February 21, 2016

Pride and Prejudice Story in Hindi

असल न्याय प्रकृति के हिस्से है

‘अहंकार श्रेय नहीं देता, वह सब कुछ अधीन कर लेना चाहता है।’

इस पंक्ति को लिखते समय न जाने कितने चेहरे आँखों के सामने से गुजर गए। उसमें से एक चेहरा था बचपन में स्कूल की एक अध्यापिका का। स्कूल के समय में पढ़ाई के साथ-साथ अन्य साहित्यिक गतिविधियों में भी मैं बहुत सक्रिय थी। पंचायत, जिला, राज्य एवं विविध स्तरों पर होने वाली प्रतियोगिताओं की जानकारी बच्चों तक पहुँचाने का कार्य उन्हीं अध्यापिका का था।

विषय पता चलने के बाद मैं दिन-रात मेहनत करके घर पर रखी कुछ पत्रिकाओं, किताबों और अपने मन से वाद-विवाद, निबंध, भाषण, कविता, पत्र वाचन या जो भी कोई प्रतियोगिता होती उसकी सामग्री तैयार करती थी। प्रतियोगिता का परिणाम लगभग हमेशा प्रथम रहता था, जिसकी सूचना इस तरह मिलती थी कि वह अध्यापिका सारे स्कूल के हर एक क्लास, प्रिंसिपल रूम, स्टाफ रूम सबमें घूम-घूमकर फूली न समाती हुई कहती कि मोनिका का फलां प्रतियोगिता में प्रथम स्थान आया है और उसे सारी की सारी तैयारी मैंने ही करवाई थी। उनका अपने ’मैं’ पर इतना जोर होता था कि मेरा ’मैं’ गौण हो जाता था। :) ऐसा कई बार हुआ। जिस क्लास में मैं खुद बैठी होती थी वहां भी यह सूचना मुझ तक ऐसे ही पहुँचती थी, बल्कि उन्होंने तैयारी करवाई इस बात पर मेरा समर्थन भी ले लिया जाता। शिक्षकों के प्रति सम्मान, उस स्कूल के माहौल का डर और मेरी अंतर्मुखता इस बात की इजाजत नहीं देती थी कि मैं कुछ विरोध में कहूँ।

पक्षपात को पोषण भी अहंकार से ही मिलता है। यह पक्षपात जाति पर आधारित हो सकता है, संबंधों पर आधारित हो सकता है, या कोई भी अन्य आधार हो सकता है। उस समय मैं 10th क्लास में थी और वे अध्यापिका 12th क्लास की क्लास टीचर थी। जिसकी कुछ छात्राओं से उनका विशेष लगाव था। तब जिला स्तरीय टूर्नामेंट में एक निबंध प्रतियोगिता की सूचना आई थी। उन अध्यापिका ने मुझसे कंटेंट तैयार करके लाने को कहा। कई दिनों की मेहनत के बाद मैं 30-40 पृष्ठों का एक निबंध तैयार करके ले गयी। उन्होंने मुझसे वह ले लिया और एक दो दिन बाद मुझे स्टाफ रूम में बुलाया जहाँ 12th क्लास की वे छात्राएं भी थीं। उनकी ओर इशारा करके उन अध्यापिका ने मुझे कहा कि इन लड़कियों का आखिरी साल है इस स्कूल में इसलिए इन्हें प्रतियोगिता में भेज देते हैं। ( हालाँकि मेरा भी आखिरी साल ही था उस स्कूल में...क्योंकि वहां मेरे सब्जेक्ट्स थे नहीं, लेकिन उन अध्यापिका के अनुसार मुझे और भी अवसर मिलेंगे।)...और यह कहकर वह निबंध जो मुझसे तैयार करवाया गया था उन्हें दे दिया गया। मैं चुपचाप क्लास में चली आई थी, लेकिन घर आकर बहुत रोई थी। उस समय न तो इतना बड़प्पन था कि ख़ुशी-ख़ुशी यह स्वीकार कर पाती और न ही इतना साहस कि विरोध कर पाती।

अगले साल स्कूल बदल गया था। नया स्कूल कोएड था और वहां बहुत स्वतंत्रता थी। लेकिन फिर भी हर विद्यालय में कुछ अध्यापक ऐसे होते ही हैं जो अपनी मान्यताओं, स्वार्थ, अहंकार और ईर्ष्या के सामने प्रतिभा का सम्मान नहीं करते। मुझे नहीं पता यह सही था या गलत लेकिन 6th क्लास से लेकर 11th क्लास तक हर साल बेस्ट स्टूडेंट का अवार्ड जिसमें मेरा नाम मेजोरिटी से फाइनल होता था वहां किसी एक या दो अध्यापकों के हस्तक्षेप की वजह से वह आखिरी क्लास (12th) के बच्चों को दे दिया जाता था।

इसी तरह जीवन कई सारे पक्षपातों का साक्षी रहा है। बहुत कुछ खोया है लेकिन मेहनत के बल पर बहुत कुछ पाया भी है, पर मन बस अब इस खोने और पाने से बहुत ऊपर उठ जाना चाहता है। कभी-कभी कुछ मामलों में अन्याय जैसा लगता था लेकिन अब समझ चुकी हूँ कि सामान्यत: मनुष्य अहंकार और इससे जनित पक्षपात, पूर्वाग्रहों, ईर्ष्या, द्वेष, मोह आदि से युक्त होता ही है, बस मात्रा और आधार अलग-अलग होते हैं। और इसी वजह से मनुष्यों द्वारा न्याय जैसा कुछ हो ही नहीं सकता। इसके अलावा जीवन ऐसा है कि किसी एक के साथ भी किसी आधार पर न्याय किया जाएगा तो वह किसी और के साथ किसी अन्य आधार पर अन्याय हो ही जाएगा। इसका आशय यह नहीं कि गलत के ख़िलाफ़ आवाज़ न उठाई जाए। जहाँ जरुरी है वहां उठाई ही जानी चाहिए। कई बार उठाती भी हूँ, कई बार नहीं भी...जब लगता है कि शांति बड़ी चीज है। हमें कब क्या करना है यह प्रश्न सही और गलत के साथ-साथ सजगता, कर्तव्य, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का भी है। बाकी असल न्याय प्रकृति के हिस्से है और उसी के हिस्से रहेगा। और यह केवल वह प्रकृति नहीं जो बाहर है, यह वह प्रकृति भी है जो प्रारब्ध, संचित कर्मों और प्रवृत्तियों के रूप में हमारे भीतर है। यह वह प्रकृति है जो सर्वत्र है।

Monika Jain ‘पंछी’
(21/02/2016)

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February 6, 2016

Apple Theft Childhood Story in Hindi

मैं एप्पल चोर

ऐसा भी नहीं था कि मुझे एप्पल खानी थी। ऐसा भी नहीं था कि मन लालची था। ऐसा भी नहीं था कि पहले कभी बिना पूछे किसी की चीज उठाई हो। अपने एग्जाम पेपर्स में कोई सवाल न आने पर एक पल को भी आगे-पीछे, बाएं-दायें न झाँकने वाली लड़की को चीटिंग क्या होता है यह नहीं पता था। दूसरों की चीजों या भौतिक वस्तुओं की ओर कभी कोई खासा आकर्षण रहा ही नहीं तो चोरी क्या होती है यह भी कैसे पता होता? लेकिन जाने क्यों उस दिन राह में चलते हुए भैया के बेफिक्री और मजाक में बार-बार कहे शब्द 'तू वहां से एप्पल नहीं उठा सकती' मैंने बड़ी गंभीरता से ले लिए थे। भैया को खुद भी कहाँ अहसास होगा कि मैं उन शब्दों के विपरीत को साकार कर ही दूंगी। तब उम्र भी क्या थी, यही कोई 6-7 साल और भैया भी तो सिर्फ दो साल ही तो बड़ा था, पर बार-बार ये शब्द सुनकर लगा जैसे मेरे साहस को चुनौती दी जा रही हो। जैसे मेरी निर्भयता को ललकारा गया हो। हालाँकि तब नन्हा और अबोध मन यह कहाँ जानता था कि किसी की चीज को बिना पूछे चुपके से उठा लेना साहस और निर्भयता का काम नहीं होता, तब तो बस कानों में यही शब्द गूँज रहे थे कि 'तू वह एप्पल नहीं उठा सकती' और मैं बिना कुछ और सोचे तुरंत उस ठेले के पास गयी और एक एप्पल उठा लिया।

ठेले वाला आसपास कहीं ओर खड़ा था और उसने मुझे ऐसा करते देख लिया था तो वह वहीँ से चिल्लाया और इधर सारा साहस और निर्भयता एक ही झटके में वहां छोड़कर हम ऐसे दौड़े जैसे कोई मेराथन जीतना था। अपने मोहल्ले के खेलों में अपनी परफॉरमेंस की वजह से मुझे बिजली और भैया को बादल का ख़िताब मिला हुआ था इसलिए ठेले वाला रेस में हमसे जीत तो नहीं सकता था पर उसे पीछे आता हुआ देखकर एप्पल वहीँ छोड़कर कुछ देर और हमारी दौड़ जारी रही। एप्पल वाले को तो उसकी एप्पल मिल गयी थी पर उस दिन मेरे मासूम मन ने बहुत कुछ खो दिया था।

भैया को मुझे ब्लैकमेल करने का एक अच्छा-खासा बहाना मिल गया था। अब जब-जब भैया को मुझसे कोई बात मनवानी होती थी वह यही कहकर मनवाता कि वह मम्मी-पापा को एप्पल चोरी वाली बात बता देगा और कई दिनों तक उसकी ब्लैकमेलिंग सफल रही। पर उसे शायद नहीं पता था कि उसकी बात को चैलेंज की तरह मानकर बीच बाजार में किसी ठेले से एप्पल उठा लेने वाली लड़की अपनी यह करतूत खुद सबको बताने का साहस भी तो कर सकती है। और फिर क्या...मैंने सारी घटना खुद ही मम्मी-पापा को सुना दी और एक बड़ा बोझ मन से उतर गया।

मम्मी-पापा ने क्या कहा वह कुछ याद नहीं पर बचपन की यह घटना कितनी ही हल्की-फुल्की और हंसी मजाक में उड़ा देने वाली ही क्यों न हो इससे कितने सारे सबक सीखे जा सकते हैं। सबसे पहला तो यही कि किसी के भी कहने में आकर, या किसी भी उन्माद में बिना सोचे-समझे हम कोई काम नहीं करें। वह कोई भी कार्य साहस और निर्भयता कभी नहीं हो सकता जिससे हमारी आत्मा पतन के मार्ग पर धकेलता हो। दूसरा अपनी गलतियों, अपराधों और दोषों को स्वीकार करने में हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए। सच सिर्फ एक बार ही बोलना होता है पर झूठ और अपराध बोध को तिल-तिल कर जीना पड़ता है और तीसरा यह कि भले ही दूसरे दोषी रहे हों तब भी किसी पर दोषारोपण किये बगैर जब अपने हिस्से की गलतियों की जिम्मेदारी हम खुद लेने लगते हैं तो परिस्थितियां और परिणाम न भी बदल पायें पर उनका सामना करने की हिम्मत जरुर आ जाती है। क्योंकि शिकायतें और अपेक्षाएं अक्सर जीने नहीं देती।

Monika Jain ‘पंछी’
(06/02/2016)

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February 2, 2016

My Childhood Memories Essay in Hindi

मैं घुमक्कड़...

बच्चों के साथ खेलने के दौरान - एक को ताश में हुकुम का इक्का इतना पसंद आ जाता है कि वह उसे कहीं छिपाकर रख आती है और फिर बाकी पत्तों से खेलने आ जाती है। फिर पत्ता निकलवाने के लिए उसे समझाना पड़ता है कि जिसे प्यार करते हैं उसे कैद नहीं करते। :p दूसरी चेस खेलते समय अपनी ही किसी गोटी को खाने लग जाती है। :D तीसरी चाइनीज़ चेकर्स खेलते समय खुद की बजाय अनजाने में मेरी गोटी चलाकर उसे और पीछे पहुँचा आती है। :'( चौथी के छोटे-छोटे हाथ कैरम स्ट्राइकर को चलाने के लिए झाड़ू मार विधि अपनाते हैं। :O कुल मिलाकर बच्चों को ही कुछ-कुछ पता होता है कि स्वतंत्रता क्या होती है। उनके लिए कोई ढर्रे होते ही नहीं।

अपने बचपन में झांकती हूँ तो पाती हूँ कि बचपन से ही मुझे पैदल घूमने का बहुत शौक रहा है। मम्मा और बाकी सभी बताती हैं कि जब मैं दो-तीन साल की थी तो अपनी ही एक हम उम्र सहेली के साथ बिना किसी को खबर पड़े चुपके से घूमने निकल जाया करती थी। सड़क पर चलते-चलते हम जाने कहाँ-कहाँ पहुँच जाते थे। मतलब हम आये दिन खो जाते थे और दोनों परिवारों में कोहराम मच जाता था। बाद में हमारे बड़े भाइयों को पहरे पर बैठाया जाता था, तो भी हम कभी-कभी जाने कैसे चकमा देकर निकल ही जाते थे।

तब हमारा घर बन रहा था और मैं अपनी सहेली से अक्सर कहती, ‘चल, नए घर घूमने चलें।’ माँ और भैया यह भी बताते हैं कि हम एक जोड़ी चप्पल पाँव में पहनकर जाते थे और एक जोड़ी जूते हाथ में ले जाते थे। :p अब इसके पीछे क्या लॉजिक रहा होगा यह तो नहीं पता, लेकिन हाँ हमारा यह घूमना तब छूटा जब एक दिन कुछ कुत्ते हमारे पीछे पड़ गए, तब हाथ वाले जूते वहीँ छूट गए और कुछ लोगों की मदद से हम अपने-अपने घरवालों को मिल गए। मैं सहेली की मम्मी की गोद में और सहेली मेरी मम्मी की गोद में...वाह! क्या सीन रहा होगा। :p और फिर रोते-रोते, डांट खाते हुए घर पहुँचे होंगे। :) उसके बाद मेरा परिवार नए घर में शिफ्ट हो गया...और उस सहेली के साथ घुमक्कड़ी बस वहीँ तक रही। हालाँकि बाद में कई सालों बाद फिर एक बार हम दो साल साथ-साथ पढ़े।

कुछ भी याद न रहने वाली उम्र के उस दौर के बाद भी किसी ना किसी रूप में यह घुमक्कड़पन हमेशा जारी रहा। जब किसी का साथ रहा तब भी और जब न रहा तब भी। इनफैक्ट मैं तो पढ़ाई भी घूम-घूम कर किया करती थी। तब का एक पड़ोसी दोस्त बताता है कि वह और उसका एक मित्र जो दोनों ही मेरे क्लासमैट्स थे, मुझे किताब हाथ में लेकर छत पर लगातार घंटों घूमते देखकर उनका सर चकरा जाता था। छत पर ही एक दिन वह उसके दोस्त का सुंदर सा प्रपोजल कार्ड लेकर आया था...और बड़ी मासूमियत से मैंने उसी समय उसे वापस लौटा दिया। कार्ड लौटा देने पर उस पड़ोसी मित्र ने कहा, कोई नहीं वह यूज़ कर लेगा इस कार्ड को किसी और लड़की को देने के लिए। :p पता नहीं उसने उसके दोस्त को जाकर क्या कहा होगा। :)

मुझे दिन में सोने की आदत कभी नहीं रही इसलिए स्कूल से आने के बाद दिन में जब घर में सब को सोता हुआ देखती थी तो मन न लगने के चलते पूरे घर में पैर पटकते हुए चक्कर लगाती रहती थी और इंतजार करती थी कि कोई उठ जाये। पड़ोस की लड़कियों के साथ भी मोर्निंग और नाईट वाक के कई दौर चले। यहाँ तक कि लव रिलेशन की भी सबसे खूबसूरत चीज लगती है...रात के अँधेरे में हाथ पकड़ कर लम्बी सैर पर जाना...तब ऐसा लगता है कि बस चलते रहें, चलते रहें, वापस कभी लौटना ही न हो….तुम भी चलो, हम भी चलें...चलती रहे ये ज़िन्दगी की तर्ज पर। :)

खैर! आज अचानक मेरा मन किया जानने का कि अब तक मैं कितने किलोमीटर चल चुकी हूँ। अगर यह पता चल जाता तो शायद कोई रिकॉर्ड मेरे नाम भी हो जाता। :p ;)

Monika Jain ‘पंछी’
(02/02/2016)

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