December 26, 2016

Letter to a Friend in Hindi

 Letter to a Friend in Hindi
(1)

सदा तुम्हारे पास

अतीत के झरोखों पे साथ बैठे पंछियों,

मेरी निरंतर उदासीनता के बावजूद भी रह-रहकर आती तुम्हारी आवाजें...अच्छा लगता है यह जानना कि मैं भुलाई नहीं गयी। अच्छा लगता है यह देखना कि मैं तुम्हारी यादों का हिस्सा अब भी हूँ। अच्छा लगता है यह सोचना कि ज़िन्दगी की इस तेज रफ़्तार में जहाँ तुम सब जाने कहाँ-कहाँ पहुँच गए हो आज भी मुझसे मिलने की ख्वाहिश रखते हो। यादों के उस सुरीले संगीत में मेरी खनक आज भी है, यह सुनना अच्छा लगता है। इस प्यारे से अहसास के लिए सदा तुम्हारी ऋणी रहूंगी...पर काश! काश, मैं तुम्हें यह समझा पाती कि कभी-कभी अतीत चाहे जितना भी सुन्दर रहा हो उसे भूलना पड़ता है। मेरे लिए भी भूलना जरुरी था। न भूलती तो इस कठोर वर्तमान को कैसे स्वीकार कर पाती? तुम्हारी पुकार को अनसुना करूँ तो अपराधबोध होने लगता है और सुनकर अमल करूँ तो खुद के साथ अन्याय कर बैठूंगी। एक ही गुजारिश है कि अपेक्षाओं से परे मुझे जो हूँ उसी तरह स्वीकार कर लो...बस फिर मुझे सदा अपने पास ही पाओगे।

Monika Jain ‘पंछी’
(04/06/2015)

(2)

प्रेमियों का संवाद
 
मित्र मेरे!

तुम मित्र हो मेरे क्योंकि तुम सबके मित्र हो। तुम्हारे शब्द एक जरिया हैं ह्रदय को प्रेम से प्रकाशित करने का। शब्दों के मायने बस इतने ही कि उनके बीच का अन्तराल मुझे दे जाता है निच्छलता के कई क्षण। कल रात सपने में तुम्हें मृत देखा और मैं जार-जार रोई। सुबह देखा तो तुम्हारे शब्द भी नहीं थे कहीं। कोई तकनीकी अड़चन रही हो या मेरी परीक्षा कि मैं बस शब्दों और तुमसे जुड़ कर न रह जाऊं। मैं शब्दों के बीच के उस अन्तराल को लम्बा करूँ...और लम्बा... इतना कि शब्द खो जाए और बस निश्छलता रह जाए। कुछ समय बाद अड़चन दूर हुई और पता है सबसे पहला वाक्य क्या पढ़ा, ‘स्वप्न तो बस स्वप्न ही है।’ मुश्किल तो बहुत है यह जीवन...पर मौन सम्प्रेषण के ऐसे हजारों किस्से!...जीवन बहुत आश्चर्यजनक हो चला है आजकल।

कैसे कोई बिल्कुल अनजान होते हुए भी मन की सारी की सारी बातें और जिज्ञासाएं पढ़ लेता है और कोई प्रकट बातों के अर्थ का भी घोर अनर्थ कर देता है। तुम्हें देखकर यही लगता है कि प्रेम सांसारिक रिश्तों का मोहताज नहीं। प्रेम उत्तेजित नहीं करता...प्रेम तो करुणा और शांति की गहराईयों में ले जाता है...यह अनुभूति देने वाले तुम!...तुम्हारा होना बधाई है मुझे! न जाने कौनसे क्षण की शुभकामना फलित हुई जो तुम्हारे शब्दों के जरिये तुमसे परिचय हुआ। सबसे पवित्र और गहन रिश्ता उसी से तो बनता है जो हमें हमारे निकट लाता है। और जो अपने निकट हो जाता है, वह सबके निकट हो जाता है। शब्द तुम्हारे उतारते हैं मुझे अपने भीतर...और हो जाती हूँ उस क्षण मैं बिल्कुल नि:शब्द! इतनी स्वच्छता, इतनी निर्मलता, इतनी सौम्यता...नहीं-नहीं यह बात महज शब्दों की नहीं...यह कुछ और ही है जो जोड़ता है हम सबको अपने स्रोत से। उस क्षण मुक्त हो जाती हूँ मैं जीवन की तमाम दुश्वारियों से।

मैं अक्सर सोचती थी - क्या कोई ऐसा हो सकता है, जिससे आजीवन एक प्रवाहमय संवाद हो सके। किसी-किसी को देखकर यह भ्रम हुआ भी, पर अब लगता है जिन्होंने भी खुद को पाया होगा, सिर्फ उन्हें ही इस प्रश्न का उत्तर मिला होगा। लगता तो यह भी है कि कोरे प्रश्न के साथ मर जाना कितना बुरा होता है। और तुम्हें देखकर यह विश्वास पक्का हो जाता है कि आत्मा के तल पर जीने वाले प्रेमियों का संवाद निश्चय ही एक शांत, नीरव; बहती नदी जैसा, वीणा से झंकृत मधुर संगीत जैसा; सांझ की मद्धिम शीतल हवा जैसा या सर्दियों में खिलखिलाती धूप जैसा...होता होगा। कितनी सातत्यता होती होगी उसमें। कोई खंड नहीं, कोई द्वंद्व नहीं, कोई तनाव और खिंचाव नहीं, कोई प्रयास नहीं! अहा! कितना सहज, कितना अद्भुत, कितना निर्मल, कितना गहन और कितना जीवंत! ऐसा ही तो होता होगा न!

Monika Jain ‘पंछी’
(26/12/2016)

(3)

गुमनाम पत्थर
 
मित्र मेरे,

तुम्हारी कहानियां खूब उकेरती है किसी की पीड़ा और दर्द को। तुम्हारा निरीक्षण अच्छा है। अच्छी है तुम्हारी संवेदनशीलता। लेकिन अच्छा नहीं लगता जब तुम्हारे मन में अपने लिए शिकायतें पढ़ती हूँ। बुरा लगता है कि तुम मेरे मन तक नहीं पहुँच पाते। गलती तुम्हारी भी नहीं। मैं कुछ कहती भी तो नहीं। पर सोचो! गर किसी दिन तुम्हें यह पता चले कि जिन कहानियों को तुम्हारी संवेदनशीलता जिन्दा कर देती है सबके ज़हन में, उन्हीं कहानियों की दर्दनाक मार और पीड़ा से गुजर रही एक पात्र मैं भी हूँ...तो क्या तब भी ऐसे ही शिकायत करोगे?

तुम चाहते हो मुझे एक सुन्दर देश के सपने को साकार करने में समर्पित होते देखना...तुम चाहते हो मुझसे मिलना...तुम चाहते हो मेरे हाथों से बने खाने का स्वाद चखना...तुम चाहते हो मेरे साथ खेलना...और भी बहुत कुछ! लेकिन तुम खुद सोचो! क्या इतनी छोटी-छोटी सी चाहतों को ठुकराने और उनकी उपेक्षा कर देने का अहंकार हो सकता है मुझमें? इतना भी नहीं जाना मुझे और मित्र भी कह दिया?

तुम्हारी चाहतें तो बहुत छोटी-छोटी सी चाहते हैं, लेकिन मेरे जीवन का संघर्ष इतना बड़ा है कि वहां अब चाहत शब्द कोई मायने रखता ही नहीं। मेरी उपलब्धि बस इतनी कि मेरी मुस्कान अब तक कायम है। इसका मतलब यह नहीं कि मैं अँधेरी स्याह रातों में अकेले अक्सर रोती होऊँगी। नहीं! मेरी उपलब्धि है कि इन अनंत प्रतिकूलताओं के बीच भी मैं अक्सर अकेले में भी मुस्कुरा लेती हूँ। मैं अब भी प्रेम बाँट लेती हूँ। प्रेम और मुस्कुराहट बस यही मेरे खौफनाक और दर्दनाक जीवन की उपलब्धियां है। गर हो सके तो अब शिकायत ना करना। हो सके तो बस इतनी सी दुआ करना कि मेरे ह्रदय का प्रेम और मेरे होठों की मुस्कुराहट सदैव कायम रह सके। फिर भले ही मैं तुम्हारे विचारों के अनुरूप एक सुन्दर देश के स्वप्न के प्रति समर्पित नज़र न आऊँ, लेकिन तुम्हारे सपनों के देश की नींव में एक गुमनाम पत्थर मेरा भी होगा।

Monika Jain ‘पंछी’
(30/01/2017)

December 21, 2016

Story on Christmas in Hindi for Kids


खुद बनो सांता क्लॉज़

हर वर्ष की तरह जिम्मी और जॉनी दिसम्बर के आते ही बहुत उत्साहित थे। क्रिसमस का त्यौहार जो आने वाला था। पर क्रिसमस का उनका सारा उत्साह उनके मामा जॉन से जुड़ा था जो हर साल क्रिसमस पर सैंटा बनकर उनके घर आते और बच्चों के लिए ढेर सारे उपहार लाते। उसके बाद सब मिलकर खूब धूम और मस्ती से क्रिसमस मनाते।

लेकिन आज ही शाम को डिनर के समय मम्मी ने बताया कि इस बार मामा को बहुत जरुरी काम है इसलिए वे नहीं आ पायेंगे। यह सुनते ही जिम्मी और जॉनी का चेहरा उतर गया।

‘मामा के बिना तो बिल्कुल भी मजा नहीं आएगा।’ जिम्मी बोली।

‘हाँ, और मामा ही तो सैंटा बनते है, गिफ्ट्स लाते हैं और गेम्स खिलाते हैं। बिना सैंटा के कैसा क्रिसमस?’ जॉनी रुहांसा हो गया।

‘कोई बात नहीं बेटा, पापा तो गिफ्ट्स लायेंगे ही न?’ मम्मी बोली।

‘नहीं मम्मा, पापा तो हमेशा ही लाते हैं लेकिन क्रिसमस पर तो हमें हमारे सैंटा मामा से ही गिफ्ट लेना है।’ यह कहकर जिम्मी और जॉनी रुहांसे से अपने कमरे में चले गए।

घर में क्रिसमस ट्री लाया जा चुका था, पर उसे सजाने में जिम्मी और जॉनी को कोई दिलचस्पी ही नही थी। क्रिसमस से दो दिन पहले मामा का फिर फोन आया बच्चों का हालचाल और तैयारी के बारे में पूछने के लिए। जिम्मी और जॉनी की मम्मी ने उन्हें बताया कि दोनों बच्चे इस बार कोई तैयारी नहीं कर रहे। कह रहे हैं मामा के बिना नहीं मनाएंगे क्रिसमस। जॉन ने बच्चों को फोन देने को कहा। जिम्मी ने मामा से कहा, ‘मामा, आप ही तो सैंटा क्लॉज़ बनते हो। हम लोगों को इतना हंसाते हो। इतने गेम्स खिलवाते हो। हर बार नए-नए गिफ्ट्स लाते हो। अब आपके बिना हम क्या करेंगे?’

मामा ने कहा, ‘कुछ नहीं! इस बार तुम सैंटा बन जाना।’

जॉनी चौंका। ‘हम सैंटा?’

‘हाँ, क्यों नहीं? बच्चों, गिफ्ट्स लेने में जितना मजा आता है उससे कई अधिक मजा आता है गिफ्ट्स देने में। तुम बनकर तो देखो एक बार?’ मामा बोले।

फिर बच्चे मामा से बात कर अपने सोने के कमरे में चले गए। सोते-सोते एक दूसरे से बातें करने लगे।

जॉनी बोला, ‘जिम्मी दीदी, सैंटा तो हम बन जायेंगे लेकिन हम गिफ्ट्स क्या लायेंगे और किसे देंगे?’

जिम्मी ने कहा, ‘जॉनी, गिफ्ट्स तो हम बोलेंगे तो पापा दिला देंगे। लेकिन मैंने सोचा है कि हम इस बात को सरप्राइज रखते हैं। हमारे घर जो रोली आंटी आती है न काम करने के लिए, उनके मोहल्ले में बहुत बच्चे हैं। उनके वहां कोई सैंटा भी नहीं जाता और वो हमारी तरह कोई फेस्टिवल बहुत अच्छे से मना भी नहीं पाते। हम उनके मोहल्ले में चलेंगे। हम मम्मा और पापा के लिए भी गिफ्ट्स लायेंगे और मामा भी कुछ दिन बाद आयेंगे तो उनके लिए भी।’

‘लेकिन पैसे? वो कहाँ से आयेंगे?’ जॉनी ने कहा।

‘अरे! हमारे पिग्गी बैंक कब काम आयेंगे? अब तक तो उनमें खूब पैसे जमा हो गए होंगे। मैंने सोचा है उन सब बच्चों के लिए हम रंग-बिरंगी पेंसिल्स, रबर और शार्पनर लायेंगे।’ जिम्मी बोली।

‘अरे वाह दीदी! यह तो बहुत अच्छा आइडिया है। मैंने सोचा है - मम्मा, पापा और मामा के लिए हम न्यू ईयर की डायरी और पेन लायेंगे। मम्मी और मामा को तो लिखने का भी शौक है और पापा को सब हिसाब-किताब के लिए डायरी की जरुरत होती ही है।’ जॉनी ने कहा।

‘हाँ जॉनी। यह तुमने बहुत अच्छा सोचा। चलो अब हम सो जाते हैं। कल हमें बहुत सारी तैयारियाँ करनी है।’ यह कहकर जिम्मी ने लाइट बंद कर दी।

अगले दिन दोनों से सबसे पहले अपने-अपने पिग्गी बैंक तोड़ दिए। कुल 1000 रुपये उसमें जमा थे। अपने दोस्त से मिलने जाने की कहकर वे सुबह ही घर से निकल गए। फिर उन्होंने एक स्टेशनरी की शॉप पर जाकर सारा सामान खरीदा और कुछ देर बाद घर लौट आये। आते ही दौड़कर सामान को छिपाकर रख दिया। बाकी सारा दिन अगले दिन की तैयारियों में गुजरा।

जिम्मी और जॉनी को अचानक इस तरह से उत्साहित और ख़ुश देखकर मम्मी ने राहत की सांस ली और वह भी दिल से मिठाई आदि तैयार करने में जुट गयी।

अगले दिन सुबह जिम्मी और जॉनी ने उठते ही पापा और मम्मी को विश किया और उन्हें गिफ्ट्स दिए। पापा-मम्मी की ख़ुशी का ठिकाना न रहा। पापा-मम्मी ने भी जिम्मी और जॉनी को गिफ्ट्स दिए। उन्होंने खोलकर देखा तो उसमें से दोनों के लिए सैंटा क्लॉज़ की ड्रेस थी। सैंटा क्लॉज़ की ड्रेस देखते ही जिम्मी और जॉनी दोनों हैरान रह गए। उन्होंने मम्मी-पापा को अचरच भरी निगाहों से देखा तो मम्मी ने बताया कि मामा ने ही उन्हें यह आईडिया दिया था कि इस बार बच्चों के लिए सैंटा की ड्रेस ले आये।

‘भैया, हम तो सैंटा की ड्रेस के बारे में भूल ही गए थे। मामा कितने अच्छे हैं। अब हम शाम को रोली आंटी के मोहल्ले के बच्चों के साथ और भी मजे से क्रिसमस मनाएंगे।’ जिम्मी बोली।

इसके बाद दोनों बच्चों ने अपने प्लान के बारे में पापा-मम्मी को बताया और मार्केट से लायी गयी पेन्सिल्स, रबर और शार्पनर सब लाकर दिखाये। पापा-मम्मी को अपने बच्चों पर बेहद गर्व महसूस हुआ। पापा भी मार्केट जाकर उन बच्चों के लिए खिलौने और मिठाई ले आये।

इसके बाद सब शाम को रोली आंटी के मोहल्ले में गए और वहां एक क्रिसमस ट्री मंगवाकर सबके साथ उसे सजाया। प्रार्थना के बाद सैंटा बने जिम्मी और जॉनी ने सब बच्चों को गिफ्ट्स और मिठाई बांटी। सबने मिलकर कई गेम्स खेले और इसके बाद सब ख़ुशी-ख़ुशी घर आ गए। घर आकर जिम्मी और जॉनी ने मामा को फ़ोन किया और कहा, ‘मामा आपने बिल्कुल सही कहा था। गिफ्ट्स लेने से भी कई ज्यादा ख़ुशी तो गिफ्ट्स देने में होती है। इस बार का क्रिसमस हम कभी नहीं भूलेंगे और अबसे आपके साथ-साथ हम भी सैंटा बनेंगे।’ मामा ने बच्चों को खूब प्यार और आशीर्वाद दिया और मधुर यादों को मन में संजोये दोनों बच्चे सोने चले गए।

Monika Jain ‘पंछी’
(21/12/2016)