December 26, 2016

Letter to a Friend in Hindi

 Letter to a Friend in Hindi
(1)

सदा तुम्हारे पास

अतीत के झरोखों पे साथ बैठे पंछियों,

मेरी निरंतर उदासीनता के बावजूद भी रह-रहकर आती तुम्हारी आवाजें...अच्छा लगता है यह जानना कि मैं भुलाई नहीं गयी। अच्छा लगता है यह देखना कि मैं तुम्हारी यादों का हिस्सा अब भी हूँ। अच्छा लगता है यह सोचना कि ज़िन्दगी की इस तेज रफ़्तार में जहाँ तुम सब जाने कहाँ-कहाँ पहुँच गए हो आज भी मुझसे मिलने की ख्वाहिश रखते हो। यादों के उस सुरीले संगीत में मेरी खनक आज भी है, यह सुनना अच्छा लगता है। इस प्यारे से अहसास के लिए सदा तुम्हारी ऋणी रहूंगी...पर काश! काश, मैं तुम्हें यह समझा पाती कि कभी-कभी अतीत चाहे जितना भी सुन्दर रहा हो उसे भूलना पड़ता है। मेरे लिए भी भूलना जरुरी था। न भूलती तो इस कठोर वर्तमान को कैसे स्वीकार कर पाती? तुम्हारी पुकार को अनसुना करूँ तो अपराधबोध होने लगता है और सुनकर अमल करूँ तो खुद के साथ अन्याय कर बैठूंगी। एक ही गुजारिश है कि अपेक्षाओं से परे मुझे जो हूँ उसी तरह स्वीकार कर लो...बस फिर मुझे सदा अपने पास ही पाओगे।

Monika Jain ‘पंछी’
(04/06/2015)

(2)

प्रेमियों का संवाद
 
मित्र मेरे!

तुम मित्र हो मेरे क्योंकि तुम सबके मित्र हो। तुम्हारे शब्द एक जरिया हैं ह्रदय को प्रेम से प्रकाशित करने का। शब्दों के मायने बस इतने ही कि उनके बीच का अन्तराल मुझे दे जाता है निच्छलता के कई क्षण। कल रात सपने में तुम्हें मृत देखा और मैं जार-जार रोई। सुबह देखा तो तुम्हारे शब्द भी नहीं थे कहीं। कोई तकनीकी अड़चन रही हो या मेरी परीक्षा कि मैं बस शब्दों और तुमसे जुड़ कर न रह जाऊं। मैं शब्दों के बीच के उस अन्तराल को लम्बा करूँ...और लम्बा... इतना कि शब्द खो जाए और बस निश्छलता रह जाए। कुछ समय बाद अड़चन दूर हुई और पता है सबसे पहला वाक्य क्या पढ़ा, ‘स्वप्न तो बस स्वप्न ही है।’ मुश्किल तो बहुत है यह जीवन...पर मौन सम्प्रेषण के ऐसे हजारों किस्से!...जीवन बहुत आश्चर्यजनक हो चला है आजकल।

कैसे कोई बिल्कुल अनजान होते हुए भी मन की सारी की सारी बातें और जिज्ञासाएं पढ़ लेता है और कोई प्रकट बातों के अर्थ का भी घोर अनर्थ कर देता है। तुम्हें देखकर यही लगता है कि प्रेम सांसारिक रिश्तों का मोहताज नहीं। प्रेम उत्तेजित नहीं करता...प्रेम तो करुणा और शांति की गहराईयों में ले जाता है...यह अनुभूति देने वाले तुम!...तुम्हारा होना बधाई है मुझे! न जाने कौनसे क्षण की शुभकामना फलित हुई जो तुम्हारे शब्दों के जरिये तुमसे परिचय हुआ। सबसे पवित्र और गहन रिश्ता उसी से तो बनता है जो हमें हमारे निकट लाता है। और जो अपने निकट हो जाता है, वह सबके निकट हो जाता है। शब्द तुम्हारे उतारते हैं मुझे अपने भीतर...और हो जाती हूँ उस क्षण मैं बिल्कुल नि:शब्द! इतनी स्वच्छता, इतनी निर्मलता, इतनी सौम्यता...नहीं-नहीं यह बात महज शब्दों की नहीं...यह कुछ और ही है जो जोड़ता है हम सबको अपने स्रोत से। उस क्षण मुक्त हो जाती हूँ मैं जीवन की तमाम दुश्वारियों से।

मैं अक्सर सोचती थी - क्या कोई ऐसा हो सकता है, जिससे आजीवन एक प्रवाहमय संवाद हो सके। किसी-किसी को देखकर यह भ्रम हुआ भी, पर अब लगता है जिन्होंने भी खुद को पाया होगा, सिर्फ उन्हें ही इस प्रश्न का उत्तर मिला होगा। लगता तो यह भी है कि कोरे प्रश्न के साथ मर जाना कितना बुरा होता है। और तुम्हें देखकर यह विश्वास पक्का हो जाता है कि आत्मा के तल पर जीने वाले प्रेमियों का संवाद निश्चय ही एक शांत, नीरव; बहती नदी जैसा, वीणा से झंकृत मधुर संगीत जैसा; सांझ की मद्धिम शीतल हवा जैसा या सर्दियों में खिलखिलाती धूप जैसा...होता होगा। कितनी सातत्यता होती होगी उसमें। कोई खंड नहीं, कोई द्वंद्व नहीं, कोई तनाव और खिंचाव नहीं, कोई प्रयास नहीं! अहा! कितना सहज, कितना अद्भुत, कितना निर्मल, कितना गहन और कितना जीवंत! ऐसा ही तो होता होगा न!

Monika Jain ‘पंछी’
(26/12/2016)

(3)

गुमनाम पत्थर
 
मित्र मेरे,

तुम्हारी कहानियां खूब उकेरती है किसी की पीड़ा और दर्द को। तुम्हारा निरीक्षण अच्छा है। अच्छी है तुम्हारी संवेदनशीलता। लेकिन अच्छा नहीं लगता जब तुम्हारे मन में अपने लिए शिकायतें पढ़ती हूँ। बुरा लगता है कि तुम मेरे मन तक नहीं पहुँच पाते। गलती तुम्हारी भी नहीं। मैं कुछ कहती भी तो नहीं। पर सोचो! गर किसी दिन तुम्हें यह पता चले कि जिन कहानियों को तुम्हारी संवेदनशीलता जिन्दा कर देती है सबके ज़हन में, उन्हीं कहानियों की दर्दनाक मार और पीड़ा से गुजर रही एक पात्र मैं भी हूँ...तो क्या तब भी ऐसे ही शिकायत करोगे?

तुम चाहते हो मुझे एक सुन्दर देश के सपने को साकार करने में समर्पित होते देखना...तुम चाहते हो मुझसे मिलना...तुम चाहते हो मेरे हाथों से बने खाने का स्वाद चखना...तुम चाहते हो मेरे साथ खेलना...और भी बहुत कुछ! लेकिन तुम खुद सोचो! क्या इतनी छोटी-छोटी सी चाहतों को ठुकराने और उनकी उपेक्षा कर देने का अहंकार हो सकता है मुझमें? इतना भी नहीं जाना मुझे और मित्र भी कह दिया?

तुम्हारी चाहतें तो बहुत छोटी-छोटी सी चाहते हैं, लेकिन मेरे जीवन का संघर्ष इतना बड़ा है कि वहां अब चाहत शब्द कोई मायने रखता ही नहीं। मेरी उपलब्धि बस इतनी कि मेरी मुस्कान अब तक कायम है। इसका मतलब यह नहीं कि मैं अँधेरी स्याह रातों में अकेले अक्सर रोती होऊँगी। नहीं! मेरी उपलब्धि है कि इन अनंत प्रतिकूलताओं के बीच भी मैं अक्सर अकेले में भी मुस्कुरा लेती हूँ। मैं अब भी प्रेम बाँट लेती हूँ। प्रेम और मुस्कुराहट बस यही मेरे खौफनाक और दर्दनाक जीवन की उपलब्धियां है। गर हो सके तो अब शिकायत ना करना। हो सके तो बस इतनी सी दुआ करना कि मेरे ह्रदय का प्रेम और मेरे होठों की मुस्कुराहट सदैव कायम रह सके। फिर भले ही मैं तुम्हारे विचारों के अनुरूप एक सुन्दर देश के स्वप्न के प्रति समर्पित नज़र न आऊँ, लेकिन तुम्हारे सपनों के देश की नींव में एक गुमनाम पत्थर मेरा भी होगा।

Monika Jain ‘पंछी’
(30/01/2017)

December 21, 2016

Story on Christmas in Hindi for Kids


खुद बनो सांता क्लॉज़

हर वर्ष की तरह जिम्मी और जॉनी दिसम्बर के आते ही बहुत उत्साहित थे। क्रिसमस का त्यौहार जो आने वाला था। पर क्रिसमस का उनका सारा उत्साह उनके मामा जॉन से जुड़ा था जो हर साल क्रिसमस पर सैंटा बनकर उनके घर आते और बच्चों के लिए ढेर सारे उपहार लाते। उसके बाद सब मिलकर खूब धूम और मस्ती से क्रिसमस मनाते।

लेकिन आज ही शाम को डिनर के समय मम्मी ने बताया कि इस बार मामा को बहुत जरुरी काम है इसलिए वे नहीं आ पायेंगे। यह सुनते ही जिम्मी और जॉनी का चेहरा उतर गया।

‘मामा के बिना तो बिल्कुल भी मजा नहीं आएगा।’ जिम्मी बोली।

‘हाँ, और मामा ही तो सैंटा बनते है, गिफ्ट्स लाते हैं और गेम्स खिलाते हैं। बिना सैंटा के कैसा क्रिसमस?’ जॉनी रुहांसा हो गया।

‘कोई बात नहीं बेटा, पापा तो गिफ्ट्स लायेंगे ही न?’ मम्मी बोली।

‘नहीं मम्मा, पापा तो हमेशा ही लाते हैं लेकिन क्रिसमस पर तो हमें हमारे सैंटा मामा से ही गिफ्ट लेना है।’ यह कहकर जिम्मी और जॉनी रुहांसे से अपने कमरे में चले गए।

घर में क्रिसमस ट्री लाया जा चुका था, पर उसे सजाने में जिम्मी और जॉनी को कोई दिलचस्पी ही नही थी। क्रिसमस से दो दिन पहले मामा का फिर फोन आया बच्चों का हालचाल और तैयारी के बारे में पूछने के लिए। जिम्मी और जॉनी की मम्मी ने उन्हें बताया कि दोनों बच्चे इस बार कोई तैयारी नहीं कर रहे। कह रहे हैं मामा के बिना नहीं मनाएंगे क्रिसमस। जॉन ने बच्चों को फोन देने को कहा। जिम्मी ने मामा से कहा, ‘मामा, आप ही तो सैंटा क्लॉज़ बनते हो। हम लोगों को इतना हंसाते हो। इतने गेम्स खिलवाते हो। हर बार नए-नए गिफ्ट्स लाते हो। अब आपके बिना हम क्या करेंगे?’

मामा ने कहा, ‘कुछ नहीं! इस बार तुम सैंटा बन जाना।’

जॉनी चौंका। ‘हम सैंटा?’

‘हाँ, क्यों नहीं? बच्चों, गिफ्ट्स लेने में जितना मजा आता है उससे कई अधिक मजा आता है गिफ्ट्स देने में। तुम बनकर तो देखो एक बार?’ मामा बोले।

फिर बच्चे मामा से बात कर अपने सोने के कमरे में चले गए। सोते-सोते एक दूसरे से बातें करने लगे।

जॉनी बोला, ‘जिम्मी दीदी, सैंटा तो हम बन जायेंगे लेकिन हम गिफ्ट्स क्या लायेंगे और किसे देंगे?’

जिम्मी ने कहा, ‘जॉनी, गिफ्ट्स तो हम बोलेंगे तो पापा दिला देंगे। लेकिन मैंने सोचा है कि हम इस बात को सरप्राइज रखते हैं। हमारे घर जो रोली आंटी आती है न काम करने के लिए, उनके मोहल्ले में बहुत बच्चे हैं। उनके वहां कोई सैंटा भी नहीं जाता और वो हमारी तरह कोई फेस्टिवल बहुत अच्छे से मना भी नहीं पाते। हम उनके मोहल्ले में चलेंगे। हम मम्मा और पापा के लिए भी गिफ्ट्स लायेंगे और मामा भी कुछ दिन बाद आयेंगे तो उनके लिए भी।’

‘लेकिन पैसे? वो कहाँ से आयेंगे?’ जॉनी ने कहा।

‘अरे! हमारे पिग्गी बैंक कब काम आयेंगे? अब तक तो उनमें खूब पैसे जमा हो गए होंगे। मैंने सोचा है उन सब बच्चों के लिए हम रंग-बिरंगी पेंसिल्स, रबर और शार्पनर लायेंगे।’ जिम्मी बोली।

‘अरे वाह दीदी! यह तो बहुत अच्छा आइडिया है। मैंने सोचा है - मम्मा, पापा और मामा के लिए हम न्यू ईयर की डायरी और पेन लायेंगे। मम्मी और मामा को तो लिखने का भी शौक है और पापा को सब हिसाब-किताब के लिए डायरी की जरुरत होती ही है।’ जॉनी ने कहा।

‘हाँ जॉनी। यह तुमने बहुत अच्छा सोचा। चलो अब हम सो जाते हैं। कल हमें बहुत सारी तैयारियाँ करनी है।’ यह कहकर जिम्मी ने लाइट बंद कर दी।

अगले दिन दोनों से सबसे पहले अपने-अपने पिग्गी बैंक तोड़ दिए। कुल 1000 रुपये उसमें जमा थे। अपने दोस्त से मिलने जाने की कहकर वे सुबह ही घर से निकल गए। फिर उन्होंने एक स्टेशनरी की शॉप पर जाकर सारा सामान खरीदा और कुछ देर बाद घर लौट आये। आते ही दौड़कर सामान को छिपाकर रख दिया। बाकी सारा दिन अगले दिन की तैयारियों में गुजरा।

जिम्मी और जॉनी को अचानक इस तरह से उत्साहित और ख़ुश देखकर मम्मी ने राहत की सांस ली और वह भी दिल से मिठाई आदि तैयार करने में जुट गयी।

अगले दिन सुबह जिम्मी और जॉनी ने उठते ही पापा और मम्मी को विश किया और उन्हें गिफ्ट्स दिए। पापा-मम्मी की ख़ुशी का ठिकाना न रहा। पापा-मम्मी ने भी जिम्मी और जॉनी को गिफ्ट्स दिए। उन्होंने खोलकर देखा तो उसमें से दोनों के लिए सैंटा क्लॉज़ की ड्रेस थी। सैंटा क्लॉज़ की ड्रेस देखते ही जिम्मी और जॉनी दोनों हैरान रह गए। उन्होंने मम्मी-पापा को अचरच भरी निगाहों से देखा तो मम्मी ने बताया कि मामा ने ही उन्हें यह आईडिया दिया था कि इस बार बच्चों के लिए सैंटा की ड्रेस ले आये।

‘भैया, हम तो सैंटा की ड्रेस के बारे में भूल ही गए थे। मामा कितने अच्छे हैं। अब हम शाम को रोली आंटी के मोहल्ले के बच्चों के साथ और भी मजे से क्रिसमस मनाएंगे।’ जिम्मी बोली।

इसके बाद दोनों बच्चों ने अपने प्लान के बारे में पापा-मम्मी को बताया और मार्केट से लायी गयी पेन्सिल्स, रबर और शार्पनर सब लाकर दिखाये। पापा-मम्मी को अपने बच्चों पर बेहद गर्व महसूस हुआ। पापा भी मार्केट जाकर उन बच्चों के लिए खिलौने और मिठाई ले आये।

इसके बाद सब शाम को रोली आंटी के मोहल्ले में गए और वहां एक क्रिसमस ट्री मंगवाकर सबके साथ उसे सजाया। प्रार्थना के बाद सैंटा बने जिम्मी और जॉनी ने सब बच्चों को गिफ्ट्स और मिठाई बांटी। सबने मिलकर कई गेम्स खेले और इसके बाद सब ख़ुशी-ख़ुशी घर आ गए। घर आकर जिम्मी और जॉनी ने मामा को फ़ोन किया और कहा, ‘मामा आपने बिल्कुल सही कहा था। गिफ्ट्स लेने से भी कई ज्यादा ख़ुशी तो गिफ्ट्स देने में होती है। इस बार का क्रिसमस हम कभी नहीं भूलेंगे और अबसे आपके साथ-साथ हम भी सैंटा बनेंगे।’ मामा ने बच्चों को खूब प्यार और आशीर्वाद दिया और मधुर यादों को मन में संजोये दोनों बच्चे सोने चले गए।

Monika Jain ‘पंछी’
(21/12/2016)

October 16, 2016

Compassion (Kindness) Quotes in Hindi

Compassion (Kindness) Quotes

  • 13/09/2017 - अपनी व्यक्तिगत खुन्नस में आप किसी पर मिथ्या आरोप लगाते हैं, बिना उन आरोपों की गंभीरता को समझते हुए। बिना यह जाने और सोचे कि उनका क्या परिणाम हो सकता है और क्या हुआ होगा। अपने पूर्वाग्रहों को आपसी संवाद द्वारा दूर करने की कोई भी कोशिश किये बिना, अपनी गैर जिम्मेदार टिप्पणियों से पल्ला झाड़कर आप यह अपेक्षा करते हैं कि सब कुछ सामान्य रहे तो बेशर्मी और असंवेदनशीलता इसे कहते हैं। इस पर भी आप खुद को बहुत जिम्मेदार, संवेदनशील और ईमानदार समझे तो अपनी समझ पर पुनर्विचार जरुरी है। वैसे गलती आपकी भी नहीं। जो समाज किसी की संवेदनाओं का आकलन ही सिर्फ किसी हादसे पर प्रकट दुःख या रोष से करता हो, वह समाज संवेदना शून्य हो तो किम् आश्चर्यम्?
  • 11/09/2017 - करुणा सहजता के पीछे आती है।
  • 13/08/2017 - सबसे अधिक जरुरी है स्व और पर का आंतरिक अंतर मिटते जाना। प्रतिक्रिया कर्तव्यों की इतिश्री नहीं करती। वह संक्रमण मात्र है। प्रश्न को उचित उत्तर की जरुरत होती है।
  • 15/02/2017- भावुक संवेदनशीलता और बोध युक्त संवेदनशीलता में बहुत अंतर है। दुःख चाहे अपना हो या दूसरों का वास्तव में दुःख पराया ही है। जो लोग इस स्तर तक पहुँच जाते हैं कि उनके लिए दुःख दुःख ही नहीं रह जाता तो वे स्वयं या दूसरों के दु:खों पर विचलित भी नहीं होते। लेकिन फिर भी कहा जाता है कि वे ही करुणामय है या प्रेममय है। इसकी वजह है कि वे दुःख को अच्छी तरह से जान गए हैं। तो किसी और के दुःख के प्रति उनकी जो समानुभूति/करुणा है वह इस वजह से है कि उनके लिए कोई दूसरा नहीं रहता। वे दुःख क्या है यह जानते हैं और यह भी कि दुःख है तो अनित्य लेकिन व्यक्ति को महसूस तो होता ही है जब तक अहंकार का अस्तित्व है। 
  • 16/10/2016 - कुछ लोग कहते हैं दिल (करुणा) को सुनना चाहिए और कुछ कहते हैं दिमाग (प्रज्ञा) को सुनना चाहिए। समस्या किसे सुनना चाहिए यह नहीं है। समस्या दिल और दिमाग के अलग-अलग (द्वंद्व) होने की है। जैसे-जैसे प्रज्ञा और करुणा एक होते जायेंगे, हम जो भी सुनेंगे सही सुनेंगे। 
  • 13/12/2015 - बाहर से आरोपित नैतिकता और भीतर से उपजी करुणा में बड़ा गहरा अंतर है।
  • 19/05/2015 - 'असंवेदनशीलता' समस्या बस यही है और कुछ भी नहीं। 
  • 10/05/2016 - अपनी कमियों, गलतियों, कमजोरियों, अवगुणों आदि के प्रति आप जितने सदय रहते हैं, उतने या उससे थोड़ा कम ही सही...दूसरों के लिए भी रह लिया कीजिये। 
  • 07/04/2016 - प्रज्ञा के बिना करुणा और करुणा के बिना प्रज्ञा अपने मायने खो देते हैं। 
  • 14/03/2015 - उन्होंने बहुत बुलाया - दीदी! बाहर आओ। कितनी अच्छी बारिश हो रही है। ओले भी गिर रहे हैं।...पर उस बारिश को देखने का मन कैसे हो, जो न जाने कितने आसूँओं से भीगी हो।
  • 07/03/2015 - अच्छा करने पर अच्छा होता है या नहीं, पता नहीं। बुरा करने पर बुरा ही होगा, ये भी नहीं जानती। पर हाँ, इतना पता है कि एक संवेदनशील ह्रदय के लिए किसी भी अपराध बोध के साथ जीना बेहद मुश्किल होता है।...और आत्म संतुष्टि एक ऐसी चीज है जिसके सामने क्या मिल रहा है और क्या खो रहा है, मायने नहीं रखता। 
  • किसी की भी अनासक्ति का कारण समस्त जगत/जीवन के विरोधाभास/द्वंद्व/द्वैत को समझ पाने की संवेदना ही रहा होगा...नहीं? 
  • हम ऐसे समाज में रहते हैं जहाँ किताबी और डिजिटल कहानियाँ पढ़ते-सुनते समय मुंह खुला रह जाता है, आँखें छलक पड़ती है, कानों में चीत्कारें गूँजने लगती है, पर यहीं आँखें, कान और मुंह असल कहानियों के सामने बंद हो जाया करते हैं। नैतिकता और संवेदनशीलता अब बस कागजों और कीबोर्ड को गीला करने के लिए ही बची है या फिर सिर्फ रोनी-धोनी स्माइली बनाने के लिए।
  • जिसके पास दूसरों के लिए प्यार नहीं होता, जो अपने सिवा किसी और के बारे में नहीं सोच सकता। उससे ज्यादा गरीब और कोई नहीं होता। 
  • व्यक्ति और घटनाओं पर चर्चा में हमेशा से ही आवश्यकता से अधिक रूचि नहीं रही। व्यक्तिगत जीवन में इसका प्रत्यक्ष नुकसान यह हुआ कि सामने वाले ने अपनी गलतियाँ छिपाकर कितनी ही मनगढ़ंत कहानियां बनाई और एक ही पक्ष को सुनकर निष्कर्ष निकाल बैठी दुनिया में मेरी अंतर्मुखता, संवेदनशीलता और कभी-कभी अपने हिस्से का अपराध बोध मेरा पक्ष प्रकट नहीं कर पाया। लेकिन इस प्रत्यक्ष नुकसान के कई अप्रत्यक्ष और आंतरिक लाभ भी होते हैं जिनके सामने ये अस्थायी नुकसान मायने नहीं रखते। हालाँकि किसी समय विशेष पर हमें चुप रहना है या बोलना है यह पूरी तरह से समझ और जागरूकता का विषय है लेकिन अनावश्यक अतिप्रचार और दुष्प्रचार तो कुंठित मन का ही काम होता है। इसके अलावा किसी घटना या व्यक्ति विशेष के प्रति ही हमारी संवेदना भी संवेदना कम भावुकता अधिक हो जाती है। हालांकि मैं भी बहुत कम घटनाओं और व्यक्तियों पर कुछ कहती हूँ लेकिन वह ज्यादातर सिर्फ सन्दर्भ के लिए होता है ताकि मैं अपना मूल सन्देश पहुंचा सकूँ। वह घटना या व्यक्ति/प्राणी विशेष के प्रति कोरी भावुकता नहीं होती। लेकिन जिस समाज में संवेदनशीलता होती है वहां दुर्घटनाएं कम ही होती है। विचारों और भावनाओं (जो कि घटनाओं का मूल है) उन्हें छोड़कर सिर्फ और सिर्फ घटनाओं और व्यक्तियों पर प्रतिक्रिया देना ही हमारी संवेदनहीनता की ओर एक इशारा है। बाकी तो घटनाओं, किस्से और कहानियों की उपयोगिता सिर्फ इतनी ही है कि वे हमें उनकी जड़ों तक पहुँचने में मदद करे, जहाँ से उनकी उत्पत्ति होती है। और जड़ें कहीं बाहर नहीं होती, जड़ें भीतर ही होती है। 
  • धर्म का आधार होता है - अहिंसा, करुणा और समानुभूति। हमारे भीतर ऐसी संवेदनशीलता होनी चाहिए कि अगर कोई और व्यक्ति तकलीफ में हो तो उसकी पीड़ा का अहसास हमें भी हो। हमें अहसास होता तो है पर सिर्फ वहाँ जहाँ हमारा अनुराग होता है। किसी का अपना बच्चा बीमार हो गया तो उसे पीड़ा होगी लेकिन वही पीड़ा पड़ोसी के बच्चे के बीमार होने पर नहीं होगी। जहाँ सच में संवेदनशीलता होती है, अनुकम्पा होती है वहाँ तेरे-मेरे की दीवार नहीं होती। वहाँ अपनों के लिए वात्सल्य और परायों के लिए आत्मीयता का अभाव, ऐसा नहीं होता। लेकिन आज हमने अपनी नैतिकता और संवेदनशीलता को सिर्फ अपनों तक सीमित कर रखा है जिसकी सीमा हमारे स्वार्थ के अनुसार बदलती रहती है। आज जितनी भी आपराधिक घटनाएँ होती है, उसका मूल कारण संवेदनशीलता का अभाव है जिसकी वज़ह से मनुष्य दूसरों के दुःख, दर्द और पीड़ा का अनुभव नहीं कर पाता। इसलिए बहुत जरुरी है अपनी संवेदनाओं को जाग्रत करना। बस यह ध्यान रहे कि संवेदना का आशय कोरी भावुकता या विचलन नहीं होता। कोई पूर्ण स्थिर मन हो (जैसे बुद्ध, महावीर) तो वह तो हमेशा ही शांत रहेगा, लेकिन फिर भी वही सबसे अधिक करुणामय भी होगा। 

Monika Jain ‘पंछी’

September 17, 2016

Essay on Self Dependence vs Development in Hindi

विकास बनाम आत्मनिर्भरता

कुछ दिन पहले दो दिन तक शहर में नेट और मोबाइल सेवा ठप्प रही।...कारण था एक उधार लेने वाले ने उधार न चुकाने की मंशा के चलते उधार देने वाले की हत्या कर दी और उसके घर को भी लूट लिया। खैर! इस ख़बर की ओर ध्यान दिलाना मेरा उद्देश्य नहीं था। ऐसी ख़बरे तो आप रोज ही अख़बारों में पढ़ते हैं, टीवी पर देखते हैं। लेकिन हाँ, इन घटनाओं का कारण जरुर इस पोस्ट में मिल जाएगा।...तो मैं बात कर रही थी दो दिनों तक नेट और मोबाइल सेवा ठप्प होने की। कैसा महसूस होता है जब अचानक से इन्टरनेट या कॉल की सुविधा बंद हो जाती है? कैसा लगता है जब पूरे दिन बिजली नहीं आती? कैसा लगता है जब अचानक से यातायात के साधन किसी हड़ताल या अन्य किसी कारण से बंद हो जाए? कैसा लगता है जब धार्मिक उन्मादों के चलते शहर, मार्केट, कहीं भी आना-जाना सब बंद हो जाता है? कैसा लगता है जब किसी दिन घर का फ्रिज, पंखा, मिक्सर या कोई भी जरुरी मशीन काम करना बंद कर दे और कुछ दिनों तक कोई ठीक करने वाला उपलब्ध न हो? कैसा लगता है जब पूरी तरह से नौकरों पर निर्भर मालिक के यहाँ कुछ दिन नौकर न आये? और भी ऐसे कई सारे सवाल बनाये जा सकते हैं। हर एक सवाल का ज़वाब कई लोगों के लिए कुछ बेचैनी, परेशानी, किसी जरुरी काम का रुक जाना, पैसों का नुकसान, समय का नुकसान, चिड़चिड़ापन, घबराहट, चिंता, तनाव और ऐसी ही कई चीजें होंगी।

मेरा अगला सवाल यह कि विकास, तरक्की और आगे बढ़ने के आपके लिए क्या मायने हैं? अधिकांश लोगों का जवाब होगा वैज्ञानिक-तकनीकी उन्नति, सुख-सुविधा युक्त साधनों का बढ़ना, समय और मेहनत बचाने वाली मशीनों का आना, एक बटन दबाते ही सब कुछ हो जाए...ऐसा ही कुछ...है न? पर वाकई क्या विकास की यह परिभाषा सही है? विकास का आशय मैं लेती हूँ आत्मनिर्भरता का बढ़ते जाना। इस आत्मनिर्भरता का आशय सिर्फ आर्थिक आत्मनिर्भरता जितना संकुचित मत करना। उससे कई अधिक विस्तृत अर्थ है इस शब्द का...जिसकी अंतिम सीमा वहां तक पहुँचती है जहाँ पर आत्म के सिवा और कुछ भी शेष नहीं रह जाता। किसी चीज पर कोई निर्भरता नहीं। पूर्ण स्वतंत्रता...पूर्ण मुक्ति की स्थिति।

खैर! यह शीर्ष की बात है। हम फिर से पीछे लौटते हैं। ऊपर जिस तरक्की की मैंने बात की और जिसे आप विकास बताएँगे वहां आत्मनिर्भरता का हश्र कैसा है यह सोचने और समझने वाली बात है। जहाँ एक दिन भी अगर इन्टरनेट उपलब्ध न हो तो त्राहि-त्राहि मच जाती है। यातायात सेवा ठप्प हो जाए, फ़ोन घुम हो जाए, शहर बंद हो जाए, बिजली चली जाए तो इंसान बौखला जाता है। हमारा तथाकथित विकास हमें इस कदर अन्य लोगों और वस्तुओं पर निर्भर बनाता जा रहा है कि हम साधनों को साध्य समझ बैठे हैं। ऐसे में अध्यात्म का जीवन में समावेश इसलिए भी जरुरी है क्योंकि यह अंधाधुंध विकास की दौड़ में थोड़ा ठहरकर हमें वास्तविक अर्थों में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में ले जाता है। कहते हैं कि भगवान् महावीर की आत्मनिर्भरता ऐसी थी कि उन्हें भोजन करने की जरुरत नहीं होती थी...तब भी उनका शरीर बलिष्ठ था। शरीर से अद्भुत कांति चारों ओर बिखरी रहती थी...वस्त्रों की उन्हें जरुरत नहीं थी...महलों की उन्हें जरुरत नहीं थी। आत्मनिर्भरता के असल मायने तो यही हैं जहाँ बाहरी साधनों पर निर्भरता और आसक्ति घटती ही जाए। ऐसी आत्मनिर्भरता तक हम पहुचं जाएँ तब तो कितनी समस्यायों का समाधान हो जाएगा। भले ही हम आवश्यकता और समय की मांग के अनुरूप कुछ साधनों का प्रयोग करें लेकिन वे हमारे लिए जीवन और मरण का प्रश्न तो नहीं बनेंगे।

अब सोचने वाली बात यह है कि महज तकनीकी सुविधाओं के विकास के द्वारा हम कितने आत्मनिर्भर और विकसित बन रहे हैं? इस पोस्ट द्वारा मैं तकनीकी विकास का विरोध नहीं कर रही...यह पोस्ट भी आप तक तकनीकी सुविधा के उपयोग के जरिये ही पहुँच रही है। लेकिन विकास के नाम पर जो अति हो रही है उसके बारे में चिंतन हेतु मैं कुछ तर्क दे रही हूँ। वह अति विकास क्या काम का जो प्रकृति से नीचे गिराकर फिर से हमें प्रकृति की ओर लौटने को मजबूर करे? हम कब तक पहले आग लगाकर फिर कुआँ खोदने का उपक्रम करते रहेंगे? कब तक? बेहतर होता विषमता की खाईयों को बढ़ाते जाने की बजाय हम संतुलित बाह्य विकास और आत्म विकास की ओर ध्यान देते। बेहतर होता विज्ञान का उपयोग जगत और जीवन के रहस्यों की खोज में मुख्य रूप से होता। केवल सुविधा के साधन जुटाते जाने वाला विज्ञान विकास नहीं विनाश का पर्याय लगता है। क्योंकि जितनी अधिक हमारी दूसरों पर निर्भरता होगी, उतने ही हम गुलाम और उतनी ही हमारे जीवन की चाबी किसी और के हाथों में होगी...फिर चाहे हम वस्तुओं के गुलाम बनें या फिर व्यक्तियों के।

Monika Jain ‘पंछी’
(17/09/2016)

September 6, 2016

Michhami Dukkadam Kshamavani Message in Hindi

जैन क्षमावाणी पर्व : मिच्छामी दुक्कड़म

हर दिवस विशेष पर यह बात सुनने को मिलती ही है कि वर्ष में सिर्फ एक ही बार क्यों? बात सही भी है कि वर्ष में सिर्फ एक ही दिन क्यों? तो सबसे पहले तो हमसे किसने और कब मना किया कि हम किसी चीज को वर्ष में सिर्फ एक ही बार अहमियत दें? किसी ने किया क्या? चलो हम वर्ष में सिर्फ एक दिन मनाना भी छोड़ देते हैं। लेकिन क्या सिर्फ उससे हम वर्ष में बाकी सब दिन वह मानने लगेंगे। बल्कि मुझे तो यह लगता है कि ये सब दिवस हमारी भागदौड़ वाली जीवन शैली की ही देन है कि जिन चीजों को रोजमर्रा की ज़िन्दगी में अहमियत मिलनी चाहिए थी...कम से कम उन्हें हम साल में एक बार तो याद कर लें।

एक दृष्टान्त देती हूँ : एक ही परिवार के दो सदस्य थे। दोनों में किसी विवाद के बाद से 8-10 वर्षों तक अनबोला रहा। दोनों कभी परिवार में साथ-साथ होते तब भी अजनबियों की तरह होते थे। मन में एक तरह का तनाव या खिंचाव रहता ही होगा। अहम् बड़ा था इसलिए किसी ने बात करने की शुरुआत भी नहीं की। फिर एक दिन क्षमापना दिवस के दिन परिवार के बाकी सदस्यों को बात करते देख उनमें से एक ने किसकी गलती थी और किसकी नहीं इस बात को पूरी तरह से नजरंदाज कर क्षमा मांग ली...और फिर सब कुछ पहले की तरह से नार्मल हो गया। उसके बाद कभी बात बंद होने की स्थिति नहीं आई।

तो इस तरह से कोई दिन विशेष प्रेरणा का काम भी कर सकता है। बल्कि इन दिवसों का वास्तविक उद्देश्य भी यही है कि ये हमारे लिए प्रेरक बनें। तो जब कोई क्षमावाणी जैसे पर्व पर भी व्यंग्य करता हुआ या उसका विरोध करता हुआ दिखाई देता है तो यह नकारात्मकता की अति लगती है। यह मैं इसलिए नहीं कह रही क्योंकि मेरे नाम के साथ ‘जैन’ का टैग लगा है। यह मैं इसलिए कह रही हूँ क्योंकि यह कहना जरुरी है। बाकी न ही ‘जैन’ शब्द पर और न ही ‘क्षमा’ शब्द पर किसी का भी एकाधिकार है। ‘क्षमा’ का अर्थ तो सभी जानते ही हैं बाकी ‘जैन’ शब्द भी ‘जिन’ शब्द से बना है। ‘जिन’ का अर्थ होता है जिसने ‘राग’ और ‘द्वेष’ को जीत लिया हो...और इस नाते जैन वे सब होंगे जो इस मार्ग के अनुयायी होंगे। खैर! किसी को जैन कहलवाना न कहलवाना मेरा उद्देश्य नहीं है। मुझे तो खुद ही ख़याल नहीं रहता कि सिर्फ किसी शब्द के जुड़ जाने से मैं किसी से अलग भी हो सकती हूँ। पर हाँ, अगर इस क्षमा पर्व के सम्बन्ध में कोई चीज है जो प्रकृति को, लोगों को, प्राणियों आदि को नुकसान पहुँचा रही हो तो मैं खुद आपके साथ उसका विरोध करुँगी। लेकिन कृपया विरोध करने के लिए विरोध या व्यंग्य करना बंद कीजिये। यह अच्छा नहीं है।

खैर! आज यह सब बातें करने का समय नहीं है। जब भी लगता है गलती की है, तो क्षमा मांगने का ख़याल रहता है। लेकिन आज विशेष दिन है :

तो सबसे पहले उन मित्रों से क्षमा जो फेसबुक के शुरूआती दिनों में बने थे। कुछ स्कूल जाने वाले बच्चे थे। एक बार किसी ने कहा था, ‘मोनिका दी, आप बहुत बदल गयी हो। पता नहीं क्या-क्या लिखती हो। हमें पहले वाली मोनिका दी चाहिए।‘ :) बदलाव तो खैर प्रकृति का नियम है। मैं इससे अछूती कैसे हो सकती हूँ? पहले जैसी रहूँ न रहूँ, संपर्क रहे न रहे। लेकिन मन में स्नेह और दुआएं हमेशा रहेंगी। बचपन, स्कूल और कॉलेज के मित्रों की भी यही शिकायत होगी। अत: उनसे भी अंतर्मन से क्षमा याचना।

क्षमा उन सभी मित्रों से जो जीवन और फेसबुक की यात्रा के दौरान अमित्र हुए। ऐसे लोग नगण्य हैं। लेकिन उनसे बस इतना कहना है कि कभी-कभी दूर होना शायद दोनों के ही हित में होता है। समय के गर्भ में क्या है पता नहीं...लेकिन मन में किसी के लिए भी किसी तरह का द्वेष न रहे इसका पूरा प्रयास रहेगा।

क्षमा उन सभी मित्रों से जिन्हें मेरी किसी भी बात, पोस्ट, कमेंट, व्यवहार आदि ने आहत किया। भावनाओं के प्रवाह में कभी-कभी ऐसी गलतियाँ हो जाती है जो सामने वाले को आहत कर जाती है। इसके अलावा मतों में भिन्नता को भी दिल पर ले जाते हैं हम लोग। मतभेद मिटे न मिटे, लेकिन मनभेद न रहे इसका पूरा प्रयास रहेगा।

क्षमा उन सभी मित्रों से जिन्होंने कभी कोई सन्देश भेजा हो और उसका जवाब मैंने न दिया हो। मेरा दिल निश्चय ही इतना बड़ा नहीं कि मैं हर या किसी भी तरह के सन्देश का जवाब दे सकती हूँ। लेकिन उपेक्षा आहत करती है और इसके लिए क्षमा याचना।

क्षमा उन मित्रों से जिनसे मैंने अनावश्यक अपेक्षाएं की हों और उन्हें बुरा लगा हो। अपेक्षाओं से पूर्ण मुक्ति बहुत मुश्किल है। इसलिए अभी आपसे क्षमा की अपेक्षा है। :)

क्षमा सृष्टि के हर जीव से, अजीव से...जिनसे भी मैंने जाने-अनजाने में, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष किसी भी रूप से राग या द्वेष का सम्बन्ध बनाया हो। यह क्षमा राग व द्वेष को जीतकर विशुद्ध प्रेम के प्रकट होने में हमारी मदद करे इसी मंगल कामना के साथ क्षमत-क्षमापना। मिच्छामी दुक्कड़म्! :)

Monika Jain ‘पंछी’
(06/09/2016)

August 31, 2016

Essay on Gautam Buddha in Hindi

बुद्ध - सच्चे अर्थों में स्वार्थी

कभी-कभी लगता है लोगों को अंगुलिमाल उतना बेचैन नहीं करता जितना कि बुद्ध करते हैं। उनकी समस्या अंगुलिमाल की हिंसा नहीं बुद्ध की अहिंसा बन जाती है। :)...तब जबकि वे खुद कभी अंगुलिमाल को नहीं बदल पाए। अंगुलिमाल को कैद किया जा सकता है...कठोर दंड दिया जा सकता है। जरुरी है तो होना भी चाहिए। लेकिन यह ख़याल रहे कि अंगुलिमाल बुद्ध के प्रभाव में ही बदलते हैं। बहरहाल तो इस युग में अंगुलिमाल जैसे बदलने वाले भी कम ही मिलेंगे। गुरु और शिष्य दोनों के ही उत्कृष्ट स्तर का उदाहरण है यह। लेकिन अगर दोषी को छोड़कर हमारी आलोचना का केंद्र निर्दोष बनते हैं तो थोड़ा ठहरकर सोचने की जरुरत है कि दोषिता से निर्दोषिता के बीच हम कहाँ खड़े हैं? बहुत संभावना है कि हम दोषिता के निकट हों। क्षणिक और स्थायी, समाधान दोनों ही जरुरी होते हैं, लेकिन उनके अंतर को हमें समझना होगा। समस्या के कारण (अज्ञान) को समझना होगा। समस्या के समाधान (ज्ञान) को समझना होगा और समाधान के मार्ग (सजगता) को भी समझना होगा।

प्रश्न : लोगों के बारे में तो कहा नहीं जा सकता लेकिन अपनी बात अगर करूँ तो ज़रूर किसी सो कॉल्ड बुद्ध से मिलना, उसे देखना चाहूंगी। जनता ने अपने आस-पास अंगुलिमाल तो एक्ससेस में देखे सुने हैं, निर्भया वाले, अभी हरियाणा में भी एक...सब अंगुलिमाल ही तो थे। बुद्ध ने अपने समय में कितने अंगुलिमाल सुधार दिए, इसकी सच्चाई पर तो बस अंदाज़े ही लगाए जा सकते हैं। आज के समय में कोई बुद्ध हों, तो उनकी ज़रूरत सच में पड़ेगी। इस से बुद्धत्व की डोक्ट्रिन भी टेस्ट हो जाएगी कि बुद्धत्व कितना ओवररेटेड है, और कितना अंडररेटेड।

उत्तर : बुद्ध और अंगुलिमाल प्रतीक हैं जिनके माध्यम से यह पोस्ट समस्त दुनिया में और किसी व्यक्ति विशेष में ही व्याप्त सत्व और तम की ओर इशारा करती है। फांसी, कैद या जितने भी अन्य उपाय हैं वह समाज की तात्कालिक आवश्यकताओं के अनरूप उचित हो सकते हैं। फौरी तौर पर एक संतुलन बना रहे इसके लिए जरुरी हो सकते हैं। ये एक भय जरुर पैदा कर सकते हैं, लेकिन क्या ये किसी इंसान का अंतस बदल सकते हैं? क्या गलत से गलत को स्थायी रूप से बदला जा सकता है? इंसान का अंतस तभी बदलेगा जब वह अपने सत्व को पहचानेगा। जब वह अपने अज्ञान से ऊपर उठेगा।...और यह प्रेरणा उसे कहीं से भी मिल सकती है। वह प्रेरक तत्व जो भी होगा वह सत्व ही होगा।

और ऐसे तो आपको ढेरों उदाहरण मिल जायेंगे जहाँ किसी की अच्छाई या व्यक्तित्व से प्रेरित होकर किसी में सुधार आया हो। आप खुद के जीवन में ऐसे उदाहरण खोज सकती हैं। मेरे पास तो ऐसे कई उदाहरण है। रही बात रेटेड की तो हर चीज मूल्य लगाने के लिए नहीं होती। पर लगाना भी हो तो जिस अच्छाई को आप समाज में देखना चाहती हैं क्या उसके चरम को इग्नोर कर सकती हैं? आदर्श तो वही होगा। बाकी दुनिया को सुधार देने की भावना जितनी प्रबल होती है वहां उतना ही अहंकार छिपा होता है। जैसे आतंकवादी भी अपनी ओर से यही कर रहे होते हैं।

जिस क्षण हम खुद बदलते हैं, उस क्षण ही पूरी दुनिया बदलती है। अन्यथा तो हम बस एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने में ही लगे रहते हैं। हम खुद को पूर्ण निर्दोष बनाये बगैर दुनिया को सुधारने की बात करें...यह प्रचलित और जरुरी हो तब भी कहीं गहराई में बहुत अजीब है। क्योंकि जितना भी दोष हममें विद्यमान है उसका ही थोड़ा बड़ा रूप किसी अपराधी में है...और यह जो अजीब वाली फीलिंग है यह भी किसी सिदार्थ को बुद्धत्व की ओर प्रेरित करती है। बाकी तो यह ऊपर ही स्पष्ट है कि समाज की तात्कालिक जरूरतों के अनुरूप कानून और न्याय व्यवस्था होनी ही चाहिए। लेकिन यह अंतिम समाधान नहीं। दोषों का दूर होना स्वयं निर्दोष बन जाने में ही निहित है। हाँ, इससे फैला उजास अवश्य वह परिवर्तन ला सकता है जो क्रांति की अनगिनत मशालें नहीं ला सकती। तो जो लोग यह कहते हैं कि बुद्ध और महावीर स्वार्थी हैं, वे अनजाने में ही सही, बिल्कुल सच कहते हैं। क्योंकि कोई भी व्यक्ति सच्चे अर्थों में 'परमार्थी' बन ही नहीं सकता जब तक वह सच्चे अर्थों में 'स्वार्थी' न बन जाए। :)

Monika Jain ‘पंछी’
(31/08/2016)

August 30, 2016

Quotes on Nonviolence in Hindi

Nonviolence Quotes

  • 15/04/2017 - हिंसा को कानूनी, नैतिक और ऊपर-ऊपर से व्यवस्थित जामा पहनाने को सभ्यता और विकास कहते हैं। इसकी आड़ में बड़ी से बड़ी हिंसा को सुन्दर रूप दिया जा सकता है।
  • 30/08/2016 - जब महावीर से पूछा गया, 'आप दुनिया को कैसी बनाना चाहते हैं?’ तो उन्होंने कहा, ‘जैसी यह है।' अहिंसा का चरम है यह। जहाँ पूर्ण स्वीकार होता है। जहाँ व्यक्ति अकर्ता बन जाता है। जहाँ अहंकार खत्म हो जाता है। अकर्ता के कर्म निश्चय ही दुनिया की भलाई के लिए ही होंगे लेकिन साथ ही उन्हें सब कुछ स्वीकार भी होगा। उनका किसी से कोई बैर नहीं होगा। 
  • अहिंसा से बड़ा और विस्तृत कोई धर्म, कोई दर्शन, कोई वाद अभी तक नजर नहीं आता, बशर्ते अहिंसा को उसके सही अर्थों में समझा जाए। मानवता (जिस आशय में कई लोग समझते हैं) उसके सामने एक संकीर्ण विचारधारा है। अहिंसा का विशुद्ध पालन भले ही असंभव के निकट है, लेकिन विशुद्ध से पहले भी बहुत कुछ आता है।
  • जब कोई किसी को शारीरिक चोट पहुँचाता है तो वह साफ़-साफ़ नज़र आ जाती है पर मानसिक चोट? मानसिक शोषण, हत्या और बलात्कार को नापने का तो कोई पैमाना ही नहीं। कोई किसी का खून कर दे और कोई किसी को हमेशा के लिए घुट-घुटकर जीने को मजबूर कर दे...दोनों में कितना भर अंतर होगा? हत्या सिर्फ शरीर की ही नहीं होती...हत्या होती है खुशियों की, अरमानों की, सपनों की, उम्मीदों की, अहसासों और भावनाओं की भी। इन हत्यारों की सजा? अपराध जो दिखाई नहीं देते...क्या अपराध नहीं होते?
  • कुछ दिन पहले किसी अथीति के स्वागत और मनोरंजन के लिए एक कबूतर को रॉकेट के साथ बांधकर उड़ाया गया। हवा में ही कबूतर के चिथड़े उड़ गए। कबूतर से भोला और शांत पक्षी तो ढूंढे नहीं मिलेगा। कई बार बहुत करीब से कबूतर, चिड़िया, चींटी आदि को मरते देखा है। हर बार यही पाया कि मृत्यु की पीड़ा और जीने की इच्छा प्रजातियों में विभेद नहीं करती। मनुष्य जरुर अपने प्रयासों से इस पीड़ा से ऊपर उठ सकता है, और सिर्फ उसी दिन मनुष्य अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ सिद्ध होता है। बाकी एक मनुष्य और पशु में क्या अंतर है? विकास के नाम पर हम कितनी भी ऊंची इमारते बना लें, समूचे विश्व को डिजिटल कर दें लेकिन ये सब करके हम किसी पे कोई अहसान तो नहीं कर रहे। हाँ, प्रकृति का दोहन और अन्य प्राणियों से उनके अधिकार जरुर छीन रहे हैं। एक जानवर सिर्फ हमारे मनोरंजन या धर्म की भेंट चढ़ जाए यह स्वीकार्य नहीं है। जैसी संवेदनाएं हम इंसानों में होती है वैसी ही कम-ज्यादा इन पशु पक्षियों में भी होती है। जिस तरह हमारी जिजीविषा है वैसी ही इन जीवों की भी। जैसा दर्द हमें होता है, वैसा ही इन्हें भी होता है। और जिस दिन हम इतना सा समझ जाएँ उस दिन अहिंसा धीरे-धीरे स्वत: ही जीवन में उतरने लगेगी, उसके लिए फिर अलग से प्रयास की जरुरत नहीं रहेगी। 
  • कुछ बच्चे और कुछ बड़े भी कई बार इसी फिराक में रहते हैं कि कब कोई नन्हा कीड़ा-मकोड़ा दिखे और कब उस पर अपना हाथ साफ़ करें। और तो और मारकर ऐसे ख़ुश होते हैं जैसे किसी शेर-चीते को फतह कर आये हों। लेकिन जब वास्तव में शेर या चीता सामने आएगा तो ऐसी घिग्गी बंधेगी कि मुंह से आवाज़ भी नहीं निकलने वाली। तो हिंसा सामान्यत: हमारी कायरता/भय ही है और अहिंसा वीरता…जिसका जन्म सिर्फ निर्भयता से ही हो सकता है। सिर्फ निर्भय ही अभय दे सकता है।

Monika Jain ‘पंछी’

August 29, 2016

Essay on Theory of Relativity in Hindi

सापेक्षता का सिद्धांत

साइंस स्ट्रीम नहीं रहा आगे तो आइंस्टीन का सापेक्षता का सिद्धांत तो कभी पढ़ना और समझना नहीं हुआ डिटेल में। हालाँकि कभी पढ़ना और अच्छे से समझना चाहूंगी। लेकिन जिस सापेक्षता को मन काफी समय से सूक्ष्म रूप से समझ रहा है वहां एक ही समय में दो विरोधाभासी कथनों से भी बिल्कुल सहमत हुआ जा सकता है।

जैसे : मृत्यु एक शाश्वत सच है और मृत्यु एक शाश्वत झूठ भी है।
जैसे : सरल होना सबसे जटिल है और सरल होना ही सबसे सरल है।
जैसे : पूर्ण स्वीकार का क्षण ही पूर्ण निस्तार का क्षण बनता है।
जैसे : सबसे मैत्री (करुणा) किसी से मैत्री (मोह) नहीं होती।
जैसे : धर्म (तथाकथित) संहारक है और धर्म (विशुद्ध) ही संरक्षक है। और संरक्षक वाला धर्म राजनीति क्या दुनिया की हर एक नीति को सकारात्मक दिशा में लाने के लिए जरुरी है।

तो कहना बस ये था कि आप सापेक्षता को समझिये, भाषा की सीमाओं को समझिये, शब्दों के अलग-अलग सन्दर्भों में अर्थ को समझिये...फिर आधे से अधिक विवाद तो पल भर में खत्म हो जायेंगे।

कुछ भी लिखा हुआ सामान्यीकरण नहीं होता, सापेक्ष ही होता है। कितनी भी सावधानी बरत लो तब भी पूर्ण सत्य कभी लिखा/कहा या सोचा जा ही नहीं सकता। एक ही बिंदु को देखने के अनन्त कोण होते हैं। इसलिए किसी भी समय शब्दों के रूप में हमारे मन, वचन या लेखन में आया कोई भी विचार एक ही समय में सत्य और असत्य दोनों ही सिद्ध हो जाता है। सारे पॉइंट ऑफ़ व्यूज से मैं जब भी अपने लिखे को जांचने की कोशिश करती हूँ तो उसे असत्य ही पाती हूँ। इसलिए कभी-कभी लिखते-लिखते रुक जाती हूँ और कभी-कभी लिखकर मिटा देती हूँ।...और भीतर कहीं गहराई में मैं सब कुछ की तरह ही लिखना भी छोड़ना चाहती हूँ। यह कोई पलायन नहीं...यह विरोधाभास और द्वन्द्वों जनित इस समस्त जीवन से मुक्ति की ही तड़प होती है जो दुनिया के हर एक प्राणी के भीतर दबी रहती है। मुख्य रूप से कर्मयोग का सिद्धांत समाधान रूप में यही से निकलता है। बाकी बात बस इतनी सी है कि सापेक्षता के दृष्टिकोण से सभी का लिखने का तरीका यही रहेगा। जरुरत बस समझ और जागरूकता के बढ़ाने की है तब आवश्यक क्या है और अनावश्यक क्या है यह अपने आप स्पष्ट होता जाएगा।

प्रश्न : ‘लिखना भी छोड़ना चाहती हूँ, सब कुछ की तरह।’ कर्मयोग का सिद्धांत यहाँ से कैसे निकलता है?

उत्तर : समाधान रूप में कई तरीके बताये गए हैं जैसे ज्ञान योग, भक्ति योग, क्रिया योग, कर्मयोग ...हालांकि ये विभाजन सुविधा के लिए हैं। ओवरलैप करता है बहुत कुछ। इसमें से कर्मयोग निष्काम कर्म के बारे में कहता है। हर किसी के लिए सन्यास संभव नहीं, यह व्यवहारिक भी नहीं...ऐसे में जागरूक होकर कर्म करें, परिणाम में आसक्ति यथासंभव न रखें। हम सचेत रहें तो अनावश्यक कर्म वैसे भी छूट ही जायेंगे।

प्रश्न : आपने बहुत अच्छा समझाया है। आपका शब्द शिल्प प्रेरणास्पद है। कुछ बातें जोड़ना चाहूंगी। प्रथम तो क्वांटम फीजिक्स से वापिस न्यूटोनियन फिजिक्स पर आते हैं, जहाँ सरफिशियल मूवमेंट के लिए जिस प्रकार घर्षण एक आवश्यक किन्तु विरोधी बल है, मतलब घर्षण नहीं हो तो मूवमेंट नहीं होगा, हालाँकि घर्षण गति की डायरेक्शन के खिलाफ काम करता है। उसी प्रकार यदि किसी लिखे हुए या कहे हुए का उल्टा अर्थ (जो लिखने वाला या कहने वाला भाव देना चाहता है, उसका उल्टा) लोग निकालें तो यह कोई विसंगति नहीं है, सामान्य बात है। क्योंकि यदि लिखे हुए या कहे हुए के अनेक अर्थ न निकलें तो लेखन ही क्या हुआ? भावों को रूपांतरित करने के लिए भाषा का अविष्कार हुआ है। ज़ाहिर है कि घर्षण उसमें भी होगा। नहीं होगा तो फिर भाषा नहीं हमें टेलीपैथी की तकनीक खोजनी होगी।

फिर मौन किसी का समाधान हो सकता हो, इसमें संदेह है। ओशो ने हजारो घण्टे स्पीचेज़ दी है। इसी कोशिश में कि भाषा का जितना अधिक विस्तार कर पाएं उतना बेहतर है, और रिलेटिव ही कहा है। किन्तु अर्थ का अनर्थ न हो, इसलिए भाषा की वृहदता का उपयोग कर अपने भाव को स्पष्ठ करने के पूर्ण प्रयास किए हैं। सप्रेम :)

उत्तर : शुक्रिया। :) कई अर्थ निकलते हैं यह स्वाभाविक है। लेकिन घर्षण को अत्यधिक से कम करते जाना तो हमारे ही हाथ में है। ओशो की बातों के कितने अनर्थ होते हैं इस बारे में आप ध्यान दीजियेगा। ओशो खुद बहुत विवादस्पद रहे हैं। खैर! यह चर्चा का विषय नहीं। लेकिन फ़िलहाल तक मैं जिस निष्कर्ष पर पहुंची हूँ वहां पर मौन अंतिम मंजिल भी लगती है और उस मंजिल तक पहुँचने की जीवन यात्रा में हर समस्या का समाधान भी मौन, ध्यान (थोड़ा विस्तृत अर्थ में है यहाँ) से ही निकलता है। बाकी मैं कितना भी संक्षेप में लिखूं पर लिखते समय अपनी ओर से जितना मेरे लिए संभव है सतर्क रहती हूँ। फायदा किसी को हो न हो यह नहीं पता लेकिन काउंट करने लायक नुकसान नहीं होगा इसकी जिम्मेदारी मैं समझती हूँ। हालाँकि सकारात्मक परिवर्तन सम्बन्धी प्रतिक्रियाएं ही मिली है अब तक ज्यादातर और आगे भी यही कोशिश रहेगी। लेकिन लिखना छोड़ने की चाह या बहुत अधिक चर्चा में न पड़ने की चाह व्यक्तिगत अनुभूतियों से ही निकलती है। जैसे आप अपने जॉब से संतुष्ट नहीं है। ऐसे ही दुनिया में किसी भी कार्य से स्थायी संतुष्टि नहीं मिल सकती। मन जिस स्थायी सुख की खोज में रहता है वह मन के मिट जाने में ही निहित होता है और वही सबसे मुश्किल होता है।

प्रश्न : मन जिस स्थाई सुख की खोज में रहता है वह मन के मिट जाने में ही निहित है, कैसे? और ये सम्भव कैसे हो?

उत्तर : इच्छाएं ही दुःख का कारण है। इसलिए इच्छाओं का अंत ही समाधान। यह कैसे संभव है इस पर तो ढेर सारे महापुरुष लिख गए हैं। कई हमारे स्वयं के अनुभव होते हैं। दूसरों के अनुभव शुरूआती तौर पर सहायक हो सकते हैं, लेकिन वास्तविकता यही है कि कोई भी पहले से लिखे गए नियम आदि समाधान नहीं दे सकते। समाधान हमें खुद ही खोजना पड़ता है और हर व्यक्ति का समाधान उसके अनुरूप अलग होता है। आपने अभी रूचि लेना शुरू किया है। धीरे-धीरे आप महसूस करने लगेंगी यह बात। :)

प्रश्न : ज्यादा समझदार होना, अपने ओथेन्टिकल जीवन से दूर ले जाता है मुझे। जीवन एक यात्रा है...इसका कोई भी उद्देश्य नहीं, मुक्ति की चाहत रखना बेवकूफी है। वैसे 'theory of relativity' को समझ कर बहुत सारी सच्चाइयां समझी जा सकती है। (बाकि ,आपके बातों से सहमत हूँ।)

उत्तर : मुक्ति की चाह कोई इरादतन या कहीं से प्रभावित चाह नहीं होती। यह एक सहज इच्छा है जिसका ही प्रतिबिम्ब है दुनिया की तमाम इच्छाएं। पर हाँ, सभी इच्छाओं की तरह इसका भी मिटना जरुरी है, बिल्कुल इसी वजह से कि जीवन का कोई उद्देश्य नहीं वह सिर्फ जीवन है। उसे बस जीवंत होकर जीना है, और यही मुक्त होना है। बाकी ओथेन्टिकल क्या है और क्या नहीं यह भी विवादस्पद ही है। यह भी व्यक्ति दर व्यक्ति अलग होता जाएगा।

Monika Jain ‘पंछी’
(29/08/2016)

July 11, 2016

Essay on Prayer in Hindi

Essay on Prayer in Hindi
प्रार्थना याचना नहीं अर्पणा है

यूँ तो घर में पूजा-पाठ का रोज-रोज वाला माहौल नहीं है, लेकिन घर या बाहर विशेष अवसरों पर कभी जब गणेश जी, लक्ष्मी जी, हनुमान जी आदि के भजनों, चालीसा, आरती आदि से मुख़ातिब होती थी तो मुझे इनके बोल कुछ अजीब से लगते थे। क्योंकि ज्यादातर ऐसे भजन और आरतियाँ हैं जिनमें अपने स्वार्थों की सिद्धि के लिए देवी-देवताओं को रिश्वत की पेशकश की गयी है। ऐसा लगता है जैसे बस अपने मतलब के लिए चापलूसी की जा रही हो। गुणों को बढ़ा-चढ़ा कर बताया जा रहा हो। देवी या देवता विशेष को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध किया जा रहा है और बाकी सबको हीन। सारे जगत के देवी-देवताओं को पूजने वाले भक्त हनुमान जी को यह कहकर पागल बनाते हैं - और देवता चित्त ना धरई, हनुमत सेई सर्व सुख करई। एक बात समझ नहीं आती - हनुमान जी ऐसे तो नहीं होने चाहिए कि उन्हें दूसरों की पूजा करने से कोई आपत्ति हो। कई सारी पूजा-पाठ व व्रत पद्दतियां ऐसी हैं कि जिनमें कोई चूक हो जाने पर अनिष्ट का भय भी दिखाया गया है। ईश्वर ऐसे भी नहीं हो सकते कि वे हमें भयभीत करें।

आज आरती और चालीसा की एक किताब हाथ में आई। खोलकर पढ़ने लगी। कुछ पंक्तियाँ यहाँ उद्धृत कर रही हूँ :

बालाजी को ख़ुश करने के लिए :

तिहारे सिर पै मुकुट बिराजे, कानों में कुंडल साजै
गले बिराजै अनुपम हार, अनोखी तिहारी झांकी।
तिहारे नैन सुरमा साजै, माथे पै तिलक विराजै
मुख में नागर पान लगा है, अनोखी तिहारी झांकी।।

वैष्णो देवी को ख़ुश करने के लिए :

सुन मेरी देवी पर्वतवासिनी कोई तेरा पार न पाया।
पान, सुपारी, ध्वजा, नारियल ले तेरी भेंट चढ़ाया।।
सुवा चोली तेरे अंग विराजै केसर तिलक लगाया।
ब्रह्मा वेद पढ़े तेरे द्वारे, शंकर ध्यान लगाया।।

माँ संतोषी को ख़ुश करने के लिए :

जय संतोषी माता, जय संतोषी माता
अपने सेवक जन की सुख संपत्ति दाता।
सुन्दर चीर सुनहरी माँ धारण कीन्हों
हीरा, पन्ना दमके तन सिंगार लीन्हों।
गेरू लाल छटा छवि बदन कमल सोहे,
मंद हंसत कल्याणी त्रिभुवन मन मोहे।
भक्ति भाव माय पूजा अंगीकृत कीजै
जो मन बसै हमारे इच्छा फल दीजै।

दुर्गा चालीसा में :

कर में खप्पर खड्ग विराजै। जाको देख काल डर भाजै।।
सोहै अस्त्र और त्रिशूला। जाते उठत शत्रु हिय शूला।।
आशा तृष्णा निपट सतावै। मोह मदादिक सब विनशावें।।
शत्रु नाश कीजै महारानी। सुमिरो इक चित्त तुम्हें भवानी
दुर्गा चालीसा जो नर गावै। सब सुख भोग परम पद पावै।।

‘ॐ जय जगदीश हरे’ आरती में :

जो ध्याये, फल पावे, दुःख बिनसे मन का
सुख-संपत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे
विषय विकार मिटाओं, पाप हरो देवा ।

‘आरती श्री शिवजी की’ में :

त्रिगुण शिव की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी मनवांछित फल पावे।।

ऊपर वर्णित विविध आरती और प्रार्थनाओं पर दृष्टि डालने पर कई सारे विरोधाभास और हास्याद्पद बातें झलक रही हैं, जिनमें से एक यह है कि एक और तो हम ईश्वर को इसलिए पसंद करते हैं क्योंकि वह मोह-माया, राग-द्वेष आदि से मुक्त है। दूसरी ओर हम उसकी पूजा इसलिए करते हैं क्योंकि हम उनसे अपने लिए सारे भोग, सुख और संपन्नता चाहते हैं। यहाँ कुछ लोग कहेंगे कि ईश्वर अलग है, वह निर्गुण है। देवी-देवता अलग होते हैं। उनकी पूजा मनवांछित फल पाने के लिए की जाती है और वे राग-द्वेष आदि से मुक्त नहीं होते। यह सत्य हो सकता है। लेकिन तब प्रश्न यह उठता है कि अपने उचित-अनुचित सभी स्वार्थों की सिद्धि के लिए प्रार्थना को हम धर्म या भक्ति का नाम कैसे देते हैं?

धन, संपत्ति, सुख, वैभव कोई भी कामना गलत नहीं कही जा सकती है। किन्तु ये सब अहंकार को मजबूत करने वाले साधन है। अहंकार को बढ़ाने वाले साधनों को आध्यात्म, धर्म या प्रार्थना के साथ जोड़ना उचित नहीं लगता। भौतिक जगत के सुखों की भिक्षा मांगने को प्रार्थना कह देना और खुद को धार्मिक समझ लेना कुछ अजीब सा है। इसी तर्ज पर आज धर्म व्यापार बन बैठा है।

बचपन में स्कूल में सप्ताह के हर दिन अलग प्रार्थना गायी जाती थी। तब मुझे एक प्रार्थना का बेसब्री से इंतजार रहता था - इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का विश्वास कमजोर हो न...हम चले नेक रस्ते पे हमसे, भूलकर भी कोई भूल हो न। सारी प्रार्थनाओं में बस एक यही मुझे सबसे अच्छी लगती थी...और सारे मन्त्रों में से ’नवकार मन्त्र’ जिसमें केवल गुणों को पूजा गया है, किसी भी नाम को नहीं, ताकि वे गुण हमारे भीतर उतर सके और हम निर्गुण स्वरुप को प्राप्त हो सके। हालाँकि कोई प्रार्थना विशेष मेरी दिनचर्या का अंग नहीं है लेकिन आज भी कभी किसी मंदिर में जाना होता है या मूर्ति के समक्ष हाथ जोड़ती हूँ तो कुछ भी मांग नहीं पाती। कभी बहुत ही ज्यादा परेशान हो जाऊं तो अलग है लेकिन अक्सर अपनी तकलीफों और संघर्ष को दूर करने के लिए भी कोई अर्जी भगवान को नहीं भेजती। ईश्वर के सामने जाकर कुछ माँगना ऐसा ही है जैसे हम ईश्वर को निर्देश दे रहे हैं या सिखा रहे हैं कि उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं। खैर! ऐसी कई प्रार्थनाएं और मन्त्र और भी हैं जिनमें निहित भावों को ईश्वर की सच्ची प्रार्थना की श्रेणी में रखा जा सकता है। जहाँ हम खुद को पूर्ण समर्पित कर स्वयं वही बन जाना चाहते हैं जिसकी हम पूजा करते हैं।

भक्तियोग भी वही मार्ग है। यहाँ मीरा, सूरदास, रसखान आदि द्वारा अपने आराध्य की लीलाओं या रूप छवि के वर्णन की आलोचना मैं नहीं कर रही क्योंकि वह आध्यात्म का एक अलग मार्ग है जहाँ आप हर जगह अपने इष्ट को ही देखने लगते हैं। और हर हाल में इष्ट का स्थान आपसे महत्वपूर्ण होता है। साकार भक्ति का यह रूप पूर्ण समर्पण है जहाँ भक्त अपने भगवान के साथ एकाकार हो जाना चाहता है। प्रार्थना वास्तव में मिटने की आकांक्षा ही हो सकती है, अहम् को मजबूत करने की नहीं। प्रार्थना में भोग की कामनाएं या इच्छाएं नहीं हो सकती। लड्डू, पेड़े आदि की घूस नहीं हो सकती। चापलूसी नहीं हो सकती।

मंदिर, मस्जिद, पूजा-पाठ की विविध सामग्रियां, आसन, मन्त्र, दिशा ये सब प्रारम्भिक साधन या पद्दतियां हो सकती है ताकि प्रार्थना हमारी जीवन चर्या में शामिल हो जाए। साथ ही इन सबका अपना-अपना विज्ञान है। लेकिन वास्तव में प्रार्थना के लिए इन सबका होना जरुरी नहीं है। ज्यों-ज्यों अहंकार का विसर्जन होता जाता है त्यों-त्यों हर पल प्रार्थना बनता जाता है।

लेकिन हम अगर अपने इष्ट को सिर्फ अपनी इच्छाओं को पूरा करने, तकलीफों को दूर करने, मोटर, गाड़ी, बंगला दिला देने के लिए ही याद करते हैं तो प्रार्थना का यह स्तर अच्छा नहीं है। प्रार्थना एक ऐसा गुण है जिसमें भक्त को स्वर्ग, सुख-संपत्ति किसी की कामना नहीं होती, वह बस अपने आराध्य में लीन हो जाना चाहता है...और मिट जाना या विसर्जित हो जाना कोई आकांक्षा नहीं होती, यह तो सभी आकांक्षाओं का खत्म होना है। संक्षेप में...प्रार्थना याचना नहीं अर्पणा है, स्वयं की अर्पणा।

Monika Jain ‘पंछी’
(11/07/2016)

July 6, 2016

Selfish People (Selfishness) Quotes in Hindi

Selfish People (Selfishness) Quotes

  • 20/01/2017 - जो स्वार्थ के सच्चे अर्थ तक पहुँचा, समझो वह परमार्थ को पहुँच गया। क्योंकि स्व और पर तो कभी जुदा थे ही नहीं।
  • 06/07/2016 - कुछ लोग मुझसे प्यार करने लगते हैं...'जैसी मैं हूँ उसके लिए।' फिर वे मुझसे नाराज हो जाते हैं...क्योंकि मैं उनकी अपेक्षाओं जैसी नहीं।
  • 29/09/2015 - मैं ये करूँगा तो मुझे पाप मिलेगा, मैं ये करूँगा तो मुझे पुण्य मिलेगा। ऐसी गणित, ऐसी कैलकुलेशन, ऐसे भाव धर्म नहीं है। यह कोरी सौदेबाजी है। हम स्वर्ग के सपने देखते हैं, 72 हूरों के सपने देखते हैं, प्रतिफल मिलने के सपने देखते हैं, नरक से डरते हैं तो हम पक्के सौदेबाज हैं। हम बिल्कुल वही कर रहे हैं जो हर रोज करते हैं। इसमें धर्म कहाँ से आया? धर्म स्वभाव होना चाहिए...और जब धर्म स्वभाव होता है तो धीरे-धीरे हर जगह हमें आत्म अनुभूति, आत्म दर्शन होने लगते हैं। ऐसे में मनुष्य, बेल, बकरी, चींटी, हाथी, घोड़ा, गाय कुछ भी हो हम उन्हें खुद से अलग नहीं देख पाते। इसे समानुभूति कहते हैं या कुछ लोगों की भाषा में सभी में परमात्मा का दर्शन करना यही है। उसमें पाप-पुण्य या प्रतिफल की अवधारणा कहीं नहीं होती। सीधा विशुद्ध रूप तक तो पहुँचा नहीं जा सकता। लेकिन धर्म का रास्ता तो यही है, बाकी सब सौदेबाजी। 
  • लोग पहले खुद अपनी मर्जी से आपको कुछ अलंकार विशेष और पदवियों से विभूषित करेंगे। फिर कुछ उनके मन का न होते ही उन्हीं अलंकारो और पदवियों को आपके द्वारा अपने लिए घोषित हुआ मानकर आपको कटघरे में खड़ा करेंगे। :) संभव है उन अलंकारों को भी कटघरे में खड़ा कर दें।
  • इंसान का बस चले तो अपने लालच और स्वार्थ के लिए पूरी दुनिया ही जला डाले। राख के ढेर पर बैठा वह अपने आप को विजेता समझ सकता है...पर वास्तविकता सिर्फ इतनी है कि वह दुनिया का सबसे कमजोर, सबसे डरपोक और सबसे हारा हुआ आदमी है। 
  • वो उसके गरीबी के दिनों की हमसफ़र थी। फिर जब वह अमीर हो गया तो उसने अमीरी के दिनों की हमसफ़र बना ली। 
  • अपने जीवन में समस्यायों का पहाड़ खड़ा हो फिर भी उन्हें भूलकर दूसरों की समस्याएं धैर्य से सुनने की संवेदनशीलता! अपनी क्षमता के अनुरूप उसके लिए जो किया जा सके वह करने का ज़ज्बा! इसके बाद भी बदले में मिलता है आलोचना, शिकायतें और दोषारोपण! क्षमता अनुरूप सहयोग के लिए हम तत्पर रह सकते हैं, लेकिन बेवजह की नौटंकियों को कब तक स्पेस दे सकते हैं? लोगों की बचकानी परेशानियाँ यह कहाँ जानती हैं कि वास्तव में समस्याएं होती क्या है। अपने स्वार्थ और अपेक्षाओं से भरपूर वे दूसरों की परेशानी कहाँ देख सकते हैं? काश! वे समझ पाते कि कोई अपनी समस्यायों का रोना नहीं रोता तो इसका तात्पर्य यह नहीं होता कि उसके जीवन में समस्याएं नहीं। 
  • जाने कितने उपद्रव शब्दों के उपद्रव हैं, क्योंकि शब्दों की आत्मा तो कभी की खो चुकी है और इन भाव रहित शब्दों को हम अपना अहंकार बना बैठे हैं। कभी ब्राह्मण, जैन, बौद्ध, प्रेम, धर्म, इस्लाम, अहिंसा...जैसे शब्दों के सही अर्थ खोजने निकले तो अहसास होगा कि हम तो इन शब्दों के आसपास भी नहीं फटकते। लेकिन हम जानकर भी अनजान बने रहेंगे, क्योंकि सत्य हमारे स्वार्थ को मुश्किल जान पड़ता है। वरना कैसे कोई किसी के मंदिर प्रवेश को निषिद्ध कर सकता है? कैसे कोई मनुष्य या पशुओं के समूह के समूह को बम और तलवारों का ग्रास बना सकता है? कैसे कोई स्त्रियों से धर्म के नाम पर उनकी आत्मा तक छीन सकता है? जहाँ स्वार्थ होगा वहां हम हिंसा का विरोध करेंगे लेकिन हम अहिंसा के समर्थक नहीं बन सकते। जहाँ स्वार्थ होगा वहां हम असत्य का विरोध करेंगे लेकिन हम सत्य के समर्थक नहीं बन सकते। जहाँ स्वार्थ होगा वहां हम अनैतिकता, अमानवीयता का विरोध करेंगे लेकिन हम मानव नहीं बन सकते। हम सिर्फ चुनाव करते हैं, अपने-अपने स्वार्थों का चुनाव। और चुन लेते हैं उन-उन शब्दों को जो हमारे स्वार्थ को पोषित करे।

Monika Jain ‘पंछी’

July 1, 2016

Jainism (Jain Philosophy) Tattva Gyan (Jiva) in Hindi

Jainism (Jain Philosophy) Tattva Gyan (Jiva) in Hindi
 जैन दर्शन : तत्व परिचय : जीव

पिछली पोस्ट में हमने जैन दर्शन में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को जिन सात तत्वों में बाँटा गया है, उनके बारे में स्थूल रूप से पढ़ा था। इस लेख में हम सात तत्वों में से पहले तत्व ’जीव’ (Living Beings) का विस्तृत अध्ययन करेंगे। जीव अर्थात जिसमें भी चेतना, प्राण या आत्मा है। जैन दर्शन में जीवों की 84 लाख प्रजातियाँ बताई गयी है। सबसे सरल आधार पर जैन दर्शन में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के जीवों को दो भागों में बाँटा गया है।

  • मुक्त आत्मा (सिद्ध जीव / Liberated Soul)
  • अमुक्त आत्मा (संसारी जीव / Non Liberated Soul)

मुक्त जीव : वे आत्माएं जो सभी प्रकार के कार्मिक बंधनों को नष्ट कर जीवन और मृत्यु के चक्र से मुक्त हो चुकी हैं, उन्हें मुक्त जीव कहा जाता है।

अमुक्त जीव : वे आत्माएं जो कर्म बंधन के कारण जीवन और मृत्यु के चक्र में फंसी हुई है, उन्हें अमुक्त जीव कहा जाता है।

अमुक्त या संसारी जीवों को गति के आधार पर दो भागों में बाँटा जा सकता है :

  • स्थावर जीव / अगतिशील (Non Mobile) / 1 इंद्रिय जीव
  • त्रस जीव / गतिशील (Mobile) / 2, 3, 4, 5 इंद्रिय जीव

स्थावर जीव : जीव जो अपनी इच्छा अनुसार एक स्थान से दूसरे स्थान पर भ्रमण नहीं कर सकते, स्थावर जीव कहलाते हैं।

त्रस जीव : जीव जो अपनी इच्छा से एक स्थान से दूसरे स्थान पर गति कर सकते हैं, उन्हें त्रस जीव कहा जाता है।

स्थावर जीव पांच प्रकार के होते हैं :

  • पृथ्वीकाय ( Earth Bodied)
  • अपकाय (Water Bodied) 
  • तेउकाय / अग्निकाय (Fire Bodied) 
  • वायुकाय (Air Bodied) 
  • वनस्पतिकाय (Plant Bodied)

पृथ्वीकाय : पृथ्वी, मिट्टी, धातुएं, खनिज पदार्थ आदि जिनका शरीर होता है, वे पृथ्वीकाय कहलाते हैं। जैसे : मोती, पारा, सोना, चांदी, अभ्रक, फिटकरी, सोडा, मिट्टी, पहाड़ आदि।

अपकाय : जीव जिनका शरीर जल के रूप में होता है, उन्हें अपकाय कहा जाता है। जैसे : कुएं का पानी, तालाब, समुद्र, झील, नदी, कुहासा, ओस, बर्फ, वर्षा का पानी आदि।

तेउकाय : जीव जिनका शरीर अग्नि के रूप में होता है, उन्हें अग्निकाय कहते हैं। जैसे : जलता हुआ कोयला, चिंगारी, ज्योति, बिजली आदि।

वायुकाय : जीव जिनका शरीर हवा होती है, उन्हें वायुकाय कहा जाता है। जैसे : हवा, तूफ़ान, आंधी, चक्रवात आदि।

वनस्पतिकाय : जीव जिनका शरीर वनस्पति के रूप में होता है, उन्हें वनस्पतिकाय कहा जाता है। जैसे : वृक्ष, फूल, फल, लताएँ आदि।

वनस्पतिकाय जीव दो प्रकार के होते हैं :

  • साधारण वनस्पतिकाय
  • प्रत्येक वनस्पतिकाय

साधारण वनस्पतिकाय : जब एक ही शरीर में अनन्त आत्माएं निवास करती है तो उस वनस्पति शरीर को साधारण वनस्पतिकाय या अनंताकाय कहा जाता है। जड़ें या जमीकंद जैसे प्याज, लहसुन, गाजर आदि।

प्रत्येक वनस्पतिकाय : जब एक शरीर में एक ही आत्मा होती है तो ऐसे जीव प्रत्येक वनस्पति काय कहलाते हैं। जैसे : पेड़, पौधे, झाड़ियाँ, फल, फूल, पत्तियाँ आदि।

अमुक्त या संसारी जीवों को इन्द्रियों के आधार पर पांच भागों में बाँटा जा सकता है।

  • एकेंद्रिय (One Sensed)
  • बेइन्द्रिय (Two Sensed) 
  • तेइन्द्रिय (Three Sensed) 
  • चउरिन्द्रिय (Four Sensed) 
  • पंचेन्द्रिय (Five Sensed)

एकेंद्रिय : वे जीव जिनमें सिर्फ एक इन्द्रिय ’स्पर्शन इन्द्रिय’ (Sense of Touch) होती है, एकेंद्रिय जीव कहलाते हैं। इन्हें स्थावर जीव भी कहते हैं।

बेइन्द्रिय : वे जीव जिनमें दो इन्द्रियाँ ‘स्पर्शन’ व ’रसना’ (Sense of Taste) होती है, बेइन्द्रिय जीव कहलाते हैं। जैसे केंचुआ, लट्ट, बैक्टीरिया आदि।

तेइन्द्रिय : वे जीव जिनमें तीन इन्द्रियाँ ‘स्पर्शन’, ‘रसना’, ‘घ्राण’ (Sense of Smelling) होती है, तेइन्द्रिय जीव कहलाते हैं। जैसे दीमक, खटमल, चींटियाँ आदि।

चउरिन्द्रिय : वे जीव जिनमें चार इन्द्रियाँ ‘स्पर्शन’, ‘रसना’, ‘घ्राण’ व ’चक्षु’ (Sense of Sight) होती है, उन्हें चउरिन्द्रिय जीव कहते हैं। जैसे तितली, मच्छर, मक्खी, झींगुर आदि।

पंचेन्द्रिय : वे जीव जिनमें पांच इन्द्रियाँ ‘स्पर्शन’, ‘रसना’, ‘घ्राण’, ‘चक्षु’ व ’कर्ण’ (Sense of Hearing) होती है, पंचेन्द्रिय जीव कहलाते हैं। जैसे : मनुष्य, घोड़ा, गाय, शेर, कबूतर आदि।

पंचेन्द्रिय जीव भी दो प्रकार के होते हैं : 

  • संज्ञी 5 इंद्रिय जीव (Sentient) : जिनमें पांच इन्द्रियों के साथ विकसित मन भी होता है।
  • असंज्ञी 5 इंद्रिय जीव (Non Sentient) : जिनमें पांच इन्द्रियाँ होती है लेकिन विकसित मन नहीं होता है। 

June 29, 2016

Jainism (Jain Philosophy) Tattva Gyan in Hindi

Jainsim (Jain Philosophy) Tattva Gyan Parichay in Hindi
 जैन दर्शन : तत्त्व विवेचना

तत्त्व से आशय वस्तु के वास्तविक स्वरुप या स्वभाव से है। जैन दर्शन में सात तत्त्व माने गए हैं।
  1. जीव (Living Beings or Soul)
  2. अजीव (Non Living Beings)
  3. आस्रव (Influx of Karmas)
  4. बंध (Bondage of Karmas)
  5. संवर (Stoppage of Karmas)
  6. निर्जरा (Destruction of Karmas)
  7. मोक्ष (Salvation or Liberation)
जीव (आत्मा) : आत्मा, चेतना या प्राण को ही जीव कहा जाता है। सुविधा के लिए जगत की प्रत्येक वस्तु जिसमें चेतना या प्राण है उसे हम जीव कहेंगे। जैसे मनुष्य, पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े, पेड़-पौधे आदि। वस्तुत: आत्मा और शरीर दो अलग-अलग तत्त्व हैं। जिसमें आत्मा जीव व शरीर अजीव है। आत्मा का पुनः उत्पादन नहीं होता है। आत्मा को अजर, अमर, अविनाशी व निराकार माना जाता है। मृत्यु के समय सांसारिक आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर नए शरीर को ग्रहण करती है। इस आधार पर जीव दो प्रकार के होते हैं : मुक्त आत्मा (सिद्ध जीव) और अमुक्त आत्मा (संसारी जीव)। संसारी जीवों को पुनः इन्द्रियों के आधार पर ( एकेंद्रिय से पंचेन्द्रिय ) पांच भागों में विभाजित किया जाता है।

अजीव : जीव (आत्मा/चेतना) के अतिरिक्त जो भी जगत में विद्यमान है उसे अजीव कहते हैं। आत्मा के बिना हमारा शरीर भी अजीव ही है। वस्तुएं जैसे कंप्यूटर, टेबल, घड़ी, पेन आदि अजीव के उदाहरण हैं। अजीव पांच प्रकार के होते हैं : पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल।

आस्रव : कर्मों की आमद को आस्रव कहा जाता है। प्राणी के जन्म और मृत्यु के चक्र में भटकने का कारण उसके कर्मों को ही माना जाता है। फिर चाहे वे पूण्य हो या पाप। मन, वचन और काया तीनों ही स्तरों पर कर्मों की आमद होती है। यह आस्रव हर क्षण होता रहता है। आस्रव के दो भेद हैं : भाव आस्रव व द्रव्य आस्रव।

बंध : कर्मों का आत्मा के साथ जुड़ना बंध कहलाता है। जब तक इन कर्मों का फल प्राप्त नहीं होता तब तक ये आत्मा के साथ जुड़े रहते हैं। मुख्य रूप से किसी भी कर्म के साथ राग या द्वेष का भाव ही कर्मों के बंधन का कारण बनते हैं। कर्मों का फल केवल तभी मिलता है जब वे आत्मा के साथ जुड़ते हैं। बंध भी दो प्रकार का होता है : भाव बांध व द्रव्य बंध।

संवर : वह प्रक्रिया जिसके द्वारा नए कर्मों की आमद को रोका जाता है, संवर कहलाती है।

निर्जरा : वह प्रक्रिया जिसके द्वारा आत्मा के साथ बंधे कर्मों को नष्ट किया जाता है, निर्जरा कहलाती है। निर्जरा के दो भेद हैं : साविपाक निर्जरा (सकाम), आविपाक निर्जरा (अकाम)। इसी तरह भाव और द्रव्य निर्जरा भी होती है।

मोक्ष : संवर और निर्जरा द्वारा जब जीव के समस्त आठों कर्मों का क्षय हो जाता है, तब उसकी आत्मा जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाती है, इस अवस्था को मोक्ष कहा जाता है। सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र मिलकर मोक्ष का मार्ग बनाते हैं। इन्हें त्रिरत्न कहा जाता है। मुक्ति आत्मा का श्रेष्ठतम उद्देश्य माना जाता है।

तत्त्वों को हम एक उदाहरण से समझेंगे। एक जहाज है, जो समुद्र में तैर रहा है। जिसमें कई यात्री यात्रा कर रहे हैं। जहाज किसी जगह से क्षतिग्रस्त हो जाता है जिससे समुद्र का पानी उसमें आने लगता है। जहाज के क्षतिग्रस्त हिस्से को ठीक किया जाता है जिससे कि नया पानी न आ सके। जहाज के भीतर भरे पानी को बाहर निकाला जाता है, और जब जहाज में पानी बिल्कुल नहीं रहता तब यात्री समुद्र को पार कर लेंगे।

  • यहाँ पर जहाज अजीव (शरीर) और यात्री जीव (आत्मा) हैं।
  • जहाज में समुद्र के पानी का आना आस्रव (कर्मों का प्रवेश) है। 
  • जहाज में जो पानी भर गया है, वह बंध कहलायेगा। 
  • जहाज के क्षतिग्रस्त हिस्से को ठीक करके पानी के आगमन को रोकना संवर (नए कर्मों की आमद को रोकना) कहलायेगा। 
  • जहाज में भरे पानी को बाहर निकालना निर्जरा (जमा कर्मों का क्षय) कहा जाएगा। 
  • यात्रियों द्वारा समुद्र को पार करना जीवात्मा द्वारा इस संसार सागर को पार कर मुक्त हो जाना मोक्ष कहलायेगा।

सभी तत्त्वों की विस्तृत विवेचना हम आगे पढ़ेंगे।

June 20, 2016

Quotes on Happiness in Hindi

Happiness Quotes

  • 12/03/2017 - कल दिवा के साथ बातों-बातों में हम दोनों को मस्ती चढ़ गयी। उसने कुछ कहा जिसके जवाब में मैंने कहा - आई एम रसगुल्ला, तो उसने कहा - आई एम गुलाबजामुन, और इस तरह से हम दोनों ‘आई एम रस मलाई’, ‘आई एम छिपकली’, ‘आई एम कॉकरोच’, ‘आई एम खिड़की’, ‘आई एम दरवाजा’, ‘आई एम खीरे का रायता’....न जाने कहाँ-कहाँ पहुँच गए। इस आधे घंटे के दौरान दिवा दौड़ते-दौड़ते इतनी हंसी इतनी हंसी कि बता नहीं सकती कि कितनी हंसी। सामान्यत: बच्चों को ख़ुश होने के कितने छोटे-छोटे से कारण चाहिए होते हैं। इसकी वजह है कि उनके अंदर की शांति और आनंद हमसे थोड़ा बेहतर होता है। मन में अभी बाहर का कूड़ा नहीं भरा होता है। आजकल हर किसी विचार या घटना को आध्यात्मिक मायनों से देखने का स्वभाव बन गया है। खुद को छिपकली, बादल, सूरज, चाँद, चींटी, मूंगफली...सब कुछ बनाते हुए अच्छा लग रहा था। याद आ रहा था हर किसी प्राणी का अंतिम लक्ष्य जहाँ किसी भी तरह का कोई भेद शेष रहता ही नहीं। और हम हर जगह, हर किसी में खुद को यानि परम को ही महसूस करते हैं। महावीर और बुद्ध भी याद आये जिनके भीतर का आनंद और शांति इतनी सघन हो जाती है कि फिर उन्हें ख़ुश होने के लिए किसी बाहरी उत्सव या कारण की जरुरत ही नहीं रहती। हम सभी बाहर ख़ुशी ढूढ़ते हैं क्योंकि वह भीतर नहीं होती। जिस दिन भीतर उत्सव मनने लग जाता है बाहरी किसी उत्सव या मनोरंजन की आवश्यकता शेष ही नहीं रहती।
  • 20/06/2016 - ...और फिर मुझे याद आया कि ख़ुश रहना एक निर्णय है। 
  • 10/01/2015 - ईश्वर पर भरोसा हो न हो, मायने नहीं रखता...पर सच्चाई और अच्छाई पर विश्वास कभी न टूटे, यह बेहद जरुरी है। जंग कभी ईश्वर और इस धरती के प्राणियों के बीच रही भी नहीं। जंग तो हमेशा से ही अच्छाई और बुराई, सही और गलत के बीच ही रही है, तो फिर ईश्वर है या नहीं इस बात की चिंता करनी भी क्यों? महत्वपूर्ण सिर्फ इतना है कि हम कौनसा रास्ता चुनते हैं। अच्छाई का रास्ता दर्द, तकलीफों, आलोचनाओं, दुःख और संघर्ष से भरा है, इसमें संदेह नहीं। लेकिन एक सच यह भी है कि इस रास्ते की आग से गुजरते हुए जो व्यक्तित्व निखर कर आएगा वह अतुलनीय होगा। उस स्तर पर जो आत्मिक सुख और संतोष होगा वैसा सुख कहीं और हो ही नहीं सकता। 
  • कई लोगों से बात की है। हमेशा यही देखा है...उच्च से उच्च शिक्षा प्राप्त कर लेने के बाद, बड़े से बड़ा पद पा लेने के बाद भी कोई संतुष्ट या खुश नज़र नहीं आता। कभी मैं भी ऐसी ही थी। अनावश्यक भौतिक वस्तुओं की चाह तो कभी भी नहीं रही लेकिन 100 में से 99 मार्क्स आने पर भी दुःख होता था कि 1 मार्क क्यों कट गया? छोटी-छोटी असफलताएं भी बहुत बड़ी लगती थी। बड़ी से बड़ी सफलता मिलने पर भी कोई खास ख़ुशी नहीं होती थी। क्योंकि उससे पहले ही नया लक्ष्य तय हो जाता था। पर अब जब जीवन के असली संघर्ष को देखा है तो लगता है...सफलता की कितनी संकीर्ण परिभाषा हम लोगों ने गढ़ रखी है। हमारी आत्म संतुष्टि से ज्यादा महत्वपूर्ण हमारे लिए दुनिया की नजरों में आगे बढ़ना हो गया है और इस दौड़ में हम ऐसे कई पलों को नजरंदाज़ कर देते हैं जो हमें सच्ची ख़ुशी दे सकते हैं। हम पूरी जिंदगी खुशियों के पीछे भागते रहते हैं, पर कुछ ऐसी भी खुशियाँ होती है जो हमारा पीछा कर रही होती है, पर हमारी दौड़ इतनी तेज होती है कि ये सब खुशियाँ पीछे छुट जाती है और रह जाती है तो बस हमारी दौड़...जो कभी खत्म ही नहीं होती। 
  • जब ख़ुश होना नहीं, ख़ुश हैं यह दिखाना अधिक महत्वपूर्ण हो तो ख़ुश कैसे रहेंगे?

Monika Jain ‘पंछी’

June 12, 2016

Essay on Life in Hindi


जीवन है बड़ा गहरा

16/12/2016 - एक चींटी जिसके कान और आँखें नहीं होती उसके लिए संसार कैसा होगा? उसके लिए तो दृश्य और ध्वनि जैसा कुछ है ही नहीं। एक जानवर जिसके सुनने और देखने की क्षमता हमसे अलग हो उसके लिए यह संसार कैसा होगा? एक पत्थर, पेड़, नदी, चट्टान, सूरज, चन्द्रमा...इन सबके लिए यह संसार कैसा होगा? इन सबका संसार अलग-अलग है जो उनके ही मन और इन्द्रियों के अधीन चल रहा है। ऐसे ही जितनी भी जीव श्रेणियां हैं उनका देखना, सुनना, समझना सब अलग है और यह विभेद बढ़ते-बढ़ते जीवमात्र पर भी लागू हो जाता है। यह संसार तो किन्हीं दो मनुष्यों के लिए भी एक सा नहीं होता। चेतना और दृष्टिकोण के हर स्तर पर संसार का स्वरुप बदल जाता है। इसलिए हम कहते हैं जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि या यूँ कहें कि एक ही संसार में असंख्य संसार है। इन्द्रियों और मन से जो नज़र आ रहा है वह तो मात्र प्रक्षेपण है। मतलब इसी दुनिया में ऐसे कई संसार हो सकते हैं जो न हमें दिखाई दे रहे हों, न सुनाई दे रहे हों और न ही हम स्पर्श कर सकते हों। लेकिन जीवन सिर्फ वह नहीं जो किसी को भी अपने मन और इन्द्रियों से नज़र आता है। जीवन इससे परे भी बहुत कुछ है या यूँ कहूँ कि सब कुछ है। जीवन तो बड़ी गहरी चीज है।

12/06/2016 - सामान्यतया मैं मंदिर नहीं जाती, पूजा-पाठ नहीं करती, कोई इष्ट देव भी नहीं। किन्हीं संत-महात्माओं के यहाँ भी नहीं जाती, कोई गुरु विशेष भी नहीं। ईश्वर जैसा साकार रूप में अलग से कुछ है, जिसने इस सृष्टि को बनाया है, ऐसा भी नहीं सोच पाती। पर मैं इन सबको सिरे से झुठला भी नहीं सकती। हाँ, समय की मांग के अनुरूप और व्यापक हित में अपने नजरिये से किन बातों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए और किन्हें नहीं, इस पर विमर्श कर सकती हूँ...समर्थन और विरोध कर सकती हूँ। लेकिन आस्तिक-नास्तिक, वाम-दक्षिण, हिन्दू-गैर हिन्दू जैसी श्रेणियों में अपना विभाजन नहीं कर पाऊँगी।
 
जो परिभाषाएं यहाँ आस्तिकता और नास्तिकता की चलती है उनके अनुसार मैं नास्तिक नहीं हूँ क्योंकि यह समूचा ब्रह्माण्ड, उसकी व्यवस्था, सृष्टि, उस पर जीवन के विविध रंग और रूप, हमारा अपने जन्म और मृत्यु के साथ-साथ कई चीजों पर नियंत्रण का न होना...ऐसी असंख्य बातें हैं जो समर्पण कर देने के लिए पर्याप्त से अधिक है। यह हमारा अहंकार है जो समर्पण कर नहीं पाता। मैं आस्तिक नहीं हूँ क्योंकि ईश्वर को मैं अलग से किसी सर्जक या स्रष्टा इकाई के रूप में नहीं मान पाती। इसलिए ही किसी रूप या आकार विशेष की पूजा भी नहीं कर पाती। अगर अपने परम तत्व में अवस्थित हो जाने का मार्ग अकर्ता हो जाना है तो अवश्य ही परम तत्व भी अकर्ता ही होगा।

बाकी मेरे दृष्टिकोण में आस्तिकता और नास्तिकता में कोई अंतर है ही कहाँ? नास्तिक ब्रह्माण्ड का जो स्रोत अकारण और स्वत: मान लेते हैं उसे ही आस्तिक ईश्वर का नाम दे देते हैं। नास्तिक जिन्हें प्रकृति की शक्तियां या ऊर्जा कह देते हैं, उसे ही आस्तिक दैवीय शक्तियां कह देते हैं। अब उसी ऊर्जा को जब हम मानव कह देते हैं, पशु-पक्षी कह देते हैं, गाजर-मूली-टमाटर कह देते हैं तो इंद्र देवता, अग्नि देवता, पवन देवता कह देने में भी कोई विशेष समस्या वाली बात है नहीं। पर हाँ, प्रकृति का यह दैवीकरण भी जागरूकता के एक विशेष स्तर के बाद ही हो सकता है उससे पहले तो यह अज्ञान और अन्धविश्वास ही होगा। हमारे सुख-दुःख, भावनाएं, किसी की मृत्यु, किसी का जन्म...सब कुछ भी तो उसी ऊर्जा का रूप है। लेकिन अपनी भावनाओं के प्रति हम कितने संवेदनशील होते हैं। मरने-मारने, लड़ने-झगड़ने सबके लिए उतारू हो जाते हैं। पर गहराई में देखें तो विचार और भावनाएं भी उसी ऊर्जा का रूप है। तो फिर यह सारे संघर्ष भी कितनी बड़ी बेवकूफी है? (मुक्ति की यात्रा भी बस इसी चिंतन से शुरू होती है।)

सुविधा के तौर पर ठीक है पर जीवन को इस रूप में आप कैसे देख लेते हैं कि इसे इतनी आसानी और कट्टरता से खांचों में बाँटा जा सके? संभावनाओं में मेरा विश्वास है और धर्म मेरे लिए जड़ता नहीं बल्कि गति है - चेतना की आगामी संभावनाओं के स्तर पर बढ़ते जाना या यूँ कहूँ कि अपने ही मूल स्वभाव की ओर वापस लौटना। जीवन बस सोने-उठने, खाने-पीने, प्रजनन, सफलता और विकास के नाम पर होने वाली कई ऊटपटांग चीजों और फिर मर जाने जितना सीमित नहीं हो सकता। सब कुछ इतना सम्बंधित है कि न जाने कितने रास्ते एक ही जगह पर पहुँचते हैं। जीवन बहुत रहस्यमयी और जटिल है। कुछ समझना भी हो तो आसान बस हमें ही होना होता है।
 
Monika Jain ‘पंछी’

May 12, 2016

Essay on Feminism (Feminist) in Hindi / English

Essay on Feminism (Feminist) in Hindi
सीमाओं से परे
(फेसबुक पर हुई एक चर्चा)

पाठक : यही हमारी भी पहल रही है। नारियों के प्रति अलग दृष्टिकोण क्यों? पता नहीं क्यों मुझे लगता है नारी सशक्तीकरण के तथाकथित प्रयासों से बस नारी अबला ही सिध्द होती है। कोई व्यर्थ प्रयास नहीं, बस सामान्य मानवता का दृष्टिकोण ही नारियों के हित में श्रेयस्कर है।

पाठक : ‘नारी’ पर लिखने तक मै सहमत हूँ। किसी ‘वाद’ को आप जैसी ‘कलम की धनी लेखिका’ अपना बनाकर लिखे, इससे मैं पुरी तरह असहमत हूँ। कारण आप स्वयं समझेगी, अन्यथा बाद में।

पाठक : आपने तो समझ लिया और इन सबसे ऊपर भी उठ गयी। लेकिन दमदार लेखनी दूसरों को समझाती है, ऊपर उठाती है, अँधेरे से बाहर निकालती हैं। और आपकी लेखन क्षमता रेयर ही है।

Reader : How can a person who is engaged in gaining 'Aatma-Gyan' see the difference among 'Jiva'? In fact one can get spiritual knowledge when he/she go beyond the differences which is mere appearance.

पाठक : नारीवाद पुरुषवाद के परे हमारी संवेदना मानवता के एक ऐसे कुचले और शोषित पक्ष के एहसास को महसूस कर सकती है और अपनी अनुभूतियों को शब्द भी दे सकती है। यह भी एक समानुभूति का ही उपक्रम होता है। हाँ, विषयों का चुनाव लिखने वालों का अपना prerogative होता है। मैंने मोनिका जी को बहुत नहीं पढ़ा लेकिन उनके इस आलेख में उनकी संवेदना को महसूस कर पा रहा हूँ। मेरा अपना मानना है कि उन्होंने नारी को अपनी कलम का विषय जरूर बनाया होगा। यह स्वागत योग्य है कि 'वाद' की छोटी बात में वे नहीं उलझ रही।

Reader : Creatures created by God are divided by ignorant man in various species. Man has praised himself recommending as the best of all. Then we fools have divided ourselves in different sects calling hindu, muslim and so on. No, we are at all satisfied with these division, we need more. So let us be ST/SC/OBC and so on. Now it’s turn to be male and female. Feminism, racism etc. western theories are imposed on us. We adore them because these have come from foreign brain. Yes, they are superhuman but we have left no man.

लेखक : जी, सही है। इसके अलावा कई विभाजन सिर्फ सुविधाओं के लिए किये गए, लेकिन उन्हें पहचान समझ लिया गया।

Reader : Identity crisis :) of predestined man but full of egotism.

Reader : Now time has come that we come out from castism, rationalism, sexlism, religionism & all other ism. We should follow only & only humanism.

पाठक : बहुत गहरा चिंतन।

Reader : You could be true and it is your prerogative to pick and pen your thoughts and experiences upon any subject of your liking you wish to or wish not to. Nobody has authority to question this. But let me ask you or rather better to say raise an objection when you say ‘जब आप वाकई में जीवन को समझने लगते हैं, तो आप स्वत: ही पक्षपात और भेदों से ऊपर उठने लगते हैं।’ I would say how is it possible to rise above the basis identity of gender one has got? Can a man rise above or forget his manhood or a woman her's? Or do you imply that talking of ‘narivad’ is some sort of bhedbhav against another sex? I am sorry to say, but this is not the correct definition of feminism however most men mock feminism understanding it this only. Feminism is neither discriminatory nor reverse discrimination to revenge the historical deficit women have faced. It is just a social theory which aims to bring equal status of both the sexes. Some man too think it too be just any male-bashing negative agenda but in reality it is not so. It is totally moral and just demand to bring woman at equal pedestal with men. Just it.

लेखक : आपने स्टेटस को सही से नहीं लिया। जेंडर क्या हर एक सीमा से ऊपर उठना बिल्कुल संभव है, लेकिन वह अंतिम स्थिति होती है। उससे पहले लम्बा चौड़ा रास्ता है। जिस पर हम सब कहीं न कहीं होते हैं। मैंने यह नहीं कहा है कि जो नारी हितों पर लिखते हैं वह गलत करते हैं। मैंने यह कहा है कि जो जीवन को समझने लगते हैं वे नारी क्या किसी के भी साथ इरादतन गलत नहीं करेंगे। जीवन में सब कुछ इतना सम्बंधित है कि जब आप केवल प्रेम या अहिंसा की बात करते हैं तब भी वह बात कितने व्यापक रूप से लागू हो जाती है। इसलिए यह जरुरी नहीं है कि कोई किसी विषय विशेष पर लिख रहा हो सिर्फ तभी वह उस विषय के प्रति संवेदनशील है।
इसके अलावा एक चीज और है। जैसे कोई महिलाओं के साथ होने वाली घरेलु हिंसा पर कुछ लिखता है। हो सकता है किसी डर से, कानून की वजह से, नाम ख़राब हो जाने या किसी और वजह से कोई मारपीट करना छोड़ दे। लेकिन उसके मन या चेतना में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है तो उसके भीतर की हिंसा किसी और रूप में निकलेगी, लेकिन निकलेगी जरुर। निशाना कोई और हो सकता है। लेकिन जो जीवन को वास्तव में समझेगा उसकी चेतना में परिवर्तन जरुर होगा और ऐसे में हिंसा का रूप नहीं बदलेगा बल्कि वह रहेगी ही नहीं। तो यहाँ बात लिखने वालों की नहीं है, यहाँ बात ग्रहण करने वालों की है।
नारी पर मैंने भी बहुत लिखा है। लिखा जाना ही चाहिए। लेकिन बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो इन अलग-अलग तरह के वाद के जरिये अपनी राजनैतिक आकांक्षाओं की पूर्ति भर करते हैं। नारीवादियों में कई छद्म नारीवादी मिलेंगे आपको जो बातें बहुत बड़ी-बड़ी करेंगे लेकिन उनके मन में नारी एक शरीर से ज्यादा भर कुछ नहीं है।

Reader : You say that it is quite possible to rise above every limitations (seema, your word), I ask if, being a woman is some kinda limitation? Or conversely being man is in some way limiting oneself to any border? Yeah, sure, I understand, you are saying it in metaphysical or spiritual sense, as I can guess as I have read your past posts too. Even in that sense and not in worldly sense, is it possible to forget or rise above our gender? Or the sex one is born in? Religious scriptures too (of all religions) are too heavily biased against women in terms of the status they give to women in not just worldly affairs but in liberatory sense as well. Bhagwad Geeta puts the blame of future generation getting rotten to 'adulterous' women. What to say of semitic religious where the status of woman is nothing more than that of a commodity, a thing, a piece of property. Tulsidas wants women and low born people to be beaten heavily. Our whole sociological construct is anti-women, and misogynistic. Even women due to this conditioning have become increasingly anti women. My point of contention is this too - if the whole world around you is adamant of making you realize that you are a woman and you should do this and not that, if you do this you become a bitch, if you don't wear that, you become a slut. The ever increasing sense of insecurity of getting targeted if left alone at that particular hour of night, the constant stigma of a single woman raising a kid and the lusty eyes threatening one of sexual violence.
Forgive me if I sound too pessimistic but tell me, if is it possible for a woman in a country like ours to rise above her gender, where she is constantly reminded every time in all possible ways that she is a woman? It's really a sad state of affairs.

लेखक : आध्यात्म जीवन से कोई अलग चीज नहीं है। हाँ सुविधा के लिए इसे हम एक अलग विषय मान लेते हैं, लेकिन यह किसी के भी जीवन से अलग है नहीं। यह बस जीवन जीने का एक तरीका है। जो किसी न किसी मात्रा में सामान्यत: सबके जीवन में शामिल होता ही है। नारी के साथ होने वाले किसी भी भेदभाव का मैं समर्थन कहाँ कर रही हूँ? न ही मैं ऐसा कह रही हूँ कि आपने जो कहा है वैसा कुछ हमारे चारों ओर नहीं होता है। बल्कि खुद एक बार मैंने यह स्टेटस डाला था - ‘बस इतनी सी आज़ादी दोगे कि हमेशा यह याद न रखना पड़े कि मैं स्त्री हूँ।’ इसलिए आपकी इन बातों से मेरा विरोध है ही नहीं। सीमाओं से ऊपर उठ जाने की बात भी केवल नारी के लिए नहीं है। मुख्य रूप से तो यह आवश्यक ही उनके लिए है जो बहुत ज्यादा भेदभाव करते हैं। मैंने जिसके साथ अन्याय हो रहा है उसके साथ-साथ जो अन्याय कर रहा है उसके भी सीमाओं से ऊपर उठने के हम सब के प्रयासों की बात की है। और ऐसे ही प्रयासों के परिणाम स्थायी हो सकते हैं जो व्यक्ति को वास्तव में सीमाओं से ऊपर उठाये। जो नारी को नारी से पहले एक इंसान की तरह देखना सिखाये। मेरा विरोध नारी के लिए कुछ लिखने, करने किसी से भी नहीं है। जो प्रयास जरुरी है वह होने ही चाहिए। मैंने बस एक विचार रखा था कि किसी भी समस्या का समाधान केवल उस विषय विशेष पर बात या कार्य करने से ही हो यह जरुरी नहीं है। क्योंकि कई फैक्टर शामिल होते हैं।
बाकी यह सही है कि कोई व्यक्ति विशेष अपने भीतर आध्यात्मिक उत्थान से हर सीमा तोड़ सकता है। बाहरी बाधाएं तो हमेशा रहेंगी ही। लेकिन उससे भी ज्यादा भीतरी बाधाएं होती है। कहाँ क्या लिखा है उस पर मैं नहीं जाऊँगी, क्योंकि कुछ चीजें अनुभव करने की होती है। कई बातों के सन्दर्भ बिल्कुल अलग होते हैं। इसी तरह कोई भी बात इसलिए सच नहीं हो जाती या धर्म/आध्यात्म नहीं हो जाती क्योंकि वह किसी धार्मिक पुस्तक में लिखी है। लिखने वाले पक्षपाती हो सकते हैं। लिखने वालों का मंतव्य कुछ और हो सकता है। ऐसे में अनुभव ही मायने रखता है।

Reader : Without contesting any of the points you have raised here I would like to see what are the established facts.
Are women ill-treated here in this nation? Yes. If women are ill treated in the world? Yes. If religious scriptures sanction this? Not sure but let's for the sake of argument assume that they do. Okay. Tulsidas say this and Vedvyas says that is of no relevance here because when we talk of spirituality, it is independent of the 'religion' we follow. Religion and Spirituality are too different concepts all together. It is quite possible that religious people are non-spiritual in their outlook as per my experiences. Let's come back to the original point, otherwise I being myself run the risk of delving or sidetracking the main issue. Coming to your question, Is it possible for a woman to forget that she is a woman? 'Forget' is not appropriate word here, 'rising above the gender' could carry more weight but still this too is not fully appropriate. Let's just for the sake of convenience put a more appropriate meaning of this term 'rising above'. Nobody is saying you to 'forget' your sex. Also it is nobody's assertions that you somehow lose memory and cease to know about your gender. Also it does not mean that you start pretending to be a man. Narivad is, as you defend is not a male-bashing agenda but a way to harmonize the social construct embedded in misogyny. I support this view that it is wrong/ terminological in exactitude to say women are inferior to men. It is blatant idiocy to say something of this sense. But thinking the other way and saying 'men and women are equal' is also another extreme. Men and women are not equal, never equal but that does not imply that either of the two sexes is inferior to other. Men have their own especially endowed gifts from nature so do women have. Thus rising above the gender means making those differences nature has made up in the sexes irrelevant/non consequential. They don't bother you, they simply cease to exist.
Say for an example - A woman is beaten brutally by her in-laws for dowry or for 'producing' female kids and I as a man is sympathizing with her then, as per rising above the gender implies, I should not be required to undergo 'परकाया प्रवेश' in order to feel her pain. It shall be coming out of me naturally and with सहजता. If a woman is fighting for any maltreatment melted out at men, it ought not be mandatory for her to undergo a sex change surgery. It shall be coming out of her with sheer compassion for humanly. So when she says सीमाएँ, in my opinion she implies not boundaries or borders, she talks of human-made constructs like language, state, religion or nation. In general sense, it could also mean of 'non-requirement' of any immediate identity of being a man or woman. That's it. How so ever, it is my personal belief that any -ism, being it feminism, black-ism, dalit-ism, which has roots in negativity is bound to die and create disturbances in harmony of the society, howsoever noble your aims be. I am not saying that feminism is a negative agenda, because for any person it has got different definitions altogether. But for the general public the 'filtered' definition which comes from west, is very very regressive and has negative connotations attached with it. Therefore it is also the duty of feminists to present it in true forms. By the way thanks for opening another facet of feminism.

Reader : किसी विषय को बाह्य/वस्तुगत रूप मे देखना भौतिक वाद है। उसी विषय को आत्मगत हो कर देखना आध्यत्म वाद है। बाह्य रूप मे समस्त विषय केवल और केवल वस्तु प्रतीत होते हैं और आत्मगत हो कर देखने पर उसी विषय मे चेतना का संचार होता हुआ प्रतीत होता है। उदाहरण के लिये मन्दिर मे रखी एक पत्थर की मूर्ति। बाह्य रूप मे देखने वाले को यह केवल एक पत्थर की मूर्ति ही प्रतीत होगी, परन्तु आत्मगत हो कर देखने वाले को इसमे सर्वव्यापी परम चैतन्य ईश्वर दिखता है। क्यूँ? बस यही अन्तर होता है, जब दृष्टि के स्थान पर अंतर दृष्टि का प्रयोग करते हैं। 

May 7, 2016

Parenting, Baby Care, Child Upbringing Tips in Hindi

बच्चों की परवरिश 

(1)

07/05/2016 - चिंकू 2 साल का है। उसके पड़ोस में उसका हमउम्र दोस्त पिंकू रहता है। चिंकू की मम्मी चिंकू को नहलाते समय, बाल बनाते समय, या ऐसे ही खाली समय में अपने टाइम पास के लिए हर रोज चिंकू के घर के सदस्यों या खिलौनों का नाम लेते हुए कहती है : 'दादा तो पिंकू के हैं, दादी पिंकू की है, मामा पिंकू के है, यह टेडी तो पिंकू का है...और चिंकू थोड़ी चिढ़, ईर्ष्या और अकड़ के साथ अपनी तुतलाती आवाज़ में कहता है : नहीं मेरे हैं, नहीं मेरी हैं, नहीं मेरे हैं।
बात छोटी सी है पर ऐसी कई सारी बातें होती हैं, जो थोड़ी अजीब लगती है। चिंकू आपका खिलौना नहीं है। अपने मन बहलाव के लिए बच्चों से ऊटपटांग बातें करना बंद कीजिये। और बच्चों में 'मैं', 'मेरा' और ईर्ष्या के भावों के बीज इस कदर मत बोईये कि बड़ा होकर वह एक ऐसा वृक्ष बने जो निजी स्वार्थ को छोड़ किसी के लिए फलदायी और सुखदायी न हो।

(2)

08/05/2016 - चिंकू जब भी कभी ठोकर खाकर या ऐसे ही चलते-चलते गिर जाता है और रोने लगता है, तो चिंकू के रुदन गीत का मुखड़ा भी खत्म नहीं होता उससे पहले ही चिंकू के पापा दौड़े-दौड़े उसके पास जाते हैं, उसे गोद में उठाते हैं, ढेर सारा प्यार करते हैं और कहते हैं देख चींटी मर गयी, मकोड़ा मर गया...इस दरवाजे ने तुझे मारा न...अभी इसकी पिटाई करते हैं...चटाक! चटाक! चटाक!
चिंकू को थोड़ा रो लेने दीजिये। अपने आप चुप हो जाए इसका भी धैर्य रखिये। अपने बच्चों को बहुत ज्यादा अटेंशन सीकर मत बनाईये। अगर चुप कराने के लिए समझाने की जरुरत हो तो भी चींटा-चींटी को मत मारिये, न ही दरवाजे को कोसिये। चिंकू को सावधानी से चलने की सीख दीजिये। प्यार जरुरी हो तो प्यार भी कीजिये लेकिन इस बात का ख़याल रखिये कि बच्चे गिरेंगे नहीं, रोयेंगे नहीं तो मजबूत कैसे बनेंगे? बड़े सारे जीवन में इतनी छोटी-छोटी बातें तो होती रहती है।

(3)

09/05/2016 - चिंकी और पिंकी दो बहने हैं। चिंकी का रंग थोड़ा सांवला है और पिंकी का एकदम साफ़। चिंकी की मम्मी कभी-कभी जब बच्चों के लिए कपड़े खरीदकर लाती है और बच्चों को कपड़े पहनाती है तो अक्सर उनके मुंह से निकल जाता है, तेरा रंग तो काला है, यह तेरे ऊपर नहीं पिंकी पर अच्छा लगेगा। इसी तरह चिंकी और पिंकी की पढ़ाई, होमवर्क, हैण्ड राइटिंग आदि सब बातों को लेकर भी तुलना चलती रहती है। यहाँ यह ध्यान देना जरुरी है कि हर बच्चा विशेष है और उसे अलग तरह के ध्यान की जरुरत होती है। अपने दो बच्चों में रंग, रूप, बुद्धिमता आदि किसी भी बात को लेकर अनावश्यक तुलना मत कीजिये। बच्चों को एक दूसरे का प्रतिस्पर्धी मत बनाईये, बल्कि उन्हें खुद में ही पहले से बेहतर बनने की भावना जगाईये।

(4)

जबसे यहाँ रहने आई हूँ, आसपास के कई बच्चे अक्सर आते हैं और कहते हैं, दीदी, कोई गेम खिलाओ। इस बहाने मैं तो हमेशा बच्ची रहने वाली हूँ। :) पर कितनी विडम्बना की बात है कि बच्चों को यह ही नहीं पता कि उन्हें खेलना क्या है और कैसे? कंप्यूटर गेम्स और मोबाइल गेम्स के अलावा उनके पास कोई ऑप्शन नहीं। पता नहीं ये मम्मी-पापा लोग आखिर करते क्या हैं? कम से कम वीकेंड्स पर तो बच्चों को नयी-नयी चीजें सिखाई ही जा सकती है और उनके साथ खेला ही जा सकता है। कुछ मम्मियों के रेस्ट्रिक्शन्स भी बड़े गज़ब के होते हैं - मिट्टी में मत खेलो, इन बच्चों के साथ मत खेलो (क्योंकि उन बच्चों की मम्मी से नहीं बनती :p), कार्ड्स खेलना अच्छी बात नहीं, फलां, ढीमका, और भी जाने क्या-क्या। सच में कुछ मम्मियां मम्मी कम हिटलर ज्यादा लगती है। जरुरत तो यह है कि जहाँ बच्चों के साथी हों वहां उन्हें बिना बेवजह की रोक-टोक के बाहर खेलने दिया जाए और जहाँ हम-उम्र साथी नहीं वहां माता-पिता खुद यह भूमिका निभाएं। सतर्कता जरुरी है, लेकिन वह कैद नहीं बननी चाहिए।

(5)

कुछ दिनों के लिए बच्चों का सानिध्य मिला। कल बच्चों को व्यस्त रखने के लिए मैं, भैया और बच्चे कई सारे गेम्स खेल रहे थे। एक गेम जिसमें मैंने हॉल में रखी कोई चीज मन में सोची और उन्हें उससे रिलेटेड क्वेश्चन्स (जैसे मेटल की है या प्लास्टिक की...etc) पूछकर उस तक पहुँचना था। आधे घंटे से ऊपर हो गया था...कोई गेस नहीं कर पाया था। तब लास्ट में सीधे एक-एक चीज का नाम वाले सवालों की झड़ी (जैसे घड़ी है, पेन है, टीवी है...etc..) से ऊबकर मैंने कहा, 'हार मान रहे हो?' तब ऐसा कहने पर उनमें से जो बड़ी थी उसने कहा, 'नहीं'! लेकिन दूसरी दौड़ के आई और बोली, 'मौसी! मैं आपकी टीम में हूँ। :p उसके बाद तीसरी दौड़ के आई और बोली, बुआ! मैं भी आपकी टीम में हूँ। :) दोनों छोटी हैं। उस समय तो उनके इस मासूम से जेस्चर पर सब जोर से हँसे। लेकिन बाद में मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ। ऊबकर ही कहे हो लेकिन 'हार मान रहे हो?' ये शब्द गलत थे।...और इससे भी गलत थी वह भावना जो सिर्फ हार से डर की वजह से उन बच्चों को टीम बदलने को प्रेरित कर रही थी। यह भावना उनमें कहाँ से आई इसका तो पता नहीं। लेकिन यह शायद असर है आज के प्रतिस्पर्धी माहौल का। जिसमें जीतना इतना महत्वपूर्ण हो गया है कि वह जीत कैसे हासिल हो यह मायने नहीं रखता। इसलिए बहुत जरुरी है कि हम बच्चों के सामने जो भी कहें बहुत सोच समझकर कहें। इसके अलावा खेल में हार और जीत दोनों स्वीकार्य होनी चाहिए...और ये हार जीत से कई अधिक सीखने, मनोरंजन और शारीरिक-मानसिक विकास के लिए होने चाहिए।

Monika Jain ‘पंछी’

April 23, 2016

Quotes on Friendship in Hindi

Friendship Quotes

  • 29/07/2017 - ईमानदारी से तारीफ कर उत्साह वर्धन करने वाले और ईमानदारी से कमी बताकर सुधार की ओर प्रेरित करने वाले मित्र/सज्जन भी दुर्लभ ही होते हैं।
  • 30/03/2017 - वह जिसके सामने बड़ी देर तक खिलखिलाया जा सकता है। वह जिसके सामने बड़ी सहजता से रोया भी जा सकता है। वह जिसे सब कुछ बताया जा सकता है। वह जिसे पहले परिचय से लेकर सालों-साल तक नंबर बदलने पर भी कभी उसे सेव करने की जरुरत ही नहीं पड़ती, क्योंकि उसे हमेशा नंबर याद हो जाता है। वह...सिर्फ वह जो समझता है, एक दिन उसे बात करने की इजाजत ही नहीं रहती। जाने क्यों किसी तीसरे की ख़ुशी के लिए दो लोगों की पाक दोस्ती को भी हमेशा के लिए छूट जाना पड़ता है। नंबर याद करने के मामले में बड़ी लापरवाह रही लेकिन कुछ नंबर मोबाइल में शायद सिर्फ इसलिए ही सेव रह जाते हैं कि शायद जाने से पहले कभी किसी दिन वे स्क्रीन पर चमक जाए।
  • 09/06/2017 - जानती हूँ...गर अरसे बाद भी हम कभी बात कर पायें तो बात करते-करते तुम मेरे 'ज' और 'ज़' वाले गलत उच्चारण को सही करोगे और मैं हमेशा की तरह खिलखिला पडूँगी। कुछ सहजताएँ समय कभी नहीं छीन सकता...कभी भी नहीं!
  • 28/05/2017 - मैं इतनी सहजता चाहती हूँ कि बिल्कुल विपरीत विचार होते हुए भी प्रेम/मैत्री पर कोई आंच न आये। कुछ बुरा लगे भी तो हम सीधे कह और सुन सकें। कहना-सुनना जब जरुरी न हो तब एक दूसरे को स्वीकार सकें। यकीन मानो! प्रेम विचारों से परे है। 
  • 10/03/2017 - जब मैं किसी से कटृा होती हूँ तो 'ote' की जगह 'ok' बोलने लग जाती हूँ और पक्का होने पर वापस 'ote'. 
  • 26-02-2017 - दोस्त हो तो ऐसा...जो अपने जन्मदिन के दिन 11:59 pm पर कॉल करके कहे - अब तो बर्थडे विश कर दो, बस एक मिनट बचा है। :)
  • 26/09/2016 - एक दोस्त ऐसा जरुर होना चाहिए जिससे तुतलाकर बात कर सकें। :p
  • 08/06/2016 - वह जिससे कभी बात ही नहीं करनी, उसे अब भी दोस्तों में गिन जाती हूँ। मैं भुलक्कड़ कितना कुछ भूल जाती हूँ।
  • 23/04/2016 - कुछ दोस्तों को यह शिकायत है कि मैं कुछ शेयर नहीं करती। :) आप मुझसे बहुत कुछ शेयर करते हैं, मुझ पर इतना भरोसा करते हैं, मुझे बहुत अच्छा मेंटर भी मानते हैं। अगर वाकई में आपकी परेशानियाँ दूर होती है तो यह मेरे लिए ख़ुशी की बात है। कोई मुझसे कुछ शेयर करे इसका औचित्य भी मैं तभी मानती हूँ जब उसे कोई राहत मिलती हो। मैं ज्यादा कुछ शेयर नहीं करती इसके बहुत से कारण हैं : पहला तो यह मेरा जन्मजात गुण है, किसी से बहुत अधिक जुड़ाव हो या कभी बहुत जरुरी हो तो अपवाद हो सकता है। दूसरा यह कि जिसे लोग मेंटर की संज्ञा दे, कम से कम उसे खुद का मेंटर तो होना ही चाहिए। तीसरा : डिपेंडेंसी पसंद नहीं है। चौथा : जो इतना सब कुछ लिखने लगते हैं, उन्हें व्यक्तिगत शेयरिंग की जरुरत नहीं रहती। पांचवा : शेयरिंग के मेरे अनुभव अच्छे नहीं है। (अब सब मेरे जैसे नहीं होते :p ) छठा : जीवन ने इतना कुछ दिखा दिया है कि अब कुछ भी शॉक देने जैसा लगता ही नहीं। :) सातवाँ : मैं यह नहीं बताना चाहती कि मैं कितनी बड़ी पागल हूँ। :D (हालाँकि सबको पता होगा। ;) ) बाकी आपको इस बात से ख़ुश होना चाहिए कि आपका कोई दोस्त ऐसा है जो आपको सुनता है, बस अपनी ही अपनी सुनाता नहीं। :) इसलिए शिकायतों में समय व्यर्थ मत गंवाइये। हंसिये और हंसाइये। :) 
  • 31/12/2015 - दोस्तों! तुमसे ही है हर पल और तुमसे ही है हर साल। जाने कितनी बार दिल ने कहा...मैत्री से बेहतर कोई भावना होती ही नहीं। इसलिए प्यारे दोस्तों! तुम्हें ढेर सारा प्यार। 
  • 01/02/2015 - कुछ लोग आपकी अच्छाईयों और कमियों का परिचय आपसे कुछ इस तरह करवाते हैं कि फिर तो बुराई की ओर भटकने का कोई चांस ही नहीं रहता। फिर कितनी भी मुश्किल आये अच्छाईयाँ अच्छी ही लगती है। खुद से प्यार बढ़ जाता है, लोगों से प्यार बढ़ जाता है और ज़िन्दगी से भी। कितने तो अच्छे होते हैं कुछ लोग!
  • तुम मेरे बचपन वाले दोस्त हो जो बड़े होकर बने हो। :p :) 
  • हम खुद ही अपने सबसे अच्छे मित्र होते हैं। हम खुद ही अपने सबसे बुरे शत्रु भी होते हैं। यह हम पर ही निर्भर है कि हम अपने मित्र बनते हैं या शत्रु।
 
Monika Jain ‘पंछी’

April 15, 2016

Funny Childhood Memories Stories in Hindi

मेरे हिस्से...कुछ बेवकूफ किस्से...

(1)

मैं...कुम्भकर्ण की नानी

बात तब की है जब मैं छोटी बच्ची थी। अपनी कुम्भकर्णी नींद की वजह से मुझे घर में 'कुम्भकर्ण की नानी' कहकर बुलाया जाता था। सबसे बड़े भैया ने दिया था यह नाम। कुम्भकर्ण की तरह बहुत देर तक तो नहीं सोती थी, लेकिन हाँ, नींद इतनी गहरी होती थी कि रात में कोई चोर जिस कमरे में मैं सोयी हूँ उसमें चोरी करके चला जाए तो भी मुझे कुछ पता न चले। कभी-कभी जल्दी सो जाने पर माँ नींद में उठाकर कुछ खिला देती...पर मुझे याद नहीं रहता। गर्मियों में छत पर सोते समय बारिश आ जाने पर कब और कैसे ऊपर से नीचे पहुँच जाती थी, वह भी याद नहीं रहता था। आसपास सोने वाले भाई बहन कहते थे मैं नींद में उन्हें लात मारती थी। :p कभी-कभी नींद में कुछ बोल भी जाती थी। शुक्र है कि नींद में चलने की आदत नहीं थी। :D

हाँ तो मेरी कुम्भकर्णी नींद के ही बचपन के दिनों में एक रात मुझे भयंकर प्यास लगी और नींद खुल गयी। यह अपवादजनक मामला था। सामान्यतया सोने के बाद सीधा सुबह ही उठती थी। तो उस दिन बहुत तेज प्यास लग रही थी। सोने की जगह के ऊपर झरोखे में एक बोतल रखी थी। नींद में इतना दिमाग नहीं लगाया कि इसमें पानी नहीं रखा है। पानी तो रसोई में है। मैंने बस उसे उठाया और पीने लगी। उसके बाद 2-3 घंटे तक उल्टियाँ होती रही, क्योंकि उस बोतल में तिल का तेल था। :p

(2)

जीवात्मा की सैर और मेरी खैर...

एक छोटे से कस्बे के अपने छुटपने के दिनों में एक दिन मैं स्कूल जाने के लिए तैयार हो रही थी। थोड़ा लेट हो गयी थी। मैं लेसेस वाले जूते पहनती थी। उस दिन हर रोज की तरह उन्हें उल्टा करके झाड़ने की बजाय सीधे ही पहन लिया और स्कूल के लिए रवाना हो गयी। वो बारिश के दिन थे, हमारा पुराना घर खुला-खुला था और वह एरिया कभी किसी समय शायद फार्मिंग लैंड रहा था, इसलिए छोटे-छोटे जीव-जंतु आ जाया करते थे.

जूते पहनने के बाद मुझे एक जूते में कुछ मुलायम और गुदगुदा सा महसूस हो रहा था। मुझे लगा जल्दी-जल्दी पहने हैं तो हो सकता है कुछ फंसा रह गया होगा और ऐसा सोचकर इग्नोर कर मैं चलती रही। चलते-चलते स्कूल में पहुँच गयी और प्रेयर की घंटी के बाद हम सब प्रेयर में बैठ गए। अब जब मैं शांत हो गयी थी तब जूते में फंसी उस चीज की हलचल शुरू हो गयी, और कुछ ही देर में मुझे समझते देर न लगी कि मैं अपने जूते में किस जीवात्मा को उठाकर ले आई हूँ।

दिल की धड़कने थोड़ी बढ़ गयी थी, थोड़ा सा डर भी लग रहा था, लेकिन मैंने अपने आपको संयत रखा और चुपचाप आँखें बंद किये प्रेयर करती रही। फिर प्रार्थना खत्म होने के बाद जब समाचार, कहानी, आदर्श वाक्य आदि का रोजाना वाला दौर चल रहा था तो मैंने धीरे से अपना जूता खोला उसे हल्का सा झटका ताकि अंदर जो भी आत्मा जा बैठी है वह बाहर निकल जाए। लेकिन उस जीवात्मा को मेरा जूता बहुत पसंद आ गया था सो वह वही जमी रही। (हालाँकि उस जीवात्मा का क्या हाल रहा होगा, यह तो वही जाने। :p )

अब बिना जीवात्मा के निकले वापस उस जूते को पहनना निश्चित ही बहुत बहादूरी वाला काम था और मुझे वह करना ही था। पाँव में बहुत अजीब सा महसूस हो रहा था। हम सब 1 घंटे के प्रार्थना सभा के कार्यक्रम के बाद कतार से अपनी-अपनी क्लास में पहुंचे। मैं तुरंत अपनी सीट पर पहुंची और नीचे झुककर अपना जूता उतारा। फिर उसे एक-दो बार उल्टा कर झटका। वह जीव बाहर नहीं आया तो तीसरी बार मैंने जूते को बहुत तेज से पटका। हमारा क्लासरूम थियेटर की तरह सीढ़ीनुमा था। फाइनली कुछ बाहर निकला और उछलते कूदते पीछे की सीढ़ियों पे चला गया। और मैंने पूरे 1½ घंटे बाद चैन की सांस ली। उसके बाद पहला पीरियड शुरू होने के बाद जब मैं और सब सामने खड़ी टीचर को ध्यान से सुन रहे थे तब पीछे का पूरा चक्कर लगाकर वापस आगे आये एक छोटे से मेढंक महाशय ब्लैकबोर्ड के पास की जमीन पर उछलते कूदते दिखे। मैं मन ही मन मुस्कुराई। एक लम्बी कैद के बाद उसने भी तो जन्नत पायी थी और शायद जीवन में पहली बार इस तरह की भयानक सैर भी की होगी। इस पूरे घटनाक्रम की सबसे ख़ास बात यह रही कि किसी को भी कुछ भी पता नहीं चला...न मेरे चेहरे से और न ही मेरी हरकतों से। :p :)

Monika Jain ‘पंछी’
(15/04/2016)

April 6, 2016

Quotes on Freedom (Salvation) in Hindi

Freedom (Salvation) Quotes

  • 24/08/2017 - महावीर और बुद्ध को पढ़ते हुए लगता है - एक समय था शायद जब आत्ममुक्ति परम लक्ष्य हुआ करती थी। लेकिन समय के थपेड़ों ने इस देश से इसकी सबसे सुन्दरतम चीज छीन ली। बहुत थोड़े से लोग हैं जो प्रेम, संवेदनशीलता, करुणा और अहिंसा के सूक्ष्म, व्यापक, गहन अर्थ और प्रभाव को समझते हैं।
  • 15/08/2017 - हर कदम पर भटकाने वाले तत्व मिलते हैं। बस इस अनर्गल शोर में अपनी आवाज़ सुन पाए कोई, असल आज़ादी भी बस उसी के लिए है। जिम्मेदारी दो तरफ़ा है - न भटको, न भटकाओ। 
  • 29/11/2016 - दुनिया में सबके अपने-अपने युग हैं। कहीं किसी कोने में कोई नरभक्षी बना बैठा है तो कहीं कोई ऐसा भी है जिसका जीवन किसी के भी भक्षण का मोहताज ही नहीं। किसी के आठों प्रहर सावद्य भाषा के प्रयोग में गुजरते हैं तो कोई निरवद्य भाषा की अंतिम परिणीति मौन तक पहुँच चुका है। कोई मन में न जाने कितनी नृशंस हत्यायों की योजनाएँ बनाता है तो कोई कहीं मन से ही मुक्त हो चुका है। 
  • 14/09/2016 - हर भौतिक आकर्षण की परिणीति एक निराशा या नीरसता के सिवा कुछ भी तो नहीं। फिर भी वह भटक रहें हैं जाने किस तलाश में। भटकते-भटकते सुनाई दे जाता है बीच-बीच में एक सन्नाटा। खींचता रहा एक शून्य सदा-सदा से। कुछ पहचानी सी लगती थी यह ख़ामोशी...जिसे मिलकर भी नहीं दबा पाते थे दुनिया-जहाँ के सारे शोर। हो न हो...आकर्षण का चरम है यह। कुछ, जो जीवन और मृत्यु से परे है। कुछ, जहाँ श्वास और निश्वास का द्वंद्व नहीं। कुछ, जो अकारण ही जीवंत है। कुछ, जो शायद कुछ है ही नहीं...फिर भी सब कुछ है।
  • 15/08/2016 - कभी-कभी सबको पढ़कर चुप रह पाना भी आज़ादी है। ;) हालाँकि बोल गयी और आज़ादी गँवा दी। :p पर अब बोल ही गयी तो शुभकामनाएं भी ले ही लो। ^_^
  • 26/04/2016 - लोग आये...शब्दों को पढ़ा...और चल दिए। मुझे इंतजार था उसका जिसे ब्लैंक स्पेसेस को पढ़ना था और फिर मेरे पास ठहर जाना था। इंतजार पूरा न हुआ...हो ही नहीं सकता था...इंतजार जायज ही न था। क्योंकि जो रिक्त को पढ़ पायेगा, उसे रिक्त होना होगा। और जो रिक्त होगा, उसके लिए सारा अस्तित्व ही रिक्त होगा...मैं भी तो। 
  • 06/04/2016 - जब सालों से सहेज कर रखी किसी जगह की यादगार, अचानक हाथ से छूटे और चूर-चूर हो जाए, पर माथे पर कोई शिकन न आये...जब यादों के तौर पर सबसे छिपाकर रखे गए, प्रेम में मिले तोहफ़े, दूसरों की मुस्कुराहटों का सबब बनने लगे...अपने लिए बड़े चाव से ख़रीदे नए-नवेले कपड़े खुद की बजाय आपको दूसरों पर अच्छे लगने लगे...जब कोई फेवरेट डिश जो आपको नहीं खानी है पर सिर्फ दूसरों के खाने के लिए आप बड़े प्यार से बनायें...जब आपकी कोई चीज किसी को पसंद आने पर आप वह उसे देने को तत्पर हो जाएँ...ऐसा कुछ भी हो तो समझना कि चीजें छोड़ी नहीं जाती बस छूट जाती है। 
  • Even the later comments are affected by the former ones. :) तो सोचिये हम कितने ज्यादा प्रभाव में रहते हैं। फिर भी सोचते हैं कि हमारा कोई अलग से अस्तित्व है। प्रभावित होना बंधना है, अप्रभावित होना मुक्त हो जाना है। हमारे जीवन में 'वह पसंद है', 'वह नापसंद है' के सापेक्ष भाव जितने ज्यादा मिटने लगे...समझना उतने ही हम मुक्त होते जा रहे हैं और यह अनुभूति सच में सुखद है। जीवन को 'पसंद' और 'नापसंद' के खांचों में बांटने से ज्यादा जरुरी है, पूर्ण भागीदार बनते हुए भी निरपेक्ष भाव से देखना। जिस दिन हम यह कर पायेंगे उस दिन हम प्रभाव में नहीं स्वभाव में स्थित होंगे। और स्वभाव में स्थित होना ही धर्म में अवस्थित होना है। 
  • कभी उसकी अलमारी का एक कोना प्रेम में मिले तोहफों को सहेज कर रखने के लिए आरक्षित था। जिसमें कुछ सूखे गुलाब के फूल भी शामिल थे। कभी-कभी वह उन तोहफों को टटोलकर यादों के शहर में घूम आया करती थी। फिर एक दिन अचानक उस कोने से सब कुछ बंटने लगा। सिर्फ उस कोने से नहीं...कमरे की हर एक जगह से जो भी अतिरिक्त था वह सब बंटने लगा। उसे कमरे का खालीपन भाने लगा। अब वह इंतजार करती है बस उस दिन का जब वह खुद से भी पूरी तरह खाली हो सके।
  • लम्बे अरसे से उसके जीवन का हिस्सा बन चुके असहनीय दर्द में कुछ और दर्द मिश्रित होते रहे। उसके मन ही मन में तूफ़ान उठते रहे...पर अब आसानी से नहीं तोड़ पाते मौन का सन्नाटा! कितने सारे प्रश्न!...न्याय की उम्मीद में अपने पक्ष को रखने वाले कितने सारे तर्क!...गलतफहमियों को दूर करने वाली कितनी सारी बातें!...हर रोज की घुटन जो खुलकर सांस लेना चाहती थी।...कुछ शिकायतें जिन्हें शब्दों की जरा सी मिठास चाहिए थी।...सूख चुके आंसू जिन्हें नमी के लिए बस स्नेह भरी एक मुस्कान की जरुरत थी।...कुछ  मामूली सी गलतियाँ, जो गंभीर अपराध सिद्ध हुई और जरुरत से ज्यादा सजा पा चुकी...मुक्त होना चाहती थी अपने अपराध बोध से।...पर अब उसके दर्द का अहसास उसके होठों तक पहुंचना भूल चुका है। और उसके मन की इस इच्छा को भी एक दिन समाप्त होना होगा कि कुछ भी कभी ठीक हो। क्योंकि सुख-दुःख, सफलता-असफलता, जीवन-मृत्यु इस स्केल पर आगे या पीछे जाने के लिए वह शायद बनी ही नहीं है। उसे तो शरीर और मन के तल की इन सारी क्षुद्र्ताओं से ऊपर उठना है। क्योंकि वह जन्मी ही है मुक्त हो जाने को। वही तो उसकी मंजिल है, जो उसे निरंतर आवाज़ देती रही है, पर दुनियावी शोर में वह अब तक उसे अनसुना करती आई है।
  • आज़ादी पर तो क्या कहूँ? बचपन में तो इस दिन का क्रेज इसलिए रहता था क्योंकि बहुत सारे प्राइजेज मिलने होते थे और रोज के रूटीन से हटकर कुछ अलग होता था और देशप्रेम के भावों से भर जाना बहुत सुखद लगता था। पर धीरे-धीरे जब आज़ादी के मायने समझ आने लगे तो बात देश, काल, जगत सबकी सीमाओं से परे जाने लगी। ऐसे में आज़ादी महसूस कैसे हो? पर फिर भी कुछ न होने से हमेशा बेहतर होता है कुछ होना। इसलिए ख़ुश होने में क्या जाता है। आप सब को भी ढेर सारी शुभकामनाएं। 
  • पूर्ण स्वीकार का क्षण ही पूर्ण निस्तार का क्षण होता है। 
  • कभी-कभी अवसाद से लड़ने के लिए कितने जतन करने होते हैं। कविता, कहानियाँ, जोक्स, तारीफ, गीत-संगीत, नृत्य, चित्रकारी, दोस्त, बच्चे, प्रकृति...हर पल ख़ुश रहने के बहाने ढूंढने पड़ते हैं। कभी-कभी सब फैल हो जाता है। ये निर्भरता बड़ी बुरी चीज है। मुक्ति और मोक्ष की बातें बेमानी नहीं है। सदियों से जिस पागलपंती को हम दोहराते आ रहे हैं, उस पर कभी तो विराम लगे।
  • प्रारब्ध वृत्तियों का निर्माण करते हैं और वृत्तियाँ फिर से प्रारब्ध का। सम्यकत्व मार्ग है इस कुचक्र को तोड़कर सिर्फ अपने स्वभाव में शेष रह जाने का। 

Monika Jain ‘पंछी’

March 29, 2016

Power of Subconscious Mind in Hindi

विचार कर्म हैं ~ समझें अपने विचारों की जिम्मेदारी

“तुम्हारा मुझे इतने दिनों बाद अचानक कुछ लिख भेजना अनायास ही न था। कुछ ही देर पहले मन की गहराईयों ने तुम्हें याद किया था।”

इस स्टेटस को लिखते हुए मन की असीम क्षमताओं को परिचित करवाते न जाने कितने चल-चित्र आँखों से गुजर गए। बिना एक शब्द कहे विचारों और भावनाओं के सम्प्रेषण के अनगनित उदाहरणों का यह मन साक्षी रहा है।

कुछ दिनों से एक लैटर का इंतजार हो रहा था। लैटर को अब तक आ जाना चाहिए था, लेकिन नहीं आया और यह बेहद जरुरी था मेरे लिए। मम्मा से रोज पूछ रही थी कि पोस्टमैन अंकल आये क्या? आज इंतजार की शिद्दत कुछ ज्यादा ही बढ़ गयी थी। आज फिर पूछा तो मम्मा ने कहा पोस्टमैन को कई दिनों से इधर देखा ही नहीं है। लैटर का न आना बहुत परेशानी में डाल सकता था। इसलिए थोड़ी बेसब्री थी, पर कहीं न कहीं मन में विश्वास भी था कि आएगा जरुर। मेरे जीवन में भरे हुए काँटों से मम्मा से ज्यादा परिचित और कौन हो सकता है इसलिए मम्मा ने कहा 'तेरी किस्मत ही ख़राब है।' मैंने मम्मा से कहा, 'मम्मा आप बहुत निराशावादी हो। आप जाओ और अच्छा-अच्छा सोचो!' कुछ देर बाद पोस्टमैन अंकल आ ही गए। माँ ने मुझे बुलाया। माँ को उन्होंने कई सारी पोस्ट्स पकड़ाई पर मेरी नज़र जिस लिफाफे को ढूंढ रही थी वह नहीं दिखा, तो मैंने पोस्टमैन अंकल को उस लैटर के बारे में बताते हुए जब भी वह आये उसे जल्द से जल्द पहुँचाने की कह दिया। मम्मा ने अंदर आते हुए मैगजीन्स के बीच में से एक लिफाफा निकालते हुए मुझसे पूछा और हाँ, यही मेरा वह सुकून लौटाने वाला लिफाफा था। इंतजार के खत्म होने से बड़ा सुकून और हो भी क्या सकता है?

कुछ देर बाद मैं पोस्टमैन अंकल के बारे में सोच रही थी। यहाँ इस शहर में आने के बाद से कितनी ही बार काँटों से भरे जीवन पथ में वो खुशियों के फूल चुन-चुन कर मेरे लिए लाते रहे हैं, जिनसे स्थायी न सही पर ज़िन्दगी का दर्द कुछ समय के लिए कम तो हो ही जाता है और सबसे बड़ी बात मुश्किलों का सामना करने का हौसला भी मिल जाता है। मुझे उन्हें कुछ गिफ्ट देना चाहिए। क्या देना चाहिए यह सब सोचते-सोचते मैं कुछ काम निपटाने लगी और कुछ देर बाद फेसबुक पर आई। न्यूज़ फीड देखते हुए नज़र अचानक एक पोस्ट पर पड़ी जो कि एक पोस्टमैन और एक लड़की की संवेदनशील कहानी थी। उसमें उस लड़की ने उस पोस्टमैन को दिवाली के अवसर पर एक दिल छू लेने वाला गिफ्ट दिया था। मैं सोचने लगी देखो! इस लड़की ने तो गिफ्ट कर भी किया और मैं जो अभी तक सोच ही रही हूँ। उस पोस्ट को पढ़कर यह भावना और भी दृढ़ हो गयी कि अब तो कुछ अच्छा सा गिफ्ट करना ही है।

कुछ ही दिनों पहले एक और घटना हुई। कई महीनों पहले एक पोस्ट पर मुझसे काफी बड़े एक फेसबुक मित्र से किसी विचार के न मिलने पर हुई एक चर्चा पर शायद कोई बात उन्हें आहत कर गयी (हालाँकि अपनी बात मर्यादित तरीके से ही रखती हूँ) और वे अनफ्रेंड करके चले गए। उस पोस्ट पर उनके कॉमेंट्स जिस तरह से थे, पढ़कर थोड़ा बुरा मुझे भी लगा था क्योंकि हमेशा उनके कॉमेंट्स बहुत विनम्र भाषा में होते थे...और उनके कॉमेंट्स से उनका विशेष स्नेह झलकता था। वे अमित्र करके चले गए, मैंने कोई प्रतिक्रिया नहीं की। लेकिन कुछ दिनों से 'on this day' वाली पोस्ट्स में उनके पुराने बहुत प्रेरणादायक कॉमेंट्स देखे तो सोच रही थी कि हम मनुष्य कितनी छोटी-छोटी बातों पर गलतफहमियां और अहंकार पाल कर बैठ जाते हैं और जो अच्छा होता है उसे भूल जाते हैं।

खुद पर भी गुस्सा आया कि मुझे तर्क-वितर्क में पड़ने की जरुरत ही क्या थी। ये जरुरी तो नहीं कि किसी बात पर विचार न मिले तो अपनी बात को सही सिद्ध करने की कोशिश की ही जाए। गलत कौन था और कौन नहीं ये बातें हमेशा मायने नहीं रखती, मायने रखती है वह सहज अनुभूति जो हम सभी को आपस में जोड़ती है। और फिर जब अच्छा सोचने के लिए इतनी सारी बातें हों तो फिर किसी छोटी सी बात का बुरा माना ही क्यों जाए? यह सब एक-दो दिन पहले सोचा ही था कि अगले दिन होली पर उनका शुभकामनाओं का मैसेज आ गया। यह बिल्कुल अप्रत्याशित था। जिस तरह से वह गए थे, जीवन में फिर कभी कोई बात होने के आसार न लगते थे। लेकिन भाव कितने सशक्त होते हैं यह इसका एक उदाहरण था। इसलिए हमारी कोशिश यह रहे कि हम अपने भावों और विचारों को हमेशा अच्छा रखें।

दुनिया की समस्त समस्यायों का कारण और समाधान हमारे भाव और विचार ही हैं जो कर्म बनते हैं...और बिना बाहरी कर्म बने भी बहुत गहरा प्रभाव डालते हैं। क्योंकि भाव अपने आप में एक कर्म है और चर्चा करते समय जो विजयी ही होने का भाव अनायास ही हमारे मन में चला आता है, बडा ही तुच्छ है उस भाव के सामने जिसे ‘स्वीकार’ कहते हैं। इसका आशय यह नहीं कि जो जरुरी हो वह कहा ना जाए, बस कट्टरता से बचना जरुरी है। फेसबुक पर आलोचना करती हुई, क्रूर व्यंग्य करती हुई, ख़तरनाक ताने मारती हुई, नकारात्मक, सिर्फ समस्यायों ही समस्यायों से भरी, गालियों और घृणा से सनी पोस्ट्स की अति देखती हूँ तो अच्छा नहीं लगता। विचार स्पंदन होते हैं। अपने ही जैसे विचारों और घटनाओं को आकर्षित करते हैं। विचार कब वस्तु या वास्तविकता बन जाए कहा नहीं जा सकता। हम अपने शब्दों और विचारों की अहमियत नहीं समझते, लेकिन इनके कितने घातक और अच्छे प्रभाव हो सकते हैं यह सोचा जाना बेहद जरुरी है। इसलिए शब्दों और विचारों के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझिये। ये सिर्फ आपके जीवन को नहीं बल्कि सबके जीवन को प्रभावित करते हैं। इसलिए जितना संभव हो प्रेम और सकारात्मकता को फैलाइये। कुछ पाने के लिए सबसे पहले उसके बारे में सोचना और बात करना ही जरुरी है। सिर्फ समस्यायों की चर्चा से तो समस्याएं ही हासिल होनी हैं। जरुरी है बातें समाधान की भी हो। प्रेम बोईये ताकि प्रेम पुष्पित और पल्लवित हो। ज़िन्दगी नफ़रत पर बर्बाद कर देने के लिए नहीं है। ज़िन्दगी का हासिल तो सिर्फ प्रेम ही हो सकता है और कुछ भी नहीं क्योंकि यहीं मृत्यु के उस हासिल तक पहुँचा सकता है जिसे मुक्ति कहते हैं।

Monika Jain ‘पंछी’
(29/03/2016)