July 16, 2015

Essay on Selfie Addiction in Hindi

Essay on Selfie Addiction in Hindi
यह सेल्फी संक्रमित युग है 
(ललकार टुडे में प्रकाशित)

प्रकृति की अनमोल धरोहर को समेटे दूर तक फैले उस हरी मखमली दूब वाले मैदान और बादलों की श्वेत-श्याम नदी को बहाते उस नील परी के आसमान से बेखबर जब सब लोग अपनी-अपनी सेल्फी लेने में व्यस्त थे तो दूर एक झील के किनारे उगे रंग-बिरंगे फूलों से मैं बातें कर रही थी। फूलों को देखकर मैं और मुझे देखकर फूल चहक रहे थे। तभी एक फूल ने कहा, ‘कितना समय हो गया, कितने दिन बीत गए, कितना अच्छा लग रहा है कि इतने दिनों बाद कोई हमसे मिलने आया है।’ और उसके स्वर को निरंतरता देते हुए एक दूसरे फूल ने कहा, ‘यूँ तो यहाँ बहुत भीड़ देखी है हमने। हम पर गिरते-पड़ते झील के किनारे खड़े होकर ये लोग हाथ में जाने क्या लेकर घंटों बटन दबाते रहते हैं। पर आज कितने दिनों बाद किसी ने आकर सहलाया है हमें और बिखेरी है एक चिर परिचित मुस्कान जो अक्सर खो जाती है यहाँ आये पर्यटकों के शोर शराबे, प्रदूषण और खींचातानी के बीच।’ तभी एक तीसरा फूल लहराकर मेरे गालों को छू गया। मेरी आँख खुली और मैंने देखा यह तो एक सपना था।

थोड़े विस्मय से भरी मैं, नींद से जागकर, फ्रेश होकर, लेमन टी की चुस्कियों के साथ जैसे ही अख़बार हाथ में थामती हूँ तो पन्ने पलटते-पलटते नजर पड़ती है एक ख़बर पर : रूस में सिखाये जा रहे हैं सेफ सेल्फी लेने के तरीके। इस ख़बर को पढ़ने के बाद सबसे पहला विचार मन-मस्तिष्क में यही कौंधता है कि हम इंसान प्रकृति के समस्त प्राणियों में से सबसे बेजोड़ नमूने इस मामले में भी हैं कि पहले तो हम लगाते हैं आग और फिर खोदते हैं कुआँ, और इसी विचार के साथ एक विचारों की श्रृंखला दौड़ पड़ती है।

बीते कुछ दिनों की बात है। सऊदी अरब में एक किशोर ने अपने दादा के शव के साथ शरारती मुस्कान और जीभ को बाहर निकालते हुए ‘अलविदा दादा’ कैप्शन के साथ एक सेल्फी पोस्ट की। असंवेदनशीलता की उपज यह मुस्कान सेल्फी पोस्ट कर लाइक पाने के क्रेज का एक उदाहरण मात्र है। ऐसे ना जाने कितने उदाहरण आजकल सुर्ख़ियों में बने हुए हैं।

पाकिस्तान की मशहूर गायिका कोमल रिजवी को ही लिया जाए। एक ओर 90 वर्ष के जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता अब्दुल सत्तार एधी गंभीर हालत में बिस्तर पर लेते हुए हैं, और दूसरी ओर कोमल रिजवी हँसते हुए उनके साथ सेल्फी लेकर फेसबुक पर पोस्ट कर रही हैं।

यह सब तो कुछ भी नहीं, सेल्फी का फीवर कुछ ऐसा चढ़ा है कि कई लोगों की सेल्फी उनके जीवन का आखिरी क्लिक बनकर रह गयी।

ऑस्कर ओटेरो एगुइलर नाम का एक व्यक्ति अपनी एक ख़ास सेल्फी लेकर सोशल मीडिया पर अपने दोस्तों को इम्प्रेस करना चाहता था। इसके चलते उसने एक गन अपने सर पर तानी और सेल्फी लेने लगा। लेकिन सेल्फी लेने के दौरान गलती से गन का ट्रिगर दब गया और मौके पर ही उसकी मौत हो गयी।

इसी तरह पुर्तगाल में एक दंपत्ति ऊंची चट्टान के ऊपर जाकर, बैरियर को लांघकर समुद्र के साथ आकर्षक सेल्फी लेने के चक्कर में उल्टे सर फिसले और सीधे चट्टान से समुद्र में समा गए। अपने पीछे वे दो मासूमों को छोड़ गए।

हैदराबाद से मनाली घूमने गए इंजीनियरिंग के उन 25-30 छात्रों को हम कैसे भूल सकते हैं जो व्यास नदी की लहरों से अनजान सेल्फीज और फोटोज क्लिक करने में इतने मस्त और मग्न थे कि कब लहरें उन्हें बहाकर ले गयी पता भी न चला।

सेल्फी लेते समय ध्यान भटक जाने के चलते विमान हादसे और कार एक्सीडेंट जैसी घटनाएँ भी अंजाम लेने लगी है। कुछ ख़ास क्षणों को कैद करना हुनर होता है, यादों को संजोने के लिए जरुरी भी। पर इतना तो ख़याल हो कि कहीं यादों के एल्बम सजाने के चक्कर में हम खुद ही उस एल्बम की एक याद बनकर ना रह जाएँ।

ऐसी ही घटनाओं के चलते रूस में सेल्फी प्रेमियों के लिए एक गाइडलाइन तैयार की गयी है जिसमें ब्रोशर, वीडियो और वेब कैंपेन के जरिये तेज रफ्तार ट्रेन, पहाड़ों के किनारे, बन्दूक और खतरनाक जानवरो के साथ सेल्फी ना लेने के लिए आगाह किया गया है। सेल्फी स्टिक से हो सकने वाली दुर्घटनाओं की आशंका के चलते विंबलडन टेनिस टूर्नामेंट के दौरान, कई फुटबॉल क्लबों, नेशनल गैलरी, द ऑल इंग्लैंड टेनिस एंड क्रिकेट क्लब आदि में सेल्फी स्टिक के प्रयोग पर पाबंदी है। डिज्नी ने दुनिया भर में अपने थीम पार्कों में सुरक्षा के चलते सेल्फी स्टिक के प्रयोग पर रोक लगा दी है। लेकिन कहाँ-कहाँ और कैसे-कैसे रोक लगायी जायेगी। आजकल टूरिज्म सिर्फ टूरिज्म नहीं सेल्फी टूरिज्म बनकर रह गया है। बल्कि टूरिज्म क्या अब तो लगभग हर घटना के आगे या पीछे सेल्फी शब्द जोड़ा जा सकता है : भूकम्प सेल्फी, ज्वालामुखी सेल्फी, शमशान सेल्फी, बाथरूम सेल्फी और भी पता नहीं कौन-कौन सी सेल्फी।

सेल्फी का क्रेज नेता, अभिनेता, युवाओं-युवतियों सब पर सर चढ़कर बोल रहा है। वो दिन गए जब सेलिब्रिटीज के ऑटोग्राफ लिए जाते थे। आजकल प्रशंसक अपने स्टार्स को अपने साथ ली गयी सेल्फी में संजो कर रखना चाहते हैं। पर यह सेल्फी मेनिया सेलिब्रिटीज के लिए समस्या भी खड़ी कर रहा है। बीते दिनों युवा ब्रिटिश गायक ज्यान मलिक ने पॉप बैंड ‘वन डायरेक्शन’ को छोड़ने का ऐलान यह कहकर किया कि वे सेल्फी कल्चर के शिकार हुए हैं। कुछ मौकापरस्त लड़कियों ने उनके साथ ली गयी सेल्फीज के आधार पर अफवाहें फैलाई जिसके चलते वे तनाव ग्रस्त हो गए।

सेल्फी के प्रति बढ़ती दीवानगी कई मनोरोगों को आमंत्रित कर रही है। अमेरिका के ओहियो यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिकों के 800 पुरुषों पर अध्ययन के अनुसार वे पुरुष जो घंटों फोटोशॉप पर एडिटिंग के बाद बहुत ज्यादा सेल्फी पोस्ट करते हैं, ऐसे लोग आत्ममुग्धता के शिकार होते हैं। उनमें स्वार्थ की अधिकता और संवेदनशीलता जैसे गुणों का अभाव होता है। उन्हें गुस्सा भी जल्दी आता है। वे अपने शरीर का एक वस्तु की तरह प्रदर्शन करते हैं, जो कि एक यौन विकृति है। महिलाओं को ऐसे पुरुषों से गंभीर रिश्ते बनाने से बचना चाहिए।

वहीँ एक सर्वे जो 16-25 वर्ष की 2000 युवतियों पर किया गया, जिसके अनुसार युवतियाँ दिन में कम से कम 48 मिनट और सप्ताह में 5-6 घंटे सेल्फी लेने में गुजार देती है। सर्वे में शामिल हर 10 में से एक लड़की के कंप्यूटर या स्मार्ट फ़ोन में स्नानघर, कार और कार्यालय में ली गयी लगभग 150 तस्वीरें पायी गयी। लाइक और कमेंट पाने का जूनून इस कदर हावी है कि कई युवतियाँ अपनी बॉडी इमेज को लेकर बहुत ज्यादा कोंशस होने के चलते ईटिंग डिसऑर्डर का शिकार हो रही है।

अमेरिकी साइकियाट्रिक ऐसोसिएशन की एक रिपोर्ट के अनुसार ‘सेल्फी’ को ‘आब्सेसिव कम्पलसिव डिजायर’ से जोड़ा गया है, जिसमें व्यक्ति अपनी तस्वीरें खींचना और शेयर करने का आदी हो जाता है। यह लत आत्मविश्वास को कमजोर करती है और नकारात्मकता को बढ़ावा देती है।

हालांकि हर चीज के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलु होते हैं। सेल्फी का उपयोग कई सामाजिक आन्दोलनों को सक्रीय बनाने में भी किया जा रहा है। कुछ ही समय पहले ब्रिटेन में कैंसर रोगियों की मदद के लिए कैंसर रिसर्च यूके चैरिटी ने ‘नो मेकअप सेल्फी फॉर कैंसर अवेयरनेस’ नामक एक अभियान चलाया। इस अभियान के जरिये कैंसर रोगियों के लिए करोड़ों रुपयों की मदद जुटाई गयी। इसी तरह का ‘पिंक सेल्फी अभियान’ ओगां कैंसर फाउंडेशन और एले ब्रेस्ट कैंसर कैंपेन की पहल पर बॉलीवुड हस्तियों और फैशन डिज़ाइनर्स की मदद से स्तन कैंसर के प्रति जागरूकता फ़ैलाने के उद्देश्य से चलाया गया। हमारे देश में चल रहे सेल्फी विथ डॉटर अभियान से हम सब परिचित ही हैं। इसी तरह 5 सितम्बर, 2014 से ही आगाज हुआ ग्लोबल ह्यूमनराइट समूह का ‘सेल्फीज4स्कूल’ अभियान जिसके तहत सेल्फीज पोस्ट कर लड़कियों को स्कूल भेजने का बीड़ा उठाया गया है।

ये सब सकारात्मक पहलु हैं लेकिन जब सामाजिक सरोकारों से इतर यह सेल्फी क्रेज स्टेटस सिंबल बनकर हर पीढ़ी के लोगों पर हावी होता हुआ नजर आता है तो चिंता होना स्वाभाविक है। सेल्फी शब्द सिर्फ ऑक्सफ़ोर्ड ‘वर्ड ऑफ़ द इयर 2013’ ही नहीं बना बल्कि यह सोते-जागते, उठते-बैठते, खाते-पीते, नहाते-गाते हर घटना, हर पल के साथ जुड़ता चला जा रहा है। जिसके घातक परिणाम हम ऊपर देख चुके हैं। नकारात्मकता, आत्मविश्वास की कमी, अकेलापन, दिखावा, क्रोध, चिड़चिड़ाहट, तनाव, आत्महत्या यह सब सेल्फी युग की सौगाते हैं जो हम पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित करने वाले हैं। क्योंकि हम कुआँ तो तभी खोदेंगे जब आग लगेगी और वह भी सिर्फ फोरी तौर पर।

Monika Jain ‘पंछी’
(16/07/2015)

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July 9, 2015

Poem on World Population Day in Hindi


जनसँख्या सिर्फ संख्या तो नहीं

कौन कहता है
दुनिया की जनसंख्या सात अरब है
मुझे तो लगती यह सात सौ अरब है।

हर आदमी के होते हैं
कई चेहरे, कई रूप
छाँव के रंग बदल जाते हैं
जब आती है कड़ी धूप।

एक संत के चेहरे में
छिपा रहता है शैतान
त्यागी जिसे कहता है जग
आसमां छूता है उसका गुमान।

बिजली से कड़कते हैं
जो बन शब्दों के जाल
हकीकत में खामोश कर देता है उन्हें
किसी का डर तो किसी का माल।

जिसके चेहरे पर मुस्कुराहट, सौम्यता
और विनम्रता का निर्झर बहता है
उसके हाथों में कहीं छिपा
एक खूनी खंजर रहता है।

सच के साथ खड़े होकर
करते हैं जो संपादक झूठ का पर्दाफाश
उनकी नजरों से सुरक्षित है एक औरत
नहीं कर सकते इसका भी विश्वास।

मंदिर में जाकर
चन्दन का जिसने टीका लगाया होगा
नहीं जान सकता कोई
उसके मन में कितना मैल समाया होगा।

सत्य, अहिंसा, मुक्ति पर
जो देता है हर रोज गुरु ज्ञान
कितने अपराधों में होगा संलग्न
नहीं लगा सकते इसका भी अनुमान।

समाज सेवा की आड़ में
सेक्स स्कैंडल जैसे घृणित कार्यों को अंजाम
अहिंसा का मुखौटा लगाकर भी
होता है यहाँ कत्ले आम।

छद्म नारीवादियों के रूप में
जन्मे हैं नारी के नए शोषक
लिखते हैं जो प्रेम शास्त्र
उनमें से कई मिलेंगे नफरत के पोषक।

कायरों ने ओढ़ी शेरों की खाल
सन्यासी हो रहे मालामाल हैं
सच्चा आदमी पहचानना है मुश्किल
हर ओर मकड़ी के जाल हैं।

चिंता जनसंख्या से ज्यादा मुझे
एक आदमी में छिपे सौ चेहरों की है
किसी मासूम को अपना निशाना बनाये
खौफ़नाक पहरो की है।

देर-सबेर बढ़ती जनसंख्या पर
लगाम लग भी जायेगी
पर मुखौटे बदलने की यह प्रवृत्ति
तो दिनों-दिन बढ़ती ही जायेगी।

जनसँख्या नियंत्रण के साथ ही हो नियंत्रण
एक जन में छिपे दुर्जन इरादों पर भी
प्यार की झूठी कसमों पर
और नेता के झूठे वादों पर भी।

क्योंकि समस्याएं मात्रात्मक से ज्यादा
अब गुणात्मक हो रही है
दिखते हैं यहाँ शरीर ही शरीर
आत्माएं सबकी कहीं खो रही है।

Monika Jain ‘पंछी’
(09/07/2015)

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July 8, 2015

Save Animals, Birds, Insects Stories in Hindi

(1)

बुद्धू कहीं का

26/12/2016 - इस भरी दुनिया में अकेला हुआ बिन माँ का एक नन्हा सा बछड़ा जो अपने तथाकथित मालिक के घर से बाहर निकाल दिया गया है, रोज मेरे घर के सामने आता है। यूँ मैं सभी पशु-पक्षियों को बस उनकी ज़रूरतों और सुरक्षा का ख़याल रखती ज्यादातर बिना स्पर्श का ही प्रेम करती हूँ। लेकिन रोटी के छोटे-छोटे टुकड़े कर उसे खिलाते हुए ...एक दिन उस पर बहुत प्यार आया। मन तो किया कि इसे गोदी में बैठाकर लोरी ही सुना दूँ, लेकिन फिर अपनी गोदी की छोटी सी साइज और उस नन्हें की बड़ी सी साइज देखकर अपनी भावनाओं से कहा - कण्ट्रोल...कण्ट्रोल! फिर उसके नजदीक जाकर उसके सर और गालों को सहलाने लगी, पर वह ठिठककर दूर जा खड़ा हुआ। तब उसकी बची हुई रोटी देखकर मैंने अपनी भावनाओं की इस अभिव्यक्ति को भी विराम दिया और थोड़ी दूर जाकर उसे वापस बुलाया। सहमा सा धीरे-धीरे वह आया और फिर अपनी रोटी खाने लगा।

प्रेम तो दृष्टि और ह्रदय में होता है और जन्म से ही माँ के स्पर्श से भी वंचित अभी उसे प्रेम के स्पर्श को पहचानने और भरोसा करने में समय लगेगा सो अब उसके ज्यादा पास नहीं जाती। और फिर भूखे पेट का पहला प्रेम और भरोसा तो रोटी ही रहेगा। खैर! धीरे-धीरे उसका भय कम हो रहा है। पास रहने पर कुछ-कुछ डरने वाला वह नन्हा जैसे ही मुख्य द्वार बंद कर घर के अन्दर चली जाती हूँ तो बड़ी निर्भयता से सीढियां चढ़कर दरवाजे के पास आकर झाँकने लगता है। दूर जाने पर पास आता है...बुद्धू कहीं का। :)

Note : 6 महीने बाद का नया अपडेट यह है कि तस्वीर अब पूरी तरह से बदल चुकी है। अब तो गेट खुलने की आवाज़ आते ही या नज़र पड़ते ही दूर खड़ा हो तो इतना तेज दौड़कर आता है कि क्या कहें। और तो और अब तो इतना निर्भय बन गया है कि एक दिन प्यार-तकरार में मुझे ही सींग दिखा रहा था। :D

(2)

प्रेम की कमी...

01/10/2016 - आजकल आसपास चल रहे व्यक्ति को दूर से ही आगाह कर देती हूँ कि यहाँ एक कीड़ा चल रहा है, इस पर पाँव नहीं रख देना। क्योंकि कभी-कभी ऐसा होता है कि कुछ काम करते समय या पढ़ते समय किसी कीड़े/मकोड़े को आसपास चलता हुआ देखती हूँ और कोई भी व्यक्ति आसपास चल रहा होता है तो मन में एक अंदेशा हो जाता है उस पर आये ख़तरे को लेकर। जब निश्चिन्त हो जाती हूँ कि चल रहा व्यक्ति इधर नहीं आ रहा है तो फिर अपने काम में लग जाती हूँ। लेकिन कुछ ही देर बाद मेरी आशंका सच सिद्ध हो जाती है। एकदम वह व्यक्ति वहां से गुजर जाता है और अनजाने में उस कीड़े/मकोड़े को कुचलकर चला जाता है।

कुछ दिनों पहले भी तो ऐसा ही हुआ था। वह दिवाली की सफाई में व्यस्त थी। छत पर बने कमरे से बाहर वाश बेसिन के ऊपर वाली ताक में चिड़िया कई दिनों से घोंसला डालने में जुटी थी। आज जब वह सफाई करने को आई तो उस घोंसले को उठाकर बाहर डालने लगी। चिड़िया आसपास कहीं नहीं थी लेकिन अचानक मुझे ख़याल आया - क्या पता इसमें अंडे हों तो मैं भीतर से टेबल ले लायी। उसने टेबल पर चढ़कर देखा तो उसे कोई अंडा नजर नहीं आया। पर घोंसला लगभग पूरा तैयार था तो मैंने कहा, ‘हम अगर इसे फेंक देंगे तो चिड़िया फिर अंडा कहाँ देगी? और इतनी जल्दी घोंसला कैसे बनाएगी? और फिर थोड़े ही दिनों की तो बात है।’ यूँ वह जीवों के प्रति संवेदनशील है, लेकिन कचरे की समस्या तो सफाई करने वाला ही जानता है, इसलिए हमेशा संवेदना को बरक़रार भी नहीं रखा जा सकता। उसने एक पल सोचा और फिर कहा, ‘और भी तो बहुत सी जगह हैं बनाने के लिए।’ और ऐसा कहकर उसने घोंसला उठा लिया।

कुछ ही देर बाद एक छोटा सा अंडा लुढ़ककर नीचे आ गिरा और फूट गया। वह अचंभित हुई। अंडा उसे दिखा नहीं था और किसी छेद से निकलकर शायद फर्श पर पहले से पड़ा था या उठाने के दौरान चला गया था। उसे इस जीव हत्या पर बहुत पछतावा हो रहा था। पता नहीं क्यों उस दिन मुझे उस फूटे हुए अंडे को देखकर तो कोई विचलन या दुःख नहीं हुआ। मुझे उसकी मृत्यु स्वीकार्य थी पर भीतर आकर बस यही ख़याल आया कि अभी मेरे भीतर का प्रेम बहुत कम है, वरना वह उस जीवन को बचा पाने में जरुर सफल होता।

(3)

मासूम आ गया

25/08/2015 - कुछ दिन पहले कुछ बच्चों के साथ छत पर बैठी थी, तभी अचानक कोई मकोड़ा आया और किसी के पैर के नीचे आकर घायल हो गया। मेरे मुंह से बरबस निकला, 'अरे! मकोड़ा मर गया।’ वह बच्ची बोली, 'इसे क्या जरुरत थी बीच में आने की।' तब मैंने कहा, 'वह मासूम है, उसे क्या पता कि कहाँ उसकी जान को खतरा है। इसलिए ख़याल तो हमें ही रखना होगा।' वह दिन है और आज का दिन अब जिसे भी मकोड़ा दिखता है वह बोलता/बोलती है, 'मासूम आ गया, मासूम आ गया' और यह कहते हुए पास आने पर सब उसे बचाने की जुगत में लग जाते हैं या सेफ प्लेस पर छोड़कर आ जाते हैं। :)

(4)

प्रेम : एक सर्वव्यापी भाषा

08/07/2015 - घर में मेरी सबसे फेवरेट जगह होती है छत। कुछ दिन पहले छत पे ही खड़ी थी तभी पास ही के एक खाली प्लाट से नेवलों का एक प्यारा सा जोड़ा एक के पीछे एक गुजर रहा था। पीछे वाले को जाने कैसे इतनी ऊपर मैं नजर आ गयी। वह सर ऊंचा कर मुझे देखने लगा/लगी। थोड़ी दूर चलता...फिर मुंह ऊपर करके देखता, फिर कुछ दूर चलता फिर ऊपर देखता। अब आगे बढ़ चुका था, तब भी उसका पीछे मुड़कर और सर ऊंचा कर देखना जारी रहा। ऐसे ही आज नीचे एक गाय का बछड़ा खड़ा था। वह भी सर ऊपर करके लगातार 10 मिनट तक बड़ी क्यूरोसिटी से देखता रहा। मैंने प्यार से पलके झपकाई इस तरह ^_^ तो बदले में उसने भी झपका दी। :) उस दिन भी और आज भी मेरा इतना मन हुआ उनसे बात करने का। बार-बार यही सोच रही थी काश! मुझे उनकी या उन्हें मेरी भाषा समझ में आती तो कितनी सारी बातें करते हम लोग। लेकिन दुनिया में एक भाषा और भी तो होती है ~ प्रेम की भाषा, जो कि सर्वव्यापी है। जिसके आगे सारे शब्द बोने हो जाते हैं। :)

Monika Jain ‘पंछी’

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July 5, 2015

Story of Diwali (Without Firecrackers) in Hindi

Story of Diwali in Hindi
Story of Deepavali in Hindi for Kids
 Moral Story on Diwali in Hindi
 Story of Diwali (Without Firecrackers) in Hindi
रोशनपुर की पहली दिवाली 
(बालहंस में प्रकाशित)

दिवाली के कुछ ही दिन बचे थे। हमारे छोटे से कस्बे में सफाई का काम जोरों पर था। कुछ ही दिनों में बच्चों के स्कूल की भी छुट्टियाँ होने वाली थी। रत्ना जो पड़ोस के घरों में झाड़ू-पोचे करती थी, उसी की मदद से मैं भी दिवाली की सफाई में जुटी हुई थी। बच्चों में हमेशा की तरह खासा उत्साह था दिवाली को लेकर। कभी दिवाली पर बनने वाली मिठाईयों की प्लानिंग होती, तो कभी घर के भीतरी और बाहरी डेकोरेशन की, तो कभी इस बार कौन-कौन से और कितने पटाखे छुडायेंगे इसकी।

रत्ना आज अपनी 7-8 साल की बच्ची को भी साथ लेकर आई थी, पर उसने उसे सफाई वाले कमरे में आने से मना कर दिया और बाहर बरामदे में ही बैठकर खेलने के लिए कहा। बच्ची बाहर ही खेलने लगी। मैंने रत्ना से पूछा, ‘अंदर क्यों नहीं आने दिया?’ तो उसने कहा, ‘दीदीजी, उसे दमा है। धूल-मिट्टी उड़ती है तो बहुत खाँसी चलने लगती है। उसे साथ लेकर भी ना आ रही थी पर वह जिद करने लगी तो लाना पड़ा।’

रत्ना के यह कहते-कहते ही उसकी बेटी खेलते-खेलते अचानक सफाई वाले कमरे में आ गयी और उसे खांसी चलने लगी। रत्ना को आश्वस्त कर मैं उसे अपने साथ ऊपर वाले कमरे में ले आई। उसे बिस्तर पर बैठाया, पानी पिलाया और फिर उससे बातें करने लगी। तभी मेरे बच्चे श्रुति और श्रेय भी दौड़े-दौड़े वहां आ गए।

श्रुति ने रत्ना की बेटी से पूछा, ‘क्या नाम है तुम्हारा?’

‘कोमल’, वह धीरे से बोली।

थी भी वह एकदम प्यारी और कोमल सी। मैं उसका ध्यान रखने की हिदायत देकर उसे बच्चों के साथ छोड़कर नीचे आ गयी और सफाई का काम देखने लगी।

जब कमरे की सफाई पूरी हो गयी तो रत्ना ने कोमल को आवाज़ लगाई। आज रसोई में भुट्टे सिक रहे थे। मैंने रत्ना को भी कुछ भुट्टे खाने को दिये। उसे अभी और भी घरों में सफाई के लिए जाना था सो मैंने कहा, ‘यही बैठकर खा लो दोनों। फिर तो ठंडे हो जायेंगे।’

रत्ना और कोमल दोनों बरामदे में दीवार के सहारे बैठ गए और भुट्टे खाने लगे। तभी कोमल ने रत्ना से पूछा, ‘माँ, दिवाली के लिए सब इतनी साफ-सफाई क्यों करवाते हैं? कित्ती खांसी चलती है मुझ।’

रत्ना ने उसे इशारे से चुपचाप भुट्टे खाने को कहा।

मैंने रत्ना से कहा, ‘अरे! इसे चुप क्यों करवा रही हो। ऐसे बच्चों के सवालों को टाला नहीं करते।’ ‘कोमल बेटा, क्या पूछना है तुम्हें मुझसे पूछो।’ मैंने कोमल के पास जाकर कहा।

कोमल संकोचवश चुप रही तो मैंने ही उसे बताना शुरू किया, ‘बेटा, सफाई करना बहुत जरुरी है। सफाई रहेगी तो हम कई बीमारियों से बचकर रहेंगे। बल्कि साफ़-सफाई होने के बाद तुझे भी बहुत अच्छा महसूस होगा। हाँ, बस जब सफाई हो रही हो और कहीं धूल मिट्टी उड़ रही हो तो तुझे वहां से दूर रहना है। पर सफाई हो जाने के बाद फिर तुझे खांसी नहीं चलेगी, और फिर दिवाली की रात लक्ष्मी माता भी तो हमारे घरों में आती है, तो उनके स्वागत के लिए भी सफाई तो करनी पड़ेगी न!’

कोमल कुछ सोचते हुए बोली, ‘लेकिन आंटीजी, मुझे तो दिवाली वाले दिन भी बहुत ज्यादा खांसी चलती है। माँ मुझे घर से बाहर भी नहीं निकलने देती। मेरा कित्ता मन होता है कि मैं भी नयी-नयी ड्रेस पहनकर सबकी तरह माँ और बापू के साथ रौशनी देखने जाऊं। पर माँ और बापू नहीं ले जाते। कहते हैं डॉक्टर ने मना किया है। मुझे ज्यादा मिठाई भी खाने को नहीं मिलती। मुझसे सांस भी नहीं ली जाती है और खांसी चलती रहती है तो मैं फिर जिद भी नहीं कर पाती, और अगले दिन तो पूरी सड़क पर जले हुए पटाखे ही पटाखे दिखते हैं। कित्ती गन्दी लगती है सड़क। क्या लक्ष्मी माता को भी पटाखे अच्छे लगते हैं? क्या जो पटाखे जलाते हैं वे उन्हीं के घर आती हैं?’

कोमल के मासूम मन ने अपनी सारी जिज्ञासा और शिकायत तो प्रकट कर दी, पर मेरे पास इन बातों का कोई जवाब नहीं था।

रत्ना बोली, ‘ये नासमझ है दीदीजी! अब इसकी किस्मत ही खोटी है तो कोई क्या करे? पटाखे तो सब हमेशा से ही जला रहे हैं। अब एक इसके लिए तो बंद होने से रहे। बस हर दिवाली इसी बात से आँखें भर आती है कि जब सारी दुनिया खुशियाँ मना रही होती है तो मेरी बेटी बिस्तर में पड़े-पड़े खांसती रहती है। जब से थोड़ी समझ आई है इसे तब से एक दिवाली भी नहीं देखी इसने। डॉक्टर ने ज्यादा मिठाई और तली-फली चीजों के लिए भी मना किया है सो वह भी नहीं दे सकती।’ यह कहकर रत्ना तो चली गयी। लेकिन मैं काफी देर तक स्तब्ध सी वहीँ खड़ी रही।

फिर अंदर आकर शाम का डिनर तैयार करने लगी। इसी बीच श्रुति और श्रेय के पापा विकास ऑफिस से घर आ गए। थोड़ी देर में बच्चे और विकास सभी डिनर टेबल पर आ गए। बच्चे अपने पापा को दिनभर की बातें बताने लगे। तभी विकास ने हँसते हुए पूछा, ‘अच्छा, इस बार तुमने अभी तक अपने पटाखों की लिस्ट नहीं पकड़ाई मुझे? लगता है बहुत बड़ी लिस्ट बन रही है इस बार।’ पटाखों का नाम सुनते ही एक बार फिर कोमल का चेहरा सामने आ गया। मैं कुछ कहने ही जा रही थी, तभी श्रेय बोला, ‘नहीं पापा, इस बार हम पटाखे नहीं जलाएंगे।’ ‘हाँ पापा, इस बार हम बिल्कुल पटाखे नहीं जलाएंगे।’ श्रुति ने श्रेय की बात दोहराते हुए कहा। मैं आश्चर्य से दोनों को देखने लगी और सोचने लगी, ‘क्या ये दोनों वही श्रुति और श्रेय हैं जिनके पटाखों की लिस्ट दिवाली के महीने भर पहले से ही तैयार होने लगती है।’ विकास भी बड़े अचरज से दोनों को देखने लगे। तब श्रुति ने कहा, ‘मम्मा, आज हमने कोमल की सारी बातें सुनी थी। कितनी प्यारी है वह और हम सब लोगों की वजह से वह अपनी दिवाली भी नहीं मना पाती। हमने तो यह भी तय किया है कि स्कूल में हम सब बच्चों से रिक्वेस्ट करेंगे कि इस बार वे दिवाली पर पटाखे न जलाये।’

‘बहुत अच्छा किया तुमने बच्चों! बल्कि कोमल ही क्या, पटाखों से तो सभी को परेशानी होती है। पेड़-पौधों, पशु-पक्षी, पर्यावरण, वृद्ध जनों, नवजात बच्चों के साथ-साथ हम सब के लिए पटाखों का विषैला धुआँ और तेज आवाज़ बहुत हानिकारक है। इसलिए तो हर बार मैं तुम्हें कम से कम पटाखे जलाने को कहती हूँ। यूँ तो तुम कभी नहीं सुनते, पर इस बार तो कोमल ने कमाल कर दिया।’ मैंने सबको खाना परोसते हुए कहा।

विकास ने मेरी तरफ देखते हुए विस्मय से पूछा, ‘रश्मि! कोमल और कमाल ये सब क्या है?’ तब मैंने उन्हें सारी बात बताई। हम दोनों को ही बच्चों के इस निर्णय पर बहुत ख़ुशी और गर्व महसूस हो रहा था।

हमारे कस्बे का बस वह एक ही हाई स्कूल था, जहाँ पूरे कस्बे के बच्चे पढ़ने आते थे। प्रार्थना सभा में श्रुति और श्रेय ने सभी को कोमल के बारे में बताया और सभी से रिक्वेस्ट की कि क्या इस बार हम पटाखे न जलाकर दिवाली पर हमारे कस्बे के गरीब लोगो की बस्ती में मिठाई, दीपक, कपड़े आदि बांटने चल सकते हैं? ताकि कोमल जैसे गरीब परिवार के बच्चे, बीमार और वृद्ध जन सभी मजे से दिवाली मना सके। और फिर दिवाली पर चहकने का हक़ तो पेड़-पौधों और पशु-पक्षियों का भी बनता है, तो क्यों न इस बार की दिवाली हम सबके लिए ख़ुशनुमा बना दें।’

बच्चों की बात सुनकर सारा स्कूल प्रांगण तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। सभी शिक्षकों ने उनके इस सराहनीय कदम की भरपूर तारीफ की और सभी ने इस अच्छे कार्य में अपना पूरा-पूरा सहयोग देने का वादा किया।

बच्चों ने अलग-अलग टोलियाँ बनाकर अपने-अपने मोहल्ले से चंदा इकट्ठा किया और दिवाली की सुबह गरीबों की बस्ती में सभी को फल, मिठाइयाँ, कपड़े और दीपक वितरित करने चल पड़े। बच्चों के इस प्रयास की कुछ ऐसी लहर दौड़ी कि इस बार हमारे कस्बे में एक भी पटाखा नहीं छोड़ा गया।

कोमल शाम को अपनी माँ के साथ हम सबको दिवाली की शुभकामनाएँ देने आई। उसके चमक धमक वाले कपड़े और उसकी खिलखिलाती मुस्कुराहट देखकर ऐसा लगा जैसे उसकी तरह हम सबने भी दिवाली पहली बार ही मनाई है।

Monika Jain ‘पंछी’
(05/07/2015)

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Essay on Diwali in Hindi

Essay on Diwali in Hindi
जीवंतता कभी बुझ न पाए

दीपक जलकर रोशन करता है अँधेरे!...तो जब अंधकार पर प्रकाश की विजय का, असत्य पर सत्य की विजय का, बुराई पर अच्छाई की विजय का, अन्याय पर न्याय की विजय का और मूर्छा पर होश की विजय का उत्सव मनाने की बात आती है तो प्रतीक दीपक से बेहतर और क्या हो सकता है? हमारे सारे उत्सव भी तो प्रतीक ही हैं। ये उत्सव क्यों बनाये गए? इन प्रतीकों की जरुरत क्यों पड़ी?...ताकि हमारी विस्मृति बनी रहे कि हमारा मार्ग क्या है। हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है। भारत में तो हर दिन कोई न कोई उत्सव होता ही है। हमारे उल्लास, उत्साह और हर्ष को बनाये रखने के लिए और किसी मार्ग विशेष पर चलने की प्रेरणा के स्त्रोत के रूप में ही उत्सवों का प्रचलन शुरू हुआ होगा। लेकिन वर्तमान के सन्दर्भ में ये उत्सव अपने उद्देश्य को पूरा कर पाने में कितने सफल हैं, इसका संज्ञान लेना भी बहुत जरुरी है।

जरुरी है त्योहारों का वैज्ञानिक-अध्यात्मिक पक्ष भी प्रकट किया जाए। सामाजिक पारिवारिक सौहार्द वाली बात ठीक है लेकिन केवल कंडीशनिंग और मिथकों के आधार पर कुछ भी करते जाना आस्तिकता को पुष्ट नहीं करता। बल्कि धर्म और अधर्म की जो सबसे उपयुक्त और सदा प्रासंगिक रहने वाली परिभाषा है वह है ही यही कि जो भी कार्य होश या जागरूकता में किया जाए वह धर्म है और जो भी कार्य बेहोशी में किया जाए वह अधर्म।

लेकिन कंडीशनिंग का हाल यहाँ ऐसा है कि दिवाली के पटाखों को लेकर (आजकल तो जन्माष्टमी और छठ पूजा पर भी छूटने लगे हैं) कोई व्यक्ति बात शुरू न करे उससे पहले ही यहाँ हिंदुत्व ख़तरे में आ जाता है। मानों हिंदुत्व का अस्तित्व केवल पटाखों पर ही टिका है। इसी ख़तरे के तहत ‘बाकी धर्मों का भी यही हाल है’ यह बोलना जरुरी है यहाँ। और ये कंडीशनिंग ऐसी है कि आने वाले समय में बच्चे दीपावली पर निबंध में लिखा करेंगे : आज के दिन अयोध्या वासियों ने श्री राम का स्वागत पटाखे छोड़कर किया था। केवल संस्कृति और परंपरा के नाम पर हम उत्सवों में होने वाली बेबुनयादी और गैरजिम्मेदार चीजों को स्वीकृति नहीं दे सकते। किसी एक का उत्सव दूसरे की पीड़ा न बन जाए इसका ख़याल रखना भी तो जरुरी है न!...और समय के साथ-साथ गैरजरूरी चीजों और दूषित परम्पराओं से छुटकारा भी।

वैसे सबके पास अपने-अपने कारण है दिवाली मनाने के, इसलिए दिवाली किसी वर्ग विशेष का त्यौहार बनकर रहा ही नहीं। किसी के लिए राम की विजय और उनके अयोध्या वापस लौटने का उल्लास है, तो किसी के पास महावीर के निर्वाण प्राप्त करने का। किसी के पास फसल कटकर घर आने का उत्साह है तो किसी के पास गौतम बुद्ध के स्वागत का। हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध चाहे जितने भी पंथ या संप्रदाय हो दिवाली एक ऐसा त्यौहार है जो सीमाओं और वर्गों में बंधकर कभी रहा ही नहीं।...और फिर रौशनी को बाँटा भी कहाँ जा सकता है? उस पर तो सबका पूरा-पूरा अधिकार है।

दिवाली सूक्ष्म सफाई अभियान के भी अपने वैज्ञानिक पहलु हैं। वर्षा के बाद बढ़ जाने वाली सीलन, नमी, फफूंद आदि से इस सफाई के द्वारा निजात पायी जाती है। घर के हर कोने, छोटी से छोटी हर चीज को दिवाली के बहाने साल में एक बार संभाल लिया जाता है। अतिरक्त और अनुपयोगी सामान निकाल दिया जाता है। सर्दी के कपड़ों को धूप दिखाकर आने वाली सर्दी की तैयारी कर ली जाती है। वैसे मनुष्य कितना परिग्रही है इसका अहसास दिवाली सफाई अभियान में हो ही जाता है। अपने परिग्रह को कम करने का भी यह एक अच्छा अवसर है।

दिवाली यही याद दिलाने आती है हर साल कि हमारे भीतर की जीवंतता कभी बुझ न पाए।...और इस जीवंतता की रौशनी में हमारी दृष्टि स्पष्ट बने। अज्ञान के बादल जिन्होंने ढक रखा है हमारे मन को, उन्हें हम छितरा दें। आशा है यह दिवाली हमारे मन के अंधेरों को जीतने में सहायक बनेगी। इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ : Happy Diwali.

Monika Jain ‘पंछी’
(05/07/2015)

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