February 21, 2016

Pride and Prejudice Story in Hindi

असल न्याय प्रकृति के हिस्से है

‘अहंकार श्रेय नहीं देता, वह सब कुछ अधीन कर लेना चाहता है।’

इस पंक्ति को लिखते समय न जाने कितने चेहरे आँखों के सामने से गुजर गए। उसमें से एक चेहरा था बचपन में स्कूल की एक अध्यापिका का। स्कूल के समय में पढ़ाई के साथ-साथ अन्य साहित्यिक गतिविधियों में भी मैं बहुत सक्रिय थी। पंचायत, जिला, राज्य एवं विविध स्तरों पर होने वाली प्रतियोगिताओं की जानकारी बच्चों तक पहुँचाने का कार्य उन्हीं अध्यापिका का था।

विषय पता चलने के बाद मैं दिन-रात मेहनत करके घर पर रखी कुछ पत्रिकाओं, किताबों और अपने मन से वाद-विवाद, निबंध, भाषण, कविता, पत्र वाचन या जो भी कोई प्रतियोगिता होती उसकी सामग्री तैयार करती थी। प्रतियोगिता का परिणाम लगभग हमेशा प्रथम रहता था, जिसकी सूचना इस तरह मिलती थी कि वह अध्यापिका सारे स्कूल के हर एक क्लास, प्रिंसिपल रूम, स्टाफ रूम सबमें घूम-घूमकर फूली न समाती हुई कहती कि मोनिका का फलां प्रतियोगिता में प्रथम स्थान आया है और उसे सारी की सारी तैयारी मैंने ही करवाई थी। उनका अपने ’मैं’ पर इतना जोर होता था कि मेरा ’मैं’ गौण हो जाता था। :) ऐसा कई बार हुआ। जिस क्लास में मैं खुद बैठी होती थी वहां भी यह सूचना मुझ तक ऐसे ही पहुँचती थी, बल्कि उन्होंने तैयारी करवाई इस बात पर मेरा समर्थन भी ले लिया जाता। शिक्षकों के प्रति सम्मान, उस स्कूल के माहौल का डर और मेरी अंतर्मुखता इस बात की इजाजत नहीं देती थी कि मैं कुछ विरोध में कहूँ।

पक्षपात को पोषण भी अहंकार से ही मिलता है। यह पक्षपात जाति पर आधारित हो सकता है, संबंधों पर आधारित हो सकता है, या कोई भी अन्य आधार हो सकता है। उस समय मैं 10th क्लास में थी और वे अध्यापिका 12th क्लास की क्लास टीचर थी। जिसकी कुछ छात्राओं से उनका विशेष लगाव था। तब जिला स्तरीय टूर्नामेंट में एक निबंध प्रतियोगिता की सूचना आई थी। उन अध्यापिका ने मुझसे कंटेंट तैयार करके लाने को कहा। कई दिनों की मेहनत के बाद मैं 30-40 पृष्ठों का एक निबंध तैयार करके ले गयी। उन्होंने मुझसे वह ले लिया और एक दो दिन बाद मुझे स्टाफ रूम में बुलाया जहाँ 12th क्लास की वे छात्राएं भी थीं। उनकी ओर इशारा करके उन अध्यापिका ने मुझे कहा कि इन लड़कियों का आखिरी साल है इस स्कूल में इसलिए इन्हें प्रतियोगिता में भेज देते हैं। ( हालाँकि मेरा भी आखिरी साल ही था उस स्कूल में...क्योंकि वहां मेरे सब्जेक्ट्स थे नहीं, लेकिन उन अध्यापिका के अनुसार मुझे और भी अवसर मिलेंगे।)...और यह कहकर वह निबंध जो मुझसे तैयार करवाया गया था उन्हें दे दिया गया। मैं चुपचाप क्लास में चली आई थी, लेकिन घर आकर बहुत रोई थी। उस समय न तो इतना बड़प्पन था कि ख़ुशी-ख़ुशी यह स्वीकार कर पाती और न ही इतना साहस कि विरोध कर पाती।

अगले साल स्कूल बदल गया था। नया स्कूल कोएड था और वहां बहुत स्वतंत्रता थी। लेकिन फिर भी हर विद्यालय में कुछ अध्यापक ऐसे होते ही हैं जो अपनी मान्यताओं, स्वार्थ, अहंकार और ईर्ष्या के सामने प्रतिभा का सम्मान नहीं करते। मुझे नहीं पता यह सही था या गलत लेकिन 6th क्लास से लेकर 11th क्लास तक हर साल बेस्ट स्टूडेंट का अवार्ड जिसमें मेरा नाम मेजोरिटी से फाइनल होता था वहां किसी एक या दो अध्यापकों के हस्तक्षेप की वजह से वह आखिरी क्लास (12th) के बच्चों को दे दिया जाता था।

इसी तरह जीवन कई सारे पक्षपातों का साक्षी रहा है। बहुत कुछ खोया है लेकिन मेहनत के बल पर बहुत कुछ पाया भी है, पर मन बस अब इस खोने और पाने से बहुत ऊपर उठ जाना चाहता है। कभी-कभी कुछ मामलों में अन्याय जैसा लगता था लेकिन अब समझ चुकी हूँ कि सामान्यत: मनुष्य अहंकार और इससे जनित पक्षपात, पूर्वाग्रहों, ईर्ष्या, द्वेष, मोह आदि से युक्त होता ही है, बस मात्रा और आधार अलग-अलग होते हैं। और इसी वजह से मनुष्यों द्वारा न्याय जैसा कुछ हो ही नहीं सकता। इसके अलावा जीवन ऐसा है कि किसी एक के साथ भी किसी आधार पर न्याय किया जाएगा तो वह किसी और के साथ किसी अन्य आधार पर अन्याय हो ही जाएगा। इसका आशय यह नहीं कि गलत के ख़िलाफ़ आवाज़ न उठाई जाए। जहाँ जरुरी है वहां उठाई ही जानी चाहिए। कई बार उठाती भी हूँ, कई बार नहीं भी...जब लगता है कि शांति बड़ी चीज है। हमें कब क्या करना है यह प्रश्न सही और गलत के साथ-साथ सजगता, कर्तव्य, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का भी है। बाकी असल न्याय प्रकृति के हिस्से है और उसी के हिस्से रहेगा। और यह केवल वह प्रकृति नहीं जो बाहर है, यह वह प्रकृति भी है जो प्रारब्ध, संचित कर्मों और प्रवृत्तियों के रूप में हमारे भीतर है। यह वह प्रकृति है जो सर्वत्र है।

Monika Jain ‘पंछी’
(21/02/2016)

February 11, 2016

Trust (Faith) Quotes in Hindi

Trust Quotes

  • 11/02/2016 - प्रॉमिस डे? बस हंसी आ रही है। कोई दिन मनाने के विरोध में नहीं रही कभी, लेकिन एक सच यह भी तो है कि जो चीजें दुर्लभ हो जाती हैं, वे दिन विशेष में सिमट कर रह जाती है। यह 'विश्वास' भी तो कुछ ऐसा ही है। इसके लिए किसी वादे की जरुरत नहीं होनी चाहिए थी, लेकिन हमने पैदा कर दी। और तो और उसके बाद 'वादे होते ही हैं तोड़ने के लिए' इस पर भी सील लगा दी। हमेशा कहती हूँ और आज फिर : किसी की सरलता, निर्दोषिता और विश्वास को मजाक मत बनने दो। दुनिया में किसी एक का भी विश्वास टूटता है तो समूची मानवता में अविश्वास गहराता है।
  • 08/12/2015 - यह आपने लिखा है, यकीन नहीं हो रहा...यह आपकी आवाज़ है, यकीन नहीं हो रहा...यह आपने कुक किया है, यकीन नहीं हो रहा...यह आपने ड्रा/डिज़ाइन किया है, यकीन नहीं हो रहा... etc...etc...etc. मैं क्या शक्ल से इतनी ढपोल लगती हूँ या जिनपे यकीन होता है वो क्या आसमान से टपकते हैं? काश! कभी कुछ ऐसा बुनूं, जिसपे मुझे भी यकीन न हो। :p 
  • 08/08/2015 - कभी-कभी अकाउंट डीएक्टिवेट करना होता है। ऐसे में हर बार कई दोस्तों को लग जाता है कि उन्हें ब्लॉक कर दिया है, तो कुछ चीजें बताना जरुरी है। मेरे लिए ब्लॉक या अनफ्रेंड करना इन्टरनेट पर किया जाने वाला सबसे महत्वहीन और नीरसता वाला कार्य है। इसकी सामान्यतया मुझे जरुरत भी नहीं होती। बाकी ये काम तभी करती हूँ जब कोई और विकल्प नहीं बचता और तब भी अगर सामने वाला ही कर दे तो मैं उसकी शुक्रगुजार रहती हूँ। ऐसे में अकारण किसी को ब्लॉक करने का तो सवाल ही नहीं उठता। अभी भी मुश्किल से मेरी ब्लॉक लिस्ट में 4-5 लोग होंगे। ब्लॉक सिर्फ वही लोग होते हैं जिनका उद्देश्य बस ब्लॉक होना ही होता है, या फिर इंसान अच्छे हों लेकिन फिर भी ब्लॉक होना दोनों के हित में हो। तो कोई भी ऐसा ख़याल अपने दिल और दिमाग में ना लायें। आप सभी मेरे लिए महत्वपूर्ण हैं। पोस्ट्स पर आपका समर्थन और स्वस्थ आलोचना दोनों ही मेरे लिए बहुत जरुरी है, और आपकी उदासीनता से भी मुझे लेश मात्र समस्या नहीं। मैं यहाँ बस प्यार बांटने और प्यार पाने के लिए ही हूँ। नफरत की दीवारें तोड़नी हैं, बनानी नहीं। इसलिए खुद पर विश्वास रखिये और मुझ पर भी। 
  • 08/06/2015 - जब एक माँ बच्चे पर किसी वजह से हाथ उठाती है तो किसी और अपने की अनुपस्थिति में वह बच्चा मार खाते हुए भी माँ का ही आँचल पकड़कर प्यार पाने की कोशिश करता है। मासूमियत और भरोसा शायद इसे ही कहते हैं।
  • 14/03/2015 - अविश्वास और शक लोगों के दिलों-दिमाग में इस कदर जगह बना चुके हैं कि कोई खुली किताब सा सामने हो तब भी शक और संदेह से बच नहीं सकता। कई मामलों में सच है कि हम जैसे होते हैं लोगों को भी वैसा ही देखते हैं। अक्सर कहती हूँ और आज फिर, दुनिया के किसी कोने में किसी एक का भी विश्वास टूटता है तो समूची मानवता में अविश्वास गहराता है। मने किसी एक के प्रति हमारा अपराध समूची मानवता के विरुद्ध अपराध है। 
  • आस्था और विश्वास को अन्धविश्वास न बनने दे। 
  • अगर एक बार आपका भरोसा बुरी तरह तोड़ दिया जाता है तो संभव है कि आपके शब्दकोष में औरों पर विश्वास का शब्द ही हमेशा के लिए क्षतिग्रस्त हो जाए। 
  • कैसी होती होगी उस मन की स्थिति, जिसे खूनी ना होने पर भी खूनी करार दे दिया जाये। जिसके चोर ना होने पर भी चोरी का इल्जाम लग जाए। जिसके झूठ ना बोलने पर भी उसे झूठा समझ लिया जाए। कितनी भी विषम परिस्थितियाँ हों, सारी दुनिया विरोध में हो, लेकिन जिसे हम चाहते हैं अगर उसका भरोसा साथ हो तो फिर हर मुश्किल को धैर्य से पार पाना आसान हो जाता है, लेकिन अगर स्थिति इसके उलट हो - कोई जिसके विश्वास की सबसे ज्यादा जरुरत हो उसका ही भरोसा ना हो तो ऐसे में 'मैं खूनी नहीं हूँ', 'मैं चोर नहीं हूँ', 'मैं झूठा नहीं हूँ' ये चीत्कारें एक दिन आवाज़ खो देती है और मन के किसी कोने में सिसक-सिसक कर दम तोड़ देती है। ऐसे में बहुत संभव है, जिसने खून नहीं किया वह खुद को खूनी मान ले या खूनी बन जाए। जिसने चोरी नहीं की वह खुद को चोर मान ले या चोरी करने लगे। जिसने झूठ नहीं बोला वह खुद को झूठा समझ ले या सच में झूठ बोलने लगे और जो पागल नहीं, वह खुद को पागल मान ले या सच में पागल हो जाए। 

Monika Jain ‘पंछी’

February 6, 2016

Apple Theft Childhood Story in Hindi

मैं एप्पल चोर

ऐसा भी नहीं था कि मुझे एप्पल खानी थी। ऐसा भी नहीं था कि मन लालची था। ऐसा भी नहीं था कि पहले कभी बिना पूछे किसी की चीज उठाई हो। अपने एग्जाम पेपर्स में कोई सवाल न आने पर एक पल को भी आगे-पीछे, बाएं-दायें न झाँकने वाली लड़की को चीटिंग क्या होता है यह नहीं पता था। दूसरों की चीजों या भौतिक वस्तुओं की ओर कभी कोई खासा आकर्षण रहा ही नहीं तो चोरी क्या होती है यह भी कैसे पता होता? लेकिन जाने क्यों उस दिन राह में चलते हुए भैया के बेफिक्री और मजाक में बार-बार कहे शब्द 'तू वहां से एप्पल नहीं उठा सकती' मैंने बड़ी गंभीरता से ले लिए थे। भैया को खुद भी कहाँ अहसास होगा कि मैं उन शब्दों के विपरीत को साकार कर ही दूंगी। तब उम्र भी क्या थी, यही कोई 6-7 साल और भैया भी तो सिर्फ दो साल ही तो बड़ा था, पर बार-बार ये शब्द सुनकर लगा जैसे मेरे साहस को चुनौती दी जा रही हो। जैसे मेरी निर्भयता को ललकारा गया हो। हालाँकि तब नन्हा और अबोध मन यह कहाँ जानता था कि किसी की चीज को बिना पूछे चुपके से उठा लेना साहस और निर्भयता का काम नहीं होता, तब तो बस कानों में यही शब्द गूँज रहे थे कि 'तू वह एप्पल नहीं उठा सकती' और मैं बिना कुछ और सोचे तुरंत उस ठेले के पास गयी और एक एप्पल उठा लिया।

ठेले वाला आसपास कहीं ओर खड़ा था और उसने मुझे ऐसा करते देख लिया था तो वह वहीँ से चिल्लाया और इधर सारा साहस और निर्भयता एक ही झटके में वहां छोड़कर हम ऐसे दौड़े जैसे कोई मेराथन जीतना था। अपने मोहल्ले के खेलों में अपनी परफॉरमेंस की वजह से मुझे बिजली और भैया को बादल का ख़िताब मिला हुआ था इसलिए ठेले वाला रेस में हमसे जीत तो नहीं सकता था पर उसे पीछे आता हुआ देखकर एप्पल वहीँ छोड़कर कुछ देर और हमारी दौड़ जारी रही। एप्पल वाले को तो उसकी एप्पल मिल गयी थी पर उस दिन मेरे मासूम मन ने बहुत कुछ खो दिया था।

भैया को मुझे ब्लैकमेल करने का एक अच्छा-खासा बहाना मिल गया था। अब जब-जब भैया को मुझसे कोई बात मनवानी होती थी वह यही कहकर मनवाता कि वह मम्मी-पापा को एप्पल चोरी वाली बात बता देगा और कई दिनों तक उसकी ब्लैकमेलिंग सफल रही। पर उसे शायद नहीं पता था कि उसकी बात को चैलेंज की तरह मानकर बीच बाजार में किसी ठेले से एप्पल उठा लेने वाली लड़की अपनी यह करतूत खुद सबको बताने का साहस भी तो कर सकती है। और फिर क्या...मैंने सारी घटना खुद ही मम्मी-पापा को सुना दी और एक बड़ा बोझ मन से उतर गया।

मम्मी-पापा ने क्या कहा वह कुछ याद नहीं पर बचपन की यह घटना कितनी ही हल्की-फुल्की और हंसी मजाक में उड़ा देने वाली ही क्यों न हो इससे कितने सारे सबक सीखे जा सकते हैं। सबसे पहला तो यही कि किसी के भी कहने में आकर, या किसी भी उन्माद में बिना सोचे-समझे हम कोई काम नहीं करें। वह कोई भी कार्य साहस और निर्भयता कभी नहीं हो सकता जिससे हमारी आत्मा पतन के मार्ग पर धकेलता हो। दूसरा अपनी गलतियों, अपराधों और दोषों को स्वीकार करने में हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए। सच सिर्फ एक बार ही बोलना होता है पर झूठ और अपराध बोध को तिल-तिल कर जीना पड़ता है और तीसरा यह कि भले ही दूसरे दोषी रहे हों तब भी किसी पर दोषारोपण किये बगैर जब अपने हिस्से की गलतियों की जिम्मेदारी हम खुद लेने लगते हैं तो परिस्थितियां और परिणाम न भी बदल पायें पर उनका सामना करने की हिम्मत जरुर आ जाती है। क्योंकि शिकायतें और अपेक्षाएं अक्सर जीने नहीं देती।

Monika Jain ‘पंछी’
(06/02/2016)

February 5, 2016

Essay on Salvation (Freedom) in Hindi

मन विजय करें 

यूँ तो यह पूरा ब्रह्माण्ड ही रहस्मयी है और हमारा जीवन भी अगर हम ध्यान दें तो कितने सारे रहस्यात्मक अनुभवों का साक्षी बनता है। ऐसे ही कई अनुभवों में कल का दिन भी कुछ अद्भुत अनुभवों के नाम रहा। ईर्ष्या, द्वेष, स्वार्थ, असुरक्षा, अहंकार और शक किसी व्यक्ति को किस स्तर तक नीचे गिरा सकते हैं इसके कुछ नमूने देखे। उन्हीं में से एक था...जिस लड़की के शब्दकोष में गालियों के नाम पर जानवरों को बदनाम करने वाले सिर्फ एक दो शब्द ही विद्यमान थे उसे एक मोहतरमा ने स्त्री सूचक कई गालियों से परिचय करवाया। 

खैर! यह सब कुछ इतना अद्भुत नहीं था। जो सबसे अद्भुत चीज थी वह यह थी कि जिन बातों को सुनकर मुझे बहुत अधिक गुस्सा, तनाव या रोना आना चाहिए था उन बातों पर मैं मुस्कुरा रही थी। कोई संघीन मिथ्या आरोपों और अपशब्दों के पटाखे और बम छोड़ रहा था और मैंने चेहरे और होंठों पर फूल खिल रहे थे। अचानक खुद को चिमटी काटकर देखा कि कहीं यह कोई सपना तो नहीं...या फिर कहीं बुद्ध, जीसस या महावीर की आत्मा तो कुछ देर को प्रवेश नहीं कर गयी है। :p क्योंकि एक सीमा से पार हो जाने के बाद, या ऊपर तक भर जाने पर मेरे गुस्से का ज्वालामुखी फूट ही पड़ता है। और इन मायनों में क्रोध मेरी एक कमजोरी भी है। लेकिन कल कुछ भी नहीं भर रहा था। बल्कि सब कुछ खाली और शांत होते हुए लग रहा था। मैं लगातार मुस्कुरा रही थी...अभी भी मुस्कुरा रही हूँ। :) और सब कुछ विपरीत होने के बावजूद भी मैं बहुत ख़ुश थी। क्योंकि एक बार फिर यह विश्वास गहरा हुआ कि मन पर विजय ही सबसे बड़ी विजय है। इस विजय के मार्ग में जो सबसे बड़ी बाधा थी, जिसे दूर करने के लिए प्रकृति कब से संकेत दे रही थी...कल हिम्मत जुटाकर उसे भी दूर कर पायी। क्योंकि मोह अक्सर हमें वह नहीं देखने देता जो सच होता है। 

महावीर के जीवन का एक किस्सा है - एक बार वे एक वन में गहरे ध्यान में लीन थे, तभी वहां एक ग्वाला अपने बैलों के साथ आया। महावीर को कुछ समय के लिए अपने बैलों का ध्यान रखने की कहकर वह कहीं चला गया। महावीर ध्यान में थे और उन्हें इस बारे में कुछ पता ही नहीं था। जब ग्वाला वापस आया तो बैल वहां नहीं थे। उसने समझा कि महावीर ने उसके बैल कहीं छिपा दिए हैं और क्रोध में आकर उनके कानों में खीले ठोक दिए। महावीर आत्मज्ञानी थे इसलिए समताभाव से चुपचाप सब देखते रहे। ऐसी मान्यता है कि उन्हें यह भी स्मरण था कि अपने ही किसी पिछले जन्म में उन्होंने एक राजा के रूप में एक छोटी सी गलती के लिए इसी ग्वाले को जो शायद एक गायक था के कानों में गर्म सीसा पिघलवाकर डलवा दिया था। 

इस मान्यता और पुनर्जन्म की इस रूप में सत्यता असत्यता के बारे में तो मैं कुछ नहीं कह सकती। लेकिन अगर राग-द्वेष और ऐसे ही सभी विकारों से दूर होकर अपने मन से कोई भी सहयोग दिए बिना हम किसी चीज को सिर्फ साक्षी या दृष्टा की तरह देखते हैं तो इसका अनुभव सच में अवर्णनीय और अद्भुत है। कई लोगों के लिए साक्षी बनने या दृष्टा बनने की टर्म शायद नयी हो, उनके लिए हम एक उदाहरण लेते हैं : जैसे हमारे पाँव या हाथ पर कहीं चोट लगी। 99% लोग दर्द से कराहने लगेंगे, कई जोर-जोर से रोने लगेंगे। लेकिन इस स्थिति में अगर कोई साक्षी बनता है तो वह सिर्फ उस दर्द को द्रष्टा बनकर देखेगा। वह अपने मन से इसे कोई सहयोग नहीं देगा। जैसा है सिर्फ वैसा देखेगा...मन को उस हिस्से से अलग करके...जैसे दर्द सिर्फ शरीर के उस हिस्से को हो रहा है...मुझे नहीं हो रहा है। जब हम ऐसा करने में संभव हो पाते हैं तो हमें दर्द का इतना ज्यादा अहसास नहीं होता। शरीर और उसका दर्द हमें खुद से अलग जान पड़ता है। और यह साक्षी बनने की प्रक्रिया हर एक घटना पर लागू की जा सकती है। यही मुक्त होना है, यही स्वतंत्र होना है, यही ध्यान है, यही जागरूकता है, यही सम्यक दृष्टि है। जब यह अपने ही मन पर हो तो सामायिक बन जाती है। और यह सम्यक दृष्टि ही हमें सम्यक ज्ञान तक ले जाती है। यह सम्यक ज्ञान ही सम्यक आचरण बनता है और यह सम्यक आचरण ही हमें मुक्ति मने परम स्वतंत्रता की ओर ले जाता है। 

Monika Jain ‘पंछी’
(05/02/2016)

February 4, 2016

Anger (Angry) Quotes (Status) in Hindi

Anger Quotes / Angry Status

  • 13/08/2017 - कुछ अपवादजनक मामलों को छोड़कर आजकल मुझमें आसानी से प्रतिक्रिया नहीं आती। वैसे मैं इस बदलाव को अच्छा मानती हूँ, बशर्ते वो अपवादजनक मामले मुझ पर हावी न हो। उनकी तीव्रता का कम होकर खत्म होना भी बेहद जरुरी है। बाकी अच्छा मैं इसे इसलिए मानती हूँ क्योंकि मन में तुरंत बिना सोचे समझे प्रतिक्रिया का न होना किसी भी घटना, किसी के भी व्यवहार को सूक्ष्म रूप से समझने का मौका देता है और अगर हमारे हाथ में कुछ हो तो उसी अनुरूप उत्तर देने में सक्षम भी बनाता है। और आपवादिक रूप से जिन लोगों की समझ बहुत विकसित हो जाती है उन्हें तो फिर कुछ ज्यादा सोचने की जरूरत ही नहीं रहती। वे कभी प्रतिक्रिया नहीं देते, सहज और सीधे उत्तर ही देते हैं। यह उत्तर मौन भी हो सकता है और कुछ और भी। 
  • 13/08/2017 - गुस्से के मामले में मैं ऐसी थी कि रेयरली ही आता था लेकिन वह शायद धीरे-धीरे भरा हुआ गुस्सा होता था इसलिए तेज भी होता था। ऐसे क्रोध हमारे चित्त से लेकर हमारे पूरे शरीर को कम्पित करने लगता है। शारीरिक चोट तो नहीं पहुंचाती थी कभी सामने वाले को लेकिन भाषण बहुत चुभने वाला दे देती थी, कभी-कभी खाने की प्लेट को गिराया भी है और दरवाजे को पटका भी है। खाने की प्लेट फेंकने वाली बात बहुत अपराध बोध से भर देती थी। गुस्से के बाद बहुत तेज रोने भी लगती थी। हालाँकि इस तरह का तेज गुस्सा आखिरी बार एक साल पहले आया था और वह भी एक बहुत लम्बे गैप के बाद ही आया था लेकिन तब खुद से वादा किया था कि अब यथासंभव कभी नहीं। 
  • 13/08/2017 - दरअसल हर भाव की अपनी विशेषता और उपयोगिता तो होती है लेकिन फिर भी प्रतिक्रियाएं कभी समाधान नहीं होती। मतलब गुस्सा या अन्य किसी भाव को प्रकट करना जरुरी हो तो वह हम करें लेकिन चित्त और शरीर का निष्कम्पित रहना जरुरी है। यह सीख जाना वाकई बहुत मुश्किल है। लेकिन कभी-कभी जब ऐसी कुछ चीजें घटित हुई तो यह भी समझ आया कि यह कितना जरुरी है। हालाँकि अनिवार्य अनुकूलता बिल्कुल नहीं है तो जीवन के रहते यह पूरी तरह हो पायेगा, यह संभव लगता नहीं, लेकिन फिर भी जितना समझ और जान सकूँ उतना तो करना ही चाहती हूँ। 
  • 14/01/2017 - कुछ लोग किस बात का खार (खुन्नस) खाए बैठे रहते हैं समझ ही नहीं आता। अच्छी बात यह है कि आजकल गुस्सा कम आता है, मुस्कुराहट ज्यादा। :) 
  • 28/06/2016 - आवेश क्षीण होकर गुम हो जाते हैं, बस हम उन्हें सहयोग न दें तो। आवेश में उठने के इच्छुक कदम को हरसंभव निरस्त करते जाना चाहिए। अक्सर ही आवेश के खत्म हो जाने पर यह अहसास होता है कि अगर वह कदम उठ जाता तो कितना गलत होता। 
  • 25/06/2016 - ...क्योंकि असल वाली कट्टी कहकर नहीं होते। 
  • 10/05/2016 - जिससे प्यार करते हैं, कभी-कभी उसी पर गुस्सा निकालने का मन होता है। वह झेल लेगा न, शायद इसलिए। :p 
  • 17/04/2016 - नाराज हो जाओ कभी तो बस इतने से फासले पर होना जो एक कदम, एक स्पर्श, एक मुस्कुराहट, एक आंसू, एक शब्द या प्रेम की एक नजर भर से भरा जा सके।...और भरावन हो ऐसी कि कभी नाराज हुए थे, ये याद भी न रह सके।
  • 04/02/2016 - कितने कमजोर हो गए हैं लोग। अद्भुत गालियों का सहारा लेना पड़ता है।

Monika Jain ‘पंछी’

Quotes on Smile in Hindi

Smile Quotes

  • 06/02/2017 - जीवन के भयंकर झंझावातों का सामना करता कोई...उसकी सरल और सहज मुस्कान ही उसके जीवन की परम उपलब्धि है। जिसकी कोई तुलना हो ही नहीं सकती। अगर उसकी मुस्कान को बचाए रखने में सहयोगी न बन सको तो कोई बात नहीं लेकिन कम से कम उसकी मुस्कान को छीनने के सहभागी तो न बनो।
  • 04/02/2016 - जब भी उदास होती हूँ, जाने कहाँ से कोई अजनबी मित्र मुस्कुराहट लाने वाला सन्देश भेज देता है। सबसे खूबसूरत रिश्ते बिना अपेक्षाओं वाले ही होते है न? और प्रकृति वह तो हमारी सबसे सच्ची मित्र है। वह हमेशा हमें मुस्कुराता हुआ ही देखना चाहती है...हम बस अपने मित्र बन जाएँ।
  • 22/04/2015 - जीवन में सब कुछ छिन जाए तब भी एक चीज हमेशा बचाकर रखना...अपनी मुस्कुराहट। क्योंकि मुस्कुराहट सृजन करती है।
  • 09/03/2015 - जो लोग छोटी-छोटी बातों में ख़ुश हो जाते हैं, उन्हें अक्सर छोटी-छोटी बातों के लिए ही तरसाया जाता है। इसलिए अपनी ख़ुशी के लिए किसी का मोहताज क्यों होना? एक सकारात्मक दिल, दो मुस्कुराते होंठ और दो उम्मीद से चमकती आँखें! बस काफी है ख़ुश रहने के लिए।
  • 28/02/2015 - किसी को चीयर अप कर दिया तो समझो दिन बन गया, और जब-जब कोई कह देता है कि तुम ज़िन्दगी भर याद रहोगी, तब तो नींद में भी मुस्कुरा लेती हूँ।
  • 25/02/2015 - कोई परेशानी में है, तकलीफ में है, दुःख में है तो बार-बार उससे कारण मत पूछो। बस इतना प्रयास करो कि वह अपने दुःख से ध्यान हटाकर मुस्कुरा सके। मुस्कुराहट बाँटों...सहजता दौड़ी चली आएगी। न भी आई तो उद्देश्य तो पूरा हुआ।
  • 22/02/2015 - पर्सनली मुझे फोटोग्राफी ज्यादा पसंद नहीं है, क्योंकि ऐसा लगता है जैसे कुछ कैप्चर करने के चक्कर में बहुत कुछ छूट जाता है। दूसरी ओर विरोधाभास यह है कि जब भी मैं उदास होती हूँ तो शेयर करने के लिए अपनी हँसती-मुस्कुराती फोटो ढूंढती हूँ, एंड इट वर्क्स। कारण अब तक तो पता नहीं था, पर शायद यही है कि हमें खुद को उदास देखना पसंद नहीं होता। शायद खुद को मुस्कुराते हुए देखते हैं तो मुस्कुराने भी लगते हैं, तो इसलिए अब ये भी लगता है कि ख़ुशी के पलों की कुछ तस्वीरें तो होनी चाहिए...तो इस विरोधाभास का निष्कर्ष यह है कि कैमरा किसी और को पकड़वा दो और खुद एन्जॉय करो। :p
  • 17/02/2015 - एक्स्ट्रा चीजों को जब भी खुद से मुक्त करके किसी जरूरतमंद को देते हैं, तब उसके चेहरे पर जो मुस्कुराहट खिलती है, उसे देखकर लगता है कि चवन्नी की चीज के चार हजार वसूल हो गए।
  • 05/02/2015 - मुस्कुराहटें संक्रामक होती है।
  • ऐसा नहीं था कि मेरे पास कोई तर्क या जवाब नहीं था। लेकिन जब बिना जाने वह निष्कर्षों के ढेर लिए बैठा था तो फिर मुस्कुरा भर देना या चुप रह जाना मुझे अधिक तार्किक लगा।
  • आंसुओं के समंदर से मुस्कुराहटों के मोती चुन पाना आसान नहीं होता।
  • किसी के लिए कुछ बुरा सोचते हो वह कभी कहो ना कहो, पर अगर किसी के लिए कुछ भी अच्छा सोचते हो तो आज, अभी और इसी वक्त कह दो। क्या पता कल हो न हो। मुस्कुराहटें बहुत कीमती है और किसी के चेहरे पर खिलने पर तो अनमोल हो जाती है।
  • छोटी-छोटी बातों में खुश हो लेना चाहिए। कभी-कभी बिन बात के भी खुश हो लेना चाहिए। क्योंकि होठों की मुस्कुराहट मन की ख़ुशी का सीक्रेट है। और यह उतना ही सच है जितना कि दिल की ख़ुशी होठों की मुस्कुराहट का राज। और हाँ, ये फेसबुक की स्माइल भी बहुत काम की है। सो रोज यहाँ भी जहाँ-तहाँ ढेर सारी स्माइली बना लेनी चाहिए।
  • गरीब है वह जिसके पास दूसरों के लिए मुस्कुराहट नहीं।
  • बहादुर वह है जो सबसे मुश्किल समय में भी अपने चेहरे की मुस्कान खोने नहीं देता।


Monika Jain ‘पंछी’

February 2, 2016

My Childhood Memories Essay in Hindi

मैं घुमक्कड़...

बच्चों के साथ खेलने के दौरान - एक को ताश में हुकुम का इक्का इतना पसंद आ जाता है कि वह उसे कहीं छिपाकर रख आती है और फिर बाकी पत्तों से खेलने आ जाती है। फिर पत्ता निकलवाने के लिए उसे समझाना पड़ता है कि जिसे प्यार करते हैं उसे कैद नहीं करते। :p दूसरी चेस खेलते समय अपनी ही किसी गोटी को खाने लग जाती है। :D तीसरी चाइनीज़ चेकर्स खेलते समय खुद की बजाय अनजाने में मेरी गोटी चलाकर उसे और पीछे पहुँचा आती है। :'( चौथी के छोटे-छोटे हाथ कैरम स्ट्राइकर को चलाने के लिए झाड़ू मार विधि अपनाते हैं। :O कुल मिलाकर बच्चों को ही कुछ-कुछ पता होता है कि स्वतंत्रता क्या होती है। उनके लिए कोई ढर्रे होते ही नहीं।

अपने बचपन में झांकती हूँ तो पाती हूँ कि बचपन से ही मुझे पैदल घूमने का बहुत शौक रहा है। मम्मा और बाकी सभी बताती हैं कि जब मैं दो-तीन साल की थी तो अपनी ही एक हम उम्र सहेली के साथ बिना किसी को खबर पड़े चुपके से घूमने निकल जाया करती थी। सड़क पर चलते-चलते हम जाने कहाँ-कहाँ पहुँच जाते थे। मतलब हम आये दिन खो जाते थे और दोनों परिवारों में कोहराम मच जाता था। बाद में हमारे बड़े भाइयों को पहरे पर बैठाया जाता था, तो भी हम कभी-कभी जाने कैसे चकमा देकर निकल ही जाते थे।

तब हमारा घर बन रहा था और मैं अपनी सहेली से अक्सर कहती, ‘चल, नए घर घूमने चलें।’ माँ और भैया यह भी बताते हैं कि हम एक जोड़ी चप्पल पाँव में पहनकर जाते थे और एक जोड़ी जूते हाथ में ले जाते थे। :p अब इसके पीछे क्या लॉजिक रहा होगा यह तो नहीं पता, लेकिन हाँ हमारा यह घूमना तब छूटा जब एक दिन कुछ कुत्ते हमारे पीछे पड़ गए, तब हाथ वाले जूते वहीँ छूट गए और कुछ लोगों की मदद से हम अपने-अपने घरवालों को मिल गए। मैं सहेली की मम्मी की गोद में और सहेली मेरी मम्मी की गोद में...वाह! क्या सीन रहा होगा। :p और फिर रोते-रोते, डांट खाते हुए घर पहुँचे होंगे। :) उसके बाद मेरा परिवार नए घर में शिफ्ट हो गया...और उस सहेली के साथ घुमक्कड़ी बस वहीँ तक रही। हालाँकि बाद में कई सालों बाद फिर एक बार हम दो साल साथ-साथ पढ़े।

कुछ भी याद न रहने वाली उम्र के उस दौर के बाद भी किसी ना किसी रूप में यह घुमक्कड़पन हमेशा जारी रहा। जब किसी का साथ रहा तब भी और जब न रहा तब भी। इनफैक्ट मैं तो पढ़ाई भी घूम-घूम कर किया करती थी। तब का एक पड़ोसी दोस्त बताता है कि वह और उसका एक मित्र जो दोनों ही मेरे क्लासमैट्स थे, मुझे किताब हाथ में लेकर छत पर लगातार घंटों घूमते देखकर उनका सर चकरा जाता था। छत पर ही एक दिन वह उसके दोस्त का सुंदर सा प्रपोजल कार्ड लेकर आया था...और बड़ी मासूमियत से मैंने उसी समय उसे वापस लौटा दिया। कार्ड लौटा देने पर उस पड़ोसी मित्र ने कहा, कोई नहीं वह यूज़ कर लेगा इस कार्ड को किसी और लड़की को देने के लिए। :p पता नहीं उसने उसके दोस्त को जाकर क्या कहा होगा। :)

मुझे दिन में सोने की आदत कभी नहीं रही इसलिए स्कूल से आने के बाद दिन में जब घर में सब को सोता हुआ देखती थी तो मन न लगने के चलते पूरे घर में पैर पटकते हुए चक्कर लगाती रहती थी और इंतजार करती थी कि कोई उठ जाये। पड़ोस की लड़कियों के साथ भी मोर्निंग और नाईट वाक के कई दौर चले। यहाँ तक कि लव रिलेशन की भी सबसे खूबसूरत चीज लगती है...रात के अँधेरे में हाथ पकड़ कर लम्बी सैर पर जाना...तब ऐसा लगता है कि बस चलते रहें, चलते रहें, वापस कभी लौटना ही न हो….तुम भी चलो, हम भी चलें...चलती रहे ये ज़िन्दगी की तर्ज पर। :)

खैर! आज अचानक मेरा मन किया जानने का कि अब तक मैं कितने किलोमीटर चल चुकी हूँ। अगर यह पता चल जाता तो शायद कोई रिकॉर्ड मेरे नाम भी हो जाता। :p ;)

Monika Jain ‘पंछी’
(02/02/2016)