March 21, 2016

Essay on Character (Human Nature) in Hindi

अज़ब-ग़ज़ब के लोग हम

बीते दिनों शिवा ट्रायलॉजी का दूसरा भाग ’नागाओं का रहस्य’ पूरा किया। अमीश ने शिव के माध्यम से एक बेहद सुन्दर बात कही है, 'कोई भी अच्छा या बुरा नहीं है। वे या तो शक्तिशाली होते हैं या फिर दुर्बल। शक्तिशाली व्यक्ति अपनी नैतिकताओं पर टिके रहते हैं, चाहे कितनी ही परीक्षा हो या संकट आये। दुर्बल व्यक्ति अधिकतर समय इस बात का अनुभव भी नहीं करते कि वे कितना गिर चुके हैं।' अब इसे हम अच्छाई और बुराई कहें, शक्ति और दुर्बलता कहें, ज्ञान और अज्ञान कहें या फिर सकारात्मकता और नकारात्मकता...इन दोनों के अलग-अलग मात्रा में संयोग से ही बनते हैं विभिन्न व्यक्तित्व और चरित्र!

एक मजबूत व्यक्तित्व के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है अपनी अंतरात्मा के प्रति जवाबदेही। यह जवाबदेही उसे स्वत: ही दुनिया में अपने कर्तव्यों के प्रति जिम्मेदार बना देती है। उनका कोई भी कार्य कोई छवि विशेष बनाने के लिए नहीं होता। उनके कार्य उनकी अंतरात्मा से प्रेरित होते हैं। वहीं एक कमजोर व्यक्तित्व के लिए अपना भौतिक सुख सबसे पहले आता है। हाँ, दुनिया के सामने अपनी छवि उनके लिए महत्वपूर्ण हो सकती है...पर वहां अच्छाई सहज या स्वाभाविक न होकर मेनीपुलेट होगी, जिससे जन्म लेते हैं पाखण्ड और आडम्बर! इसके साथ ही कोई ऐसा भी हो सकता है जिसकी जवाबदेही न अपनी अंतरात्मा के प्रति हो और न ही जिसे अपनी किसी छवि की चिंता हो।

अमीश के उपन्यास के ही चरित्रों की बात करें तो शिव और सती मजबूत चरित्र को और दक्ष एक कमजोर चरित्र को प्रकट करता है, जो अपनी छवि की सजगता को लेकर अपनी विकृत पुत्री और पौत्र का ही परित्याग कर देता है, यहाँ तक कि विकृत संतानों के जन्म का दोष भी अपनी पत्नी पर मढ़ देता है। ऐसे चरित्रों के झूठ और सच सिर्फ अवसरों की खोज में रहते हैं। हालाँकि अभी तीसरा भाग वायुपुत्रों की शपथ पढ़ना बाकी है। उससे कई और नयी चीजें सामने आएँगी।

वर्षों के अवलोकन में मैंने भी इसी तरह की एक विशेष प्रजाति को डिटेक्ट किया है...जो अपने जीवन की हर विषमता, हर मुश्किल, हर परेशानी का दोष दूसरों पर मढ़ने को हर वक्त तैयार रहते हैं...वहां भी जहाँ दूर-दूर तक कहीं कोई आधार ही न हो। अपनी निराशा, कुंठा, झुंझलाहट और नफरत का ठीकरा फोड़ने के लिए इन्हें हमेशा ऐसे शख्स की जरुरत पड़ती है जो निर्दोष या संवेदनशील हो, या फिर भावनात्मक रूप से उनसे जुड़ा होने की वजह से उन्हें कोई हानि न पहुंचा पाए और अपराधी न होते हुए भी अपनी संवेदनशीलता या जुड़ाव की वजह से दु:खी होता रहे। दोष मढ़ने वाले ये लोग हमेशा किसी न किसी को कोसते नजर आयेंगे। जीवन-साथी, माता-पिता, पुत्र-पुत्री, बाहरी व्यक्ति...कोई भी वह शिकार हो सकता है। मनहूस, अपशगुनी, विकर्म...ऐसे शब्द निश्चित रूप से इसी प्रजाति की उपज होंगे। हद तब हो जाती है जब उनका मोबाइल, कंप्यूटर, टीवी या कोई भी चीज ख़राब होती है तब भी वे किसी को दोष मढ़ने के लिए ढूंढ निकालते हैं...भले ही वह व्यक्ति सात समुन्दर पार ही क्यों न बैठा हो। यह कैसी मानसिकता है इसे अभी तक समझ नहीं पायी। पर हाँ, फ़िलहाल इसे कह सकती हूँ गैरजिम्मेदारी की पराकाष्ठा! वैसे सबसे मजेदार बात यह होती है कि मौकापरस्त ये लोग अपनी रणनीति को बदलते हुए किसी की निजी जीवन की परेशानियों को पहले खोद-खोद कर जानते हैं, फिर अवसर आने पर अपनी घृणा को तुष्ट करने के लिए यह हमला करते हुए भी पाए जाते हैं कि जरुर भुगत रहे होंगे अपने ही कर्मों का फल! सुपर क्यूट! इसे कहते हैं चित भी मेरी और पट भी मेरी। काश! भरोसे और विश्वास को कायम रखने का मतलब उन्हें पता होता।

इसी तरह किसी विषय विशेष पर चर्चा करते हुए कुछ भद्र जनों के तर्क जब खत्म होने लगते हैं तो अपशब्द/कुतर्क शुरू हो जाते हैं। जिन्हें शब्दों की मर्यादा में रहते हुए सत्य (कटु हो सकता है) पर दृढ़ता से टिके रहना आता है और अपनी गलती होने पर स्वीकार करना और क्षमा माँगना भी आता है, उन्हें कुटिल अपशब्दों और क्रूर व्यंग्यों के स्तर तक जाने की जरुरत नहीं पड़ती। ऐसा नहीं है कि उन्हें ऐसे शब्दों की जानकारी या प्रयोग पता नहीं होता, लेकिन स्वाभाविक/सहज तौर पर उन्हें जरुरत पड़ती ही नहीं...और जिन्हें पल-पल में इसकी जरुरत पड़ती है उनके स्तर का अंदाज़ा लगा ही सकते हैं। सबसे मजेदार बात यह कि कुतर्कों का कीचड़ उछालने में जिनकी क्षमता सबसे तेज होती है, कड़वे सच को झेलने में वे उतने ही फुस्स होते हैं।

कई लोगों के लिए अध्यात्म अलग से कोई विषय या चर्या है। मुझे लगता है अध्यात्म एक सहज गुण है जिसे विकसित जरुर किया जा सकता है, लेकिन किसी अलग खांचे में नहीं बांटा जा सकता कि चलो इतने समय हम आध्यात्मिक हो लेते हैं और बाकी समय भौतिक। इसके अलावा यह अध्यात्म का गुण ही होता है जो व्यक्ति को जिम्मेदार बनाता है। अपनी गलतियों, अपनी परेशानियों की जिम्मेदारी खुद लेने जितना मजबूत और सक्षम बनाता है। क्षमा मांगने और क्षमा कर देने जितना साहसी भी और अहंकार से उपजी कृतघ्नता छोड़कर कृतज्ञ और विनम्र भी। अपनी अति उन्नत अवस्था में (महावीर या बुद्ध जैसे व्यक्तित्व के रूप में) यह दूसरों की अपने प्रति गलतियों को भी उसे अपने ही कर्म फल का निमित्त मानकर भूल जाता है। इस चरम स्तर तक जो पहुँच जाए निश्चय ही वह अपने जीवन में कभी दु:खी नहीं हो सकता...और शायद इसी वजह से ही अध्यात्म आनंद की कुंजी है। ईश्वर हम सभी को इस मार्ग पर चलने में सक्षम बनायें...और इतना निर्भय बनाये जहाँ न हम किसी से भयभीत हों और न ही कोई हमसे।

Monika Jain ‘पंछी’
(21/03/2016)

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March 7, 2016

Essay on Gender Equality Inequality in Hindi

Essay on Gender Equality Inequality in Hindi

(1)

बस इतनी सी आज़ादी...दोगे?
(फेसबुक पोस्ट पर आये सवालों के जवाब)

जिन्होंने यह कहा कि आज़ादी मांगी नहीं जा सकती, वह लेनी/छीननी पड़ती है...या जिन्होंने यह कहा कि आज़ादी भीतर होती है।

बेशक! वास्तविक और पूर्ण आज़ादी भीतर ही है...बाहर कहीं भी नहीं। और इस पूर्णता या आज़ादी के लिए स्त्री और पुरुष क्या...हर एक भेद से ऊपर उठना होता है। और वह प्रकृति के विरुद्ध जाना नहीं, अपनी वास्तविक प्रकृति पाना ही है। लेकिन उस पूर्णता को प्राप्त करने से बहुत पहले और उस पूर्णता को प्राप्त करने के लिए भी भीतर के साथ-साथ बाहर एक अनुकूल माहौल की जरुरत होती है। उस अनुकूल माहौल को माँगना बस सहयोग माँगना है। हम सब आपस में इतने संबंधित हैं कि यह अनुकूल माहौल छीना नहीं जा सकता...सहयोग से ही बनाया जा सकता है।

जिन्होंने यह कहा कि यह भूलना भी क्यों चाहिए कि तुम स्त्री हो...या जिन्होंने यह कहा कि आप पुरुष बनना चाहती हैं।

सबसे पहले तो यह कि हर पुरुष में एक स्त्री और हर स्त्री में एक पुरुष पहले से ही विद्यमान है। यही वजह है कि पूर्णता भीतर की चीज है बाहर की नहीं। पर उस पूर्णता से पहले जब मैं यह कहती हूँ कि मैं हमेशा यह याद नहीं रखना चाहती कि मैं स्त्री हूँ तो मैं प्रकृति द्वारा एक स्त्री को प्रदत्त भिन्नताओं को नकारने की बात नहीं कह रही। एक पुरुष और स्त्री के स्वाभाविक आकर्षण को नकारने की बात भी नहीं कह रही। कुछ मर्यादाएं और शालीनताएँ जो समय के अनुरूप एक सुव्यवस्था के लिए जरुरी है (दोनों ओर से) उन्हें भुलाने की बात भी नहीं कह रही। मैं बस उन जबरन बनायी सीमाओं की बात कह रही हूँ जो एक स्त्री में सिर्फ स्त्री होने की वजह से भय उत्पन्न करती है। जहाँ वह चलते समय, कुछ बोलते समय, किसी शुरुआत से पहले, किसी निर्णय से पहले...या कई सारे मुद्दों पर सिर्फ इसलिए रुक जाती है या डर जाती है कि वह तो स्त्री है। उसे डर है कि प्रेम में उसने पहल की तो वह चरित्रहीन सिद्ध हो जायेगी। उसे डर है कि वह अकेले या असमय बाहर निकली तो कोई इज्जत नाम की चीज लुट सकती है। और भी ढेर सारी बातें।
याद करती हूँ उन दिनों को जब बहुत ज्यादा अंतर्मुखी और निर्दोष होने की वजह से दुनिया से बेखबर थी। घर से दूर भी रात के 9-10 बजे जरुरी काम होने पर अकेले बाहर निकल जाती थी। रात के 3-4 बजे तक अकेले छत पर बेख़ौफ़ पढ़ती रहती थी। कुछ महीनों तक रात 7-9 बजे की एक ऐसी क्लास में थी जहाँ पर मैं अकेली लड़की और बाकी सारे लड़के थे।...पर मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता था क्योंकि मुझे पढ़ना था। एग्जाम टाइम में प्रैक्टिकल सब्जेक्ट्स समझाने के लिए पूरी रात लड़कों के साथ बैठकर पढ़ाया है। बस इतना चाहती हूँ कि आज भी और आगे भी वैसी ही रह सकूँ। मैंने यह तो कहा ही नहीं कि सब पुरुष एक से हैं, न ही यह कहा कि लड़कियों को कुछ समझने और बदलने की जरुरत नहीं। मैंने सिर्फ सहयोग की बात की है जो लड़के और लड़कियों सभी की ओर से अपेक्षित है।

जिन्होंने करुणा, क्षमा, सहनशीलता आदि स्त्री गुणों की बात की।

अपनी कमियों को स्वीकारते हुए इन गुणों की पूरजोर समर्थक हूँ। पशु-पक्षियों, कीड़े मकोड़ों...सभी के लिए प्यार है। मौसी और बुआ कहने वाले बच्चे अचानक से मम्मा भी कह चुके हैं। बच्चों को हाथों से खाना खिलाना, उनके साथ खेलना, उन्हें कहानियां सुनाना, उनका ख़याल रखना सब बहुत पसंद है। करुणा के आड़े पशु जगत, मानव जगत, धर्म, जाति, लिंग ये सब सीमायें नहीं आती। लेकिन ये ऐसे गुण हैं जो सिर्फ स्त्री के लिए नहीं सबके लिए है।. इन्हें सिर्फ स्त्री से बांधकर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता। जब मैं कहती हूँ कि मैं हमेशा याद नहीं रखना चाहती कि मैं स्त्री हूँ तो समझिये कि मैं सबमें इन्हीं गुणों के विकास की बात कहती हूँ।

(2)

क्या ऐसा युग दोगे?

30/11/2015 - लड़का है या लड़की...फेसबुक पर आने के बाद से किसी की पोस्ट्स अच्छी लगने पर फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजते समय यह कभी दिमाग में नहीं आता था (था इसलिए क्योंकि कुछ समय से पोस्ट्स वाला आधार भी छोड़ चूकी इसलिए फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजना भी लगभग छूट गया। क्योंकि सबको दोस्त मान पाना मेरा सपना है...पूरे हो न हो पर सपने सबसे बड़े वाले देखती हूँ मैं। :p) बचपन से खुद को लड़की कम इंसान ज्यादा समझा है और दूसरी ओर प्रकृति भी ऐसी है कि कोई लड़कियों वाले जबरदस्ती के ताने सामान्यतया मार नहीं पाता। लेकिन जब एक एक्सट्रीम वाले कुछ लड़के तो अपनी उल्टी-सीधी हरकतों से बार-बार लड़की होने का अहसास कराते हैं और दूसरे एक्सट्रीम वाले लड़के लोग सब कुछ पढ़ते हुए, फ्रेंड रिक्वेस्ट ओपन होते हुए, कमेंट्स में बात करते हुए यह अपेक्षा घनघोर रूप से लगाए हुए रहते हैं कि उनको फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजना मेरा ही परम धर्म है तो भाईयों अपना भी स्त्रीत्व जाग उठता है। :p मुख्य बात (सिर्फ पुरुष नहीं सबसे) : सहज को सहज ही रहने दो। चाहती तो हूँ एक ऐसा युग जहाँ जीवन मात्र को सब जीवन समझे...पर उससे करोड़ों सीढियाँ पहले क्या ऐसा युग दोगे?...जहाँ स्त्री स्वयं को और बाकी सब उसे इंसान समझ सके, प्रकृति द्वारा प्रदत्त भेद का सम्मान करते हुए।

Monika Jain ‘पंछी’

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March 6, 2016

Essay on Indian Culture and Tradition in Hindi

परंपरा कहीं प्रदूषण न बन जाए

पर्व, संस्कृति, परंपरा, प्रकृति के साथ इनके जुड़े होने सम्बंधित भावुक कर देने वाली बातें बहुत पढ़ीं। इनका मजाक उड़ाने वाली, विरोध करने वाली, तर्क की कसौटी पर कसी पोस्ट्स भी बहुत पढ़ी। दोनों काफी कुछ अपनी-अपनी जगह सही हैं। मैं जन्म से जिस धर्म और परिवार से जुड़ी हूँ और जो स्वभाव और परिस्थितियां पायी हैं उसमें परम्पराओं, रीति-रिवाजों, कर्म-कांडों से बहुत ज्यादा पाला पड़ता नहीं...और खुद का आकर्षण नहीं इसलिए जहाँ तक संभव हो पाला पड़ने भी नहीं देती। पर अगर बात प्रकृति से जुड़ाव, स्नेह, संवेदनशीलता की आये तो हर रोज पर्व और उत्सव मनाने वाले कई लोगों से बहुत बेहतर स्थिति है। कोई अपनी परम्पराएं संजोकर रखना चाहता है, कोई छुटकारा चाहता है, जो जैसा भी चाहता है वैसा करे, लेकिन हम जो भी जीवन पद्दतियां अपनाते हैं उनमें धीरे-धीरे पसर आने वाले आतंकवाद, शोषण, अन्याय, असंवेदनशीलता, दिखावे, हिंसा और पाखण्ड को नजरंदाज करते रहें यह भी तो सही बात नहीं। यह ऐसा युग है जहाँ पर अहिंसा के नाम पर भी भयंकर हिंसा हो जाती है। जहाँ धर्म के नाम पर कितना अधर्म हो रहा होता है इसका अहसास तक नहीं होता। ऐसे में आँखों और मन को क्षण भर के लिए लुभाने वाली चीजों के पीछे कौन-कौन से आधार खोखले हो रहे हैं, इस पर ध्यान दिया जाना भी जरुरी है। पर्वों पर रात दिन छूटने वाले पटाखे, लाउडस्पीकर वाले रात्रि जागरण, सुबह असमय नींद उड़ा देने वाली आरती और भजनों की तेज आवाजें क्या यही प्रकृति और इसके प्राणियों से प्रेम है? कम से कम रातों को शांति के और सुबहों को तो पंछियों की सुरीली आवाजों के नाम कर दिया होता।

हमें यह समझना होगा कि आज आस्था, धर्म, ईश्वर और परम्पराओं से कई ज्यादा जरुरत दुनिया को संवेदनशीलता और प्रेम की है। संवेदनशीलता प्रकृति और इसके समस्त प्राणियों के प्रति। अगर परम्पराएँ प्रकृति से जोड़ने में सफल हो पाती, तो आज प्रकृति और पर्यावरण की ये हालत न होती। तथाकथित परम्पराओं को निभाते तो मैंने उन्हें भी देखा है, जो झरनों, झीलों, नदियों में शराब छलकाते हुए, फूहड़ गानों पर घंटों डांस करते हैं। परम्पराएँ निभाते उन्हें भी देखा है, जो तोते, चिड़ियाँ जैसे कई पशु-पक्षियों को पिंजरों में कैदकर गर्व से फूलें नहीं समाते। परम्पराएँ निभाते उन्हें भी देखा है, जिनके लिए पत्नी सिर्फ घर में काम करने वाली और उनके विषय भोगों को पूरा करने वाली मशीन से ज्यादा कुछ भी नहीं। परम्पराओं के नाम पर होने वाली हत्याएँ देखी हैं। परम्पराओं के नाम पर होने वाला शारीरिक और मानसिक शोषण भी...और भी सेकड़ों उदाहरण। जरुरत क्या है चीजों को यूँ गोलमोल घुमाकर, उन्हें सही सिद्ध करने की? क्या सीधी-सरल बातें समझ नहीं आती? या बस दिखावा करते-करते एक दिन सबको ले डूबना ही हमारी एकमात्र इच्छा और नियति है। बल्कि आजकल तो परंपरा और आधुनिकता दोनों का वह कॉकटेल दिखाई पड़ता है जिसने चमक और धमक की अति के पीछे अपने सारे आधारों को खोखला कर देने की ठानी है।

मैं धर्म और परम्पराओं की विरोधी नहीं, लेकिन जब परम्पराएँ, प्रतीक, रिवाज और कर्म-कांड अपना महत्व खोने लगे और शोषण और व्यापार ही उनका उद्देश्य मात्र रह जाए तो उन्हें भुला देने में ही भलाई है। कहीं किसी की मृत्यु होती है और सुर में सुर मिलाकर महिलाएं पल्ला प्रथा के नाम पर रोने का अभिनय करती हैं। अभिनय के समाप्त होने पर यही महिलाएं मृत्यु वाले पूरे परिवार का इतिहास, भूगोल सब बांचने लगती हैं। बेटी ने किसी और जाति में विवाह किया है, इसलिए उसके रहते हम यहाँ नहीं रह सकते। पति ने ये किया, पुत्र ऐसा है...फलां, ढीमका और भी न जाने क्या-क्या। परिवार, समाज, देश और दुनिया सभी को संवेदनशीलता और प्रेम की जरुरत है, इन बेवजह की नौटंकियों की नहीं।

कुछ दिन पहले सुना था दक्षिण तमिलनाडु के विरुद्धनगर में 'तलईकुथल' नाम की एक परम्परा है। जिसके अनुसार बुजुर्गों को नारियल पानी पिला कर फिर किसी ठंडे तेल से मालिश करके तब तक ठंडे पानी से नहलाया जाता है जब तक उनकी मृत्यु नहीं हो जाती। इस परंपरा के चलते अपने दादा-दादी, माता-पिता, पति-पत्नी किसी की भी हत्या कर दी जाती है और कोई पछतावा भी नहीं। क्या खाकर पैदा होते हैं ऐसे लोग? उन्हें इंसान तो नहीं कह सकते। पर जानवर!..वो भी कैसे कहें? लोग अपने स्वार्थ के लिए कोई भी परंपरा बना लेते हैं। अपने ही मतलब के लिए उसे जब चाहे तोड़ मरोड़ लेते हैं और अपने ही मतलब के लिए इन परम्पराओं की दुहाई देते नहीं थकते। थू है ऐसी परम्पराओं पर, इन्हें बनाने वालों पर और इनका पालन करने वालों पर।

परम्पराओं, प्रतीकों, कर्मकांडों और संस्कृति के नाम पर छल की संभावनाएं बहुत ज्यादा बढ़ गयी है। हमें समय को देखकर चलना होगा और आज की आवश्यकताओं को समझना होगा। सालों पहले जो चीजें प्रासंगिक थी, आज भी हो जरुरी नहीं। समस्यायों के घुमा-फिरा कर नहीं, सीधे समाधान ढूंढने होंगे। मंदिर, मस्जिद, सिन्दूर, मंगलसूत्र, पूजा-पाठ, आरती, ज्योतिष, वास्तु...इनके पीछे चाहे जितने वैज्ञानिक कारण गिनाये जाए पर क्या ये चीजें आज की समस्यायों का समाधान करने में सक्षम है? सारी समस्याएं हमारे भीतर की उपज है, तो समाधान भी वैसे ही ढूंढने होंगे जो सीधे दिल और दिमाग पर असर करे। इधर-उधर भटकाने वाले समाधान नयी समस्याएं पैदा करेंगे और कुछ नहीं।

सारी अमूर्त चीजों को मूर्त रूप में बदल देने वाली परम्पराएँ और व्यवस्थाएं कितना भला कर पायी है, वर्तमान के सन्दर्भ में इसकी समीक्षा बेहद जरुरी है। कहीं ऐसा न हो कि हम खोखली परम्पराओं पर गर्व करते रह जाएँ और वह जमीं जिस पर इन्हें आरोपित किया गया था उसका पूरा सफाया ही हो जाए। सत्य के प्रतीक बचे रहे और सत्य पूरी तरह मिट जाए। प्रेम और साहस के प्रतीक बचे रहे पर प्रेम और साहस कहीं नजर ही न आये, ऐसा तो नहीं होना चाहिए न!

Monika Jain ‘पंछी’
(06/03/2016)

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