June 29, 2016

Jainism (Jain Philosophy) Tattva Gyan in Hindi

Jainsim (Jain Philosophy) Tattva Gyan Parichay in Hindi
 जैन दर्शन : तत्त्व विवेचना

तत्त्व से आशय वस्तु के वास्तविक स्वरुप या स्वभाव से है। जैन दर्शन में सात तत्त्व माने गए हैं।
  1. जीव (Living Beings or Soul)
  2. अजीव (Non Living Beings)
  3. आस्रव (Influx of Karmas)
  4. बंध (Bondage of Karmas)
  5. संवर (Stoppage of Karmas)
  6. निर्जरा (Destruction of Karmas)
  7. मोक्ष (Salvation or Liberation)
जीव (आत्मा) : आत्मा, चेतना या प्राण को ही जीव कहा जाता है। सुविधा के लिए जगत की प्रत्येक वस्तु जिसमें चेतना या प्राण है उसे हम जीव कहेंगे। जैसे मनुष्य, पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े, पेड़-पौधे आदि। वस्तुत: आत्मा और शरीर दो अलग-अलग तत्त्व हैं। जिसमें आत्मा जीव व शरीर अजीव है। आत्मा का पुनः उत्पादन नहीं होता है। आत्मा को अजर, अमर, अविनाशी व निराकार माना जाता है। मृत्यु के समय सांसारिक आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर नए शरीर को ग्रहण करती है। इस आधार पर जीव दो प्रकार के होते हैं : मुक्त आत्मा (सिद्ध जीव) और अमुक्त आत्मा (संसारी जीव)। संसारी जीवों को पुनः इन्द्रियों के आधार पर ( एकेंद्रिय से पंचेन्द्रिय ) पांच भागों में विभाजित किया जाता है।

अजीव : जीव (आत्मा/चेतना) के अतिरिक्त जो भी जगत में विद्यमान है उसे अजीव कहते हैं। आत्मा के बिना हमारा शरीर भी अजीव ही है। वस्तुएं जैसे कंप्यूटर, टेबल, घड़ी, पेन आदि अजीव के उदाहरण हैं। अजीव पांच प्रकार के होते हैं : पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल।

आस्रव : कर्मों की आमद को आस्रव कहा जाता है। प्राणी के जन्म और मृत्यु के चक्र में भटकने का कारण उसके कर्मों को ही माना जाता है। फिर चाहे वे पूण्य हो या पाप। मन, वचन और काया तीनों ही स्तरों पर कर्मों की आमद होती है। यह आस्रव हर क्षण होता रहता है। आस्रव के दो भेद हैं : भाव आस्रव व द्रव्य आस्रव।

बंध : कर्मों का आत्मा के साथ जुड़ना बंध कहलाता है। जब तक इन कर्मों का फल प्राप्त नहीं होता तब तक ये आत्मा के साथ जुड़े रहते हैं। मुख्य रूप से किसी भी कर्म के साथ राग या द्वेष का भाव ही कर्मों के बंधन का कारण बनते हैं। कर्मों का फल केवल तभी मिलता है जब वे आत्मा के साथ जुड़ते हैं। बंध भी दो प्रकार का होता है : भाव बांध व द्रव्य बंध।

संवर : वह प्रक्रिया जिसके द्वारा नए कर्मों की आमद को रोका जाता है, संवर कहलाती है।

निर्जरा : वह प्रक्रिया जिसके द्वारा आत्मा के साथ बंधे कर्मों को नष्ट किया जाता है, निर्जरा कहलाती है। निर्जरा के दो भेद हैं : साविपाक निर्जरा (सकाम), आविपाक निर्जरा (अकाम)। इसी तरह भाव और द्रव्य निर्जरा भी होती है।

मोक्ष : संवर और निर्जरा द्वारा जब जीव के समस्त आठों कर्मों का क्षय हो जाता है, तब उसकी आत्मा जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाती है, इस अवस्था को मोक्ष कहा जाता है। सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र मिलकर मोक्ष का मार्ग बनाते हैं। इन्हें त्रिरत्न कहा जाता है। मुक्ति आत्मा का श्रेष्ठतम उद्देश्य माना जाता है।

तत्त्वों को हम एक उदाहरण से समझेंगे। एक जहाज है, जो समुद्र में तैर रहा है। जिसमें कई यात्री यात्रा कर रहे हैं। जहाज किसी जगह से क्षतिग्रस्त हो जाता है जिससे समुद्र का पानी उसमें आने लगता है। जहाज के क्षतिग्रस्त हिस्से को ठीक किया जाता है जिससे कि नया पानी न आ सके। जहाज के भीतर भरे पानी को बाहर निकाला जाता है, और जब जहाज में पानी बिल्कुल नहीं रहता तब यात्री समुद्र को पार कर लेंगे।

  • यहाँ पर जहाज अजीव (शरीर) और यात्री जीव (आत्मा) हैं।
  • जहाज में समुद्र के पानी का आना आस्रव (कर्मों का प्रवेश) है। 
  • जहाज में जो पानी भर गया है, वह बंध कहलायेगा। 
  • जहाज के क्षतिग्रस्त हिस्से को ठीक करके पानी के आगमन को रोकना संवर (नए कर्मों की आमद को रोकना) कहलायेगा। 
  • जहाज में भरे पानी को बाहर निकालना निर्जरा (जमा कर्मों का क्षय) कहा जाएगा। 
  • यात्रियों द्वारा समुद्र को पार करना जीवात्मा द्वारा इस संसार सागर को पार कर मुक्त हो जाना मोक्ष कहलायेगा।

सभी तत्त्वों की विस्तृत विवेचना हम आगे पढ़ेंगे।

June 26, 2016

Unity in Diversity Essay in Hindi

मुक्ति भेदभाव से चाहिए अनूठेपन से नहीं

26/06/2016 - बात तब की है जब मैं कोई 12-13 साल की थी। एक बार मम्मी के साथ मैं कहीं रास्ते पर थी। हमें कहीं बाहर जाना था, बस का इंतजार हो रहा था और मम्मी मुझे एक जगह बैठाकर पास में किसी को बुलाने चली गयी। तभी वहां पर सफाई कर्मचारी की एक लड़की आई और आकर मेरे पास बैठकर मुझे बार-बार छूकर दूर चली जाती, और कहती, 'देख! मैंने तुझे छू लिया...देख! मैंने तुझे छू लिया।' उसने यह पांच से छ: बार किया। मैं चुपचाप बैठी रही। उसका यह व्यवहार थोड़ा सा अजीब लगा पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। तब बहुत ज्यादा अंतर्मुखी, शर्मीली और मासूम भी थी। लेकिन उसके जाने के बाद कुछ देर सोचा तो मन उसके प्रति करुणा से भर आया। क्योंकि मुझे चिढ़ाने और परेशान करने की कोशिश में वह खुद अपना ही अपमान कर रही थी। तब इतनी समझ तो नहीं थी कि उसे कुछ समझा पाती, पर आज भी इतना ही समझ पायी हूँ कि औरों को कुछ समझाने से पहले खुद को यह समझाना बहुत जरुरी है कि न मैं किसी से श्रेष्ठ हूँ और न ही किसी से हीन।

खुद में ही बेहतर बनते रहने के प्रयास जरुरी हैं। अपनी कमियों को स्वीकार कर उनसे ऊपर उठना भी जरुरी है। किसी के गुणों से प्रेरित होना भी अच्छा है। लेकिन इसके लिए मन में हीनता से प्रेरित ईर्ष्या व द्वेष की कोई ग्रंथि रखने की आवश्यकता नहीं क्योंकि अवसर मिलने पर यही इन्फीरियरिटी कॉम्प्लेक्स सुपीरियरटी कॉम्प्लेक्स बन जाता है और ये दोनों ही कॉम्प्लेक्स कई अपराधों और समस्यायों की जड़ हैं। श्रेष्ठता के सारे मापदंड तो हमने ही निर्मित किये हैं। बाकी तो जितने भी जीवन इस धरती पर हैं वे बस अनूठे हैं...हीन या श्रेष्ठ नहीं। और अगर हम चेतना को श्रेष्ठता का सबसे उपयुक्त मापदंड माने तब भी चेतना की श्रेष्ठता इसी में है कि वह किसी को हीन न समझे। सबमें स्वयं की अनुभूति एक आदर्श स्थिति है, पर पूर्ण आदर्श से पहले एक लम्बा रास्ता है और समाधान की दिशा यही है। बाकी तो कितनी भी क्रांतियाँ होती रहे, यह दुनिया नहीं बदलने वाली।

क्योंकि अक्सर जितनी भी क्रांतियाँ और आन्दोलन होते हैं वे बस शोषक को शोषित और शोषित को शोषक में रूपांतरित कर देने की कोशिश भर है। सामान्यतया कोई भी प्राणी शोषक और शोषित दोनों ही होता है। कई बार तो बात बस अवसर मिलने और न मिलने की हो जाती है। ऐसे में सबसे जरुरी है शोषक और शोषित के इस कुचक्र से ऊपर उठने के मार्ग पर बढ़ने की। इसके लिए जरुरी है कि भिन्नता को बस भिन्नता के तौर पर लिया जाए। उसे भेदभाव या किसी को नीचे और ऊपर समझने का आधार न बनाया जाए। पहले भिन्नता को भेदभाव का आधार बनाना और फिर समानता के लिए संघर्ष...आपको नहीं लगता कहीं कुछ चूक रहा है। क्योंकि समानता तो संभव है नहीं...और मुक्ति तो भेदभाव से चाहिए...अनूठेपन से नहीं। जब तक हम भिन्नता को एक अद्वितीयता के रूप में स्वीकार कर भेदभावों से ऊपर नहीं उठेंगे, तब तक क्रांतियाँ सिर्फ भेदभाव और शोषण के तरीकों और शोषक-शोषितों में बदलाव भर करेगी, इससे ज्यादा कुछ भी नहीं। इसलिए आवश्यक है समाधान के उस रास्ते पर बढ़ना जो विभिन्नता में एकता को महसूस कर सके।

23/09/2017 - शून्य से शून्य के बीच की क्रीडा (कीड़ा भी कह लो) ही संसार है। लहरों से लहरों की तुलना बेमानी है, जब हर लहर की शुरुआत और अंत बस पानी है। समय और स्थान ही श्रेष्ठता या हीनता के भ्रम में डाल देता है हमें, जो कि निरपेक्ष है ही नहीं। किसी से किसी आधार पर खुद को हीन (ग्रन्थि युक्त) समझना अक्सर ही उन प्रयासों में डाल देता है, जहाँ पर खुद को उसी से किन्हीं अन्य आधारों पर श्रेष्ठ (ग्रंथि युक्त) भी सिद्ध किया जा सके। यह बाहरी तौर पर भले ही बेहतर बना ले हमें पर भीतर कुछ खो जाता है। और जिसने खुद को श्रेष्ठ ही समझ लिया तो सीखने के रास्ते ही बंद कर दिए। हाँ, प्रेरणा और स्वप्रेरणा एक अलग चीज है। इसमें ग्रंथि नहीं होती। जिसके लिए उसे सामने रखा जाना चाहिए जो दर्पण का काम करे। यूँ कई लोग हमारे लिए अलग-अलग समय और स्थान पर इस दर्पण की भूमिका निभा जाते हैं, हम खुद भी। पर दर्पणों का दर्पण तो सिर्फ वही है जो मुक्त है। वह समय और स्थान के फेरे में पड़ता ही नहीं। वह इसी क्षण है और सर्वत्र है। समय में सिर्फ भूत और भविष्य आते हैं। वर्तमान समय होता ही नहीं। स्थान में यहाँ और वहाँ आता है। सारा आकाश इसमें समाता ही नहीं। 

Monika Jain ‘पंछी’

June 20, 2016

Quotes on Happiness in Hindi

Happiness Quotes

  • 12/03/2017 - कल दिवा के साथ बातों-बातों में हम दोनों को मस्ती चढ़ गयी। उसने कुछ कहा जिसके जवाब में मैंने कहा - आई एम रसगुल्ला, तो उसने कहा - आई एम गुलाबजामुन, और इस तरह से हम दोनों ‘आई एम रस मलाई’, ‘आई एम छिपकली’, ‘आई एम कॉकरोच’, ‘आई एम खिड़की’, ‘आई एम दरवाजा’, ‘आई एम खीरे का रायता’....न जाने कहाँ-कहाँ पहुँच गए। इस आधे घंटे के दौरान दिवा दौड़ते-दौड़ते इतनी हंसी इतनी हंसी कि बता नहीं सकती कि कितनी हंसी। सामान्यत: बच्चों को ख़ुश होने के कितने छोटे-छोटे से कारण चाहिए होते हैं। इसकी वजह है कि उनके अंदर की शांति और आनंद हमसे थोड़ा बेहतर होता है। मन में अभी बाहर का कूड़ा नहीं भरा होता है। आजकल हर किसी विचार या घटना को आध्यात्मिक मायनों से देखने का स्वभाव बन गया है। खुद को छिपकली, बादल, सूरज, चाँद, चींटी, मूंगफली...सब कुछ बनाते हुए अच्छा लग रहा था। याद आ रहा था हर किसी प्राणी का अंतिम लक्ष्य जहाँ किसी भी तरह का कोई भेद शेष रहता ही नहीं। और हम हर जगह, हर किसी में खुद को यानि परम को ही महसूस करते हैं। महावीर और बुद्ध भी याद आये जिनके भीतर का आनंद और शांति इतनी सघन हो जाती है कि फिर उन्हें ख़ुश होने के लिए किसी बाहरी उत्सव या कारण की जरुरत ही नहीं रहती। हम सभी बाहर ख़ुशी ढूढ़ते हैं क्योंकि वह भीतर नहीं होती। जिस दिन भीतर उत्सव मनने लग जाता है बाहरी किसी उत्सव या मनोरंजन की आवश्यकता शेष ही नहीं रहती।
  • 20/06/2016 - ...और फिर मुझे याद आया कि ख़ुश रहना एक निर्णय है। 
  • 10/01/2015 - ईश्वर पर भरोसा हो न हो, मायने नहीं रखता...पर सच्चाई और अच्छाई पर विश्वास कभी न टूटे, यह बेहद जरुरी है। जंग कभी ईश्वर और इस धरती के प्राणियों के बीच रही भी नहीं। जंग तो हमेशा से ही अच्छाई और बुराई, सही और गलत के बीच ही रही है, तो फिर ईश्वर है या नहीं इस बात की चिंता करनी भी क्यों? महत्वपूर्ण सिर्फ इतना है कि हम कौनसा रास्ता चुनते हैं। अच्छाई का रास्ता दर्द, तकलीफों, आलोचनाओं, दुःख और संघर्ष से भरा है, इसमें संदेह नहीं। लेकिन एक सच यह भी है कि इस रास्ते की आग से गुजरते हुए जो व्यक्तित्व निखर कर आएगा वह अतुलनीय होगा। उस स्तर पर जो आत्मिक सुख और संतोष होगा वैसा सुख कहीं और हो ही नहीं सकता। 
  • कई लोगों से बात की है। हमेशा यही देखा है...उच्च से उच्च शिक्षा प्राप्त कर लेने के बाद, बड़े से बड़ा पद पा लेने के बाद भी कोई संतुष्ट या खुश नज़र नहीं आता। कभी मैं भी ऐसी ही थी। अनावश्यक भौतिक वस्तुओं की चाह तो कभी भी नहीं रही लेकिन 100 में से 99 मार्क्स आने पर भी दुःख होता था कि 1 मार्क क्यों कट गया? छोटी-छोटी असफलताएं भी बहुत बड़ी लगती थी। बड़ी से बड़ी सफलता मिलने पर भी कोई खास ख़ुशी नहीं होती थी। क्योंकि उससे पहले ही नया लक्ष्य तय हो जाता था। पर अब जब जीवन के असली संघर्ष को देखा है तो लगता है...सफलता की कितनी संकीर्ण परिभाषा हम लोगों ने गढ़ रखी है। हमारी आत्म संतुष्टि से ज्यादा महत्वपूर्ण हमारे लिए दुनिया की नजरों में आगे बढ़ना हो गया है और इस दौड़ में हम ऐसे कई पलों को नजरंदाज़ कर देते हैं जो हमें सच्ची ख़ुशी दे सकते हैं। हम पूरी जिंदगी खुशियों के पीछे भागते रहते हैं, पर कुछ ऐसी भी खुशियाँ होती है जो हमारा पीछा कर रही होती है, पर हमारी दौड़ इतनी तेज होती है कि ये सब खुशियाँ पीछे छुट जाती है और रह जाती है तो बस हमारी दौड़...जो कभी खत्म ही नहीं होती। 
  • जब ख़ुश होना नहीं, ख़ुश हैं यह दिखाना अधिक महत्वपूर्ण हो तो ख़ुश कैसे रहेंगे?

Monika Jain ‘पंछी’

June 19, 2016

Poem on College Life (Farewell) in Hindi


(1)

स्लैम बुक

एक पुराना बैग
उसमें रखी एक पुरानी डायरी
एक स्लैम बुक
और इनसे जुड़ी व इनमें सिमटी
ढेर सारी यादें...

कॉलेज के आखिरी दिन...
स्लैम बुक के पहले पन्ने पर
दर्ज होते तुम...
और तुम्हारी लिखी आखिरी पंक्तियाँ -
“You are a Very Darling Girl!
Very Thought Provoking,
& Very Caring.”

जानती हूँ आज भी अगर लिखोगे
तो कुछ ऐसा ही लिखोगे।
पर जुड़ जाएगा आखिर में
एक और विशेषण -
“You are Very Understanding.”

और यही वह आखिरी शब्द है
जो इजाजत देता ही नहीं
कि बढ़ा दूँ तुम्हारी ओर
फिर से स्लैम बुक
और कर दो तुम
अपनी ज़िन्दगी का
एक और पन्ना
बस मेरे नाम। 

Monika Jain ‘पंछी’
(19/06/2016)

(2)

अपलक

तुम्हें याद है वो दिन 
जब हम आखिरी बार मिले थे 
फिर कभी ना मिलने के लिए। 

तुम्हें क्या महसूस हुआ 
ये तो नहीं जानती 
पर जुदाई के आखिरी पलों में 
मैं बिल्कुल हैरान थी। 

कुछ ऐसा लग रहा था जैसे 
अलग कर दिया है मेरी रूह को 
मेरे ही जिस्म से 
दिल काँप रहा था मेरा 
इस अनचाही विदाई की रस्म से। 

एक अनजाने से खौफ ने 
जकड़ लिया था मुझे 
और तेरे आँखों से ओझल होने के बाद भी 
अपलक देखती रही मैं बस तुझे। 

Monika Jain 'पंछी'
(01/04/2013)

June 12, 2016

Essay on Life in Hindi


जीवन है बड़ा गहरा

16/12/2016 - एक चींटी जिसके कान और आँखें नहीं होती उसके लिए संसार कैसा होगा? उसके लिए तो दृश्य और ध्वनि जैसा कुछ है ही नहीं। एक जानवर जिसके सुनने और देखने की क्षमता हमसे अलग हो उसके लिए यह संसार कैसा होगा? एक पत्थर, पेड़, नदी, चट्टान, सूरज, चन्द्रमा...इन सबके लिए यह संसार कैसा होगा? इन सबका संसार अलग-अलग है जो उनके ही मन और इन्द्रियों के अधीन चल रहा है। ऐसे ही जितनी भी जीव श्रेणियां हैं उनका देखना, सुनना, समझना सब अलग है और यह विभेद बढ़ते-बढ़ते जीवमात्र पर भी लागू हो जाता है। यह संसार तो किन्हीं दो मनुष्यों के लिए भी एक सा नहीं होता। चेतना और दृष्टिकोण के हर स्तर पर संसार का स्वरुप बदल जाता है। इसलिए हम कहते हैं जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि या यूँ कहें कि एक ही संसार में असंख्य संसार है। इन्द्रियों और मन से जो नज़र आ रहा है वह तो मात्र प्रक्षेपण है। मतलब इसी दुनिया में ऐसे कई संसार हो सकते हैं जो न हमें दिखाई दे रहे हों, न सुनाई दे रहे हों और न ही हम स्पर्श कर सकते हों। लेकिन जीवन सिर्फ वह नहीं जो किसी को भी अपने मन और इन्द्रियों से नज़र आता है। जीवन इससे परे भी बहुत कुछ है या यूँ कहूँ कि सब कुछ है। जीवन तो बड़ी गहरी चीज है।

12/06/2016 - सामान्यतया मैं मंदिर नहीं जाती, पूजा-पाठ नहीं करती, कोई इष्ट देव भी नहीं। किन्हीं संत-महात्माओं के यहाँ भी नहीं जाती, कोई गुरु विशेष भी नहीं। ईश्वर जैसा साकार रूप में अलग से कुछ है, जिसने इस सृष्टि को बनाया है, ऐसा भी नहीं सोच पाती। पर मैं इन सबको सिरे से झुठला भी नहीं सकती। हाँ, समय की मांग के अनुरूप और व्यापक हित में अपने नजरिये से किन बातों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए और किन्हें नहीं, इस पर विमर्श कर सकती हूँ...समर्थन और विरोध कर सकती हूँ। लेकिन आस्तिक-नास्तिक, वाम-दक्षिण, हिन्दू-गैर हिन्दू जैसी श्रेणियों में अपना विभाजन नहीं कर पाऊँगी।
 
जो परिभाषाएं यहाँ आस्तिकता और नास्तिकता की चलती है उनके अनुसार मैं नास्तिक नहीं हूँ क्योंकि यह समूचा ब्रह्माण्ड, उसकी व्यवस्था, सृष्टि, उस पर जीवन के विविध रंग और रूप, हमारा अपने जन्म और मृत्यु के साथ-साथ कई चीजों पर नियंत्रण का न होना...ऐसी असंख्य बातें हैं जो समर्पण कर देने के लिए पर्याप्त से अधिक है। यह हमारा अहंकार है जो समर्पण कर नहीं पाता। मैं आस्तिक नहीं हूँ क्योंकि ईश्वर को मैं अलग से किसी सर्जक या स्रष्टा इकाई के रूप में नहीं मान पाती। इसलिए ही किसी रूप या आकार विशेष की पूजा भी नहीं कर पाती। अगर अपने परम तत्व में अवस्थित हो जाने का मार्ग अकर्ता हो जाना है तो अवश्य ही परम तत्व भी अकर्ता ही होगा।

बाकी मेरे दृष्टिकोण में आस्तिकता और नास्तिकता में कोई अंतर है ही कहाँ? नास्तिक ब्रह्माण्ड का जो स्रोत अकारण और स्वत: मान लेते हैं उसे ही आस्तिक ईश्वर का नाम दे देते हैं। नास्तिक जिन्हें प्रकृति की शक्तियां या ऊर्जा कह देते हैं, उसे ही आस्तिक दैवीय शक्तियां कह देते हैं। अब उसी ऊर्जा को जब हम मानव कह देते हैं, पशु-पक्षी कह देते हैं, गाजर-मूली-टमाटर कह देते हैं तो इंद्र देवता, अग्नि देवता, पवन देवता कह देने में भी कोई विशेष समस्या वाली बात है नहीं। पर हाँ, प्रकृति का यह दैवीकरण भी जागरूकता के एक विशेष स्तर के बाद ही हो सकता है उससे पहले तो यह अज्ञान और अन्धविश्वास ही होगा। हमारे सुख-दुःख, भावनाएं, किसी की मृत्यु, किसी का जन्म...सब कुछ भी तो उसी ऊर्जा का रूप है। लेकिन अपनी भावनाओं के प्रति हम कितने संवेदनशील होते हैं। मरने-मारने, लड़ने-झगड़ने सबके लिए उतारू हो जाते हैं। पर गहराई में देखें तो विचार और भावनाएं भी उसी ऊर्जा का रूप है। तो फिर यह सारे संघर्ष भी कितनी बड़ी बेवकूफी है? (मुक्ति की यात्रा भी बस इसी चिंतन से शुरू होती है।)

सुविधा के तौर पर ठीक है पर जीवन को इस रूप में आप कैसे देख लेते हैं कि इसे इतनी आसानी और कट्टरता से खांचों में बाँटा जा सके? संभावनाओं में मेरा विश्वास है और धर्म मेरे लिए जड़ता नहीं बल्कि गति है - चेतना की आगामी संभावनाओं के स्तर पर बढ़ते जाना या यूँ कहूँ कि अपने ही मूल स्वभाव की ओर वापस लौटना। जीवन बस सोने-उठने, खाने-पीने, प्रजनन, सफलता और विकास के नाम पर होने वाली कई ऊटपटांग चीजों और फिर मर जाने जितना सीमित नहीं हो सकता। सब कुछ इतना सम्बंधित है कि न जाने कितने रास्ते एक ही जगह पर पहुँचते हैं। जीवन बहुत रहस्यमयी और जटिल है। कुछ समझना भी हो तो आसान बस हमें ही होना होता है।
 
Monika Jain ‘पंछी’

June 11, 2016

Surrogacy (Surrogate Mother) Poem in Hindi

कोख का मोल

निवेश को बाजार ढूंढती
हमारी पूंजीवादी व्यवस्था
कहीं भी कोई गुंजाइश
क्यों छोड़ने लगी?
देखो, आज माँ की कोख भी
चंद रुपयों के पीछे
निवेश की दौड़ दोड़ने लगी।

वासना से पूरित आँखें
अब तक तो चलते-फिरते
स्त्री को माल कहते आई है।
पर मातृत्व भी हो जाएगा
बाजार के अधीन?
किराये की कोख
आज यही हाल कहते पाई है।

पैसों की दौड़ ने सबको कर दिया है
महज़ वस्तुओं में तब्दील
कुछ बन गए खरीदकर
और कुछ बिकाऊ
अब हो सकती है कोई भी डील।

‘ममता है अनमोल’ कहते चेहरों को
कल तक गर्व से इठलाते देखा
पर ’कोख का मोल’ लगाने वालों को
बेशर्मी से इसे झुठलाते देखा।

नहीं दोष केवल उस औरत का
जो कोख के व्यापार को बैठी है
शामिल है हम सब और पूरी ही व्यवस्था 
जो जीवन को महज व्यापार बना बैठी है।

अपना अंश, अपना खून,
मनुष्य की आकांक्षाएं
कोई भी सीढ़ियाँ चढ़ लेती है
पर जो होती है सच में माँ
वह तो किसी भी रूप के लिए
ममता के भाव गढ़ लेती है।

Monika Jain ‘पंछी’
(11/06/2016)

24/10/2017 : नोट : जीवन एक लेन-देन और व्यापार के सिवा कुछ है नहीं। शरीर, विचार, भावना, ऊर्जा...हर स्तर पर यह लेन-देन होता है। मुख्य बात बस यही है कि इस लेन-देन की मात्रा और स्तर क्या है और यह हमें आत्मिक तौर पर कितना ऊपर उठाता है या नीचे गिराता है। बाहर से क्या नज़र आता है उससे कई अधिक महत्वपूर्ण उस स्थिति में किसी भी व्यक्ति के भाव हो जाते हैं, और वह हमेशा हर व्यक्ति के मामले में हमें नहीं पता हो सकते। इस आधार पर आज इस कविता की अभिव्यक्ति से पूरी तरह तो सहमत नहीं हूँ। हालाँकि कविता मात्र विचार है। भावों में कोई बुरा आवेश यहाँ नहीं है। जिम्मेदार सभी को माना है। लेकिन फिर भी मुख्य पात्रों की आलोचना का अधिकार नहीं रखती, जबकि खुद भी किसी न किसी रूप या मात्रा में, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर जीवन के व्यापारों और इस पूंजीवादी व्यवस्था में शामिल हूँ।