March 9, 2015

Misunderstanding Quotes in Hindi

Misunderstanding Quotes

  • 06/02/2017 - कुछ लोग बंद आँखों से भी पढ़ लेते हैं और कुछ खुली आँखों से भी नहीं पढ़ पाते।
  • 11/11/2016 - कुछ लोग कुत्ता पालते हैं, कुछ बिल्ली पालते हैं और कुछ सिर्फ गलतफहमियां। 
  • 21/12/2016 - मेरे जीवन की सबसे बड़ी ट्रैजेडी यह है कि जब भी मैंने प्रेम में कुछ कहा, किया या लिखा...तो या तो वह बहुत हाई लेवल की बात लगी या फिर कोई बात ही नहीं लगी और लगी तो पता नहीं क्या-क्या लगी।
  • 10/09/2016 - जिनसे भी आपका 36 का आँकड़ा हो उन्हें पढ़ना तत्काल बंद कर देना चाहिए। क्योंकि वे कुछ भी सोचकर लिखेंगे, किसी भी सन्दर्भ में लिखेंगे, अपने विचारों की चक्की में घुमा-घुमाकर आप उस लिखे हुए को अपने विरुद्ध बना ही लेंगे। 36 के आँकड़े वालों से संवाद तो होते नहीं, इसलिए गलतफहमियां बढ़ने के अतिरिक्त और कोई आसार भी नहीं होते।
  • 17/04/2016 - भाषा की सीमायें जो नहीं समझते...उनके पास तर्काभासों का ढेर होता है। और यहाँ भाषा की सीमा का आशय केवल भाषा की शिष्टता व मर्यादा से नहीं, कुछ भी अभिव्यक्त कर पाने में भाषा की कमियों से भी है। ऐसे में मुख्य बात होती है भावार्थ तक पहुँच पाना।
  • 27/03/2016 - तुम कुछ भी कहो...कोई उतना ही समझेगा, जितना वह समझ सकता है और समझना चाहता है।
  • 01/11/2015 - ओशो के विचारों की ओशो के ही भक्तों द्वारा धज्जियां उड़ते देखना अच्छा नहीं लगता। खैर! ओशो ही क्या यह बात तो हर विचारक के साथ है। पर जब ओशो कहते हैं अपनी सारी कमियों, बुराइयों, वासनाओं, इच्छाओं, अपराधों को स्वीकारने की बात...तो इसका आशय यह नहीं होता कि कोई अपनी बुराइयों या कमियों के प्रति इतना मुग्ध हो जाए कि उससे छुटकारा पाने की सारी जिम्मेदारी परमात्मा पर डालकर खुद चैन से डूबा रहे। स्वीकार करना सुधार करने की दिशा में पहला कदम है। जब तक हम अपने मन में यह स्वीकार नहीं करेंगे कि हम चोरी करते हैं, जब तक हम यह स्वीकार नहीं करेंगे कि हम झूठ बोलते हैं, जब तक हम यह स्वीकार नहीं करेंगे कि हम क्रोध करते हैं, शोषण या अन्याय करते हैं तब तक हम इन्हें दूर करने या सुधार करने की दिशा में सोच भी कैसे पायेंगे? समर्थक या अनुयायी बनना ज्यादातर लोगों के लिए सबसे आसान काम है। जिसका समर्थन किया जा रहा है उसे समझ पाना बड़ा मुश्किल।
  • 08/06/2015 - बड़ी समस्या है...कुछ भी कहना या लिखना जितना अच्छा साबित हो सकता है, उतना ही ख़तरनाक भी। भाषा की सीमाएँ नहीं कर पाती मंतव्य को पूरी तरह स्पष्ट और फिर कई बार होने लगते हैं अर्थ के अनर्थ। 
  • 18/05/2015 - कौन ज्यादा अभागा? जिसे समझा नहीं गया वह या फिर जो समझ नहीं पाया वह?
  • 09/03/2015 - उफ़! ये अकाउंट डीएक्टिवेट करो, तो दस लोग सोचने लगते हैं कि हमें ब्लॉक कर दिया। इतने दिन से पढ़ रहे हैं पर इतना सा नहीं जानते?...और मुझ पर भरोसा नहीं तो न सही, कम से कम खुद पर तो भरोसा हो।
  • 08/12/2014 - भला हो जाता सारी दुनिया का अगर लोग शब्दों को पकड़ने के बजाय, उनके मर्म को समझ लेते।
  • 04/10/2014 - आप सुबह के बाद सीधा रात में ऑनलाइन आते हैं। कभी-कभी हो सकता है आप कई दिनों बाद भी आयें। इस बीच आपके पास फेसबुक पर मैसेज आते हैं। ऑनलाइन आने के बाद आप तुरंत उनका रिप्लाई करते हैं और तभी आपको ये पता चलता है कि आपको तो रिप्लाई न किये जाने की वजह से पहले ही अनफ्रेंड कर दिया गया है। अजीब लगता है, जब वो लोग ऐसा करते हैं, जिनके प्रति आपके मन में सम्मान है, जो अच्छे इंसान है और जिनके पोस्ट्स आप नियमित पढ़ते हैं। आभासी दुनिया में गलतफहमियाँ होने के चांसेस और भी ज्यादा बढ़ जाते हैं, लेकिन दूसरों पर ना सही खुद पर इतना भरोसा होना चाहिए कि कोई भी व्यक्ति बेवजह हमें इग्नोर क्यों करेगा? यहाँ तक कि मैसेज सीन हो जाने के बाद रिप्लाई न आने पर भी हममें इतनी समझदारी होनी चाहिए कि सामने वाला व्यक्ति किसी जरुरी काम में फँसा हो सकता है, नेट डिसकनेक्ट हो सकता है, वह तसल्ली से फ्री होकर बात करना चाहता हो, या फिर कोई भी और वजह हो सकती है। कई बार हम जो पोस्ट्स लिखते हैं, उनको खुद पर लेकर भी कई लोग ग़लतफ़हमी का शिकार हो जाते हैं। कई बार कमेंट का रिप्लाई ना दे पाने की स्थिति में भी ऐसा होता है और भी कई कारण होते हैं। बेहतर है गलतफहमियों को सीधा संवाद कर दूर कर लिया जाए और जहाँ तक मेरी बात है तो बेवजह मैं किसी को इग्नोर नहीं करती (छिछोरों को छोड़कर) और अच्छे लोगों को तो बिल्कुल भी नहीं। फिर भी आपको मुझ पर ना सही कम से कम खुद पर तो भरोसा होना चाहिए। 
  • फेसबुक के कुछ नेगेटिव इफेक्ट्स में से एक जो मुझे सबसे बुरा लगता है, वह है गलतफहमियों को बढ़ावा देना। जितने भी सालों से फेसबुक पर हूँ एक चीज कई बार महसूस की है कि पोस्ट क्या सोचकर लिखी जाती है लेकिन क्या समझकर ले ली जाती है। सिर्फ एक सामान्य विचार को कई बार व्यक्तिगत आक्षेप समझकर ले लिया जाता है। यह अनुभव सभी लोगों का होगा? जहाँ तक मेरा सवाल है व्यक्तिगत टिपण्णी करने वाली पोस्ट सामान्यत: मैं नहीं करती, जो भी लिखती हूँ वह लम्बे समय का ऑब्जरवेशन या अनुभव होता है, जो इत्तेफाक़न कभी-कभी उस समय भी शब्द रूप में आ जाता है जब वैसी ही कोई बात फिर दोहराई गयी हो। लेकिन नफरत, द्वेष या किसी को नीचा दिखाना उसका उद्देश्य बिल्कुल नहीं होता। व्यक्तियों से कोई समस्या सामान्यतया नहीं होती इसलिए ही अनफ्रेंड या ब्लॉक करने की जरुरत भी बहुत कम पड़ती है। लेकिन यह गलतफहमियों को बढ़ावा मिलते देखना और आपसी मनमुटाव और द्वेष का बढ़ना एक अच्छा संकेत नहीं है। विचारों को बस विचारों की तरह लीजिये। उनसे प्रभावित होते हैं तो उन्हें अपनाइए, और पसंद न आये तो अपने विचार बताइये या इग्नोर कीजिये, लेकिन गलतफहमियां मत पालिए। फेसबुक अगर नफरत बढ़ाने का कारण बनता है तो फिर इसके होने का कोई औचित्य नहीं रह जाता। इसे प्रेम बढ़ाने का साधन बनाइये, नफरत फ़ैलाने का नहीं। 
  • जिसने नासमझने की ठानी हो, उसे समझाना भी तो नासमझी ही है।

 Monika Jain ‘पंछी’

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