September 17, 2016

Essay on Self Dependence vs Development in Hindi

विकास बनाम आत्मनिर्भरता

कुछ दिन पहले दो दिन तक शहर में नेट और मोबाइल सेवा ठप्प रही।...कारण था एक उधार लेने वाले ने उधार न चुकाने की मंशा के चलते उधार देने वाले की हत्या कर दी और उसके घर को भी लूट लिया। खैर! इस ख़बर की ओर ध्यान दिलाना मेरा उद्देश्य नहीं था। ऐसी ख़बरे तो आप रोज ही अख़बारों में पढ़ते हैं, टीवी पर देखते हैं। लेकिन हाँ, इन घटनाओं का कारण जरुर इस पोस्ट में मिल जाएगा।...तो मैं बात कर रही थी दो दिनों तक नेट और मोबाइल सेवा ठप्प होने की। कैसा महसूस होता है जब अचानक से इन्टरनेट या कॉल की सुविधा बंद हो जाती है? कैसा लगता है जब पूरे दिन बिजली नहीं आती? कैसा लगता है जब अचानक से यातायात के साधन किसी हड़ताल या अन्य किसी कारण से बंद हो जाए? कैसा लगता है जब धार्मिक उन्मादों के चलते शहर, मार्केट, कहीं भी आना-जाना सब बंद हो जाता है? कैसा लगता है जब किसी दिन घर का फ्रिज, पंखा, मिक्सर या कोई भी जरुरी मशीन काम करना बंद कर दे और कुछ दिनों तक कोई ठीक करने वाला उपलब्ध न हो? कैसा लगता है जब पूरी तरह से नौकरों पर निर्भर मालिक के यहाँ कुछ दिन नौकर न आये? और भी ऐसे कई सारे सवाल बनाये जा सकते हैं। हर एक सवाल का ज़वाब कई लोगों के लिए कुछ बेचैनी, परेशानी, किसी जरुरी काम का रुक जाना, पैसों का नुकसान, समय का नुकसान, चिड़चिड़ापन, घबराहट, चिंता, तनाव और ऐसी ही कई चीजें होंगी।

मेरा अगला सवाल यह कि विकास, तरक्की और आगे बढ़ने के आपके लिए क्या मायने हैं? अधिकांश लोगों का जवाब होगा वैज्ञानिक-तकनीकी उन्नति, सुख-सुविधा युक्त साधनों का बढ़ना, समय और मेहनत बचाने वाली मशीनों का आना, एक बटन दबाते ही सब कुछ हो जाए...ऐसा ही कुछ...है न? पर वाकई क्या विकास की यह परिभाषा सही है? विकास का आशय मैं लेती हूँ आत्मनिर्भरता का बढ़ते जाना। इस आत्मनिर्भरता का आशय सिर्फ आर्थिक आत्मनिर्भरता जितना संकुचित मत करना। उससे कई अधिक विस्तृत अर्थ है इस शब्द का...जिसकी अंतिम सीमा वहां तक पहुँचती है जहाँ पर आत्म के सिवा और कुछ भी शेष नहीं रह जाता। किसी चीज पर कोई निर्भरता नहीं। पूर्ण स्वतंत्रता...पूर्ण मुक्ति की स्थिति।

खैर! यह शीर्ष की बात है। हम फिर से पीछे लौटते हैं। ऊपर जिस तरक्की की मैंने बात की और जिसे आप विकास बताएँगे वहां आत्मनिर्भरता का हश्र कैसा है यह सोचने और समझने वाली बात है। जहाँ एक दिन भी अगर इन्टरनेट उपलब्ध न हो तो त्राहि-त्राहि मच जाती है। यातायात सेवा ठप्प हो जाए, फ़ोन घुम हो जाए, शहर बंद हो जाए, बिजली चली जाए तो इंसान बौखला जाता है। हमारा तथाकथित विकास हमें इस कदर अन्य लोगों और वस्तुओं पर निर्भर बनाता जा रहा है कि हम साधनों को साध्य समझ बैठे हैं। ऐसे में अध्यात्म का जीवन में समावेश इसलिए भी जरुरी है क्योंकि यह अंधाधुंध विकास की दौड़ में थोड़ा ठहरकर हमें वास्तविक अर्थों में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में ले जाता है। कहते हैं कि भगवान् महावीर की आत्मनिर्भरता ऐसी थी कि उन्हें भोजन करने की जरुरत नहीं होती थी...तब भी उनका शरीर बलिष्ठ था। शरीर से अद्भुत कांति चारों ओर बिखरी रहती थी...वस्त्रों की उन्हें जरुरत नहीं थी...महलों की उन्हें जरुरत नहीं थी। आत्मनिर्भरता के असल मायने तो यही हैं जहाँ बाहरी साधनों पर निर्भरता और आसक्ति घटती ही जाए। ऐसी आत्मनिर्भरता तक हम पहुचं जाएँ तब तो कितनी समस्यायों का समाधान हो जाएगा। भले ही हम आवश्यकता और समय की मांग के अनुरूप कुछ साधनों का प्रयोग करें लेकिन वे हमारे लिए जीवन और मरण का प्रश्न तो नहीं बनेंगे।

अब सोचने वाली बात यह है कि महज तकनीकी सुविधाओं के विकास के द्वारा हम कितने आत्मनिर्भर और विकसित बन रहे हैं? इस पोस्ट द्वारा मैं तकनीकी विकास का विरोध नहीं कर रही...यह पोस्ट भी आप तक तकनीकी सुविधा के उपयोग के जरिये ही पहुँच रही है। लेकिन विकास के नाम पर जो अति हो रही है उसके बारे में चिंतन हेतु मैं कुछ तर्क दे रही हूँ। वह अति विकास क्या काम का जो प्रकृति से नीचे गिराकर फिर से हमें प्रकृति की ओर लौटने को मजबूर करे? हम कब तक पहले आग लगाकर फिर कुआँ खोदने का उपक्रम करते रहेंगे? कब तक? बेहतर होता विषमता की खाईयों को बढ़ाते जाने की बजाय हम संतुलित बाह्य विकास और आत्म विकास की ओर ध्यान देते। बेहतर होता विज्ञान का उपयोग जगत और जीवन के रहस्यों की खोज में मुख्य रूप से होता। केवल सुविधा के साधन जुटाते जाने वाला विज्ञान विकास नहीं विनाश का पर्याय लगता है। क्योंकि जितनी अधिक हमारी दूसरों पर निर्भरता होगी, उतने ही हम गुलाम और उतनी ही हमारे जीवन की चाबी किसी और के हाथों में होगी...फिर चाहे हम वस्तुओं के गुलाम बनें या फिर व्यक्तियों के।

Monika Jain ‘पंछी’
(17/09/2016)

September 6, 2016

Michhami Dukkadam Kshamavani Message in Hindi

जैन क्षमावाणी पर्व : मिच्छामी दुक्कड़म

हर दिवस विशेष पर यह बात सुनने को मिलती ही है कि वर्ष में सिर्फ एक ही बार क्यों? बात सही भी है कि वर्ष में सिर्फ एक ही दिन क्यों? तो सबसे पहले तो हमसे किसने और कब मना किया कि हम किसी चीज को वर्ष में सिर्फ एक ही बार अहमियत दें? किसी ने किया क्या? चलो हम वर्ष में सिर्फ एक दिन मनाना भी छोड़ देते हैं। लेकिन क्या सिर्फ उससे हम वर्ष में बाकी सब दिन वह मानने लगेंगे। बल्कि मुझे तो यह लगता है कि ये सब दिवस हमारी भागदौड़ वाली जीवन शैली की ही देन है कि जिन चीजों को रोजमर्रा की ज़िन्दगी में अहमियत मिलनी चाहिए थी...कम से कम उन्हें हम साल में एक बार तो याद कर लें।

एक दृष्टान्त देती हूँ : एक ही परिवार के दो सदस्य थे। दोनों में किसी विवाद के बाद से 8-10 वर्षों तक अनबोला रहा। दोनों कभी परिवार में साथ-साथ होते तब भी अजनबियों की तरह होते थे। मन में एक तरह का तनाव या खिंचाव रहता ही होगा। अहम् बड़ा था इसलिए किसी ने बात करने की शुरुआत भी नहीं की। फिर एक दिन क्षमापना दिवस के दिन परिवार के बाकी सदस्यों को बात करते देख उनमें से एक ने किसकी गलती थी और किसकी नहीं इस बात को पूरी तरह से नजरंदाज कर क्षमा मांग ली...और फिर सब कुछ पहले की तरह से नार्मल हो गया। उसके बाद कभी बात बंद होने की स्थिति नहीं आई।

तो इस तरह से कोई दिन विशेष प्रेरणा का काम भी कर सकता है। बल्कि इन दिवसों का वास्तविक उद्देश्य भी यही है कि ये हमारे लिए प्रेरक बनें। तो जब कोई क्षमावाणी जैसे पर्व पर भी व्यंग्य करता हुआ या उसका विरोध करता हुआ दिखाई देता है तो यह नकारात्मकता की अति लगती है। यह मैं इसलिए नहीं कह रही क्योंकि मेरे नाम के साथ ‘जैन’ का टैग लगा है। यह मैं इसलिए कह रही हूँ क्योंकि यह कहना जरुरी है। बाकी न ही ‘जैन’ शब्द पर और न ही ‘क्षमा’ शब्द पर किसी का भी एकाधिकार है। ‘क्षमा’ का अर्थ तो सभी जानते ही हैं बाकी ‘जैन’ शब्द भी ‘जिन’ शब्द से बना है। ‘जिन’ का अर्थ होता है जिसने ‘राग’ और ‘द्वेष’ को जीत लिया हो...और इस नाते जैन वे सब होंगे जो इस मार्ग के अनुयायी होंगे। खैर! किसी को जैन कहलवाना न कहलवाना मेरा उद्देश्य नहीं है। मुझे तो खुद ही ख़याल नहीं रहता कि सिर्फ किसी शब्द के जुड़ जाने से मैं किसी से अलग भी हो सकती हूँ। पर हाँ, अगर इस क्षमा पर्व के सम्बन्ध में कोई चीज है जो प्रकृति को, लोगों को, प्राणियों आदि को नुकसान पहुँचा रही हो तो मैं खुद आपके साथ उसका विरोध करुँगी। लेकिन कृपया विरोध करने के लिए विरोध या व्यंग्य करना बंद कीजिये। यह अच्छा नहीं है।

खैर! आज यह सब बातें करने का समय नहीं है। जब भी लगता है गलती की है, तो क्षमा मांगने का ख़याल रहता है। लेकिन आज विशेष दिन है :

तो सबसे पहले उन मित्रों से क्षमा जो फेसबुक के शुरूआती दिनों में बने थे। कुछ स्कूल जाने वाले बच्चे थे। एक बार किसी ने कहा था, ‘मोनिका दी, आप बहुत बदल गयी हो। पता नहीं क्या-क्या लिखती हो। हमें पहले वाली मोनिका दी चाहिए।‘ :) बदलाव तो खैर प्रकृति का नियम है। मैं इससे अछूती कैसे हो सकती हूँ? पहले जैसी रहूँ न रहूँ, संपर्क रहे न रहे। लेकिन मन में स्नेह और दुआएं हमेशा रहेंगी। बचपन, स्कूल और कॉलेज के मित्रों की भी यही शिकायत होगी। अत: उनसे भी अंतर्मन से क्षमा याचना।

क्षमा उन सभी मित्रों से जो जीवन और फेसबुक की यात्रा के दौरान अमित्र हुए। ऐसे लोग नगण्य हैं। लेकिन उनसे बस इतना कहना है कि कभी-कभी दूर होना शायद दोनों के ही हित में होता है। समय के गर्भ में क्या है पता नहीं...लेकिन मन में किसी के लिए भी किसी तरह का द्वेष न रहे इसका पूरा प्रयास रहेगा।

क्षमा उन सभी मित्रों से जिन्हें मेरी किसी भी बात, पोस्ट, कमेंट, व्यवहार आदि ने आहत किया। भावनाओं के प्रवाह में कभी-कभी ऐसी गलतियाँ हो जाती है जो सामने वाले को आहत कर जाती है। इसके अलावा मतों में भिन्नता को भी दिल पर ले जाते हैं हम लोग। मतभेद मिटे न मिटे, लेकिन मनभेद न रहे इसका पूरा प्रयास रहेगा।

क्षमा उन सभी मित्रों से जिन्होंने कभी कोई सन्देश भेजा हो और उसका जवाब मैंने न दिया हो। मेरा दिल निश्चय ही इतना बड़ा नहीं कि मैं हर या किसी भी तरह के सन्देश का जवाब दे सकती हूँ। लेकिन उपेक्षा आहत करती है और इसके लिए क्षमा याचना।

क्षमा उन मित्रों से जिनसे मैंने अनावश्यक अपेक्षाएं की हों और उन्हें बुरा लगा हो। अपेक्षाओं से पूर्ण मुक्ति बहुत मुश्किल है। इसलिए अभी आपसे क्षमा की अपेक्षा है। :)

क्षमा सृष्टि के हर जीव से, अजीव से...जिनसे भी मैंने जाने-अनजाने में, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष किसी भी रूप से राग या द्वेष का सम्बन्ध बनाया हो। यह क्षमा राग व द्वेष को जीतकर विशुद्ध प्रेम के प्रकट होने में हमारी मदद करे इसी मंगल कामना के साथ क्षमत-क्षमापना। मिच्छामी दुक्कड़म्! :)

Monika Jain ‘पंछी’
(06/09/2016)