October 29, 2015

Sad Love Story in Hindi

Sad Love Story in Hindi

मैं सीख रही हूँ फिर से प्यार बाँटना
(अहा! ज़िन्दगी में प्रकाशित)

उदासी के इस लम्बे दौर में मैंने बना लिए हैं मुस्कुराहटों के कुछ ठिकाने। यूँ तो न जाने कितनी कहानियाँ है इन उदासियों का हिस्सा...जिसमें एक कहानी तुम्हारी भी तो है, पर इन कहानियों से चुराकर थोड़े से आंसू मैं बना लेती हूँ हर रोज कुछ मोती और टांग आती हूँ इन्हें उन ठिकानों पर जहाँ इसी तरह जमा की है हर रोज मैंने कुछ मुस्कुराहटें। इस तरह उदासी का हिस्सा होकर भी तुम चमक आते हो कभी-कभी मोतियों सी मुस्कान बनकर...पर फिर भी दिल कहता है कि काश! तुमने मेरी मुस्कुराहटों को चुना होता...उन मुस्कुराहटों को जिनके लिए न चुराने पड़ते मुझे अपने ही आंसू।

अपने जीवन के सबसे खुबसूरत और मीठे शब्द मैंने तुम्हारे ही तो नाम किये थे और कभी न सोचा था कि तुम्हारे मन में मेरे लिए इतनी कड़वाहट, इतनी घृणा और इतनी नफरत भर आएगी। अपना अटूट विश्वास मैंने तुम्हें ही तो सौंपा था पर नहीं जानती थी कि तुम्हारे लिए उसका मूल्य दो कोड़ी भी नहीं रहेगा। तुम्हें पाने का कभी इरादा न था लेकिन तुम्हें खो देने के डर में जो गलतियाँ हुई और जो नहीं हुई उनका पूर्ण स्वीकार भी तुम्हारी क्षमा नहीं पा सका। जाते-जाते जो शब्द बाण तुमने छोड़े उनसे बहुत कुछ मर चुका था मेरे भीतर। पर मैं नहीं जानती वह कौनसी भावना होती है जो तुमसे लगातार मिले अपमान, तिरस्कार और व्यंग्य बाणों के बावजूद भी खत्म होने का नाम नहीं लेती। शायद तुमसे कुछ पलों के लिए मिला स्नेह उन सारी उपेक्षाओं पर भारी है जो अब तक जारी है। शायद कुछ लम्हों की मित्रता किसी कसक या द्वेष को मन में ठहरने ही नहीं देती। शायद मेरे प्रति तुम्हारे एक छोटे से अन्तराल के आकर्षण की गुणवत्ता हर उस विकर्षण को हरा देती है जो तुम्हारे अन्याय और पक्षपात को देखकर उपजता है। यूँ तो न जाने कितने लोगों से तारीफें बटोरी है पर तुम्हारे स्नेह से सिक्त प्रेरणात्मक शब्दों की गूँज आज भी तुम्हारी घृणा से उपजे शब्दों पर हावी है। और तुम्हारी नाराजगी देखकर लगता है जैसे सृष्टि का कण-कण मुझसे रूठा है। कुछ ही दिनों की पहचान...पर जैसे सालों का रिश्ता कोई टूटा है।

कितना कुछ था जो तुमसे कहना था...कितने सारे डिस्कशंस जो अधूरे छूट गए...कितना कुछ नया जो उछल कूद कर तुम्हें बताना था। तुम्हारी अनवरत चलती रिसर्च्स, जिनके बारे में कितना कुछ जानना था...सब अधुरा रह गया। अधूरे रह गए वे सुर भी जो सिर्फ तुम्हारी वजह से फिर जागे थे। अधूरी रह गयी न जाने कितनी कवितायेँ जो सिर्फ तुम पर रची जानी थी। अधूरी रह गयी एक कहानी भी, जिसमें बस मुस्कुराहटों को होना था। अब बचा है तो कोरा सन्नाटा...जिसमें सिसकियाँ लेता है वह विश्वास जो तुम मुझ पर ना कर सके, वह भरोसा जो मैंने कभी तोड़ना सीखा ही नहीं और वह दर्द जो सीख रहा है मुस्कुराहटों की आड़ में छिप जाना।

सबका भरोसा पाने वाली मैं...नहीं पा सकी एक तुम्हारा ही विश्वास। और देखो न...तुम्हारा भरोसा पाने की जद्दोजहद में जाने कहाँ छूट गया है मेरा ही विश्वास। क्यों हमारे बीच किसी के भ्रम के बीज बोने की कोशिश को तुमने सफल होने दिया? क्यों तुमने किसी और की आँखों से मुझे पढ़ा? बस एक बार...सिर्फ एक बार...मेरी आँखों को पढ़ा होता तो तुम्हें नजर आती वह भावना जो सारी दुनिया की नजरों से तुम्हारी हिफाजत कर सकती थी। तुम्हे अहसास भी नहीं कि सारी दुनिया की ईर्ष्या से बचने की कवायद में तुम उससे ही ईर्ष्या कर बैठे जिसके होठों पर सदा तुम्हारे लिए दुवाएं बसती हैं। निराशा और झुंझलाहट में अपने जीवन की सारी समस्यायों का ठीकरा तुमने उसके सर फोड़ दिया जो तुम्हारे लिए सकारात्मक ऊर्जा बनना चाहती थी। छोटी-छोटी सी गलतियों को तुमने इतना गंभीर अपराध सिद्ध कर दिया कि अब जरुरत से ज्यादा सजा पाने के बावजूद भी मैं अपराध बोध से मुक्त नहीं हो पाती।

जानती हूँ प्रेम के उच्चतम तल को मैं नहीं छू पायी इसलिए ये सारी शिकायतें हैं, ये सारे प्रश्न है। पर हर रोज तुम याद आते हो और मैं खुद को भूल जाती हूँ...हर रोज तुम्हारी बातें दोहराती हैं और मैं ख़ामोश हो जाती हूँ...तुम सिखा रहे हो अपेक्षाओं के पर काटना...और मैं सीख रही हूँ फिर से प्यार बाँटना। लम्हा-लम्हा दर्ज हो रहा है तुम्हारा मौन मन के किसी कोने में...और एक दिन शायद यही सिखाएगा मुझे सही मायनों में प्रेम! वह प्रेम जो सारी अपेक्षाओं, सारी शिकायतों और सारे दर्द से परे हो। वह प्रेम जो सारे बंधनों से परे हो। वह प्रेम जो सिर्फ और सिर्फ मुक्त करता है। वह प्रेम जो समय की सीमाओं से परे हो।

Monika Jain ‘पंछी’
(29/10/2015)

October 1, 2015

Essay on Dussehra Festival in Hindi

विजयादशमी के मायने

उत्सव और त्यौहार हर्ष, उल्लास और मनोरंजन के प्रतीक हैं। दौड़ती-भागती ज़िन्दगी की बोरियत में कुछ ठहरे हुए क्षण! ये बात अलग है कि ये दौड़-भाग की ज़िन्दगी भी इंसान ने खुद चुनी और ये बोरियत भी। मैं उत्सव विरोधी नहीं हूँ, लेकिन एक बड़ी मजेदार चीज है - इंसान ने सारी दुनिया के साधन अपने मनोरंजन के लिए जुटा लिए, इसके बावजूद भी उसकी बोरियत दूर नहीं हो पायी। वह घोड़ों को दौड़ाता है, वह बैलों को लड़ाता है, वह खुद भी अखाड़े में उतर जाता है; दुनिया भर के गीत-संगीत, नृत्य, खेल, एडवेंचर, त्यौहार और भी न जाने क्या-क्या इंसान ने अपने लिए उपलब्ध करवा लिए...लेकिन उसकी बोरियत आज भी वैसी की वैसी ही है और आनंद की खोज अब तक जारी है। जबकि घोड़ों, गधों, बैलों, ऊंटों किसी को भी इंसान की इस दौड़ में कोई रूचि नहीं। बल्कि जिन लोगों को मनोरंजन के साधनों की दरकार नहीं, जो सबकी तरह बोरियत महसूस नहीं करते, जिनके लिए प्रकृति और अंतर्मुखता ही सारे आनंद और उत्सवों की शरणस्थली है, वे लोग भी उसकी नजर में बोरिंग इंसान करार दे दिए जाते हैं। अजब है पर सच है।

खैर! अब आते हैं हम विजयादशमी पर। उत्सव, त्योहारों और आनंद की इसी कड़ी में हर वर्ष रावण का दहन एक परंपरा बन चुका है और यह त्यौहार मनाया जाता है बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक के रूप में। कई अन्य मान्यताओं के साथ जो एक प्रमुख मान्यता है वह है कि इस दिन श्री राम ने रावण का वध किया था और लंका पर विजय प्राप्त की थी। बुराई की हार और अच्छाई की विजय निश्चित रूप से अच्छा संकेत है। इसे सेलिब्रेट करना भी अच्छी बात है। लेकिन क्या सिर्फ जश्न मनाने तक ही यह सारी कवायद होनी चाहिए? जिस रावण को हम सालों से जलाते आ रहे हैं वह रावण तो कभी का मृत्यु का वरण कर चुका, तो फिर हर साल रावण का कद बढ़ा-बढ़ाकर हम कौनसी बुराईयों को जलाते हैं? हम तमाशाबीन अपनी बुराईयों, अपने गुनाहों, अपने अपराधों से अनजान किसकी मृत्यु पर इतना हर्ष मनाते हैं?

विजयादशमी संकेत है अपने मन के भीतर झाँकने का और वहां सदियों से जो गन्दगी, बुराई और अज्ञान रुपी धूल की पर्तें जमी हैं उन्हें झाड़ने का। यह समय है बहिर्मुखी से अंतर्मुखी बनने का, अन्याय से न्याय और असत्य से सत्य की ओर लौटने का। लेकिन हमारा सारा उत्सव, हमारा सम्पूर्ण जीवन तो कुछ और ही कहानी बयां करता है। हम खुद से इतना भयभीत हो चुके हैं, हम अपने मन से इतना हार चुके हैं, हम अपनी कमजोरियों के इस कदर गुलाम बन चुके हैं कि हमारी सारी यात्रा बाहर और दूसरों की तरफ ही होती है। तभी तो कागज का जलता हुआ रावण हमें हर्ष और उल्लास दे जाता है लेकिन अपने भीतर के रावण को हम दिन प्रतिदिन सशक्त होने देते हैं। उसके सामने हमारा कोई वश नहीं चलता।

मेरे कस्बे के दशहरे मेले में जिस समय रावण का पुतला धूं-धूं करके जल रहा होता है ठीक उसी समय एक कविता हमेशा बोली जाती है, जिसमें एक पंक्ति आती है - ‘सचमुच के रावण जिन्दा है, कागज़ के रावण जलते हैं।’ और इन्हीं मेलों में लड़कियों को कितनी अश्लील हरकतों का सामना करना पड़ता है, यह भी किसी से छिपा हुआ नहीं। लेकिन सब कुछ पता होते हुए भी कितने विरोधाभासों में जीते हैं हम! हर पल हम उन्हीं पात्रों की आलोचना कर रहे होते हैं जिन्हें हम किसी ना किसी रूप या मात्रा में खुद जी रहे होते हैं।

उत्सव हमारे जीवन का अपरिहार्य हिस्सा बन चुके हैं, लेकिन जीवन उत्सव तभी बन सकता है जब इन उत्सवों से मिले सार्थक सन्देश को भी हम अपने जीवन में उतार सकें। विशेष रूप से जब कोई किसी उत्सव को धर्म से जोड़ता हैं, अपने किसी आराध्य से जोड़ता हैं तब तो उसकी जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। दशहरा आने वाला है। आईये हम सब मनन करें कि इस बार रावण दहन की अग्नि को हम अपनी कौनसी बुराई अर्पित करके आने वाले हैं। बाकी आप सभी को विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

Monika Jain ‘पंछी’
(01/10/2015)