January 25, 2016

Letter to Religious Extremists in Hindi

कब बनेंगे हम भाग्यशाली?

अभी-अभी एक नोटिफिकेशन मिला : 'XYZ Ansari' added you to the public group 'I am so lucky because I am Muslim. Do you?'

प्यारे अंसारी जी,

सबसे पहले तो बहुत-बहुत शुक्रिया कि आपने मुझे लकी बनने का सुअवसर प्रदान किया। विगत कुछ वर्षों से लक की कुछ ज्यादा ही जरुरत है मुझे। आपके इस अतिसंवेदनशील कृत्य का सम्मान करते हुए, आपके ग्रुप की सदस्य मैं बनी रहूंगी और दिन दोगुनी-रात चौगुनी दर से अपने आप को लकी महसूस करती रहूंगी। ये बात अलग है कि बस नोटिफिकेशन बंद करके यह कृतज्ञता सामन्यतया उन सभी मित्रों के लिए रहती है जो इतने प्यार से कहीं भी ऐड कर देते हैं। क्या करूँ इतने प्यार को ठुकरा नहीं पाती। तो अंसारी जी मैं आपके इस स्नेहिल निमंत्रण का बेहद सम्मान करती हूँ और तहे दिल से अपनी कृतज्ञता व्यक्त करती हूँ कि आपने मुझे इस योग्य समझा। बस आपसे कुछ सवालों के जवाब चाहिए :

इंसान का भाग्य क्या सच में किसी शब्द या प्रतीक के साथ मात्र इस तरह से जुड़ जाने से बदल जाता है? और इंसान खुद क्या सच में इस तरह धर्म परिवर्तन से बदल जाता है? अगर ऐसा है तो फिर इस शब्द, प्रतीक के अलावा बाकी किसी चीज की तो आपको जरुरत ही न होगी? ऐसा जादू संभव हो तब तो दुनिया की सारी समस्याएं यथा गरीबी, बेरोजगारी, बलात्कार, चोरी, लूट...सब एक चुटकी में हल हो जाए। निश्चित रूप से आपकी कौम में ऐसी कोई समस्या नहीं होती होगी। है न?

इस दुनिया में जहाँ मनुष्य खुद अपने जीवन के लिए पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, हवा, पानी, सूर्य...न जाने किस-किस पर निर्भर है। जिस ब्रह्माण्ड में पृथ्वी तक की एक बिंदु से ज्यादा कोई औकात नहीं। वहां अपने दृष्टिकोण को इतना संकुचित आप लोग कैसे कर लेते हो दोस्त? इस ग्रुप में एक महिला हिन्दू महिलाओं के इस्लाम को ग्रहण कर लेने पर अपनी बेइंतहा ख़ुशी को जाहिर कर रही है। यह सफलता बहुत-बहुत मुबारक आपको। पर यह कैसी ख़ुशी है और यह कैसा धर्म है जो सिर्फ अहंकार, विस्तार और नियंत्रण से सम्बंधित हो?

ग्रुप में लिखा है : Islam is the religion of peace and compassion. मने अल्टीमेट गोल शांति और करुणा ही है। तो मतलब शांति और करुणा से ही इस्लाम की सार्थकता है। है न? तो फिर ये मुस्लिम-हिन्दू क्यों लगा रखा है? देखो! मेरी शांति और करुणा में तो चींटी और मच्छर को मारना भी शामिल नहीं। तो मेरा धर्म का टैग बदलवाकर मुझे और कितना शांत और करुण बना पाओगे? अगर इस्लाम स्वीकार करके ऐसा चमत्कार हो जाए कि मैं सारे दृश्य-अदृश्य जीवों पर करुणा बरसा सकूँ तो फिर मैं मुस्लिम बनने को तैयार हूँ। वैसे मित्र! यह भी संभव है लेकिन धर्म का टैग मात्र बदलने से नहीं।

अपने अहंकार को, अपने स्वार्थ को, अपने यश, विस्तार और नाम को धर्म का नाम जाने कितने लोग सदियों से देते आ रहे हैं। पर दोस्त! मैंने धर्म का अर्थ सिर्फ इतना सा जाना है, जहाँ अहंकार पूरी तरह से विसर्जित हो जाता है। जहाँ मैं और तुम की सारी दीवारें गिर जाती हैं...सिर्फ मानव-मानव के लिए नहीं, ब्रह्माण्ड के कण-कण के लिए। तो अगर समझ सको तो सिर्फ इतना सा समझ लो कि जिस दिन हमारे मन से बांटने वाले सारे शब्द और प्रतीक एक-एक करके गिरने लगेंगे, धर्म की शुरुआत उसी दिन से होगी। उस दिन सिर्फ कहने भर को नहीं...तुम, मैं और हम सब...सच में भाग्यशाली होंगे। सच में!

शुभकामनाएं।

Monika Jain ‘पंछी’
(25/01/2016)

नोट : जिन-जिन धर्म प्रेमियों को सिर्फ इस्लाम के लिए लिखे जाने की वजह से यह पत्र पढ़कर बहुत-बहुत ख़ुशी हुई, वे अपना नाम और धर्म जोड़कर इस ख़त को एक बार फिर से पढ़ें। धन्यवाद।

Feel free to add your views about this hindi letter to all religious extremist with a message of love, peace, compassion and unity.

January 1, 2016

Quotes on Simplicity in Hindi

Simplicity Quotes

  • 02/04/2017 - महावीर! :) अब इस नाम के मायने बहुत बदल गए हैं। पहले भी सम्मान और श्रद्धा थी लेकिन अज्ञान वश दूरी ज्यादा थी। दूरी का पूरी तरह मिटना तो सोच से ही परे है लेकिन अब उन्हें अच्छे से जाना और समझा है। यह भी समझा कि मोह (किसी भी तरह के) में बहे आँसू और प्रेम में बहे आंसुओं में कितना अंतर है। पहले आँसू अहंकार से उपजे हैं और दूसरे समर्पण से। पहले पीड़ा देते हैं और दूसरे सुकून। पहले उपद्रव रचेंगे और दूसरे शांति। प्रेम में बहे आंसुओं से सुन्दर और क्या हो सकता है? महावीर के लिए या यूँ कहूँ कि उनके माध्यम से भी ये आंसू बहे हैं। प्रेम होना इतना सुन्दर है कि इसके लिए मैं बार-बार रोना चाहूंगी, हजार बार रोना चाहूंगी। क्योंकि ये आंसू नहीं मोती है... निर्दोषिता की गहराईयों से निकले मोती! एक अतुलनीय आनंद के मोती!
  • 09/02/2017 - नवजात बच्चों और कुछ जानवरों के साथ सबसे अच्छी बात यह है कि उनकी आँखों में आँखें डालकर कितनी भी देर तक देखा जा सकता है। 
  • 09/09/2016 - बुद्ध की निश्छलता और बच्चों की निश्छलता में एक बड़ा अंतर होता है, जिसे ज्ञान कहते हैं। बुद्ध बच्चे हैं लेकिन बच्चे बुद्धू (अबोध) हैं। हालाँकि बच्चों में भी अलग-अलग मात्रा में राग-द्वेष, अहंकार आदि वृत्तियाँ पायी जाती है, लेकिन इनका क्षेत्र बहुत सीमित होता है क्योंकि उनका मन अविकसित होता है और सामाजिक प्रभाव भी बहुत कम हुए होते हैं। इसलिए बच्चे सरल और निर्दोष होते हैं। और उनकी सरलता और निर्दोषिता ईश्वरत्व की कुछ झलक दे जाती है।
  • 31/07/2016 - जितनी सरलता...उतनी स्वतंत्रता! जितनी सहजता...उतनी सुन्दरता!
  • 10/06/2016 - पता नहीं लोग इतने जटिल क्यों होते हैं? जटिल होना क्या इतना जरुरी है?
  • 02/05/2016 - जिसने जीवन की जटिलता को जितना अधिक जाना, वह उतना ही सरल हुआ। 
  • 27/04/2016 - भावों के इतने गहरे स्पंदन को समेटे उस मासूम की आँखें उस क्षण विशेष में कुछ ऐसी थी...मानों! दुनिया की सारी निर्दोषिता को समेट लायी हो...और उस क्षण की साक्षी बनी इन आँखों में कैद हो गया है वह दृश्य सदा के लिए। ये बच्चे इतने प्यारे क्यों होते हैं? :’( निर्दोषिता चरम है आकर्षण का...निसंदेह! निर्विवाद! निश्चय ही!
  • 22/04/2016 - वासनामयी आँखों से तो एक नन्हें की मासूमियत भी नहीं बच पाती और शालीनता कपड़ों की मोहताज भी नहीं, लेकिन फिर भी जहाँ और जब तक कपड़ों का उद्देश्य देह के विचार को मजबूत करना हो (अपने और दूसरों के मन में ) वहां मैं शालीनता की हिमायती हूँ। बाकी जो देह से ऊपर उठ गया हो वह तो निर्दोषिता का चरम पा ही चुका है। बाहरी शालीनता उसके सामने शर्मिंदा है। 
  • 24/11/2015 - प्रतीकात्मक शब्दों का अतिप्रयोग अर्थ के कितने अनर्थ करता है यह धर्मों के सन्दर्भ में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। इसलिए जरुरी है 'सीधी बात नो बकवास'। 
  • 24/11/2015 - सरलता ही सबसे अधिक होती है प्रभावी, गोलमोल पर होती है सिर्फ वाहवाही। 
  • 06/07/2015 - दूसरों की जासूसी छोड़कर जिस दिन से हम अपनी जासूसी करने लगेंगे...जीवन सरल से सरलतम होने लगेगा। 
  • 31/05/2015 - जिसे इसका भान हो कि उसके ज्ञान की सीमा क्या है और यह स्वीकारने में कोई हिचक न हो कि यह उसे आता है और यह नहीं आता है, ऐसे लोग मुझे बेहद अच्छे लगते हैं। उनके प्रति अनायास ही सम्मान और विश्वास की भावना आ जाती है। विशेषज्ञ/विद्वान होने के बावजूद भी कुछ मामलों में कोई गलत/अज्ञानी हो सकता है...और यह स्वीकार कर पाने का साहस ही व्यक्ति को महान बनाता है। पर अक्सर अहंकार लोगों को अपनी सीमाएँ देखने ही नहीं देता और अपने अहंकार के शोर में वे दूसरों को सुन या समझ नहीं पाते। और फिर लोग इतने ईमानदार भी तो नहीं होते। कुछ सब गोलमोल कर देंगे पर स्वीकार कभी नहीं करेंगे। बड़े पदों पर पहुँचने के बाद भी अगर ईमानदारी, स्वीकारोक्ति, सरलता और विनम्रता का यह गुण बरकरार रहे तब तो सोने पर सुहागा है। भले ही अपनी समस्या का समाधान मिले न मिले, पर मैं जब भी ऐसे लोगों से मिलती हूँ, मुझे बहुत ख़ुशी होती है। 
  • 28/02/2015 - सरलता के पास सारे समाधान है, पर लोग जटिलता में उलझे हैं। 
  • मेरी यह स्वभाव है कि अगर मुझे किसी से कोई शिकायत होती है या उसकी कोई बात बुरी लगती है तो मैं सीधा उसके मुंह पर कह देती हूँ। गुस्सा आता है तो गुस्सा निकाल देती हूँ। मन में कोई बात नहीं रखती। सामने चापलूस बने रहना और पीठ पीछे बुराई करना ये मुझसे कभी नहीं हो पाया और न ही कभी हो सकता है, पर कभी-कभी लगता है ये दुनिया चापलूसों की ही है। लोग उन्हीं से खुश रहते हैं। 
  • ज्ञान विशिष्ट नहीं बनाता...साधारण से भी साधारण बना देता है और यही इसकी विशिष्टता है। 
  • जितने अधिक आप सरल व स्पष्ट बनेंगे...उतने ही लोग आपके लिए अधिक जटिल बनते जायेंगे। लेकिन सरलता की असल परीक्षा भी यही है कि वह उस स्तर तक पहुँच सके जहाँ वह लोगों की जटिलता को भी सरलता से स्वीकार कर सके। :)
  • हर जगह शब्दों की जादूगिरी से काम नहीं चलता। कुछ चीजे सीधी कहे जाना और सीधे समझे जाना जरुरी होता है। 
  • दिखावे की कीमत होती है, मन की शांति...और इसका परिणाम होता है, जन की ईर्ष्या। बहुत घाटे का सौदा है। 
  • सरलता, मासूमियत और संवेदना को चोटों से डरकर खोने की जरुरत नहीं होती। सरलता को खोना एक पायदान नीचे उतर जाना है, जड़ बन जाना है। जरुरत है सरलता और निर्दोषिता को इतना परिष्कृत कर देने की कि फिर चोट हम तक पहुंचे लेकिन हमें लगे ही नहीं। यूँ चोट सामान्यत: जड़ता तक भी नहीं पहुँचती पर वह चोट देना सीख जाती है। लेकिन वह मृतप्राय स्थिति है। हमें तो इतना जीवंत होना है कि चोट जो हम तक पहुँचे वह भी रूपांतरित होकर प्रेम की फुहारों सी लौटे।
  • सहज उपलब्ध भी अनमोल होता है कई बार। बस पहचानने और सहेजने का हुनर चाहिए। पर पहुँच से दूर के पीछे दौड़ते-दौड़ते हम अक्सर उसे खो देते हैं जो सहजता से उपलब्ध था कभी। 

Monika Jain ‘पंछी’

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