June 25, 2015

Childhood (Children's Day) Quotes in Hindi

Childhood (Children's Day) Quotes

  • 14/04/2018 - जिद्दी बच्चे, बात-बात पर रोते बच्चे, खाना न खाने वाले बच्चे, हरी सब्जियां न खाने वाले बच्चे, पढ़ाई न करने वाले बच्चे, नाराज हो जाने वाले बच्चे, तुनक मिजाज बच्चे...इस तरह की कई घोषणाएं बच्चों के बारे में माता-पिता करते हैं। जब भी सामने ऐसा कुछ होता है तो पूर्व धारणा नहीं बनाना चाहती इसलिए बच्चे को पास बुलाकर प्यार और तर्क से अपनी बात कह देती हूँ और बच्चा उतने ही प्यार से सुनकर अक्सर मान भी जाता है। फिर उसके गालों को चूम उसे जाने देती हूँ। बच्चा अपनी वृत्ति से उस समय बिल्कुल विपरीत होता है। या यूँ कहूँ कि वह वृत्ति ही मुझे उस पर जबरन थोपी हुई लगती है। प्रेम और सरलता में मेरा भरोसा बढ़ता है। कभी कोई बच्चा नहीं भी मानता। पर यह देखकर अच्छा नहीं लगता कि बच्चों की वृत्तियों का पोषण अक्सर माता-पिता ही करते हैं, कभी अपने मनोरंजन के लिए तो कभी अपनी वृत्तियों के चलते और फिर वे ही शिकायत करते भी पाये जाते हैं। बच्चे को जन्म देना और माता-पिता बन जाना दोनों बहुत अलग-अलग बातें हैं। बच्चों की जन्मजात मूल वृत्ति भी होती है, कुछ बच्चे नहीं भी सुनते, वृत्ति गहन हो चुकी होती है। लेकिन एक छोटे बच्चे के माता-पिता, शिक्षक या अन्य बड़ों को हमेशा यही सोचकर चलना चाहिए कि कमी उनके ही प्रेम, समझ और समझाने में है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि बच्चे स्वयं में सुधार का एक बहुत प्यारा अवसर हैं। 
  • 12/03/2017 - दिवा - बुआ देखो! उसको होली कहते हैं। बुआ - होलिका!...उसको होलिका कहते हैं। दिवा - अच्छा...'का' भी कहते हैं।
  • 04/02/2017 - दिवा (अभी तक हमारे परिवार की सबसे छोटी सदस्या), जब भी उससे बात होती है तब कहती है - मोनी बुआ, आप मेरे लिए नयी वाली अहा (हेयर स्टाइल) बनाना सीखकर रखना। मैं जब वहां आऊंगी तो मेरे बालों में नयी वाली अहा बनाना। जब भी किसी फेस्टिवल पर यह आती है तो मुझे अपना हेयर ड्रेसर बनाकर रखती है। :p दरअसल मुझे भी बच्चों के काम करना बेहद अच्छा लगता है। विशेष रूप से उन्हें अपने हाथों से खाना खिलाना, कहानियां और लोरी सुनाना तो सबसे अच्छा। एक स्वर्गीय अहसास! दिवा अभी मुझे अहा बनाने वाली बुआ के रूप में ज्यादा जानती है...और सब जगह तारीफ करते हुए इस बात का जिक्र जरुर करती है।...तो हुआ यूँ कि आज उसका बर्थडे है, तो वह जहाँ रहती है वहां पड़ोस में अपने किसी दोस्त को इनवाइट करने गयी और उससे पूछती है - क्या तेरी बुआ को अहा बनाना आता है? :p अब उसका दोस्त कुछ बोले तो कैसे बोले? उसके तो अभी बाल ही नहीं है। :D
  • 20/04/2016 - डिअर पेरेंट्स! आपके बच्चों के साथ हुए वार्तालाप को सुनकर कभी-कभी समझ नहीं आता कि आप कुछ बना रहे हैं या बिगाड़ रहे हैं। प्रकृति कैसे कृत्रिम बना दी जाती है, यह देखना हो तो एक बच्चे को बड़ा होते हुए देखिये।
  • 27/03/2016 - बच्चों को कुछ समझाते समय एक अच्छा अवसर होता है खुद के कुछ सीखने और समझने का भी, वह सब जो अब तक हम सीख या बदल नहीं पाए। माता-पिता और शिक्षकों के बाद शायद बच्चे ही सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं जीवन में। जरुरत बस खुद के और बच्चों के प्रति ईमानदारी की है।
  • 09/11/2015 - माँ क्या, बच्चे तो अपनी प्यारी, तुतलाती आवाज़ में मौसी, बुआ, दीदी कुछ भी कहे...जन्नत सा अहसास हो आता है। 
  • 27/06/2015 - बच्चे मुझे बड़ा नहीं समझते। 'चिड़िया उड़, तोता उड़' से लेकर 'ओ मीना, मीना सानी', 'अक्कड़-बक्कड़', 'कार्ड्स की मैचिंग'...सारे के सारे गेम खिलवाकर ही मानते हैं। लगता है चिड़िया उड़ खेलते-खेलते ही उडूंगी एक दिन। 
  • 25/06/2015 - मम्मा वाशिंग मशीन में कपड़े धो रही है और बेबी ने बड़े प्यार से रट लगा रखी है, 'मम्मा-मम्मा मुझे इसमें डाल दो।' इसे कहते हैं खतरनाक मासूमियत! मम्मा ने कभी जरुर कहा होगा, ‘रोना बंद कर! वरना अभी वाशिंग मशीन में डाल दूंगी।’ 
  • 15/01/2015 - जब तक हम अपने बच्चे की परवरिश सही ढंग से कर सकने के लिए तैयार नहीं, हमें उन्हें जन्म देने का अधिकार नहीं है। 
  • आज तो बाल दिवस है। एक बार एक दोस्त ने कहा था - तुम्हारी सोच परिपक्व है; पर शक्ल, आवाज़, रोना, हँसना, गुस्सा, मनाना और दिल बिल्कुल बच्चों जैसा है। इसलिए जिससे भी तुम्हारी शादी होगी उसे बच्चा और बीवी एक साथ ही मिल जायेंगे। :p वैसे मैं भी यही चाहती हूँ कि जब तक मैं ज़िन्दा रहूँ, मेरा कुछ बचपन भी ज़िन्दा रहे। इस दुनिया की शान-ओ-शौकत, दिखावे, बन्धनों, परम्पराओं और चमक-दमक से दूर जब भी मैं बच्चों के साथ होती हूँ तो खुद को बिलकुल आज़ाद महसूस करती हूँ। तब मैं पूरी तरह से मैं होती हूँ। मुझे बच्चों के साथ खेलना, उनसे बातें करना, उन्हें प्यार करना, उनका ख़याल रखना, उन्हें अच्छी-अच्छी बातें बताना, अपने हाथों से उन्हें खाना खिलाना, उन्हें कहानियां सुनाना, उनके साथ सालसा डांस करना...और भी बहुत कुछ...बहुत अच्छा लगता है। कुछ दोस्त पूछते हैं - आपकी ज्यादातर पिक्स बच्चों के साथ क्यूँ होती हैं? इसका सीक्रेट है कि बच्चों के साथ मेरी पिक्स स्वाभाविक रूप से अच्छी आती है। आज भी, जब भी मुझे मौका मिलता है तो चाहे सड़क हो, घर हो या कोई भी जगह मैं बच्चों के साथ बचपन वाले गेम्स खेलने लग जाती हूँ। मुझे एकदम बड़ा नहीं बनना। मुझे कुछ-कुछ बच्चा ही रहना है। 

Monika Jain ‘पंछी’

June 16, 2015

Poem on Evening in Hindi

यह जीवन की सांझ का दौर है

यह जीवन की सांझ का दौर है
ख़ामोशी की सरसराहट पसरी सब ओर है 
यह जीवन की सांझ का दौर है। 

नैन परिंदे लौट रहे हैं आशाओं के पथ से 
नहीं रहा अब कोई सवेरा बस रैन बसेरे अब से। 
रंग उधार का लिए बची ये जो थोड़ी सी लाली है 
सूने-सूने मन अम्बर में ये भी खोने वाली है। 

छोड़ घरौंदे मिट्टी के ज्यों बच्चे घर को जाते हैं 
उस मिट्टी में मेरे कुछ सपने भी मिल जाते हैं। 
ज्यों छाया बढ़ती जाती है प्राची में अपने को खोने 
त्यों-त्यों यह काया बढ़ती है तम की कोख में सोने। 

निस्तेज, निशब्द, निस्पंदित है, आने वाला हर पल 
अब ना रहस्य बचा कोई क्या होने वाला है कल। 
अंतर्मन के क्रंदन को भी अब ना मिलेगी ओस कहीं 
ना है कोई स्नेह यहाँ और ना है कोई रोष कहीं। 

रात उगेगा यादों का एक चाँद और कुछ तारें 
एकाकीपन के होंगे बस अबसे दोस्त ये सारे। 
कभी अमावस लाएगी घनघोर अँधेरी रातें 
जब यादों से भी ना कर पायेंगे हम बातें। 

प्रश्न यहाँ सब खो जायेंगे, हल भी सारे सो जायेंगे 
जो जैसा है सो तैसा है, यह भी कह ना पायेंगे। 
न विजय बची, न शेष पराजय, भाव खो गए हैं सारे 
सांझ कोई ऐसी आएगी, ये तो ना सोचा था प्यारे। 

Monika Jain ‘पंछी’
(16/06/2015)