September 27, 2015

Story on Dussehra in Hindi

मुन्नी का दशहरा

मुन्नी बड़ी ख़ुश नजर आ रही थी। आज पहली बार वह अपने कस्बे का दशहरा मेला जो देखने जा रही थी। मेला देखने का यह उत्साह कई दिनों से उसके नन्हें से मन में हिलोरे ले रहा था। कुछ ही दिन पहले उसकी हिंदी की टीचर ने दशहरे के बारे में पढ़ाया था। तबसे उसका इंतजार और भी बढ़ गया। मेले की चाट-पकौड़ी, गुब्बारे, मिट्टी के सेठ-सेठानी, हूपला, झूले ये सब तो उसके आकर्षण का केंद्र थे ही लेकिन कई दिनों से मुन्नी के दिमाग में कुछ और बातें भी चल रही थी।

उसकी हिंदी की टीचर ने बताया था कि दशहरा बुराई पर अच्छाई की विजय का त्यौहार है और रावण को जलाना एक तरह से बुराई को जलाना ही है। उस दिन से ही मुन्नी ने कॉपी के एक पन्ने पर उन सब बातों की लिस्ट बनानी शुरू कर दी जो उसे भली नहीं जान पड़ती थी।

मुन्नी के पापा मुन्नी को बहुत प्यार करते हैं, लेकिन कुछ समय से वह देख रही थी कि पापा सिगरेट और शराब पीने लगे हैं जिसकी वजह से आये दिन पापा और मम्मी के बीच झगड़ा होता है। स्कूल में उसके बगल में बैठने वाली सीमा जब-तब उसकी पेंसिल चुरा लेती है और अगले दिन पेंसिल को दोनों और से छीलकर उसकी शक्ल ही बदलकर ले आती है और कहती कि यह तो मेरी ही है। उसकी अंग्रेजी की टीचर छोटी-छोटी सी बातों पर बच्चों को लकड़ी की बेंत से बुरी तरह से पीटती है। उसके पड़ोस में रहने वाला कल्लू जब भी वह घर के बाहर पड़ी काली मिट्टी से खिलौने बनाती है तो सब तहस-नहस करके चला जाता है।

पड़ोस में रहने वाली गौमती काकी जो एक अँधेरी कोठरी में रह रही है, हर रोज शहर बस गए अपने बेटे की चिट्ठी का इंतजार करती है पर वह चिट्ठी कभी नहीं आती। उसी की दोस्त गिन्नी की सौतेली माँ गिन्नी से ढेर सारा काम करवाती है, उसे खाना भी पूरा नहीं देती और उसकी पिटाई भी करती है। ऐसी ना जाने कितनी बातों की लिस्ट उसने बनायी और भगवान जी के नाम एक चिट्ठी लिख दी, जिसमें उसने इन सभी बुराईयों को रावण के साथ जला देने की प्रार्थना भगवान से की।

शाम में जब माँ ने मेले के लिए तैयार होने को आवाज लगाई तो मुन्नी अपनी सबसे पसंदीदा फ्रॉक पहनकर उसकी जेब में वह चिट्ठी डालकर इठलाते हुए मम्मी-पापा के साथ मेला देखने निकल पड़ी।

मेले में पहुँचने पर माँ-पापा किसी खिलौने की दुकान पर रुकते और उससे कुछ पसंद का खरीदने को पूछते तो वह बाद में-बाद में कहकर टाल देती और कहती मुझे सबसे पहले रावण को देखना है, एकदम पास से। और इस तरह वह बीच में आने वाले चाट-पकौड़ी, कुल्फी, झूले, गुब्बारों सबको अनदेखा करते हुए तब तक नहीं रुकी जब तक कि रावण के नजदीक नहीं पहुँच गयी। पर अपनी चिट्ठी डालने के लिए तो उसे और भी पास जाना था। पर पापा ने कहा कि इससे आगे नहीं जा सकते और यहाँ से रावण कितना बड़ा और साफ़ दिख तो रहा है। जब और आगे जाने का कोई रास्ता और तरकीब उसे नजर नहीं आई तो वह मायूस हो गयी। पापा ने उसे बार-बार समझाया पर उस पर कोई असर न हुआ। मेला देखने का इतने दिनों का उल्लास जाने कहाँ चला गया। तभी पापा ने अपनी गुड़िया को गोद में उठाया और इसी दौरान वह चिट्ठी नीचे गिर पड़ी। मुन्नी बोली मेरी चिट्ठी और पापा उसे उठाकर पढ़ने लगे।

बच्ची के मासूम शब्दों में ढली प्रार्थना पापा के दिल को छू गयी। उन्होंने मुन्नी को चूमा और प्यार से समझाया, ‘बेटा, कोई भी बुराई सिर्फ कागज को आग में जला देने से नहीं मिट सकती। इसके लिए उसे हमें अपने मन से मिटाने का संकल्प लेना होता है। रावण को जलाना बस एक इशारा भर है हम सबके लिए अपने-अपने मन के रावण को जलाने के लिए। लेकिन अफसोस है कि हम बस कागज़ के रावण ही जलाकर रह जाते हैं।’ यह कहकर मुन्नी के पापा ने अपनी जेब से सिगरेट का पैकेट बाहर निकाला और उसे वहां पड़े डस्टबिन में फेंक दिया और मुन्नी से वादा किया कि अबसे वह इन बुरी आदतों को हाथ भी न लगायेंगे।

मुन्नी की मुस्कान फिर लौट आई। उसने कहा, ‘अगर ऐसा है तो आज से मैं अपना होमवर्क टाइम से करुँगी और खाना खाते समय नखरे भी नहीं दिखाऊंगी।’ मुन्नी की माँ भी ख़ुश होकर बोली, ‘आज से मैं भी अपनी प्यारी मुन्नी पर कभी हाथ नहीं उठाऊंगी।’

पीछे रावण जलने लगा था। मुन्नी ने अपने पापा-मम्मी के साथ मेला अच्छे से घूमा, खिलौने खरीदे, झूला खाया, हूपला खेला, जादूगर का खेल देखा; अपनी पसंदीदा आइसक्रीम, जलेबी और पकौड़ियाँ खायी और फिर सब ख़ुशी-ख़ुशी घर लौट आये। मेले से वह गौमती काकी के लिए मिठाई और एक साड़ी भी खरीद कर लायी थी, जिसे देखकर गौमती काकी की आँखें ख़ुशी से छलछला उठी। उसने मेले से लाये खिलौनों से कल्लू को भी खेलने दिया और इसके बाद कल्लू ने उसके खिलौने कभी नहीं बिगाड़े।

अपने लिए मेले से लायी रंग-बिरंगी पेंसिल्स में से उसने कुछ पेंसिल सीमा को भी दी। सीमा बहुत ख़ुश हुई और उसे अपनी गलती का अहसास भी हुआ। उसने मुन्नी से वादा किया कि अब वह ऐसा काम कभी नहीं करेगी।

अंग्रेजी की बेंत मारने वाली टीचर और उसकी सहेली गिन्नी की सौतेली माँ के अंदर के रावण भी एक दिन जल जायेंगे, इसी आशा के साथ वह अपना होमवर्क करने बैठ गयी।

Monika Jain ‘पंछी’
(27/09/2015)

September 25, 2015

Essay on Bakra Eid Ul Adha (Zuha) in Hindi

नयी ईद का इंतजार

(1)

12/09/2016 - घर से बाहर जब भी बकरियों या भेड़ों का झुण्ड सर झुकाए चलते हुए देखती हूँ तो वह जो नन्हा सा मेमना फुदककर आता हुआ सारी भीड़ को तितर-बितर कर देता है, उसपे बड़ा प्यार आता है। परम्पराओं के नाम पर बिना सोचे समझे अक्सर 'भेड़ चाल' चलते हैं हम। बस तुम (मैं शामिल) वह नन्हा, मासूम मेमना बन जाना और बदल देना परंपरा को। तुम बता जाना अगली पीढ़ी को कि हम ईद इसलिए मनाते आ रहे हैं क्योंकि इस दिन से कई मासूमों को जीवन मिलने लगा था। कल्पनाएँ बड़ी असंभव सी करती हूँ मैं...पर उस नयी ईद का मुझे इंतजार है।...और उस नन्हें मेमने को ढेर सारा प्यार है।

(2)

25/09/2015 - किसी की धार्मिक स्वतंत्रता से समस्या नहीं...न हिन्दू की, न मुस्लिम की, न किसी और की। किसी के भी उत्सव और आनंद में ख़लल डालने का कोई इरादा नहीं। बात बस इतनी सी है कि अपने अति अस्तित्व और अपनी अति महत्वकांक्षाओं के चलते मनुष्य वैसे ही बहुत ऊलजलूल हरकतें करता आया है। तिस पर उसे धर्म भी ऐसी ही हरकतों के लिए चाहिए। क्या जीवन का कोई एक कोना भी नहीं छोड़ सकते हम शांति, सुकून और प्रेम के लिए कि जब-जब लगे कि बहुत हुआ अब तो फिर लौट आये वहां फिर से।

कभी-कभी समझ नहीं आता...प्रतीकों और विवेकहीन मान्यताओं के इतने अवलंबन की जरुरत क्यों हैं? इंसान इतना भयभीत क्यों हैं? क्यों स्वार्थ और धर्म के नाम पर वह इतना अँधा बन जाता है कि उसे उचित-अनुचित भी दिखाई नहीं पड़ता। क्यों वह ताउम्र खुद से दूर भागता रहता है और बाहर सारे समाधान ढूंढता रहता है। कहीं इसलिए तो नहीं कि जो भीतर झाँका तो सारी पोल-पट्टी खुलने का डर है? मन से बहुत निशक्त हैं हम...बहुत ज्यादा। इसलिए मन में झाँकने तक की हिम्मत नहीं कर पाते। धर्म जो अँधा बनाये वह धर्म कैसे हो सकता है? धर्म का काम तो जागृति होना चाहिए था...अन्धता तो बिल्कुल भी नहीं। धर्म का काम तो एकता होना चाहिए था...बंटवारा तो बिल्कुल भी नहीं। धर्म तो प्रेम होना चाहिए था...नफरत और हिंसा तो बिल्कुल भी नहीं। धर्म तो मुक्ति का अहसास होना चाहिए था...ये बाहरी जकड़न तो बिल्कुल भी नहीं। ये रक्तरंजित घूमती हुई तस्वीरें अच्छी नहीं लग रही...बिल्कुल भी नहीं। अगर कोई पूछे कि दुनिया का सबसे अभिशप्त शब्द कौनसा है तो इन तस्वीरों को देखकर बस एक ही जवाब दिमाग में आता है...धर्म!

माना कि हर किसी का जीवन हिंसा पर ही खड़ा है, हिंसा के बिना किसी जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। लेकिन अनावश्यक हिंसा को तो रोका जा ही सकता है। बचपन में फूलों की सुन्दरता से आकर्षित होकर मैं कभी-कभी फूल तोड़ लेती थी, पर फूल को तोड़ते ही उसकी सुन्दरता जाने कहाँ गायब हो जाती थी और हर बार फूल तोड़ने पर पछतावा ही होता था। धीरे-धीरे कब फूलों का जीवन पौधों पर ही अच्छा लगने लगा, पता भी न चला...और अब फूल नहीं तोड़े जाते, किसी पूजा-पाठ करने वाले के लिए भी नहीं।

क्योंकि अगर किसी का यह विश्वास भी है कि सृष्टि की रचना ईश्वर/अल्लाह ने की है, तब भी सृष्टि का रचयिता अपने ही नाम पर अपनी ही रचनाओं की मृत्य से ख़ुश कैसे हो सकता है? किसी निर्दोष या मासूम की हत्या से तो बिल्कुल भी नहीं। हम सभी किसी न किसी मात्रा में हिंसक हैं...कोई कम तो कोई ज्यादा। इसलिए यह तो समझ आता है कि किसी की कटु आलोचना का अधिकार हमें नहीं है। लेकिन हम मिलकर इस दुनिया को जितना संभव हो, सबके लिए सुंदर और जीने योग्य तो बना ही सकते हैं। क्योंकि जीना भला किसे नहीं पसंद? और इतना नहीं कर सकते तब भी इतना तो कर ही सकते हैं कि जो काम गलत है, सिर्फ हमारे स्वार्थ और मनोरंजन के लिए है, धर्म और ईश्वर जैसी अमूर्त चीजों के नाम पर उन्हें मढ़कर उनका महिमामंडन तो न करें।

(3)

26/09/2015 - हममें से अधिकांश लोग हिंसा के सिर्फ स्थूल और बाहरी स्वरुप को ही जानते हैं। यहाँ हिंसा के खिलाफ पल-प्रतिपल आ रही पोस्ट बार-बार यही बता जाती है। लेकिन हिंसा बाहर नहीं भीतर गहराई में मौजूद है। आप वास्तव में बाहर किसी को नहीं मार सकते। हिंसा या प्रेम मुख्य रूप से भीतर घटित होता है और वही बाहर अभिव्यक्त होता है। हमें इसके सूक्ष्म से सूक्ष्मतम स्तर को समझना और पहचानना जरुरी है। धर्म के स्तर पर छोड़ने की कोई बाध्यता या जल्दी नहीं होती (कानून/न्याय व्यवस्था के लिए जरुरी हो सकता है) क्योंकि जिस क्षण कुछ वाकई में आत्मसात हुआ वह स्वत: ही छूट जाता है। कई जगह इको फ्रेंडली बकरे को काटने की बात चल रही है। जाने क्यों मुझे यह ‘आकाश से गिरे, खजूर पे अटके’ जैसी बात लग रही है। भाव हिंसा को समझिये। प्रेम को धर्म का प्रतीक बनाईये, किसी प्राणी को काटने को नहीं। रही बात अर्पण-समर्पण या कुर्बानी की तो प्रेम के क्षण में ईश्वर खुद हमसे प्रकट हो रहे होते हैं। इससे निकट ईश्वर से कोई क्या सम्बन्ध बन सकता है?

Monika Jain ‘पंछी’

September 23, 2015

Essay on Theism, Atheism, Agnosticism in Hindi

नास्तिकता क्यों एक समाधान नहीं

एक ओर धर्म में जहाँ आडम्बर और कर्म-काण्ड आधुनिकता का रंग ओढ़कर आगे से आगे स्थानांतरित होते जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर स्वयं को तर्कवादी कहने वाले नास्तिकों की संख्या में भी इज़ाफा हो रहा है। हालाँकि आडम्बर एक ऐसी चीज है जिसका सिर्फ धर्म से सम्बन्ध नहीं है, इसका सम्बन्ध मनुष्य के मन से है और इस आडम्बर से तो आस्तिक क्या नास्तिक भी अछूते नहीं है। हाँ, बस ईश्वर और धर्म के नाम पर जो भौंडा प्रदर्शन होता है वह थोड़ा अधिक कुरूप लगता है। धर्म के नाम पर होने वाले अपराध अधिक घृणित लगते हैं। बाकी दिखावों और अपराधों का तो हमारा यह समाज आदि हो ही चुका है। इससे कोई कितना अछूता रह पाता है यह तो उसकी प्रकृति और जागरूकता पर ही निर्भर करेगा, आस्तिक या नास्तिक के लेबल पर नहीं।

जहाँ एक ओर लोग अपने धर्म और जाति विशेष का होने पर गर्व करते हैं वैसे ही नास्तिक अपने नास्तिक होने पर गर्व महसूस करते हैं। कुछ समय तक मैं नास्तिकता के अधिक पक्ष में थी लेकिन तथाकथित आस्तिकता और नास्तिकता का बारीकी से विश्लेषण करने के बाद मुझे यह महसूस हुआ कि अधिकांश मामलों में दोनों में कोई विशेष अंतर नहीं। दोनों में ही कट्टरता और अन्धविश्वास को देखा जा सकता है। अपवाद भी दोनों में है ही।

नास्तिक धर्म को सारे अपराधों की जड़ मानते हैं और उन्हें लगता है कि धर्म के खत्म हो जाने से देश और दुनिया बेहतर बन जायेगी, लेकिन केवल एक नास्तिक शब्द के बल पर जो दुनिया बदलने चले हैं वे बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी में हैं। अगर उन्हें लगता है कि राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, हजरत मोहम्मद के उपदेशों को मिटा देने से; गीता, कुरान, बाइबिल सभी धर्म ग्रंथों को आग लगा देने से; धर्म शब्द को ही लोगों के जेहन से मिटा देने मात्र से समस्यायों का समाधान हो सकता है तो वे फिर से वही भूल दोहरा रहे हैं जो आस्तिकों ने इस रूप में की है कि सिर्फ ईश्वर की पूजा-पाठ कर लेने से, गंगा में डुबकी लगा लेने से, साधुओं का प्रवचन सुन आने से, मंदिरों या गरीबों में दान कर देने से, अपने-अपने धर्म का प्रसार करने से, निर्दोष पशुओं की बलि देने से और गाय को माता मान लेने से वे स्वर्ग या जन्नत में पहुँच जायेंगे, उनके सारे कष्ट दूर हो जायेंगे या उन्हें अपने गलत-सही हर तरह के स्वार्थ को सिद्ध करने का लाइसेंस मिल जाएगा। दोनों की विचारधारा में ज्यादा कुछ अंतर नहीं। क्योंकि सतही और फोरी तौर पर किये गए उपाय समाधान नहीं बन सकते। इलाज के लिए रुग्ण जड़ों को स्वस्थ जड़ों में रूपांतरित करना जरुरी है। उस कीड़े को मिटाना जरुरी है जिसे स्वार्थ और अज्ञानता कहा जा सकता है। क्योंकि किसी भी तरह के अपराध के मूल में स्वार्थ, अहंकार और अज्ञानता ही होती है, धर्म कहीं भी नहीं।

सबसे महत्वपूर्ण चीज यहाँ जो दोनों वर्गों द्वारा इग्नोर की जा रही है वह है मनुष्य का मन और उसका आदतन स्वभाव! जो न तो नाम मात्र का आस्तिक बन जाने से बदल सकता है और न ही नास्तिक बन जाने से। अधिकांश मामलों में आस्तिकता और नास्तिकता एक जिद और अहंकार से ज्यादा कुछ भी नहीं लगती। नास्तिकों की बातें पढ़ें तो नजर आएगा कि उनका एक मात्र उद्देश्य बस धर्म और ईश्वर को गरियाना भर ही रह गया है। जबकि अन्धानुकरण की प्रवृत्ति, शब्दों और प्रतीकों को पकड़ने की प्रवृत्ति सिर्फ धर्म और ईश्वर की मोहताज नहीं। यह पकड़ना मनुष्य का स्वभाव बन गया है, जो जीवन के कई क्षेत्रों में देखने को मिल सकता है। बल्कि कई नास्तिक खुद अपने जीवन का अवलोकन करेंगे तो वे खुद भी अपने आपको किसी न किसी चीज की गंभीर जकड़न में पायेंगे। बहुतों ने तो नास्तिक शब्द को ही पकड़ लिया है और यह पकड़ना ही तो अन्धानुकरण और अंध श्रद्धा है। बल्कि पकड़ जहाँ जितनी गहरी वहां हिंसा उतनी ही ज्यादा। आडम्बर, हिंसा, दिखावा, पाखण्ड मनुष्य के दिल और दिमाग में इस कदर रच बस गए हैं कि वह धर्म के क्षेत्र से निकल भी जाए तो अन्य रूपों में प्रकट होंगे लेकिन होंगे जरुर! अभी भी हो ही रहे हैं। हिटलर और स्टालिन दोनों से बेहतर इस बात के और क्या उदाहरण हो सकते हैं। एक आस्तिक था, दूसरा नास्तिक, लेकिन दोनों के तानाशाही कांडों में कोई अधिक अंतर नहीं। दुर्गा पूजा के विरोध में जब महिषासुर की पूजा होती है, राम के विरोध में जब रावण को पूजा जाता है, बीफ पार्टी के विरोध में जब पोर्क पार्टी या पोर्क पार्टी के विरोध में जब बीफ़ पार्टी होती है तो यह विश्वास और भी दृढ़ हो जाता है कि समस्या कहीं बाहर है ही नहीं। सारी समस्या तो भीतर ही है।

कुछ बातों को समझना यहाँ जरुरी है। अन्धविश्वास अपने पाँव क्यों पसारते हैं? एक पक्ष के स्वार्थ और दूसरे पक्ष के अज्ञान और आत्मविश्वास की कमी के कारण। जिस व्यक्ति को यह न पता हो कि विविध पदार्थों और धातुओं से वैज्ञानिक प्रक्रिया द्वारा निर्मित एक यंत्र सात समुद्र बात करने में भी सक्षम है, उसके लिए पहली बार ऐसे किसी यंत्र से रूबरू होना किसी चमत्कार के साक्षात्कार से ज्यादा कुछ हो भी कैसे सकता है? इसके अलावा मनुष्य का मन बहुत निशक्त है। दिन प्रतिदिन बढ़ती भौतिकवादी सुख-सुविधाओं ने लोगों के मन को इतना कमजोर बना दिया है कि छोटी से छोटी समस्या भी उन्हें पहाड़ जैसी बड़ी लगने लगती है। ऐसे में हमेशा वे अवलंब और सहारा ढूंढने की कोशिश करते हैं कि कोई उनकी समस्यायों का निराकरण कर दे। और जो लोग इन समस्यायों को भुनाने के लिए चमत्कारी दूकानें खोल कर बैठे हैं, वहां उन्हें उम्मीद की किरण नजर आती है इसलिए उनके यहाँ ग्राहकों की भीड़ बढ़ने लगती है और उनका व्यवसाय दिन दुगुनी, रात चोगुनी दर से फलने-फूलने लगता है।

स्वार्थ, अहंकार और अज्ञान केवल तथाकथित धर्म का मोहताज नहीं है। धर्म रहे न रहे स्वार्थ, अहंकार और अज्ञान तो तब तक रहेगा ही जब तक ज्ञान और शिक्षा का प्रसार नहीं होता, जब तक लोगों का मन प्रेम और करुणा से ओतप्रोत नहीं होता। दुनिया को हम अगर अच्छा बनते देखना चाहते हैं तो सबसे पहले जरुरत है संकीर्ण सोच से मुक्त एक खुले दिमाग की और सकारात्मक बातों के प्रसार की। ईश्वर है या नहीं यह चिंता का विषय नहीं है। चिंता का विषय है अज्ञान और स्वार्थ के वशीभूत अपनी कट्टर मान्यताओं को ओढ़े बढ़ती नफरत, हिंसा और मनमुटाव! जैसे ही हम दिमाग को खुला छोड़ेंगे और अपने मन, जीवन और आसपास के परिवेश पर विवेक पूर्वक सकारात्मक दृष्टि रखना शुरू करेंगे तो हमें कई नयी चीजें समझ आने लगेगी। विज्ञान, कारण-कार्य-परिणाम के एक ऐसे परिवेश का निर्माण करना बहुत जरुरी है जहाँ लोग मन से सशक्त, संवेदनशील, प्रेम और करुणा से भरे हो, जो अपने आप से दूर भागने की बजाय अपने भीतर झाँकने की हिम्मत कर सके और वहां अपनी समस्यायों के समाधान ढूंढ सकें। जहाँ लोग बाहर कुछ बदलने से पहले भीतर खुद को बदलने का साहस कर सकें। जहाँ लोग सच्चे अर्थों में आत्मनिर्भर बन सकें।

Monika Jain ‘पंछी’
(23/09/2015)

September 4, 2015

Dr Sarvepalli Radhakrishnan Biography in Hindi

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन उन महान राजनेताओं में से एक थे जिन्हें अपनी संस्कृति एवं कला से लगाव होता है। वे एक आस्थावान हिन्दू थे, साथ ही अन्य समस्त धर्मावलम्बियों के प्रति भी गहरा आदर भाव रखते थे। जो लोग उनसे वैचारिक मतभेद रखते थे, वह उनकी बात भी बड़े सम्मान और धैर्य से सुनते थे।

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की दर्शनशास्त्र की अगाध विद्वता और अंग्रेजी भाषा पर बेमिसाल अधिकार को देखकर सभी चकित रह जाते थे। दर्शनशास्त्र भले ही शुष्क विषय है और कम लोग ही उसे समझ पाते हैं, परन्तु उनका विषय को उपस्थित करने का ढंग, प्रभावपूर्ण भाषा और उच्चारण से यही प्रतीत होता था कि इस व्यक्ति ने न जाने कितने वर्ष इंगलैंड के आक्सफोर्ड अथवा कैम्ब्रिज विश्वविघालय में शिक्षा पायी होगी। और एक दिन उनकी विद्वत्ता पर मुग्ध छात्रों ने पूछ ही लिया, ‘सर, आपने कौन-सी विदेशी परीक्षा पास की है, और कौन-सी डिग्री प्राप्त की है?’ प्रो. राधाकृष्णन् ने अपनी शैली में ही उत्तर दिया, ‘मैं इंगलैंड पढ़ने नहीं गया, हां पढ़ाने अवश्य जाऊंगा।’ उनका मुख-मण्डल आत्मविश्वास की अनोखी आभा से दमदमा रहा था और छात्र अपने प्रोफेसर की उक्ति से खुशी में उन्मत हो तालियां बजा रहे थे।

इतना कुछ पढ़ने के पश्चात डॉ. राधाकृष्णन के व्यक्तित्व के संबंध में उत्सुकता का जाग्रत होना स्वाभाविक है। इसका शमन नीचे किया जा रहा है :-

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म तिरूतनी में 5 सितम्बर, 1888 को, एक गरीब बाह्मण-परिवार में हुआ था। दक्षिणात्यों के लिए यह स्थान बहुत पहले से एक प्रसिद्ध तीर्थस्थल रहा है जो आज के चैन्नई शहर से 64 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित है।

डॉ. राधाकृष्णन के नाम के पूर्व सर्वपल्ली लगने का एक महत्वपूर्ण कारण है। 1852-55 के आसपास इनके पूर्वज सर्वपल्ली ग्राम से तिरूतनी तीर्थस्थल में आ बसे थे। उन लोगों ने अपने नामों के पूर्व अपनी जन्मभूमि का नाम संयुक्त रखना उचित समझा, जैसा कि दक्षिण में अक्सर होता है। इनके पिता का नाम सर्वपल्ली वीरास्वामी और माता का नाम सीताम्मा था। डॉ. राधाकृष्णन पांच भाई और एक बहन थे। भाईयों में इनका स्थान द्वितीय था।

गरीब ब्राह्मण-परिवार के होने के कारण तथा अपेक्षाकृत भाई-बहनों की बड़ी संख्या के फलस्वरूप् डॉ. राधाकृष्णन की आरम्भिक शिक्षा-दीक्षा तिरूतनी और देश के सर्वश्रेष्ठ तीर्थस्थल तिरूमाला अथवा तिरूपति में हुई। राधाकृष्णन आरम्भ से ही मेघावी थे। साथ ही परिश्रमी भी। तिरूतनी में अपने आरम्भिक जीवन के आठ वर्ष व्यतीत करने के पश्चात् ही वे विद्याध्ययन के लिए तिरूपति भेजे गए। उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर ही आर्थिक दृष्टि से असहाय पिता ने पारम्परिक धार्मिक शिक्षा देने के बदले उन्हें अंग्रेजी माध्यम से शिक्षित करने का निर्णय लिया।

राधाकृष्णन ने ‘लूथरन मिशन स्कूल’ तिरूपति में पांच वर्ष, वेल्लोर के एक प्रसिद्ध कॉलेज में पांच वर्ष तथा मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज में पांच वर्ष तक अध्ययन किया। बालक राधाकृष्णन के इस अध्ययन में केवल पिता का ही आर्थिक सहयोग नहीं था, राधाकृष्णन ने मात्र चौदह वर्ष की अवस्था अर्थात् 1902 में मद्रास विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में उच्च अंक प्राप्त कर मैट्रिकुलेशन की परीक्षा उर्त्तीण की थी।

स्कूली और महाविद्यालय की पुस्तकों के अतिरिक्त इन्होंने स्वाध्याय के द्वारा भी अपने ज्ञान में अभिवृद्धि की और उसी के बल पर राष्ट्र और विश्व के विशिष्टम विद्वानों में इनकी गिनती हुई। दर्शनशास्त्र में एम. ए. करने के फलस्वरूप इन्हें वेदों, उपनिषदों और गीता में पर्याप्त रूची थी, जिनका उन्होंने गहराई से अध्ययन किया। दूसरे धर्मों के प्रति भी इनकी रूचि थी। ईसाइयों का धर्मग्रन्थ बाईबल पूर्णतया कंठस्थ था।

डॉ. राधाकृष्णन की गांधीजी से पहली मुलकात 1938 में सेवाग्राम में हुई। वैसे वे इससे पहले ही गांधी जी के संपर्क में आ चुके थे। गांधीजी जब दक्षिण अफ्रीका से लौटे थे, तब मद्रास में श्री नटेसन के घर पर मुलाकात और दिलचस्प वार्तालाप भी हो चुका था। गांधी जी का उन दिनों मूंगफली पर जोर था और वह लोगों को दूध पीने से मना किया करते थे। वह कहा करते थे कि दूध गाय के मांस का ही अतिरक्ति उत्पादन है। यह बात युवा प्रोफेसर से भी हुई, राधाकृष्णन ने उत्तर दिया कि तब तो हमें मां का दूध भी नहीं पीना चाहिए। गांधी जी को पता था कि वह उन दिनों ‘लाजिक’ के प्रोफेसर थे। महात्मा गांधी के प्रति डॉ. राधाकृष्णन् की अगाध श्रद्धा थी। उन्होंने एक जगह उन्हें ‘मानव जाति का अमर स्वर’ बताया था और उन्हें मानवीय प्रयत्नों का सर्वश्रेष्ठ प्रतीक भी घोषित किया था।

डॉ. राधाकृष्णन को प्रायः सभी ने ‘शिक्षक’ कहा है। अतः उनका जन्म दिन 5 सितम्बर आज भी शिक्षक-दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है कि उन्होंने जीवन के चालीस वर्ष शिक्षा के क्षेत्र में बिताये, परन्तु वस्तुतः वह इतने प्रभावशाली व्यक्ति रहे कि उन्होंने शिक्षा, लेखन, व्यवस्था, राजनीति और शासन सभी क्षेत्रों में महान् छाप छोड़ी। यह ठीक है कि मूलरूप उनका शिक्षक का ही रहा हो, परन्तु लेखन और दर्शन शास्त्र के व्याख्याता के रूप को शिक्षक से पृथक नहीं किया जा सकता। वह शिक्षक से लेकर शिक्षण संस्थाओं के मूर्धन्य व्यवस्थापक-कुलपति तक रहे और सभी प्रकार के कार्यों को अपनी प्रतिभा से चमत्कृत करते रहे। एक प्रोफेसर के रूप में जहां उनका अपने विषय पर पूरा अधिकार था, वहां उनमें उसे प्रभावशाली भाषा में उपस्थित करने की भी महान दक्षता थी। उसके लिए उन्होंने कितना तप किया होगा, इसे कौन भुलाने को तैयार होगा। वह 12-12, 18-18 घंटे अध्ययन करते रहते थे। शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने जो कार्य किया वह भुलाया नहीं जा सकता।

ऑक्सफोर्ड विश्वविघालय में डॉ. साहब ने काफी समय तक अध्यापन कार्य किया था। इंग्लैंड के कई चर्चों में भी उन्होंने भाषण दिये थे। एक बार पोप ने डॉ. साहब को सम्मानित किया था। उनके भाषणों को सुनकर श्रोता मंत्रमुग्ध रह जाते थे। वस्तुतः उनके प्रवचनों की वास्तविक महत्ता उनके अन्तर में निवास करती थी, जिसकी व्याख्या नहीं की जा सकती। उनकी यही आध्यात्मिक शक्ति सबको प्रभावित करती थी।

डॉ. राधाकृष्णन बड़े हाजिर जवाब थे। विश्व में उन्हें हिन्दुत्व के परम विद्वान के रूप् में जाना जाता था। एक बार वे इंगलैंड गये, तब देश अंग्रेजों के आधीन था, बड़ी संख्या में लोग उनका भाषण सुनने आये थे। भोजन के दौरान एक अंग्रेज ने उनसे पूछा, ‘क्या हिन्दू नाम का कोई समाज है? कोई संस्कृति है? तुम कितने बिखरे हुए हो, तुम्हारे रंग एक जैसे नहीं है, कोई गोरा, कोई काला, कोई धोती पहनता है, कोई लुंगी, कोई कुर्ता तो कोई कमीज। देखो, हम अंग्रेज सब एक जैसे हैं, सब गोरे लाल-लाल।’ इस पर डॉ. राधाकृष्णन ने तपाक से जवाब दिया, ‘घोड़े सब अलग-अलग रंग-रूप के होते हैं, पर गधे सब एक जैसे होते हैं, अलग-अलग रंग और विविधता विकास के लक्षण हैं।’

सन् 1949 में डॉ. साहब को राजदूत बनाकर मास्को भेजा गया। इससे पहले भारत और महात्मा गांधी के सम्बन्ध में रूस की राय अच्छी नहीं थी। परन्तु डॉ. साहब ने वहां जाते ही अपनी प्रतिभा का सिक्का जमा दिया। एक घटना अत्यनत महत्वपूर्ण रही, जब डॉ. साहब प्रथम बार रूस के लौह पुरूष जैकब स्टालिन से मुलाकात करने पहुंचे, बातचीत के दौरान डॉ. साहब ने कहा, ‘हमारे देश में एक महान सम्राट हुआ है, उसने भीषण युद्ध और विजय के पश्चात अपनी तलवार तोड़ दी थी और अहिंसा का दामन थाम लिया था। आपने शक्ति अर्जित करने के लिए हिंसा का तरीका अपनाया है। किसी को क्या मालुम, हमारे उस महान सम्राट की वह घटना आपके यहां दोहरा दी जाये।’ स्टालिन ने मुस्कुराते हुए कहा ‘हां वास्तव में कभी-कभी ऐसे चमत्कार हो जाते हैं। मैं भी पांच वर्षों तक ब्रह्मज्ञान के शिक्षालय में रह चुका हूं।’

सन् 1952 में डॉ. राधाकृष्णन को भारत का उपराष्ट्रपति चुना गया। साथ ही दिल्ली विश्वविद्यालय का कुलपति, साहित्य अकादमी का उपाध्यक्ष भी बनाया गया। ये दायित्व भी उन्होंने बहुत कुशलता से निभाये।

डॉ. राधाकृष्णन ने 87 वर्ष की आयु प्राप्त की। वे सादा खाना खाने वाले अल्पभाषी व्यक्ति थे। जीवन के अंतिम वर्षों में सामान्य लोग भी इनसे सहजता से मिल लेते थे। एक ऐेसे ही भेंटकर्ता ने उनसे प्रश्न किया - ‘अपने दीर्घ जीवन का राज बताने की कृपा करेंगे?’ डॉ. राधाकृष्णन ने हल्की मुस्कराहट के साथ कहा- ‘कम खाओ।’

दुर्भाग्यवश डॉ. राधाकृष्णन के अंन्तिम कुछेक वर्ष बुरे बीते। कभी का अप्रतिम स्मरण-शक्ति वाला व्यक्ति जो अंग्रेजी और संस्कृत के उद्धरण देते नहीं थकता था, अपनी स्मरण-शक्ति पूर्णतया खो चुका था। उनकी यह दशा देखकर बहुत लोग व्यथित हुए, किन्तु नियति के सामने किसकी चलती है? अन्ततः भारत का यह महान सपूत 1975 के 17 अप्रैल की प्रातः बेला में अपनी प्राणवायु विसर्जित कर बैठा। सम्पूर्ण देश की जनता और अखिल विश्व के विद्वान शोक-सन्तप्त हो उठे।

भारत के इतिहास में कोई भी राष्ट्रपति अपनी राजनैतिक कुशलता, चातुर्य एवं अपनी बुद्धिमता के लिए याद किया जाएगा- किन्तु एक विश्वप्रसिद्ध दार्शनिक एवं बहुआयामी विद्वता के लिए किसी को स्मरण किया जाएगा तो वह होंगे भारत के द्वितीय राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन।

Mukesh Pandit
MotivationalStoriesinHindi.in
(लेखक के विचार उनके निजी विचार हैं।)

September 3, 2015

Essay on Positive Thinking in Hindi

मैं इस तरह मरना नहीं चाहती

कुछ दिन पहले एक नन्हीं सी चिड़िया बाहर बनी सीढ़ियों के रास्ते में फंस गयी थी। छत का दरवाजा और रोशनदान सब खोल देने के बावजूद भी उसे काफी देर तक रास्ता नज़र नहीं आया और बड़ी देर तक वह चीं-चीं करती रही। उसके ये चीं-चीं के स्वर दिल को भेदने वाले थे। जब तक आवाज़ आती रही मन बेचैन रहा। किसी काम में मन नहीं लगा। फिर जब कुछ देर बाद आवाज़ आना बंद हुआ और जाकर देख लिया कि चिड़िया उड़ चुकी है तब जाकर तसल्ली हुई।

नीचे आकर कुछ पढ़ने बैठी तो अचानक ख़याल आया कि यह आवाज़ कितनी जानी पहचानी है। नन्हीं चिड़िया की यह आवाज़ बिल्कुल उस नन्हें बच्चे जैसी ही तो है जो माँ से दूर कहीं अपह्रत करके ले जाया गया हो, या बिल्कुल उस लड़की के जैसी जिसे रास्ते पर कुछ आवारा लड़कों ने घेर लिया हो, या बिल्कुल उस मुर्गे या बकरे जैसी जिसकी गर्दन पर बस कुछ ही देर में छुरी चलायी जाने वाली हो, या बिल्कुल उस वृद्धा जैसी जिसे घर के एक कोने में पटककर उसके मरने का इंतजार किया जा रहा हो। भय और मदद की पुकार की ये आवाजें हर रोज चारों ओर से तो उठती हैं, फिर हमें आजकल कुछ सुनाई क्यों नहीं देता? क्यों धीरे-धीरे हमारी संवेदनशीलता खत्म सी होती जा रही है। जब कारणों को टटोलने बैठी तो देखा एक बहुत बड़ा कारण खुद इन नकारात्मक ख़बरों का अतिप्रसार ही तो है जो धीरे-धीरे हमें संवेदना शून्य बना रहा है।

कुछ दिन पहले ही एक बड़ी अच्छी बात भी मालूम चली। अफ्रीका के समुदाय में जब भी कोई व्यक्ति कोई गलती या अपराध करता है तो उसे गाँव के बीचो-बीच ले जाया जाता है। गाँव के लोग उसे चारों ओर से घेर लेते हैं और उसे दो दिन तक उसके सभी अच्छे कामों के बारे में याद दिलाया जाता है, जो उसने अब तक किये हैं। बुराई के आवरण में उसके भीतर उपस्थित अच्छा इंसान जो कहीं खो गया है, यह उसे फिर से जगाने की कोशिश है।

पर हम अगर गौर करें तो पायेंगे कि आज न्यूज पेपर हो, चाहे न्यूज चैनल, सोशल साइट्स हो या कोई भी अन्य माध्यम...सब जगह नकारात्मकता बहुत ज्यादा परोसी जा रही है। सिर्फ समस्या, सिर्फ चिंताएं, सिर्फ शिकायतें ही शिकायतें...समाधान की बातें बहुत कम नज़र आती है। ऐसा लगता है जैसे दुनिया में अच्छाई और भलाई नाम की कोई चीज बची ही नहीं है। खून से लथपथ, बलात्कार, चोरी, रिश्वत, लूट, सांप्रदायिक दंगों और अश्लीलता से सनी ख़बरें दिन-रात हमारे चारों ओर हाहाकार मचाये रहती है। न इनके समाधानों पर ज्यादा चर्चा होती है और न ही उन अच्छी ख़बरों का ज्यादा प्रसार होता है, जहाँ किसी ने किसी के जीवन को बचाया हो या किसी ने अजनबी रहते हुए भी बुरे वक्त में किसी की मदद की हो, या जिसका पूरा जीवन ही मानवता को समर्पित रहा हो।

जबकि इसी दुनिया में ग्यारह साल की एक ऐसी बहन भी है जो अपने छह साल के भाई के बीमार होने पर उसे कंधे पर उठा अकेले आठ किलोमीटर दूर अस्पताल तक पहुंचाकर उसकी जान बचाती है। इसी दुनिया में रिटायर हो चुके एक ऐसे हेडमास्टर भी हैं जो रिटायर होने के बाद भी स्कूल जाकर बच्चों को मुफ्त में पढ़ाते हैं और पढ़ाने से पहले स्कूल परिसर का झाड़ू भी लगाते हैं। इसी दुनिया में एक ऐसे शिक्षक भी हैं जो सुबह उठकर अख़बार बांटने का काम इसलिए करते हैं ताकि स्कूल के बच्चों को गुणवत्ता युक्त मिड डे मील उपलब्ध करवा सकें और इसी दुनिया में ऐसे माता-पिता भी हैं जो अपनी छह साल की बेटी की मौत हो जाने पर भी अपना धैर्य खोये बिना उसकी आँखों को दान कर किसी की ज़िन्दगी रोशन करने का ज़ज्बा रखते हैं।

बहुत जरुरी है कि हम ज्यादा से ज्यादा अच्छी बातों का, अच्छे लोगों का, अच्छी घटनाओं का प्रसार करें। क्योंकि जो हम पढ़ते, सुनते और देखते हैं उसका हमारे व्यक्तित्व पर बहुत गहरा असर पड़ता है। जिस बात की जितनी ज्यादा चर्चा होती है उसकी उतनी ही गहरी जड़े पैठने लगती है। लगातार बुरी ख़बरों को सुनना हमें संवेदना शून्य, क्रूर और कठोर बनाता है। क्योंकि बुराई का प्रसार ज्यादा होता है तो व्यक्ति अपनी तुलना अक्सर निम्नतर से करने लगता है। इतने क्रूरता पूर्ण अपराधों की ख़बरें उसे हमेशा इस भ्रम में बनाये रखती है कि वह दूसरों से कम बुरा है, उसकी बुराईयाँ, उसकी गलतियाँ जायज हैं। और ऐसा सोचते-सोचते वह अधिक से अधिक बुराईयाँ संचित करने लगता है।

जब हर तरफ बुराई की ही चर्चा हो; हिंसा, बलात्कार, चोरी की ही बातें हों तो अपराध करते समय उसका डर और संवेदना बिल्कुल खत्म हो जायेगी क्योंकि उसे लगेगा कि सभी यही तो कर रहे हैं। दूसरी ओर अगर अच्छी बातों और अच्छाईयों की चर्चा ज्यादा हो तो व्यक्ति कोई भी हीन कार्य करते समय अपनी तुलना अन्य लोगों की अच्छाई से करेगा और इतना आसान नहीं होगा उसके लिए बुरा काम करना। क्योंकि अच्छाई की चर्चा, भलाई की चर्चा...अच्छाई की जड़ें मजबूत करती है।

इसलिए क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम नकारात्मक ख़बरों के प्रसार को थोड़ा कम करें। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम उनके समाधानों की चर्चा ज्यादा करें। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम अच्छी बातों की चर्चा ज्यादा करें। यह जरुरी है। हमारी संवेदना को बचाने के लिए बेहद जरुरी है। क्योंकि कोई अंतर नहीं एक इंसान के मर जाने में और उसकी संवेदना के मर जाने में। और मैं इस तरह मरना नहीं चाहती, बिल्कुल भी नहीं।

Monika Jain ‘पंछी’
(03/09/2015)