May 31, 2015

Making Fun of Someone Quotes in Hindi

Fun Quotes

  • 03/06/2017 - आपको कोई व्यक्ति/नेता/सेलिब्रिटी पसंद नहीं है, यह आपका व्यक्तिगत मामला है। लेकिन अपनी नापसंदगी की वजह से अमुक व्यक्ति की किसी महिला के साथ सामान्य सी तस्वीरों पर भी भद्दी छिछोरी कहानियां गढ़ने वालों! कितने कम शब्दों में अपना परिचय दे देते हो तुम। कई बार, कई जगह देखा है – महिला-पुरुष की बात आते ही इस देश के अधिकांश लोगों की सोच बस एक ही संकीर्ण दायरे में घूमती रहती है। पुरुष, महिला और उनके रिश्तों को सामान्य न लेने वाले देश में एक ओर इतनी चमत्कारी कहानियां घूमती रहती है और दूसरी ओर रोज बलात्कार घटित होते हैं तो किम आश्चर्यम्?
  • 04/02/2016 - बहुत हँसती हूँ मैं, लेकिन एक निर्दोष हंसी और एक भद्दे, कुरूप, विद्रूप व्यंग्य में गहरा अंतर है, यह भी समझती हूँ...और ऐसे व्यंग्य चाहे किसी पर भी हो नहीं हँसा पाते। और कितनी अजीब बात है...अक्सर जो लोग सबसे ज्यादा फब्तियां कसते हैं, वे अपने ऊपर एक भी नहीं झेल पाते। 
  • 30/10/2015 - हंसी चाहे 100 वाट की हो, 200 वाट की या 1000 वाट की...किसी दूसरे का मजाक उड़ाने, अपमान करने या नीचा दिखाने पर आश्रित नहीं होती। अगर हो रही है तो हम समझ लें कि वह सहज हास्य नहीं कुंठित हास्य है। 
  • 31/05/2015 - कुछ लोग किसी की स्वीकारोक्ति पर उसका मजाक उड़ाते हैं। ऐसे लोग असल वाले मुर्ख होते हैं और सच्चाई और ईमानदारी के खात्मे में परम सहयोगी भी। 
  • 31/05/2015 - हर कोई हर चीज में विशेषज्ञ नहीं होता। मुझे अच्छा नहीं लगता जब लोग किसी की अयोग्यता और अकुशलता का मजाक बनाते हैं। 
  • 06/03/2016 - फेसबुक मेमोरीज (on this day) में कुछ पुरानी पोस्ट्स को पढ़कर अब हंसी आती है। :p...और कुछ-कुछ मुझ पर भी हँसती हैं। :( बस ये भी एक दिन पहले वाली केटेगरी में आ जाए। खुद पर खुद हँसना बेहतर है न? :) 
  • खिल्ली उड़ाने में माहिर लोग खिल्ली उड़ने से इतना डरते क्यों हैं? 
  • काश! संकीर्णता आस्तिकता या नास्तिकता की मोहताज होती। साधुओं के वेश में छिपे असाधुओं के पाखंडों की चर्चा बहुत की है, आगे किसी और दिन फिर कर लेंगे। आज बस आपकी बात करते हैं। आप बस इतना बताईये कि किसी भी साधु-सन्यासी (जिससे आप परिचित तक नहीं) की किसी स्त्री की ओर देखते हुए...या कुछ अन्य जेस्चर दिखाते हुए और उनकी खिल्ली उड़ाते शब्दों के साथ पिक्स शेयर करते हुए आप किस मानसिकता का परिचय दे रहे होते हैं? एक पिक्चर मात्र (जिसमें कोई जेस्चर क्लिक करते समय अनजाने में किसी भी वजह से बन सकता है, जिसे आप अपनी मर्जी से कहीं भी प्रोजेक्ट कर देते हैं) से आप किसी के भी चरित्र का सम्पूर्ण बखान कर सकते हैं? और क्या किसी की साधुता या ब्रह्मचर्य की परिभाषा आप इससे करते हैं कि वह किसी स्त्री को देख भी नहीं सकता...छू भी नहीं सकता...बात भी नहीं कर सकता? 

Monika Jain ‘पंछी’

May 24, 2015

Story of Maharana Pratap Singh in Hindi

महाराणा प्रताप का प्रतीक

स्कूल की छुट्टी हो गयी थी। रमन, सुलेखा, चित्रा, दीपक, सृष्टि, अमन और प्रतीक सभी बच्चे बहुत उत्साहित लग रहे थे। कुछ दिनों बाद उनके स्कूल में विचित्र वेशभूषा प्रतियोगिता जो थी और इन सभी ने उसमें अपना नाम लिखवाया था। सभी घर आते हुए इसी पर चर्चा कर रहे थे।

‘मुझे समझ नहीं आ रहा मैं क्या बनूँगा।’ दीपक ने कहा।

मैंने तो सोच लिया है, ‘मैं तो मीरा ही बनूँगी।’ चित्रा बोली।

‘तू मीरा बनेगी तो मैं कृष्ण बन जाऊँगा। अब से तू मेरी भक्त हुई। चल आशीर्वाद ले चुहिया!’ अमन ने चित्रा को चिढ़ाते हुए कहा और सारे बच्चे हँस पड़े।

‘आशीर्वाद ले मेरा ठेंगा। तुझ पर तो कंस बनना ही सूट करेगा कनखजूरे!’ चित्रा मुंह बनाते हुए बोली और फिर से सबकी हंसी छूट गयी।

‘इन दोनों की लड़ाई तो कभी खत्म न होने वाली। वैसे तुम लोग यह तो भूल ही गए कि इस बार इस प्रतियोगिता में कुछ नया भी शामिल किया गया है।’ रमन बोला।

‘अरे हाँ! मेम ने कहा था कि इस बार जो जिस पात्र का अभिनय करेगा उसे उसी के जीवन से सम्बंधित प्रश्न भी पूछे जायेंगे और यह भी प्रतियोगिता के मूल्यांकन का एक अहम् हिस्सा है।’ सृष्टि ने रमन की बात आगे बढ़ाते हुए कहा।

‘पर यह सब हम कैसे पता करेंगे?’ सुलेखा ने चिंतित होते हुए पूछा।

‘हे चिंता देवी! इन्टरनेट किस दिन काम आएगा?’ अमन ने बेफिक्र होते हुए कहा।

प्रतीक आज बिल्कुल चुप था और अपने में ही खोया हुआ था। कुछ देर में सब बच्चे घर पहुँच गए।

घर पहुँचते ही प्रतीक इन्टरनेट पर कुछ सर्च करने लगा।

‘बेटा! खाना तो खा लो पहले और यह क्या तुमने अपनी यूनिफार्म भी नहीं बदली अभी तक?’ प्रतीक की मम्मी ने कहा।

प्रतीक ने उत्साहित होते हुए पापा-मम्मी को प्रतियोगिता के बारे में बताया और कहा, ‘मैं महाराणा प्रताप बनना चाहता हूँ पापा! आज उनकी एक कविता आई थी हमारी हिंदी की किताब में। बस तब से ही उनके बारे में और ज्यादा जानने की इच्छा है। और फिर हमसे हम जो भी बनेंगे उनके जीवन से आधारित प्रश्न भी तो पूछे जायेंगे।’

‘अरे वाह! महाराणा प्रताप ही तो बना था मैं अपने कॉलेज के दिनों में उनके जीवन पर आधारित एक नाटक में। चलो पहले कपड़े बदलकर खाना खाओ फिर मैं तुम्हें सब कुछ बताता हूँ उनके बारे में।’ प्रतीक के पापा ने गर्व से कहा।

प्रतीक यह जानकर बड़ा ख़ुश हुआ। शाम में पापा के पास बैठकर उसने बड़े ध्यान से महाराणा प्रताप के बारे में सब कुछ सुना और प्रतियोगिता की तैयारी शुरू कर दी।

आज प्रतियोगिता का दिन था। अंतिम बारी प्रतीक की ही थी। लम्बी कद काठी वाला हष्ट-पुष्ट प्रतीक बिल्कुल महाराणा प्रताप का छोटा प्रतिरूप ही लग रहा था। उसके चेहरे का ओज और आत्मविश्वास भी देखते ही बनता था। उसके स्टेज पर आते ही सब तरफ से तालियों की गड़गड़ाहट गूँज पड़ी।

जज महोदय ने पूछा, ‘प्रतीक, कौनसी बात ने तुम्हें महाराणा प्रताप बनने के लिए प्रेरित किया?’

प्रतीक ने कहा, ‘सर यूँ तो महाराणा प्रताप का पूरा जीवन ही इतना प्रेरणादायक है कि प्रतियोगिता में ही सही महाराणा प्रताप का अभिनय करना मेरे लिए बहुत हर्ष का विषय है। पर हाँ, महाराणा प्रताप बनने का विचार मेरे मन में तब आया जब हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तक में महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक और हाथी रामसिंह का उल्लेख आया था। कहते हैं हल्दीघाटी के युद्ध में मानसिंह के हाथी पर जब चेतक ने अपने दोनों पाँव चढ़ा दिए तब हाथी की सूंड पर बंधी तलवार से उसका एक पैर कट गया था। ऐसी हालत में भी वह लगातार युद्ध भूमि में महाराणा प्रताप का साथ देता रहा। जब प्रताप युद्ध भूमि से बाहर निकल रहे थे तब दो मुग़ल सैनिक उनके पीछे थे। सामने 26 फीट चौड़ा नाला था। चेतक जिसका एक पैर कटा हुआ था, उसने इस स्थिति में भी अपने स्वामी की रक्षा के लिए अपना सारा बल लगाकर उस नाले को पार कर लिया और सैनिक पीछे ही रह गए। इसके बाद चेतक की गति मंद पड़ गयी और वह वीरगति को प्राप्त हुआ। इसी तरह महाराणा प्रताप के हाथी रामप्रसाद को मानसिंह ने बंदी बनाकर अकबर को भेंट किया था। पर रामप्रसाद ने शत्रु के यहाँ 18 दिनों तक दाना-पानी कुछ भी नहीं खाया और शहीद हो गया। जिस महाराणा प्रताप से जानवर भी इतना प्यार करते थे कि उनके लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया, वे स्वयं कितने विलक्षण और अद्भुत होंगे यह सोचते हुए ही मेरे मन में महाराणा प्रताप बनने और उनके बारे में ज्यादा से ज्यादा जानने की इच्छा जागृत हुई और जितना मैं उनके विषय में जानता गया उतना ही मेरे मन में महाराणा प्रताप और मेवाड़ की इस भूमि के प्रति सम्मान बढ़ता गया। न जाने कितनी बार ऐसा हुआ जब महाराणा प्रताप के बारे में पापा से सुनते हुए मेरी आँखों में आंसू आ गए। महाराणा प्रताप जैसे वीरों की गाथाएं हमारी अमूल्य धरोहर है। मैं अगर उनके जीवन से कोई एक गुण भी गृहण कर पाऊं तो मेरे लिए बहुत ख़ुशी की बात होगी।’

प्रतीक का जवाब सुनकर पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। सभी की आँखें नम हो गयी। जब पुरस्कार की घोषणा होने लगी तो सब तरफ से प्रतीक-प्रतीक के स्वर गूँजने लगे। प्रतीक को पहला पुरस्कार मिला और पूरा हॉल महाराणा प्रताप की जय-जयकार से गूँज उठा।

Monika Jain ‘पंछी’
(24/05/2015)

May 9, 2015

Broken Heart Love Story in Hindi

Broken Heart Love Story in Hindi
 
मैंने मांग लिया तारों से उनका ना टूटना
(अहा! ज़िन्दगी में प्रकाशित)
(कहानी व कहानी के सभी पात्र काल्पनिक हैं।)

तो आखिर आज आ ही गया तुम्हारा जन्मदिन! हर साल कितनी बेसब्री से इंतजार रहता है इस दिन का। और हर बार लगता है जैसे हर साल आने वाला यह दिन जाने कितने सालों बाद आया है। तुम्हें तो पता भी नहीं सालों पहले तुम्हारा जन्मदिन जानने के लिए घंटों कंप्यूटर के सामने बैठकर कितनी मशक्कत की थी मैंने। तुमने तो सारी दुनिया से इसे छिपाने के प्रबंध कर रखे थे। पर मैं भी हार कहाँ मानने वाली थी। तुमसे और तुम्हारे दोस्तों से बिना कुछ पूछे तुम्हारा जन्मदिन जो जानना था। और आखिरकार तीन-चार घंटों की मेहनत रंग ले ही आई। बस तब से यह दिन मेरे जीवन का सबसे खास दिन बन गया है। कभी-कभी इस जुनून और दीवानगी के बारे में सोचती हूँ तो बरबस हँसी छूट जाती है और साथ ही हो जाती है ये आँखें भी नम। सोचती हूँ इतनी शिद्दत से ईश्वर को ढूंढा होता तो शायद वे भी मिल जाते। पर देखो न तुम ना मिले।

कितने पागल से दिन थे वे। तुम तो मुझसे कोसों दूर थे पर सिर्फ तुम्हारी एक झलक पाने के लिए दिन में बीसों बार अपना फेसबुक अकाउंट लॉग इन करती और तुम्हारे स्टेटस! वो तो मेरे लिए जैसे रोज की गीता बाँचना था। कभी कई दिनों तक तुम्हारी कोई हलचल ना दिखाई देती तो मैं परेशान हो उठती। इंतजार के वे पल बड़े भारी लगते। रह-रहकर ख़याल आ जाता सब ठीक तो है न? पर तुमसे पूछने की हिम्मत कभी न जुटा पाती।

फिर एक दिन तुमने ही बात करना शुरू किया और मैं पगली, ख़ुशी के मारे हूँ-हाँ से ज्यादा कुछ बोल ही न पायी। धीरे-धीरे हम दोस्त बने और फिर दोस्ती से प्यार का सफ़र...उस वक्त ऐसा लगता था जैसे सारी दुनिया की खुशियाँ मेरे दामन में आकर सिमट गयी हो।

फिर एक दिन जाने क्या हुआ। अचानक तुमने कहा कि यह रिश्ता तोड़ना होगा हमें। कोई वजह भी कहाँ बताई तुमने और बिना कुछ कहे चले गए हमेशा के लिए। पर मैंने कहा था न टूटा हुआ कुछ भी अच्छा नहीं लगता मुझे। बस इसलिए ही मैंने नहीं तोड़ा यह रिश्ता आज तक। प्यार के उस अंकुरित बीज को देती रही अपनी वफ़ा का खाद और पानी...और कब यह एक विशाल वृक्ष बन गया पता भी न चला। तुम्हारी अनुपस्थिति में भी तुम्हारा अस्तित्व मेरे जीवन में इतना गहरा होता चला गया कि अब कोई मुझमें मुझे तलाशेगा तब भी सिर्फ तुम्हें ही पायेगा।

लड्डू बहुत पसंद हैं न तुम्हें? हर साल की तरह इस साल भी वही बनाये हैं। तुम्हें याद है? पहली बार जब तुमने मेरे हाथों से बने लड्डू खाए थे तो मेरा नाम ही लड्डू रख दिया था। अब तो सालों गुजर गए इन कानों ने अपने लिए यह नाम नहीं सुना। वैसे भी तुम्हारे सिवा कोई लड्डू कहता भी तो अच्छा कहाँ लगता।

तुम कहाँ हो, कैसे हो, क्या कर रहे हो कुछ भी नहीं पता। मैं तुम्हारी स्मृतियों में हूँ या नहीं यह भी नहीं जानती। तुम तक कुछ पहुँचाऊ तो भी कैसे? यूँ तो कभी मंदिर नहीं जाती पर यह तुम्हारा ही विश्वास था न कि दुआएँ और प्रार्थनाएँ दुनिया के किसी भी कोने में पहुँच जाती है। बस इसलिए हर साल इस दिन लड्डू लेकर पहुँच जाती हूँ मंदिर और मांग लेती हूँ ईश्वर से तुम्हारे जीवन में लड्डुओं की सी मिठास।

अक्सर सखियाँ हँसती है मुझ पर। कहती हैं, ‘कंगना! पागल लड़की! कब तक उसके लिए दुआएँ मांगती रहेगी जिसे तेरी जरा भी फिक्र नहीं। जिसने इतने सालों में एक बार भी तेरी खोज-खबर लेने की कोशिश नहीं की कि तू कैसी है, किस हाल में है। कभी भगवान से अपने लिए भी कुछ मांग लिया कर।’ मैं बस मुस्कुरा कर रह जाती हूँ। अब उन्हें कैसे बताऊँ कि मेरे भीतर मेरा कुछ रह ही कहाँ गया है।

अक्सर तारों से भरी रातों में चाँद को निहारते हुए जब अचानक कोई तारा टूट जाता था तो तुम आँखें बंद कर मांग लेते थे हमेशा के लिए मुझे और मैं बस अपलक तुम्हें देखती रह जाती थी। आज भी तारों से भरी वैसी ही रात है। सखियों की बात याद है कि कभी कुछ मांग लिया कर अपने भी लिए। सोच रही हूँ जैसे ही कोई तारा टूटेगा मांग लूँगी मैं भी तुम्हें। पर यह क्या? तारा टूटा और मैंने मांग लिया तारों से उनका ना टूटना। टूटा हुआ कुछ भी अच्छा नहीं लगता न!

Monika Jain ‘पंछी’
(09/05/2015)

May 5, 2015

Poem on Clock (Time) in Hindi


(1)

घड़ी 

टिक-टिक-टिक-टिक
मैं हूँ घड़ी!
आती हूँ मैं काम बड़ी। 

कहीं कलाई पर बंध जाती 
कहीं मेज पर पड़ी इठलाती
कहीं दीवारों पर टंग जाती 
समय हुआ क्या, ये बतलाती। 

समय से आना, समय से जाना
समय से खाना, समय से पढ़ना
मुझे देखकर पता है चलता 
कब है सोना, कब है जगना। 

सुइयां मेरी सरपट दौड़े 
जैसे किसी रेस के घोड़े 
बीता समय न वापस आये 
काम कभी कल पर न छोड़ें। 

याद करो दादा के बोल 
समय बड़ा ही है अनमोल
उसे बड़ा पछताना पड़ता 
जो न जाने समय का मोल। 

घंटा, मिनट और हर सेकंड का 
रखती हूँ मैं पूरा हिसाब 
जो चलता है सदा समय से 
उसके होते पूरे ख़्वाब। 

Monika Jain ‘पंछी’
(05/05/2015)

(2)

समय प्रबंधन 

समय की बर्बादी है जीवन का अपमान 
करेगा समय प्रबंधन तो रोशन होगा नाम 
रोशन होगा नाम समय ना कर तू जाया 
रोज सवेरे उठकर माँ ने था समझाया 
कहती पंछी अब पछताने से क्या पायेगा 
निकल गया जो वक्त हाथ से अब ना आएगा। 

Monika Jain ‘पंछी’

(3) 

वक्त का धोखा 

सालों पहले 
अपने-अपने सपनों के साथ 
हमने कदम बढ़ाये थे
मिलते रहेंगे यूँ ही हमेशा 
ख़्वाब कुछ आँखों में बसाये थे। 

तुम चले गए और 
वक्त मेरे पैरों में जंजीरे बांध 
बहुत आगे बढ़ गया। 

मैं आज भी वहीँ खड़ी हूँ 
तुम्हारे इंतजार में 
कि शायद तुम एक दिन आओगे 
और मुझे वक्त की उन बेड़ियों से 
आज़ाद कराओगे। 

पर मैं भूल गयी थी 
जो बढ़ गया है आगे 
वो कब लौट कर आया है 
जिसे वक्त ने ही बुरी तरह छला हो 
भला उसका साथ किसने निभाया है?

Monika Jain ‘पंछी’ 
(03/2013)

(4)

वक्त के साथ 

वक्त का पता नहीं चलता 
अपनों के साथ 
पर अपनों का पता चल जाता है 
वक्त के साथ। 

पहले सिर्फ सुना था
अब महसूस भी किया है 
इस रंग बदलती दुनिया में
ना कोई अपना ना पराया है। 

बदलते वक्त के साथ
कितना कुछ बदलता है 
कभी था जो अपना
देखो आज जहर उगलता है। 

खुली रह जाती हैं आँखें
सिल जाते हैं होंठ 
जब दिल पर करता है
कोई अपना गहरी चोट। 

ना पालो किसी से आशा
ना रखो कोई उम्मीद 
वरना ख़्वाब टूटेगा एक दिन 
और उड़ जायेगी नींद। 

Monika Jain ‘पंछी’ 

May 4, 2015

Poem on Republic Day (Democracy) in Hindi

(1)

गणतंत्र दिवस

पास ही के एक स्कूल से 
सुनाई पड़ रही थी 
देशभक्ति के गीतों की 
स्वर लहरियां
और गूँज रहे थे 
माँ भारती की 
जय-जयकार के 
गगनचुम्बी नारे।

बिना स्कूल बैग के 
आते जाते बच्चे 
अहसास करा रहे थे 
गणतंत्र दिवस के 
आगमन का। 

एक ऐसा गणतंत्र 
जिसमें रह गया है 
सिर्फ तंत्र 
और नदारद है 
आम जन। 

एक ऐसा जनतंत्र 
जो जनता का
जनता के लिए 
जनता के द्वारा शासन नहीं 
बल्कि नेताओं का
नेताओं के लिए 
नेताओं द्वारा शासन है। 

एक ऐसा लोकतंत्र 
जिसमें लोगों को 
याद तो किया जाता है 
लेकिन बस
चुनावों के समय। 

एक ऐसा प्रजातंत्र 
जिसमें प्रजा तरसती है 
दो वक्त की रोटी के लिए 
और मंत्री उड़ाते हैं मौज 
पांच सितारा होटलों में 
रकम जेब में मोटी लिए। 

सोच रही हूँ कब से 
क्यों हम हो गये हैं इतने विवश 
जो मना रहे हैं गणतंत्र दिवस
यह तंत्र हमारा है ही नहीं 
फिर हम क्यों हैं इतने बेबस?

Monika Jain 'पंछी'
(26/01/2013)

(2)

कब हम एक गौरवान्वित देश बुनेंगे?

बचपन से कई जगह, कई बार पढ़ रहे हैं -
India is a democratic country.
और इस democracy शब्द की रटी-रटायी परिभाषा ने 
सिखा दिया है गर्व करना अपने देश पर। 

I am proud of India भी तो बन चुका है 
बस एक रटा-रटाया वाक्य!
जो चस्पा कर दिया जाता है जब-तब यहाँ-वहाँ 
और बस यह बोलकर ही हम खुद को 
समझ लेते हैं अपने राष्ट्र का एक सच्चा भक्त। 

पर दिखावे की इन प्रबल भावनाओं में 
बदल गए हैं अब शब्दों के मायने 
शब्द रह गए हैं महज शब्द ही 
और अर्थ आ रहे हैं नित नये सामने। 

लोकतंत्र भी तो रह गया है 
बस कुछ भ्रष्ट शासकों की कठपुतली बन 
जनता द्वारा जनता के लिए शासन में 
अब कहीं भी नहीं दिखता है जन। 

यह तो लगता है बस जैसे हो 
धर्म और सत्ता के बीच की सांठ-गांठ 
एक ओर मानवता का शोषण और 
दूजी ओर शैतानों के हैं ठाठ। 

ऐसे में झूठा गर्व 
नहीं कर सकता कोई समाधान 
गर्व करना हो जो देश पर 
तो लेना होगा अपने भीतर का भी संज्ञान। 

देश हम पर गर्व करे 
अब ऐसे कारण हमें देने होंगे 
हम गर्वित भारतीय बहुत बन चुके 
अब कब हम एक गौरवान्वित देश बुनेंगे? 

Monika Jain ‘पंछी’ 
(04/05/2015)