April 23, 2016

Quotes on Friendship in Hindi

Friendship Quotes

  • 29/07/2017 - ईमानदारी से तारीफ कर उत्साह वर्धन करने वाले और ईमानदारी से कमी बताकर सुधार की ओर प्रेरित करने वाले मित्र/सज्जन भी दुर्लभ ही होते हैं।
  • 30/03/2017 - वह जिसके सामने बड़ी देर तक खिलखिलाया जा सकता है। वह जिसके सामने बड़ी सहजता से रोया भी जा सकता है। वह जिसे सब कुछ बताया जा सकता है। वह जिसे पहले परिचय से लेकर सालों-साल तक नंबर बदलने पर भी कभी उसे सेव करने की जरुरत ही नहीं पड़ती, क्योंकि उसे हमेशा नंबर याद हो जाता है। वह...सिर्फ वह जो समझता है, एक दिन उसे बात करने की इजाजत ही नहीं रहती। जाने क्यों किसी तीसरे की ख़ुशी के लिए दो लोगों की पाक दोस्ती को भी हमेशा के लिए छूट जाना पड़ता है। नंबर याद करने के मामले में बड़ी लापरवाह रही लेकिन कुछ नंबर मोबाइल में शायद सिर्फ इसलिए ही सेव रह जाते हैं कि शायद जाने से पहले कभी किसी दिन वे स्क्रीन पर चमक जाए।
  • 09/06/2017 - जानती हूँ...गर अरसे बाद भी हम कभी बात कर पायें तो बात करते-करते तुम मेरे 'ज' और 'ज़' वाले गलत उच्चारण को सही करोगे और मैं हमेशा की तरह खिलखिला पडूँगी। कुछ सहजताएँ समय कभी नहीं छीन सकता...कभी भी नहीं!
  • 28/05/2017 - मैं इतनी सहजता चाहती हूँ कि बिल्कुल विपरीत विचार होते हुए भी प्रेम/मैत्री पर कोई आंच न आये। कुछ बुरा लगे भी तो हम सीधे कह और सुन सकें। कहना-सुनना जब जरुरी न हो तब एक दूसरे को स्वीकार सकें। यकीन मानो! प्रेम विचारों से परे है। 
  • 10/03/2017 - जब मैं किसी से कटृा होती हूँ तो 'ote' की जगह 'ok' बोलने लग जाती हूँ और पक्का होने पर वापस 'ote'. 
  • 26-02-2017 - दोस्त हो तो ऐसा...जो अपने जन्मदिन के दिन 11:59 pm पर कॉल करके कहे - अब तो बर्थडे विश कर दो, बस एक मिनट बचा है। :)
  • 26/09/2016 - एक दोस्त ऐसा जरुर होना चाहिए जिससे तुतलाकर बात कर सकें। :p
  • 08/06/2016 - वह जिससे कभी बात ही नहीं करनी, उसे अब भी दोस्तों में गिन जाती हूँ। मैं भुलक्कड़ कितना कुछ भूल जाती हूँ।
  • 23/04/2016 - कुछ दोस्तों को यह शिकायत है कि मैं कुछ शेयर नहीं करती। :) आप मुझसे बहुत कुछ शेयर करते हैं, मुझ पर इतना भरोसा करते हैं, मुझे बहुत अच्छा मेंटर भी मानते हैं। अगर वाकई में आपकी परेशानियाँ दूर होती है तो यह मेरे लिए ख़ुशी की बात है। कोई मुझसे कुछ शेयर करे इसका औचित्य भी मैं तभी मानती हूँ जब उसे कोई राहत मिलती हो। मैं ज्यादा कुछ शेयर नहीं करती इसके बहुत से कारण हैं : पहला तो यह मेरा जन्मजात गुण है, किसी से बहुत अधिक जुड़ाव हो या कभी बहुत जरुरी हो तो अपवाद हो सकता है। दूसरा यह कि जिसे लोग मेंटर की संज्ञा दे, कम से कम उसे खुद का मेंटर तो होना ही चाहिए। तीसरा : डिपेंडेंसी पसंद नहीं है। चौथा : जो इतना सब कुछ लिखने लगते हैं, उन्हें व्यक्तिगत शेयरिंग की जरुरत नहीं रहती। पांचवा : शेयरिंग के मेरे अनुभव अच्छे नहीं है। (अब सब मेरे जैसे नहीं होते :p ) छठा : जीवन ने इतना कुछ दिखा दिया है कि अब कुछ भी शॉक देने जैसा लगता ही नहीं। :) सातवाँ : मैं यह नहीं बताना चाहती कि मैं कितनी बड़ी पागल हूँ। :D (हालाँकि सबको पता होगा। ;) ) बाकी आपको इस बात से ख़ुश होना चाहिए कि आपका कोई दोस्त ऐसा है जो आपको सुनता है, बस अपनी ही अपनी सुनाता नहीं। :) इसलिए शिकायतों में समय व्यर्थ मत गंवाइये। हंसिये और हंसाइये। :) 
  • 31/12/2015 - दोस्तों! तुमसे ही है हर पल और तुमसे ही है हर साल। जाने कितनी बार दिल ने कहा...मैत्री से बेहतर कोई भावना होती ही नहीं। इसलिए प्यारे दोस्तों! तुम्हें ढेर सारा प्यार। 
  • 01/02/2015 - कुछ लोग आपकी अच्छाईयों और कमियों का परिचय आपसे कुछ इस तरह करवाते हैं कि फिर तो बुराई की ओर भटकने का कोई चांस ही नहीं रहता। फिर कितनी भी मुश्किल आये अच्छाईयाँ अच्छी ही लगती है। खुद से प्यार बढ़ जाता है, लोगों से प्यार बढ़ जाता है और ज़िन्दगी से भी। कितने तो अच्छे होते हैं कुछ लोग!
  • तुम मेरे बचपन वाले दोस्त हो जो बड़े होकर बने हो। :p :) 
  • हम खुद ही अपने सबसे अच्छे मित्र होते हैं। हम खुद ही अपने सबसे बुरे शत्रु भी होते हैं। यह हम पर ही निर्भर है कि हम अपने मित्र बनते हैं या शत्रु।
 
Monika Jain ‘पंछी’

April 15, 2016

Funny Childhood Memories Stories in Hindi

मेरे हिस्से...कुछ बेवकूफ किस्से...

(1)

मैं...कुम्भकर्ण की नानी

बात तब की है जब मैं छोटी बच्ची थी। अपनी कुम्भकर्णी नींद की वजह से मुझे घर में 'कुम्भकर्ण की नानी' कहकर बुलाया जाता था। सबसे बड़े भैया ने दिया था यह नाम। कुम्भकर्ण की तरह बहुत देर तक तो नहीं सोती थी, लेकिन हाँ, नींद इतनी गहरी होती थी कि रात में कोई चोर जिस कमरे में मैं सोयी हूँ उसमें चोरी करके चला जाए तो भी मुझे कुछ पता न चले। कभी-कभी जल्दी सो जाने पर माँ नींद में उठाकर कुछ खिला देती...पर मुझे याद नहीं रहता। गर्मियों में छत पर सोते समय बारिश आ जाने पर कब और कैसे ऊपर से नीचे पहुँच जाती थी, वह भी याद नहीं रहता था। आसपास सोने वाले भाई बहन कहते थे मैं नींद में उन्हें लात मारती थी। :p कभी-कभी नींद में कुछ बोल भी जाती थी। शुक्र है कि नींद में चलने की आदत नहीं थी। :D

हाँ तो मेरी कुम्भकर्णी नींद के ही बचपन के दिनों में एक रात मुझे भयंकर प्यास लगी और नींद खुल गयी। यह अपवादजनक मामला था। सामान्यतया सोने के बाद सीधा सुबह ही उठती थी। तो उस दिन बहुत तेज प्यास लग रही थी। सोने की जगह के ऊपर झरोखे में एक बोतल रखी थी। नींद में इतना दिमाग नहीं लगाया कि इसमें पानी नहीं रखा है। पानी तो रसोई में है। मैंने बस उसे उठाया और पीने लगी। उसके बाद 2-3 घंटे तक उल्टियाँ होती रही, क्योंकि उस बोतल में तिल का तेल था। :p

(2)

जीवात्मा की सैर और मेरी खैर...

एक छोटे से कस्बे के अपने छुटपने के दिनों में एक दिन मैं स्कूल जाने के लिए तैयार हो रही थी। थोड़ा लेट हो गयी थी। मैं लेसेस वाले जूते पहनती थी। उस दिन हर रोज की तरह उन्हें उल्टा करके झाड़ने की बजाय सीधे ही पहन लिया और स्कूल के लिए रवाना हो गयी। वो बारिश के दिन थे, हमारा पुराना घर खुला-खुला था और वह एरिया कभी किसी समय शायद फार्मिंग लैंड रहा था, इसलिए छोटे-छोटे जीव-जंतु आ जाया करते थे.

जूते पहनने के बाद मुझे एक जूते में कुछ मुलायम और गुदगुदा सा महसूस हो रहा था। मुझे लगा जल्दी-जल्दी पहने हैं तो हो सकता है कुछ फंसा रह गया होगा और ऐसा सोचकर इग्नोर कर मैं चलती रही। चलते-चलते स्कूल में पहुँच गयी और प्रेयर की घंटी के बाद हम सब प्रेयर में बैठ गए। अब जब मैं शांत हो गयी थी तब जूते में फंसी उस चीज की हलचल शुरू हो गयी, और कुछ ही देर में मुझे समझते देर न लगी कि मैं अपने जूते में किस जीवात्मा को उठाकर ले आई हूँ।

दिल की धड़कने थोड़ी बढ़ गयी थी, थोड़ा सा डर भी लग रहा था, लेकिन मैंने अपने आपको संयत रखा और चुपचाप आँखें बंद किये प्रेयर करती रही। फिर प्रार्थना खत्म होने के बाद जब समाचार, कहानी, आदर्श वाक्य आदि का रोजाना वाला दौर चल रहा था तो मैंने धीरे से अपना जूता खोला उसे हल्का सा झटका ताकि अंदर जो भी आत्मा जा बैठी है वह बाहर निकल जाए। लेकिन उस जीवात्मा को मेरा जूता बहुत पसंद आ गया था सो वह वही जमी रही। (हालाँकि उस जीवात्मा का क्या हाल रहा होगा, यह तो वही जाने। :p )

अब बिना जीवात्मा के निकले वापस उस जूते को पहनना निश्चित ही बहुत बहादूरी वाला काम था और मुझे वह करना ही था। पाँव में बहुत अजीब सा महसूस हो रहा था। हम सब 1 घंटे के प्रार्थना सभा के कार्यक्रम के बाद कतार से अपनी-अपनी क्लास में पहुंचे। मैं तुरंत अपनी सीट पर पहुंची और नीचे झुककर अपना जूता उतारा। फिर उसे एक-दो बार उल्टा कर झटका। वह जीव बाहर नहीं आया तो तीसरी बार मैंने जूते को बहुत तेज से पटका। हमारा क्लासरूम थियेटर की तरह सीढ़ीनुमा था। फाइनली कुछ बाहर निकला और उछलते कूदते पीछे की सीढ़ियों पे चला गया। और मैंने पूरे 1½ घंटे बाद चैन की सांस ली। उसके बाद पहला पीरियड शुरू होने के बाद जब मैं और सब सामने खड़ी टीचर को ध्यान से सुन रहे थे तब पीछे का पूरा चक्कर लगाकर वापस आगे आये एक छोटे से मेढंक महाशय ब्लैकबोर्ड के पास की जमीन पर उछलते कूदते दिखे। मैं मन ही मन मुस्कुराई। एक लम्बी कैद के बाद उसने भी तो जन्नत पायी थी और शायद जीवन में पहली बार इस तरह की भयानक सैर भी की होगी। इस पूरे घटनाक्रम की सबसे ख़ास बात यह रही कि किसी को भी कुछ भी पता नहीं चला...न मेरे चेहरे से और न ही मेरी हरकतों से। :p :)

Monika Jain ‘पंछी’
(15/04/2016)

April 6, 2016

Quotes on Freedom (Salvation) in Hindi

Freedom (Salvation) Quotes

  • 24/08/2017 - महावीर और बुद्ध को पढ़ते हुए लगता है - एक समय था शायद जब आत्ममुक्ति परम लक्ष्य हुआ करती थी। लेकिन समय के थपेड़ों ने इस देश से इसकी सबसे सुन्दरतम चीज छीन ली। बहुत थोड़े से लोग हैं जो प्रेम, संवेदनशीलता, करुणा और अहिंसा के सूक्ष्म, व्यापक, गहन अर्थ और प्रभाव को समझते हैं।
  • 15/08/2017 - हर कदम पर भटकाने वाले तत्व मिलते हैं। बस इस अनर्गल शोर में अपनी आवाज़ सुन पाए कोई, असल आज़ादी भी बस उसी के लिए है। जिम्मेदारी दो तरफ़ा है - न भटको, न भटकाओ। 
  • 29/11/2016 - दुनिया में सबके अपने-अपने युग हैं। कहीं किसी कोने में कोई नरभक्षी बना बैठा है तो कहीं कोई ऐसा भी है जिसका जीवन किसी के भी भक्षण का मोहताज ही नहीं। किसी के आठों प्रहर सावद्य भाषा के प्रयोग में गुजरते हैं तो कोई निरवद्य भाषा की अंतिम परिणीति मौन तक पहुँच चुका है। कोई मन में न जाने कितनी नृशंस हत्यायों की योजनाएँ बनाता है तो कोई कहीं मन से ही मुक्त हो चुका है। 
  • 14/09/2016 - हर भौतिक आकर्षण की परिणीति एक निराशा या नीरसता के सिवा कुछ भी तो नहीं। फिर भी वह भटक रहें हैं जाने किस तलाश में। भटकते-भटकते सुनाई दे जाता है बीच-बीच में एक सन्नाटा। खींचता रहा एक शून्य सदा-सदा से। कुछ पहचानी सी लगती थी यह ख़ामोशी...जिसे मिलकर भी नहीं दबा पाते थे दुनिया-जहाँ के सारे शोर। हो न हो...आकर्षण का चरम है यह। कुछ, जो जीवन और मृत्यु से परे है। कुछ, जहाँ श्वास और निश्वास का द्वंद्व नहीं। कुछ, जो अकारण ही जीवंत है। कुछ, जो शायद कुछ है ही नहीं...फिर भी सब कुछ है।
  • 15/08/2016 - कभी-कभी सबको पढ़कर चुप रह पाना भी आज़ादी है। ;) हालाँकि बोल गयी और आज़ादी गँवा दी। :p पर अब बोल ही गयी तो शुभकामनाएं भी ले ही लो। ^_^
  • 26/04/2016 - लोग आये...शब्दों को पढ़ा...और चल दिए। मुझे इंतजार था उसका जिसे ब्लैंक स्पेसेस को पढ़ना था और फिर मेरे पास ठहर जाना था। इंतजार पूरा न हुआ...हो ही नहीं सकता था...इंतजार जायज ही न था। क्योंकि जो रिक्त को पढ़ पायेगा, उसे रिक्त होना होगा। और जो रिक्त होगा, उसके लिए सारा अस्तित्व ही रिक्त होगा...मैं भी तो। 
  • 06/04/2016 - जब सालों से सहेज कर रखी किसी जगह की यादगार, अचानक हाथ से छूटे और चूर-चूर हो जाए, पर माथे पर कोई शिकन न आये...जब यादों के तौर पर सबसे छिपाकर रखे गए, प्रेम में मिले तोहफ़े, दूसरों की मुस्कुराहटों का सबब बनने लगे...अपने लिए बड़े चाव से ख़रीदे नए-नवेले कपड़े खुद की बजाय आपको दूसरों पर अच्छे लगने लगे...जब कोई फेवरेट डिश जो आपको नहीं खानी है पर सिर्फ दूसरों के खाने के लिए आप बड़े प्यार से बनायें...जब आपकी कोई चीज किसी को पसंद आने पर आप वह उसे देने को तत्पर हो जाएँ...ऐसा कुछ भी हो तो समझना कि चीजें छोड़ी नहीं जाती बस छूट जाती है। 
  • Even the later comments are affected by the former ones. :) तो सोचिये हम कितने ज्यादा प्रभाव में रहते हैं। फिर भी सोचते हैं कि हमारा कोई अलग से अस्तित्व है। प्रभावित होना बंधना है, अप्रभावित होना मुक्त हो जाना है। हमारे जीवन में 'वह पसंद है', 'वह नापसंद है' के सापेक्ष भाव जितने ज्यादा मिटने लगे...समझना उतने ही हम मुक्त होते जा रहे हैं और यह अनुभूति सच में सुखद है। जीवन को 'पसंद' और 'नापसंद' के खांचों में बांटने से ज्यादा जरुरी है, पूर्ण भागीदार बनते हुए भी निरपेक्ष भाव से देखना। जिस दिन हम यह कर पायेंगे उस दिन हम प्रभाव में नहीं स्वभाव में स्थित होंगे। और स्वभाव में स्थित होना ही धर्म में अवस्थित होना है। 
  • कभी उसकी अलमारी का एक कोना प्रेम में मिले तोहफों को सहेज कर रखने के लिए आरक्षित था। जिसमें कुछ सूखे गुलाब के फूल भी शामिल थे। कभी-कभी वह उन तोहफों को टटोलकर यादों के शहर में घूम आया करती थी। फिर एक दिन अचानक उस कोने से सब कुछ बंटने लगा। सिर्फ उस कोने से नहीं...कमरे की हर एक जगह से जो भी अतिरिक्त था वह सब बंटने लगा। उसे कमरे का खालीपन भाने लगा। अब वह इंतजार करती है बस उस दिन का जब वह खुद से भी पूरी तरह खाली हो सके।
  • लम्बे अरसे से उसके जीवन का हिस्सा बन चुके असहनीय दर्द में कुछ और दर्द मिश्रित होते रहे। उसके मन ही मन में तूफ़ान उठते रहे...पर अब आसानी से नहीं तोड़ पाते मौन का सन्नाटा! कितने सारे प्रश्न!...न्याय की उम्मीद में अपने पक्ष को रखने वाले कितने सारे तर्क!...गलतफहमियों को दूर करने वाली कितनी सारी बातें!...हर रोज की घुटन जो खुलकर सांस लेना चाहती थी।...कुछ शिकायतें जिन्हें शब्दों की जरा सी मिठास चाहिए थी।...सूख चुके आंसू जिन्हें नमी के लिए बस स्नेह भरी एक मुस्कान की जरुरत थी।...कुछ  मामूली सी गलतियाँ, जो गंभीर अपराध सिद्ध हुई और जरुरत से ज्यादा सजा पा चुकी...मुक्त होना चाहती थी अपने अपराध बोध से।...पर अब उसके दर्द का अहसास उसके होठों तक पहुंचना भूल चुका है। और उसके मन की इस इच्छा को भी एक दिन समाप्त होना होगा कि कुछ भी कभी ठीक हो। क्योंकि सुख-दुःख, सफलता-असफलता, जीवन-मृत्यु इस स्केल पर आगे या पीछे जाने के लिए वह शायद बनी ही नहीं है। उसे तो शरीर और मन के तल की इन सारी क्षुद्र्ताओं से ऊपर उठना है। क्योंकि वह जन्मी ही है मुक्त हो जाने को। वही तो उसकी मंजिल है, जो उसे निरंतर आवाज़ देती रही है, पर दुनियावी शोर में वह अब तक उसे अनसुना करती आई है।
  • आज़ादी पर तो क्या कहूँ? बचपन में तो इस दिन का क्रेज इसलिए रहता था क्योंकि बहुत सारे प्राइजेज मिलने होते थे और रोज के रूटीन से हटकर कुछ अलग होता था और देशप्रेम के भावों से भर जाना बहुत सुखद लगता था। पर धीरे-धीरे जब आज़ादी के मायने समझ आने लगे तो बात देश, काल, जगत सबकी सीमाओं से परे जाने लगी। ऐसे में आज़ादी महसूस कैसे हो? पर फिर भी कुछ न होने से हमेशा बेहतर होता है कुछ होना। इसलिए ख़ुश होने में क्या जाता है। आप सब को भी ढेर सारी शुभकामनाएं। 
  • पूर्ण स्वीकार का क्षण ही पूर्ण निस्तार का क्षण होता है। 
  • कभी-कभी अवसाद से लड़ने के लिए कितने जतन करने होते हैं। कविता, कहानियाँ, जोक्स, तारीफ, गीत-संगीत, नृत्य, चित्रकारी, दोस्त, बच्चे, प्रकृति...हर पल ख़ुश रहने के बहाने ढूंढने पड़ते हैं। कभी-कभी सब फैल हो जाता है। ये निर्भरता बड़ी बुरी चीज है। मुक्ति और मोक्ष की बातें बेमानी नहीं है। सदियों से जिस पागलपंती को हम दोहराते आ रहे हैं, उस पर कभी तो विराम लगे।
  • प्रारब्ध वृत्तियों का निर्माण करते हैं और वृत्तियाँ फिर से प्रारब्ध का। सम्यकत्व मार्ग है इस कुचक्र को तोड़कर सिर्फ अपने स्वभाव में शेष रह जाने का। 

Monika Jain ‘पंछी’