August 31, 2016

Essay on Gautam Buddha in Hindi

बुद्ध - सच्चे अर्थों में स्वार्थी

कभी-कभी लगता है लोगों को अंगुलिमाल उतना बेचैन नहीं करता जितना कि बुद्ध करते हैं। उनकी समस्या अंगुलिमाल की हिंसा नहीं बुद्ध की अहिंसा बन जाती है। :)...तब जबकि वे खुद कभी अंगुलिमाल को नहीं बदल पाए। अंगुलिमाल को कैद किया जा सकता है...कठोर दंड दिया जा सकता है। जरुरी है तो होना भी चाहिए। लेकिन यह ख़याल रहे कि अंगुलिमाल बुद्ध के प्रभाव में ही बदलते हैं। बहरहाल तो इस युग में अंगुलिमाल जैसे बदलने वाले भी कम ही मिलेंगे। गुरु और शिष्य दोनों के ही उत्कृष्ट स्तर का उदाहरण है यह। लेकिन अगर दोषी को छोड़कर हमारी आलोचना का केंद्र निर्दोष बनते हैं तो थोड़ा ठहरकर सोचने की जरुरत है कि दोषिता से निर्दोषिता के बीच हम कहाँ खड़े हैं? बहुत संभावना है कि हम दोषिता के निकट हों। क्षणिक और स्थायी, समाधान दोनों ही जरुरी होते हैं, लेकिन उनके अंतर को हमें समझना होगा। समस्या के कारण (अज्ञान) को समझना होगा। समस्या के समाधान (ज्ञान) को समझना होगा और समाधान के मार्ग (सजगता) को भी समझना होगा।

प्रश्न : लोगों के बारे में तो कहा नहीं जा सकता लेकिन अपनी बात अगर करूँ तो ज़रूर किसी सो कॉल्ड बुद्ध से मिलना, उसे देखना चाहूंगी। जनता ने अपने आस-पास अंगुलिमाल तो एक्ससेस में देखे सुने हैं, निर्भया वाले, अभी हरियाणा में भी एक...सब अंगुलिमाल ही तो थे। बुद्ध ने अपने समय में कितने अंगुलिमाल सुधार दिए, इसकी सच्चाई पर तो बस अंदाज़े ही लगाए जा सकते हैं। आज के समय में कोई बुद्ध हों, तो उनकी ज़रूरत सच में पड़ेगी। इस से बुद्धत्व की डोक्ट्रिन भी टेस्ट हो जाएगी कि बुद्धत्व कितना ओवररेटेड है, और कितना अंडररेटेड।

उत्तर : बुद्ध और अंगुलिमाल प्रतीक हैं जिनके माध्यम से यह पोस्ट समस्त दुनिया में और किसी व्यक्ति विशेष में ही व्याप्त सत्व और तम की ओर इशारा करती है। फांसी, कैद या जितने भी अन्य उपाय हैं वह समाज की तात्कालिक आवश्यकताओं के अनरूप उचित हो सकते हैं। फौरी तौर पर एक संतुलन बना रहे इसके लिए जरुरी हो सकते हैं। ये एक भय जरुर पैदा कर सकते हैं, लेकिन क्या ये किसी इंसान का अंतस बदल सकते हैं? क्या गलत से गलत को स्थायी रूप से बदला जा सकता है? इंसान का अंतस तभी बदलेगा जब वह अपने सत्व को पहचानेगा। जब वह अपने अज्ञान से ऊपर उठेगा।...और यह प्रेरणा उसे कहीं से भी मिल सकती है। वह प्रेरक तत्व जो भी होगा वह सत्व ही होगा।

और ऐसे तो आपको ढेरों उदाहरण मिल जायेंगे जहाँ किसी की अच्छाई या व्यक्तित्व से प्रेरित होकर किसी में सुधार आया हो। आप खुद के जीवन में ऐसे उदाहरण खोज सकती हैं। मेरे पास तो ऐसे कई उदाहरण है। रही बात रेटेड की तो हर चीज मूल्य लगाने के लिए नहीं होती। पर लगाना भी हो तो जिस अच्छाई को आप समाज में देखना चाहती हैं क्या उसके चरम को इग्नोर कर सकती हैं? आदर्श तो वही होगा। बाकी दुनिया को सुधार देने की भावना जितनी प्रबल होती है वहां उतना ही अहंकार छिपा होता है। जैसे आतंकवादी भी अपनी ओर से यही कर रहे होते हैं।

जिस क्षण हम खुद बदलते हैं, उस क्षण ही पूरी दुनिया बदलती है। अन्यथा तो हम बस एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने में ही लगे रहते हैं। हम खुद को पूर्ण निर्दोष बनाये बगैर दुनिया को सुधारने की बात करें...यह प्रचलित और जरुरी हो तब भी कहीं गहराई में बहुत अजीब है। क्योंकि जितना भी दोष हममें विद्यमान है उसका ही थोड़ा बड़ा रूप किसी अपराधी में है...और यह जो अजीब वाली फीलिंग है यह भी किसी सिदार्थ को बुद्धत्व की ओर प्रेरित करती है। बाकी तो यह ऊपर ही स्पष्ट है कि समाज की तात्कालिक जरूरतों के अनुरूप कानून और न्याय व्यवस्था होनी ही चाहिए। लेकिन यह अंतिम समाधान नहीं। दोषों का दूर होना स्वयं निर्दोष बन जाने में ही निहित है। हाँ, इससे फैला उजास अवश्य वह परिवर्तन ला सकता है जो क्रांति की अनगिनत मशालें नहीं ला सकती। तो जो लोग यह कहते हैं कि बुद्ध और महावीर स्वार्थी हैं, वे अनजाने में ही सही, बिल्कुल सच कहते हैं। क्योंकि कोई भी व्यक्ति सच्चे अर्थों में 'परमार्थी' बन ही नहीं सकता जब तक वह सच्चे अर्थों में 'स्वार्थी' न बन जाए। :)

Monika Jain ‘पंछी’
(31/08/2016)

August 30, 2016

Quotes on Nonviolence in Hindi

Nonviolence Quotes

  • 15/04/2017 - हिंसा को कानूनी, नैतिक और ऊपर-ऊपर से व्यवस्थित जामा पहनाने को सभ्यता और विकास कहते हैं। इसकी आड़ में बड़ी से बड़ी हिंसा को सुन्दर रूप दिया जा सकता है।
  • 30/08/2016 - जब महावीर से पूछा गया, 'आप दुनिया को कैसी बनाना चाहते हैं?’ तो उन्होंने कहा, ‘जैसी यह है।' अहिंसा का चरम है यह। जहाँ पूर्ण स्वीकार होता है। जहाँ व्यक्ति अकर्ता बन जाता है। जहाँ अहंकार खत्म हो जाता है। अकर्ता के कर्म निश्चय ही दुनिया की भलाई के लिए ही होंगे लेकिन साथ ही उन्हें सब कुछ स्वीकार भी होगा। उनका किसी से कोई बैर नहीं होगा। 
  • अहिंसा से बड़ा और विस्तृत कोई धर्म, कोई दर्शन, कोई वाद अभी तक नजर नहीं आता, बशर्ते अहिंसा को उसके सही अर्थों में समझा जाए। मानवता (जिस आशय में कई लोग समझते हैं) उसके सामने एक संकीर्ण विचारधारा है। अहिंसा का विशुद्ध पालन भले ही असंभव के निकट है, लेकिन विशुद्ध से पहले भी बहुत कुछ आता है।
  • जब कोई किसी को शारीरिक चोट पहुँचाता है तो वह साफ़-साफ़ नज़र आ जाती है पर मानसिक चोट? मानसिक शोषण, हत्या और बलात्कार को नापने का तो कोई पैमाना ही नहीं। कोई किसी का खून कर दे और कोई किसी को हमेशा के लिए घुट-घुटकर जीने को मजबूर कर दे...दोनों में कितना भर अंतर होगा? हत्या सिर्फ शरीर की ही नहीं होती...हत्या होती है खुशियों की, अरमानों की, सपनों की, उम्मीदों की, अहसासों और भावनाओं की भी। इन हत्यारों की सजा? अपराध जो दिखाई नहीं देते...क्या अपराध नहीं होते?
  • कुछ दिन पहले किसी अथीति के स्वागत और मनोरंजन के लिए एक कबूतर को रॉकेट के साथ बांधकर उड़ाया गया। हवा में ही कबूतर के चिथड़े उड़ गए। कबूतर से भोला और शांत पक्षी तो ढूंढे नहीं मिलेगा। कई बार बहुत करीब से कबूतर, चिड़िया, चींटी आदि को मरते देखा है। हर बार यही पाया कि मृत्यु की पीड़ा और जीने की इच्छा प्रजातियों में विभेद नहीं करती। मनुष्य जरुर अपने प्रयासों से इस पीड़ा से ऊपर उठ सकता है, और सिर्फ उसी दिन मनुष्य अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ सिद्ध होता है। बाकी एक मनुष्य और पशु में क्या अंतर है? विकास के नाम पर हम कितनी भी ऊंची इमारते बना लें, समूचे विश्व को डिजिटल कर दें लेकिन ये सब करके हम किसी पे कोई अहसान तो नहीं कर रहे। हाँ, प्रकृति का दोहन और अन्य प्राणियों से उनके अधिकार जरुर छीन रहे हैं। एक जानवर सिर्फ हमारे मनोरंजन या धर्म की भेंट चढ़ जाए यह स्वीकार्य नहीं है। जैसी संवेदनाएं हम इंसानों में होती है वैसी ही कम-ज्यादा इन पशु पक्षियों में भी होती है। जिस तरह हमारी जिजीविषा है वैसी ही इन जीवों की भी। जैसा दर्द हमें होता है, वैसा ही इन्हें भी होता है। और जिस दिन हम इतना सा समझ जाएँ उस दिन अहिंसा धीरे-धीरे स्वत: ही जीवन में उतरने लगेगी, उसके लिए फिर अलग से प्रयास की जरुरत नहीं रहेगी। 
  • कुछ बच्चे और कुछ बड़े भी कई बार इसी फिराक में रहते हैं कि कब कोई नन्हा कीड़ा-मकोड़ा दिखे और कब उस पर अपना हाथ साफ़ करें। और तो और मारकर ऐसे ख़ुश होते हैं जैसे किसी शेर-चीते को फतह कर आये हों। लेकिन जब वास्तव में शेर या चीता सामने आएगा तो ऐसी घिग्गी बंधेगी कि मुंह से आवाज़ भी नहीं निकलने वाली। तो हिंसा सामान्यत: हमारी कायरता/भय ही है और अहिंसा वीरता…जिसका जन्म सिर्फ निर्भयता से ही हो सकता है। सिर्फ निर्भय ही अभय दे सकता है।

Monika Jain ‘पंछी’

August 29, 2016

Albert Einstein's Theory of Relativity Essay in Hindi

आइंस्टीन का सापेक्षता का सिद्धांत

16/12/2017 - कुछ सालों पहले जब मैंने आइंस्टीन के आपेक्षिकता सिद्धांत का एक दो लोगों के सामने जिक्र किया तो उनकी बातों से लगा जैसे बहुत मुश्किल और जटिल सा सिद्धांत है। विज्ञान वालों को मुश्किल लग रहा है तो मुझे कहाँ से समझ आएगा और इस तरह मैं उस बात को भूल गयी। फिर कुछ महीनों पहले जब गूगल पर तीन-चार बार पढ़ा तो कुछ-कुछ चीजें समझ भी आयी। 

पता नहीं कितना समझा पर इस सिद्धांत के अनुसार कोई भी पिंड अपने गुरुत्व की वजह से गुरुत्व की दिशा में अपने आसपास के दिक्-काल (समय-स्थान) में एक संकुचन पैदा करता है। आशय यह कि गुरुत्व समय की गति को धीमा कर देता है और स्थान को भी संकुचित कर देता है। यही बात गतिशील वस्तुओं पर भी लागू होती है। जिसके स्पष्ट परिणाम प्रकाश के वेग के निकट गति करती वस्तुओं में देखे जा सकते हैं। लेकिन सैद्धांतिक तौर पर गति के सापेक्ष वस्तु का द्रव्यमान बढ़ता है, जिसकी वजह से समय धीमे हो जाता है और गति की दिशा में लम्बाई में संकुचन होता है। मतलब प्रेक्षक के सापेक्ष गतिशील घड़ी में स्थिर घड़ी की तुलना में समय धीरे बीतेगा। और वह गति की दिशा में संकुचित भी दिखाई देगी। ऐसे में समय यात्रा के बारे में भी सोचा जा सकता है। लेकिन वह हम जैसे कल्पना करते हैं वैसे नहीं होगी। सापेक्षता की वजह से होगी। और प्रायोगिक तौर पर अभी संभव नहीं क्योंकि प्रकाश के वेग की तुलना में अभी बहुत धीमी गति ही संभव हो पायी है। 

आइंस्टीन ने न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण से आकर्षण को हटा दिया और उसे दिक्-काल संकुचन के रूप में व्यक्त किया। इस संकुचन से उत्पन्न वक्रता की वजह से ही वस्तुएं धरती की ओर गिरती हैं और पिंड एक दूसरे के चारों ओर परिक्रमा करते हैं। ऊर्जा द्रव्यमान के सम्बन्ध को भी उन्होंने परिभाषित किया। और भी चीजें हैं जैसे प्रकाश की किरण का अधिक दिक्-काल संकुचन में प्रवेश करने पर मुड़ जाना। अब अगर गुरुत्व के प्रभावों पर हम विचार करें तो बहुत से निष्कर्ष सामने निकलकर आते हैं। जैसे अगर पृथ्वी की तुलना में कम गुरुत्व वाले किसी पिंड पर जीवन संभव होता तो वहां हमारी लम्बाई कुछ बढ़ जाती लेकिन हमारी उम्र कुछ कम हो जाती। और किसी अधिक गुरुत्व वाले क्षेत्र में जीवन संभव होता तो हमारी उम्र बढ़ जाती और हमारी लम्बाई यहाँ की तुलना में कम होती। वैसे गणना योग्य परिवर्तन तो प्रकाश के वेग के निकट गति करने पर ही देखे जा सकते हैं। 

यह सब सोचते-सोचते बहुत से सवाल मन में आ रहे थे जैसे : गुरुत्व का मन पर क्या प्रभाव पड़ता है? कुछ तो पड़ता ही होगा। वैसे मन तो सबसे अधिक जटिल है। इस पर तो ना जाने किस-किस के प्रभाव पड़ते हैं। फिर मन के लिए तो समय और स्थान हमेशा से ही सापेक्ष रहे हैं। एक फूल एक दिन में अपना पूरा जीवन जी लेता है और हमें यह समय कितना छोटा लगता है। कुछ जीवों की आयु तो मिनिट्स और सेकण्ड्स में भी होती होगी। उनके लिए भी उनका जीवन तो पूरा ही होता होगा। जब हम उदास होते हैं और मन भारी होता है तो समय कितना धीरे-धीरे बीतता महसूस होता है। जब हम ख़ुश होते हैं, मन हल्का होता है तो समय कितना तेज गुजरता महसूस होता है। और जो लोग ध्यान द्वारा विचार शून्यता की स्थिति में पहुँच जाते होंगे उनके लिए तो उस स्थिति में समय और स्थान का अस्तित्व ही नहीं रहता होगा। शायद इसलिए कुछ लोग इतने-इतने वर्षों की तपस्या कर पाते थे। हमारे आसपास इतने सारे फैक्टर काम करते हैं कि जीवन भी सापेक्ष है, मृत्यु भी सापेक्ष है, यह भी सापेक्ष और वह भी सापेक्ष। सत्य! तुम इतने निकट होकर भी कितने दूर हो। नेति-नेति भी तो यही कहती है। 

29/08/2016 - साइंस स्ट्रीम नहीं रहा आगे तो आइंस्टीन का सापेक्षता का सिद्धांत तो कभी पढ़ना और समझना नहीं हुआ डिटेल में। हालाँकि कभी पढ़ना और अच्छे से समझना चाहूंगी। लेकिन जिस सापेक्षता को मन काफी समय से सूक्ष्म रूप से समझ रहा है वहां एक ही समय में दो विरोधाभासी कथनों से भी बिल्कुल सहमत हुआ जा सकता है।

जैसे : मृत्यु एक शाश्वत सच है और मृत्यु एक शाश्वत झूठ भी है।
जैसे : सरल होना सबसे जटिल है और सरल होना ही सबसे सरल है।
जैसे : पूर्ण स्वीकार का क्षण ही पूर्ण निस्तार का क्षण बनता है।
जैसे : सबसे मैत्री (करुणा) किसी से मैत्री (मोह) नहीं होती।
जैसे : धर्म (तथाकथित) संहारक है और धर्म (विशुद्ध) ही संरक्षक है। और संरक्षक वाला धर्म राजनीति क्या दुनिया की हर एक नीति को सकारात्मक दिशा में लाने के लिए जरुरी है।

तो कहना बस ये था कि आप सापेक्षता को समझिये, भाषा की सीमाओं को समझिये, शब्दों के अलग-अलग सन्दर्भों में अर्थ को समझिये...फिर आधे से अधिक विवाद तो पल भर में खत्म हो जायेंगे।

कुछ भी लिखा हुआ सामान्यीकरण नहीं होता, सापेक्ष ही होता है। कितनी भी सावधानी बरत लो तब भी पूर्ण सत्य कभी लिखा/कहा या सोचा जा ही नहीं सकता। एक ही बिंदु को देखने के अनन्त कोण होते हैं। इसलिए किसी भी समय शब्दों के रूप में हमारे मन, वचन या लेखन में आया कोई भी विचार एक ही समय में सत्य और असत्य दोनों ही सिद्ध हो जाता है। सारे पॉइंट ऑफ़ व्यूज से मैं जब भी अपने लिखे को जांचने की कोशिश करती हूँ तो उसे असत्य ही पाती हूँ। इसलिए कभी-कभी लिखते-लिखते रुक जाती हूँ और कभी-कभी लिखकर मिटा देती हूँ।...और भीतर कहीं गहराई में मैं सब कुछ छोड़ना चाहती हूँ। यह कोई पलायन नहीं...यह विरोधाभास और द्वन्द्वों जनित इस समस्त जीवन से मुक्ति की ही तड़प होती है जो दुनिया के हर एक प्राणी के भीतर दबी रहती है। चीजों को समझते-समझते कई अनावश्यक चीजें छूटती जा रही हैं और मैं केवल मूलभूत जरूरतों तक ही सीमित हूँ। लेकिन चीजों को केवल छोड़ देना भी समाधान नहीं होता। मुख्य बात यह है कि संसार के भीतर रहते हुए, कर्म करते हुए भी हम खुद को मुक्त कितना रख पाते हैं। कर्मयोग का सिद्धांत समाधान रूप में यही से निकलता है। बाकी बात बस इतनी सी है कि सापेक्षता के दृष्टिकोण से सभी का लिखने का तरीका यही रहेगा। जरुरत बस समझ और जागरूकता के बढ़ाने की है तब आवश्यक क्या है और अनावश्यक क्या है यह अपने आप स्पष्ट होता जाएगा।

प्रश्न : ‘सब कुछ छोड़ना चाहती हूँ।’ कर्मयोग का सिद्धांत यहाँ से कैसे निकलता है?

उत्तर : समाधान रूप में कई तरीके बताये गए हैं जैसे ज्ञान योग, भक्ति योग, क्रिया योग, कर्मयोग ...हालांकि ये विभाजन सुविधा के लिए हैं। ओवरलैप करता है बहुत कुछ। इसमें से कर्मयोग निष्काम कर्म के बारे में कहता है। हर किसी के लिए सन्यास संभव नहीं, यह व्यवहारिक भी नहीं...ऐसे में जागरूक होकर कर्म करें, परिणाम में आसक्ति यथासंभव न रखें। हम सचेत रहें तो कई अनावश्यक कर्म वैसे भी छूट ही जायेंगे। जीवन हिंसा पर खड़ा है और जीवित रहने के लिए कुछ चीजें हमारी मजबूरी होती हैं। हम मुक्त हो जाएँ तो संभव है वे भी छूट जाएंगी या फिर मन में कोई संघर्ष पैदा नहीं करेंगी। 

प्रश्न : आपने बहुत अच्छा समझाया है। आपका शब्द शिल्प प्रेरणास्पद है। कुछ बातें जोड़ना चाहूंगी। प्रथम तो क्वांटम फीजिक्स से वापिस न्यूटोनियन फिजिक्स पर आते हैं, जहाँ सरफिशियल मूवमेंट के लिए जिस प्रकार घर्षण एक आवश्यक किन्तु विरोधी बल है, मतलब घर्षण नहीं हो तो मूवमेंट नहीं होगा, हालाँकि घर्षण गति की डायरेक्शन के खिलाफ काम करता है। उसी प्रकार यदि किसी लिखे हुए या कहे हुए का उल्टा अर्थ (जो लिखने वाला या कहने वाला भाव देना चाहता है, उसका उल्टा) लोग निकालें तो यह कोई विसंगति नहीं है, सामान्य बात है। क्योंकि यदि लिखे हुए या कहे हुए के अनेक अर्थ न निकलें तो लेखन ही क्या हुआ? भावों को रूपांतरित करने के लिए भाषा का अविष्कार हुआ है। ज़ाहिर है कि घर्षण उसमें भी होगा। नहीं होगा तो फिर भाषा नहीं हमें टेलीपैथी की तकनीक खोजनी होगी।

फिर मौन किसी का समाधान हो सकता हो, इसमें संदेह है। ओशो ने हजारो घण्टे स्पीचेज़ दी है। इसी कोशिश में कि भाषा का जितना अधिक विस्तार कर पाएं उतना बेहतर है, और रिलेटिव ही कहा है। किन्तु अर्थ का अनर्थ न हो, इसलिए भाषा की वृहदता का उपयोग कर अपने भाव को स्पष्ट करने के पूर्ण प्रयास किए हैं। सप्रेम :)

उत्तर : शुक्रिया। :) कई अर्थ निकलते हैं यह स्वाभाविक है। लेकिन घर्षण को अत्यधिक से कम करते जाना तो हमारे ही हाथ में है। ओशो की बातों के कितने अनर्थ होते हैं इस बारे में आप ध्यान दीजियेगा। ओशो खुद बहुत विवादस्पद रहे हैं। खैर! यह चर्चा का विषय नहीं। लेकिन फ़िलहाल तक मैं जिस निष्कर्ष पर पहुंची हूँ, वहां पर मौन अंतिम मंजिल भी लगती है और उस मंजिल तक पहुँचने की जीवन यात्रा में हर समस्या का समाधान भी मौन, ध्यान (थोड़ा विस्तृत अर्थ में है यहाँ) से ही निकलता है। मेरा आशय शाब्दिक रूप से चुप हो जाने से नहीं है। शब्द और उनके अर्थ तो हमेशा सापेक्ष ही होंगे, संदर्भित ही होंगे लेकिन जब तक हम खुद पूरी तरह मुक्त नहीं हो जाते तब तक हम जो कहेंगे वह तो संस्कारित मन से ही कहेंगे। वैसे जब से इन चीजों को थोड़ा बहुत समझने लगी हूँ तब से लिखते समय अपनी ओर से जितना मेरे लिए संभव है, सतर्क रहती हूँ। फायदा किसी को हो न हो यह नहीं पता लेकिन काउंट करने लायक नुकसान नहीं होगा इसकी जिम्मेदारी मैं समझती हूँ। हालाँकि सकारात्मक परिवर्तन सम्बन्धी प्रतिक्रियाएं ही मिली है अब तक ज्यादातर और आगे भी यही कोशिश रहेगी। लेकिन मुक्ति की चाह व्यक्तिगत अनुभवों से ही निकलती है। जैसे आप अपने जॉब से संतुष्ट नहीं हैं। ऐसे ही दुनिया में किसी भी कार्य से स्थायी संतुष्टि नहीं मिल सकती। मन जिस स्थायी सुख की खोज में रहता है वह मन के मुक्त हो जाने में ही निहित होता है और वही सबसे मुश्किल होता है।

प्रश्न : मन जिस स्थाई सुख की खोज में रहता है वह मन के मुक्त हो जाने में ही निहित है, कैसे? और ये सम्भव कैसे हो?

उत्तर : इच्छाएं ही दुःख का कारण है। इसलिए इच्छाओं से मुक्ति ही समाधान। यह कैसे संभव है इस पर तो ढेर सारे महापुरुष लिख गए हैं। कई हमारे स्वयं के अनुभव होते हैं। दूसरों के अनुभव शुरूआती तौर पर सहायक हो सकते हैं, लेकिन वास्तविकता यही है कि कोई भी पहले से लिखे गए नियम आदि समाधान नहीं दे सकते। समाधान हमें खुद ही खोजना पड़ता है और हर व्यक्ति का समाधान उसके अनुरूप अलग होता है। 

प्रश्न : ज्यादा समझदार होना, अपने ओथेन्टिकल जीवन से दूर ले जाता है मुझे। जीवन एक यात्रा है...इसका कोई भी उद्देश्य नहीं, मुक्ति की चाहत रखना बेवकूफी है। वैसे 'theory of relativity' को समझ कर बहुत सारी सच्चाइयां समझी जा सकती है। (बाकी ,आपके बातों से सहमत हूँ।)

उत्तर : मुक्ति की चाह कोई इरादतन या कहीं से प्रभावित चाह नहीं होती। यह एक सहज इच्छा है जिसका ही प्रतिबिम्ब है दुनिया की तमाम इच्छाएं। पर हाँ, सभी इच्छाओं की तरह इसका भी मिटना जरुरी है, बिल्कुल इसी वजह से कि जीवन का कोई उद्देश्य नहीं वह सिर्फ जीवन है। उसे बस जीवंत होकर जीना है, और यही मुक्त होना है। बाकी ओथेन्टिकल क्या है और क्या नहीं यह भी विवादस्पद ही है। यह भी व्यक्ति दर व्यक्ति अलग होता जाएगा।

Monika Jain ‘पंछी’