January 31, 2016

Quotes on Knowledge in Hindi

Knowledge Quotes

  • 26/01/2017 - ज्ञान जो खाली करे वह प्रेम तक पहुंचता है और ज्ञान जो भरे वह अहंकार तक। 
  • 14/01/2017 - ज्ञान की सीमा है अपने असीम अज्ञान को जान लेना। 
  • 24/09/2016 - जानना और छूटना साथ-साथ चलता है। जितना अधिक जानेंगे...पसंद-नापसंद, समर्थन-विरोध, पक्ष-विपक्ष...उतने ही छूटने लगेंगे। 
  • 01/09/2016 - सवालों के जवाब जानते-जानते एक दिन हमें यह भी जानना होता है कि सवाल सवाल नहीं है। 
  • 29/08/2016 - जितना आसान है प्रश्न पूछना...उतना ही मुश्किल है जिज्ञासु और खोजी होना। एक जिज्ञासु के मन में प्रश्न होगा यह स्वाभाविक है लेकिन एक प्रश्न पूछने वाला जिज्ञासु ही हो यह जरुरी नहीं। यह अंतर है स्वयं के पुरुषार्थ और पका-पकाया मिल जाने का। यह अंतर है प्रश्न पूछने के लिए अनावश्यक प्रश्न पूछने और कुछ जानने के लिए आवश्यक प्रश्न पूछने का। यह अंतर है अपना ज्ञान प्रदर्शित करने और अपने अज्ञान को मिटाने की उत्कंठा का। यह अंतर है सतही/बेपरवाह होने और गहन/जागरूक होने का।
  • 07/06/2016 - ज्ञान बाँटा जा सकता है...ग्रहणशीलता नहीं। 
  • 02/05/2016 - लोगों की पसंद के अनुरूप चलकर लेखन या किसी भी क्षेत्र में सफलता की ऊचाइयों पर पहुँचना बहुत मुश्किल नहीं! लेकिन सफलता की वह परिभाषा भी तो लोगों की ही पसंद है। और फिर यह पसंद ऐसी चीज है जो यहाँ-वहाँ, जहाँ-तहाँ...न जाने कहाँ-कहाँ से प्रभावित होती है। ऐसे में क्या प्रचलन में है, इससे ज्यादा जरुरी है यह देखना कि क्या प्रचलन में होना चाहिए। सफल नहीं जिम्मेदार बनना जरुरी है। और जिम्मेदार बनने के लिए सबसे पहले खुद को पहचानना जरुरी है। पहले हम खुद को जाने और फिर अपनी जिम्मेदारियों का निर्धारण करें, यही बेहतर तरीका है। 
  • 10/02/2016 - जितना भी अधिक जानो...उतना ही मोह भंग! कर रही है कायनात साजिश कोई।
  • 31/01/2016 - आजकल कई मित्र पूछते हैं - इतना ज्ञान कहाँ से लाती हो पंछी? - मूर्खताओं के इतिहास से। :p (सभी वहीँ से लाते होंगे, महावीर और बुद्ध भी) हालाँकि मूर्खताओं से छुटकारा इतना आसान कहाँ? आशा है कभी तो मिलेगा। :) कुछ मित्रों का डर है, मैं सन्यासी न हो जाऊं कहीं? काश! ऐसा भी हो पाए कभी। आपके मुंह में घी-शक्कर! (घी-शक्कर की जगह मनपसंद मिठाई मान लेना :p) वास्तविकता यह है कि जब भी किसी के जीवन में सच्चे अर्थों में सन्यास घटित होता है तो वह परम हर्ष का विषय होता है, डर या चिंता का विषय तो बिल्कुल भी नहीं। बल्कि जब भी किसी में ऐसी संभावना या इच्छा देखें तो उसके लिए दुआ करें। :) आज सुबह-सुबह कुछ याद आया - सम्यक ज्ञान आता है सम्यक दृष्टि से। जो जैसा है उसे वैसा ही देखना, अपनी ओर से बिना कोई सहयोग किये हुए, निष्पक्ष दृष्टिकोण से। इसे ही साक्षी बनना या दृष्टा बनना कहते हैं। जब यही दृष्टि हमारे मन पर होती है तो वह सामायिक बन जाती है। सम्यक दृष्टि से उपजा यह सम्यक ज्ञान ही बनता है सम्यक आचरण...और सम्यक आचरण ही ले जाता है मुक्ति (परम स्वतंत्रता) की ओर। 
  • 22/12/2015 - हम जब भी किसी को पूजनीय बना देते हैं, या महान घोषित कर देते हैं तो दरअसल हम अपनी विफलताओं को छुपाने का प्रयास करते हैं। महान आत्माएं हमेशा से महान नहीं होती है। बस अपने ज्ञान द्वारा पशु से परमात्मा बनने के क्रमिक विकास में आगे या परम स्तर तक पहुँच जाती है और इस उपलब्धि की सम्भावना दुनिया के हर एक प्राणी में है। दरअसल कोई महान नहीं होता, सिर्फ ज्ञानवान होता है। और ज्ञान व चेतना का वह स्तर प्राप्त करना हर प्राणी के बस की ही बात है। 
  • यह एक तथ्य है कि हम सामान्यतया जिसके बारे में या जिन बातों के बारे में सबसे ज्यादा सोचते हैं बहुत कुछ वैसे ही होने लगते हैं। संगति के असर की बात इसलिए ही कही जाती है। मंत्रों का निर्माण और उच्चारण भी इसी सोच के साथ शुरू हुआ होगा कि एक अच्छे व्यक्तित्व के अच्छे गुणों के बारे में हम जब चिंतन और मनन करेंगे तो अच्छे भाव और गुण हममें अवतरित होने लगेंगे। अर्थात् मुख्य बात भाव की ही थी और उस व्यक्तित्व को धारण करने की ही थी। पर होने क्या लगा? भगवान खुश होकर हमारी अच्छी-बुरी सब इच्छाएं पूरी कर देंगे इस उद्देश्य ने सबके मन में जगह बना ली या फिर 'मुंह में राम बगल में छुरी' वाली बातें सामने आने लगी।...और अपनी स्वार्थ सिद्धि और दिखावे का उद्देश्य इतना गहराता चला गया कि उस व्यक्तित्व जिसे ईश्वर या अल्लाह कहा जाता है को बहरा या अँधा समझकर सुबह से लेकर रात तक की नौटंकी सड़कों पर होने लगी। जिसका फायदा तो एक नहीं नजर आता, हाँ नुकसान प्रकृति और जाने किस-किस को उठाना पड़ता है, इसकी कोई गिनती नहीं। धर्म के नाम पर कोई कितना अधर्म कर रहा होता है इसका अहसास भी नहीं होता उसे। इसलिए कहा जाता है, पहले जानना जरुरी है उसके बाद मानना। 
  • ज्ञान अगर साथ में अहंकार ला रहा है तो वह अज्ञान की ओर बढ़ाया गया कदम है, पर ज्ञान अगर साथ में विनम्रता ला रहा है तो वह खुद के अभी बहुत अज्ञानी होने का भान है। पहली परिस्थिति में पतन का मार्ग चुना गया है और दूसरी में उत्कर्ष का। 
  • शब्दों को सबसे अधिक वही पकड़ते हैं जो सन्दर्भ और सापेक्षता को नहीं समझ पाते। सूचना और ज्ञान में गहरा अंतर होता है। सूचना स्थूल व ज्ञान सूक्ष्म होता है। सूचना सतही व ज्ञान गहरा होता है। सूचना का स्रोत बाहरी तो ज्ञान अंत:करण से उपजता है। जो ज्ञानी है वह अलग-अलग समय, परिस्थितियों और सापेक्षता को समझकर दो विरोधाभासी कथनों से भी सहमत हो सकता है। और जो सिर्फ सूचना का भंडार है वह अपने आपको ज्ञानी सिद्ध करने के लिए हर परिस्थति में विरोध प्रकट कर सकता है।

Monika Jain ‘पंछी’

January 25, 2016

Letter to Religious Extremists in Hindi

कब बनेंगे हम भाग्यशाली?

अभी-अभी एक नोटिफिकेशन मिला : 'XYZ Ansari' added you to the public group 'I am so lucky because I am Muslim. Do you?'

प्यारे अंसारी जी,

सबसे पहले तो बहुत-बहुत शुक्रिया कि आपने मुझे लकी बनने का सुअवसर प्रदान किया। विगत कुछ वर्षों से लक की कुछ ज्यादा ही जरुरत है मुझे। आपके इस अतिसंवेदनशील कृत्य का सम्मान करते हुए, आपके ग्रुप की सदस्य मैं बनी रहूंगी और दिन दोगुनी-रात चौगुनी दर से अपने आप को लकी महसूस करती रहूंगी। ये बात अलग है कि बस नोटिफिकेशन बंद करके यह कृतज्ञता सामन्यतया उन सभी मित्रों के लिए रहती है जो इतने प्यार से कहीं भी ऐड कर देते हैं। क्या करूँ इतने प्यार को ठुकरा नहीं पाती। तो अंसारी जी मैं आपके इस स्नेहिल निमंत्रण का बेहद सम्मान करती हूँ और तहे दिल से अपनी कृतज्ञता व्यक्त करती हूँ कि आपने मुझे इस योग्य समझा। बस आपसे कुछ सवालों के जवाब चाहिए :

इंसान का भाग्य क्या सच में किसी शब्द या प्रतीक के साथ मात्र इस तरह से जुड़ जाने से बदल जाता है? और इंसान खुद क्या सच में इस तरह धर्म परिवर्तन से बदल जाता है? अगर ऐसा है तो फिर इस शब्द, प्रतीक के अलावा बाकी किसी चीज की तो आपको जरुरत ही न होगी? ऐसा जादू संभव हो तब तो दुनिया की सारी समस्याएं यथा गरीबी, बेरोजगारी, बलात्कार, चोरी, लूट...सब एक चुटकी में हल हो जाए। निश्चित रूप से आपकी कौम में ऐसी कोई समस्या नहीं होती होगी। है न?

इस दुनिया में जहाँ मनुष्य खुद अपने जीवन के लिए पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, हवा, पानी, सूर्य...न जाने किस-किस पर निर्भर है। जिस ब्रह्माण्ड में पृथ्वी तक की एक बिंदु से ज्यादा कोई औकात नहीं। वहां अपने दृष्टिकोण को इतना संकुचित आप लोग कैसे कर लेते हो दोस्त? इस ग्रुप में एक महिला हिन्दू महिलाओं के इस्लाम को ग्रहण कर लेने पर अपनी बेइंतहा ख़ुशी को जाहिर कर रही है। यह सफलता बहुत-बहुत मुबारक आपको। पर यह कैसी ख़ुशी है और यह कैसा धर्म है जो सिर्फ अहंकार, विस्तार और नियंत्रण से सम्बंधित हो?

ग्रुप में लिखा है : Islam is the religion of peace and compassion. मने अल्टीमेट गोल शांति और करुणा ही है। तो मतलब शांति और करुणा से ही इस्लाम की सार्थकता है। है न? तो फिर ये मुस्लिम-हिन्दू क्यों लगा रखा है? देखो! मेरी शांति और करुणा में तो चींटी को मारना भी शामिल नहीं। तो मेरा धर्म का टैग बदलवाकर मुझे और कितना शांत और करुण बना पाओगे? अगर इस्लाम स्वीकार करके ऐसा चमत्कार हो जाए कि मैं सारे दृश्य-अदृश्य जीवों पर करुणा बरसा सकूँ तो फिर मैं मुस्लिम बनने को तैयार हूँ। वैसे मित्र! यह भी संभव है लेकिन धर्म का टैग मात्र बदलने से नहीं।

अपने अहंकार को, अपने स्वार्थ को, अपने यश, विस्तार और नाम को धर्म का नाम जाने कितने लोग सदियों से देते आ रहे हैं। पर दोस्त! मैंने धर्म का अर्थ सिर्फ इतना सा जाना है, जहाँ अहंकार पूरी तरह से विसर्जित हो जाता है। जहाँ मैं और तुम की सारी दीवारें गिर जाती हैं...सिर्फ मानव-मानव के लिए नहीं, ब्रह्माण्ड के कण-कण के लिए। तो अगर समझ सको तो सिर्फ इतना सा समझ लो कि जिस दिन हमारे मन से बांटने वाले सारे शब्द और प्रतीक एक-एक करके गिरने लगेंगे, धर्म की शुरुआत उसी दिन से होगी। उस दिन सिर्फ कहने भर को नहीं...तुम, मैं और हम सब...सच में भाग्यशाली होंगे। सच में!

शुभकामनाएं।

Monika Jain ‘पंछी’
(25/01/2016)

नोट : जिन-जिन धर्म प्रेमियों को सिर्फ इस्लाम के लिए लिखे जाने की वजह से यह पत्र पढ़कर बहुत-बहुत ख़ुशी हुई, वे अपना नाम और धर्म जोड़कर इस ख़त को एक बार फिर से पढ़ें। धन्यवाद।

January 24, 2016

Essay on Love in Hindi

प्रेम

(1)

04/04/2017 - कोई बात नहीं करता, कोई सोचने की जरुरत भी महसूस नहीं करता...लेकिन इस दुनिया में सबसे अधिक जरुरत है ऐसी स्कूल्स की जहाँ पर प्रेम सिखाया जाए (यहाँ प्रेम सिखाने से तात्पर्य किसी किताबी ज्ञान से नहीं बल्कि उन सभी तरीकों, साधनों और तकनीकों से है जो मन को विकारों के प्रभाव से मुक्त करने और रखने में मदद कर सके), तब तक जब तक कि घर, परिवार और सामान्य स्कूल्स इसमें सक्षम नहीं होते। क्योंकि जब 80-90 साल की उम्र तक आकर भी कोई व्यक्ति प्रेम करना नहीं जान पाता, तब लगता है कि दुनिया जहाँ की तमाम उपलब्धियों के बावजूद भी उसका जीवन व्यर्थ है, पूरी तरह व्यर्थ है। इस तरह से भी कि किसी एक का प्रेम को न जान पाना भी उससे जुड़े न जाने कितनों के लिए बड़ी बाधा बन जाता है। प्रेम के बहुत गहरे और विस्तृत मायने है। इसलिए सबसे पहली शिक्षा प्रेम की! क्योंकि जिसने प्रेम को पूरी तरह जान लिया फिर उसे कोई और शिक्षा न भी मिले तब भी रत्ती भर फर्क नहीं पड़ेगा...रत्ती भर भी नहीं!

(2)

26/03/2017 - शराब, गुटखा, तम्बाकू, अफीम की भरपूर उपलब्धता और सिर्फ वासना पूर्ति के लिए यौन सम्बन्ध ये चीजें कैसे किसी देश को जन्नत बनाती है, यह मेरी समझ से परे है। वहां फिर सिर्फ मुर्दा सम्बन्ध ही बनते होंगे। ऐसे लोग कब और कैसे आत्मिक ऊंचाईयां छू पायेंगे यह भी सोच नहीं पा रही। कुंठाएं न पनपे इसके लिए खुलेपन और सहजता की जरुरत है। सहमति से बने यौन संबंधों में कोई बुराई भी नहीं। यह भी अन्य सभी जरूरतों की तरह हर प्राणी की एक जरुरत है। लेकिन फिर भी हम इस दिशा में सोचना कभी न छोड़ें कि शारीरिक-मानसिक जरूरतों से इतर हर सम्बन्ध का आधार प्रेम हो सकता है। यहाँ तक कि जिस भोजन को हम गृहण कर रहे हैं उसके प्रति भी अगर भूख की जगह कृतज्ञता वाली भावना आ जाए तो पूरा परिदृश्य ही बदलने लगता है। इसलिए जो गलत लग रहा है उसका विरोध कीजिये लेकिन थोड़ा सोच-समझकर।

(3)

18/06/2016 - प्रेम एक सार्वभौमिक भाषा है...हमारा शुद्धतम स्वरुप, जो हम सब को आपस में जोड़ता है। प्रेम से अधिक सहज अनुभूति और क्या होगी?...और प्रेम से पगे शब्दों को कहने और सुनने से अधिक सुखद और क्या हो सकता है? कल जब मैंने कहा, ‘अक्सर कोई ‘I Love You' कहता है तो मुझे तेज हंसी आती है, पर मैं बस मुस्कुरा देती हूँ।’ लक्षणा में था यह वाक्य और एक विषय विशेष से संदर्भित भी। और इस वाक्य का उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष पर हँसना तो कदापि नहीं था। मजाक उड़ाना (जिसकी तह में नफ़रत या कुंठा हो) मेरे स्वभाव में नहीं है। हँसी के कई और मायने भी हो सकते हैं - कभी-कभी यह एक बिल्कुल बेफिक्र और निर्दोष हँसी हो सकती है। कभी-कभी यह वाकई उन शब्दों का कमाल हो सकता है, जो हम सुनना चाहते थे। कभी-कभी यह गहन दर्द से भरी हँसी भी हो सकती है, जो अनुभव हमें दे जाते हैं...और कभी यह खुद पर ही हँसना हो सकता है...और भी बहुत कुछ। खैर! मेरी पोस्ट का मंतव्य बस इतना था - हम दिन में 100 बार किसी को 'I Love You' कहें...यह कोई समस्या नहीं है। बस हम जो कहें...उसके मायने भी समझे। प्रेम कबाड़ बना देने वाली चीज नहीं है।

(4)

25/01/2016 - सुनो प्रेम! हमने फूलों को तुम्हारे आगमन का प्रतीक माना, हमने हरियाली को तुमसे जोड़ा, हमने रंगों को भी तुम्हें अर्पित कर किया। कोयल के स्वर, मयूर का नृत्य, बादलों की रिमझिम...प्रकृति में ऐसा कोई भी चित्र, कोई भी भाव और कुछ भी तो शेष नहीं जो सुन्दर हो और तुमसे न जोड़ा गया हो। तुम पर इतना लिखा गया जितना कभी किसी शब्द पर नहीं लिखा गया। तुम्हें इतना पढ़ा गया जितना कभी कुछ और नहीं पढ़ा गया। फिर भी हर बार, बार-बार तुम बिल्कुल ताजा होकर खिल आते हो...कभी किसी की लेखनी से बिखरे शब्दों को चुनकर, तो कभी किसी प्रेयसी की आँखों में चंद सपनों को बुनकर...कभी किसी माँ की ममता में लिपट कर, तो कभी किसी पिता के वात्सल्य में रमकर...कभी किसी के गीतों के स्वर में, तो कभी किसी के ध्यान के प्रहर में…
 
पर जाने क्यों तुम पर हुई इतनी चर्चाओं, इतने प्रतीकों, इतने शब्दों, इतनी उपमाओं और अलंकारों के बावजूद भी ऐसा लगता है जैसे हम लोगों ने तुम्हें ठीक से समझा ही नहीं। इसलिए ही तो इस दुनिया में तुम्हारी कुछ कमी सी खलती है। पर शायद सारी दुनिया को प्रेममय देखने की ख्वाहिश ही कुछ बड़ी सी है, और शायद संतुलन के चलते यह संभव भी नहीं, लेकिन नकारात्मकता की अनावश्यकता तो कम होनी ही चाहिए न?

माँ कहती है अब फलों, सब्जियों, दालों, दूध आदि में पहले सी मिठास नहीं रही। पर माँ, यह मिठास रहेगी भी कैसे? मन की मिठास ही तो दुनिया के हर कोने तक पहुँचती है। मन ही तो स्त्रोत है। जब-जब मन में मिलावट होगी तो वह बाहर अभिव्यक्त होगी ही। सिर्फ प्रेम भरा मन ही तो शुद्धता बिखेर सकता है, और कुछ कैसे?

रूह को भी कंपा देने वाले हैं इस समाज के कुछ घिनौने सच! और जब घटनाएँ हमारी सोच और विचारों से भी परे की हो तो क्या किया जाए? काश! इतना भी हो कि हर एक हत्या हमारे भीतर किसी को जीवन देने की भावना को मजबूत करे। हर एक अन्याय हमारे भीतर न्याय करने की क्षमता को बल दे। हर एक शोषण हमारे भीतर करुणा और दया को संरक्षित करे। हर एक आडम्बर हमारी पारदर्शिता को बढ़ाये और हर एक नफरत से भरी नजर हमारी आँखों को प्रेम की गहराई दे। संतुलन के लिए यह भी तो जरुरी है।

(5)

29/05/2013 - ‘Love Always Hurts’ जिसे भी प्यार में असफलता मिली हो, धोखा मिला हो या जिसने अपने आसपास प्यार की कहानियों का दुखद अंत देखा हो, उनके मुंह से ये वाक्य सुना जा सकता है। पर एक पल के लिए सोचिये कि क्या सच में प्यार हमें दुःख देता है? नहीं यह प्यार नहीं बल्कि हमारी अपेक्षाएं और उम्मीदें होती हैं जो हमें दुःख पहुँचाती है। ये रिजेक्शन होता है जो हमें हर्ट करता है। या फिर कहिये ये प्यार का अभाव है जो हमारे दुःख का कारण बनता है।

तो फिर क्यों ना प्यार उनसे किया जाए जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरुरत हो और जिनसे बदले में कुछ मिलने की उम्मीद भी ना हो। ना रहेंगी उम्मीदें और ना पहुंचेगी दिल को कोई भी तकलीफ। प्यार करिए प्रकृति से और उन मासूम जीवों से जिन्हें धोखा देना नहीं आता। प्यार करिए उन जरूरतमंद लोगों से जिन्हें सच में प्यार की बहुत जरुरत है।

क्यों ना एक दिन हम किसी अनाथालय हो आयें और अपना प्यार वहां लुटा आयें। या फिर किसी वृद्दाश्रम में जाकर सूनी आँखों को थोड़ी चमक दे आयें। बिना उम्मीद का ये प्यार बाँट कर आइये और देखिये उस दिन आप कितनी सुकून की नींद सोते हैं। अपेक्षाओं से भरे प्यार में रातें अक्सर आंसुओं से गीले तकिये के साथ गुजरती है।

जिस दिन हमें उनसे प्यार करना आ गया जिन्हें हमारे प्यार की सच में जरुरत है उस दिन हमारी जिन्दगी से प्यार को लेकर जो भी शिकायते हैं वे हमेशा के लिए दूर हो जायेंगी और शायद सही मायनों में हम प्यार का मतलब भी समझ जाएँ जिसे आज तक दुनिया की कोई भी किताब नहीं समझा पायी।

Monika Jain ‘पंछी’

January 4, 2016

Superstition (Blind Faith) Quotes in Hindi

Superstitions (Blind Faith) Quotes

  • 04/01/2016 - न आस्तिक कहलाने की जरुरत है, न नास्तिक कहलाने की। जरुरत बस खुले दिमाग की है। किसी श्रेणी से बंध जाना अक्सर उन असीम क्षमताओं से दूर कर देता है जो हमारे भीतर विद्यमान है। कम से कम जो विज्ञान प्रेमी है उसे तो ऐसा नहीं ही करना चाहिए।
  • 11/03/2015 - सालों पहले कुछ पीले कागज या पोस्टकार्ड घर के बरामदे में यदा-कदा पड़े मिलते थे, जिनमें उन्हें छपवाकर या लिखकर 21, 51 या जाने कितने लोगों को बाँटने की लिखा होता था। बाँटने पर कुछ अच्छा और न बाँटने पर कोई दुष्परिणाम भुगतने की धमकी होती थी। आजकल फेसबुक पर कुछ पोस्ट्स या पिक्स को लाइक या शेयर करने पर बिल्कुल उसी तर्ज पर कोई चमत्कार होने की भविष्यवाणी होती है और न करने पर कुछ बुरा होने की धमक। मैं सोच रही हूँ - मुझसे बेहतर तो ये अंधविश्वास हैं। इन्होंने भी कितनी प्रगति कर ली है। 
  • 29/11/2014 - नेपाल के गढ़ीमाई मेले में पांच लाख पशुओं की बलि! क्यों माँ शब्द को बदनाम करते हो अंधभक्तों! लानत है तुम्हारी ऐसी निर्लज्ज और असंवेद्य भक्ति पर। 
  • 29/11/2014 - एक बड़ी विचित्र बात है - ईद पर हिन्दू कहते हैं कि ईद की कुर्बानी की कोई आलोचना नहीं करता और नवरात्रा या अन्य अवसर पर दी जाने वाली बलि पर मुस्लिम कहते हैं कि हिन्दुओं द्वारा दी गयी बलि किसी को दिखाई नहीं देती। ऐसा ही कुछ बाबाओं और मौलवियों के केस में भी होता है। कुल मिलाकर दोनों चाहते बस ये हैं कि उनके-उनके धर्म के नाम पर जो भी गलत-सलत हो उस पर सब चुप्पी साधे रहें और विरोध बस दूसरे का हो। मैं तो दोनों ही अवसरों पर विरोध देखती हूँ। काश! इन धर्मान्धों को यह पता होता कि जिस दिन से तुम हत्याओं, बलि, बलात्कार और सभी बुराइयों को अपने-अपने धर्म और जाति का चश्मा उतार कर देखने लगोगे और अपने धर्म में सुधार की पहल करोगे, उस दिन से ही इस देश का उद्धार शुरू हो जाएगा।
  • 31/07/2014 - मुझे तो कल क्या खाया था, ये ही याद नहीं रहता, ये निर्मल दरबार में आने वालों को सप्ताह और महीने भर पहले खाए हुए 'करी-चावल' और 'आलू के पराठें' कैसे याद रह जाते हैं? 
  • 08/07/2014 - कौन कहता है विज्ञान का विकास अंधविश्वासों पर प्रहार करता है। हमारे अंधविश्वास तो इतने ढीठ हैं कि विज्ञान का सहारा लेकर आजकल वे भी आधुनिक हो गए हैं।
  • 30/06/2014 - हिन्दू धर्म के किसी अन्धविश्वास की बुराई करो तो मुस्लिम लोगों का दिल बाग़-बाग़ हो जाता है। इस्लाम के विरोध में कुछ लिखो तो हिन्दुओं की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहता। अरे भाइयों! यहाँ इस वाल पर एक की बुराई को दूसरे की तारीफ़ समझने की गलती तो कभी भी मत करना।
  • 22/05/2014 - किसी को भगवान या हैवान बनाने की इतनी जल्दी क्यों पड़ी है आप लोगों को? इंसान को इंसान बने रहने दीजिये...और कुछ काम तो करने दीजिये पहले। इतनी ज्यादा अपेक्षाओं के बोझ से मत लादिये कि उसके नीचे इंसान दब ही जाए। न तो इतना भजन कीर्तन कीजिये कि सबके सर पर बैठ कर नाचने लगे और न ही इतनी नफ़रत पालिए कि आपकी नफ़रत की आग में जल ही जाए। सहयोगी बनिए, आलोचक भी बनिए...पर कृपा करके अंधभक्त और अंधविरोधी न बनिए। 
  • आरती-हवन से निकली आग, धुएं, आकाश में छाए बादलों, पेड़-पौधों, पत्थरों, चट्टानों आदि में अपने-अपने मन की आकृति देख लेना सामान्य बात है, लेकिन आश्चर्यचकित होकर उसका दैवीकरण संकीर्णता की उपज है। प्रकृति पहले से ही हमारे चारों ओर अनगिनत रूपों में अभिव्यक्त हो रही है, वह क्या कम आश्चर्य है? 
  • काफी समय से फेसबुक और अन्य सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर कुछ ऐसे मैसेजेज का दौर चल रहा है, जिसमें सन्देश को 15-20 लोगों को फॉरवर्ड करने पर कुछ अच्छा होने और फॉरवर्ड ना करने पर कुछ बुरा होने की धमकी दी हुई होती है। यह दुखद और आश्चर्यजनक है कि हमारी पढ़ी लिखी युवा पीढ़ी भी धड़ल्ले से ऐसे मैसेजेज को फॉरवर्ड भी करती है। आप अगर अंधविश्वासों को खत्म करने में कोई योगदान नहीं कर सकते तो कम से कम उन्हें फलने-फूलने का अवसर तो न दें। 
  • किसी भी महापुरुष के विचारों को जितना खतरा उसके आलोचकों से नहीं होता उससे कई ज्यादा खतरा उसके अंध समर्थकों और अंधभक्तों से होता है। महावीर अपनी साधना के 12 वर्षों तक मौन क्यों रहे अब समझ में आता है। जब वे बोलते थे तब भी निश्चयात्मक कथन क्यों नहीं कहते थे...यह भी अब समझ में आता है। उन्होंने कभी कोई पंथ और संप्रदाय बनाने या समर्थकों की भीड़ जुटाने में रूचि नहीं ली। हालाँकि उनके पीछे एक संप्रदाय बन ही गया। उन्होंने स्यादवाद और अनेकान्तवाद का सिद्धांत क्यों दिया...उन्होंने वर्ण व्यवस्था, आश्रम व्यवस्था, कर्म-कांडों को क्यों नहीं स्वीकारा यह आज अच्छे से समझा जा सकता है। जड़ व्यवस्थाओं और जड़ परम्पराओं ने मनुष्यता की जितनी क्षति की है उतनी और किसी चीज ने नहीं की...और ऐसा भी नहीं कि यह जड़ता सिर्फ धर्म के क्षेत्र में हो।
  • बहुत पहले कहीं लिखा पढ़ा, 'हम XYZ धर्म से हैं इसलिए ZYX नहीं खाते।' पढ़कर कुछ अजीब लगा...पर अक्सर ऐसी बातें कह दी जाती है। लगभग सबने कभी न कभी कही होगी किसी न किसी सन्दर्भ में। लेकिन मांसाहार, जमीकंद, दूध या कोई भी चीज छोड़ने का कारण या कुछ भी अपनाने का कारण जैन, ब्राह्मण, मुस्लिम, ईसाई या कुछ भी क्यों होना चाहिए? सिर्फ खाने की बात ही नहीं, बहुत सी चीजें और परम्पराएँ ऐसे ही चलती आ रही है सदियों से। ज्यादातर लोगों को कारणों से कोई मतलब ही नहीं होता। अगर सच में कारण जानने की कोशिश की जाए तो बहुत कुछ और जो गैरजरुरी है वह भी छूट जाये और जो जरुरी है वह अपना लिया जाए। क्योंकि चीजे छोड़ी नहीं जाती छूट जाती है। और हाँ, XYZ और ZYX पर ज्यादा ध्यान न लगाया जाए। मुझे नफ़रत की राजनीति नहीं आती। 
  • कुछ राम को चुन रहे हैं, कुछ रावण को। कुछ दुर्गा को तो कुछ महिषासुर को। सबको पूजने के लिए कोई ना कोई तो चाहिए ही। ऐसा थोड़े हो सकता है कि जिसकी जो बात उचित लगे उसे चुन लें।
 
Monika Jain ‘पंछी’

January 1, 2016

Quotes on Simplicity in Hindi

Simplicity Quotes

  • 02/04/2017 - महावीर! :) अब इस नाम के मायने बहुत बदल गए हैं। पहले भी सम्मान और श्रद्धा थी लेकिन अज्ञान वश दूरी ज्यादा थी। दूरी का पूरी तरह मिटना तो सोच से ही परे है लेकिन अब उन्हें अच्छे से जाना और समझा है। यह भी समझा कि मोह (किसी भी तरह के) में बहे आँसू और प्रेम में बहे आंसुओं में कितना अंतर है। पहले आँसू अहंकार से उपजे हैं और दूसरे समर्पण से। पहले पीड़ा देते हैं और दूसरे सुकून। पहले उपद्रव रचेंगे और दूसरे शांति। प्रेम में बहे आंसुओं से सुन्दर और क्या हो सकता है? महावीर के लिए या यूँ कहूँ कि उनके माध्यम से भी ये आंसू बहे हैं। प्रेम होना इतना सुन्दर है कि इसके लिए मैं बार-बार रोना चाहूंगी, हजार बार रोना चाहूंगी। क्योंकि ये आंसू नहीं मोती है... निर्दोषिता की गहराईयों से निकले मोती! एक अतुलनीय आनंद के मोती!
  • 09/02/2017 - नवजात बच्चों और कुछ जानवरों के साथ सबसे अच्छी बात यह है कि उनकी आँखों में आँखें डालकर कितनी भी देर तक देखा जा सकता है। 
  • 09/09/2016 - बुद्ध की निश्छलता और बच्चों की निश्छलता में एक बड़ा अंतर होता है, जिसे ज्ञान कहते हैं। बुद्ध बच्चे हैं लेकिन बच्चे बुद्धू (अबोध) हैं। हालाँकि बच्चों में भी अलग-अलग मात्रा में राग-द्वेष, अहंकार आदि वृत्तियाँ पायी जाती है, लेकिन इनका क्षेत्र बहुत सीमित होता है क्योंकि उनका मन अविकसित होता है और सामाजिक प्रभाव भी बहुत कम हुए होते हैं। इसलिए बच्चे सरल और निर्दोष होते हैं। और उनकी सरलता और निर्दोषिता ईश्वरत्व की कुछ झलक दे जाती है।
  • 31/07/2016 - जितनी सरलता...उतनी स्वतंत्रता! जितनी सहजता...उतनी सुन्दरता!
  • 10/06/2016 - पता नहीं लोग इतने जटिल क्यों होते हैं? जटिल होना क्या इतना जरुरी है?
  • 02/05/2016 - जिसने जीवन की जटिलता को जितना अधिक जाना, वह उतना ही सरल हुआ। 
  • 27/04/2016 - भावों के इतने गहरे स्पंदन को समेटे उस मासूम की आँखें उस क्षण विशेष में कुछ ऐसी थी...मानों! दुनिया की सारी निर्दोषिता को समेट लायी हो...और उस क्षण की साक्षी बनी इन आँखों में कैद हो गया है वह दृश्य सदा के लिए। ये बच्चे इतने प्यारे क्यों होते हैं? :’( निर्दोषिता चरम है आकर्षण का...निसंदेह! निर्विवाद! निश्चय ही!
  • 22/04/2016 - वासनामयी आँखों से तो एक नन्हें की मासूमियत भी नहीं बच पाती और शालीनता कपड़ों की मोहताज भी नहीं, लेकिन फिर भी जहाँ और जब तक कपड़ों का उद्देश्य देह के विचार को मजबूत करना हो (अपने और दूसरों के मन में ) वहां मैं शालीनता की हिमायती हूँ। बाकी जो देह से ऊपर उठ गया हो वह तो निर्दोषिता का चरम पा ही चुका है। बाहरी शालीनता उसके सामने शर्मिंदा है। 
  • 24/11/2015 - प्रतीकात्मक शब्दों का अतिप्रयोग अर्थ के कितने अनर्थ करता है यह धर्मों के सन्दर्भ में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। इसलिए जरुरी है 'सीधी बात नो बकवास'। 
  • 24/11/2015 - सरलता ही सबसे अधिक होती है प्रभावी, गोलमोल पर होती है सिर्फ वाहवाही। 
  • 06/07/2015 - दूसरों की जासूसी छोड़कर जिस दिन से हम अपनी जासूसी करने लगेंगे...जीवन सरल से सरलतम होने लगेगा। 
  • 31/05/2015 - जिसे इसका भान हो कि उसके ज्ञान की सीमा क्या है और यह स्वीकारने में कोई हिचक न हो कि यह उसे आता है और यह नहीं आता है, ऐसे लोग मुझे बेहद अच्छे लगते हैं। उनके प्रति अनायास ही सम्मान और विश्वास की भावना आ जाती है। विशेषज्ञ/विद्वान होने के बावजूद भी कुछ मामलों में कोई गलत/अज्ञानी हो सकता है...और यह स्वीकार कर पाने का साहस ही व्यक्ति को महान बनाता है। पर अक्सर अहंकार लोगों को अपनी सीमाएँ देखने ही नहीं देता और अपने अहंकार के शोर में वे दूसरों को सुन या समझ नहीं पाते। और फिर लोग इतने ईमानदार भी तो नहीं होते। कुछ सब गोलमोल कर देंगे पर स्वीकार कभी नहीं करेंगे। बड़े पदों पर पहुँचने के बाद भी अगर ईमानदारी, स्वीकारोक्ति, सरलता और विनम्रता का यह गुण बरकरार रहे तब तो सोने पर सुहागा है। भले ही अपनी समस्या का समाधान मिले न मिले, पर मैं जब भी ऐसे लोगों से मिलती हूँ, मुझे बहुत ख़ुशी होती है। 
  • 28/02/2015 - सरलता के पास सारे समाधान है, पर लोग जटिलता में उलझे हैं। 
  • मेरी यह स्वभाव है कि अगर मुझे किसी से कोई शिकायत होती है या उसकी कोई बात बुरी लगती है तो मैं सीधा उसके मुंह पर कह देती हूँ। गुस्सा आता है तो गुस्सा निकाल देती हूँ। मन में कोई बात नहीं रखती। सामने चापलूस बने रहना और पीठ पीछे बुराई करना ये मुझसे कभी नहीं हो पाया और न ही कभी हो सकता है, पर कभी-कभी लगता है ये दुनिया चापलूसों की ही है। लोग उन्हीं से खुश रहते हैं। 
  • ज्ञान विशिष्ट नहीं बनाता...साधारण से भी साधारण बना देता है और यही इसकी विशिष्टता है। 
  • जितने अधिक आप सरल व स्पष्ट बनेंगे...उतने ही लोग आपके लिए अधिक जटिल बनते जायेंगे। लेकिन सरलता की असल परीक्षा भी यही है कि वह उस स्तर तक पहुँच सके जहाँ वह लोगों की जटिलता को भी सरलता से स्वीकार कर सके। :)
  • हर जगह शब्दों की जादूगिरी से काम नहीं चलता। कुछ चीजे सीधी कहे जाना और सीधे समझे जाना जरुरी होता है। 
  • दिखावे की कीमत होती है, मन की शांति...और इसका परिणाम होता है, जन की ईर्ष्या। बहुत घाटे का सौदा है। 
  • सरलता, मासूमियत और संवेदना को चोटों से डरकर खोने की जरुरत नहीं होती। सरलता को खोना एक पायदान नीचे उतर जाना है, जड़ बन जाना है। जरुरत है सरलता और निर्दोषिता को इतना परिष्कृत कर देने की कि फिर चोट हम तक पहुंचे लेकिन हमें लगे ही नहीं। यूँ चोट सामान्यत: जड़ता तक भी नहीं पहुँचती पर वह चोट देना सीख जाती है। लेकिन वह मृतप्राय स्थिति है। हमें तो इतना जीवंत होना है कि चोट जो हम तक पहुँचे वह भी रूपांतरित होकर प्रेम की फुहारों सी लौटे।
  • सहज उपलब्ध भी अनमोल होता है कई बार। बस पहचानने और सहेजने का हुनर चाहिए। पर पहुँच से दूर के पीछे दौड़ते-दौड़ते हम अक्सर उसे खो देते हैं जो सहजता से उपलब्ध था कभी। 

Monika Jain ‘पंछी’