जो खेती और पशुपालन के काम को अपने लायक नहीं समझते और सफ़ेद कॉलर वाली नौकरी पा नहीं सकते।

खैर! यह एक अलग मुद्दा है। लेकिन हाँ, बात अगर लेखन सम्बन्धी अशुद्धियों की हो तो बेहतर होगा कि सामान्य अशुद्धियों को इंगित करती हुई पोस्ट्स विद्वजन डालते रहें या फिर जहाँ अशुद्धि दिखे वहीं अशुद्ध और शुद्ध शब्द बता दिया जाए। यह भी जरुरी है कि जिनकी अशुद्धियाँ बतायी जा रही हैं, वे इसे अपने अहम् पर चोट का मसला न बनायें और सहर्ष गलतियों को सुधारने को तैयार रहें। समाज सेवा सिर्फ वृद्धाश्रम या अनाथाश्रम में जाकर फोटो खिंचवाने से ही नहीं होती, और भी लाखों तरीके हैं।

Monika Jain ‘पंछी’ 
(05/12/2014)