December 8, 2015

Save Animals and Birds Essay in Hindi

(1)
 
इंसान होने का सबूत

30/05/2017 - किसी भी संप्रदाय की कुरीतियों, रूढ़ियों या पशु-पक्षियों को देवी-देवता या माता-पिता मानने से मेरा कोई लेना-देना नहीं है। मैं किसी पार्टी विशेष की समर्थक भी नहीं। लेकिन कोई भी देश और दुनिया सिर्फ इंसानों के लिए नहीं है। पशु-पक्षियों के लिए आप न्यूनतम भी नहीं रखना चाहते। जबकि इंसान इंसान तभी होता है जब वह अपनी चेतना और बुद्धि का सदुपयोग कर शेष जीवों (इंसान शामिल) को अधिकतम संरक्षण प्रदान कर सके। बाकी तो वह पशुओं के स्तर से भी नीचे ही है। इंसानी उपलब्धियां इस प्रकृति पर कोई अहसान नहीं कर रही। हाँ, विपरीत जरुर सत्य है तो फिर गर्व की तो कोई बात है ही नहीं। जानवरों पर भोजन के साथ-साथ और भी कई तरह से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष अत्याचार होते हैं...और अगर किसी देश के पास यह विकल्प हो कि वह बिना धर्म और राजनीतिक दांव-पेंचों के वहां रहने वाले पशु-पक्षियों के संरक्षण को भी सुनिश्चित कर सके तो मुझे तो यही लगता है कि इस पर सभी को मिलकर सोचना ही चाहिए और सभी बिन्दुओं को शामिल करके सोचना चाहिए। कहीं किसी बिंदु पर आकर तो सहमति बन ही सकती है। और शुरुआत व्यापक हित को देखते हुए चयनित पशुओं को लेकर भी हो तो समस्या क्या है? पर अफ़सोस है कि सत्ता और अपनी असुरक्षा से आगे इंसान कुछ सोच ही नहीं पाता। हमारी इच्छाएं/महत्वकांक्षाएं अनन्त हैं। लेकिन अपने इंसान होने का कोई तो सबूत हम इस प्रकृति और शेष जीवों को दें।

(2)

अपनी ढपली, अपना राग

हिंदुत्व श्रेष्ठ है इसलिए हिंदुत्व ही बचना चाहिए।
इस्लाम श्रेष्ठ है इसलिए इस्लाम ही बचना चाहिए।
इंसान श्रेष्ठ है इसलिए इंसान ही बचना चाहिए।
सारी मिथ्या घोषणाएं हमारी! बिल्कुल अपनी ढपली, अपना राग की तर्ज पर। और इन सारी घोषणाओं के पीछे जो चीज प्रमुखता से चलती है वह है : राजनीति, मालकियत, सत्ता, अहंकार, नियंत्रण और अपने विस्तार की भावना। लेकिन पानी पी-पीकर हमें अगर किसी चीज को कोसना है तो वह है धर्म! खैर! अमूर्त चीजों पर अपना गुस्सा निकालना हर हाल में बेहतर है। कम से कम इस क्रोध की अग्नि में कोई मारा तो नहीं जाता। बाकी इंसान कितना ज्यादा श्रेष्ठ है इसका पता भी तब ही चल सकता है जब इंसान और किसी जीवन के बिना इस धरती पर बच सके। बाकी जिसे सच में जीव हत्या से आपत्ति हो वह न तो गाय के मारे जाने का समर्थन कर सकता है और न ही गाय को मारने वाले इंसान को मार डालने का समर्थन कर सकता है। वैसे ये जबरन किसी को भी माता-पिता, भाई-बहन बनाने वाले इंसान भी किसी चमत्कार से कम नहीं। स्वार्थ को रिश्तों का जामा पहनाना कोई हमसे सीखे। जब तक गाय घोषणा नहीं कर देती कि मैं तुम्हारी माता हूँ, तब तक हमारे लिए यही बेहतर है कि हम अपनी भावनाओं को अपने नियंत्रण में रखे और उसे अपने बछड़े की माता ही बने रहने दें।

(3)

गर आप वह पंछी / पशु होते तो?

08/12/2015 - पिंजरे में तोते, चिड़िया, खरगोश, चूहे आदि रखने वाले, दिन भर उन्हें पुचकारते हुए इसी ग़लतफ़हमी में जीते रहते हैं कि वे उन्हें बहुत प्यार करते हैं, पर सच सिर्फ इतना है कि वे इन भोले-भाले जीवों के सबसे बड़े दुश्मन है, जिनके मनोरंजन की बलि चढ़ती है, इन जीवों की आज़ादी! सोचिये, अगर कोई हमें जानवरों से भरे जंगल में अकेला पिंजरे में या खुला भी छोड़ आये तो हमें कैसा लगेगा? फिर कैसे हम सोच लेते हैं कि अपनी प्रजाति से दूर अकेले वे हमारे साथ खुश रह पायेंगे? कल एक अंकल जी कहीं पर बोलते दिखे, 'इन तोतों के लिए मैंने इतना बड़ा पिंजरा इसलिए ही बनावाया है ताकि इनकी आज़ादी में कोई खलल न पड़े।' (इत्ता बड़ा अहसान :o) प्यारे अंकल जी, आकाश को नापने वाले पंछियों के लिए कोई कितना बड़ा पिंजरा बनवा सकता है भला? पंछी पिंजरे में रहने को होते तो उनके पंख क्यों होते? कैदखाना स्वर्ण महल हो तब भी एक बंदिशों से रहित झोपड़ी से बदतर होता है...महसूस करके देखिये। परिंदों की आज़ादी पर यह फैसला लेने का हक़ आपको किसने दिया? उनकी आज़ादी का निर्णय उन पर ही छोड़ दीजिये न!...और भी बहुत कुछ है कहने को...पर बस आप एक पल को सोचिये - गर आप वह पंछी होते तो?

इसी तरह से ये पालतू कुत्ते को घुमाने वालों को उनके गले में पट्टा और रस्सी क्यों बांधनी पड़ती है? मतलब क्या इतने दिनों में भी वह उनके साथ यूँ ही चलना नहीं सीख पाता? और अगर नहीं सीख पाता तो इसका सीधा मतलब यह है कि वह ऐसे चलना ही नहीं चाहता। वैसे आज कोई बहुत ज्यादा पशु प्रेम नहीं उमड़ रहा है और न ही कोई व्यंग्य लेखन का इरादा है। बस अभी-अभी एक कपल को देख रही थी जो अपने कुत्ते को साथ घुमाने लाये थे और हर 5 सेकंड में उस कुत्ते के इधर-उधर डोलने और बीच-बीच में रुकने की वजह से उन्हें भी ऐसा ही करना पड़ रहा था। समझ नहीं आ रहा था उन्होंने कुत्ते को बाँधा हुआ है या कुत्ते ने उन्हें बाँधा हुआ है। खैर! प्रेम में कोई परेशानी नहीं होती लेकिन अच्छा लगता अगर बिना पट्टा और रस्सी बांधे इस तरह की परवाह और प्रेम देखने को मिलता।

Monika Jain ‘पंछी’

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December 1, 2015

Funny Quotes in Hindi

Funny Quotes

  • 13/06/2017 - हँसना हो तो अपनी पुरानी पोस्ट्स पढ़ें।...मसलन 31 जनवरी, 2014 को किसी के सवाल का जवाब मैं कुछ यूँ दे रही थी - जब कुछ लोग अपनी बुराई (घोर वाली) तक नहीं छोड़ते तो मैं भला अपनी अच्छाई कैसे छोड़ दूँ? (What a Logic!)
  • 08/06/2017 - बहुत ज्यादा...मतलब बहुत ही ज्यादा बोलने वाली पत्नियों के पति बचा-कुचा बोलना भी भूल जाते हैं। सॉरी टू नारीवाद! 
  • 02/06/2017 - कीड़े-मकोड़ों से प्यार करने का पुरस्कार कभी-कभी रात नीचे वाले फ्लोर में माँ-पापा के सो जाने के बाद, ऊपर वाले फ्लोर में बड़े ही ख़तरनाक, विचित्रोगरीब, खूंखार, रहस्यमयी, एकदम अज़नबी, दो इत्ते लम्बे दंशों के साथ आये बड़े जहरीले कीड़े के रूप में भी प्राप्त हो सकता है। फ़िलहाल मैं सुरक्षित हूँ। उसे भी रूम से बाहर बालकनी से टाटा कह दिया है। थोड़ा सा अजीब लग रहा है। लेकिन शुभ रात्रि। 
  • 27/05/2017 - सपने में लाइट न हो तो भी कितनी दिक्कत हो जाती है। कुछ भी नज़र नहीं आता। इसी के चलते कल रात मैं एक शहर में खो गयी थी। 
  • 26/05/2017 - कुछ लोगों को देखकर लगता है कि अगर इनका साम्राज्य या शासन होता तो ये हँसने पर ही टैक्स लगा देते या फिर डांट-डपट कर चुपचाप एक कोने में बैठा देते। मतलब इत्ते खड़ूस। 
  • 22/05/2017 - बन्दे ने तो पोस्ट में Better Half लिखा था। मैं उसे Battle Half पढ़ गयी।
  • 17/05/2017 - कोई ज्यादा 'हम्म-हम्म' करता हो और उसका 'हम्म-हम्म' करना छुड़वाना हो तो उससे भी ज्यादा 'हम्म-हम्म' करने लगो और उसे शुरू में कारण भी बता दो। उसका छूट जाएगा। बस बाद में खुद का छोड़ना मत भूल जाना। 
  • 16/05/2017 - कभी-कभी घूरने वाले/वाली को घूर कर भी उसकी घ्रूरता को कम किया जा सकता है।
  • 12/05/2017 - तुम मुझे फूल दो...मैं तुम्हें गमला दूँगी।
  • 09/05/2017 - दुनिया कभी-कभी फर्जीवाड़ा लगती है।
  • 02/05/2017 - एक बहुत सुन्दर सा गिरगिट कई दिनों से गृह प्रवेश की फ़िराक में लग रहा है। वैसे गिरगिट छिपकली से ज्यादा मासूम लग रहा है। 
  • 01/05/2017 - टमाटर रागियों का बस चले तो दही की करी में भी टमाटर डलवा दे और टमाटर द्वेषियों का बस चले तो टमाटर की सब्जी में भी टमाटर न डाले।
  • 27/04/2017 - अच्छा लगता है जब सारी रोटियां गोलगप्पा बन जाती है।
  • 13/04/2017 - गालों पर प्यार करने की इतनी आदत है कि गाय के बच्चे के भी गाल खोजने लग जाती हूँ। 
  • 21/03/2017 - जीवन में कुछ भी हो सकता है। मसलन यह भी कि रात नींद में आप पानी पीने को उठो और जग से गिलास में पानी डालो और पानी गिलास के बजाय बिस्तर पर गिर जाए या भयंकर सर्दी की रात में पानी गिलास में लेने के बाद आप जग को वापस अपनी जगह रखने की बजाय हवा में ही रख दो और तब आपको यह पता चले कि नींद उड़ना किसे कहते हैं। 
  • 29/12/2016 - बच्चे के रूप में करीब-करीब ईश्वर ही जन्म लेता है। फिर माता-पिता और समाज उसे बिगाड़ने का कार्य करते हैं। 
  • 21/12/2016 - कुछ लोगों को आपकी पोस्ट्स इतनी पसंद आती है, इतनी पसंद आती है, इतनी पसंद आती है कि वे उसे अपनी ही बना लेते हैं। उनके लिए यह स्वीकार करना संभव ही नहीं होता कि यह उन्होंने नहीं लिखी है।
  • 07/11/2016 - न सोयेंगे और न सोने देंगे वाले प्राणियों की संख्या दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही है।
  • 27/09/2016 - एक ज़माने में मैं इतनी बुद्धू थी (अभी भी कम नहीं) कि एक दोस्त ने मेरे मजे लेने के लिए मुझसे कहा, 'हमारे यहाँ पर बेस्ट फ्रेंड को मुर्गीचोर कहा जाता है।' मैंने थोड़ा संदेह जताया तो उसने कहा, 'चाहो तो किसी और से पूछ लो।' और मैं आराम से वहीँ पर रहने वाले एक कॉमन फ्रेंड से पूछ भी आई कि क्या आपके यहाँ बेस्ट फ्रेंड को मुर्गीचोर कहते हैं? 
  • 04/09/2016 - हमारी शिक्षा प्रणाली इतनी बोरिंग है कि बच्चे यह तक कहते पाए जाते हैं कि काश! बाढ़ आ जाए तो स्कूल ही नहीं जाना पड़ेगा। 
  • 30/08/2016 - अपने घर में मैं नास्तिक समझी जाती हूँ। मेरी जन्मकुंडली में लिखा है मैं बहुत बड़ी धर्मात्मा बनूँगी और यहाँ फेसबुक पर शायद आध्यात्मिक समझते हैं मित्र। और फिर मैंने इनमें से कुछ भी बनना कैंसिल कर दिया। 
  • 21/08/2016 - मित्र के सालों पुराने नंबर पर कॉल करने...जो कुछ सालों तक बंद रहकर अब किसी ख़तरनाक लड़की का नंबर हो चुका हो। जहाँ सामने वाली आपको कोई और लड़की (रिमझिम) समझ रही है (जिससे उसका 36 का आँकड़ा है शायद) और आप उसे मित्र की पत्नी समझकर बहुत सहजता से बात कर रहे हैं। तब इस ख़तरनाक ग़लतफ़हमी के बीच कुछ अज़ब वार्तालाप के साथ-साथ उसका कहना, 'देखो! तुम इतनी ज्यादा स्वीट मत बनो।'...मुझे रह-रहकर अभी तक हंसी आ रही है। अच्छी-खासी आवाज़ का इस तरह से कचरा भी हो सकता है। मन कर रहा था उसे कह दूँ, मैं स्वीट बन नहीं रही...आलरेडी स्वीट हूँ। 
  • 18/08/2016 - बच्चों का स्वागत और बच्चों द्वारा स्वागत आज भी दरवाजे के पीछे छिपकर 'हो' से ही होता है। 
  • 07/04/2016 - डिअर स्माइली! तुम अलग-अलग स्क्रीन पर अलग-अलग से मत दिखा करो। 
  • 19/02/2016 - काहें का 'फ्रीडम 251'! सबको तो गुलाम बना छोड़ा है। इत्ते तो अभी शक्ल भी नहीं देखी ढंग से। अफवाहों का बाज़ार भी गर्म है। वैसे टेंशन न लो कोई। कुछ ठीक न रहा तब भी बच्चों के खेलने के काम तो आ ही जाएगा।
  • 11/01/2016 - 'स्टेप हेयर कट' के लिए माँ कहती है - चूहों ने बाल कुतर दिए हो जैसे।
  • 07/12/2015 - किचन एक्सपेरिमेंट के नाम पर किसी ने कहा, 'आप आलू-मुर्गा बना लो।' हमने कहा, 'आलू हम बना लेंगे, आप मुर्गा (सजा वाला) बन जाना।' 
  • 01/12/2015 - जिन्हें शब्दों से अति प्रेम हो या फिर जिनके लिए चर्चा सिर्फ हार या जीत का प्रश्न हो उनके साथ चर्चा में पड़ना मतलब ’आ बैल मुझे मार!’ 
  • हमारी फ्रेंडलिस्ट में रहते हुए भी कुछ लोग हमें इतना रेगुलर नहीं पढ़ते जितना ब्लॉक लिस्ट में जाने के बाद पढ़ने लगते हैं।
 
Monika Jain ‘पंछी’

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November 17, 2015

My Childhood Memories Story in Hindi

काश! वह प्रेम पत्र रहा होता

कागज पर लिखे प्रेम पत्र का अपना एक अलग ही आकर्षण है। कितना रोमांचक समय होगा वह जब एक दूसरे को प्यार करने वाले डर-डर के छुप-छुप के एक दूसरे को प्रेम पत्र लिखा करते होंगे। फूल, गिफ्ट्स, चॉकलेट्स, मैसेजेज, ईमेल्स, फोन, व्हाट्स एप और डेटिंग के इस दौर में वह खतों वाला प्यार जाने किसे नसीब होता होगा।

हमेशा स्कूल/डिस्ट्रिक्ट टॉप करने के लिए किताबों में खोयी रहने वाली, अव्वल दर्जे की अंतर्मुखी और सिंसियर यह लड़की, जिसे हमेशा बस एक-दो का ही साथ चाहिए होता था, जिसे ग्रुप्स में रहना ज्यादा पसंद नहीं था, जिसे और तरीकों से प्रेम प्रस्ताव तो मिलते रहे लेकिन क्या किसी ने कभी मुझे भी वो कागज़ वाला प्रेम पत्र लिखा होगा यही याद करते-करते मैं बचपन के समय में चली गयी। तब पाँचवी कक्षा में पढ़ती थी। इनोसेंट का टैग तो आज तक नहीं उतर पाया है तो उस वक्त क्या रही होऊँगी, पता नहीं। पर हाँ, सही शब्द- गलत शब्द इतना तो पहचानती थी। भावनाओं को तो नवजात शिशु भी पहचान लेता है तो फिर मैं तो 10-11 साल की लड़की थी। कहते हैं पढ़ाई में होशियार और गंभीर लड़कियों से लड़के थोड़ा डरते हैं और खुद यह लड़की भी अपने में ही खोयी रहने वाली किसी की ओर नजर उठाकर भी नहीं देखने वाली, जिसे यह भी न मालूम होता था कि कक्षा में पढ़ता कौन-कौन है...पर हाँ, तब क्लास के कुछ लड़के गृहकार्य के लिए कॉपी मांगने जरुर अक्सर घर आते थे। पाँचवी कक्षा तक आते-आते लड़के और लड़कियों के बैठने की जगह अलग-अलग हो गयी थी। इसलिए शायद मन ने भी लड़के और लड़की के भेद को कुछ-कुछ स्वीकार कर लिया होगा।

एक दिन प्रार्थना के बाद कक्षा में आकर बैठी थी। कॉपी-किताब निकालने के लिए बैग खोला तो देखा उसमें कागज का बॉल बनाकर डाला हुआ था। मैंने और मेरे पास बैठी मेरी सहेली दोनों ने उसे देखा। फिर मैंने उसे खोला तो उसमें एक लड़के ने अपने नाम के साथ कुछ मैसेज लिखा था। एक पार्क में मिलने के लिए बुलाया था और जिन शब्दों का प्रयोग करते हुए यह लिखा था वह बिल्कुल अच्छे नहीं थे, मतलब भाषा अश्लील थी। सहेली तो हंसने लगी थी और मैंने झट से उसे वापस फोल्ड करके बैग में रख दिया। घर आकर चुपके से छत पर गयी और रोते-रोते उस लैटर के जितने बारीक टुकड़े कर सकती थी किये और उसे एक बारिश का पानी जाने वाले पाइप में डाल दिया। अब तो समझती हूँ कि ये गलत किया था, पर तब शायद मन में जाने क्या डर रहा हो।

कुछ दिन बाद वापस वैसा ही लैटर घर पर बैग खोलते वक्त मिला। भैया पास में ही बैठा था। मैं फिर रोने लगी और रोते-रोते वह ख़त भैया को पकड़ा दिया। घर पे सबको पता चला। पापा ने प्रिंसिपल मैम से बात की। उस नाम के दो लड़के पढ़ते थे स्कूल में। एक सीनियर और एक जूनियर। प्रिंसिपल मैम ने लैटर माँगा और कहा हैण्डराइटिंग मिलाकर उसे समझा देंगी और डांट देंगी। खैर! बात आई गयी हो गयी। लड़के का पता चला या नहीं यह सब कुछ पता नहीं...पर हाँ, उसके बाद कोई ख़त नहीं आया था। वे दोनों लड़के रास्ते में एक-दो बार नजर भी आये थे, पर कभी पता नहीं चल पाया कि कौन था। इसके बाद स्कूल भी बदल गयी। आज कुछ बच्चे अपने स्कूल में चलने वाले टाइम पास और रोज-रोज बदलने वाले अफेयर्स के बारे में बता रहे थे। अचानक ही वह घटना याद आ गयी और मन खिन्नता से भर आया। जाने क्यों मन ने कहा कि काश! वह प्रेम पत्र रहा होता।

Monika Jain ‘पंछी’
(17/11/2015)

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November 10, 2015

Recipe of Angoori Petha in Hindi

Recipe of Angoori Petha in Hindi
 
रेसिपी : अंगूरी पेठा
 
सामग्री :

पेठा फल : 1 किलोग्राम
चीनी : 700 ग्राम
चूने (100 ग्राम) या फिटकरी ( 2 मटर के दाने जितनी) का पानी
केसर या मीठा पीला या नारंगी रंग

विधि :

पेठे के फल को छीलकर व इसके बीज और मुलायम गुदा बाहर निकाल देंगे। अब बाकी भाग के 1-2 इंच के चोकोर टुकड़े काट लेंगे या फिर स्कूप की मदद से इसकी बॉल्स निकल लेंगे। अब इन टुकड़ों या बॉल्स में सुई या कांटे वाले चम्मच की मदद से जगह-जगह छेद कर देंगे। एक बर्तन में पानी लेकर उसमें दो मटर के दानों के बराबर फिटकरी मिलाकर घोल देंगे। फिटकरी की जगह चूने का पानी भी उपयोग में लाया जा सकता है। अब पेठे के टुकड़ों को इसमें डालकर 2 घंटे के लिए भिगो देंगे। पेठे पानी में डूबे हुए रहने चाहिए। अब दो घंटे बाद इन्हें निकालकर साफ पानी से तेज धार में धो लेंगे ताकि फिटकरी या चूने का अंश न बचने पाए। अब एक बर्तन में पानी लेकर उसके उबाल आने पर पेठे के टुकड़ों को डालकर इनके नर्म और पारदर्शी होने तक उबालेंगे। इसके बाद चलनी की सहायता से इस पानी को निकाल देंगे। अब एक दूसरे बर्तन में पानी लेकर उसमें चीनी, केसर या मीठा रंग मिला देंगे। एक तार की चाशनी बन जाने पर इसमें पेठे के टुकड़े डाल देंगे। सामान्य ताप पर आ जाने पर इन्हें कुछ घंटों के लिए फ्रिज में रख देंगे। तब तक चाशनी भी पेठों में प्रवेश कर जायेगी। इसके बाद इन्हें खाने के लिए सर्व किया जा सकता है।

Instant Angoori Petha Recipe : अगर मेहमानों के आने पर झटपट अंगूरी पेठे तैयार करने हो तो इसके लिए बाजार से सूखे तैयार मीठे पेठे (½ kg) लाइए। अगर ये आकार में बड़े हैं तो इन्हें छोटे-छोटे चोकोर टुकड़ों में काट लीजिये। अब एक पतीली में 2 गिलास पानी लेकर इसके उबाल आने पर इसमें पेठे डाल दीजिये। इसी के साथ पीला मीठा रंग या केसर की पात्तियां भी डाल दीजिये। अब इन पेठों को तब तक उबालिए जब तक की पानी चाशनी की तरह गाढ़ा न हो जाए। अब गैस बंद कर इसके सामान्य तापमान पर आने पर फ्रिज में ठंडा करके सर्व कीजिये।

Monika Jain ‘पंछी’
(10/11/2015)

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October 1, 2015

Essay on Dussehra Festival in Hindi

विजयादशमी के मायने

उत्सव और त्यौहार हर्ष, उल्लास और मनोरंजन के प्रतीक हैं। दौड़ती-भागती ज़िन्दगी की बोरियत में कुछ ठहरे हुए क्षण! ये बात अलग है कि ये दौड़-भाग की ज़िन्दगी भी इंसान ने खुद चुनी और ये बोरियत भी। मैं उत्सव विरोधी नहीं हूँ, लेकिन एक बड़ी मजेदार चीज है - इंसान ने सारी दुनिया के साधन अपने मनोरंजन के लिए जुटा लिए, इसके बावजूद भी उसकी बोरियत दूर नहीं हो पायी। वह घोड़ों को दौड़ाता है, वह बैलों को लड़ाता है, वह खुद भी अखाड़े में उतर जाता है; दुनिया भर के गीत-संगीत, नृत्य, खेल, एडवेंचर, त्यौहार और भी न जाने क्या-क्या इंसान ने अपने लिए उपलब्ध करवा लिए...लेकिन उसकी बोरियत आज भी वैसी की वैसी ही है और आनंद की खोज अब तक जारी है। जबकि घोड़ों, गधों, बैलों, ऊंटों किसी को भी इंसान की इस दौड़ में कोई रूचि नहीं। बल्कि जिन लोगों को मनोरंजन के साधनों की दरकार नहीं, जो सबकी तरह बोरियत महसूस नहीं करते, जिनके लिए प्रकृति और अंतर्मुखता ही सारे आनंद और उत्सवों की शरणस्थली है, वे लोग भी उसकी नजर में बोरिंग इंसान करार दे दिए जाते हैं। अजब है पर सच है।

खैर! अब आते हैं हम विजयादशमी पर। उत्सव, त्योहारों और आनंद की इसी कड़ी में हर वर्ष रावण का दहन एक परंपरा बन चुका है और यह त्यौहार मनाया जाता है बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक के रूप में। कई अन्य मान्यताओं के साथ जो एक प्रमुख मान्यता है वह है कि इस दिन श्री राम ने रावण का वध किया था और लंका पर विजय प्राप्त की थी। बुराई की हार और अच्छाई की विजय निश्चित रूप से अच्छा संकेत है। इसे सेलिब्रेट करना भी अच्छी बात है। लेकिन क्या सिर्फ जश्न मनाने तक ही यह सारी कवायद होनी चाहिए? जिस रावण को हम सालों से जलाते आ रहे हैं वह रावण तो कभी का मृत्यु का वरण कर चुका, तो फिर हर साल रावण का कद बढ़ा-बढ़ाकर हम कौनसी बुराईयों को जलाते हैं? हम तमाशाबीन अपनी बुराईयों, अपने गुनाहों, अपने अपराधों से अनजान किसकी मृत्यु पर इतना हर्ष मनाते हैं?

विजयादशमी संकेत है अपने मन के भीतर झाँकने का और वहां सदियों से जो गन्दगी, बुराई और अज्ञान रुपी धूल की पर्तें जमी हैं उन्हें झाड़ने का। यह समय है बहिर्मुखी से अंतर्मुखी बनने का, अन्याय से न्याय और असत्य से सत्य की ओर लौटने का। लेकिन हमारा सारा उत्सव, हमारा सम्पूर्ण जीवन तो कुछ और ही कहानी बयां करता है। हम खुद से इतना भयभीत हो चुके हैं, हम अपने मन से इतना हार चुके हैं, हम अपनी कमजोरियों के इस कदर गुलाम बन चुके हैं कि हमारी सारी यात्रा बाहर और दूसरों की तरफ ही होती है। तभी तो कागज का जलता हुआ रावण हमें हर्ष और उल्लास दे जाता है लेकिन अपने भीतर के रावण को हम दिन प्रतिदिन सशक्त होने देते हैं। उसके सामने हमारा कोई वश नहीं चलता।

मेरे कस्बे के दशहरे मेले में जिस समय रावण का पुतला धूं-धूं करके जल रहा होता है ठीक उसी समय एक कविता हमेशा बोली जाती है, जिसमें एक पंक्ति आती है - ‘सचमुच के रावण जिन्दा है, कागज़ के रावण जलते हैं।’ और इन्हीं मेलों में लड़कियों को कितनी अश्लील हरकतों का सामना करना पड़ता है, यह भी किसी से छिपा हुआ नहीं। लेकिन सब कुछ पता होते हुए भी कितने विरोधाभासों में जीते हैं हम! हर पल हम उन्हीं पात्रों की आलोचना कर रहे होते हैं जिन्हें हम किसी ना किसी रूप या मात्रा में खुद जी रहे होते हैं।

उत्सव हमारे जीवन का अपरिहार्य हिस्सा बन चुके हैं, लेकिन जीवन उत्सव तभी बन सकता है जब इन उत्सवों से मिले सार्थक सन्देश को भी हम अपने जीवन में उतार सकें। विशेष रूप से जब कोई किसी उत्सव को धर्म से जोड़ता हैं, अपने किसी आराध्य से जोड़ता हैं तब तो उसकी जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। दशहरा आने वाला है। आईये हम सब मनन करें कि इस बार रावण दहन की अग्नि को हम अपनी कौनसी बुराई अर्पित करके आने वाले हैं। बाकी आप सभी को विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

Monika Jain ‘पंछी’
(01/10/2015)

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September 27, 2015

Story on Dussehra in Hindi

मुन्नी का दशहरा

मुन्नी बड़ी ख़ुश नजर आ रही थी। आज पहली बार वह अपने कस्बे का दशहरा मेला जो देखने जा रही थी। मेला देखने का यह उत्साह कई दिनों से उसके नन्हें से मन में हिलोरे ले रहा था। कुछ ही दिन पहले उसकी हिंदी की टीचर ने दशहरे के बारे में पढ़ाया था। तबसे उसका इंतजार और भी बढ़ गया। मेले की चाट-पकौड़ी, गुब्बारे, मिट्टी के सेठ-सेठानी, हूपला, झूले ये सब तो उसके आकर्षण का केंद्र थे ही लेकिन कई दिनों से मुन्नी के दिमाग में कुछ और बातें भी चल रही थी।

उसकी हिंदी की टीचर ने बताया था कि दशहरा बुराई पर अच्छाई की विजय का त्यौहार है और रावण को जलाना एक तरह से बुराई को जलाना ही है। उस दिन से ही मुन्नी ने कॉपी के एक पन्ने पर उन सब बातों की लिस्ट बनानी शुरू कर दी जो उसे भली नहीं जान पड़ती थी।

मुन्नी के पापा मुन्नी को बहुत प्यार करते हैं, लेकिन कुछ समय से वह देख रही थी कि पापा सिगरेट और शराब पीने लगे हैं जिसकी वजह से आये दिन पापा और मम्मी के बीच झगड़ा होता है। स्कूल में उसके बगल में बैठने वाली सीमा जब-तब उसकी पेंसिल चुरा लेती है और अगले दिन पेंसिल को दोनों और से छीलकर उसकी शक्ल ही बदलकर ले आती है और कहती कि यह तो मेरी ही है। उसकी अंग्रेजी की टीचर छोटी-छोटी सी बातों पर बच्चों को लकड़ी की बेंत से बुरी तरह से पीटती है। उसके पड़ोस में रहने वाला कल्लू जब भी वह घर के बाहर पड़ी काली मिट्टी से खिलौने बनाती है तो सब तहस-नहस करके चला जाता है।

पड़ोस में रहने वाली गौमती काकी जो एक अँधेरी कोठरी में रह रही है, हर रोज शहर बस गए अपने बेटे की चिट्ठी का इंतजार करती है पर वह चिट्ठी कभी नहीं आती। उसी की दोस्त गिन्नी की सौतेली माँ गिन्नी से ढेर सारा काम करवाती है, उसे खाना भी पूरा नहीं देती और उसकी पिटाई भी करती है। ऐसी ना जाने कितनी बातों की लिस्ट उसने बनायी और भगवान जी के नाम एक चिट्ठी लिख दी, जिसमें उसने इन सभी बुराईयों को रावण के साथ जला देने की प्रार्थना भगवान से की।

शाम में जब माँ ने मेले के लिए तैयार होने को आवाज लगाई तो मुन्नी अपनी सबसे पसंदीदा फ्रॉक पहनकर उसकी जेब में वह चिट्ठी डालकर इठलाते हुए मम्मी-पापा के साथ मेला देखने निकल पड़ी।

मेले में पहुँचने पर माँ-पापा किसी खिलौने की दुकान पर रुकते और उससे कुछ पसंद का खरीदने को पूछते तो वह बाद में-बाद में कहकर टाल देती और कहती मुझे सबसे पहले रावण को देखना है, एकदम पास से। और इस तरह वह बीच में आने वाले चाट-पकौड़ी, कुल्फी, झूले, गुब्बारों सबको अनदेखा करते हुए तब तक नहीं रुकी जब तक कि रावण के नजदीक नहीं पहुँच गयी। पर अपनी चिट्ठी डालने के लिए तो उसे और भी पास जाना था। पर पापा ने कहा कि इससे आगे नहीं जा सकते और यहाँ से रावण कितना बड़ा और साफ़ दिख तो रहा है। जब और आगे जाने का कोई रास्ता और तरकीब उसे नजर नहीं आई तो वह मायूस हो गयी। पापा ने उसे बार-बार समझाया पर उस पर कोई असर न हुआ। मेला देखने का इतने दिनों का उल्लास जाने कहाँ चला गया। तभी पापा ने अपनी गुड़िया को गोद में उठाया और इसी दौरान वह चिट्ठी नीचे गिर पड़ी। मुन्नी बोली मेरी चिट्ठी और पापा उसे उठाकर पढ़ने लगे।

बच्ची के मासूम शब्दों में ढली प्रार्थना पापा के दिल को छू गयी। उन्होंने मुन्नी को चूमा और प्यार से समझाया, ‘बेटा, कोई भी बुराई सिर्फ कागज को आग में जला देने से नहीं मिट सकती। इसके लिए उसे हमें अपने मन से मिटाने का संकल्प लेना होता है। रावण को जलाना बस एक इशारा भर है हम सबके लिए अपने-अपने मन के रावण को जलाने के लिए। लेकिन अफसोस है कि हम बस कागज़ के रावण ही जलाकर रह जाते हैं।’ यह कहकर मुन्नी के पापा ने अपनी जेब से सिगरेट का पैकेट बाहर निकाला और उसे वहां पड़े डस्टबिन में फेंक दिया और मुन्नी से वादा किया कि अबसे वह इन बुरी आदतों को हाथ भी न लगायेंगे।

मुन्नी की मुस्कान फिर लौट आई। उसने कहा, ‘अगर ऐसा है तो आज से मैं अपना होमवर्क टाइम से करुँगी और खाना खाते समय नखरे भी नहीं दिखाऊंगी।’ मुन्नी की माँ भी ख़ुश होकर बोली, ‘आज से मैं भी अपनी प्यारी मुन्नी पर कभी हाथ नहीं उठाऊंगी।’

पीछे रावण जलने लगा था। मुन्नी ने अपने पापा-मम्मी के साथ मेला अच्छे से घूमा, खिलौने खरीदे, झूला खाया, हूपला खेला, जादूगर का खेल देखा; अपनी पसंदीदा आइसक्रीम, जलेबी और पकौड़ियाँ खायी और फिर सब ख़ुशी-ख़ुशी घर लौट आये। मेले से वह गौमती काकी के लिए मिठाई और एक साड़ी भी खरीद कर लायी थी, जिसे देखकर गौमती काकी की आँखें ख़ुशी से छलछला उठी। उसने मेले से लाये खिलौनों से कल्लू को भी खेलने दिया और इसके बाद कल्लू ने उसके खिलौने कभी नहीं बिगाड़े।

अपने लिए मेले से लायी रंग-बिरंगी पेंसिल्स में से उसने कुछ पेंसिल सीमा को भी दी। सीमा बहुत ख़ुश हुई और उसे अपनी गलती का अहसास भी हुआ। उसने मुन्नी से वादा किया कि अब वह ऐसा काम कभी नहीं करेगी।

अंग्रेजी की बेंत मारने वाली टीचर और उसकी सहेली गिन्नी की सौतेली माँ के अंदर के रावण भी एक दिन जल जायेंगे, इसी आशा के साथ वह अपना होमवर्क करने बैठ गयी।

Monika Jain ‘पंछी’
(27/09/2015)

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September 25, 2015

Essay on Bakra Eid Ul Adha (Zuha) in Hindi

नयी ईद का इंतजार

(1)

12/09/2016 - घर से बाहर जब भी बकरियों या भेड़ों का झुण्ड सर झुकाए चलते हुए देखती हूँ तो वह जो नन्हा सा मेमना फुदककर आता हुआ सारी भीड़ को तितर-बितर कर देता है, उसपे बड़ा प्यार आता है। परम्पराओं के नाम पर बिना सोचे समझे अक्सर 'भेड़ चाल' चलते हैं हम। बस तुम (मैं शामिल) वह नन्हा, मासूम मेमना बन जाना और बदल देना परंपरा को। तुम बता जाना अगली पीढ़ी को कि हम ईद इसलिए मनाते आ रहे हैं क्योंकि इस दिन से कई मासूमों को जीवन मिलने लगा था। कल्पनाएँ बड़ी असंभव सी करती हूँ मैं...पर उस नयी ईद का मुझे इंतजार है।...और उस नन्हें मेमने को ढेर सारा प्यार है।

(2)

25/09/2015 - किसी की धार्मिक स्वतंत्रता से समस्या नहीं...न हिन्दू की, न मुस्लिम की, न किसी और की। किसी के भी उत्सव और आनंद में ख़लल डालने का कोई इरादा नहीं। बात बस इतनी सी है कि अपने अति अस्तित्व और अपनी अति महत्वकांक्षाओं के चलते मनुष्य वैसे ही बहुत ऊलजलूल हरकतें करता आया है। तिस पर उसे धर्म भी ऐसी ही हरकतों के लिए चाहिए। क्या जीवन का कोई एक कोना भी नहीं छोड़ सकते हम शांति, सुकून और प्रेम के लिए कि जब-जब लगे कि बहुत हुआ अब तो फिर लौट आये वहां फिर से।

कभी-कभी समझ नहीं आता...प्रतीकों और विवेकहीन मान्यताओं के इतने अवलंबन की जरुरत क्यों हैं? इंसान इतना भयभीत क्यों हैं? क्यों स्वार्थ और धर्म के नाम पर वह इतना अँधा बन जाता है कि उसे उचित-अनुचित भी दिखाई नहीं पड़ता। क्यों वह ताउम्र खुद से दूर भागता रहता है और बाहर सारे समाधान ढूंढता रहता है। कहीं इसलिए तो नहीं कि जो भीतर झाँका तो सारी पोल-पट्टी खुलने का डर है? मन से बहुत निशक्त हैं हम...बहुत ज्यादा। इसलिए मन में झाँकने तक की हिम्मत नहीं कर पाते। धर्म जो अँधा बनाये वह धर्म कैसे हो सकता है? धर्म का काम तो जागृति होना चाहिए था...अन्धता तो बिल्कुल भी नहीं। धर्म का काम तो एकता होना चाहिए था...बंटवारा तो बिल्कुल भी नहीं। धर्म तो प्रेम होना चाहिए था...नफरत और हिंसा तो बिल्कुल भी नहीं। धर्म तो मुक्ति का अहसास होना चाहिए था...ये बाहरी जकड़न तो बिल्कुल भी नहीं। ये रक्तरंजित घूमती हुई तस्वीरें अच्छी नहीं लग रही...बिल्कुल भी नहीं। अगर कोई पूछे कि दुनिया का सबसे अभिशप्त शब्द कौनसा है तो इन तस्वीरों को देखकर बस एक ही जवाब दिमाग में आता है...धर्म!

माना कि हर किसी का जीवन हिंसा पर ही खड़ा है, हिंसा के बिना किसी जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। लेकिन अनावश्यक हिंसा को तो रोका जा ही सकता है। बचपन में फूलों की सुन्दरता से आकर्षित होकर मैं कभी-कभी फूल तोड़ लेती थी, पर फूल को तोड़ते ही उसकी सुन्दरता जाने कहाँ गायब हो जाती थी और हर बार फूल तोड़ने पर पछतावा ही होता था। धीरे-धीरे कब फूलों का जीवन पौधों पर ही अच्छा लगने लगा, पता भी न चला...और अब फूल नहीं तोड़े जाते, किसी पूजा-पाठ करने वाले के लिए भी नहीं।

क्योंकि अगर किसी का यह विश्वास भी है कि सृष्टि की रचना ईश्वर/अल्लाह ने की है, तब भी सृष्टि का रचयिता अपने ही नाम पर अपनी ही रचनाओं की मृत्य से ख़ुश कैसे हो सकता है? किसी निर्दोष या मासूम की हत्या से तो बिल्कुल भी नहीं। हम सभी किसी न किसी मात्रा में हिंसक हैं...कोई कम तो कोई ज्यादा। इसलिए यह तो समझ आता है कि किसी की कटु आलोचना का अधिकार हमें नहीं है। लेकिन हम मिलकर इस दुनिया को जितना संभव हो, सबके लिए सुंदर और जीने योग्य तो बना ही सकते हैं। क्योंकि जीना भला किसे नहीं पसंद? और इतना नहीं कर सकते तब भी इतना तो कर ही सकते हैं कि जो काम गलत है, सिर्फ हमारे स्वार्थ और मनोरंजन के लिए है, धर्म और ईश्वर जैसी अमूर्त चीजों के नाम पर उन्हें मढ़कर उनका महिमामंडन तो न करें।

(3)

26/09/2015 - हममें से अधिकांश लोग हिंसा के सिर्फ स्थूल और बाहरी स्वरुप को ही जानते हैं। यहाँ हिंसा के खिलाफ पल-प्रतिपल आ रही पोस्ट बार-बार यही बता जाती है। लेकिन हिंसा बाहर नहीं भीतर गहराई में मौजूद है। आप वास्तव में बाहर किसी को नहीं मार सकते। हिंसा या प्रेम मुख्य रूप से भीतर घटित होता है और वही बाहर अभिव्यक्त होता है। हमें इसके सूक्ष्म से सूक्ष्मतम स्तर को समझना और पहचानना जरुरी है। धर्म के स्तर पर छोड़ने की कोई बाध्यता या जल्दी नहीं होती (कानून/न्याय व्यवस्था के लिए जरुरी हो सकता है) क्योंकि जिस क्षण कुछ वाकई में आत्मसात हुआ वह स्वत: ही छूट जाता है। कई जगह इको फ्रेंडली बकरे को काटने की बात चल रही है। जाने क्यों मुझे यह ‘आकाश से गिरे, खजूर पे अटके’ जैसी बात लग रही है। भाव हिंसा को समझिये। प्रेम को धर्म का प्रतीक बनाईये, किसी प्राणी को काटने को नहीं। रही बात अर्पण-समर्पण या कुर्बानी की तो प्रेम के क्षण में ईश्वर खुद हमसे प्रकट हो रहे होते हैं। इससे निकट ईश्वर से कोई क्या सम्बन्ध बन सकता है?

Monika Jain ‘पंछी’

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September 23, 2015

Essay on Theism, Atheism, Agnosticism in Hindi

नास्तिकता क्यों एक समाधान नहीं

एक ओर धर्म में जहाँ आडम्बर और कर्म-काण्ड आधुनिकता का रंग ओढ़कर आगे से आगे स्थानांतरित होते जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर स्वयं को तर्कवादी कहने वाले नास्तिकों की संख्या में भी इज़ाफा हो रहा है। हालाँकि आडम्बर एक ऐसी चीज है जिसका सिर्फ धर्म से सम्बन्ध नहीं है, इसका सम्बन्ध मनुष्य के मन से है और इस आडम्बर से तो आस्तिक क्या नास्तिक भी अछूते नहीं है। हाँ, बस ईश्वर और धर्म के नाम पर जो भौंडा प्रदर्शन होता है वह थोड़ा अधिक कुरूप लगता है। धर्म के नाम पर होने वाले अपराध अधिक घृणित लगते हैं। बाकी दिखावों और अपराधों का तो हमारा यह समाज आदि हो ही चुका है। इससे कोई कितना अछूता रह पाता है यह तो उसकी प्रकृति और जागरूकता पर ही निर्भर करेगा, आस्तिक या नास्तिक के लेबल पर नहीं।

जहाँ एक ओर लोग अपने धर्म और जाति विशेष का होने पर गर्व करते हैं वैसे ही नास्तिक अपने नास्तिक होने पर गर्व महसूस करते हैं। कुछ समय तक मैं नास्तिकता के अधिक पक्ष में थी लेकिन तथाकथित आस्तिकता और नास्तिकता का बारीकी से विश्लेषण करने के बाद मुझे यह महसूस हुआ कि अधिकांश मामलों में दोनों में कोई विशेष अंतर नहीं। दोनों में ही कट्टरता और अन्धविश्वास को देखा जा सकता है। अपवाद भी दोनों में है ही।

नास्तिक धर्म को सारे अपराधों की जड़ मानते हैं और उन्हें लगता है कि धर्म के खत्म हो जाने से देश और दुनिया बेहतर बन जायेगी, लेकिन केवल एक नास्तिक शब्द के बल पर जो दुनिया बदलने चले हैं वे बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी में हैं। अगर उन्हें लगता है कि राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, हजरत मोहम्मद के उपदेशों को मिटा देने से; गीता, कुरान, बाइबिल सभी धर्म ग्रंथों को आग लगा देने से; धर्म शब्द को ही लोगों के जेहन से मिटा देने मात्र से समस्यायों का समाधान हो सकता है तो वे फिर से वही भूल दोहरा रहे हैं जो आस्तिकों ने इस रूप में की है कि सिर्फ ईश्वर की पूजा-पाठ कर लेने से, गंगा में डुबकी लगा लेने से, साधुओं का प्रवचन सुन आने से, मंदिरों या गरीबों में दान कर देने से, अपने-अपने धर्म का प्रसार करने से, निर्दोष पशुओं की बलि देने से और गाय को माता मान लेने से वे स्वर्ग या जन्नत में पहुँच जायेंगे, उनके सारे कष्ट दूर हो जायेंगे या उन्हें अपने गलत-सही हर तरह के स्वार्थ को सिद्ध करने का लाइसेंस मिल जाएगा। दोनों की विचारधारा में ज्यादा कुछ अंतर नहीं। क्योंकि सतही और फोरी तौर पर किये गए उपाय समाधान नहीं बन सकते। इलाज के लिए रुग्ण जड़ों को स्वस्थ जड़ों में रूपांतरित करना जरुरी है। उस कीड़े को मिटाना जरुरी है जिसे स्वार्थ और अज्ञानता कहा जा सकता है। क्योंकि किसी भी तरह के अपराध के मूल में स्वार्थ, अहंकार और अज्ञानता ही होती है, धर्म कहीं भी नहीं।

सबसे महत्वपूर्ण चीज यहाँ जो दोनों वर्गों द्वारा इग्नोर की जा रही है वह है मनुष्य का मन और उसका आदतन स्वभाव! जो न तो नाम मात्र का आस्तिक बन जाने से बदल सकता है और न ही नास्तिक बन जाने से। अधिकांश मामलों में आस्तिकता और नास्तिकता एक जिद और अहंकार से ज्यादा कुछ भी नहीं लगती। नास्तिकों की बातें पढ़ें तो नजर आएगा कि उनका एक मात्र उद्देश्य बस धर्म और ईश्वर को गरियाना भर ही रह गया है। जबकि अन्धानुकरण की प्रवृत्ति, शब्दों और प्रतीकों को पकड़ने की प्रवृत्ति सिर्फ धर्म और ईश्वर की मोहताज नहीं। यह पकड़ना मनुष्य का स्वभाव बन गया है, जो जीवन के कई क्षेत्रों में देखने को मिल सकता है। बल्कि कई नास्तिक खुद अपने जीवन का अवलोकन करेंगे तो वे खुद भी अपने आपको किसी न किसी चीज की गंभीर जकड़न में पायेंगे। बहुतों ने तो नास्तिक शब्द को ही पकड़ लिया है और यह पकड़ना ही तो अन्धानुकरण और अंध श्रद्धा है। बल्कि पकड़ जहाँ जितनी गहरी वहां हिंसा उतनी ही ज्यादा। आडम्बर, हिंसा, दिखावा, पाखण्ड मनुष्य के दिल और दिमाग में इस कदर रच बस गए हैं कि वह धर्म के क्षेत्र से निकल भी जाए तो अन्य रूपों में प्रकट होंगे लेकिन होंगे जरुर! अभी भी हो ही रहे हैं। हिटलर और स्टालिन दोनों से बेहतर इस बात के और क्या उदाहरण हो सकते हैं। एक आस्तिक था, दूसरा नास्तिक, लेकिन दोनों के तानाशाही कांडों में कोई अधिक अंतर नहीं। दुर्गा पूजा के विरोध में जब महिषासुर की पूजा होती है, राम के विरोध में जब रावण को पूजा जाता है, बीफ पार्टी के विरोध में जब पोर्क पार्टी या पोर्क पार्टी के विरोध में जब बीफ़ पार्टी होती है तो यह विश्वास और भी दृढ़ हो जाता है कि समस्या कहीं बाहर है ही नहीं। सारी समस्या तो भीतर ही है।

कुछ बातों को समझना यहाँ जरुरी है। अन्धविश्वास अपने पाँव क्यों पसारते हैं? एक पक्ष के स्वार्थ और दूसरे पक्ष के अज्ञान और आत्मविश्वास की कमी के कारण। जिस व्यक्ति को यह न पता हो कि विविध पदार्थों और धातुओं से वैज्ञानिक प्रक्रिया द्वारा निर्मित एक यंत्र सात समुद्र बात करने में भी सक्षम है, उसके लिए पहली बार ऐसे किसी यंत्र से रूबरू होना किसी चमत्कार के साक्षात्कार से ज्यादा कुछ हो भी कैसे सकता है? इसके अलावा मनुष्य का मन बहुत निशक्त है। दिन प्रतिदिन बढ़ती भौतिकवादी सुख-सुविधाओं ने लोगों के मन को इतना कमजोर बना दिया है कि छोटी से छोटी समस्या भी उन्हें पहाड़ जैसी बड़ी लगने लगती है। ऐसे में हमेशा वे अवलंब और सहारा ढूंढने की कोशिश करते हैं कि कोई उनकी समस्यायों का निराकरण कर दे। और जो लोग इन समस्यायों को भुनाने के लिए चमत्कारी दूकानें खोल कर बैठे हैं, वहां उन्हें उम्मीद की किरण नजर आती है इसलिए उनके यहाँ ग्राहकों की भीड़ बढ़ने लगती है और उनका व्यवसाय दिन दुगुनी, रात चोगुनी दर से फलने-फूलने लगता है।

स्वार्थ, अहंकार और अज्ञान केवल तथाकथित धर्म का मोहताज नहीं है। धर्म रहे न रहे स्वार्थ, अहंकार और अज्ञान तो तब तक रहेगा ही जब तक ज्ञान और शिक्षा का प्रसार नहीं होता, जब तक लोगों का मन प्रेम और करुणा से ओतप्रोत नहीं होता। दुनिया को हम अगर अच्छा बनते देखना चाहते हैं तो सबसे पहले जरुरत है संकीर्ण सोच से मुक्त एक खुले दिमाग की और सकारात्मक बातों के प्रसार की। ईश्वर है या नहीं यह चिंता का विषय नहीं है। चिंता का विषय है अज्ञान और स्वार्थ के वशीभूत अपनी कट्टर मान्यताओं को ओढ़े बढ़ती नफरत, हिंसा और मनमुटाव! जैसे ही हम दिमाग को खुला छोड़ेंगे और अपने मन, जीवन और आसपास के परिवेश पर विवेक पूर्वक सकारात्मक दृष्टि रखना शुरू करेंगे तो हमें कई नयी चीजें समझ आने लगेगी। विज्ञान, कारण-कार्य-परिणाम के एक ऐसे परिवेश का निर्माण करना बहुत जरुरी है जहाँ लोग मन से सशक्त, संवेदनशील, प्रेम और करुणा से भरे हो, जो अपने आप से दूर भागने की बजाय अपने भीतर झाँकने की हिम्मत कर सके और वहां अपनी समस्यायों के समाधान ढूंढ सकें। जहाँ लोग बाहर कुछ बदलने से पहले भीतर खुद को बदलने का साहस कर सकें। जहाँ लोग सच्चे अर्थों में आत्मनिर्भर बन सकें।

Monika Jain ‘पंछी’
(23/09/2015)

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September 4, 2015

Dr Sarvepalli Radhakrishnan Biography in Hindi

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन उन महान राजनेताओं में से एक थे जिन्हें अपनी संस्कृति एवं कला से लगाव होता है। वे एक आस्थावान हिन्दू थे, साथ ही अन्य समस्त धर्मावलम्बियों के प्रति भी गहरा आदर भाव रखते थे। जो लोग उनसे वैचारिक मतभेद रखते थे, वह उनकी बात भी बड़े सम्मान और धैर्य से सुनते थे।

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की दर्शनशास्त्र की अगाध विद्वता और अंग्रेजी भाषा पर बेमिसाल अधिकार को देखकर सभी चकित रह जाते थे। दर्शनशास्त्र भले ही शुष्क विषय है और कम लोग ही उसे समझ पाते हैं, परन्तु उनका विषय को उपस्थित करने का ढंग, प्रभावपूर्ण भाषा और उच्चारण से यही प्रतीत होता था कि इस व्यक्ति ने न जाने कितने वर्ष इंगलैंड के आक्सफोर्ड अथवा कैम्ब्रिज विश्वविघालय में शिक्षा पायी होगी। और एक दिन उनकी विद्वत्ता पर मुग्ध छात्रों ने पूछ ही लिया, ‘सर, आपने कौन-सी विदेशी परीक्षा पास की है, और कौन-सी डिग्री प्राप्त की है?’ प्रो. राधाकृष्णन् ने अपनी शैली में ही उत्तर दिया, ‘मैं इंगलैंड पढ़ने नहीं गया, हां पढ़ाने अवश्य जाऊंगा।’ उनका मुख-मण्डल आत्मविश्वास की अनोखी आभा से दमदमा रहा था और छात्र अपने प्रोफेसर की उक्ति से खुशी में उन्मत हो तालियां बजा रहे थे।

इतना कुछ पढ़ने के पश्चात डॉ. राधाकृष्णन के व्यक्तित्व के संबंध में उत्सुकता का जाग्रत होना स्वाभाविक है। इसका शमन नीचे किया जा रहा है :-

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म तिरूतनी में 5 सितम्बर, 1888 को, एक गरीब बाह्मण-परिवार में हुआ था। दक्षिणात्यों के लिए यह स्थान बहुत पहले से एक प्रसिद्ध तीर्थस्थल रहा है जो आज के चैन्नई शहर से 64 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित है।

डॉ. राधाकृष्णन के नाम के पूर्व सर्वपल्ली लगने का एक महत्वपूर्ण कारण है। 1852-55 के आसपास इनके पूर्वज सर्वपल्ली ग्राम से तिरूतनी तीर्थस्थल में आ बसे थे। उन लोगों ने अपने नामों के पूर्व अपनी जन्मभूमि का नाम संयुक्त रखना उचित समझा, जैसा कि दक्षिण में अक्सर होता है। इनके पिता का नाम सर्वपल्ली वीरास्वामी और माता का नाम सीताम्मा था। डॉ. राधाकृष्णन पांच भाई और एक बहन थे। भाईयों में इनका स्थान द्वितीय था।

गरीब ब्राह्मण-परिवार के होने के कारण तथा अपेक्षाकृत भाई-बहनों की बड़ी संख्या के फलस्वरूप् डॉ. राधाकृष्णन की आरम्भिक शिक्षा-दीक्षा तिरूतनी और देश के सर्वश्रेष्ठ तीर्थस्थल तिरूमाला अथवा तिरूपति में हुई। राधाकृष्णन आरम्भ से ही मेघावी थे। साथ ही परिश्रमी भी। तिरूतनी में अपने आरम्भिक जीवन के आठ वर्ष व्यतीत करने के पश्चात् ही वे विद्याध्ययन के लिए तिरूपति भेजे गए। उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर ही आर्थिक दृष्टि से असहाय पिता ने पारम्परिक धार्मिक शिक्षा देने के बदले उन्हें अंग्रेजी माध्यम से शिक्षित करने का निर्णय लिया।

राधाकृष्णन ने ‘लूथरन मिशन स्कूल’ तिरूपति में पांच वर्ष, वेल्लोर के एक प्रसिद्ध कॉलेज में पांच वर्ष तथा मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज में पांच वर्ष तक अध्ययन किया। बालक राधाकृष्णन के इस अध्ययन में केवल पिता का ही आर्थिक सहयोग नहीं था, राधाकृष्णन ने मात्र चौदह वर्ष की अवस्था अर्थात् 1902 में मद्रास विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में उच्च अंक प्राप्त कर मैट्रिकुलेशन की परीक्षा उर्त्तीण की थी।

स्कूली और महाविद्यालय की पुस्तकों के अतिरिक्त इन्होंने स्वाध्याय के द्वारा भी अपने ज्ञान में अभिवृद्धि की और उसी के बल पर राष्ट्र और विश्व के विशिष्टम विद्वानों में इनकी गिनती हुई। दर्शनशास्त्र में एम. ए. करने के फलस्वरूप इन्हें वेदों, उपनिषदों और गीता में पर्याप्त रूची थी, जिनका उन्होंने गहराई से अध्ययन किया। दूसरे धर्मों के प्रति भी इनकी रूचि थी। ईसाइयों का धर्मग्रन्थ बाईबल पूर्णतया कंठस्थ था।

डॉ. राधाकृष्णन की गांधीजी से पहली मुलकात 1938 में सेवाग्राम में हुई। वैसे वे इससे पहले ही गांधी जी के संपर्क में आ चुके थे। गांधीजी जब दक्षिण अफ्रीका से लौटे थे, तब मद्रास में श्री नटेसन के घर पर मुलाकात और दिलचस्प वार्तालाप भी हो चुका था। गांधी जी का उन दिनों मूंगफली पर जोर था और वह लोगों को दूध पीने से मना किया करते थे। वह कहा करते थे कि दूध गाय के मांस का ही अतिरक्ति उत्पादन है। यह बात युवा प्रोफेसर से भी हुई, राधाकृष्णन ने उत्तर दिया कि तब तो हमें मां का दूध भी नहीं पीना चाहिए। गांधी जी को पता था कि वह उन दिनों ‘लाजिक’ के प्रोफेसर थे। महात्मा गांधी के प्रति डॉ. राधाकृष्णन् की अगाध श्रद्धा थी। उन्होंने एक जगह उन्हें ‘मानव जाति का अमर स्वर’ बताया था और उन्हें मानवीय प्रयत्नों का सर्वश्रेष्ठ प्रतीक भी घोषित किया था।

डॉ. राधाकृष्णन को प्रायः सभी ने ‘शिक्षक’ कहा है। अतः उनका जन्म दिन 5 सितम्बर आज भी शिक्षक-दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है कि उन्होंने जीवन के चालीस वर्ष शिक्षा के क्षेत्र में बिताये, परन्तु वस्तुतः वह इतने प्रभावशाली व्यक्ति रहे कि उन्होंने शिक्षा, लेखन, व्यवस्था, राजनीति और शासन सभी क्षेत्रों में महान् छाप छोड़ी। यह ठीक है कि मूलरूप उनका शिक्षक का ही रहा हो, परन्तु लेखन और दर्शन शास्त्र के व्याख्याता के रूप को शिक्षक से पृथक नहीं किया जा सकता। वह शिक्षक से लेकर शिक्षण संस्थाओं के मूर्धन्य व्यवस्थापक-कुलपति तक रहे और सभी प्रकार के कार्यों को अपनी प्रतिभा से चमत्कृत करते रहे। एक प्रोफेसर के रूप में जहां उनका अपने विषय पर पूरा अधिकार था, वहां उनमें उसे प्रभावशाली भाषा में उपस्थित करने की भी महान दक्षता थी। उसके लिए उन्होंने कितना तप किया होगा, इसे कौन भुलाने को तैयार होगा। वह 12-12, 18-18 घंटे अध्ययन करते रहते थे। शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने जो कार्य किया वह भुलाया नहीं जा सकता।

ऑक्सफोर्ड विश्वविघालय में डॉ. साहब ने काफी समय तक अध्यापन कार्य किया था। इंग्लैंड के कई चर्चों में भी उन्होंने भाषण दिये थे। एक बार पोप ने डॉ. साहब को सम्मानित किया था। उनके भाषणों को सुनकर श्रोता मंत्रमुग्ध रह जाते थे। वस्तुतः उनके प्रवचनों की वास्तविक महत्ता उनके अन्तर में निवास करती थी, जिसकी व्याख्या नहीं की जा सकती। उनकी यही आध्यात्मिक शक्ति सबको प्रभावित करती थी।

डॉ. राधाकृष्णन बड़े हाजिर जवाब थे। विश्व में उन्हें हिन्दुत्व के परम विद्वान के रूप् में जाना जाता था। एक बार वे इंगलैंड गये, तब देश अंग्रेजों के आधीन था, बड़ी संख्या में लोग उनका भाषण सुनने आये थे। भोजन के दौरान एक अंग्रेज ने उनसे पूछा, ‘क्या हिन्दू नाम का कोई समाज है? कोई संस्कृति है? तुम कितने बिखरे हुए हो, तुम्हारे रंग एक जैसे नहीं है, कोई गोरा, कोई काला, कोई धोती पहनता है, कोई लुंगी, कोई कुर्ता तो कोई कमीज। देखो, हम अंग्रेज सब एक जैसे हैं, सब गोरे लाल-लाल।’ इस पर डॉ. राधाकृष्णन ने तपाक से जवाब दिया, ‘घोड़े सब अलग-अलग रंग-रूप के होते हैं, पर गधे सब एक जैसे होते हैं, अलग-अलग रंग और विविधता विकास के लक्षण हैं।’

सन् 1949 में डॉ. साहब को राजदूत बनाकर मास्को भेजा गया। इससे पहले भारत और महात्मा गांधी के सम्बन्ध में रूस की राय अच्छी नहीं थी। परन्तु डॉ. साहब ने वहां जाते ही अपनी प्रतिभा का सिक्का जमा दिया। एक घटना अत्यनत महत्वपूर्ण रही, जब डॉ. साहब प्रथम बार रूस के लौह पुरूष जैकब स्टालिन से मुलाकात करने पहुंचे, बातचीत के दौरान डॉ. साहब ने कहा, ‘हमारे देश में एक महान सम्राट हुआ है, उसने भीषण युद्ध और विजय के पश्चात अपनी तलवार तोड़ दी थी और अहिंसा का दामन थाम लिया था। आपने शक्ति अर्जित करने के लिए हिंसा का तरीका अपनाया है। किसी को क्या मालुम, हमारे उस महान सम्राट की वह घटना आपके यहां दोहरा दी जाये।’ स्टालिन ने मुस्कुराते हुए कहा ‘हां वास्तव में कभी-कभी ऐसे चमत्कार हो जाते हैं। मैं भी पांच वर्षों तक ब्रह्मज्ञान के शिक्षालय में रह चुका हूं।’

सन् 1952 में डॉ. राधाकृष्णन को भारत का उपराष्ट्रपति चुना गया। साथ ही दिल्ली विश्वविद्यालय का कुलपति, साहित्य अकादमी का उपाध्यक्ष भी बनाया गया। ये दायित्व भी उन्होंने बहुत कुशलता से निभाये।

डॉ. राधाकृष्णन ने 87 वर्ष की आयु प्राप्त की। वे सादा खाना खाने वाले अल्पभाषी व्यक्ति थे। जीवन के अंतिम वर्षों में सामान्य लोग भी इनसे सहजता से मिल लेते थे। एक ऐेसे ही भेंटकर्ता ने उनसे प्रश्न किया - ‘अपने दीर्घ जीवन का राज बताने की कृपा करेंगे?’ डॉ. राधाकृष्णन ने हल्की मुस्कराहट के साथ कहा- ‘कम खाओ।’

दुर्भाग्यवश डॉ. राधाकृष्णन के अंन्तिम कुछेक वर्ष बुरे बीते। कभी का अप्रतिम स्मरण-शक्ति वाला व्यक्ति जो अंग्रेजी और संस्कृत के उद्धरण देते नहीं थकता था, अपनी स्मरण-शक्ति पूर्णतया खो चुका था। उनकी यह दशा देखकर बहुत लोग व्यथित हुए, किन्तु नियति के सामने किसकी चलती है? अन्ततः भारत का यह महान सपूत 1975 के 17 अप्रैल की प्रातः बेला में अपनी प्राणवायु विसर्जित कर बैठा। सम्पूर्ण देश की जनता और अखिल विश्व के विद्वान शोक-सन्तप्त हो उठे।

भारत के इतिहास में कोई भी राष्ट्रपति अपनी राजनैतिक कुशलता, चातुर्य एवं अपनी बुद्धिमता के लिए याद किया जाएगा- किन्तु एक विश्वप्रसिद्ध दार्शनिक एवं बहुआयामी विद्वता के लिए किसी को स्मरण किया जाएगा तो वह होंगे भारत के द्वितीय राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन।

Mukesh Pandit
MotivationalStoriesinHindi.in
(लेखक के विचार उनके निजी विचार हैं।)

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September 3, 2015

Essay on Positive Thinking in Hindi

मैं इस तरह मरना नहीं चाहती

कुछ दिन पहले एक नन्हीं सी चिड़िया बाहर बनी सीढ़ियों के रास्ते में फंस गयी थी। छत का दरवाजा और रोशनदान सब खोल देने के बावजूद भी उसे काफी देर तक रास्ता नज़र नहीं आया और बड़ी देर तक वह चीं-चीं करती रही। उसके ये चीं-चीं के स्वर दिल को भेदने वाले थे। जब तक आवाज़ आती रही मन बेचैन रहा। किसी काम में मन नहीं लगा। फिर जब कुछ देर बाद आवाज़ आना बंद हुआ और जाकर देख लिया कि चिड़िया उड़ चुकी है तब जाकर तसल्ली हुई।

नीचे आकर कुछ पढ़ने बैठी तो अचानक ख़याल आया कि यह आवाज़ कितनी जानी पहचानी है। नन्हीं चिड़िया की यह आवाज़ बिल्कुल उस नन्हें बच्चे जैसी ही तो है जो माँ से दूर कहीं अपह्रत करके ले जाया गया हो, या बिल्कुल उस लड़की के जैसी जिसे रास्ते पर कुछ आवारा लड़कों ने घेर लिया हो, या बिल्कुल उस मुर्गे या बकरे जैसी जिसकी गर्दन पर बस कुछ ही देर में छुरी चलायी जाने वाली हो, या बिल्कुल उस वृद्धा जैसी जिसे घर के एक कोने में पटककर उसके मरने का इंतजार किया जा रहा हो। भय और मदद की पुकार की ये आवाजें हर रोज चारों ओर से तो उठती हैं, फिर हमें आजकल कुछ सुनाई क्यों नहीं देता? क्यों धीरे-धीरे हमारी संवेदनशीलता खत्म सी होती जा रही है। जब कारणों को टटोलने बैठी तो देखा एक बहुत बड़ा कारण खुद इन नकारात्मक ख़बरों का अतिप्रसार ही तो है जो धीरे-धीरे हमें संवेदना शून्य बना रहा है।

कुछ दिन पहले ही एक बड़ी अच्छी बात भी मालूम चली। अफ्रीका के समुदाय में जब भी कोई व्यक्ति कोई गलती या अपराध करता है तो उसे गाँव के बीचो-बीच ले जाया जाता है। गाँव के लोग उसे चारों ओर से घेर लेते हैं और उसे दो दिन तक उसके सभी अच्छे कामों के बारे में याद दिलाया जाता है, जो उसने अब तक किये हैं। बुराई के आवरण में उसके भीतर उपस्थित अच्छा इंसान जो कहीं खो गया है, यह उसे फिर से जगाने की कोशिश है।

पर हम अगर गौर करें तो पायेंगे कि आज न्यूज पेपर हो, चाहे न्यूज चैनल, सोशल साइट्स हो या कोई भी अन्य माध्यम...सब जगह नकारात्मकता बहुत ज्यादा परोसी जा रही है। सिर्फ समस्या, सिर्फ चिंताएं, सिर्फ शिकायतें ही शिकायतें...समाधान की बातें बहुत कम नज़र आती है। ऐसा लगता है जैसे दुनिया में अच्छाई और भलाई नाम की कोई चीज बची ही नहीं है। खून से लथपथ, बलात्कार, चोरी, रिश्वत, लूट, सांप्रदायिक दंगों और अश्लीलता से सनी ख़बरें दिन-रात हमारे चारों ओर हाहाकार मचाये रहती है। न इनके समाधानों पर ज्यादा चर्चा होती है और न ही उन अच्छी ख़बरों का ज्यादा प्रसार होता है, जहाँ किसी ने किसी के जीवन को बचाया हो या किसी ने अजनबी रहते हुए भी बुरे वक्त में किसी की मदद की हो, या जिसका पूरा जीवन ही मानवता को समर्पित रहा हो।

जबकि इसी दुनिया में ग्यारह साल की एक ऐसी बहन भी है जो अपने छह साल के भाई के बीमार होने पर उसे कंधे पर उठा अकेले आठ किलोमीटर दूर अस्पताल तक पहुंचाकर उसकी जान बचाती है। इसी दुनिया में रिटायर हो चुके एक ऐसे हेडमास्टर भी हैं जो रिटायर होने के बाद भी स्कूल जाकर बच्चों को मुफ्त में पढ़ाते हैं और पढ़ाने से पहले स्कूल परिसर का झाड़ू भी लगाते हैं। इसी दुनिया में एक ऐसे शिक्षक भी हैं जो सुबह उठकर अख़बार बांटने का काम इसलिए करते हैं ताकि स्कूल के बच्चों को गुणवत्ता युक्त मिड डे मील उपलब्ध करवा सकें और इसी दुनिया में ऐसे माता-पिता भी हैं जो अपनी छह साल की बेटी की मौत हो जाने पर भी अपना धैर्य खोये बिना उसकी आँखों को दान कर किसी की ज़िन्दगी रोशन करने का ज़ज्बा रखते हैं।

बहुत जरुरी है कि हम ज्यादा से ज्यादा अच्छी बातों का, अच्छे लोगों का, अच्छी घटनाओं का प्रसार करें। क्योंकि जो हम पढ़ते, सुनते और देखते हैं उसका हमारे व्यक्तित्व पर बहुत गहरा असर पड़ता है। जिस बात की जितनी ज्यादा चर्चा होती है उसकी उतनी ही गहरी जड़े पैठने लगती है। लगातार बुरी ख़बरों को सुनना हमें संवेदना शून्य, क्रूर और कठोर बनाता है। क्योंकि बुराई का प्रसार ज्यादा होता है तो व्यक्ति अपनी तुलना अक्सर निम्नतर से करने लगता है। इतने क्रूरता पूर्ण अपराधों की ख़बरें उसे हमेशा इस भ्रम में बनाये रखती है कि वह दूसरों से कम बुरा है, उसकी बुराईयाँ, उसकी गलतियाँ जायज हैं। और ऐसा सोचते-सोचते वह अधिक से अधिक बुराईयाँ संचित करने लगता है।

जब हर तरफ बुराई की ही चर्चा हो; हिंसा, बलात्कार, चोरी की ही बातें हों तो अपराध करते समय उसका डर और संवेदना बिल्कुल खत्म हो जायेगी क्योंकि उसे लगेगा कि सभी यही तो कर रहे हैं। दूसरी ओर अगर अच्छी बातों और अच्छाईयों की चर्चा ज्यादा हो तो व्यक्ति कोई भी हीन कार्य करते समय अपनी तुलना अन्य लोगों की अच्छाई से करेगा और इतना आसान नहीं होगा उसके लिए बुरा काम करना। क्योंकि अच्छाई की चर्चा, भलाई की चर्चा...अच्छाई की जड़ें मजबूत करती है।

इसलिए क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम नकारात्मक ख़बरों के प्रसार को थोड़ा कम करें। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम उनके समाधानों की चर्चा ज्यादा करें। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम अच्छी बातों की चर्चा ज्यादा करें। यह जरुरी है। हमारी संवेदना को बचाने के लिए बेहद जरुरी है। क्योंकि कोई अंतर नहीं एक इंसान के मर जाने में और उसकी संवेदना के मर जाने में। और मैं इस तरह मरना नहीं चाहती, बिल्कुल भी नहीं।

Monika Jain ‘पंछी’
(03/09/2015)

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August 25, 2015

Essay on Social (Society) Change in Hindi

बनों वह बदलाव, जो तुम देखना चाहते हो

लेखन कभी मेरा क्षेत्र नहीं था। आज से कुछ साल पहले जब लिखना शुरू किया तब किसी ने कहा, 'तुम्हारे शब्दों में दुनिया को बदलने की ताकत है।' कल फिर किसी ने कहा, 'काश! आप और आप जैसे लोग बच्चों के शिक्षक होते तो यह दुनिया कितनी सुन्दर होती।' ऐसी प्रतिक्रियाएं निश्चित रूप से अनमोल हैं। लेकिन एक चीज हम सब लोगों के लिए समझना बेहद जरुरी है। एक पाठक या एक लेखक की जिम्मेदारी बस यहीं खत्म नहीं हो जाती। बल्कि यहीं से जिम्मेदारियां शुरू होती हैं। माता-पिता और शिक्षक ये तीन लोग निसंदेह पूरी दुनिया को बेहतर बनाने की ताकत रखते हैं, लेकिन सबसे पहली जरुरत होती है खुद को बेहतर बनाना।

कुछ दिन पहले किसी ने कहा, ‘मुंशी प्रेमचंद का ‘हामिद’ दुनिया में कहीं नहीं मिलता।’ क्यों नहीं मिलता? क्योंकि हम हमेशा हामिद की तलाश में रहते हैं। हम कभी भी हामिद बनना नहीं चाहते। हम हमेशा सोचते हैं हमें कहीं कोई महावीर, बुद्ध या गांधी जैसा दिख जाए, लेकिन हम उनकी राह पर चलने की कोशिश कभी नहीं करेंगे। हम अक्सर अपनी अच्छाईयों की तुलना अपने से कमतर से करेंगे और खुद को बेहतर समझेंगे। लेकिन अगर तुलना करनी भी हो तो हमेशा आदर्श व्यक्तित्व से ही होनी चाहिए। अच्छाई को लेकर हमारी अपेक्षाएं हमेशा दूसरों से जुड़ी रहती हैं, लेकिन जिस दिन ये अपेक्षाएं खुद से जुड़ जायेंगी, उस दिन दुनिया खुद-ब-खुद अच्छी बन जायेगी।

हम भ्रष्टाचार रहित देश चाहते हैं, लेकिन अगर भ्रष्टाचार शब्द का सही अर्थ हमें मालूम होता तो हेलमेट को जानकर घर पर भूल आने के बाद चालान से बचने के लिए ट्रैफिक पुलिस को हम 50-100 को नोट न थमाते। हम हमेशा जगह-जगह गन्दगी फैली होने की शिकायत करते हैं, लेकिन अगर सफाई के मायने हमें पता होते तो प्रकृति को निहारने गए हम, अपने पेट को भरने के बाद बचे प्लास्टिक और पॉलीथिन के कचरे को प्रकृति की गोद में न छोड़ आते। हम अच्छी शिक्षा चाहते हैं लेकिन जब कुछ अच्छा पढ़ाया जा रहा होता है, तब भी हम ध्यान नहीं देते क्योंकि हम तो ट्युशन पढ़ने जाते हैं। हम न्याय देखना चाहते हैं, लेकिन अपने पारिवारिक और सामाजिक जीवन में हम न्याय के कितने समर्थक हैं, यह सोचना नहीं चाहते। हम सच का नहीं पैसे, प्रतिष्ठा और ताकत का समर्थन करते हैं। अपने स्वार्थ के खातिर वृद्ध माता-पिता को वृद्धाश्रम छोड़ आते हैं। अपनी बेटी के लिए जैसे ससुराल की कामना करते हैं, वैसा अपनी पत्नी या बहु को नहीं दे पाते। हमें अपनी माँ, बेटी और बहन की इज्जत बहुत प्यारी है, लेकिन दूसरों की बेटियों और बहनों को हम बुरी नजर से देखना नहीं छोड़ेंगे।

काल्पनिक कहानियों पर हमारे कीबोर्ड आंसुओं से भीग जाते हैं। खत्म हो चुकी असल दर्दनाक कहानियों पर भी हमारी पलकें भीग जाया करती है। लेकिन जो कहानियां जारी है...अपने दर्द, अपने संघर्ष, अपनी मजबूरियों के साथ...उनके सामने तो हम पत्थर को भी मात दे जाते हैं। कभी-कभी तो उस कहानी को भुगत रहे पात्र का सर फोड़ देने की हद तक...कैसे लोग हैं हम? आन्दोलन या क्रांति, ये शब्द कितने अच्छे लगते हैं न हमें! इनका हिस्सा बनकर कितना गर्व महसूस करते हैं हम! न सर्दी देखते हैं, न बारिश। समय की परवाह भी नहीं करते। लेकिन जब बीच सड़क कोई दर्द से कराहता मदद की गुहार लगा रहा होता है तब हम बहरे और अंधे बन जाते हैं। तब हम दुनिया के सबसे व्यस्त इंसान नजर आते हैं।

हमें बेहतर समाज चाहिए, बेहतर न्यायिक व्यवस्था चाहिए, बेहतर सरकार, बेहतर तंत्र, बेहतर शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ, सब कुछ बेहतर चाहिए। लेकिन बेहतरी का यह रास्ता अगर कहीं से शुरू होता है तो हमारे ही भीतर से। पर हम खुद को नहीं बदलना चाहते...तो फिर हम दोयम दर्जे के आत्मकेंद्रित और स्वार्थी इंसान किस मुंह से बदलाव और परिवर्तन की बातें करते हैं?

मुझे याद आते हैं कुछ लोग जो कपड़े समय पर न धुल पाने पर पसीने से तरबतर कपड़ों की सड़ांध से परेशान होकर डीयो या परफ्यूम छिड़ककर खुद को और कपड़ों को सुगन्धित बनाकर बेफिक्र हो जाते थे। बिल्कुल यही...बिल्कुल यही हम अपनी समस्यायों के साथ भी करते हैं। हम समाधान करते हैं और समस्याएं नित नए रूपों में उभरकर सामने आती है। हमें एक परेशानी से निजात नहीं मिलता कि दूसरी परेशानी सर उठाये खड़ी नजर आती है। हमने प्लेग को मात दी तो बर्ड फ्लू का खतरा पैदा हुआ, बर्ड फ्लू को हराया तो स्वाइन फ्लू ने आ झपटा। प्रदुषण, ग्लोबल वार्मिंग, गरीबी, बेरोजगारी, बलात्कार, चोरी, महंगाई...हमारे पास समस्यायों के भंडार हैं। समस्यायों पर ढेरों चर्चाएँ होती है, पर समाधान? क्या सच में हम समाधान ढूंढते हैं? हम सिर्फ सतही बातें करते हैं। हम जानते हुए भी यह स्वीकार नहीं करते कि दुनिया की अधिकांश समस्याएं वैचारिक प्रदूषण से उपजी है। और यही वैचारिक प्रदूषण नित नयी-नयी समस्यायों के रूप में हमारे सामने आता है। जब तक हम सबने अपने मन को शुद्ध करने के प्रयास शुरू नहीं करेंगे तब तक समस्यायों से मुक्ति एक दिवा स्वप्न है।

गरीब अमीर बन जायेंगे, अमीर गरीब बन जायेंगे; नौकर मालिक की जगह पा लेगा, मालिक नौकर की; सवर्ण दलित बन जायेंगे, दलित सवर्ण; महिलाएं पुरुष की जगह पा लेगी और पुरुष महिलाओं की...पर समानता या समाधान तब तक दिवा स्वप्न रहेगा, जब तक हमारे मन से मालकियत, नियंत्रण, अहंकार और स्वार्थ की अति खत्म नहीं होती, जब तक हम अपने मन का कचरा साफ़ नहीं करते, जब तक हम दूसरों के साथ वैसा व्यवहार नहीं करते जैसा हम खुद के साथ चाहते हैं। जब तक हम वह बदलाव नहीं बनते जो हम देखना चाहते हैं।

Monika Jain ‘पंछी’
(25/08/2015)

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August 14, 2015

Jainism (Jain) Santhara Sallekhana Essay in Hindi

जैन धर्म : संथारा व सल्लेखना प्रथा

हम सभी को बहुत जल्दबाजी मची रहती है चीजों को सही और गलत के तराजू में तौलने की, पर काश! काश सब कुछ इतना आसान होता। अगर सब कुछ इतना ही आसान होता तो तुरंत दुनिया के सारे कामों को सही और गलत के एक्सट्रीम्स पर श्रेणीबद्ध कर दिया जाता और फिर कोई विवाद ही नहीं रहता। पर चीजें सामान्तया द्वैत नहीं होती...अक्सर सही और गलत के बीच कहीं होती है, और फिर जितने भी दुनिया में प्राणी है उतने ही सही और गलत अलग से अस्तित्व में आ जाते हैं।

इन दिनों ओशो की 'महावीर वाणी' पढ़ रही हूँ। कल ही 'संथारे' पर रोक की ख़बर सुनी और शाम में ही यह किताब पढ़ते समय 'संथारे' का थोड़ा सा जिक्र आया। सबसे महत्वपूर्ण जो चीज होती है वह होते हैं भाव और दृष्टिकोण। 'आत्महत्या' को हम सामान्यता जिजीविषा का खत्म होना मानते हैं, पर वास्तविकता इससे परे है। आत्महत्या जिजीविषा का खत्म होना नहीं बल्कि कुछ विशेष शर्तों के साथ गहरी जिजीविषा का होना है, जिनके पूरा ना होने पर हम मृत्यु का मार्ग चुन लेते हैं, और यह निर्णय भी बस एक क्षण का आवेश होता है। अगर उस क्षण किसी ने रोक लिया होता तो आत्महत्या भी कोई नहीं करता। बल्कि आत्महत्या की तैयारी करते समय एक सांप आ जाए तब भी मरने को इच्छुक व्यक्ति भाग खड़ा होगा। क्योंकि गहरे में कहीं जीने की इच्छा प्रबल है। मतलब जहाँ-जहाँ मरने की इच्छा है वहां जीने की इच्छा निश्चित रूप से होगी, बस वह कंडीशनल होगी।

अब आते हैं 'संथारे' पर! अपने शुद्ध रूप में संथारा वह भाव है जहाँ ना जीने की इच्छा होती है और ना ही मरने की। इसके मूल में भी अहिंसा ही है, क्योंकि हमारी जीने की सारी इच्छा हिंसा पर खड़ी है। हर एक जीवन किसी ना किसी की मृत्यु पर ही संभव है। ऐसे में संथारा अपने आदर्श रूप में अहिंसा के उच्चतम भाव के अलावा और कुछ नहीं है। पल भर में डर कर खुद को खत्म कर लेना बहुत आसान काम है, लेकिन अन्न, जल का त्याग करते हुए 20-30-60-90 दिनों तक जीना किसी कायर या मृत्यु की इच्छा रखने वाले का काम नहीं हो सकता, वह भी तब जबकि हम जानते हैं कि हमारा मन क्षण-क्षण बदलता रहता है।

इसके अलावा जैन धर्म मुक्ति के लिए कर्मों की निर्जरा पर विश्वास करता है, जिसका मुख्य आधार अहिंसा है। अपने अंतिम समय में नए पाप कर्मों के बंध को रोकने के लिए संथारा लिया जाता है, ताकि अपनी सेवा के लिए किसी को कष्ट ना पहुँचाया जाए और आहार-विहार आदि से होने वाली हिंसा से भी बचा जा सके। ऐसे में संथारा आत्महत्या और इच्छामृत्यु दोनों से ही बिल्कुल अलग है।

कल किसी ने कहा कि संथारा एक प्राकृतिक मृत्यु नहीं है। संथारे का समर्थन या विरोध बाद में, उससे पहले एक सवाल मेरे दिमाग में घूम रहा है। हम जिस परिवेश में रह रहे हैं उसमें कौनसी मृत्यु प्राकृतिक है? एक शराबी जो रोज शराब पीता है उसकी? एक स्मोकर जो रोज सिगरेट पीता है उसकी? विकास के नाम पर जो करोड़ों टन धुआँ वायुमंडल में छोड़ा जाता है उसमें सांस लेने वालों की? कीटनाशकों और रसायनों के इंजेक्शन का प्रयोग करके जो पेड़ पौधे और पशु-पक्षी हम जबरन पैदा करवा रहे हैं उन्हें खाने वालों की? यहाँ तक की रोज चाय, दूध और कॉफ़ी में घोलकर पी जाने वाली शक्कर को भी धीमा जहर माना जाता है।...तो बात ऐसी है कि प्रत्यक्ष हो या अप्रत्यक्ष, होश में हो या बेहोशी में...हम सभी आत्महत्या और परहत्या करने के अलावा रोज कौनसा काम कर रहे हैं?

और कल्पना कीजिये कि अगर पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं के भी क़ानून लागू होने शुरू हो जाएँ तो आत्महत्या तो बहुत बाद की बात है, पहले तो परहत्या के मामलों की गिनती ही नामुमकिन हो जायेगी। बात गोलमोल घुमाने वाली नहीं है। बात ऐसी है कि वास्तव में ही सब कुछ गोलमोल ही है।...तो कम से कम जो इस गोलमोल से बिना किसी को कष्ट पहुंचाए, बिना कोई गलत सन्देश दिए मुक्त होना चाहते हैं, उनके बारे में सोच समझकर कुछ निर्णय लेना ही उचित होगा।

Monika Jain ‘पंछी’
(14/08/2015)

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August 5, 2015

Story of Parrot in Hindi

मुझे अच्छी लगती है उनकी आज़ादी

मुझे पशु-पक्षियों को हाथ में पकड़कर घुमाना या उन्हें पिंजरे में रखकर दिल बहलाना जरा भी नहीं पसंद। पर हाँ, मुझे अच्छा लगता है आकाश में ऊंचाइयों पर उड़ते हुए पंछियों को देखना। मुझे अच्छा लगता है जब अचानक कोई भेड़ या बकरियों का झुण्ड घर के बाहर से गुजरता है और उनमें से कुछ शरारती मेमने फुदककर कतार से बाहर निकल इधर-उधर दौड़ने लगते हैं। मुझे अच्छा लगता है जब छत पर सुबह रखा दाना और पानी अगली सुबह तक अनजाने दोस्तों द्वारा पूरा फिनिश कर दिया जाता है। मुझे अच्छा लगता है घर की सीढ़ियों पर बैठकर कुत्ते या उसके पिल्ले को रोटी के छोटे-छोटे टुकड़े करके खिलाना। कई बार जब रोटी एक हो और कैंडिडेट्स ज्यादा तो चुपके से सभी को इक्वल-इक्वल शेयर करके खिला देना मुझे अच्छा लगता है। तितलियों, तोते या किसी भी पक्षी को पकड़ने के इरादे से आये विलेन को देखकर उन्हें फुर्र से उड़ा देना मुझे अच्छा लगता है। मुझे अच्छी लगती है उनकी आज़ादी। बहुत अच्छी।

पर कुछ लोगों को जाने क्यों यह अच्छा नहीं लगता। बात कुछ सालों पहले की है। एक तोता शायद कहीं से किसी पिंजरे से उड़कर हमारे घर पर आ गया था। उसके थोड़े से कटे हुए पंखों और उसके हावभाव से यही लग रहा था कि वह एक पालतू तोता है। बिना किसी जान पहचान के भी खाना खाते समय थाली पर या मुझ पर आकर बैठ जाता। उसे तो डर नहीं लग रहा था पर उसके इतने अपनेपन से मैं डर जाती थी। :p हालाँकि निश्चिंत थी कि जैसे आया है वैसे ही चला भी जाएगा। पर एक दिन 2-3 घंटे के लिए बाहर क्या गयी, कुछ बच्चों को उस तोते की भनक लग गयी और मेरी अनुपस्थिति में वे उसे पकड़ने को आ गए। वह उड़कर भाग गया तो पूरे 2 घंटे उन बच्चों ने उसे पकड़ने के लिए एक पेड़ से दूसरे पेड़, दूसरे से तीसरे पर दौड़ाया। उस पर पत्थर फेंके सो अलग। उड़ने में वह शायद बहुत ज्यादा माहिर नहीं था इसलिए उनके पकड़ में आ गया और सामने रहने वाले पड़ोसी के बच्चों ने उसे पिंजरे में डाल दिया।

मेरे घर आने तक यह सब काण्ड हो चुका था। जब मुझे यह सब पता चला तो बहुत दुःख हुआ और बहुत गुस्सा भी आया। पता नहीं मैंने सही किया या नहीं, पर मैंने उस बच्चे से पिंजरे में पकड़ा तोता अपने घर पर दिखाने को लाने को कहा और उसे उस तोते को पिंजरे से बाहर निकालकर वही छोड़कर जाने के लिए मजबूर कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि पड़ोसी का मुंह फूल गया। उस पर उनका तर्क कि बच्चों ने 2 घंटे तक इतनी मेहनत की इसे पकड़ने की। पर इससे भी बुरी जो चीज हुई वह थी उस तोते के दिमाग में भयंकर वाले डर का बैठ जाना जो बच्चों ने उसके पीछे पड़-पड़कर, पत्थर फेंक-फेंक कर उसके दिल और दिमाग में बैठा दिया था। उस दिन के बाद तोता बस कमरे में एक जगह बैठ गया और कभी अपनी जगह से हिला तक नहीं। कुछ खाने को दिया जाता तो नहीं खाता। किसी की भी आहट होती या पड़ोस के वही बच्चे उसे देखने के लिए कभी आ जाते तो वह बहुत बुरी तरह से सहम जाता। 1-2 दिन ऐसे ही निकल गए।

मैंने बहुत कोशिश की उसे सहज माहौल देने की पर फिर वह तोता मैंने कभी नहीं देखा जो बिना किसी डर के खाने की थाली में आ बैठता था, जो पूरे दिन घर में इधर से उधर उड़ता फिरता था। हाँ, आखिरी दिन वह कमरे से बाहर खुले चोक में आया था पर फिर पता नहीं कब वह उड़ कर घर से बाहर चला गया। जिन्दा रहा होगा या नहीं यह तो नहीं पता लेकिन मुझे यही लगता है कि किसी के मनोरंजन के लिए कैदी बनने से कई बेहतर होगी उसके लिए उसकी आज़ादी वाली मौत।

Monika Jain ‘पंछी’
(05/08/2015)

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July 16, 2015

Essay on Selfie Addiction in Hindi

Essay on Selfie Addiction in Hindi
यह सेल्फी संक्रमित युग है 
(ललकार टुडे में प्रकाशित)

प्रकृति की अनमोल धरोहर को समेटे दूर तक फैले उस हरी मखमली दूब वाले मैदान और बादलों की श्वेत-श्याम नदी को बहाते उस नील परी के आसमान से बेखबर जब सब लोग अपनी-अपनी सेल्फी लेने में व्यस्त थे तो दूर एक झील के किनारे उगे रंग-बिरंगे फूलों से मैं बातें कर रही थी। फूलों को देखकर मैं और मुझे देखकर फूल चहक रहे थे। तभी एक फूल ने कहा, ‘कितना समय हो गया, कितने दिन बीत गए, कितना अच्छा लग रहा है कि इतने दिनों बाद कोई हमसे मिलने आया है।’ और उसके स्वर को निरंतरता देते हुए एक दूसरे फूल ने कहा, ‘यूँ तो यहाँ बहुत भीड़ देखी है हमने। हम पर गिरते-पड़ते झील के किनारे खड़े होकर ये लोग हाथ में जाने क्या लेकर घंटों बटन दबाते रहते हैं। पर आज कितने दिनों बाद किसी ने आकर सहलाया है हमें और बिखेरी है एक चिर परिचित मुस्कान जो अक्सर खो जाती है यहाँ आये पर्यटकों के शोर शराबे, प्रदूषण और खींचातानी के बीच।’ तभी एक तीसरा फूल लहराकर मेरे गालों को छू गया। मेरी आँख खुली और मैंने देखा यह तो एक सपना था।

थोड़े विस्मय से भरी मैं, नींद से जागकर, फ्रेश होकर, लेमन टी की चुस्कियों के साथ जैसे ही अख़बार हाथ में थामती हूँ तो पन्ने पलटते-पलटते नजर पड़ती है एक ख़बर पर : रूस में सिखाये जा रहे हैं सेफ सेल्फी लेने के तरीके। इस ख़बर को पढ़ने के बाद सबसे पहला विचार मन-मस्तिष्क में यही कौंधता है कि हम इंसान प्रकृति के समस्त प्राणियों में से सबसे बेजोड़ नमूने इस मामले में भी हैं कि पहले तो हम लगाते हैं आग और फिर खोदते हैं कुआँ, और इसी विचार के साथ एक विचारों की श्रृंखला दौड़ पड़ती है।

बीते कुछ दिनों की बात है। सऊदी अरब में एक किशोर ने अपने दादा के शव के साथ शरारती मुस्कान और जीभ को बाहर निकालते हुए ‘अलविदा दादा’ कैप्शन के साथ एक सेल्फी पोस्ट की। असंवेदनशीलता की उपज यह मुस्कान सेल्फी पोस्ट कर लाइक पाने के क्रेज का एक उदाहरण मात्र है। ऐसे ना जाने कितने उदाहरण आजकल सुर्ख़ियों में बने हुए हैं।

पाकिस्तान की मशहूर गायिका कोमल रिजवी को ही लिया जाए। एक ओर 90 वर्ष के जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता अब्दुल सत्तार एधी गंभीर हालत में बिस्तर पर लेते हुए हैं, और दूसरी ओर कोमल रिजवी हँसते हुए उनके साथ सेल्फी लेकर फेसबुक पर पोस्ट कर रही हैं।

यह सब तो कुछ भी नहीं, सेल्फी का फीवर कुछ ऐसा चढ़ा है कि कई लोगों की सेल्फी उनके जीवन का आखिरी क्लिक बनकर रह गयी।

ऑस्कर ओटेरो एगुइलर नाम का एक व्यक्ति अपनी एक ख़ास सेल्फी लेकर सोशल मीडिया पर अपने दोस्तों को इम्प्रेस करना चाहता था। इसके चलते उसने एक गन अपने सर पर तानी और सेल्फी लेने लगा। लेकिन सेल्फी लेने के दौरान गलती से गन का ट्रिगर दब गया और मौके पर ही उसकी मौत हो गयी।

इसी तरह पुर्तगाल में एक दंपत्ति ऊंची चट्टान के ऊपर जाकर, बैरियर को लांघकर समुद्र के साथ आकर्षक सेल्फी लेने के चक्कर में उल्टे सर फिसले और सीधे चट्टान से समुद्र में समा गए। अपने पीछे वे दो मासूमों को छोड़ गए।

हैदराबाद से मनाली घूमने गए इंजीनियरिंग के उन 25-30 छात्रों को हम कैसे भूल सकते हैं जो व्यास नदी की लहरों से अनजान सेल्फीज और फोटोज क्लिक करने में इतने मस्त और मग्न थे कि कब लहरें उन्हें बहाकर ले गयी पता भी न चला।

सेल्फी लेते समय ध्यान भटक जाने के चलते विमान हादसे और कार एक्सीडेंट जैसी घटनाएँ भी अंजाम लेने लगी है। कुछ ख़ास क्षणों को कैद करना हुनर होता है, यादों को संजोने के लिए जरुरी भी। पर इतना तो ख़याल हो कि कहीं यादों के एल्बम सजाने के चक्कर में हम खुद ही उस एल्बम की एक याद बनकर ना रह जाएँ।

ऐसी ही घटनाओं के चलते रूस में सेल्फी प्रेमियों के लिए एक गाइडलाइन तैयार की गयी है जिसमें ब्रोशर, वीडियो और वेब कैंपेन के जरिये तेज रफ्तार ट्रेन, पहाड़ों के किनारे, बन्दूक और खतरनाक जानवरो के साथ सेल्फी ना लेने के लिए आगाह किया गया है। सेल्फी स्टिक से हो सकने वाली दुर्घटनाओं की आशंका के चलते विंबलडन टेनिस टूर्नामेंट के दौरान, कई फुटबॉल क्लबों, नेशनल गैलरी, द ऑल इंग्लैंड टेनिस एंड क्रिकेट क्लब आदि में सेल्फी स्टिक के प्रयोग पर पाबंदी है। डिज्नी ने दुनिया भर में अपने थीम पार्कों में सुरक्षा के चलते सेल्फी स्टिक के प्रयोग पर रोक लगा दी है। लेकिन कहाँ-कहाँ और कैसे-कैसे रोक लगायी जायेगी। आजकल टूरिज्म सिर्फ टूरिज्म नहीं सेल्फी टूरिज्म बनकर रह गया है। बल्कि टूरिज्म क्या अब तो लगभग हर घटना के आगे या पीछे सेल्फी शब्द जोड़ा जा सकता है : भूकम्प सेल्फी, ज्वालामुखी सेल्फी, शमशान सेल्फी, बाथरूम सेल्फी और भी पता नहीं कौन-कौन सी सेल्फी।

सेल्फी का क्रेज नेता, अभिनेता, युवाओं-युवतियों सब पर सर चढ़कर बोल रहा है। वो दिन गए जब सेलिब्रिटीज के ऑटोग्राफ लिए जाते थे। आजकल प्रशंसक अपने स्टार्स को अपने साथ ली गयी सेल्फी में संजो कर रखना चाहते हैं। पर यह सेल्फी मेनिया सेलिब्रिटीज के लिए समस्या भी खड़ी कर रहा है। बीते दिनों युवा ब्रिटिश गायक ज्यान मलिक ने पॉप बैंड ‘वन डायरेक्शन’ को छोड़ने का ऐलान यह कहकर किया कि वे सेल्फी कल्चर के शिकार हुए हैं। कुछ मौकापरस्त लड़कियों ने उनके साथ ली गयी सेल्फीज के आधार पर अफवाहें फैलाई जिसके चलते वे तनाव ग्रस्त हो गए।

सेल्फी के प्रति बढ़ती दीवानगी कई मनोरोगों को आमंत्रित कर रही है। अमेरिका के ओहियो यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिकों के 800 पुरुषों पर अध्ययन के अनुसार वे पुरुष जो घंटों फोटोशॉप पर एडिटिंग के बाद बहुत ज्यादा सेल्फी पोस्ट करते हैं, ऐसे लोग आत्ममुग्धता के शिकार होते हैं। उनमें स्वार्थ की अधिकता और संवेदनशीलता जैसे गुणों का अभाव होता है। उन्हें गुस्सा भी जल्दी आता है। वे अपने शरीर का एक वस्तु की तरह प्रदर्शन करते हैं, जो कि एक यौन विकृति है। महिलाओं को ऐसे पुरुषों से गंभीर रिश्ते बनाने से बचना चाहिए।

वहीँ एक सर्वे जो 16-25 वर्ष की 2000 युवतियों पर किया गया, जिसके अनुसार युवतियाँ दिन में कम से कम 48 मिनट और सप्ताह में 5-6 घंटे सेल्फी लेने में गुजार देती है। सर्वे में शामिल हर 10 में से एक लड़की के कंप्यूटर या स्मार्ट फ़ोन में स्नानघर, कार और कार्यालय में ली गयी लगभग 150 तस्वीरें पायी गयी। लाइक और कमेंट पाने का जूनून इस कदर हावी है कि कई युवतियाँ अपनी बॉडी इमेज को लेकर बहुत ज्यादा कोंशस होने के चलते ईटिंग डिसऑर्डर का शिकार हो रही है।

अमेरिकी साइकियाट्रिक ऐसोसिएशन की एक रिपोर्ट के अनुसार ‘सेल्फी’ को ‘आब्सेसिव कम्पलसिव डिजायर’ से जोड़ा गया है, जिसमें व्यक्ति अपनी तस्वीरें खींचना और शेयर करने का आदी हो जाता है। यह लत आत्मविश्वास को कमजोर करती है और नकारात्मकता को बढ़ावा देती है।

हालांकि हर चीज के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलु होते हैं। सेल्फी का उपयोग कई सामाजिक आन्दोलनों को सक्रीय बनाने में भी किया जा रहा है। कुछ ही समय पहले ब्रिटेन में कैंसर रोगियों की मदद के लिए कैंसर रिसर्च यूके चैरिटी ने ‘नो मेकअप सेल्फी फॉर कैंसर अवेयरनेस’ नामक एक अभियान चलाया। इस अभियान के जरिये कैंसर रोगियों के लिए करोड़ों रुपयों की मदद जुटाई गयी। इसी तरह का ‘पिंक सेल्फी अभियान’ ओगां कैंसर फाउंडेशन और एले ब्रेस्ट कैंसर कैंपेन की पहल पर बॉलीवुड हस्तियों और फैशन डिज़ाइनर्स की मदद से स्तन कैंसर के प्रति जागरूकता फ़ैलाने के उद्देश्य से चलाया गया। हमारे देश में चल रहे सेल्फी विथ डॉटर अभियान से हम सब परिचित ही हैं। इसी तरह 5 सितम्बर, 2014 से ही आगाज हुआ ग्लोबल ह्यूमनराइट समूह का ‘सेल्फीज4स्कूल’ अभियान जिसके तहत सेल्फीज पोस्ट कर लड़कियों को स्कूल भेजने का बीड़ा उठाया गया है।

ये सब सकारात्मक पहलु हैं लेकिन जब सामाजिक सरोकारों से इतर यह सेल्फी क्रेज स्टेटस सिंबल बनकर हर पीढ़ी के लोगों पर हावी होता हुआ नजर आता है तो चिंता होना स्वाभाविक है। सेल्फी शब्द सिर्फ ऑक्सफ़ोर्ड ‘वर्ड ऑफ़ द इयर 2013’ ही नहीं बना बल्कि यह सोते-जागते, उठते-बैठते, खाते-पीते, नहाते-गाते हर घटना, हर पल के साथ जुड़ता चला जा रहा है। जिसके घातक परिणाम हम ऊपर देख चुके हैं। नकारात्मकता, आत्मविश्वास की कमी, अकेलापन, दिखावा, क्रोध, चिड़चिड़ाहट, तनाव, आत्महत्या यह सब सेल्फी युग की सौगाते हैं जो हम पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित करने वाले हैं। क्योंकि हम कुआँ तो तभी खोदेंगे जब आग लगेगी और वह भी सिर्फ फोरी तौर पर।

Monika Jain ‘पंछी’
(16/07/2015)

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July 9, 2015

Poem on World Population Day in Hindi


जनसँख्या सिर्फ संख्या तो नहीं

कौन कहता है
दुनिया की जनसंख्या सात अरब है
मुझे तो लगती यह सात सौ अरब है।

हर आदमी के होते हैं
कई चेहरे, कई रूप
छाँव के रंग बदल जाते हैं
जब आती है कड़ी धूप।

एक संत के चेहरे में
छिपा रहता है शैतान
त्यागी जिसे कहता है जग
आसमां छूता है उसका गुमान।

बिजली से कड़कते हैं
जो बन शब्दों के जाल
हकीकत में खामोश कर देता है उन्हें
किसी का डर तो किसी का माल।

जिसके चेहरे पर मुस्कुराहट, सौम्यता
और विनम्रता का निर्झर बहता है
उसके हाथों में कहीं छिपा
एक खूनी खंजर रहता है।

सच के साथ खड़े होकर
करते हैं जो संपादक झूठ का पर्दाफाश
उनकी नजरों से सुरक्षित है एक औरत
नहीं कर सकते इसका भी विश्वास।

मंदिर में जाकर
चन्दन का जिसने टीका लगाया होगा
नहीं जान सकता कोई
उसके मन में कितना मैल समाया होगा।

सत्य, अहिंसा, मुक्ति पर
जो देता है हर रोज गुरु ज्ञान
कितने अपराधों में होगा संलग्न
नहीं लगा सकते इसका भी अनुमान।

समाज सेवा की आड़ में
सेक्स स्कैंडल जैसे घृणित कार्यों को अंजाम
अहिंसा का मुखौटा लगाकर भी
होता है यहाँ कत्ले आम।

छद्म नारीवादियों के रूप में
जन्मे हैं नारी के नए शोषक
लिखते हैं जो प्रेम शास्त्र
उनमें से कई मिलेंगे नफरत के पोषक।

कायरों ने ओढ़ी शेरों की खाल
सन्यासी हो रहे मालामाल हैं
सच्चा आदमी पहचानना है मुश्किल
हर ओर मकड़ी के जाल हैं।

चिंता जनसंख्या से ज्यादा मुझे
एक आदमी में छिपे सौ चेहरों की है
किसी मासूम को अपना निशाना बनाये
खौफ़नाक पहरो की है।

देर-सबेर बढ़ती जनसंख्या पर
लगाम लग भी जायेगी
पर मुखौटे बदलने की यह प्रवृत्ति
तो दिनों-दिन बढ़ती ही जायेगी।

जनसँख्या नियंत्रण के साथ ही हो नियंत्रण
एक जन में छिपे दुर्जन इरादों पर भी
प्यार की झूठी कसमों पर
और नेता के झूठे वादों पर भी।

क्योंकि समस्याएं मात्रात्मक से ज्यादा
अब गुणात्मक हो रही है
दिखते हैं यहाँ शरीर ही शरीर
आत्माएं सबकी कहीं खो रही है।

Monika Jain ‘पंछी’
(09/07/2015)

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July 8, 2015

Save Animals, Birds, Insects Stories in Hindi

(1)

बुद्धू कहीं का

26/12/2016 - इस भरी दुनिया में अकेला हुआ बिन माँ का एक नन्हा सा बछड़ा जो अपने तथाकथित मालिक के घर से बाहर निकाल दिया गया है, रोज मेरे घर के सामने आता है। यूँ मैं सभी पशु-पक्षियों को बस उनकी ज़रूरतों और सुरक्षा का ख़याल रखती ज्यादातर बिना स्पर्श का ही प्रेम करती हूँ। लेकिन रोटी के छोटे-छोटे टुकड़े कर उसे खिलाते हुए ...एक दिन उस पर बहुत प्यार आया। मन तो किया कि इसे गोदी में बैठाकर लोरी ही सुना दूँ, लेकिन फिर अपनी गोदी की छोटी सी साइज और उस नन्हें की बड़ी सी साइज देखकर अपनी भावनाओं से कहा - कण्ट्रोल...कण्ट्रोल! फिर उसके नजदीक जाकर उसके सर और गालों को सहलाने लगी, पर वह ठिठककर दूर जा खड़ा हुआ। तब उसकी बची हुई रोटी देखकर मैंने अपनी भावनाओं की इस अभिव्यक्ति को भी विराम दिया और थोड़ी दूर जाकर उसे वापस बुलाया। सहमा सा धीरे-धीरे वह आया और फिर अपनी रोटी खाने लगा।

प्रेम तो दृष्टि और ह्रदय में होता है और जन्म से ही माँ के स्पर्श से भी वंचित अभी उसे प्रेम के स्पर्श को पहचानने और भरोसा करने में समय लगेगा सो अब उसके ज्यादा पास नहीं जाती। और फिर भूखे पेट का पहला प्रेम और भरोसा तो रोटी ही रहेगा। खैर! धीरे-धीरे उसका भय कम हो रहा है। पास रहने पर कुछ-कुछ डरने वाला वह नन्हा जैसे ही मुख्य द्वार बंद कर घर के अन्दर चली जाती हूँ तो बड़ी निर्भयता से सीढियां चढ़कर दरवाजे के पास आकर झाँकने लगता है। दूर जाने पर पास आता है...बुद्धू कहीं का। :)

Note : 6 महीने बाद का नया अपडेट यह है कि तस्वीर अब पूरी तरह से बदल चुकी है। अब तो गेट खुलने की आवाज़ आते ही या नज़र पड़ते ही दूर खड़ा हो तो इतना तेज दौड़कर आता है कि क्या कहें। और तो और अब तो इतना निर्भय बन गया है कि एक दिन प्यार-तकरार में मुझे ही सींग दिखा रहा था। :D

(2)

प्रेम की कमी...

01/10/2016 - आजकल आसपास चल रहे व्यक्ति को दूर से ही आगाह कर देती हूँ कि यहाँ एक कीड़ा चल रहा है, इस पर पाँव नहीं रख देना। क्योंकि कभी-कभी ऐसा होता है कि कुछ काम करते समय या पढ़ते समय किसी कीड़े/मकोड़े को आसपास चलता हुआ देखती हूँ और कोई भी व्यक्ति आसपास चल रहा होता है तो मन में एक अंदेशा हो जाता है उस पर आये ख़तरे को लेकर। जब निश्चिन्त हो जाती हूँ कि चल रहा व्यक्ति इधर नहीं आ रहा है तो फिर अपने काम में लग जाती हूँ। लेकिन कुछ ही देर बाद मेरी आशंका सच सिद्ध हो जाती है। एकदम वह व्यक्ति वहां से गुजर जाता है और अनजाने में उस कीड़े/मकोड़े को कुचलकर चला जाता है।

कुछ दिनों पहले भी तो ऐसा ही हुआ था। वह दिवाली की सफाई में व्यस्त थी। छत पर बने कमरे से बाहर वाश बेसिन के ऊपर वाली ताक में चिड़िया कई दिनों से घोंसला डालने में जुटी थी। आज जब वह सफाई करने को आई तो उस घोंसले को उठाकर बाहर डालने लगी। चिड़िया आसपास कहीं नहीं थी लेकिन अचानक मुझे ख़याल आया - क्या पता इसमें अंडे हों तो मैं भीतर से टेबल ले लायी। उसने टेबल पर चढ़कर देखा तो उसे कोई अंडा नजर नहीं आया। पर घोंसला लगभग पूरा तैयार था तो मैंने कहा, ‘हम अगर इसे फेंक देंगे तो चिड़िया फिर अंडा कहाँ देगी? और इतनी जल्दी घोंसला कैसे बनाएगी? और फिर थोड़े ही दिनों की तो बात है।’ यूँ वह जीवों के प्रति संवेदनशील है, लेकिन कचरे की समस्या तो सफाई करने वाला ही जानता है, इसलिए हमेशा संवेदना को बरक़रार भी नहीं रखा जा सकता। उसने एक पल सोचा और फिर कहा, ‘और भी तो बहुत सी जगह हैं बनाने के लिए।’ और ऐसा कहकर उसने घोंसला उठा लिया।

कुछ ही देर बाद एक छोटा सा अंडा लुढ़ककर नीचे आ गिरा और फूट गया। वह अचंभित हुई। अंडा उसे दिखा नहीं था और किसी छेद से निकलकर शायद फर्श पर पहले से पड़ा था या उठाने के दौरान चला गया था। उसे इस जीव हत्या पर बहुत पछतावा हो रहा था। पता नहीं क्यों उस दिन मुझे उस फूटे हुए अंडे को देखकर तो कोई विचलन या दुःख नहीं हुआ। मुझे उसकी मृत्यु स्वीकार्य थी पर भीतर आकर बस यही ख़याल आया कि अभी मेरे भीतर का प्रेम बहुत कम है, वरना वह उस जीवन को बचा पाने में जरुर सफल होता।

(3)

मासूम आ गया

25/08/2015 - कुछ दिन पहले कुछ बच्चों के साथ छत पर बैठी थी, तभी अचानक कोई मकोड़ा आया और किसी के पैर के नीचे आकर घायल हो गया। मेरे मुंह से बरबस निकला, 'अरे! मकोड़ा मर गया।’ वह बच्ची बोली, 'इसे क्या जरुरत थी बीच में आने की।' तब मैंने कहा, 'वह मासूम है, उसे क्या पता कि कहाँ उसकी जान को खतरा है। इसलिए ख़याल तो हमें ही रखना होगा।' वह दिन है और आज का दिन अब जिसे भी मकोड़ा दिखता है वह बोलता/बोलती है, 'मासूम आ गया, मासूम आ गया' और यह कहते हुए पास आने पर सब उसे बचाने की जुगत में लग जाते हैं या सेफ प्लेस पर छोड़कर आ जाते हैं। :)

(4)

प्रेम : एक सर्वव्यापी भाषा

08/07/2015 - घर में मेरी सबसे फेवरेट जगह होती है छत। कुछ दिन पहले छत पे ही खड़ी थी तभी पास ही के एक खाली प्लाट से नेवलों का एक प्यारा सा जोड़ा एक के पीछे एक गुजर रहा था। पीछे वाले को जाने कैसे इतनी ऊपर मैं नजर आ गयी। वह सर ऊंचा कर मुझे देखने लगा/लगी। थोड़ी दूर चलता...फिर मुंह ऊपर करके देखता, फिर कुछ दूर चलता फिर ऊपर देखता। अब आगे बढ़ चुका था, तब भी उसका पीछे मुड़कर और सर ऊंचा कर देखना जारी रहा। ऐसे ही आज नीचे एक गाय का बछड़ा खड़ा था। वह भी सर ऊपर करके लगातार 10 मिनट तक बड़ी क्यूरोसिटी से देखता रहा। मैंने प्यार से पलके झपकाई इस तरह ^_^ तो बदले में उसने भी झपका दी। :) उस दिन भी और आज भी मेरा इतना मन हुआ उनसे बात करने का। बार-बार यही सोच रही थी काश! मुझे उनकी या उन्हें मेरी भाषा समझ में आती तो कितनी सारी बातें करते हम लोग। लेकिन दुनिया में एक भाषा और भी तो होती है ~ प्रेम की भाषा, जो कि सर्वव्यापी है। जिसके आगे सारे शब्द बोने हो जाते हैं। :)

Monika Jain ‘पंछी’

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July 5, 2015

Story of Diwali (Without Firecrackers) in Hindi

Story of Diwali in Hindi
Story of Deepavali in Hindi for Kids
 Moral Story on Diwali in Hindi
 Story of Diwali (Without Firecrackers) in Hindi
रोशनपुर की पहली दिवाली 
(बालहंस में प्रकाशित)

दिवाली के कुछ ही दिन बचे थे। हमारे छोटे से कस्बे में सफाई का काम जोरों पर था। कुछ ही दिनों में बच्चों के स्कूल की भी छुट्टियाँ होने वाली थी। रत्ना जो पड़ोस के घरों में झाड़ू-पोचे करती थी, उसी की मदद से मैं भी दिवाली की सफाई में जुटी हुई थी। बच्चों में हमेशा की तरह खासा उत्साह था दिवाली को लेकर। कभी दिवाली पर बनने वाली मिठाईयों की प्लानिंग होती, तो कभी घर के भीतरी और बाहरी डेकोरेशन की, तो कभी इस बार कौन-कौन से और कितने पटाखे छुडायेंगे इसकी।

रत्ना आज अपनी 7-8 साल की बच्ची को भी साथ लेकर आई थी, पर उसने उसे सफाई वाले कमरे में आने से मना कर दिया और बाहर बरामदे में ही बैठकर खेलने के लिए कहा। बच्ची बाहर ही खेलने लगी। मैंने रत्ना से पूछा, ‘अंदर क्यों नहीं आने दिया?’ तो उसने कहा, ‘दीदीजी, उसे दमा है। धूल-मिट्टी उड़ती है तो बहुत खाँसी चलने लगती है। उसे साथ लेकर भी ना आ रही थी पर वह जिद करने लगी तो लाना पड़ा।’

रत्ना के यह कहते-कहते ही उसकी बेटी खेलते-खेलते अचानक सफाई वाले कमरे में आ गयी और उसे खांसी चलने लगी। रत्ना को आश्वस्त कर मैं उसे अपने साथ ऊपर वाले कमरे में ले आई। उसे बिस्तर पर बैठाया, पानी पिलाया और फिर उससे बातें करने लगी। तभी मेरे बच्चे श्रुति और श्रेय भी दौड़े-दौड़े वहां आ गए।

श्रुति ने रत्ना की बेटी से पूछा, ‘क्या नाम है तुम्हारा?’

‘कोमल’, वह धीरे से बोली।

थी भी वह एकदम प्यारी और कोमल सी। मैं उसका ध्यान रखने की हिदायत देकर उसे बच्चों के साथ छोड़कर नीचे आ गयी और सफाई का काम देखने लगी।

जब कमरे की सफाई पूरी हो गयी तो रत्ना ने कोमल को आवाज़ लगाई। आज रसोई में भुट्टे सिक रहे थे। मैंने रत्ना को भी कुछ भुट्टे खाने को दिये। उसे अभी और भी घरों में सफाई के लिए जाना था सो मैंने कहा, ‘यही बैठकर खा लो दोनों। फिर तो ठंडे हो जायेंगे।’

रत्ना और कोमल दोनों बरामदे में दीवार के सहारे बैठ गए और भुट्टे खाने लगे। तभी कोमल ने रत्ना से पूछा, ‘माँ, दिवाली के लिए सब इतनी साफ-सफाई क्यों करवाते हैं? कित्ती खांसी चलती है मुझ।’

रत्ना ने उसे इशारे से चुपचाप भुट्टे खाने को कहा।

मैंने रत्ना से कहा, ‘अरे! इसे चुप क्यों करवा रही हो। ऐसे बच्चों के सवालों को टाला नहीं करते।’ ‘कोमल बेटा, क्या पूछना है तुम्हें मुझसे पूछो।’ मैंने कोमल के पास जाकर कहा।

कोमल संकोचवश चुप रही तो मैंने ही उसे बताना शुरू किया, ‘बेटा, सफाई करना बहुत जरुरी है। सफाई रहेगी तो हम कई बीमारियों से बचकर रहेंगे। बल्कि साफ़-सफाई होने के बाद तुझे भी बहुत अच्छा महसूस होगा। हाँ, बस जब सफाई हो रही हो और कहीं धूल मिट्टी उड़ रही हो तो तुझे वहां से दूर रहना है। पर सफाई हो जाने के बाद फिर तुझे खांसी नहीं चलेगी, और फिर दिवाली की रात लक्ष्मी माता भी तो हमारे घरों में आती है, तो उनके स्वागत के लिए भी सफाई तो करनी पड़ेगी न!’

कोमल कुछ सोचते हुए बोली, ‘लेकिन आंटीजी, मुझे तो दिवाली वाले दिन भी बहुत ज्यादा खांसी चलती है। माँ मुझे घर से बाहर भी नहीं निकलने देती। मेरा कित्ता मन होता है कि मैं भी नयी-नयी ड्रेस पहनकर सबकी तरह माँ और बापू के साथ रौशनी देखने जाऊं। पर माँ और बापू नहीं ले जाते। कहते हैं डॉक्टर ने मना किया है। मुझे ज्यादा मिठाई भी खाने को नहीं मिलती। मुझसे सांस भी नहीं ली जाती है और खांसी चलती रहती है तो मैं फिर जिद भी नहीं कर पाती, और अगले दिन तो पूरी सड़क पर जले हुए पटाखे ही पटाखे दिखते हैं। कित्ती गन्दी लगती है सड़क। क्या लक्ष्मी माता को भी पटाखे अच्छे लगते हैं? क्या जो पटाखे जलाते हैं वे उन्हीं के घर आती हैं?’

कोमल के मासूम मन ने अपनी सारी जिज्ञासा और शिकायत तो प्रकट कर दी, पर मेरे पास इन बातों का कोई जवाब नहीं था।

रत्ना बोली, ‘ये नासमझ है दीदीजी! अब इसकी किस्मत ही खोटी है तो कोई क्या करे? पटाखे तो सब हमेशा से ही जला रहे हैं। अब एक इसके लिए तो बंद होने से रहे। बस हर दिवाली इसी बात से आँखें भर आती है कि जब सारी दुनिया खुशियाँ मना रही होती है तो मेरी बेटी बिस्तर में पड़े-पड़े खांसती रहती है। जब से थोड़ी समझ आई है इसे तब से एक दिवाली भी नहीं देखी इसने। डॉक्टर ने ज्यादा मिठाई और तली-फली चीजों के लिए भी मना किया है सो वह भी नहीं दे सकती।’ यह कहकर रत्ना तो चली गयी। लेकिन मैं काफी देर तक स्तब्ध सी वहीँ खड़ी रही।

फिर अंदर आकर शाम का डिनर तैयार करने लगी। इसी बीच श्रुति और श्रेय के पापा विकास ऑफिस से घर आ गए। थोड़ी देर में बच्चे और विकास सभी डिनर टेबल पर आ गए। बच्चे अपने पापा को दिनभर की बातें बताने लगे। तभी विकास ने हँसते हुए पूछा, ‘अच्छा, इस बार तुमने अभी तक अपने पटाखों की लिस्ट नहीं पकड़ाई मुझे? लगता है बहुत बड़ी लिस्ट बन रही है इस बार।’ पटाखों का नाम सुनते ही एक बार फिर कोमल का चेहरा सामने आ गया। मैं कुछ कहने ही जा रही थी, तभी श्रेय बोला, ‘नहीं पापा, इस बार हम पटाखे नहीं जलाएंगे।’ ‘हाँ पापा, इस बार हम बिल्कुल पटाखे नहीं जलाएंगे।’ श्रुति ने श्रेय की बात दोहराते हुए कहा। मैं आश्चर्य से दोनों को देखने लगी और सोचने लगी, ‘क्या ये दोनों वही श्रुति और श्रेय हैं जिनके पटाखों की लिस्ट दिवाली के महीने भर पहले से ही तैयार होने लगती है।’ विकास भी बड़े अचरज से दोनों को देखने लगे। तब श्रुति ने कहा, ‘मम्मा, आज हमने कोमल की सारी बातें सुनी थी। कितनी प्यारी है वह और हम सब लोगों की वजह से वह अपनी दिवाली भी नहीं मना पाती। हमने तो यह भी तय किया है कि स्कूल में हम सब बच्चों से रिक्वेस्ट करेंगे कि इस बार वे दिवाली पर पटाखे न जलाये।’

‘बहुत अच्छा किया तुमने बच्चों! बल्कि कोमल ही क्या, पटाखों से तो सभी को परेशानी होती है। पेड़-पौधों, पशु-पक्षी, पर्यावरण, वृद्ध जनों, नवजात बच्चों के साथ-साथ हम सब के लिए पटाखों का विषैला धुआँ और तेज आवाज़ बहुत हानिकारक है। इसलिए तो हर बार मैं तुम्हें कम से कम पटाखे जलाने को कहती हूँ। यूँ तो तुम कभी नहीं सुनते, पर इस बार तो कोमल ने कमाल कर दिया।’ मैंने सबको खाना परोसते हुए कहा।

विकास ने मेरी तरफ देखते हुए विस्मय से पूछा, ‘रश्मि! कोमल और कमाल ये सब क्या है?’ तब मैंने उन्हें सारी बात बताई। हम दोनों को ही बच्चों के इस निर्णय पर बहुत ख़ुशी और गर्व महसूस हो रहा था।

हमारे कस्बे का बस वह एक ही हाई स्कूल था, जहाँ पूरे कस्बे के बच्चे पढ़ने आते थे। प्रार्थना सभा में श्रुति और श्रेय ने सभी को कोमल के बारे में बताया और सभी से रिक्वेस्ट की कि क्या इस बार हम पटाखे न जलाकर दिवाली पर हमारे कस्बे के गरीब लोगो की बस्ती में मिठाई, दीपक, कपड़े आदि बांटने चल सकते हैं? ताकि कोमल जैसे गरीब परिवार के बच्चे, बीमार और वृद्ध जन सभी मजे से दिवाली मना सके। और फिर दिवाली पर चहकने का हक़ तो पेड़-पौधों और पशु-पक्षियों का भी बनता है, तो क्यों न इस बार की दिवाली हम सबके लिए ख़ुशनुमा बना दें।’

बच्चों की बात सुनकर सारा स्कूल प्रांगण तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। सभी शिक्षकों ने उनके इस सराहनीय कदम की भरपूर तारीफ की और सभी ने इस अच्छे कार्य में अपना पूरा-पूरा सहयोग देने का वादा किया।

बच्चों ने अलग-अलग टोलियाँ बनाकर अपने-अपने मोहल्ले से चंदा इकट्ठा किया और दिवाली की सुबह गरीबों की बस्ती में सभी को फल, मिठाइयाँ, कपड़े और दीपक वितरित करने चल पड़े। बच्चों के इस प्रयास की कुछ ऐसी लहर दौड़ी कि इस बार हमारे कस्बे में एक भी पटाखा नहीं छोड़ा गया।

कोमल शाम को अपनी माँ के साथ हम सबको दिवाली की शुभकामनाएँ देने आई। उसके चमक धमक वाले कपड़े और उसकी खिलखिलाती मुस्कुराहट देखकर ऐसा लगा जैसे उसकी तरह हम सबने भी दिवाली पहली बार ही मनाई है।

Monika Jain ‘पंछी’
(05/07/2015)

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Essay on Diwali in Hindi

Essay on Diwali in Hindi
जीवंतता कभी बुझ न पाए

दीपक जलकर रोशन करता है अँधेरे!...तो जब अंधकार पर प्रकाश की विजय का, असत्य पर सत्य की विजय का, बुराई पर अच्छाई की विजय का, अन्याय पर न्याय की विजय का और मूर्छा पर होश की विजय का उत्सव मनाने की बात आती है तो प्रतीक दीपक से बेहतर और क्या हो सकता है? हमारे सारे उत्सव भी तो प्रतीक ही हैं। ये उत्सव क्यों बनाये गए? इन प्रतीकों की जरुरत क्यों पड़ी?...ताकि हमारी विस्मृति बनी रहे कि हमारा मार्ग क्या है। हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है। भारत में तो हर दिन कोई न कोई उत्सव होता ही है। हमारे उल्लास, उत्साह और हर्ष को बनाये रखने के लिए और किसी मार्ग विशेष पर चलने की प्रेरणा के स्त्रोत के रूप में ही उत्सवों का प्रचलन शुरू हुआ होगा। लेकिन वर्तमान के सन्दर्भ में ये उत्सव अपने उद्देश्य को पूरा कर पाने में कितने सफल हैं, इसका संज्ञान लेना भी बहुत जरुरी है।

जरुरी है त्योहारों का वैज्ञानिक-अध्यात्मिक पक्ष भी प्रकट किया जाए। सामाजिक पारिवारिक सौहार्द वाली बात ठीक है लेकिन केवल कंडीशनिंग और मिथकों के आधार पर कुछ भी करते जाना आस्तिकता को पुष्ट नहीं करता। बल्कि धर्म और अधर्म की जो सबसे उपयुक्त और सदा प्रासंगिक रहने वाली परिभाषा है वह है ही यही कि जो भी कार्य होश या जागरूकता में किया जाए वह धर्म है और जो भी कार्य बेहोशी में किया जाए वह अधर्म।

लेकिन कंडीशनिंग का हाल यहाँ ऐसा है कि दिवाली के पटाखों को लेकर (आजकल तो जन्माष्टमी और छठ पूजा पर भी छूटने लगे हैं) कोई व्यक्ति बात शुरू न करे उससे पहले ही यहाँ हिंदुत्व ख़तरे में आ जाता है। मानों हिंदुत्व का अस्तित्व केवल पटाखों पर ही टिका है। इसी ख़तरे के तहत ‘बाकी धर्मों का भी यही हाल है’ यह बोलना जरुरी है यहाँ। और ये कंडीशनिंग ऐसी है कि आने वाले समय में बच्चे दीपावली पर निबंध में लिखा करेंगे : आज के दिन अयोध्या वासियों ने श्री राम का स्वागत पटाखे छोड़कर किया था। केवल संस्कृति और परंपरा के नाम पर हम उत्सवों में होने वाली बेबुनयादी और गैरजिम्मेदार चीजों को स्वीकृति नहीं दे सकते। किसी एक का उत्सव दूसरे की पीड़ा न बन जाए इसका ख़याल रखना भी तो जरुरी है न!...और समय के साथ-साथ गैरजरूरी चीजों और दूषित परम्पराओं से छुटकारा भी।

वैसे सबके पास अपने-अपने कारण है दिवाली मनाने के, इसलिए दिवाली किसी वर्ग विशेष का त्यौहार बनकर रहा ही नहीं। किसी के लिए राम की विजय और उनके अयोध्या वापस लौटने का उल्लास है, तो किसी के पास महावीर के निर्वाण प्राप्त करने का। किसी के पास फसल कटकर घर आने का उत्साह है तो किसी के पास गौतम बुद्ध के स्वागत का। हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध चाहे जितने भी पंथ या संप्रदाय हो दिवाली एक ऐसा त्यौहार है जो सीमाओं और वर्गों में बंधकर कभी रहा ही नहीं।...और फिर रौशनी को बाँटा भी कहाँ जा सकता है? उस पर तो सबका पूरा-पूरा अधिकार है।

दिवाली सूक्ष्म सफाई अभियान के भी अपने वैज्ञानिक पहलु हैं। वर्षा के बाद बढ़ जाने वाली सीलन, नमी, फफूंद आदि से इस सफाई के द्वारा निजात पायी जाती है। घर के हर कोने, छोटी से छोटी हर चीज को दिवाली के बहाने साल में एक बार संभाल लिया जाता है। अतिरक्त और अनुपयोगी सामान निकाल दिया जाता है। सर्दी के कपड़ों को धूप दिखाकर आने वाली सर्दी की तैयारी कर ली जाती है। वैसे मनुष्य कितना परिग्रही है इसका अहसास दिवाली सफाई अभियान में हो ही जाता है। अपने परिग्रह को कम करने का भी यह एक अच्छा अवसर है।

दिवाली यही याद दिलाने आती है हर साल कि हमारे भीतर की जीवंतता कभी बुझ न पाए।...और इस जीवंतता की रौशनी में हमारी दृष्टि स्पष्ट बने। अज्ञान के बादल जिन्होंने ढक रखा है हमारे मन को, उन्हें हम छितरा दें। आशा है यह दिवाली हमारे मन के अंधेरों को जीतने में सहायक बनेगी। इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ : Happy Diwali.

Monika Jain ‘पंछी’
(05/07/2015)

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June 1, 2015

Maharana Pratap Singh Biography in Hindi

महाराणा प्रताप सिंह

“भगवान एकलिंग की शपथ है, प्रताप के इस मुख से अकबर तुर्क ही कहलायेगा। मैं शरीर रहते उसकी अधीनता स्वीकार करके उसे बादशाह नहीं कहूँगा। सूर्य जहाँ उगता है, वहाँ पूर्व में ही उगेगा। सूर्य के पश्चिम में उगने के समान प्रताप के मुख से अकबर को बादशाह निकलना असंभव है।’’

ये हैं वीरता, शौर्य, बुद्धिमता और दृढ़ प्रतिज्ञा के प्रतीक महाराणा प्रताप के शब्द जिनका जन्म 9 मई, 1540 ई. में राजस्थान के कुम्भलगढ़ में महाराणा उदयसिंह व रानी जीवत कँवर के यहाँ हुआ था। ये वहीँ उदयसिंह हैं जिनके प्राणों की रक्षा पन्नाधाय ने अपने पुत्र की बलि देकर की थी। महाराणा प्रताप एकमात्र ऐसे हिन्दू राजा थे जिन्होंने कभी भी अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की।

कहते हैं पूत के पाँव पालने में ही दिखाई देने लगते हैं। बचपन में ‘कीका’ नाम से पुकारे जाने वाले महाराणा प्रताप साधारण शिक्षा की बजाय खेलकूद और हथियार बनाने की कला में अधिक रूचि लेते थे। वे बचपन से ही स्वाभिमानी, बहादुर और धार्मिक आचरण वाले थे।

महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक 1 मार्च 1573 ई. को गोगुन्दा में हुआ था। उस समय दिल्ली पर मुग़ल बादशाह अकबर का शासन था। सम्राट अकबर ने राजपूत राजाओं से संधि व वैवाहिक संबंधों के जरिये अपने राज्य का निर्भय विस्तार किया। मारवाड़, आमेर, बीकानेर और बूंदी के नरेश अकबर के सामने झुक चुके थे। यहाँ तक की महाराणा प्रताप के सगे भाई ने भी अकबर से मिलकर अपने कुल की राजधानी प्राप्त कर ली। अकबर महाराणा प्रताप को अपने अधीन आधे हिंदुस्तान का वारिस बनाने को तैयार था। प्रताप को मनाने के लिए उसने जलाल सिंह, मानसिंह, भगवानदास और टोडरमल को शांति दूत बनाकर भेजा पर महाराणा प्रताप जिनके पास न अपनी राजधानी थी न ही वित्तीय साधन, ऐसी विषम परिस्थितियों में भी उन्होंने अपने स्वाभिमान को जिन्दा रखा और अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए साहस पूर्वक संघर्ष किया। 30 वर्षों के लम्बे समय में भी अकबर जैसा शक्तिशाली सम्राट महाराणा प्रताप को न झुका पाया और न बंदी बना पाया।

शोलापुर की विजय के पश्चात् हिंदुस्तान लौटते हुए मानसिंह ने राणा प्रताप से मिलने की इच्छा प्रकट की। प्रताप ने उसका स्वागत किया लेकिन भोजन के समय स्वयं उपस्थित ना होकर अपने पुत्र अमरसिंह को भेज दिया। मानसिंह अकबर के अधीन था और उसकी बुआ जोधाबाई का विवाह अकबर के साथ किया गया था। इसलिए प्रताप मानसिंह के साथ भोजन करना उचित नहीं समझते थे। मानसिंह ने इसे अपना अपमान समझा और भोजन गृहण नहीं किया। मानसिंह के साथ राणा प्रताप के इस व्यवहार से अकबर को मेवाड़ पर आक्रमण का अवसर मिल गया और इस अपमान का बदला लेने के लिए मानसिंह व आसफ़ खां के नेतृत्व में मुग़ल सेना ने 18 जून, 1576 को मेवाड़ पर आक्रमण किया। यह युद्ध इतिहास प्रसिद्द हल्दीघाटी के युद्ध के नाम से जाना जाता है। एक ही दिन चले इस युद्ध में करीब 17000 लोग मारे गए। एक अजब संयोग यह था कि इस युद्ध में मुग़ल सेना के अग्रिम दल में राजपूत राजा जगन्नाथ के नेतृत्व में राजपूत सैनिक थे और महाराणा प्रताप के अग्रिम दल में मुस्लिम सरदार हकीम खां सूरी के नेतृत्व में पठान सैनिक थे।

हल्दीघाटी सरीखा विश्व में अन्य कोई बलिदान स्थल नहीं होगा। युद्ध के दौरान वहां की मिट्टी रक्त रंजित हो गयी। हल्दीघाटी का कण-कण आज भी मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप के पराक्रम, साहस, भीलों और राजपूतों के अपने राजा के लिए बलिदान और त्याग की अमर गाथा कहता है। 20000 राजपूत एवं भील सैनिकों (जिनके मुख्य हथियार भाले, तलवार, धनुष बाण और गुलेल थी) के साथ मुगलों के 80000 सैनिकों (जो मैदानी तोपों और बंदूकों से सुसज्जित थे) का सामना आसान नहीं था। पर शाही सेना पहले ही हमले में भाग निकली थी। यह राणा की जीत थी पर जब किसी ने अफवाह फैलाई कि बादशाह खुद आ रहा है तो शाही सेना का मनोबल बढ़ गया और बराबर की टक्कर होने लगी।

प्रताप ने अद्भुत वीरता का परिचय दिया। राणा प्रताप जब मानसिंह से युद्ध कर रहे थे तब असंख्य मुग़ल सैनिकों ने उन्हें घेर लिया। इसी समय चेतक ने जब अपने दोनों पाँव हाथी पर चढ़ाये तब हाथी की सूंड पर बंधी तलवार से चेतक का एक पैर कट गया। महाराणा प्रताप भी घायल हो गए। महाराणा को संकट में देखकर झाला सरदार ने स्वामिभक्ति की अनूठी मिसाल पेश की। झाला सरदार मन्नाजी ने तेजी से महाराणा प्रताप के पास जाकर उनका मुकुट और छत्र स्वयं धारण कर लिया और महाराणा प्रताप को युद्ध भूमि से बाहर निकल जाने को विवश किया और स्वयं थोड़ा दूर जाकर युद्ध करने लगे। मुग़ल सैनिक उन्हें प्रताप समझकर उन पर वार करने लगे और अंतत: झाला सरदार वीर गति को प्राप्त हुए। इस बीच महाराणा प्रताप को युद्ध भूमि से बाहर निकलने का अवसर मिला।

दो मुग़ल सैनिक प्रताप का पीछा कर रहे थे। बीच में एक पहाड़ी नाला आया जो 26 फीट चौड़ा था, जिसे चेतक ने एक टांग टूटी हुई होने के बावजूद भी अपनी पूरी शक्ति लगाकर लाँघ लिया। सैनिक पीछे रह गये पर अब चेतक की गति भी धीमी पड़ गयी थी। तभी प्रताप को पीछे से अपनी मातृभाषा में सुनाई पड़ा ‘हो, नीला घोड़ा रा असवार,’ प्रताप ने पीछे मुड़कर देखा तो वहां उनका भाई शक्तिसिंह था। प्रताप से व्यक्तिगत विरोध के चलते वह मुग़ल पक्ष की ओर से लड़ रहा था, पर आज उसका मन बदल गया और उसने दोनों मुग़ल सैनिकों को मारकर महाराणा प्रताप की रक्षा की। दोनों भाई एक दूसरे से गले मिले। इसी बीच चेतक भी जमीन पर घिर पड़ा। चेतक ने अपने प्राण त्याग दिए। दोनों भाइयों ने उसे श्रद्धांजलि दी। शक्तिसिंह ने अपना घोड़ा महाराणा प्रताप को दिया और वापस लौट आया। जिस स्थान पर चेतक घायल होकर गिरा था वहां आज भी चेतक की याद में बनाया गया चबूतरा स्थित है। यह स्थान हल्दीघाटी से 2 मील की दूरी पर बलीचा नामक गाँव में है।

महाराणा ने अरावली की गुफाओं, वनों और पर्वतों में आश्रय लिया। अपनी जन्मभूमि की दुर्दशा देखकर उन्होंने सारे भोगविलास त्याग दिए। उन्होंने अपने सरदारों और सैनिकों के साथ प्रतिज्ञा की कि जब तक अपनी राजधानी चित्तौड़ को मुगलों से मुक्त नहीं करवा लेंगे तब तक महलों की कोमल शय्या को छोड़कर तृण शय्या का प्रयोग करेंगे और सोने-चांदी के बर्तनों की बजाय वृक्षों के पत्तों में भोजन करेंगे और राजभोग की बजाय जंगल के कंद-मूल-फल आदि का आहार लेंगे। समय गुजरता रहा पर प्रताप की कठिनाइयाँ और भी बढ़ती गयी। पर्वत के जितने भी स्थान जो राणा और उनके परिवार को आश्रय प्रदान कर सकते थे मुगलों के अधिकार में हो गए। स्वामिभक्त भीलों ने राणा और उनके परिवार की रक्षा के लिए जी जान से सहयोग दिया। वे राणा के बच्चों को टोकरों में छिपाकर जावरा की खानों में ले गए और वहां कई दिनों तक उनका पालन-पोषण किया। वे स्वयं भूखे रहकर राणा और उनके परिवार के लिए खाद्य सामग्री जुटाते थे। जावरा और चावंड के घने वनों में आज भी वे लोहे के बड़े-बड़े कीले गढ़े हुए मिलते हैं जिन पर बेतों के बड़े-बड़े टोकरे टांगकर भील राणा के बच्चों को छिपाकर मुग़ल सेनिकों और जंगली जानवरों से रक्षा करते थे।

अकबर के गुप्तचर ने एक बार आँखों देखा हाल सुनाया, जिसके अनुसार राणा और उनके सरदार घने जंगल में एक वृक्ष के नीचे भोजन कर रहे थे। भोजन में मात्र जंगली फल, जड़े और पत्तियां थी जिसे भी वे सभी ख़ुशी-ख़ुशी संतोष से खा रहे थे। किसी के चेहरे पर उदासी नहीं थी। यह सब सुनकर अकबर भी दरबार में महाराणा प्रताप के त्याग और बलिदान की प्रशंसा किये बिना नहीं रह पाया।

अकबर के विश्वास पात्र सरदार अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना के शब्दों में, ‘इस संसार में सभी नाशवान हैं। राज्य और धन किसी भी समय नष्ट हो सकता है, परन्तु महान व्यक्तियों की ख्याति कभी नष्ट नहीं हो सकती। पुत्तों ने धन और भूमि को छोड़ दिया, परन्तु उसने कभी अपना सिर नहीं झुकाया। हिन्द के राजाओं में वही एकमात्र ऐसा राजा है, जिसने अपनी जाति के गौरव को बनाए रखा है।’

पर कई बार ऐसे भी अवसर आये जब अपने परिवार की सुरक्षा और भूख से बिलखते बच्चों को देखकर प्रताप भाव विभोर हुए। मुग़ल सैनिक इस कदर उनके पीछे पड़े थे कि कई बार उन्हें तैयार भोजन छोड़कर दूसरी जगह प्रस्थान करना पड़ता था। एक दिन पांच बार भोजन पकाया गया और पाँचों ही बार भोजन छोड़कर जाना पड़ा। इसी तरह एक बार घास के बीजों को पीसकर बनायीं रोटी जो उनकी पुत्री के लिए बचाकर रखी थी उसे एक जंगली बिलाव छीनकर भाग गया। पुत्री को रोते बिलखते देखकर प्रताप का ह्रदय पसीज गया। विषम परिस्थितयों में अच्छे-अच्छों का धैर्य टूट जाता है। राणा प्रताप भी कुछ समय के लिए विचलित हो गए और एक पत्र के द्वारा अकबर से मिलने की इच्छा प्रकट की।

राणा प्रताप का पत्र पाकर अकबर की ख़ुशी की सीमा ना रही। इसे उन्होंने महाराणा का आत्मसमर्पण समझा और यह पत्र बीकानेर नरेश के छोटे भाई पृथ्वीराज नामक स्वाभिमानी राजपूत को दिखाया। बीकानेर मुग़ल सत्ता के अधीन था। पृथ्वीराज वीर ही नहीं अपितु योग्य कवि भी थे। प्रताप के पत्र को पढ़कर उन्हें बहुत पीड़ा हुई। उन्होंने खुद को नियंत्रित करते हुए अकबर को कहा, ‘यह पत्र प्रताप का नहीं है। किसी शत्रु ने जरुर जालसाजी की है।’ इसके साथ ही पृथ्वीराज ने अकबर से अनुरोध किया कि वह सच्चाई जानने के लिए उसका एक पत्र प्रताप तक भिजवा दे। अकबर ने बात मान ली और पृथ्वीराज ने राजस्थानी शैली में एक पत्र लिखकर प्रताप को भिजवाया।

पृथ्वीराज ने उस पत्र के द्वारा प्रताप को अपने स्वाभिमान का स्मरण करवाया जिसकी रक्षा के लिए उन्होंने आज तक इतने घनघोर संकटों और विपत्तियों का सामना किया था लेकिन कभी हार नहीं मानी। पृथ्वीराज के ओजस्विता से पूर्ण पत्र को पढ़कर प्रताप में अप्रतिम उत्साह का संचार हुआ और उन्होंने अपना स्वाभिमान बनाये रखने का दृढ़ संकल्प लिया।

मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए उन्होंने चित्तौड़ और मेवाड़ को छोड़कर सिंध नदी के किनारे स्थित सोगदी राज्य की तरफ बढ़ने की योजना बनायी ताकि बीच का मरुस्थल शत्रुओं को दूर रखे। लेकिन तभी मेवाड़ का वृद्ध मंत्री भामाशाह अपनी काफी संपत्ति लेकर प्रताप के सम्मुख प्रकट हुआ और मेवाड़ के उद्दार की याचना की। यह संपत्ति 25000 सेनिकों के वर्षों तक भरण-पोषण के लिए पर्याप्त थी। भामाशाह के इस त्याग ने राणा प्रताप को फिर से लौटने पर विवश किया।

महाराणा प्रताप ने वापस आकर राजपूतों की अच्छी सेना तैयार की और एक-एक करके अपने 32 दुर्गों पर पुनः अधिकार कर लिया। 1530 ई. में चित्तौड़, अजमेर और मांडलगढ़ को छोड़कर सम्पूर्ण मेवाड़ पर राणा प्रताप का अधिकार हो गया। उन्होंने उदयपुर को अपनी राजधानी बनाया। इसके बाद अकबर ने युद्ध बंद कर दिया था पर राणा ने चित्तौड़ के उद्दार की प्रतिज्ञा ली थी कि जब तक चित्तौड़ का उद्धार न हो, तब तक सिसोदिया राजपूतों को सभी सुख त्याग देने चाहिए। इसलिए उन्होंने राजमहल को छोड़कर पिछौला तालाब के पास अपने लिए झोपड़ियाँ बनवाई और वर्षों तक वहीँ रहे।

अकबर के युद्ध बंद कर देने से महाराणा प्रताप को बहुत दुःख हुआ। उन्होंने हजारों कष्ट उठाये पर वे चित्तौड़ को मुक्त ना करा सके। अपने अंतिम समय में एक दिन वे उदास कुटिया में लेते हुए थे। उन्हें उदास देखकर उनके एक सामंत ने उनसे पूछा, ‘महाराज! ऐसा कौनसा दुःख है जो आपके अंतिम समय की शांति को भंग कर रहा है।’

महाराणा प्रताप ने कहा, ‘ पुत्र अमरसिंह हमारे पूर्वजों के गौरव की रक्षा नहीं कर सकेगा। वह विलासी प्रवृति का है। वह मुगलों से मातृभूमि की रक्षा नहीं कर पायेगा। केवल आप लोगों से आश्वासन की वाणी सुनकर ही मेरी देह सुखपूर्वक प्राण त्याग सकती है।’ यह सुनकर सभी सरदारों ने उसी वक्त प्रताप के समक्ष प्रतिज्ञा कि जब तक वे जीवित रहेंगे तब तक कोई तुर्क मेवाड़ की भूमि पर अपना अधिकार नहीं कर पायेगा। मेवाड़ भूमि को पूर्ण स्वतंत्रता मिलने तक वे इन्हीं कुटियों में निवास करेंगे। यह सुनकर प्रताप ने निश्चिन्तता पूर्वक अंतिम सांस ली। यह 29 जनवरी, 1597 ई. का दिन था।

महाराणा प्रताप के निधन के समाचार पर अकबर की आँखों से भी अश्रुधारा बह निकली। वह बोला, ‘हे प्रताप! मुझे तेरे जैसा हठी बैरी नहीं मिलेगा और तुझे भी मेरे जैसा जिद्दी दुश्मन नहीं मिल सका। मैं तुझे सलाम करता हूँ।’

महाराणा प्रताप शक्ति, शौर्य, साहस, दृढ़ निश्चय और त्याग की अद्भुत मिसाल थे। कहते हैं उनके भाले और कवच का वजन 80-80 किलो था और तलवारों, ढाल सबको मिलाकर कुल 208 किलो वजन के साथ वे युद्ध भूमि में लड़ते थे। उनका रणकौशल देखकर शत्रु भी दांतों टेल अंगुली दबा लेते थे। स्वतंत्रता के लिए महाराणा प्रताप जैसा अनूठा त्याग कम ही देखने को मिलता है, तभी तो अकबर भी उनकी प्रशंसा करने से खुद को ना रोक पाया। अकबर के दरबार के कवि पृथ्वीराज ने उनके यश के गीत गाये। वनवास के दिनों में भीलों ने अपनी जान की परवाह किये बगैर उनकी सहायता की। अश्व चेतक और रामसिंह हाथी तक उनसे इतना प्यार करते थे कि उनके लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया। हाथी रामसिंह को मानसिंह ने बंदी बनाकर अकबर को भेंट किया पर स्वामिभक्त रामसिंह ने 18 दिनों तक शत्रु का दिया दाना-पानी गृहण नहीं किया और अपने प्राण त्याग दिए। झाला और भामाशाह का त्याग और बलिदान हम जानते ही हैं। अकबर के सरदार खानखाना ने भी प्रताप की प्रशंसा में पद्यों की रचना की। एक अद्भुत पुरुष थे महाराणा प्रताप जिनका स्वतंत्रता और मातृभूमि के लिए त्याग, बलिदान व प्रेम सदियों तक समूचे विश्व में मिसाल रहेगा, तभी तो जब अब्राहम लिंकन भारत दौरे पर आने वाले थे और उन्होंने अपनी माँ से पूछा कि वे उनके लिए भारत से क्या लायें तो उनकी माँ ने कहा, ‘उस महान देश की वीर भूमि हल्दी घाटी से एक मुट्ठी धूल लेकर आना जहाँ का राजा अपनी प्रजा के प्रति इतना वफ़ादार था कि उसने आधे हिंदुस्तान के बदले अपनी मातृभूमि को चुना’।

इसके अलावा जब वियतमान ने अमेरिका जैसे शक्तिशाली राष्ट्र को हरा दिया था तो एक पत्रकार के पूछने पर वियतमान के राष्ट्राध्यक्ष ने कहा, ‘उन्हें विजय और युद्धनीति के लिए राजस्थान के मेवाड़ प्रदेश के राजा महाराणा प्रताप सिंह की जीवनी से प्रेरणा मिली।’ आगे उन्होंने कहा, ‘अगर ऐसे राजा ने हमारे देश में जन्म लिया होता तो हमने समूचे विश्व पर राज किया होता।’ इसी राष्ट्राध्यक्ष ने मृत्यु के बाद अपनी समाधि पर लिखवाया, ‘यह महाराणा प्रताप के शिष्य की समाधि है।’

Monika Jain ‘पंछी’
(01/06/2015)

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