November 26, 2015

Science and Religion Quotes in Hindi

Science and Religion Quotes

  • 14/09/2017 - सबसे सुन्दर संयोग है विज्ञान और प्रेम (करुणा) का संयोग।
  • 31/08/2017 - विज्ञान और अध्यात्म दोनों ही यह कहते हैं कि इस ब्रह्माण्ड में सब कुछ परस्पर सहसम्बन्धित या सापेक्ष है। किसी भी चीज का कोई स्वतंत्र अस्तित्व संभव नहीं। इसका तात्पर्य यह कि समूचे अस्तित्व का सकल जोड़ हमेशा शून्य ही बैठता है। ऐसे में खुद को सबसे श्रेष्ठ समझने वाला इंसान नामक प्राणी भी सकल रूप से कुछ घटा या बढ़ा नहीं सकता। हम लोग अगर वाकई में कुछ कर सकते हैं तो वह सिर्फ इतना कि विषमताओं को कम कर सकते हैं, क्योंकि यह संतुलन सबके लिए सुखद होगा, अन्यथा प्रकृति खुद को संतुलित करना जानती ही है। विषमताओं को दूर करने के कई तरीके हैं और जब हम विषमताओं को कम करने की बात करते हैं तो उसके दायरे में इंसान, जानवर, नदी, पेड़-पौधे, पर्वत-पठार...सब कुछ आ जाता है। क्योंकि सब जुड़े हुए हैं तो किसी एक को भी अनावश्यक क्षति या अनावश्यक लाभ सबको प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष तौर पर प्रभावित करती है। इस बार वैसे में जानवरों की बात नहीं करुँगी, बस इतना जानना था कि क्या कोई ऐसा इंसान है जिसने इस बार खुद को बलि-प्रथा से मुक्त कर लिया है? अगर कोई है तो उसे बधाई और शुभकामनाएं। :)
  • 29/03/2016 - विज्ञान खोज का मार्ग है...हम उसे दोहन का मार्ग बना रहे हैं। धर्म भी पथ है गति का...पर हम उसे दुर्गति का पथ बना रहे हैं। धर्म और विज्ञान पूरक है उत्थान के...रुको!...कहीं हम उन्हें पतन का पूरक न बना दें। विज्ञान प्रकृति के रहस्यों को जानने का मार्ग है। हमने उसे सुविधाभोगी तकनीक के लिए प्रकृति के दोहन तक सीमित कर दिया है। धर्म आत्मा/परमात्मा के रहस्य तक पहुँचने का मार्ग है...हमनें उसे पाखण्ड, दिखावे, कट्टरता और राजनीति तक सीमित कर दिया है। धर्म और विज्ञान सहायक है एक दूसरे के...रहस्यों को जानने के लिए। खोज का एक रास्ता बाहर को जाता है और एक भीतर को। लेकिन आज दोनों अपना मूल खो रहे हैं। 
  • 26/11/2015 - सब कुछ चमत्कार है और कुछ भी चमत्कार नहीं। 
  • 29/09/2015 : चीजों को विज्ञान की भाषा में ही समझना और समझाना बेहद जरुरी है और युग के अनुरूप अनावश्यक बातों से छुटकारा भी जरुरी है। अनावश्यक अलंकरण और चमत्कृत करना भ्रम पैदा करता है और यहीं से जन्म लेते हैं अन्धविश्वास और अन्धानुकरण। धर्म शब्द को भी बड़ा विचित्र रूप से देखा जाता है। और जितना इसे आस्तिक चमत्कृत रूप से देखते हैं, उतना ही नास्तिक घृणित रूप से। जबकि शब्द बेचारा दूसरे शब्दों की तरह से ही सीधा सा है। बस स्वार्थ के लिए इसका महिमामंडन कर दिया गया है। फ़िलहाल मुझे तो यही समझ में आया है कि धर्म का मार्ग अपने मूल स्वभाव को पाने का मार्ग है। यह चेतना के विकास का मार्ग है और यह विकास सिर्फ मनुष्य के लिए नहीं अपितु हर जीव के लिए है। ईश्वर का ख़याल करते ही ज्यादातर लोगों के दिमाग में त्रिशूल, तलवार, गोटा और भी ना जाने कैसे-कैसे औजार लिए हुई, ऊपर से नीचे तक सजी धजी छवियाँ उभरने लगती है। जबकि चेतना, आत्मा, परमात्मा ये सभी शब्द उस शून्यता की ओर इंगित करते हैं जो सभी पदार्थों या तत्वों के अन्योन्याश्रित होने की वजह से है और शायद इसलिए ही कहा जाता है कि परमात्मा कण-कण में व्याप्त है। अगर सचमुच वैज्ञानिक ह्रदय बनना है तो ये आस्तिक और नास्तिक की श्रेणियों से थोड़ा बाहर निकलकर खुला और विस्तृत बनने की जरुरत है। न तो हमारे पूर्वज इतने मुर्ख थे और न ही हम इतने बुद्धिमान हैं। बल्कि मुर्खता का प्रतिशत कई मामलों में अब ज्यादा नजर आता है क्योंकि अगर हर कोई इतना जड़ हो जाता तो पशु से मनुष्य तक की ये यात्रा भी संभव न होती। और जब पशु से मनुष्य तक की यात्रा संभव है तो मनुष्य से परमात्मा तक की यात्रा की संभावनाओं को भी खारिज नहीं किया जा सकता। 
  • 27/08/2015 - जितने भी 'घोर' लोग होते हैं, फिर चाहे वे 'घोर आस्तिक' हो, चाहे 'घोर नास्तिक', 'घोर समर्थक' हो चाहे 'घोर विरोधी', वे सभी पूर्वाग्रहों से ग्रसित महा अन्धविश्वासी होते हैं। क्योंकि वास्तव में जो वैज्ञानिक मन-मस्तिष्क होता है, उसे पता होता है कि अभी बहुत कुछ जानना शेष है, अभी बहुत कुछ सीखा जाना बाकी है, बहुत से विचार आने वाले समय में बदल सकते हैं, क्योंकि अभी खोज जारी है। 
  • 18/08/2015 - चमत्कार जैसा कुछ नहीं होता। हर चीज का कोई कारण अवश्य होता है। हाँ, बस वह कारण ज्ञात या अज्ञात हो सकता है।
  • 06/07/2015 - बिना जाने विश्वास किया जाए या अविश्वास...दोनों अन्धविश्वास ही है। अपवादों को छोड़ दें तो यहाँ नास्तिकता और आस्तिकता दोनों ही अन्धविश्वास की तरह दिखाई पड़ रहे हैं। एक प्रवाह जिसमें बस बहे जा रहे हैं लोग। पता नहीं जो चीज जानी ही नहीं गयी, अनुभव ही नहीं की गयी, उसके बारे में इतनी कट्टरता के साथ कैसे कह देते हैं लोग। अपने हर शब्द, कार्य, विचार, अपने जीवन और आसपास होने वाली हर घटना, हर वस्तु, हर प्राणी के प्रति सजगता और संवेदनशीलता का समावेश जब जीवन में होने लगेगा तब धीरे-धीरे अनुभव होने लगेगा कि बहुत कुछ रहस्यमयी है, पर कहीं गहरे में वह विज्ञान की कसौटी पर खरा भी उतरता है।
  • 'पूर्वाग्रह' विज्ञान (प्रयोग आधारित) और अंतर्ज्ञान (प्रयोग रहित) दोनों के ही मार्ग की सबसे बड़ी बाधा है। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं, सहायक है। लेकिन फिर भी अंतर्ज्ञान विज्ञान से कई कदम आगे हैं। विज्ञान कभी वहां तक पहुँच पायेगा जहाँ तक अंतर्ज्ञान पहुँचता है, कहना मुश्किल है। इसका मुख्य कारण यह है कि सब कुछ सिद्ध नहीं किया जा सकता। इसके अलावा विज्ञान मुख्य रूप से सुविधाएँ जुटाने और तकनीकी विकास का ज्ञान बनता जा रहा है। विज्ञान की भूमिका को नकारा बिल्कुल नहीं जा सकता। लेकिन उसका जरुरी और गैर जरुरी के अंतर को समझना आवश्यक है। 
  • धर्म/अध्यात्म का विज्ञान से कोई बैर नहीं है...रत्ती भर भी बैर नहीं है। धर्म तो गति का कारक है। बैर तो मन की उपज है जो अधर्म को धर्म के रूप में स्थापित करने लगता है और विज्ञान को भी गर्त की दिशा में ले जाने लगता है। 
  • लम्बे उपवास का सबसे सही समय वर्षा ऋतु मानी जाती है। और खाने का सही समय सूर्योदय से सूर्यास्त के बीच होता है। धर्म और विज्ञान अलग-अलग नहीं होते। अलग हैं तो बदल डालें। और अलग नहीं तो थोड़ा प्रकाश डालें। 

Monika Jain ‘पंछी’

November 18, 2015

Feelings and Emotions Quotes in Hindi

Feelings and Emotions Quotes

  • 25/10/2017 - नज़र लगने की बात सोचकर लगभग हर एक माँ बाकी उपायों के फेल होने पर नज़र उतारती है। मेरी माँ ने भी बहुत कम ही सही लेकिन ऐसा किया है। अक्सर माँ का दिल होता ही ऐसा है, वह ज्यादा तर्क में नहीं पड़ता। वैसे मैंने नज़र उतारने के टोटकों का कोई असर कभी महसूस नहीं किया। बाकियों का सच मुझे नहीं पता। पर बात कुदृष्टि की करूँ तो यह होती तो है ही सब प्राणियों के पास और हर भाव और विचार का उसकी शक्ति के अनुरूप न्यूनाधिक प्रभाव पड़ता है, ऐसा मैं समझती हूँ। अंधविश्वास के तौर पर नहीं, मनोविज्ञान के तौर पर, कार्य-कारण के तौर पर, ऊर्जा के सिद्धांत के तौर पर। लेकिन समाधान के लिए हम इस कुदृष्टि पर कार्य क्यों नहीं करते? मैंने सामान्यत: ऐसी चर्चा होते नहीं देखी जहाँ लोग अपनी-अपनी दृष्टि और भावों को सुधारने की बात कर रहे हो बजाय कि दूसरों पर दोष लगाने के। 
  • 23/03/2017 - कितना अच्छा होता गर धारणाएं बनाने की बजाय सीधे बात कर ली जाती। सहजता की कितनी कमी है हमारे समाज में। वैसे अगर सहजता हो तब तो बिना बात किये भी अक्सर धारणा बनती ही नहीं। शब्दों या कविताओं के कुछ टुकड़े पूरी ज़िन्दगी नहीं होते। वे तो खुद की छोड़ो किसी और की क्षणिक भावनाएं भी हो सकती है, क्योंकि लेखक महसूस लेता है कई ज़िंदगियों को खुद में। 
  • 22/01/2016 - दिल (रक्त परिसंचरण वाला) कभी कुछ नहीं कहता...जो भी कहता है दिमाग (मन) ही कहता है। जब तक बोध न हो तब तक तो मन में विरोधाभासी विचार ही उठते हैं। जहाँ भी चयन का सवाल है वहां हमें बस यह देखना है कि जिस बात को हम सुनने जा रहे हैं उसका व्यापक हित कितना है...और सही निर्णय भावनाओं में बहकर तो कभी नहीं हो सकते। यह तो सिर्फ सजग रहकर ही हो सकते हैं।
  • 18/11/2015 - ख़ुशी और दुःख का अहसास एक साथ कब होता है? अपनी कविताओं को व्हाट्स एप, फेसबुक और यू ट्यूब पर बेनाम भटकते हुए देखकर। कुछ तो फीमेल वर्जन से मेल वर्जन में बदल जाती है और कुछ के आगे किसी और का नाम जुड़ जाता है।
  • 01/09/2015 - शुद्धता और अशुद्धता का मुख्य सम्बन्ध भावों से होता है, और जहाँ भाव शुद्धतम होते हैं वहां अशुद्धता नहीं फटकती। 
  • 01/09/2014 - कभी-कभी आप कितनी भी कोशिश करो, वह नहीं कह पाते, जो आप कहना चाहते हैं। सच! कुछ अहसासों को शब्द नहीं दिए जा सकते। 
  • कितने ही शब्द ज़ुबा तक आकर रुक जाते हैं। कितने ही सन्देश बैकस्पेस की से बार-बार मिटा दिए जाते हैं। कितनी ही बार अंगुलियाँ किसी नंबर को डायल करने से पहले ही काट देती है। कुछ जज़्बात धीरे-धीरे दिल में ही कैद रहना सीख लेते हैं। क्योंकि वे सब कुछ सह सकते हैं, पर उन्हें झुठलाया जाना नहीं। 
  • कोई शब्दों और विचारों को चुरा सकता है, उनकी अनुभूति और अहसास को नहीं। 
  • जुड़ाव के घटने और प्रेम के बढ़ने के साथ-साथ ही हमारी भावनाएं आहत होने की दर कम होती चली जाती है। 

Monika Jain ‘पंछी’

November 17, 2015

My Childhood Memories Story in Hindi

काश! वह प्रेम पत्र रहा होता

कागज पर लिखे प्रेम पत्र का अपना एक अलग ही आकर्षण है। कितना रोमांचक समय होगा वह जब एक दूसरे को प्यार करने वाले डर-डर के छुप-छुप के एक दूसरे को प्रेम पत्र लिखा करते होंगे। फूल, गिफ्ट्स, चॉकलेट्स, मैसेजेज, ईमेल्स, फोन, व्हाट्स एप और डेटिंग के इस दौर में वह खतों वाला प्यार जाने किसे नसीब होता होगा।

हमेशा स्कूल/डिस्ट्रिक्ट टॉप करने के लिए किताबों में खोयी रहने वाली, अव्वल दर्जे की अंतर्मुखी और सिंसियर यह लड़की, जिसे हमेशा बस एक-दो का ही साथ चाहिए होता था, जिसे ग्रुप्स में रहना ज्यादा पसंद नहीं था, जिसे और तरीकों से प्रेम प्रस्ताव तो मिलते रहे लेकिन क्या किसी ने कभी मुझे भी वो कागज़ वाला प्रेम पत्र लिखा होगा यही याद करते-करते मैं बचपन के समय में चली गयी। तब पाँचवी कक्षा में पढ़ती थी। इनोसेंट का टैग तो आज तक नहीं उतर पाया है तो उस वक्त क्या रही होऊँगी, पता नहीं। पर हाँ, सही शब्द- गलत शब्द इतना तो पहचानती थी। भावनाओं को तो नवजात शिशु भी पहचान लेता है तो फिर मैं तो 10-11 साल की लड़की थी। कहते हैं पढ़ाई में होशियार और गंभीर लड़कियों से लड़के थोड़ा डरते हैं और खुद यह लड़की भी अपने में ही खोयी रहने वाली किसी की ओर नजर उठाकर भी नहीं देखने वाली, जिसे यह भी न मालूम होता था कि कक्षा में पढ़ता कौन-कौन है...पर हाँ, तब क्लास के कुछ लड़के गृहकार्य के लिए कॉपी मांगने जरुर अक्सर घर आते थे। पाँचवी कक्षा तक आते-आते लड़के और लड़कियों के बैठने की जगह अलग-अलग हो गयी थी। इसलिए शायद मन ने भी लड़के और लड़की के भेद को कुछ-कुछ स्वीकार कर लिया होगा।

एक दिन प्रार्थना के बाद कक्षा में आकर बैठी थी। कॉपी-किताब निकालने के लिए बैग खोला तो देखा उसमें कागज का बॉल बनाकर डाला हुआ था। मैंने और मेरे पास बैठी मेरी सहेली दोनों ने उसे देखा। फिर मैंने उसे खोला तो उसमें एक लड़के ने अपने नाम के साथ कुछ मैसेज लिखा था। एक पार्क में मिलने के लिए बुलाया था और जिन शब्दों का प्रयोग करते हुए यह लिखा था वह बिल्कुल अच्छे नहीं थे, मतलब भाषा अश्लील थी। सहेली तो हंसने लगी थी और मैंने झट से उसे वापस फोल्ड करके बैग में रख दिया। घर आकर चुपके से छत पर गयी और रोते-रोते उस लैटर के जितने बारीक टुकड़े कर सकती थी किये और उसे एक बारिश का पानी जाने वाले पाइप में डाल दिया। अब तो समझती हूँ कि ये गलत किया था, पर तब शायद मन में जाने क्या डर रहा हो।

कुछ दिन बाद वापस वैसा ही लैटर घर पर बैग खोलते वक्त मिला। भैया पास में ही बैठा था। मैं फिर रोने लगी और रोते-रोते वह ख़त भैया को पकड़ा दिया। घर पे सबको पता चला। पापा ने प्रिंसिपल मैम से बात की। उस नाम के दो लड़के पढ़ते थे स्कूल में। एक सीनियर और एक जूनियर। प्रिंसिपल मैम ने लैटर माँगा और कहा हैण्डराइटिंग मिलाकर उसे समझा देंगी और डांट देंगी। खैर! बात आई गयी हो गयी। लड़के का पता चला या नहीं यह सब कुछ पता नहीं...पर हाँ, उसके बाद कोई ख़त नहीं आया था। वे दोनों लड़के रास्ते में एक-दो बार नजर भी आये थे, पर कभी पता नहीं चल पाया कि कौन था। इसके बाद स्कूल भी बदल गयी। आज कुछ बच्चे अपने स्कूल में चलने वाले टाइम पास और रोज-रोज बदलने वाले अफेयर्स के बारे में बता रहे थे। अचानक ही वह घटना याद आ गयी और मन खिन्नता से भर आया। जाने क्यों मन ने कहा कि काश! वह प्रेम पत्र रहा होता।

Monika Jain ‘पंछी’
(17/11/2015)

November 10, 2015

Recipe of Angoori Petha in Hindi

Recipe of Angoori Petha in Hindi
 
रेसिपी : अंगूरी पेठा
 
सामग्री :

पेठा फल : 1 किलोग्राम
चीनी : 700 ग्राम
चूने (100 ग्राम) या फिटकरी ( 2 मटर के दाने जितनी) का पानी
केसर या मीठा पीला या नारंगी रंग

विधि :

पेठे के फल को छीलकर व इसके बीज और मुलायम गुदा बाहर निकाल देंगे। अब बाकी भाग के 1-2 इंच के चोकोर टुकड़े काट लेंगे या फिर स्कूप की मदद से इसकी बॉल्स निकल लेंगे। अब इन टुकड़ों या बॉल्स में सुई या कांटे वाले चम्मच की मदद से जगह-जगह छेद कर देंगे। एक बर्तन में पानी लेकर उसमें दो मटर के दानों के बराबर फिटकरी मिलाकर घोल देंगे। फिटकरी की जगह चूने का पानी भी उपयोग में लाया जा सकता है। अब पेठे के टुकड़ों को इसमें डालकर 2 घंटे के लिए भिगो देंगे। पेठे पानी में डूबे हुए रहने चाहिए। अब दो घंटे बाद इन्हें निकालकर साफ पानी से तेज धार में धो लेंगे ताकि फिटकरी या चूने का अंश न बचने पाए। अब एक बर्तन में पानी लेकर उसके उबाल आने पर पेठे के टुकड़ों को डालकर इनके नर्म और पारदर्शी होने तक उबालेंगे। इसके बाद चलनी की सहायता से इस पानी को निकाल देंगे। अब एक दूसरे बर्तन में पानी लेकर उसमें चीनी, केसर या मीठा रंग मिला देंगे। एक तार की चाशनी बन जाने पर इसमें पेठे के टुकड़े डाल देंगे। सामान्य ताप पर आ जाने पर इन्हें कुछ घंटों के लिए फ्रिज में रख देंगे। तब तक चाशनी भी पेठों में प्रवेश कर जायेगी। इसके बाद इन्हें खाने के लिए सर्व किया जा सकता है।

Instant Angoori Petha Recipe : अगर मेहमानों के आने पर झटपट अंगूरी पेठे तैयार करने हो तो इसके लिए बाजार से सूखे तैयार मीठे पेठे (½ kg) लाइए। अगर ये आकार में बड़े हैं तो इन्हें छोटे-छोटे चोकोर टुकड़ों में काट लीजिये। अब एक पतीली में 2 गिलास पानी लेकर इसके उबाल आने पर इसमें पेठे डाल दीजिये। इसी के साथ पीला मीठा रंग या केसर की पात्तियां भी डाल दीजिये। अब इन पेठों को तब तक उबालिए जब तक की पानी चाशनी की तरह गाढ़ा न हो जाए। अब गैस बंद कर इसके सामान्य तापमान पर आने पर फ्रिज में ठंडा करके सर्व कीजिये।

Monika Jain ‘पंछी’
(10/11/2015)