December 8, 2015

Save Animals and Birds Essay in Hindi

(1)
 
इंसान होने का सबूत

30/05/2017 - किसी भी संप्रदाय की कुरीतियों, रूढ़ियों या पशु-पक्षियों को देवी-देवता या माता-पिता मानने से मेरा कोई लेना-देना नहीं है। मैं किसी पार्टी विशेष की समर्थक भी नहीं। लेकिन कोई भी देश और दुनिया सिर्फ इंसानों के लिए नहीं है। पशु-पक्षियों के लिए आप न्यूनतम भी नहीं रखना चाहते। जबकि इंसान इंसान तभी होता है जब वह अपनी चेतना और बुद्धि का सदुपयोग कर शेष जीवों (इंसान शामिल) को अधिकतम संरक्षण प्रदान कर सके। बाकी तो वह पशुओं के स्तर से भी नीचे ही है। इंसानी उपलब्धियां इस प्रकृति पर कोई अहसान नहीं कर रही। हाँ, विपरीत जरुर सत्य है तो फिर गर्व की तो कोई बात है ही नहीं। जानवरों पर भोजन के साथ-साथ और भी कई तरह से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष अत्याचार होते हैं...और अगर किसी देश के पास यह विकल्प हो कि वह बिना धर्म और राजनीतिक दांव-पेंचों के वहां रहने वाले पशु-पक्षियों के संरक्षण को भी सुनिश्चित कर सके तो मुझे तो यही लगता है कि इस पर सभी को मिलकर सोचना ही चाहिए और सभी बिन्दुओं को शामिल करके सोचना चाहिए। कहीं किसी बिंदु पर आकर तो सहमति बन ही सकती है। और शुरुआत व्यापक हित को देखते हुए चयनित पशुओं को लेकर भी हो तो समस्या क्या है? पर अफ़सोस है कि सत्ता और अपनी असुरक्षा से आगे इंसान कुछ सोच ही नहीं पाता। हमारी इच्छाएं/महत्वकांक्षाएं अनन्त हैं। लेकिन अपने इंसान होने का कोई तो सबूत हम इस प्रकृति और शेष जीवों को दें।

(2)

अपनी ढपली, अपना राग

हिंदुत्व श्रेष्ठ है इसलिए हिंदुत्व ही बचना चाहिए।
इस्लाम श्रेष्ठ है इसलिए इस्लाम ही बचना चाहिए।
इंसान श्रेष्ठ है इसलिए इंसान ही बचना चाहिए।
सारी मिथ्या घोषणाएं हमारी! बिल्कुल अपनी ढपली, अपना राग की तर्ज पर। और इन सारी घोषणाओं के पीछे जो चीज प्रमुखता से चलती है वह है : राजनीति, मालकियत, सत्ता, अहंकार, नियंत्रण और अपने विस्तार की भावना। लेकिन पानी पी-पीकर हमें अगर किसी चीज को कोसना है तो वह है धर्म! खैर! अमूर्त चीजों पर अपना गुस्सा निकालना हर हाल में बेहतर है। कम से कम इस क्रोध की अग्नि में कोई मारा तो नहीं जाता। बाकी इंसान कितना ज्यादा श्रेष्ठ है इसका पता भी तब ही चल सकता है जब इंसान और किसी जीवन के बिना इस धरती पर बच सके। बाकी जिसे सच में जीव हत्या से आपत्ति हो वह न तो गाय के मारे जाने का समर्थन कर सकता है और न ही गाय को मारने वाले इंसान को मार डालने का समर्थन कर सकता है। वैसे ये जबरन किसी को भी माता-पिता, भाई-बहन बनाने वाले इंसान भी किसी चमत्कार से कम नहीं। स्वार्थ को रिश्तों का जामा पहनाना कोई हमसे सीखे। जब तक गाय घोषणा नहीं कर देती कि मैं तुम्हारी माता हूँ, तब तक हमारे लिए यही बेहतर है कि हम अपनी भावनाओं को अपने नियंत्रण में रखे और उसे अपने बछड़े की माता ही बने रहने दें।

(3)

गर आप वह पंछी / पशु होते तो?

08/12/2015 - पिंजरे में तोते, चिड़िया, खरगोश, चूहे आदि रखने वाले, दिन भर उन्हें पुचकारते हुए इसी ग़लतफ़हमी में जीते रहते हैं कि वे उन्हें बहुत प्यार करते हैं, पर सच सिर्फ इतना है कि वे इन भोले-भाले जीवों के सबसे बड़े दुश्मन है, जिनके मनोरंजन की बलि चढ़ती है, इन जीवों की आज़ादी! सोचिये, अगर कोई हमें जानवरों से भरे जंगल में अकेला पिंजरे में या खुला भी छोड़ आये तो हमें कैसा लगेगा? फिर कैसे हम सोच लेते हैं कि अपनी प्रजाति से दूर अकेले वे हमारे साथ खुश रह पायेंगे? कल एक अंकल जी कहीं पर बोलते दिखे, 'इन तोतों के लिए मैंने इतना बड़ा पिंजरा इसलिए ही बनावाया है ताकि इनकी आज़ादी में कोई खलल न पड़े।' (इत्ता बड़ा अहसान :o) प्यारे अंकल जी, आकाश को नापने वाले पंछियों के लिए कोई कितना बड़ा पिंजरा बनवा सकता है भला? पंछी पिंजरे में रहने को होते तो उनके पंख क्यों होते? कैदखाना स्वर्ण महल हो तब भी एक बंदिशों से रहित झोपड़ी से बदतर होता है...महसूस करके देखिये। परिंदों की आज़ादी पर यह फैसला लेने का हक़ आपको किसने दिया? उनकी आज़ादी का निर्णय उन पर ही छोड़ दीजिये न!...और भी बहुत कुछ है कहने को...पर बस आप एक पल को सोचिये - गर आप वह पंछी होते तो?

इसी तरह से ये पालतू कुत्ते को घुमाने वालों को उनके गले में पट्टा और रस्सी क्यों बांधनी पड़ती है? मतलब क्या इतने दिनों में भी वह उनके साथ यूँ ही चलना नहीं सीख पाता? और अगर नहीं सीख पाता तो इसका सीधा मतलब यह है कि वह ऐसे चलना ही नहीं चाहता। वैसे आज कोई बहुत ज्यादा पशु प्रेम नहीं उमड़ रहा है और न ही कोई व्यंग्य लेखन का इरादा है। बस अभी-अभी एक कपल को देख रही थी जो अपने कुत्ते को साथ घुमाने लाये थे और हर 5 सेकंड में उस कुत्ते के इधर-उधर डोलने और बीच-बीच में रुकने की वजह से उन्हें भी ऐसा ही करना पड़ रहा था। समझ नहीं आ रहा था उन्होंने कुत्ते को बाँधा हुआ है या कुत्ते ने उन्हें बाँधा हुआ है। खैर! प्रेम में कोई परेशानी नहीं होती लेकिन अच्छा लगता अगर बिना पट्टा और रस्सी बांधे इस तरह की परवाह और प्रेम देखने को मिलता।

Monika Jain ‘पंछी’

December 4, 2015

Spiritual Quotes in Hindi

Spiritual Quotes

  • 03/03/2017- बिना वेश बदले अध्यात्म के रास्ते पर चलना दोधारी तलवार पर चलने के समान है। आप किसी समय कोई काम क्यों कर रहे हैं या क्यों नहीं कर रहे हैं यह 90% लोग नहीं समझ पायेंगे। इसलिए खुद को सबसे पहले यह समझाना जरुरी है कि बहुत सम्भावना इसी की है कि अकेला ही चलना पड़ेगा और दूसरा यह कि आपके प्रति लोग क्या सोचेंगे, कहेंगे और करेंगे यह सोचना भी छोड़ना पड़ेगा।
  • 06/02/2017 - मैं बहुत गहराई से महसूस करती हूँ कि अब तक अपने जीवन के भयावह संघर्षों का सामना करने की जो शक्ति और प्रेरणा मुझे मिलती है वह एक आध्यात्मिक प्रेरणा है। ईश्वर को मैं सबके भीतर इसी रूप में जानती हूँ जो भयंकर विचलनों के दौर में भी भीतर की निष्कंपता, निश्छलता और स्थिरता को बनाये रखता है। 
  • 22/01/2017 - अध्यात्म शब्द पढ़कर ही जिनकी हंसी छूटती है, उन्हें अभी इसका शाब्दिक अर्थ भी नहीं पता। यह बात अलग है कि जाने-अनजाने वे अध्यात्म के क्षण जीते ही हैं। समस्या बस यह है कि अपनी-अपनी धारणाओं, पूर्वाग्रहों और भयों के चलते हम लोग आधे-अधूरे से संतोष कर लेते हैं। पूर्णता हमें डराती है। सबके मन में एक गहरा डर है कुछ छूट जाने का। अध्यात्म है ही ऐसा... धीरे-धीरे सब कुछ छूटेगा। लेकिन खालीपन में जो सुकून है उसके सामने बाकी चीजें कितनी क्षुद्र है। 
  • 18/03/2016 - कहते हैं कि प्रकृति तीन गुणों से मिलकर बनी है...तम, रज और सत्व। सबमें ये गुण अलग-अलग समय में अलग-अलग मात्रा में होते हैं, जिन पर कई कारकों का प्रभाव पड़ता है और इस त्रिगुण प्रकृति को माया कहा जाता है। जो इन तीनों गुणों से ऊपर उठ जाता है (त्रिगुणातीत), वह अपनी वास्तविक प्रकृति (निर्गुण) को पा लेता है। अर्थात् अपने मूल रूप में हम सभी एक ही हैं। आंशिक ही सही कभी-कभी यह अनुभूति होती भी है। 
  • 16/03/2016 - समस्याएं 'मैं' से शुरू होती है और समस्याएं 'मैं' पर ही आकर खत्म होती है। पहला 'मैं' है सिर्फ खुद को 'मैं' मानना...और दूसरा 'मैं' है सब को 'मैं' मानना। और इन दोनों 'मैं' के बीच दूरी बस 'मैं' जितनी ही है। 
  • 05/03/2016 - एक अध्ययन ऐसा भी है...जो शब्दकोष नहीं बढ़ाता...वहां तो शब्द गुम होने लगते हैं। 
  • 22/01/2016 - शरीर के तल पर, मन के तल पर और आत्मा के तल पर जीने वालों के सच और क्षमताएं अलग-अलग होते हैं। हम जब तक अगले तल तक या उसके निकट कभी पहुँचे ही नहीं...तब तक अध्यात्म, आत्मा, ब्रह्मचर्य, अंतर्ज्ञान, परस्पर भाव बोध...ये सब कुछ हमें बकवास, अप्राकृतिक और झूठ ही लगेगा। प्रेम, अहिंसा और करुणा आत्मा का स्वभाव है और ध्यान/सामायिक या सजगता उस मूल स्वभाव तक पहुँचने के साधन। यह सिर्फ वह ध्यान/सामायिक नहीं जो एक घंटे बैठकर कर लिया जाए। यह जागरूकता हर क्षण वाली है। जैसी परिस्थितयां हमने बना दी हैं उसमें सबसे लम्बी और सबसे मुश्किल यात्रा खुद तक पहुँचने की ही होती है। कितना अजीब है न...चाँद और मंगल तक पहुँच जाने वाले हम विकसित प्राणी अपनी आत्मा से कितना दूर होते हैं। 
  • 12/12/2015 - अध्यात्म की सफलता इसमें भी होगी, अगर यह अपने नाम पर होने वाले क्रूर से क्रूरतम व्यंग्यों और तमाशों को पढ़ते, देखते और सुनते हुए भी विचलित न हो। क्योंकि अध्यात्म ही सिखाता है : आत्मवत् सर्वभूतेषु...तो महावीर, बुद्ध, कबीर, विवेकानंद, ओशो आदि सभी विचारकों की मान्यताओं को पागलपन और मानसिक बीमारी करार देने वाले नास्तिक बुद्धिजीवियों!...और अर्थ का अनर्थ कर देने वाले तथाकथित आस्तिक भक्तों! हमें आप दोनों से प्यार है।
  • 09/12/2015 - कल एक दोस्त ने मेरी अध्यात्म से संदर्भित पोस्ट्स के लिए कहा, 'अगर मुझे पहले पता होता कि आगे जाकर तुम इतनी खतरनाक वाली पोस्ट्स करने लगोगी तो मैं तुम्हें फ्रेंड रिक्वेस्ट ही नहीं भेजता।’ वैसे मुझे भी कहाँ पता था। :) 
  • 04/12/2015 - छोटी-छोटी आध्यात्मिक अनुभूतियाँ यह अहसास करवाने के लिए पर्याप्त हैं कि अगर कोई रास्ता पूर्णता और स्थायी आनंद की ओर जाता है तो वह अध्यात्म ही है। 
  • 04/12/2015 - साथी ऐसा हो जो आत्मिक उत्थान में सहायक बनें, वह नहीं जो पतन के गर्त में ले जा। 
  • कुछ दिन पहले कहीं पढ़ा था 'जो भी इच्छाएं और वासनाएं बाकी रह गयी है उन्हें इसी जन्म में पूरा कर लो क्योंकि दमित इच्छाएं अध्यात्म के मार्ग में बाधा बनती है।' इसे पढ़ने के बाद एक मुस्कान आई चेहरे पर और पहला प्रश्न मन में आया : क्या इच्छाएं कभी पूरी हुई हैं? अध्यात्म का मार्ग इच्छाओं को पूरा करने से या दमन से शुरू नहीं होता। अध्यात्म का मार्ग शुरू होता है इच्छाओं से ऊपर उठते जाने से। जहाँ न उनके दमन की आवश्यकता है और न ही उन्हें पूरा करने की कोई अनिवार्य जरुरत। पर हाँ, यह सच है कि हम धीरे-धीरे ही सीखते हैं। 
  • हर व्यक्ति विरोधाभासी विचारों और शब्दों का पुतला है। कोई ज्यादा, कोई कम। हमारी दृष्टि जब तक 'पर' पर रहेगी विरोधाभास रहेंगे, और जितनी ज्यादा रहेगी उतने ही रहेंगे। ऐसे में विरोधाभास नजर तो आयेंगे पर सिर्फ 'पर' के ही 'स्व' के नहीं।
  • अध्यात्म का मार्ग आत्मनिर्भरता का मार्ग है और इसकी मंजिल आत्मनिर्भरता की पराकाष्ठा जहाँ सिर्फ आत्म बचता है और कुछ भी शेष नहीं रहता। अध्यात्म अपने जीवन में आये उन परिणामों या परिस्थितयों जिनमें हमारा कोई योगदान नहीं है (हालाँकि कर्म या पुनर्जन्म सिद्धांत के अनुसार योगदान हो सकता है) की भी जिम्मेदारी लेना सिखाता है। बाह्य दृष्टिकोण से जहाँ यह मार्ग सांसारिक जिम्मेदारियों से पलायन समझा जा सकता है वहीँ आत्म दृष्टिकोण से यह मार्ग विशुद्ध जिम्मेदार बनाता है। (पोस्ट का मंतव्य किसी को यह शिक्षा देना नहीं कि वह अपने प्रति हुए शोषण या अन्याय को चुपचाप सहन करे। किस परिस्थिति में हमें क्या करना है इसका निर्णय पूरी तरह से समझ और जागरूकता पर निर्भर करेगा।) 
  • मैं यहाँ क्यों हूँ, कौन हूँ और क्या कर रहा/रही हूँ। ये प्रश्न ही अध्यात्म की ओर आकर्षित करते हैं। लेकिन चमत्कार दिखाने और चमत्कार अनुभव करने की तीव्र इच्छा इस मार्ग से भटकाने के लिए पर्याप्त है। 
  • विरोधाभास (द्वंद्व/द्वैत) के बिना भौतिक अस्तित्व शायद संभव नहीं : समष्टि का भी और व्यष्टि का भी। सकारात्मक और नकारात्मक दोनों में से एक भी अगर पूर्ण रूप से खत्म हुआ तो यह दृश्य नहीं रहेगा। सब कुछ सिमटकर दो शब्दों/छोरों के बीच समा सकता है यह तो हम जानते हैं। पर ये दो शब्द भी सिमट कर जिस शून्य/अदृश्य तक पहुँचते हैं, उसे हम नहीं जानते। उसे जानना ही शायद वास्तव में जानना या पूर्ण जानना है। ऐसे में अगर हम सिर्फ दूसरों के (बाहरी) विरोधाभासों को ही चिह्नित करने में लगे रहे तो कुछ भी नहीं हाथ आने वाला। अंतत: जानने का रास्ता भीतर ही जाता है। 
  • समस्त प्रयासों के बाद भी जब हम किसी को न समझ पायें तो उसे समझ पाने की इच्छा और प्रयत्न को छोड़कर हमें खुद को समझने में लग जाना चाहिए। इसके बाद सबको समझने लगेंगे। :p :)
 
Monika Jain ‘पंछी’

December 1, 2015

Funny Quotes in Hindi

Funny Quotes

  • 13/06/2017 - हँसना हो तो अपनी पुरानी पोस्ट्स पढ़ें।...मसलन 31 जनवरी, 2014 को किसी के सवाल का जवाब मैं कुछ यूँ दे रही थी - जब कुछ लोग अपनी बुराई (घोर वाली) तक नहीं छोड़ते तो मैं भला अपनी अच्छाई कैसे छोड़ दूँ? (What a Logic!)
  • 08/06/2017 - बहुत ज्यादा...मतलब बहुत ही ज्यादा बोलने वाली पत्नियों के पति बचा-कुचा बोलना भी भूल जाते हैं। सॉरी टू नारीवाद! 
  • 02/06/2017 - कीड़े-मकोड़ों से प्यार करने का पुरस्कार कभी-कभी रात नीचे वाले फ्लोर में माँ-पापा के सो जाने के बाद, ऊपर वाले फ्लोर में बड़े ही ख़तरनाक, विचित्रोगरीब, खूंखार, रहस्यमयी, एकदम अज़नबी, दो इत्ते लम्बे दंशों के साथ आये बड़े जहरीले कीड़े के रूप में भी प्राप्त हो सकता है। फ़िलहाल मैं सुरक्षित हूँ। उसे भी रूम से बाहर बालकनी से टाटा कह दिया है। थोड़ा सा अजीब लग रहा है। लेकिन शुभ रात्रि। 
  • 27/05/2017 - सपने में लाइट न हो तो भी कितनी दिक्कत हो जाती है। कुछ भी नज़र नहीं आता। इसी के चलते कल रात मैं एक शहर में खो गयी थी। 
  • 26/05/2017 - कुछ लोगों को देखकर लगता है कि अगर इनका साम्राज्य या शासन होता तो ये हँसने पर ही टैक्स लगा देते या फिर डांट-डपट कर चुपचाप एक कोने में बैठा देते। मतलब इत्ते खड़ूस। 
  • 22/05/2017 - बन्दे ने तो पोस्ट में Better Half लिखा था। मैं उसे Battle Half पढ़ गयी।
  • 17/05/2017 - कोई ज्यादा 'हम्म-हम्म' करता हो और उसका 'हम्म-हम्म' करना छुड़वाना हो तो उससे भी ज्यादा 'हम्म-हम्म' करने लगो और उसे शुरू में कारण भी बता दो। उसका छूट जाएगा। बस बाद में खुद का छोड़ना मत भूल जाना। 
  • 16/05/2017 - कभी-कभी घूरने वाले/वाली को घूर कर भी उसकी घ्रूरता को कम किया जा सकता है।
  • 12/05/2017 - तुम मुझे फूल दो...मैं तुम्हें गमला दूँगी।
  • 09/05/2017 - दुनिया कभी-कभी फर्जीवाड़ा लगती है।
  • 02/05/2017 - एक बहुत सुन्दर सा गिरगिट कई दिनों से गृह प्रवेश की फ़िराक में लग रहा है। वैसे गिरगिट छिपकली से ज्यादा मासूम लग रहा है। 
  • 01/05/2017 - टमाटर रागियों का बस चले तो दही की करी में भी टमाटर डलवा दे और टमाटर द्वेषियों का बस चले तो टमाटर की सब्जी में भी टमाटर न डाले।
  • 27/04/2017 - अच्छा लगता है जब सारी रोटियां गोलगप्पा बन जाती है।
  • 13/04/2017 - गालों पर प्यार करने की इतनी आदत है कि गाय के बच्चे के भी गाल खोजने लग जाती हूँ। 
  • 21/03/2017 - जीवन में कुछ भी हो सकता है। मसलन यह भी कि रात नींद में आप पानी पीने को उठो और जग से गिलास में पानी डालो और पानी गिलास के बजाय बिस्तर पर गिर जाए या भयंकर सर्दी की रात में पानी गिलास में लेने के बाद आप जग को वापस अपनी जगह रखने की बजाय हवा में ही रख दो और तब आपको यह पता चले कि नींद उड़ना किसे कहते हैं। 
  • 29/12/2016 - बच्चे के रूप में करीब-करीब ईश्वर ही जन्म लेता है। फिर माता-पिता और समाज उसे बिगाड़ने का कार्य करते हैं। 
  • 21/12/2016 - कुछ लोगों को आपकी पोस्ट्स इतनी पसंद आती है, इतनी पसंद आती है, इतनी पसंद आती है कि वे उसे अपनी ही बना लेते हैं। उनके लिए यह स्वीकार करना संभव ही नहीं होता कि यह उन्होंने नहीं लिखी है।
  • 07/11/2016 - न सोयेंगे और न सोने देंगे वाले प्राणियों की संख्या दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही है।
  • 27/09/2016 - एक ज़माने में मैं इतनी बुद्धू थी (अभी भी कम नहीं) कि एक दोस्त ने मेरे मजे लेने के लिए मुझसे कहा, 'हमारे यहाँ पर बेस्ट फ्रेंड को मुर्गीचोर कहा जाता है।' मैंने थोड़ा संदेह जताया तो उसने कहा, 'चाहो तो किसी और से पूछ लो।' और मैं आराम से वहीँ पर रहने वाले एक कॉमन फ्रेंड से पूछ भी आई कि क्या आपके यहाँ बेस्ट फ्रेंड को मुर्गीचोर कहते हैं? 
  • 04/09/2016 - हमारी शिक्षा प्रणाली इतनी बोरिंग है कि बच्चे यह तक कहते पाए जाते हैं कि काश! बाढ़ आ जाए तो स्कूल ही नहीं जाना पड़ेगा। 
  • 30/08/2016 - अपने घर में मैं नास्तिक समझी जाती हूँ। मेरी जन्मकुंडली में लिखा है मैं बहुत बड़ी धर्मात्मा बनूँगी और यहाँ फेसबुक पर शायद आध्यात्मिक समझते हैं मित्र। और फिर मैंने इनमें से कुछ भी बनना कैंसिल कर दिया। 
  • 21/08/2016 - मित्र के सालों पुराने नंबर पर कॉल करने...जो कुछ सालों तक बंद रहकर अब किसी ख़तरनाक लड़की का नंबर हो चुका हो। जहाँ सामने वाली आपको कोई और लड़की (रिमझिम) समझ रही है (जिससे उसका 36 का आँकड़ा है शायद) और आप उसे मित्र की पत्नी समझकर बहुत सहजता से बात कर रहे हैं। तब इस ख़तरनाक ग़लतफ़हमी के बीच कुछ अज़ब वार्तालाप के साथ-साथ उसका कहना, 'देखो! तुम इतनी ज्यादा स्वीट मत बनो।'...मुझे रह-रहकर अभी तक हंसी आ रही है। अच्छी-खासी आवाज़ का इस तरह से कचरा भी हो सकता है। मन कर रहा था उसे कह दूँ, मैं स्वीट बन नहीं रही...आलरेडी स्वीट हूँ। 
  • 18/08/2016 - बच्चों का स्वागत और बच्चों द्वारा स्वागत आज भी दरवाजे के पीछे छिपकर 'हो' से ही होता है। 
  • 07/04/2016 - डिअर स्माइली! तुम अलग-अलग स्क्रीन पर अलग-अलग से मत दिखा करो। 
  • 19/02/2016 - काहें का 'फ्रीडम 251'! सबको तो गुलाम बना छोड़ा है। इत्ते तो अभी शक्ल भी नहीं देखी ढंग से। अफवाहों का बाज़ार भी गर्म है। वैसे टेंशन न लो कोई। कुछ ठीक न रहा तब भी बच्चों के खेलने के काम तो आ ही जाएगा।
  • 11/01/2016 - 'स्टेप हेयर कट' के लिए माँ कहती है - चूहों ने बाल कुतर दिए हो जैसे।
  • 07/12/2015 - किचन एक्सपेरिमेंट के नाम पर किसी ने कहा, 'आप आलू-मुर्गा बना लो।' हमने कहा, 'आलू हम बना लेंगे, आप मुर्गा (सजा वाला) बन जाना।' 
  • 01/12/2015 - जिन्हें शब्दों से अति प्रेम हो या फिर जिनके लिए चर्चा सिर्फ हार या जीत का प्रश्न हो उनके साथ चर्चा में पड़ना मतलब ’आ बैल मुझे मार!’ 
  • हमारी फ्रेंडलिस्ट में रहते हुए भी कुछ लोग हमें इतना रेगुलर नहीं पढ़ते जितना ब्लॉक लिस्ट में जाने के बाद पढ़ने लगते हैं।
 
Monika Jain ‘पंछी’