January 15, 2015

Essay on Children’s Day in Hindi

Essay on Children’s Day in Hindi
 
बचपन कहीं बचा नहीं
(समाज कल्याण, केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, भारत सरकार में प्रकाशित)

एक औरत ठिठुरती सर्दी में चार-पांच महीने के बच्चे को बिना कोई कपड़ा पहनाये घर-घर भीख मांगने जाती है। एक दूसरी औरत बच्चे को इस हालत में देखकर उसके पहनने के लिए कोई कपड़ा देती है। पहली औरत कपड़ा बच्चे को पहनाकर आगे बढ़ जाती है और दूसरे घर के सामने पहुँचने से पहले बच्चे के शरीर से वह कपड़ा उतार लेती है और भरी सर्दी उसे नंगा कर फिर से भीख मांगने लगती है। पहली औरत बस विस्मय से देखती रह जाती है। जानती हूँ पेट की आग, स्वार्थ और लालच के सामने रिश्ते दम तोड़ देते हैं। बच्चे उस आग से लड़ने के हथियार बन जाते हैं। सवेरा होते ही कूड़ेदान से प्लास्टिक, लोहा आदि बीनने के लिए घर से बाहर निकाल दिए जाते हैं।...पर भूख की यह कीमत सच बहुत बड़ी है, बहुत बोझिल! इतनी कि सारी दुनिया के पेट की तृप्ति भी इसे न्यायसंगत नहीं ठहरा सकती।

खैर, यह तो बात हुई उन बच्चों की जिनका जन्म ही अभावों में होता है, और अक्सर इन्हीं अभावों में इनका सारा बचपन घुल जाता है। जिसे बचाने के लिए एक व्यक्ति से लेकर पूरे राष्ट्रीय स्तर तक व्यापक प्रयासों और नीतियों की जरुरत है। पर सुख सुविधा से संपन्न या मध्यमवर्गीय घरों के बच्चे? क्या वे अपना बचपन जी पा रहे हैं? क्या उनकी मासूमियत को हम सहेज पा रहे हैं? शायद नहीं।

एक पिता अपनी एक छोटी सी बच्ची के साथ बाहर खड़े हैं। शरीर पर खुजली से त्रस्त एक श्वान सड़क पर इधर-उधर दौड़ रहा है। बच्ची ने जिज्ञासावश पूछा, ‘पापा, इस डॉगी को क्या हुआ’ पापा ने उस जानवर की तरफ नाक-भौंह सिकोड़ते हुए कहा, ‘बेटा, यह बहुत गन्दा डॉगी है। इसके पास बिल्कुल नहीं जाना है और यह कभी पास भी आये तो इसे पत्थर मारकर भगा देना।’

पापा चाहते तो यह भी कह सकते थे कि यह कोई गन्दा नहीं बस एक बीमार जानवर है। आप छोटे हो इसलिए आपको उसके पास नहीं जाना है। उसे बेवजह पत्थर नहीं मारना है, बस उससे दूर रहना है और उसके लिए मन में प्यार ही रखना है। लेकिन हम बच्चों को प्रेम नहीं नफरत करना सिखा रहे हैं।

बचपन का वह समय जो खिलखिलाता, मुस्कुराता, हर तरह के तनाव से कोसों दूर और मासूमियत व निर्दोषता से परिपूर्ण होना चाहिए, उसे हम नहीं सहेज पा रहे। क्या थमा रहे हैं हम बच्चों को? जो उम्र दादा, नाना, पापा, मामा और चाचा के कन्धों की सवारी करने की है, उस उम्र में हम बच्चों के कन्धों पर दुनिया-जहाँ का बोझ बस्ते के रूप में लाद रहे हैं। क्लास में अव्वल आने या परीक्षा में ज्यादा से ज्यादा अंक लाने का तनाव समय से पहले उन्हें बहुत गंभीर बना देता है। कई बच्चे तो इन अपेक्षाओं के बोझ को झेल भी नहीं पाते और इतनी छोटी उम्र में आत्महत्या कर इस समूची शिक्षा व्यवस्था पर एक प्रश्न चिह्न छोड़कर चले जाते हैं। जो समय उछलने-कूदने, फुदकने, टहलने और किलकारियों का है उस समय को हम कैद कर रहे हैं खचाखच भरी बसों में। और तो और आजकल बच्चों को यह भी पता नहीं होता कि खेलना क्या और कैसे है? गिल्ली-डंडा, छिपा-छिपी, सितोलिया, लंगड़ी टांग, शतरंज, कैरम, खो-खो, रुमाल झपट्टा ये सब गुजरे जमाने के किस्से हैं। आजकल के बच्चों के पास कंप्यूटर और मोबाइल गेम्स के अलावा कोई ऑप्शन नहीं। और फिर हम बड़ों के रेस्ट्रिक्शंस भी बड़े गज़ब के होते हैं- मिट्टी में नहीं खेलना है, उन बच्चों के साथ नहीं खेलना है (क्योंकि उन बच्चों के बड़ों से नहीं बनती), ये नहीं खेलना है, ऐसे नहीं खेलना है और भी न जाने क्या-क्या।

बच्चों से प्रेम और मैत्री की भावना भी छीन ली हमने और उसकी जगह थमा दिए प्रतिस्पर्धा, तनाव और कुछ भी कर गुजरने की भावना से भरे टैलेंट हंट शोज और कम्पटीशन्स। जाहिर है इन प्रतियोगिताओं की तैयारी के लिए दिन रात एक कर दिए जाते हैं। हर अभिभावक की उम्मीद कि मेरा बच्चा ही जीते, पर सारे बच्चे तो जीत नहीं सकते। ऐसे में जो हारते हैं, उन्हें एक पल को लगता है जैसे उनकी सारी दुनिया ही खत्म हो गयी हो। इतनी सी उम्र में मायूसी और निराशा कौनसे गुल खिलाएगी, यह जरा सोचने वाली बात है। दूसरी ओर सबकी आँखों का तारा बना, जीत का ताज पहनने वाला बच्चा कितनी महत्वकांक्षाओं, अभिमान और अपेक्षाओं से भर सकता है, यह भी विचारणीय है। आगे चलकर यही भावनाएं तो दुनिया जहाँ के संघर्षों और शोषण की जड़ें बनती है। जरा सोचकर देखने वाली बात है - क्या इतनी सी उम्र में जीत-हार से इतना फर्क पड़ना चाहिए? बच्चों में कैसी होड़? लेकिन बड़ों की अपेक्षाओं, प्रतिस्पर्धा और स्वार्थ के इस खेल में कई बच्चों का आत्मविश्वास टूट जाता है और कुछ बच्चे आत्ममुग्धता के शिकार हो जाते हैं। दोनों ही स्थितियां भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं।

इसलिए बहुत जरुरी है हम सब के लिए यह समझना कि अगर बच्चों को हम ऐसी प्रतियोगिताओं का हिस्सा बनाते भी हैं तो बस उनका प्रतिभागी होना ही महत्वपूर्ण होना चाहिए। जीतने और हारने से कई ज्यादा जरुरी है कुछ बेहतर सीखना और अपने डर को खत्म करना। क्योंकि प्रतियोगिताएं होती ही कुछ बेहतर सीखने-सिखाने, आत्मविश्वास को मजबूत करने, नए-नए लोगों से मिलने और नयी-नयी जानकारियां प्राप्त करने के लिए। और जिसने सीख लिया वह तो हारकर भी जीत गया। इसलिए अगर जीत की ख़ुशी हो तो हार भी सहर्ष स्वीकार होनी चाहिए। बच्चे अभी इतने नाजुक हैं कि मैडल्स, सर्टिफिकेट्स और तमगों का बोझ नहीं उठा सकते। उन्हें फूलों सा खिला रहने दिया जाये, इसी में हमारी समझदारी है।

टीवी, इन्टरनेट और मोबाइल संस्कृति ने भी बचपन को लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। अपनी मासूमियत से सभी के दिलों को जीत लेने वाले बाल कलाकारों के जीवन की सच्चाई इतनी मासूम नहीं। इतनी छोटी उम्र का अभिनय, पॉपुलैरिटी और स्टारडम आने वाले भविष्य के उतार-चढ़ावों को स्वीकार करने में बाधा डालता है और बचपन की सारी बेफिक्री को भी लूटकर ले जाता है। वहीं दूसरी ओर टीवी, मोबाइल और इन्टरनेट के उपयोगकर्ता बच्चे प्रकृति की निकटता से दूर इस आभासी मनोरंजन में डूबे हिंसक और फूहड़ कार्टून सीरियल्स और वीडियो गेम्स की लत के कारण गुस्से, तनाव, चिड़चिड़ाहट, अकेलेपन, हिंसा और अवसाद के शिकार हो रहे हैं। जिसकी वजह से उनका मानसिक और शारीरिक विकास बाधित हो रहा है। एकल परिवारों और जनरेशन गैप के चलते अब वो दादी और नानी की कहानियां भी नहीं रही जो बचपन से बच्चों के चरित्र को वह मजबूती देती थी जो आगे चलकर देश का भविष्य बनता था। अब तो मम्मी और पापा दोनों की जॉब में व्यस्तता की वजह से बाकी रह गए हैं बस टीवी पर आने वाले ऊलजुलूल कार्यक्रम, हिंसक और बेहुदे कार्टून केरैक्टर्स, इन्टरनेट पर पोर्न तक पहुँच, एक्शन मूवीज, फूहड़ और अश्लील गाने, मोबाइल के उत्तेजना और निराशा पैदा करने वाले गेम्स जो नफरत, हिंसा, उन्माद और भटकाव से भरे भविष्य का आईना दिखा रहे हैं।

बड़ी ही विडम्बना पूर्ण स्थिति है। एक ओर देश का भविष्य कचरे के ढेर में से प्लास्टिक, पोलीथिन और बेचने लायक चीजें चुन रहा है, ताकि एक वक्त की रोटी का जुगाड़ हो सके। होटल, रेस्तरां और घरों में झूठे बर्तनों को रगड़ रहा है ताकि रात को भूखे पेट न सोना पड़े। स्कूल जाते बच्चों को देखकर इस बचपन की आँखें एक पल को चमकती है लेकिन अगले ही पल मालिक की फटकार पर फिर से बर्तनों के ढेर में जा गढ़ती है। दूसरी ओर कन्धों पर जमाने भर का बोझ लादे ऊपर से नीचे तक बंधा हुआ बचपन है जो सड़कों पर दौड़ते-खेलते पिल्लों को देखकर पल भर ठहरकर मुस्कुरा लेना चाहता है लेकिन अगले ही पल खचाखच भरी बसों का हॉर्न उनकी मुस्कुराहट को लील जाता है। एक बचपन वर्तमान की रोटी के इंतजाम के लिए जूझ रहा है और दूसरा बचपन भविष्य की रोटियों के इंतजाम के लिए। और जिस देश का बचपन ही इतना जूझता नजर आये उस देश के भविष्य की दिशा क्या होगी?

Monika Jain ‘पंछी’
(15/01/2015)

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January 12, 2015

Essay on Social Media for Women in Hindi

Essay on Social Media for Women in Hindi
सोशल मीडिया और महिलाएँ
(आधी आबादी में प्रकाशित)

तुर्क के उपप्रधानमंत्री बुलेंट एरिंक का एक भाषण में कहना ‘शालीनता बहुत महत्वपूर्ण है, महिलाओं को सार्वजनिक रूप से नहीं हँसना चाहिए’, और इस बेतुके बयान के बाद से ही तुर्की महिलाओं द्वारा बड़ी संख्या में सोशल मीडिया पर अपनी हँसती हुई तस्वीरें पोस्ट करना और ‘कहकहा’ हेशटैग के अंतर्गत लाखों ट्वीट करना यह अहसास दिलाने के लिए काफी है कि सोशल मीडिया ने ‘व्हाट्स ऑन योर माइंड’ के जरिये महिलाओं को अपनी घुटन, भावनाओं, आक्रोश, गुस्से, समर्थन और विरोध सभी को खुल कर व्यक्त करने का एक नया आसमान दिया है, जिसके जरिये वह सदियों से अपनी दासता के विरुद्ध चली आ रही जंग को मुकाम तक पहुँचाने के लिए नयी ऊर्जा दे सकती है।

गौरतबल है कि तुर्क में ट्विटर का इस्तेमाल करने वाली महिलाओं की संख्या पुरुषों से ज्यादा है और इससे पूर्व भी तुर्क में बस और ट्रेन में जानबूझकर पैर पसारकर बैठने और पास बैठी महिला को सिकुड़कर बैठने को मजबूर करने वाले पुरुषों के विरुद्ध सोशल मीडिया पर ‘डॉन्ट ऑक्यूपाई माई स्पेस’ कैंपेन चलाया जा चुका है, जिसमें ऐसे पुरुषों की फोटोज शेयर कर समूचे विश्व को इस समस्या के प्रति जागरूक किया गया था।

भारत में लगभग 11.2 करोड़ फेसबुक यूजर्स हैं और संचार क्रांति के इस युग में सोशल मीडिया परिवर्तन के एक बहुत बड़े कारक के तौर पर उभरा है। और स्वाभाविक है कि घर बैठे ही सारी दुनिया से जुड़ने के इस उपक्रम का महिलाओं के जीवन पर भी एक व्यापक प्रभाव परिलक्षित होता है। हालाँकि भारत में पुरुष और महिला यूजर्स का अनुपात 75:25 ही है पर फिर भी घरेलु महिलाओं के लिए घर बैठे ही दुनिया के कई अच्छे लोगों से जुड़ने, अपने विचारों और अपनी कला को अभिव्यक्त करने, नयी-नयी जानकारियां प्राप्त करने और अपनी समस्यायों के समाधान ढूंढने की दिशा में सोशल मीडिया बेहद कारगर सिद्ध हो रहा है।

शादी के बाद महिलाओं के बचपन और कॉलेज के लगभग सभी दोस्त छूट जाते हैं, पर उन बिछड़े दोस्तों को मिलाने और उनसे संपर्क साधने में फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स की अहम् भूमिका है। महिलाएं घर से शुरू अपने छोटे-छोटे बिज़नस या आर्टवर्क के लिए भी सोशल मीडिया के जरिये सही ग्राहकों तक पहुँच सकती है।

पुलिस और प्रशासन से न्याय पाने में असफल महिलाओं के लिए भी न्याय प्रक्रिया को त्वरित करने में सोशल मीडिया एक उपयोगी हथियार के रूप में उभरा है। देहली के चर्चित निर्भया केस में समूचे देश में बलात्कारियों के विरुद्ध क्रांति की अलख जगाने में सोशल मीडिया की प्रमुख भागीदारी रही, जिसने प्रशासन को महिलाओं की सुरक्षा हेतु नए कानून बनाने की दिशा में सोचने पर विवश किया।

उत्तर प्रदेश में एक महिला सब इंस्पेक्टर का जब उसके ही सीनियर अधिकारी ने यौन उत्पीड़न किया और जब मामले पर सुनवाई ना हुई तो महिला पुलिसकर्मी ने फेसबुक पर एक पेज बनाया, जिसे जबरदस्त समर्थन मिला और अधिकारियों को शिकायत की जांच करने के लिए मजबूर होना पड़ा। आरुषी मर्डर, जेसिका लाल हत्याकांड और ऐसे ही कई और मामलें हैं जिनमें सोशल मीडिया जनाक्रोश की अभिव्यक्ति का एक सशक्त और प्रभावी माध्यम बनकर उभरा है। इनमें से कई मामलों में इन्साफ भी मिला है।

कुछ लड़कियों द्वारा राह चलते छेड़छाड़ करने वाले शरारती तत्वों के वीडियो बनाकर भी यूट्यूब और फेसबुक पर अपलोड किये जा रहे हैं और इन शरारती तत्वों की जबरदस्त किरकरी हो रही है, और पुलिस पर भी त्वरित कार्यवाही का दबाव पड़ रहा है।

कुल मिलाकर सोशल मीडिया महिलाओं की अभिव्यक्ति, अस्तित्व, मुक्ति, यौन शोषण, पितृ सत्ता और अन्य सभी सामाजिक अन्यायों के विरुद्ध लड़ाई को नए आयाम दे रहा है, जिसका व्यापक असर निश्चित रूप से आने वाले दिनों में देखा जा सकता है।

पर सकारात्मक प्रभावों के साथ ही फेसबुक व अन्य सोशल नेटवर्किंग साइट्स के नकारात्मक प्रभाव भी बड़े पैमाने पर नज़र आने लगे हैं। इन दिनों तो महिलाओं से सम्बंधित साइबर क्राइम्स की बाढ़ सी आ गयी है। सच कहा जाए तो महिलाओं का जीवन आसान नहीं है, फिर चाहे वह वास्तविक दुनिया हो या फिर फेसबुक व अन्य सोशल नेटवर्किंग साइट्स की वर्चुअल दुनिया।

जिस तरह महिलाएँ आज सड़क, कार्यस्थल, कॉलेज, स्कूल यहाँ तक कि अपने घर पर भी सुरक्षित नहीं है, उसी तरह सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर भी महिलाओं को बहुत ज्यादा सतर्क और संभल कर रहने की जरूरत है। महिलाओं द्वारा बरती गयी जरा सी लापरवाही उन्हें बड़ी भारी पड़ सकती है।

फेसबुक पर लगभग हर दूसरी महिला को इनबॉक्स और कमेंट बॉक्स में आने वाले अश्लील संदेशों से रूबरू होना पड़ता है। बीते दिनों यूपी में एक कंप्यूटर सेंटर संचालक ने परीक्षा का फॉर्म भरने आई एक बीकॉम छात्रा का ईमेल आईडी बनाकर उसे दिया। उसके जाने के बाद उसके ईमेल आईडी और फोटो का इस्तेमाल कर एक फेसबुक आईडी बनाया और इस आईडी पर अश्लील फोटोज और पोस्ट्स डाल दी। जिसका पता छात्रा को अपना ईमेल अकाउंट चेक करने पर लगा। इसी तरह नोएडा में रहने वाली एक युवती के हैदराबाद में इंजीनियरिंग के दौरान उसके साथ पढ़ने वाले एक सहपाठी ने एकतरफा प्रेम के चलते इग्नोर किये जाने पर फेसबुक पर एक फर्जी आईडी बनाकर उसके मोबाइल नंबर और अश्लील तस्वीर डाल दी। जब लड़की को कई अजनबी लड़कों के फोन आने लगे तो उसके पैरों तले जमीन ही खिसक गयी।

फेसबुक पर अपनी अच्छी से अच्छी सेल्फीज और पिक्स शेयर कर ज्यादा से ज्यादा लाइक पाने का जूनून इस कदर हावी है कि इसके चलते कॉलेज गर्ल्स अपनी बॉडी इमेज को लेकर बहुत कांशस होती जा रही है और वजन कम करने के फेर में ईटिंग डिसऑर्डर का शिकार हो रही है। एलबम्स या अपने कंप्यूटर में पिक्स को कैद करने की तुलना में उनका शेयर किया जाना बेहतर है पर ये देखना बहुत जरुरी है कि हम उन्हें जिन लोगों के बीच शेयर कर रहे हैं वे कितने विश्वसनीय हैं और उनकी सोच का स्तर क्या है।

सोशल मीडिया के के जरिये दुनिया भर में क्राइम और वेश्यावृत्ति को भी बढ़ावा मिल रहा है। तहकीकात में पता चला है कि फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स का उपयोग युवतियों और महिलाओं को फंसाने में किया जा रहा है। मानव तस्करी करने वाले माफिया सोशल मीडिया के माध्यम से काम देने के बहाने युवतियों और महिलाओं को फंसाते हैं और उन्हें कैद कर वेश्यावृत्ति के लिए मजबूर करते हैं। पहले इन लोगों को खुद जाकर महिलाओं और ग्राहकों से मिलना पड़ता था, पर सोशल मीडिया ने इनका काम आसान कर दिया है। और पुलिस के लिए इन अपराधियों को पकड़ना और भी मशक्कत भरा काम हो गया है।

पटना में तो एक आईपीएस पुलिस अधिकारी का ही एक व्यक्ति ने फर्जी अकाउंट बना लिया और लड़कियों को प्रेम जाल में फंसाने के साथ-साथ ट्रस्ट में दान करने के नाम पर भी लाखों रुपये ऐंठ लिए।

फेसबुक पर अनजान लोगों से दोस्ती बढ़ाना और प्यार कर बैठना भी कई मामलों में खतरनाक साबित हो रहा है। किशोर-किशोरियों के भटकने में भी सोशल मीडिया की नकारात्मक भूमिका देखी जा सकती है। वर्चुअल दुनिया के खुलेपन और आज़ादी से प्रभावित हो किशोरियां और युवतियां जाने-अनजाने ही कई समस्याओं को आमंत्रित कर रही हैं।

पुणे में फेसबुक पर चैटिंग के दौरान एक युवती को एक युवक से प्यार हो गया। चैटिंग से बातें फ़ोन तक और फिर मुलाकात तक पहुँची। युवक ने युवती को अपने घर ले जाकर उसका कई दिनों तक यौन शोषण किया। युवती के वापस जाने पर युवक ने उसकी सोने की अंगूठी भी छीन ली। युवती जब गर्भवती हो गयी तो उसने युवक से संपर्क करने की कोशिश की पर उसे बदसलूकी का सामना करना पड़ा।

इसी तरह बेंगलुरु की एक 20 वर्षीय छात्रा की मुलाकात 2 वर्ष पूर्व फेसबुक पर एक लड़के से हुई। दोस्ती प्यार में बदल गयी पर लड़की के घरवालों को यह रिश्ता मंजूर नहीं था। जिसके चलते लड़की ने लड़के से रिश्ता तोड़ दिया। इस पर लड़के ने उस लड़की की न्यूड तस्वीरें पोर्न साईट पर डाल दी। लड़की के निजी पलों की ये तस्वीरें उसने छिप-छिप कर खींच ली थी। लड़की को जब अजीबोगरीब फोन कॉल्स आने लगे और एक अनजान लड़के ने जब उसकी ही न्यूड तस्वीर उसे भेजी तब उसे इस बारे में पता चला।

हालाँकि फेसबुक से शुरू होने वाले प्यार के सभी मामलों का सिर्फ दु:खद अंत ही नहीं होता। फेसबुक के जरिये मिले कई युवक-युवतियों ने प्रेम और शादी की अनूठी मिसाल भी पेश की है। अमेरिका के इंडियाना प्रांत की युवती ने जो कि वहाँ एक होटल में मैनेजर है, गुजरात के एक कम पढ़े-लिखे किसान से अपने प्रेम प्रसंग को शादी में परिणित किया। वह भारतीय संस्कृति से बहुत प्रभावित हुई और दोनों ने हिन्दू रीति-रिवाज से विवाह किया, पर वहीँ दूसरी और कुछ दम्पत्तियों के बीच फेसबुक अविश्वास उत्पन्न कर तलाक का कारण भी बन रहा है।

कुल मिलाकर सोशल मीडिया की उपयोगिता इस बात पर निर्भर करती है कि उसे किस तरह से इस्तेमाल किया जाए। निजी स्तर पर सावधानीपूर्वक इसके इस्तेमाल के साथ ही बड़े पैमाने पर इसे सामाजिक सरोकारों से जोड़ने पर ही इसकी सकारात्मक शक्ति का अंदाजा लगाया जा सकता है।

फेसबुक एडिक्शन सिंड्रोम, आसपास के लोगों से दूर होना, सामाजिक गतिविधियों में कम भागीदारी, इन्टरनेट उपलब्ध ना होने पर बेचैनी, लाइक्स कम होने पर चिड़चिड़ापन, प्रसिद्धि बढ़ने पर आत्ममुग्धता, दूसरों के लाइक्स और कमेंट देखकर ईर्ष्या...ये सब भी फेसबुक और सोशल मीडिया के साइड इफेक्ट्स हैं जिनसे बचना बेहद जरुरी है। सोशल मीडिया तनाव, वैमनस्य और अफवाहों के प्रसार का माध्यम नहीं बनना चाहिए।

इन सबसे इतर अपनी आवाज़ को मुखर करने, अपराधियों के विरुद्ध दबाव निर्मित कर न्याय की लड़ाई लड़ने, आर्थिक मदद जुटाने, अपनी समस्यायों से दुनिया को अवगत कराने और उनका समाधान पाने की दिशा में आधी आबादी के लिए सोशल मीडिया एक अति महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसके जरिये ना केवल न्याय की दिशा में देशव्यापी आन्दोलन किये जा सकते हैं बल्कि पुलिस, प्रशासन और सरकार को भी न्याय के पक्ष में अपनी कार्यवाही के लिए मजबूर किया जा सकता है। जरूरत बस यह है कि महिलाओं को सोशल मीडिया को इस्तेमाल करने के कारगर तरीके सीखने होंगे, क्योंकि सोशल मीडिया के इन साधनों से जुड़े जोखिम कम नहीं है। जरुरत सकारात्मक और संतुलित उपयोग की है।

Monika Jain ‘पंछी’
(12/01/2015)

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January 9, 2015

Quotes on God in Hindi

Quotes about God

  • 8/04/2017 - आस्तिक और नास्तिक सदियों तक लड़ते रहे...फिर एक दिन उन्हें पता (नहीं) चला कि जो 'न अस्ति' है वही 'अस्ति' है और जो 'अस्ति' है वही 'न अस्ति' है।
  • 31/03/2017 - ईश्वर उस तरह से है ही नहीं जैसे उसे सोचा जाता है। वैसे भी उसे सोचा जा ही कैसे सकता है? हाँ, लेकिन पहला अकारण जो भी स्रोत है उसे ही ईश्वर (शून्य) कहा जाता है। पहला है तो अकारण ही होगा। वह कर्ता (creator) नहीं है। अगर उसे कर्ता मानते हैं तो फिर उसकी रचना किसने की यह प्रश्न खड़ा हो जाता है। वह बस है। वास्तव में जो 'कुछ नहीं' है वही ईश्वर है। क्योंकि 'कुछ नहीं' में ही इतनी शक्ति हो सकती है कि वह ‘सब कुछ’ बन सकता है। कुछ नहीं को हम कोई खाली जगह भी नहीं मान सकते जिसका संसार के रूप में विस्तार हुआ हो क्योंकि उस खाली जगह को तो शुरू से ही अनंत होना पड़ेगा। अगर हम उसे सीमाओं में बांधते हैं तो फिर उस सीमा के पार भी तो कुछ होना पड़ेगा। 
  • 31/03/2017 - 'कुछ नहीं' ही तो 'सब कुछ' है और 'सब कुछ' ही तो 'कुछ नहीं'। यह इतना आश्चर्यजनक है कि कहा नहीं जा सकता, लिखा नहीं जा सकता और सोचा भी नहीं जा सकता। वह जिसका लिखना छूट गया, वह जिसका बोलना छूट गया, वह जिसका कुछ भी सोचना छूट गया। उसका हर पल उस शून्य में गुजरता है। असल में वह समय और स्थान से परे हो चुका है। असल में वह 'कुछ नहीं' होकर 'सब कुछ' हो चुका है।
  • 10/03/2017 - कितना अद्भुत है यह देख पाना भी कि दुनिया के अलग-अलग कोनों में, अलग-अलग समय में, अलग-अलग बाह्य पहचानों के साथ जन्में सभी आत्मज्ञानी एक ही बात बोलते हैं। तो सोचो कितना अद्भुत होगा वह क्षण जब हर जगह, हर किसी में, हर समय सिर्फ 'एक' ही नज़र आता होगा।
  • 01/01/2017 - मुझे आज तक ये नहीं समझ आया कि कर्म, ज्ञान, भक्ति, क्रिया...जितने भी मार्ग हैं इनके समर्थक एक दूसरे का विरोध क्यों करते हैं? किसी भी रास्ते से जाने वाला क्या दूसरे से बच पायेगा कभी? मुख्य बात है खुद से खुद के बीच की दूरी मिटा देने की। अगर वह हुआ और हम प्रेम/परम में अवस्थित हो पायें तो जो भी होगा वह शुभ ही होगा।
  • 29/12/2016 - परम के प्रेम में रोना भी कितना सुखद है।
  • 16/12/2016 - परम के प्रेम में मुस्कुराना और आंसू बह जाना...सब अकारण होता है। 
  • 26/10/2016 - कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिनके जवाब किसी चेहरे के पास नहीं होते। फिर भी मन में जब इन प्रश्नों की वजह से कोई उथल-पुथल हो, दुःख, दर्द और भय सर उठा रहे हों अपनी याद दिलाने को, या हो कोई भी सम्बद्ध परेशानी...मन अनायास ही अवचेतन तौर पर याद करने लगता है चेहरे...कि हो शायद कोई ऐसा जाना पहचाना जिसके पास हो इन प्रश्नों का हल! मन के तो खैर ये बहाने हैं खुद को और भी दु:खी करने के। उसे तो इग्नोर करना ही भला। पर अक्सर ही होता है ऐसा कि कुछ समय बाद कोई किताब उठाती हूँ, या खोलती हूँ कोई डिजिटल पन्ना...और लिखी होती है वहां हुबहू मेरी परेशानी। नहीं, किसी समाधान के साथ नहीं बल्कि खुद पर जगा देने वाले इस विश्वास के साथ कि देखो यह कोई समस्या थी ही नहीं। शाश्वत के साथ मित्रता का वाकई कोई सानी नहीं। वह हर भय से मुक्त कर देता है। 
  • 09/04/2016 - जब तक ईश्वरत्व सम्मुख रहता है तब तक उसे पत्थर मारे जाते हैं, जहर दिया जाता है, सूली पर चढ़ाया जाता है। और जब वह अदृश्य हो जाता है तब उसकी प्रतिमाएं बनाकर उसको पूजा जाता है। अज़ब है न?...पर सच भी तो है। सोचो! कहीं तुम अपने अहंकार को तो नहीं पूजते? 
  • 26/06/2015 - जो भक्त बनाना चाहते हैं...भगवान नहीं हो सकते। 
  • 11/06/2015 - बहुत सारे ईश्वर और बहुत सारी श्रद्धाएँ! आस्था और श्रद्धा का हवाला देते अधिकांश लोगों की आस्था खोखली! क्यों? क्योंकि किसी के प्रति आस्था तब तक आस्था नहीं हो सकती जब तक उसके सुविचारों में आस्था ना हो...और सुविचारों में आस्था मतलब कहीं ना कहीं उन्हें अपनाने का प्रयास। जो अपनाने का प्रयास होता तो दुनिया में इतनी समस्याएँ क्यों कर होती?
  • 09/01/2015 - 'अल्लाह ओ अकबर' का नारा लगाकर खून की नदियाँ बहाने वाले इन नर पिशाचों के सामने अगर कोई सबसे बेबस और लाचार नज़र आता है, तो वह खुद इनका अल्लाह ही है। 
  • 20/02/2013 - मैंने लोगों को सिर्फ बदलते देखा है। अगर कोई नहीं बदलता...तो वह है सिर्फ मेरा ईश्वर!...पर मैं शुक्रगुजार हूँ उन सभी लोगों की जिन्होंने मुझे दुःख पहुँचाया या धोखा दिया क्योंकि ऐसा करके उन्होंने मुझे ईश्वर के और करीब कर दिया। 
  • परमात्मा शुरुआत भी है और चरम भी। परमात्मा निर्माण भी है और निर्वाण भी। परमात्मा कारण भी है और परिणाम भी। परमात्मा साधन भी है और साध्य भी। 
  • कुछ लोगों का जनसँख्या के मुद्दे से कोई लेना देना नहीं होता, क्योंकि वे सोचते हैं बच्चे भगवान की देन होते हैं। समझ नहीं आता अपनी करनी लोग भगवान् पर कैसे थोप देते हैं? 
  • कई लोग ईश्वर की पूजा इसलिए करते हैं ताकि वे बुरे काम करने का लाइसेंस प्राप्त कर सके। 
  • ईश्वरत्व को पाने के लिए आडम्बर की नहीं मन की पवित्रता की जरुरत होती है। 
  • एक तरफ सारे संसार के मोह, माया, आकर्षण और छद्म सफलता की दौड़ और दूसरी तरफ सत्य का साक्षात्कार और उसी के अनुपात में मौन और अदृश्यता का जीवन में प्रवेश, जहाँ 'मैं' को पूरी तरह मिटना होता है। उस 'मैं' को जो वास्तव में भ्रम के सिवा और कुछ है भी नहीं। तात्कालिक परिणामों और प्रभावों के चलते पहला पलड़ा सामान्यतया भारी पड़ता है। इसलिए किसी महावीर या बुद्ध का होना एक अति असामान्य घटना है। हम तो प्रकृति के सामान्य नियमों को भी भुला बैठे और इंसान तक ना रहे, फिर ईश्वरत्व तो प्रकृति के सामान्य नियमों से भी पार बहुत दूर की कोड़ी है।
 
Monika Jain ‘पंछी’

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