August 25, 2015

Essay on Social (Society) Change in Hindi

बनों वह बदलाव, जो तुम देखना चाहते हो

लेखन कभी मेरा क्षेत्र नहीं था। आज से कुछ साल पहले जब लिखना शुरू किया तब किसी ने कहा, 'तुम्हारे शब्दों में दुनिया को बदलने की ताकत है।' कल फिर किसी ने कहा, 'काश! आप और आप जैसे लोग बच्चों के शिक्षक होते तो यह दुनिया कितनी सुन्दर होती।' ऐसी प्रतिक्रियाएं निश्चित रूप से अनमोल हैं। लेकिन एक चीज हम सब लोगों के लिए समझना बेहद जरुरी है। एक पाठक या एक लेखक की जिम्मेदारी बस यहीं खत्म नहीं हो जाती। बल्कि यहीं से जिम्मेदारियां शुरू होती हैं। माता-पिता और शिक्षक ये तीन लोग निसंदेह पूरी दुनिया को बेहतर बनाने की ताकत रखते हैं, लेकिन सबसे पहली जरुरत होती है खुद को बेहतर बनाना।

कुछ दिन पहले किसी ने कहा, ‘मुंशी प्रेमचंद का ‘हामिद’ दुनिया में कहीं नहीं मिलता।’ क्यों नहीं मिलता? क्योंकि हम हमेशा हामिद की तलाश में रहते हैं। हम कभी भी हामिद बनना नहीं चाहते। हम हमेशा सोचते हैं हमें कहीं कोई महावीर, बुद्ध या गांधी जैसा दिख जाए, लेकिन हम उनकी राह पर चलने की कोशिश कभी नहीं करेंगे। हम अक्सर अपनी अच्छाईयों की तुलना अपने से कमतर से करेंगे और खुद को बेहतर समझेंगे। लेकिन अगर तुलना करनी भी हो तो हमेशा आदर्श व्यक्तित्व से ही होनी चाहिए। अच्छाई को लेकर हमारी अपेक्षाएं हमेशा दूसरों से जुड़ी रहती हैं, लेकिन जिस दिन ये अपेक्षाएं खुद से जुड़ जायेंगी, उस दिन दुनिया खुद-ब-खुद अच्छी बन जायेगी।

हम भ्रष्टाचार रहित देश चाहते हैं, लेकिन अगर भ्रष्टाचार शब्द का सही अर्थ हमें मालूम होता तो हेलमेट को जानकर घर पर भूल आने के बाद चालान से बचने के लिए ट्रैफिक पुलिस को हम 50-100 को नोट न थमाते। हम हमेशा जगह-जगह गन्दगी फैली होने की शिकायत करते हैं, लेकिन अगर सफाई के मायने हमें पता होते तो प्रकृति को निहारने गए हम, अपने पेट को भरने के बाद बचे प्लास्टिक और पॉलीथिन के कचरे को प्रकृति की गोद में न छोड़ आते। हम अच्छी शिक्षा चाहते हैं लेकिन जब कुछ अच्छा पढ़ाया जा रहा होता है, तब भी हम ध्यान नहीं देते क्योंकि हम तो ट्युशन पढ़ने जाते हैं। हम न्याय देखना चाहते हैं, लेकिन अपने पारिवारिक और सामाजिक जीवन में हम न्याय के कितने समर्थक हैं, यह सोचना नहीं चाहते। हम सच का नहीं पैसे, प्रतिष्ठा और ताकत का समर्थन करते हैं। अपने स्वार्थ के खातिर वृद्ध माता-पिता को वृद्धाश्रम छोड़ आते हैं। अपनी बेटी के लिए जैसे ससुराल की कामना करते हैं, वैसा अपनी पत्नी या बहु को नहीं दे पाते। हमें अपनी माँ, बेटी और बहन की इज्जत बहुत प्यारी है, लेकिन दूसरों की बेटियों और बहनों को हम बुरी नजर से देखना नहीं छोड़ेंगे।

काल्पनिक कहानियों पर हमारे कीबोर्ड आंसुओं से भीग जाते हैं। खत्म हो चुकी असल दर्दनाक कहानियों पर भी हमारी पलकें भीग जाया करती है। लेकिन जो कहानियां जारी है...अपने दर्द, अपने संघर्ष, अपनी मजबूरियों के साथ...उनके सामने तो हम पत्थर को भी मात दे जाते हैं। कभी-कभी तो उस कहानी को भुगत रहे पात्र का सर फोड़ देने की हद तक...कैसे लोग हैं हम? आन्दोलन या क्रांति, ये शब्द कितने अच्छे लगते हैं न हमें! इनका हिस्सा बनकर कितना गर्व महसूस करते हैं हम! न सर्दी देखते हैं, न बारिश। समय की परवाह भी नहीं करते। लेकिन जब बीच सड़क कोई दर्द से कराहता मदद की गुहार लगा रहा होता है तब हम बहरे और अंधे बन जाते हैं। तब हम दुनिया के सबसे व्यस्त इंसान नजर आते हैं।

हमें बेहतर समाज चाहिए, बेहतर न्यायिक व्यवस्था चाहिए, बेहतर सरकार, बेहतर तंत्र, बेहतर शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ, सब कुछ बेहतर चाहिए। लेकिन बेहतरी का यह रास्ता अगर कहीं से शुरू होता है तो हमारे ही भीतर से। पर हम खुद को नहीं बदलना चाहते...तो फिर हम दोयम दर्जे के आत्मकेंद्रित और स्वार्थी इंसान किस मुंह से बदलाव और परिवर्तन की बातें करते हैं?

मुझे याद आते हैं कुछ लोग जो कपड़े समय पर न धुल पाने पर पसीने से तरबतर कपड़ों की सड़ांध से परेशान होकर डीयो या परफ्यूम छिड़ककर खुद को और कपड़ों को सुगन्धित बनाकर बेफिक्र हो जाते थे। बिल्कुल यही...बिल्कुल यही हम अपनी समस्यायों के साथ भी करते हैं। हम समाधान करते हैं और समस्याएं नित नए रूपों में उभरकर सामने आती है। हमें एक परेशानी से निजात नहीं मिलता कि दूसरी परेशानी सर उठाये खड़ी नजर आती है। हमने प्लेग को मात दी तो बर्ड फ्लू का खतरा पैदा हुआ, बर्ड फ्लू को हराया तो स्वाइन फ्लू ने आ झपटा। प्रदुषण, ग्लोबल वार्मिंग, गरीबी, बेरोजगारी, बलात्कार, चोरी, महंगाई...हमारे पास समस्यायों के भंडार हैं। समस्यायों पर ढेरों चर्चाएँ होती है, पर समाधान? क्या सच में हम समाधान ढूंढते हैं? हम सिर्फ सतही बातें करते हैं। हम जानते हुए भी यह स्वीकार नहीं करते कि दुनिया की अधिकांश समस्याएं वैचारिक प्रदूषण से उपजी है। और यही वैचारिक प्रदूषण नित नयी-नयी समस्यायों के रूप में हमारे सामने आता है। जब तक हम सबने अपने मन को शुद्ध करने के प्रयास शुरू नहीं करेंगे तब तक समस्यायों से मुक्ति एक दिवा स्वप्न है।

गरीब अमीर बन जायेंगे, अमीर गरीब बन जायेंगे; नौकर मालिक की जगह पा लेगा, मालिक नौकर की; सवर्ण दलित बन जायेंगे, दलित सवर्ण; महिलाएं पुरुष की जगह पा लेगी और पुरुष महिलाओं की...पर समानता या समाधान तब तक दिवा स्वप्न रहेगा, जब तक हमारे मन से मालकियत, नियंत्रण, अहंकार और स्वार्थ की अति खत्म नहीं होती, जब तक हम अपने मन का कचरा साफ़ नहीं करते, जब तक हम दूसरों के साथ वैसा व्यवहार नहीं करते जैसा हम खुद के साथ चाहते हैं। जब तक हम वह बदलाव नहीं बनते जो हम देखना चाहते हैं।

Monika Jain ‘पंछी’
(25/08/2015)

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August 14, 2015

Jainism (Jain) Santhara Sallekhana Essay in Hindi

जैन धर्म : संथारा व सल्लेखना प्रथा

हम सभी को बहुत जल्दबाजी मची रहती है चीजों को सही और गलत के तराजू में तौलने की, पर काश! काश सब कुछ इतना आसान होता। अगर सब कुछ इतना ही आसान होता तो तुरंत दुनिया के सारे कामों को सही और गलत के एक्सट्रीम्स पर श्रेणीबद्ध कर दिया जाता और फिर कोई विवाद ही नहीं रहता। पर चीजें सामान्तया द्वैत नहीं होती...अक्सर सही और गलत के बीच कहीं होती है, और फिर जितने भी दुनिया में प्राणी है उतने ही सही और गलत अलग से अस्तित्व में आ जाते हैं।

इन दिनों ओशो की 'महावीर वाणी' पढ़ रही हूँ। कल ही 'संथारे' पर रोक की ख़बर सुनी और शाम में ही यह किताब पढ़ते समय 'संथारे' का थोड़ा सा जिक्र आया। सबसे महत्वपूर्ण जो चीज होती है वह होते हैं भाव और दृष्टिकोण। 'आत्महत्या' को हम सामान्यता जिजीविषा का खत्म होना मानते हैं, पर वास्तविकता इससे परे है। आत्महत्या जिजीविषा का खत्म होना नहीं बल्कि कुछ विशेष शर्तों के साथ गहरी जिजीविषा का होना है, जिनके पूरा ना होने पर हम मृत्यु का मार्ग चुन लेते हैं, और यह निर्णय भी बस एक क्षण का आवेश होता है। अगर उस क्षण किसी ने रोक लिया होता तो आत्महत्या भी कोई नहीं करता। बल्कि आत्महत्या की तैयारी करते समय एक सांप आ जाए तब भी मरने को इच्छुक व्यक्ति भाग खड़ा होगा। क्योंकि गहरे में कहीं जीने की इच्छा प्रबल है। मतलब जहाँ-जहाँ मरने की इच्छा है वहां जीने की इच्छा निश्चित रूप से होगी, बस वह कंडीशनल होगी।

अब आते हैं 'संथारे' पर! अपने शुद्ध रूप में संथारा वह भाव है जहाँ ना जीने की इच्छा होती है और ना ही मरने की। इसके मूल में भी अहिंसा ही है, क्योंकि हमारी जीने की सारी इच्छा हिंसा पर खड़ी है। हर एक जीवन किसी ना किसी की मृत्यु पर ही संभव है। ऐसे में संथारा अपने आदर्श रूप में अहिंसा के उच्चतम भाव के अलावा और कुछ नहीं है। पल भर में डर कर खुद को खत्म कर लेना बहुत आसान काम है, लेकिन अन्न, जल का त्याग करते हुए 20-30-60-90 दिनों तक जीना किसी कायर या मृत्यु की इच्छा रखने वाले का काम नहीं हो सकता, वह भी तब जबकि हम जानते हैं कि हमारा मन क्षण-क्षण बदलता रहता है।

इसके अलावा जैन धर्म मुक्ति के लिए कर्मों की निर्जरा पर विश्वास करता है, जिसका मुख्य आधार अहिंसा है। अपने अंतिम समय में नए पाप कर्मों के बंध को रोकने के लिए संथारा लिया जाता है, ताकि अपनी सेवा के लिए किसी को कष्ट ना पहुँचाया जाए और आहार-विहार आदि से होने वाली हिंसा से भी बचा जा सके। ऐसे में संथारा आत्महत्या और इच्छामृत्यु दोनों से ही बिल्कुल अलग है।

कल किसी ने कहा कि संथारा एक प्राकृतिक मृत्यु नहीं है। संथारे का समर्थन या विरोध बाद में, उससे पहले एक सवाल मेरे दिमाग में घूम रहा है। हम जिस परिवेश में रह रहे हैं उसमें कौनसी मृत्यु प्राकृतिक है? एक शराबी जो रोज शराब पीता है उसकी? एक स्मोकर जो रोज सिगरेट पीता है उसकी? विकास के नाम पर जो करोड़ों टन धुआँ वायुमंडल में छोड़ा जाता है उसमें सांस लेने वालों की? कीटनाशकों और रसायनों के इंजेक्शन का प्रयोग करके जो पेड़ पौधे और पशु-पक्षी हम जबरन पैदा करवा रहे हैं उन्हें खाने वालों की? यहाँ तक की रोज चाय, दूध और कॉफ़ी में घोलकर पी जाने वाली शक्कर को भी धीमा जहर माना जाता है।...तो बात ऐसी है कि प्रत्यक्ष हो या अप्रत्यक्ष, होश में हो या बेहोशी में...हम सभी आत्महत्या और परहत्या करने के अलावा रोज कौनसा काम कर रहे हैं?

और कल्पना कीजिये कि अगर पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं के भी क़ानून लागू होने शुरू हो जाएँ तो आत्महत्या तो बहुत बाद की बात है, पहले तो परहत्या के मामलों की गिनती ही नामुमकिन हो जायेगी। बात गोलमोल घुमाने वाली नहीं है। बात ऐसी है कि वास्तव में ही सब कुछ गोलमोल ही है।...तो कम से कम जो इस गोलमोल से बिना किसी को कष्ट पहुंचाए, बिना कोई गलत सन्देश दिए मुक्त होना चाहते हैं, उनके बारे में सोच समझकर कुछ निर्णय लेना ही उचित होगा।

Monika Jain ‘पंछी’
(14/08/2015)

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August 5, 2015

Story of Parrot in Hindi

मुझे अच्छी लगती है उनकी आज़ादी

मुझे पशु-पक्षियों को हाथ में पकड़कर घुमाना या उन्हें पिंजरे में रखकर दिल बहलाना जरा भी नहीं पसंद। पर हाँ, मुझे अच्छा लगता है आकाश में ऊंचाइयों पर उड़ते हुए पंछियों को देखना। मुझे अच्छा लगता है जब अचानक कोई भेड़ या बकरियों का झुण्ड घर के बाहर से गुजरता है और उनमें से कुछ शरारती मेमने फुदककर कतार से बाहर निकल इधर-उधर दौड़ने लगते हैं। मुझे अच्छा लगता है जब छत पर सुबह रखा दाना और पानी अगली सुबह तक अनजाने दोस्तों द्वारा पूरा फिनिश कर दिया जाता है। मुझे अच्छा लगता है घर की सीढ़ियों पर बैठकर कुत्ते या उसके पिल्ले को रोटी के छोटे-छोटे टुकड़े करके खिलाना। कई बार जब रोटी एक हो और कैंडिडेट्स ज्यादा तो चुपके से सभी को इक्वल-इक्वल शेयर करके खिला देना मुझे अच्छा लगता है। तितलियों, तोते या किसी भी पक्षी को पकड़ने के इरादे से आये विलेन को देखकर उन्हें फुर्र से उड़ा देना मुझे अच्छा लगता है। मुझे अच्छी लगती है उनकी आज़ादी। बहुत अच्छी।

पर कुछ लोगों को जाने क्यों यह अच्छा नहीं लगता। बात कुछ सालों पहले की है। एक तोता शायद कहीं से किसी पिंजरे से उड़कर हमारे घर पर आ गया था। उसके थोड़े से कटे हुए पंखों और उसके हावभाव से यही लग रहा था कि वह एक पालतू तोता है। बिना किसी जान पहचान के भी खाना खाते समय थाली पर या मुझ पर आकर बैठ जाता। उसे तो डर नहीं लग रहा था पर उसके इतने अपनेपन से मैं डर जाती थी। :p हालाँकि निश्चिंत थी कि जैसे आया है वैसे ही चला भी जाएगा। पर एक दिन 2-3 घंटे के लिए बाहर क्या गयी, कुछ बच्चों को उस तोते की भनक लग गयी और मेरी अनुपस्थिति में वे उसे पकड़ने को आ गए। वह उड़कर भाग गया तो पूरे 2 घंटे उन बच्चों ने उसे पकड़ने के लिए एक पेड़ से दूसरे पेड़, दूसरे से तीसरे पर दौड़ाया। उस पर पत्थर फेंके सो अलग। उड़ने में वह शायद बहुत ज्यादा माहिर नहीं था इसलिए उनके पकड़ में आ गया और सामने रहने वाले पड़ोसी के बच्चों ने उसे पिंजरे में डाल दिया।

मेरे घर आने तक यह सब काण्ड हो चुका था। जब मुझे यह सब पता चला तो बहुत दुःख हुआ और बहुत गुस्सा भी आया। पता नहीं मैंने सही किया या नहीं, पर मैंने उस बच्चे से पिंजरे में पकड़ा तोता अपने घर पर दिखाने को लाने को कहा और उसे उस तोते को पिंजरे से बाहर निकालकर वही छोड़कर जाने के लिए मजबूर कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि पड़ोसी का मुंह फूल गया। उस पर उनका तर्क कि बच्चों ने 2 घंटे तक इतनी मेहनत की इसे पकड़ने की। पर इससे भी बुरी जो चीज हुई वह थी उस तोते के दिमाग में भयंकर वाले डर का बैठ जाना जो बच्चों ने उसके पीछे पड़-पड़कर, पत्थर फेंक-फेंक कर उसके दिल और दिमाग में बैठा दिया था। उस दिन के बाद तोता बस कमरे में एक जगह बैठ गया और कभी अपनी जगह से हिला तक नहीं। कुछ खाने को दिया जाता तो नहीं खाता। किसी की भी आहट होती या पड़ोस के वही बच्चे उसे देखने के लिए कभी आ जाते तो वह बहुत बुरी तरह से सहम जाता। 1-2 दिन ऐसे ही निकल गए।

मैंने बहुत कोशिश की उसे सहज माहौल देने की पर फिर वह तोता मैंने कभी नहीं देखा जो बिना किसी डर के खाने की थाली में आ बैठता था, जो पूरे दिन घर में इधर से उधर उड़ता फिरता था। हाँ, आखिरी दिन वह कमरे से बाहर खुले चोक में आया था पर फिर पता नहीं कब वह उड़ कर घर से बाहर चला गया। जिन्दा रहा होगा या नहीं यह तो नहीं पता लेकिन मुझे यही लगता है कि किसी के मनोरंजन के लिए कैदी बनने से कई बेहतर होगी उसके लिए उसकी आज़ादी वाली मौत।

Monika Jain ‘पंछी’
(05/08/2015)

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