April 15, 2016

Funny Childhood Memories Stories in Hindi

मेरे हिस्से...कुछ बेवकूफ किस्से...

(1)

मैं...कुम्भकर्ण की नानी

बात तब की है जब मैं छोटी बच्ची थी। अपनी कुम्भकर्णी नींद की वजह से मुझे घर में 'कुम्भकर्ण की नानी' कहकर बुलाया जाता था। सबसे बड़े भैया ने दिया था यह नाम। कुम्भकर्ण की तरह बहुत देर तक तो नहीं सोती थी, लेकिन हाँ, नींद इतनी गहरी होती थी कि रात में कोई चोर जिस कमरे में मैं सोयी हूँ उसमें चोरी करके चला जाए तो भी मुझे कुछ पता न चले। कभी-कभी जल्दी सो जाने पर माँ नींद में उठाकर कुछ खिला देती...पर मुझे याद नहीं रहता। गर्मियों में छत पर सोते समय बारिश आ जाने पर कब और कैसे ऊपर से नीचे पहुँच जाती थी, वह भी याद नहीं रहता था। आसपास सोने वाले भाई बहन कहते थे मैं नींद में उन्हें लात मारती थी। :p कभी-कभी नींद में कुछ बोल भी जाती थी। शुक्र है कि नींद में चलने की आदत नहीं थी। :D

हाँ तो मेरी कुम्भकर्णी नींद के ही बचपन के दिनों में एक रात मुझे भयंकर प्यास लगी और नींद खुल गयी। यह अपवादजनक मामला था। सामान्यतया सोने के बाद सीधा सुबह ही उठती थी। तो उस दिन बहुत तेज प्यास लग रही थी। सोने की जगह के ऊपर झरोखे में एक बोतल रखी थी। नींद में इतना दिमाग नहीं लगाया कि इसमें पानी नहीं रखा है। पानी तो रसोई में है। मैंने बस उसे उठाया और पीने लगी। उसके बाद 2-3 घंटे तक उल्टियाँ होती रही, क्योंकि उस बोतल में तिल का तेल था। :p

(2)

जीवात्मा की सैर और मेरी खैर...

एक छोटे से कस्बे के अपने छुटपने के दिनों में एक दिन मैं स्कूल जाने के लिए तैयार हो रही थी। थोड़ा लेट हो गयी थी। मैं लेसेस वाले जूते पहनती थी। उस दिन हर रोज की तरह उन्हें उल्टा करके झाड़ने की बजाय सीधे ही पहन लिया और स्कूल के लिए रवाना हो गयी। वो बारिश के दिन थे, हमारा पुराना घर खुला-खुला था और वह एरिया कभी किसी समय शायद फार्मिंग लैंड रहा था, इसलिए छोटे-छोटे जीव-जंतु आ जाया करते थे.

जूते पहनने के बाद मुझे एक जूते में कुछ मुलायम और गुदगुदा सा महसूस हो रहा था। मुझे लगा जल्दी-जल्दी पहने हैं तो हो सकता है कुछ फंसा रह गया होगा और ऐसा सोचकर इग्नोर कर मैं चलती रही। चलते-चलते स्कूल में पहुँच गयी और प्रेयर की घंटी के बाद हम सब प्रेयर में बैठ गए। अब जब मैं शांत हो गयी थी तब जूते में फंसी उस चीज की हलचल शुरू हो गयी, और कुछ ही देर में मुझे समझते देर न लगी कि मैं अपने जूते में किस जीवात्मा को उठाकर ले आई हूँ।

दिल की धड़कने थोड़ी बढ़ गयी थी, थोड़ा सा डर भी लग रहा था, लेकिन मैंने अपने आपको संयत रखा और चुपचाप आँखें बंद किये प्रेयर करती रही। फिर प्रार्थना खत्म होने के बाद जब समाचार, कहानी, आदर्श वाक्य आदि का रोजाना वाला दौर चल रहा था तो मैंने धीरे से अपना जूता खोला उसे हल्का सा झटका ताकि अंदर जो भी आत्मा जा बैठी है वह बाहर निकल जाए। लेकिन उस जीवात्मा को मेरा जूता बहुत पसंद आ गया था सो वह वही जमी रही। (हालाँकि उस जीवात्मा का क्या हाल रहा होगा, यह तो वही जाने। :p )

अब बिना जीवात्मा के निकले वापस उस जूते को पहनना निश्चित ही बहुत बहादूरी वाला काम था और मुझे वह करना ही था। पाँव में बहुत अजीब सा महसूस हो रहा था। हम सब 1 घंटे के प्रार्थना सभा के कार्यक्रम के बाद कतार से अपनी-अपनी क्लास में पहुंचे। मैं तुरंत अपनी सीट पर पहुंची और नीचे झुककर अपना जूता उतारा। फिर उसे एक-दो बार उल्टा कर झटका। वह जीव बाहर नहीं आया तो तीसरी बार मैंने जूते को बहुत तेज से पटका। हमारा क्लासरूम थियेटर की तरह सीढ़ीनुमा था। फाइनली कुछ बाहर निकला और उछलते कूदते पीछे की सीढ़ियों पे चला गया। और मैंने पूरे 1½ घंटे बाद चैन की सांस ली। उसके बाद पहला पीरियड शुरू होने के बाद जब मैं और सब सामने खड़ी टीचर को ध्यान से सुन रहे थे तब पीछे का पूरा चक्कर लगाकर वापस आगे आये एक छोटे से मेढंक महाशय ब्लैकबोर्ड के पास की जमीन पर उछलते कूदते दिखे। मैं मन ही मन मुस्कुराई। एक लम्बी कैद के बाद उसने भी तो जन्नत पायी थी और शायद जीवन में पहली बार इस तरह की भयानक सैर भी की होगी। इस पूरे घटनाक्रम की सबसे ख़ास बात यह रही कि किसी को भी कुछ भी पता नहीं चला...न मेरे चेहरे से और न ही मेरी हरकतों से। :p :)

Monika Jain ‘पंछी’
(15/04/2016)

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