February 27, 2015

Quotes on Relationship in Hindi

Relationship Quotes

  • 20/05/2017 - कितनी भी बार कट्टी बोल दो कट्टी नहीं होती...फिर ये तीन बार तलाक बोल देने से तलाक कैसे हो जाता है?
  • 16/02/2017 - प्यार/रिश्तों में गुणों-अवगुणों का आदान-प्रदान कभी-कभी इतना भयंकर रूप से होता है कि सुबह 11-12 बजे उठने वाला आलसी और लापरवाह लड़का जिसके आलस और लापरवाही से लड़की कभी-कभी उदास हो जाती है, सुबह 6 बजे नहा कर और बिल्कुल तैयार होकर लड़की को कॉल करके कहता है - तुम अभी तक आई नहीं? तुम्हारा एग्जाम है आज। लेट हो जाओगी। और दूसरी ओर हमेशा सामने वाले की बहुत ज्यादा परवाह करने वाली, आलस से दूर, 5 बजे उठ जाने वाली लड़की नींद में कॉल उठाकर कहती है - सॉरी, मैं तुमको बताना ही भूल गयी थी। इस एग्जाम को देने नहीं जाना है मुझे। :) 
  • 21/11/2016 - रिश्तें कितनी फ़िज़ूल बातों पर चिटकते हैं।
  • 22/09/2016 - कुछ गलतियाँ जैसे कभी निष्फल नहीं होती। किसी महाशक्की इंसान से कुछ समय के लिए भी जुड़ने से बेहतर है...जन्म-जन्मान्तरों तक अकेले रहना। 
  • 11/04/2016 - जो दिमाग से उतर जाते हैं...कभी न कभी उन्हें दिल से भी जाना ही होता है। 
  • 27/01/2016 - कुछ रिश्तों का कोई नाम नहीं होता...और यही उनकी ख़ूबसूरती होती है।
  • 22/02/2015 - शादी के एक दिन पहले तक जो लोग अपने रिश्ते को लेकर तरह-तरह की आशंकाएं पाले बैठे होते हैं, वे शादी के एक दिन बाद ही 'Feeling Loved', 'I am in Love' और भी जाने क्या-क्या फील करने लग जाते हैं। उन्हें खुश देखकर अच्छा लगता है पर प्यार के इतने संकीर्ण मायने?...सोच कर ही सिहर जाती हूँ। और सच बस इतना है कि आजकल रिश्ते सिर्फ देह के धरातल पर ही पनपते हैं जिसमें आत्मा को टटोलने का किसी के पास समय ही नहीं। 
  • 27/02/2015 - एक लेखक की प्रेमिका होना या एक लेखिका का प्रेमी होना इन मायनों में कितना प्यारा है कि जब लिखी जाती है प्रेम कविता कोई तो लिखने वाले के साथ प्यार करने लगते हैं उसे शब्द, प्रकृति, चाँद, सितारे, नदियाँ, फूल, तितिलियाँ और झरने भी। है ना?
  • जो बस विकल्प तलाशते हैं, वे प्रेम क्या कर पायेंगे?
  • प्यार सिर्फ किस्मत से मिलता है, किसी भी योग्यता से नहीं। आप चाहे कितने भी सुन्दर हैं, कितने भी प्रतिभाशाली, आपका कितना भी नाम, सम्मान और रुतबा है और चाहे कितना भी अच्छा व्यवहार, तो भी यह जरुरी नहीं कि आपको जीवन में कोई सच्चा प्यार करने वाला मिलेगा/मिलेगी। क्योंकि प्यार सिर्फ किस्मत से मिलता है। 
  • सदियों में ऐसे लोग बनते होंगे न...जो दिल, दिमाग सब छू जाते हैं, और होठों पर रह जाती है फकत मुस्कुराहटें। क्या कोई अजनबी ऐसा भी हो सकता है जिसके लिए मन एकदम निर्मल और निष्कपट बन जाए और दिल बस प्यार और विश्वास से भरा हुआ? क्या कोई ऐसा भी हो सकता है जिससे दिल बिना कुछ कहे और सुने भी बात करना चाहे उस शुद्धतम और सर्वव्यापी भाषा में जिसे प्रेम कहते हैं? क्या कोई ऐसा भी हो सकता है जिस तक आकर ज़िन्दगी की सारी तलाश खत्म हो जाए? जिसे जानने के बाद और किसी को जानने की ख्वाहिश ही न रहे। जिसके अहसास के साथ कुछ पल जी लेने के बाद लगे कि अब बस मौत भी आ जाए तो कोई गम नहीं। इतना सुकून, इतनी शांति और इतनी ख़ुशी देने वाला भी क्या कोई हो सकता है?
  • तुम चुप थे और वह अनर्गल बोले ही जा रही थी। मैं सुन रही थी। उसके शब्द बेअसर थे। तुम्हारी चुप्पी चुभ रही थी। 
  • हममें से कई लोगों को शिकायत होती है जब कोई वर्तमान के किसी क्षण के परिचय, अच्छे से बातचीत होने और कम्पेटिबिलिटी को भविष्य के अच्छे सम्बन्ध और मित्रता के विकास के रूप में नहीं सोचते, मतलब परिचय को बढ़ाने और स्थायी मित्रता में रूचि नहीं लेते। खैर! संबंधों या मित्रता में न पड़ने के किसी के कोई भी कारण हों, मुझे लगता है किसी के प्रति आत्मीयता महसूस करने और अच्छे से बातचीत करने के लिए भूत की पृष्ठभूमि या भविष्य की कोई आशा की आवश्यकता नहीं है। वर्तमान क्षणों को पूर्णता से जी लेना भी पर्याप्त है। माध्यम जो भी हो हम वर्तमान क्षण में अच्छे से सम्बंधित हो, अधिक जरुरी यह है। 
  • शरीर के तल पर हो या मन के तल पर अधिकांशत: सांसारिक संबंधों के मूल में व्यापार या सौदेबाजी ही होती है। वह तो बस हम चमत्कारी शब्दों की कारीगरी से व्यापार और लेन-देन को भी बहुत पवित्र नामों से नवाज देते हैं। अब ईश्वर को ही ले लो। शब्द भले ही भक्त और धर्म जैसे हो पर ज्यादातर तो ईश्वर लोगों के लिए उनकी इच्छाओं की पूर्ति, उनके दु:खों के निवारण और उनके मनोरंजन का साधन मात्र ही है। शाब्दिक, वैचारिक और भावनात्मक कारीगरी के बल पर हम खुद और दूसरों को कितना सलीके से मुर्ख बना लेते हैं। 
  • Whether you are proportional or inversely proportional...you are related. राग की भर्त्सना कर द्वेष को पकड़ लेने से कुछ खास बदलता नहीं, सम्बन्ध तो बना रहता है। बस और भी पतित हो जाता है। 
  • जहाँ आत्मीयता का स्थान दिखावा लेने लगता है, वहां रिश्तों का क्षरण होने लगता है। 
  • कभी नीम-नीम कभी शहद-शहद...कुछ ऐसे ही तो होते हैं हमारे रिश्तें। जहाँ प्यार का मीठा शहद होता है तो तकरार वाले नीम की कड़वाहट भी। कभी-कभी हम इन दोनों के बीच वाली अवस्था में भी पहुँच जाते हैं। जब सब कुछ फीका-फीका सा हो जाता है- स्वादहीन, उदासीन, बेरंग! रिश्तों में उदासीनता की यह स्थिति लम्बे समय तक होना अच्छा नहीं। हम खूब लड़ लें, झगड़ लें पर बातचीत बंद नहीं होनी चाहिए। जो बातचीत बंद हुई तो समझो नीम की कड़वाहट से शहद की मिठास तक पहुँचने के सारे रास्ते भी बंद हो गए। 
  • अनुष्का और विराट के रिलेशनशिप, ब्रेकअप इन सबके बारे में ज्यादा नहीं पता। लेकिन कुछ ज्यादा ही विचित्र 'हास्य बोध' रखने वाले प्राणियों को दिए विराट के जवाब को पढ़कर ख़याल आया...रिश्ते ऐसे हों कि गर टूट भी जाए तब भी इस बात को लेकर हम कभी शर्मिंदा न हो या खुद को न कोसे कि हमने ऐसे रिश्ते बनाये ही क्यों थे। कोई दिल से भले ही निकल जाए लेकिन दिमाग से न उतरे। बल्कि हम टूटने के बाद भी उस रिश्ते पर फक्र कर सकें और उस व्यक्ति का सम्मान भी। क्योंकि वह व्यक्ति रिश्ता टूट जाने पर भी भरोसे और सम्मान को बनाये रखना जानता है। सही बात का समर्थन और गलत बात का विरोध करना जानता है...और इसके लिए उसे कभी उस अतिविचित्र 'हास्य बोध' की जरुरत नहीं पड़ती जो कुंठा से उपजता है। 
  • केवल एक अच्छा पति या पत्नी बनना पर्याप्त नहीं हैं। हर एक रिश्ते के बीच संतुलन ही एक सुखी परिवार का आधार है।
 
Monika Jain ‘पंछी’

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February 12, 2015

Quote on Love in Hindi

Love Quotes

  • 10/06/2017 - जुड़ाव/लगाव तो मनुष्य का आदतन स्वभाव है। जहाँ भी उसका मानसिक, शारीरिक, आर्थिक या कोई भी अन्य स्वार्थ होगा, हो ही जाएगा। वहां न जाति आड़े आएगी और न ही धर्म! वास्तव में मनुष्य को कुछ सीखना है तो वह है निरपेक्ष प्रेम!
  • 03/06/2017 - कितनी ही बातें होती हैं, जिनके न समर्थन में कुछ कहा जा सकता है और न ही विरोध में। प्रेम निर्विकल्प जो होता है। 
  • 03/04/2017 - सब एक जैसे होकर भी कितने अनूठे हैं। सब अनूठे होकर भी कितने एक जैसे है। प्यार सबके अनूठेपन से भी हो सकता है। प्यार सबके एक सा होने से भी हो सकता है। नफ़रत की जगह कहाँ है? बोलो कहाँ है?
  • 23/03/2017 - ...और जब कोई बहुत ख़ुश होकर कहे, 'तुमने बिल्कुल वही भेजा है जिसकी मुझे जरुरत थी। तुमने किताब नहीं आशीर्वाद भेजा है।'...तो यह श्रद्धा गहरी हो जाती है कि माध्यम या साधन कुछ भी हो, प्रेम ही एक मात्र उपहार है जिसे बाँटा जा सकता है। बाकी कुछ भी हमारा होता ही कहाँ है। 
  • 21/02/2017 - सार्वभौमिक भाषा तो प्रेम ही है...जिसे शब्दों की कोई दरकार ही नहीं। 
  • 18/02/2017 - प्रेम ही तो एकमात्र भाषा है, जिसे किसी अनुवाद की जरुरत होती ही नहीं। 
  • 26/01/2017 - जो प्रेममय होंगे वे दुनिया के किसी भी कोने में हों, वे एक ही बात सोचते हैं, एक ही बात कहते हैं और एक ही बात लिखते हैं। और यह देख और समझ पाने के लिए भी कुछ-कुछ प्रेममय होना जरुरी है।
  • 21/01/2017 - प्रेममय जीवन कविता बन जाता है। 
  • 18/01/2017 - अपरिचित में भी चिर परिचित का दर्शन यही तो प्रेम (सुमिरन) है। 
  • 14/01/2017 - प्राणिमात्र से प्रेम हो जाना ही परम उपलब्धि है। फिर महापुरुष या देवतुल्य कहलाना न कहलाना तो कोई मायने रखता ही नहीं।
  • 07/01/2017 - परम के प्रेम में आंसू और मुस्कान सब अकारण होते हैं।
  • 26/12/2016 - प्रेम तो मन की एक अवस्था है, जिसका किसी दूसरे से कोई संबंध नहीं। जो व्यक्ति प्रेम पूर्ण होता है वह तो ब्रह्माण्ड के कण-कण को प्रेम प्रेषित करता है। उसके तो रोम-रोम से कृतज्ञता झलकती है।
  • 14/12/2016 - किसी को प्रभावित करने का प्रयास सिर्फ इतनी ही सूचना देता है कि आप उससे प्रभावित हैं। बाकी प्रेम तो प्रभाव का अभाव है। 
  • 11/12/2016 - बहुत कम व्यक्तित्व होते हैं ऐसे, जिन्हें पढ़ना खुद को पढ़ने जैसा होता है। ओशो उन्हीं में से एक हैं। टेक्स्ट और कोर्स बुक्स में उलझी मैं...बहुत देर से सही पर ओशो को पढ़ना एक सौभाग्य रहा। क्योंकि मैं यह मानती हूँ कि मृत्यु के मुख पर खड़े होकर भी अगर प्रेम के पायदान पर हम एक और कदम आगे बढ़ पायें तो हमें वह अवसर नहीं गंवाना चाहिए। अभी-अभी पता चला आज ओशो का जन्मदिन है। ओशो तुम्हें अशेष प्रेम। <3
  • 02/11/2016 - प्रेम परिचय का मोहताज ही कहाँ?
  • 09/08/2016 - हमारी समझ वहीं तक पहुँचती है, जहाँ तक हमारा प्रेम पहुँचता है।
  • 28/07/2016 - ऐसा नहीं हो सकता न कि तुम किसी को प्रेम करो और वह तुम्हारे व्यक्तित्व में शामिल न हो। 
  • 20/04/2016 - भाव जो विशेष के लिए नहीं होते...अशेष को पहुँचते हैं। मेरे शब्द भी कुछ ऐसे ही हैं अब...मेरा प्रेम भी तो…! 
  • 18/12/2015 - प्रेम करने का बस एक ही तरीका है ~ प्रेम हो जाना। 
  • 14/08/2015 - प्रेम पाने वाले में पात्रता हो ना हो पर प्रेम करना निश्चय ही एक पात्रता है, जो विरलों को ही मिलती है।...और जिस ह्रदय को प्रेम करना आ जाता है, उस ह्रदय में किसी से भी नफरत के लिए कोई जगह नहीं बचती।
  • 24/06/2015 - प्यार से कहे चंद शब्द रोक सकते हैं जाने कितनी बहसों को, सुलझा सकते हैं अनगनित समस्याएँ, कम कर सकते हैं भयंकर चोटों का दर्द, जोड़ सकते हैं कई टूटते रिश्ते, और बचा सकते हैं जाने कितनी जिंदगियाँ। पर अहंकार, स्वार्थ और असंवेदनशीलता के मारे हम सब...अव्वल दर्जे के गरीब हैं। 
  • 20/06/2015 - प्रेम कभी दुःख का कारण नहीं होता। प्रेम कभी कोई समस्या भी नहीं होती...हो ही नहीं सकती। प्रेम तो बस समाधान होता है...सिर्फ समाधान।
  • 11/06/2015 - अपने आदर्शतम स्वरुप में प्रेम स्वभाव होता है और यह सापेक्ष नहीं निरपेक्ष होता है।
  • 08/06/2015 - प्यार बाद में होता है उसके दुश्मन पहले पैदा हो जाते हैं। 
  • 17/02/2015 - जीवन में कभी प्यार की कमी महसूस हो तो खुद को ही प्रेम से इतना परिपूर्ण कर लो कि किसी और की जरुरत ही ना रहे। दिल बहलाने को ख़याल अच्छा है न?
  • 16/02/2015 - जो स्वार्थ वश दूसरों को कष्ट पहुँचाये, वह कुछ भी हो प्रेम नहीं हो सकता। प्रेम तो संवेदनशीलता की नमी में उगने वाला वह पौधा है, जो बस मीठे फल (किसी को भले ही कड़वे लगे) देना जानता है। ऐसे फल जिनसे दुनिया की सारी समस्यायों, सारी चिंताओं, सारी तकलीफों और सारे दु:खों का निवारण हो सकता है।
  • 12/02/2015 - जिसे प्यार करते हो उसे मुक्त कर दो। तभी प्रेम सार्थक है, वरना तो बस स्वार्थ है। 
  • प्रेम जिसे स्वभाव होना था...आसक्ति, मोह, लालच और स्वार्थ बन गया। प्रेम जिसे बंधन रहित होना था...सम्बन्ध बन गया। वह कौम की कैंची से कुतरा गया, क्षेत्रीयता की धार से काटा गया। प्रेम कतरन-कतरन हो गया। प्रेम, प्रेम नहीं रहा। 
  • उपेक्षा तभी तक महसूस होती है, जब तक अपेक्षा रहती है और जब तक अपेक्षाएं रहती है तब तक विशुद्ध प्रेम नहीं होता।
  • आकार का निराकार होते जाना ही प्रेम है।
  • जब-जब अपेक्षाओं का पतझड़ आता है...मन में प्रेम के फूल खिल जाते हैं। तब सब कुछ अच्छा और प्रेममय लगता है...अकारण ही। और अकारण प्रेम के प्रकट होने से सुन्दर कुछ हो सकता है भला?
  • प्रेम अँधा होता है...यह जितना सच है, उतना ही सच है यह भी कि प्रेम के अतिरिक्त और किसी के पास आँखें होती ही नहीं। शब्दों के अर्थ बदलते ही सारा परिदृश्य बदल जाता है। आयाम बदलते ही सारे मायने बदल जाते हैं। 
  • जितना सुलभ है ’प्रेम है’ कहना...उतना ही दुर्लभ है ’प्रेम होना’। 
  • व्यक्ति चेतना बनकर विश्व (ब्रह्मांडीय) चेतना को नहीं समझा जा सकता है। उसके लिए विश्व चेतना ही होना होता है। जैसे प्रेम के होने के लिए खुद को ही प्रेम होना होता है।
 
Monika Jain ‘पंछी

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February 8, 2015

Love Letter on Valentine's Day for Him in Hindi

Love Letter on Valentine's Day for Him in Hindi

एक दिन तुमसे जरुर मिलूँगी 
(अहा! ज़िन्दगी में प्रकाशित)

तुम्हारी ओर क्यों खिंची चली आ रही थी, अब तक नहीं जानती थी। पर जब मासूम अंदाज़ में कही तुम्हारी बातें खुद को बार-बार दोहरा रही थीं तो अचानक अहसास हुआ कि दुनिया में सबसे ज्यादा आकर्षण अगर किसी चीज में है, तो वह मासूमियत में ही तो है। वह मासूम पिल्ला, नन्ही चिड़िया, शांत कबूतर, भोली बछिया, फुदकता मेमना, कोमल शिशु, उसकी नन्हीं-सी चप्पल और ऐसी ही मासूमियत को समेटे दुनियाभर की चीजें ही तो सदा से मेरे आकर्षण का केंद्र रही हैं। जिन्हें देखते हुए एक उम्र गुजारी जा सकती है। जिन्हें देखते हुए सारे गम भुलाये जा सकते हैं। जिन्हें देखते हुए दुनिया बहुत-बहुत खूबसूरत लगती है। उस मासूमियत का अंश अगर कहीं पाऊँगी तो खुद को कैसे रोक पाऊँगी? और अब तो रोकना चाहती भी नहीं, क्योंकि मासूमियत से प्रेम ही तो सच्चे अर्थों में ईश्वर से प्रेम है।

तुम तो शायद जानते भी नहीं होंगे कि तुम्हारे बारे में सोच-सोचकर ही चेहरे पर मुस्कुराहट खिल आती है। तुम्हारे खयालों में पूरा दिन और पूरी रात मुस्कुराया जा सकता है। यह दिल तुम पर आँख मूंदकर भरोसा करना चाहता है। जी करता है तुम्हारा हाथ पकड़ लूँ और तुम्हें अपलक देखते हुए, जहाँ तुम चाहो, बिना कुछ सोचे चलती रहूँ। हाथ गालों पर टिका तुम्हारे सामने बैठूं और चुपचाप घंटों तुम्हें सुनती रहूँ। तुम्हें क्या पता...तुम्हारी तो हर बात मानने का दिल करता है।

जब भी तुम मुस्कुराते हो न तो कुछ ऐसा जादू होता है कि मेरा रोम-रोम मुस्कुराने लगता है। मैं अक्सर तुम्हारी मुस्कुराहटों को काउंट करने लगती हूँ, इस दुआ के साथ कि एक दिन ऐसा आये जब तुम्हारी मुस्कुराहटों को गिन पाना संभव ही न हो। वो अनन्त खुशियों वाला दिन कितना अनुपम होगा न? उस दिन सृष्टि का कण-कण, पत्ता-पत्ता, जर्रा-जर्रा मुझे तुम्हारी मुस्कुराहट प्रेषित करेगा। और मैं? मैं उस दिन बहुत रोऊँगी। जानते हो क्यों? क्योंकि उस दिन मेरे आँसू भी तो मुस्कुराएंगे न!

तुम्हें पता है? जब तुम नहीं होते, तब भी मैं तुमसे बातें करती हूँ, उस सर्वव्यापी भाषा में जिसे प्रेम कहते हैं। इतना निर्मल और निष्कपट मैंने खुद को कभी महसूस नहीं किया। इतने प्यार और विश्वास ने मुझे कभी नहीं छुआ। तुम्हें जान लिया तो लगता है, अब किसी को जानने की ख्वाहिश नहीं। इतना सुकून, इतनी शांति और इतनी ख़ुशी कि तुम तक आकर ज़िन्दगी की तलाश खत्म होती सी लगती है।

सच कहूँ तो तुम्हें चाहना ज़िन्दगी को चाहना है। जीने की इच्छा जाग उठती है सिर्फ तुम्हें चाहने के लिए। दिल करता है मांग लूँ ईश्वर से एक और जीवन सिर्फ और सिर्फ तुम्हें प्यार करने के लिए। वह जीवन जिसमें तुम्हारे साथ और सामीप्य के लिए किन्तु, परन्तु, अगर, मगर जैसा कोई शब्द मुझे रोक ना सके। वह जीवन जिसमें भूत की परछाइयों और भविष्य के झरोखों से झाँकते भय का कोई अस्तित्व ना हो। वह जीवन जिसमें सिर्फ तुम और सिर्फ मैं के बीच कुछ हो तो वह हो सिर्फ प्रेम! वह प्रेम जो सिर्फ मैं और सिर्फ तुम के अस्तित्व को सदा के लिए मिटा दे और रह जाएँ सिर्फ हम।

फिर चाहे मैं भोर की पहली किरण बनकर तुम्हारी अलसाई आँखों को सहला उनमें चमक जाऊँ, या फिर चाय की प्याली से चुस्कियाँ लेते तुम्हारे होठों के बीच की रिक्तता से हवा बन तुममें घुल जाऊँ। भोर के भ्रमण में तुम्हारा स्वागत शीतल झोंका बनकर करूँ, या फिर सूरज की गर्मी से सूखे तुम्हारे कंठ में पानी का घूँट बनकर उतरूँ। होली के रंगों में से कोई रंग बनकर तुम्हारे गालों पर खिल जाऊँ, या फिर बारिश की एक बूँद बनकर तुम पर बरसूँ और हौले से तुम्हारे होठों पर लुढ़क आऊँ। रात तुम्हारे सिरहाने कोई मीठी सी धुन बनकर तुम्हें सुलाऊँ या फिर एक हँसी ख़्वाब बनकर नींदों में भी तुम्हें गुदगुदाऊँ। कोयल की कूक बनकर मिश्री सी तुम्हारे कानों में घुलूं या फिर भीगी मिट्टी की सौंधी ख़ुशबू बन तुम्हारी साँसों से जा मिलूं।

नहीं जानती कैसे, पर एक दिन तुमसे जरुर मिलूँगी। बनूँगी एक लम्हा और बस तुम्हें छू लूंगी।

Monika Jain ‘पंछी’
(08/02/2015)

Wish you all a very Happy Valentine’s Day. Feel free to add your views about this love letter.