September 11, 2017

Mind and Thinking Quotes in Hindi

Mind and Thinking Quotes

  • 06/09/2017 - अपने से इतर सभी विचारधाराएँ और विचारधारी नहीं रहेंगे तो फिर अकेले क्या अपनी विचारधारा का अचार डालोगे?
  • 15/01/2017 - हमें कोई विचार, उसके लिखने की शैली पसंद आती है, सो हमने उसे शेयर कर दिया इसमें कोई समस्या नहीं है। बहुत सारे विरोधी विचारों को पढ़कर ही तो समझ आता है कि विचार सिर्फ विचार है। लेकिन बात यहाँ उनके लिए है जो हावी होने की कोशिश करते हैं। जिन्हें लगता है कि दुनिया में एकमात्र सही सिर्फ वे ही हैं और बाकी सबको उनका अनुसरण करना चाहिए और ऐसा करवाकर वे सारी दुनिया को बदल देंगे। समस्या कट्टरता और तानाशाही में है।
  • 19/03/2017 - एक ही बात पर कुछ लोग ख़ुश होते हैं, कुछ उदास, कुछ गुस्सा, कुछ क्या, कुछ कुछ नहीं...बस यहीं से मुझे ये 'मन' नामक प्राणी संदिग्ध लगने लगता है। 
  • 08/01/2017 - प्रेम के मार्ग का बस एक ही काँटा है : वृत्तियाँ। सामान्य और सरल से सरलतम को भी मानव मन की ग्रंथियां कितना जटिल और जटिलतम बना देती है। 
  • 13/06/2016 - किसी का ख़याल भर और उसका प्रकट हो जाना...बड़े ख़तरनाक हैं ये ख़याल। :p :) 
  • 05/06/2016 - फ्रॉक पहनकर कितनी छोटी हो जाती हूँ मैं...फिर खेलने का मन करने लगता है। ^_^ (तितली मन!) 
  • 02/06/2016 - अतीत के चलचित्र वर्तमान के चलचित्रों से मिल बैठते हैं और फिल्म बिगड़ जाती है। (मन तू होजा कोरा कागज।) 
  • 28/04/2016 - जब तक कुछ भी नया पढ़कर और जानकर हमारी सोच बेहतर न बनें और चीजों को देखने और समझने का नजरिया विस्तृत न हो, तब तक हमने कुछ नया जाना और सीखा नहीं है। 
  • 17/04/2016 - तुम्हारा मुझे इतने दिनों बाद अचानक कुछ लिख भेजना अनायास ही न था। कुछ ही देर पहले मन की गहराईयों ने तुम्हें याद किया था। 
  • 16/04/2016 - लोग अक्सर द्वैत के बारे में विचार करते हैं। जबकि 'कुछ होने' से 'कुछ न होने' तक का सफ़र बहुत लम्बा है। किसी क्षण कोई बीच रास्ते में कहीं पर भी हो सकता है, जहाँ प्रगमन और प्रतिगमन दोनों ही संभावनाएं हैं। 
  • 10/04/2016 - तुम्हारा दृष्टिकोण तुम्हारे बारे में बहुत कुछ बता देता है।
  • 17/03/2016 - जरुरत से अधिक सक्रिय दिमाग और जाग्रत मन में अंतर है। एक जहाँ राय कायम करने और निष्कर्षों की जल्दबाजी में सोये हुए जड़ मन की तरह ही पूर्वाग्रहों, धारणाओं, अंधविश्वासों और रूढ़ियों की गठरी बन सकता है, वहीँ दूसरा इन सबसे मुक्त हो सकता है। 
  • 04/01/2016 - न आस्तिक कहलाने की जरुरत है...न नास्तिक कहलाने की। जरुरत बस खुले दिमाग की है। किसी श्रेणी से बंध जाना अक्सर उन असीम क्षमताओं से दूर कर देता है जो हमारे भीतर विद्यमान है। कम से कम जो विज्ञान प्रेमी है उसे तो ऐसा नहीं ही करना चाहिए। 
  • 26/09/2015 - शब्दों के मनमाने अर्थ और व्याख्याएं नहीं बदल सकते सच्चाईयाँ। जिसे जानना हो सच उसे मन के धरातल पर उतरना पड़ता है। 
  • 13/08/2015 - किसी से आपका एक विचार मिलता है, अच्छी बात। दूसरा भी मिलता है, और भी अच्छी बात। तीसरा भी मिलता है, कुछ ज्यादा ही अच्छी बात। पर चौथा भी मिलना ही चाहिए यह अपेक्षा ज्यादती है। 
  • छोटी-छोटी सी बातों पर दंगे क्यों भड़क जाते हैं? विचार संक्रमण इसका मुख्य कारण है। जब विचारों, मन और आवेशों पर नियंत्रण ना हो, सतर्कता और जागरूकता की अनुपस्थिति हो तो ऐसे में किसी नकारात्मक विचार का आग की तरह फैलना और सब कुछ तबाह कर देना संभव है। 
  • शब्द, विचार और भाव इतने ज्यादा सापेक्ष हैं कि जो सन्दर्भ न समझा तो सब मिथ्या हो जाता है। 
  • बनावटी और झूठे शब्द अक्सर साफ-साफ पकड़ में आ जाते हैं, बस जाहिर नहीं करती। इनोसेंट होने का मतलब बेवकूफ होना नहीं होता। :) हालाँकि, बेवकूफियों के भी अपने अलग किस्से हैं...एक ही मन में हमारे कितने हिस्से हैं। 

Monika Jain ‘पंछी’

September 6, 2017

Essay on Nonviolence in Hindi

अंतस का बदलना जरुरी है

05/09/2017 - जैन समाज द्वारा बकरों को खरीद-खरीद कर बचाने की मुहिम मूर्खता और अहंकार से ज्यादा नहीं नज़र आती। हिंसा और जड़ता बाहर-बाहर से नहीं खत्म होती, अंतस का बदलना जरुरी है।

06/09/2017 - फेसबुक पर की गयी उपर्युक्त पोस्ट पर मूर्खता शब्द पर कुछ मित्रों ने आपत्ति दर्ज की है। कोई इस शब्द से आहत हुआ है तो उसके लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूँ। लेकिन यह वक्तव्य जल्दबाजी वाला नहीं था। मूर्खता से मेरा आशय अबोधता से ही था और किसी को मूर्ख या अहंकारी कह देने का तात्पर्य यह बिल्कुल भी नहीं कि मैं मूर्खता या अहंकार से मुक्त हो चुकी हूँ। बल्कि अक्सर मेरा द्वंद्व खुद के साथ यही चलता है कि जब मैं मन के विकारों से पूर्ण रूप से मुक्त हूँ ही नहीं तो मुझे किसी और को कुछ कहने का अधिकार है ही कहाँ? यहाँ मैं इस बात से भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो पाती कि मैं मन के विकारों को विषय या तीव्रता के आधार पर अलग-अलग खांचों में बाँट लूं कि जिस जड़ता विशेष से मैं मुक्त हूँ, उस पर कह सकती हूँ। मेरे लिए मन के विकार मन के विकार हैं फिर वे चाहे आत्मघाती हो या परघाती हो, कम हो या ज्यादा हो, कुछ मामलों में हो और कुछ मामलों में न हो। लम्बे समय बाद भी अगर किसी दिन मुझे तेज गुस्सा आया है या किसी मामले में मैं ज्यादा भावुक हुई हूँ और कोई मूर्खता या गलती कर दी है तो मुझे अपनी सारी की सारी तपस्या व्यर्थ नज़र आती है। लेकिन मैं कुछ कृष्ण की गीता और कुछ अपने मौलिक अधिकारों व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से अपने मन को बहला लेती हूँ और मेरा लिखना और कहना इस बहलाव में जारी रहता है। जिसका उद्देश्य यहाँ किसी पर कुछ थोपना बिल्कुल नहीं है। अभिव्यक्ति मेरी अपनी जरूरत है।

अब आते हैं पिछली पोस्ट के मुद्दे पर। किसी व्यक्ति विशेष द्वारा संवेदना के चलते किसी जानवर को बचाना या किसी की कैद से मुक्त करवाना एक अलग बात है और किसी समाज या संगठन द्वारा सम्पूर्ण समाज के योगदान से जानवरों की रक्षार्थ किसी मुहिम को चलाना एक दूसरी बात। पहले मामले में भी समझ जरुरी है लेकिन कृत्य के पीछे के भाव और उद्देश्य ज्यादा महत्वपूर्ण है, लेकिन दूसरे मामले में बात को हर दृष्टिकोण से देखा और समझा जाना ज्यादा जरुरी हो जाता है, तब जबकि आपकी मुहिम एक ऐसी रूढ़ि के विरुद्ध है जो किसी समाज विशेष का अनिवार्य हिस्सा बन चुकी है। जानवरों को खरीद कर, उनके जीवन पर्यंत पालन-पोषण का जिम्मा उठाकर आप उन जानवरों को बचा लेंगे, यह अच्छी बात है लेकिन इसके दूरगामी और अप्रत्यक्ष प्रभाव क्या होंगे यह समझा जाना जरुरी है।

जब कोई प्रथा या कोई जरुरत किसी समाज का अनिवार्य हिस्सा बन चुकी हो तो ऐसे में पूर्ति को कम कर देना लोगों को उसके अप्राकृतिक उत्पादन को बढ़ावा देने की ओर अग्रसर करता है। अक्सर मेरी आँखों के सामने हिलने-डुलने का एक इंच भी स्पेस न दी गयी मुर्गियां, सूअर और अन्य जानवर नज़र आते हैं। सामान की तरह भरे गए या एक कोने से दूसरे कोने में जोर से पटके गए जानवर नज़र आते हैं। जबरदस्ती दूध, बच्चे या अंडे पैदा करवाने के लिए किये गए अप्राकृतिक कृत्य नज़र आते हैं...और भी ऐसी कई चीजें...बस यही सोचकर मुझे इस कदम में कोई सार्थकता नज़र नहीं आई, बल्कि यह मुझे जानवरों और प्रकृति के विरुद्ध जाता नज़र आता है। मनुष्य बहुत चालाक और धूर्त प्राणी है, उस पर ये तरीके काम नहीं करते। उसे अपनी जनसँख्या की चिंता नहीं रहती लेकिन जानवरों की जनसँख्या की चिंता रहती है इसलिए वह उन्हें जबरदस्ती पैदा करवाता है और बिल्कुल गैर जरुरी कारणों से भी मारता है। यहाँ मैं पिछली पोस्ट पर आये मनीष जी के कॉमेंट को भी पोस्ट कर रही हूँ :

“कुछ सालों पहले तक अपने कुछ परिचित काफी समय से पर्युषण, संवत्सरी व अनंत चतुर्दशी पर बहेलियों से कबूतर, तीतर, तोते...आदि आजाद कराते थे। मालूम हुआ कि उन लोगों को इन त्योहारों की जानकारी पहले से होने लगी और उनका सारा परिवार कबूतर, तीतर, तोते पकड़ कर इकट्ठे करता (उनकी बिक्री की जरूरत से कई गुना ज्यादा) क्योंकि उनको पता था कि उनके मुंह मांगे पैसों से उनका माल बिकेगा और हमारे जैन बंधु इस बात से ही मुग्ध कि हम कितना महान कार्य कर रहे हैं, जीव दया कर रहे हैं। जबकि वो हमारे ही निमित्त अधिक कबूतर तीतर तोते आदि पकड़ते थे। बकरे काटने वाले कसाईयों को उनकी दिन भर की कमाई देकर उनसे वादा करवाते थे कि इन दिनों वो हिंसा नहीं करेंगे, लेकिन वो दुकान के शटर बन्द रख कर अपना कार्य जारी रखते थे। उस सब का दोषी कौन? क्या आज तक कसाई और बहेलियों ने अपना व्यवसाय बदल लिया?”

जैन समाज में ही कई संत ऐसे हुए हैं जिन्होंने कई जगह बलि प्रथा बंद करवायी है। एक हमारे आसपास का ही एक स्थान है जहाँ माता जी के मंदिर में हर साल भैंसों की बलि दी जाती थी। वहां एक साध्वी जी गयीं और मंदिर में बलि वाले स्थान पर खड़े होकर उन्होंने कहा कि इन्हें मारने से पहले मेरी बलि देनी होगी। हालाँकि कुछ लोग इस तरीके से भी सहमत नहीं होंगे, लेकिन मैं इसे व्यक्तिगत निर्णय और व्यक्तिगत साहस मानती हूँ। अच्छी बात यह कि उस समय और बाद में उन्होंने कई सालों तक वहां चातुर्मास करके अपने प्रवचनों के माध्यम से जागरूकता फैलाई और वहां बलि प्रथा पूरी तरह से बंद हो गयी। सभी धर्मों की बलि प्रथाओं के विरोध में अगर कानून बने तो मैं उससे सहमत हूँ। लेकिन कानून भी बस बहुत थोड़ी सी मदद ही करता है, बाकी का सारा काम जागरूकता ही करती है।

Monika Jain ‘पंछी’

September 2, 2017

Prejudgement (Being Judgemental) Quotes in Hindi

Prejudgement (Being Judgemental) Quotes

  • 29/08/2017 - हर रोज जीवन-मृत्यु के झूले, भयंकर दर्द और संघर्ष से गुजरने वाले व्यक्ति से भी कुछ लोग यह अपेक्षा रख सकते हैं कि वह सारी दुनिया की समस्यायों (नामकरण सहित) के समाधान में रूचि ले। वैसे उन लोगों के लिए समाधान या संवेदना का मतलब अक्सर भड़ास निकालना होता है। नहीं होता तो ऐसे किसी व्यक्ति से इतनी अनावश्यक अपेक्षाएं और उम्मीदें होती भी नहीं। बाकी पर पीड़ा समझने वाला व्यक्ति चाहे खुद कितनी भी भयंकर पीड़ा से गुजर रहा हो, वह पर पीड़ा समझता है। उसके अंदर बस स्वाभाविक रूप से सामान्यत: भड़ास नहीं पैदा होती। वह जहाँ कुछ कर सकता है या जिस मामले की उसे समझ होती है, वही बोलना उचित समझता है। अन्यथा उसकी सबसे बड़ी चुनौती ही अपनी अनगिनत पीड़ाओं के बावजूद भी ह्रदय में दूसरों के लिए प्रेम और समझ को कायम रख पाना है। वैसे यह हर किसी के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। और यह कितना मुश्किल होता है इसका अंदाजा सिर्फ और सिर्फ अपेक्षाएं पालने वाले लोग नहीं लगा सकते। जीवन सबके लिए समान नहीं होता। परिस्थितयां सबके लिए एक सी नहीं होती। ऐसे में सतही तुलनाएं बेमानी है। जो गहराई से सब कुछ समझ पाए तो भड़ास और पूर्वाग्रह खुद-ब-खुद कम होते जायेंगे। 
  • 22/08/2017 - अनित्यता की समझ कई दु:खों को दूर कर देती है। मसलन कोई व्यक्ति मेरे लिए बहुत पूर्वाग्रह रखता हो, ग़लतफ़हमी पालता हो और उससे मेरा थोड़ा भी जुड़ाव है तो मैं दु:खी हो जाती हूँ। इन पूर्वाग्रहों को दूर करने का कोई तरीका ना हो तो फिर मैं खुद को इस तरह समझाती हूँ कि कौनसा मुझे हमेशा जिंदा रहना है। न तो इस रूप में मैं हमेशा रहने वाली हूँ और ना ही वे पूर्वाग्रह।
  • 06/08/2017 - पूर्वाग्रही प्राणियों का प्रिय शगल है अपने काम के शब्दों को चुनकर अपने पूर्वाग्रहों को पोषण देना। ऐसे में दूरी मेन्टेन करने का आशय यह जरुरी नहीं कि वे नापसंद हों या उनसे नाराजगी ही हो। कभी-कभी यह सिर्फ भीतर के प्रेम के संरक्षण के लिए भी जरुरी होता है और कभी-कभी अपनी सुरक्षा के लिए भी। मेरे मन में सांप के लिए कितना भी प्रेम हो, लेकिन अगर वह सामने आएगा तो मुझे सतर्क रहना ही होगा, दूरी बनानी ही पड़ेगी। क्योंकि अभी तक न तो उसे हैंडल करना आता है मुझे और न ही मेरे प्रेम में वह शक्ति है कि वह मेरे लिए अपनी वृत्ति बदल दे। 
  • 10/04/2016 - बर्तन साफ़ करते समय मेरी आदत है - एक बार सारे बर्तनों की अतिरिक्त गन्दगी हटाने के लिए पहले कोरे पानी से साफ़ कर लेती हूँ, उसके बाद डिश सोप/लिक्विड लगाती हूँ और फिर पानी से साफ़ करती हूँ। मेरे ख़याल से ज्यादातर लोग ऐसा ही करते होंगे। एक बार हुआ यूँ कि मैं अपना फर्स्ट स्टेप कर रही थी तो एक थोड़ी परिचित लड़की मुझे अजीब नज़रों से देख रही थी। मैंने पूछा क्या हुआ? वह हैरान होकर बोली, तुम बिना सोप के बस ऐसे ही बर्तन साफ़ करती हो? :o मैंने कहा, 'आगे देख तो लो लड़की!' फिर कुछ देर बाद उसकी हैरानी नार्मल हुई। :) Moral of the Story : पूर्वाग्रहों से बचें। ;) 
  • 02/04/2016 - कभी-कभी लगता है सूचना के साधन जितने बढ़े और विकसित हुए हैं अज्ञान उतना ही गहराने लगा है। यह अति सक्रिय मस्तिष्क का दौर है। सोशल मीडिया जिसमें आग में घी की भूमिका निभा रहा है। बिना सोचे-समझे और जाने हर ओर बस गैरजिम्मेदार निष्कर्षों का ढेर पसर रहा है। इन तुरत-फुरत की धारणाओं और पूर्वाग्रहों से बचना बेहद जरुरी है। 

Monika Jain ‘पंछी’

August 28, 2017

Appo Deepo Bhava : Be a Light unto Yourself Essay in Hindi

अप्प दीपो भव:

जब आसाराम काण्ड हुआ था तो उस समय मेरे पास एक ईमेल आया था, जिसमें किसी के बारे में यह लिखा था कि वह आसाराम पर बहुत श्रद्धा रखता था और इसी श्रद्धा के चलते उसने सभी कुव्यसनों को छोड़ रखा था। लेकिन अब जब सच सामने आया है तो उसकी श्रद्धा तो पूरी तरह तार-तार हो जायेगी। ऐसे में क्या वह बुरी आदतों को छोड़ पाना जारी रख पायेगा? ऐसा ही होता रहा तो लोगों का सच्चाई और अच्छाई पर भरोसा ही उठ जाएगा। 

मैंने जो जवाब दिया था उसका आशय यह था कि कोई भी अनुकरणीय बात किसी के प्रति श्रद्धा की मोहताज क्यों हों? हमारा बेहतर होना हमारी अपनी जिम्मेदारी पर होना चाहिए। मुझे भी महावीर और बुद्ध से विशेष प्रेम है। हालाँकि ऐसा कभी हो नहीं सकता लेकिन फिर भी एक पल के लिए मान लें कि कभी कोई रहस्य उद्घाटित हो और यह सामने आये कि ये दोनों तो पूरी तरह फ्रॉड थे तो मुझे थोड़ा बहुत दुःख हो सकता है लेकिन ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा और ना ही जो मैंने इनसे सीखा है वह कुछ भी छूटेगा। कुछ आध्यात्मिक गुरुओं (जो अभी तक ईमानदार नज़र आते हैं) के सन्दर्भ में भी मेरी यही सोच है। हम सीख किसी से भी सकते हैं, लेकिन ग्रहणशीलता तो हमारी ही होती है। हमारे कुछ विश्वास उधार के हो सकते हैं, लेकिन जो कुछ सजग अनुभूतियाँ होती है वे तो हमारी ही होती है। धोखा, अविश्वास, भरोसे का टूटना ये चीजें वहां ज्यादा दुःख देती है जहाँ हमारा अति लगाव, मोह और जुड़ाव होता है। जहाँ वाकई सत्य के प्रति समझ होती है वहां पर व्यक्ति विशेष या नाम बहुत मायने नहीं रखते। प्रेम होता भी है तो वह समझ वाला होता है। और जहाँ परस्पर समझ होती है वहां विश्वास टूटा भी नहीं करते। 

बुद्ध और महावीर के प्रति इस प्रेम और समझ के चलते ही मैंने जीवनयापन के लिए समाज पर निर्भर सन्यास मार्ग का कभी सार्वजनिक विरोध नहीं किया, क्योंकि वे तो भिक्षुक थे और यह अहंकार के विसर्जन के लिए था। इसके साथ ही उनकी आवश्यकताएं बहुत सीमित थी, ऐसे में वैसे ही वे उपलब्ध संसाधनों पर आम व्यक्ति की तुलना में बहुत कम भार डाल रहे थे। वैसे इस मामले में मैं थोड़ी दुविधा में रहती हूँ। हालाँकि घर में मैं कई बार माँ को कहती हूँ कि ये सामान्य जीवन से अलग समाज पर आश्रित साधू, सन्यासी बनना अब बंद होना चाहिए। मतलब जिसे भी जो भी करना है, वो अपने घर पर, एकांत में या कहीं भी, अपना काम खुद करते हुए करे। हालाँकि यह कोई समाधान तो नहीं है। क्योंकि जो वृत्तियाँ है मनुष्य की वे तो रहेंगी ही। हाँ, उन्हें थोड़ी अनुकूलता कम मिले। लेकिन फिर कोई अगर वाकई में ईमानदार है तो उसके प्रति यह गलत हो जाएगा। हाँ, इस बारे में कुछ विशेष नियम बन सके तो वे बनने चाहिए। लेकिन फिर उनकी पालना भी बाकी नियमों जैसी ही रहेगी। ऐसे में समाधान क्या हो? 

समाधान यही है कि हर किसी को अपना आदर्श मत बनाओ। जब हम एक पाखंडी को अपना आदर्श बनाते हैं तो शोषण की संभावनाएं बहुत बढ़ जाती है। जब एक सच्चे और ईमानदार व्यक्ति को अपना आदर्श बनाते हैं जिसने अभी यात्रा शुरू ही की हो तो उस पर अपेक्षाओं और जिम्मेदारियों का बहुत बड़ा बोझ डाल देते हैं। आदर्श ऐसे व्यक्ति को बनाना चाहिए जो अपनी मंजिल पा चुका हो या पाने वाला हो, वरना अपने साथ-साथ हम उसके भटकने का कारण भी बन सकते हैं। वैसे निर्भरता, श्रद्धा या आस्था की दृष्टि से यह सबसे मुश्किल समय है। यहाँ किसी ऐसे का मिलना जिस पर इस मामले में भरोसा किया जा सके बहुत मुश्किल है। यहाँ विश्वास और निर्भरता बाहर नहीं भीतर खोजने की जरुरत है। 

‘अप्प दीपो भव:’ एक बहुत जरुरी चीज है जो हम सभी को समझना जरुरी है। जिनसे भी हम कुछ सीखते हैं उनके प्रति कृतज्ञता एक स्वाभाविक बात है। यह होनी भी चाहिए। लेकिन यह बात बस जरुरी कृतज्ञता तक ही सीमित रहनी चाहिए। यह अंध समर्थन में कभी भी तब्दील नहीं होनी चाहिए। जे. कृष्णमूर्ति ने एक बहुत अच्छी टर्म दी है : क्वेश्चन अथॉरिटी। जहाँ भी, जो भी (व्यक्ति, विचार, संस्था, संगठन...कुछ भी) हमें संचालित कर रहा है, उसके प्रति अपने विचारों पर निष्पक्ष प्रश्न किये जाते रहना चाहिए। कई चीजें क्लियर होती जाती है। वैसे कितने भी बाबा काण्ड होते रहे मेरी ज्ञान, दर्शन और चरित्र पर पोस्ट होती रहेंगी। मैं स्वार्थी हूँ। ये सब किसी के लिए भी कोई उपदेश की तरह नहीं होते और ना ही किसी बदलाव का उद्देश्य लेकर होते हैं। बातों को दोहराने से मुझे उन्हें आत्मसात करने में मदद मिलती है। क्योंकि रास्ता इतना मुश्किल है यह कि कुछ समय भी इन चीजों से अलग रहना हमें बहुत पीछे धकेल देता है। इसके अलावा अभिव्यक्त होना भी एक जरुरत होती है। दूसरों के व्यूज भी जानने को मिलते हैं। जिन्हें चिढ़ होती हो, या जो बोरियत महसूस करते हों, उसके लिए वे फेसबुक/ब्लॉग द्वारा दिए गए आवश्यक कदम उठा सकते हैं। हाँ, जहाँ कुछ भी गलत लगता है, कुछ नकारात्मक लगता है, अपना कोई पक्ष रखना हो तो वे सीधे मुझसे पोस्ट पर बात करेंगे तो मुझे ज्यादा अच्छा लगेगा। हम मिलकर कुछ बेहतर सीख सकेंगे। सच्चा गुरु मिलने के लिए यह दुर्लभ समय है, लेकिन हम सच्चा विद्यार्थी बनने का प्रयास तो कर ही सकते हैं। 

Monika Jain ‘पंछी’
(28/08/2017)

August 25, 2017

Materialism vs. Spiritualism Essay in Hindi

अध्यात्म बनाम भौतिकवाद 

मनुष्य कितने बड़े भ्रम में जीता है इसका पता उसे उसी दिन से लगना शुरू हो जाता है जब वह अपने मन, विचारों और कार्यों पर एक सजग और निष्पक्ष दृष्टि रखने लगता है। अक्सर व्यक्ति प्रवाह में बह जाते हैं। भीड़ और भेड़ चाल ही उनकी पसंद और नापसंदगी तय करने लगती है। मनोरंजन, ख़ुशी, सफलता, समर्थन, विरोध, नैतिकता और अनैतिकता के मापदंड भी यहीं से तय होने लगते हैं। विरले ही होते हैं जो हाथ पकड़ कर अपनी ओर खींच लेने वाली भीड़ के शोर में अपने अंतर्मन की आवाज़ सुन पाते हैं। बाकी सब सिर्फ दुनियादारी में मुखौटें बदलते रह जाते हैं।

लेकिन इस भौतिकवादी दुनिया में जहाँ हमारा पूरा जीवन बाहर की ओर जाता है खुद को आंतरिक यात्रा पर ले आना इतना आसान काम नहीं होता। यह जानते हुए भी कि बाहर की यात्रा में हम चाहे चाँद पर पहुँच जाए, चाहे मीलों की दूरियों को चंद क्षणों में बदल दें, चाहे अपार सम्पदा अर्जित कर लें, कितनी ही क्रांतियाँ कर लें...संतुष्टि, सुख या पूर्णता जैसी चीज स्थायी रूप में कहीं नहीं मिलेगी। पूर्णता और आनंद शाश्वत रूप में कहीं अगर मिल सकता है तो वह भीतर ही है। लेकिन यह वह समय भी नहीं जहाँ बाह्य परिस्थितयों और माहौल को पूरी तरह नकारा जा सके। यह बहुत मुश्किल समय है। विज्ञान, सभ्यताओं और परम्पराओं ने एक ओर जहाँ बहुत कुछ सरल किया है तो दूसरी ओर जीवन को अतिसुविधापूर्ण बनाने के चक्कर में न जाने कितनी जटिलताएं और निर्भरता भी खड़ी कर दी है। ऊपर से किसी की व्यक्तिगत मुसीबतें और परिस्थितयां जाने कितनी सीमायें खड़ी कर देती है। 

मैं जब आध्यात्मिक विषयों पर कुछ लिखती हूँ तो कुछ दोस्तों के सुझाव आते हैं कि किस चक्कर में पड़ गयी हो, ऐसे तो रचनात्मकता पूरी तरह ही खत्म हो जायेगी। मैं भी यह अच्छी तरह जानती हूँ कि कौनसे विषय हैं जिन पर मेरा लिखा हुआ बहुत ज्यादा पसंद किया जाता है। किन शब्दों को अपनी आवाज़ देने पर वे अधिक सराहे जायेंगे। कौनसा लेखन सफलता की ऊंचाईयों तक पहुँचा सकता है। लेकिन मन बार-बार अध्यात्म की ओर ही जाता है। एक लेखक की मुसीबतें तो ऐसे में हजार गुना बढ़ जाती है। जब तक उसके मन में अपने अस्तित्व को बचाए रखने की जरा सी भी चाह हो तब तो बहुत ज्यादा। और तब अपने कुछ विरोधाभासों को भी स्वीकार करना पड़ता है। इस आशा के साथ कि किसी दिन हम इतना साहस अर्जित कर पायेंगे कि उनसे भी मुक्ति पा सकें। जब न कदम पूरी तरह आध्यात्मिकता की ओर बढ़ाये जा सके और ना ही भौतिकता को पूरी तरह छोड़ा जा सके तब संतुलन का रास्ता ही चुनना होता है।

लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जो सिर्फ आपकी कमियां देखने के लिए आप पर इस कदर दृष्टि गढ़ाए रहते हैं कि उन्हें कमी के सिवा कुछ नज़र आता ही नहीं। अध्यात्म में रूचि जाग जाने का मतलब उनके लिए ये हो जाता है कि मुझे तत्काल सब कुछ छोड़-छाड़ कर भीख का कटोरा हाथ में ले लेना चाहिए। जो व्यक्ति खुद कभी लिखकर पैसा कमाना चाहते थे, बहुत भावुक कहानियां लिखकर उसकी किताब छपवाते हैं, बेचते हैं, कहानियों की पीड़ा पर वाहवाही मिलने पर ख़ुश भी होते हैं, वही दूसरों पर संवेदनाओं को बेचने का आरोप लगाते हैं। पता नहीं कुछ लोगों के लिए ऐसा क्यों है कि उन्हें नृत्य का बिकना नहीं अखरता, संगीत का बिकना नहीं अखरता, अभिनय का बिकना नहीं अखरता, अन्य कलाओं का बिकना नहीं अखरता और दुनिया में जहाँ लगभग सब कुछ व्यापार ही है किसी ना किसी रूप में (फेसबुक पर लिखना भी) वह नहीं अखरता लेकिन अगर किसी को लिखने के ऐवज में कुछ पैसे मिल रहे होंगे या कोई लेखन को प्रोफेशन चुने तो वह अखर जाता है। हाँ, कोई कुछ ऐसा लिख रहा है जिससे दुनिया का नुकसान हो रहा हो तो बात अलग है। फिर उसका विरोध बनता है।

बाकी लिखना मेरे लिए एक मानसिक जरुरत ज्यादा है। मेरे ज्यादातर लेख मेरा खुद से ही संवाद होते हैं। दूसरों में बदलाव का उद्देश्य लेकर मैं नहीं लिखती। वैसे सामान्यत: कोई भी ऐसा नहीं होता कि वो पूरी तरह से बदलाव के लिए लिखता है। यह होना भी नहीं चाहिए। क्योंकि बहुत बड़ा अहंकार है यह। खुद में कमियां रहते हुए केवल और केवल दूसरों में बदलाव के लिए कैसे लिखा जा सकता है? लगभग सभी की मानसिक जरुरत होती ही है किसी न किसी तरह की अभिव्यक्ति। बाकी मुझे लगता है अगर समझ से लिखूंगी तो स्वत: ही अच्छा प्रभाव होगा ही। हाँ, कुछ पुरानी रचनाओं से अब पूरी तरह सहमत नहीं हो पाती, बच्चों जैसी हैं, तब सोच भी कुछ-कुछ अलग थी और लिखने का उद्देश्य भी तब लिखना सीखना अधिक था...लेकिन चाहती थी कि सभी को एक जगह यहाँ लेकर आ जाऊं, लेकिन इसे भी गलत अर्थ में लिया जाता है। हालाँकि अनेकान्तवाद को अगर हम समझे तो किसी भी दृष्टिकोण से पूरी तरह सहमत या असहमत हो ही नहीं सकते। और जो कभी लिखा था वह उस समय के मेरे विचार थे ही। खैर! किसी दिन लिखना भी छूट ही जाएगा। वैसे भी जीवन में बहुत कुछ छोड़ चुकी हूँ। पर हाँ, जो एक-दो चीजें बची हैं वे भी छुड़वाकर ही मानेंगे लोग। अच्छा भी है मेरे लिए। बंधी नहीं रहूंगी किसी चीज से। लेकिन बदलाव-बदलाव की बात करने वाले लोगों की असंवेदनशीलता देखकर बहुत आश्चर्य होता है। जब आप उस व्यक्ति के प्रति संवेदनशीलता और समझ नहीं रख सकते जो आपके सामने है तो फिर सारी दुनिया-जहाँ की बात कर भी लें तो क्या मतलब? कोई ग़लतफ़हमी है भी तो पूरा स्पेस देती हूँ क्लियर कर लेने का लेकिन वह नहीं करनी है और सिर्फ पूर्वाग्रह पालने हैं। उन पूर्वाग्रहों का असल कारण क्या है अपने मन में वह नहीं स्वीकार करना है। 

मैं खुद बहुत सजग रहती हूँ महत्वकांक्षाओं से बचने के प्रति। दूसरों को इतना सोचने की जरुरत है ही नहीं क्योंकि मुझे खुद इतनी फंसावट महसूस होती है कि मैं खुद ही अपने आप को निस्सहाय महसूस करती हूँ और बहुत छोटी-छोटी सी बातों में अपराध बोध पाल लेती हूँ। बाकी जिसे आलोचना के लिए इस छोटे से मामले में पैसे नज़र आते हैं, जाने-अनजाने वह खुद पैसे को बहुत ज्यादा महत्व दे रहा है। तब जबकि मेरा कोई भी कंटेंट पेड रहता ही नहीं है। सबके लिए बिल्कुल फ्री है। बाकी पैसा तो सिर्फ एक साधन है जीवनयापन का। बस कम-ज्यादा सभी को जरुरत होती है आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए। इससे ज्यादा महत्व दिया भी नहीं जाना चाहिए इसे। मैं भी खरीदती हूँ किताबें, लेकिन मन में कभी किसी के लिए ऐसे ख़याल नहीं आते। अति-भौतिक युग की मजबूरियां हैं यह। जो वाकई में संत हो, समाज में रहे तो वह भी पूरी तरह अलग नहीं हो सकता इससे। जरुरी बस इतना होता है कि कट्टर जुड़ाव न रहे किसी भी चीज को लेकर और सिर्फ उसी के पीछे हम ना भागते रहें। 

बाकी जब कोई कहता है कि अज्ञानता एक वरदान है, तब वह इस मायने में बहुत सही कहता है कि एक जड़ जीवन, एक बंधा-बंधाया जीवन जीना आसान होता है। संघर्ष होते हैं लेकिन परिचित और सीमित तभी तो पशु-पक्षी दुनिया जहाँ की चिंताओं से मुक्त खुद में ही मग्न नज़र आते हैं। लेकिन जिसकी चेतना धीरे-धीरे जागने लगती है जाने कितने अपरिचित द्वन्द और संघर्ष उसका इंतजार कर रहे होते हैं। और ऐसे में बाहरी और व्यक्तिगत जीवन की परिस्थितियाँ जब पूरी तरह से प्रतिकूल हो तब तो कहना ही क्या? पर इन प्रतिकूलताओं में भी जो आत्मिक उत्थान के लिए अनुकूलता खोज लेता है असली विजेता वही होता है। परम तत्व बस वह शक्ति दे कि मैं भी खोज सकूँ। 

Monika Jain ‘पंछी’
(03/01/2016)

August 17, 2017

Save Nature Quotes in Hindi

Save Nature Quotes

  • 25/05/2017 - कल नदियों को बचाने से सम्बंधित एक आर्टिकल पढ़ रही थी। बहुत सी बातें निकल कर आई। घर में तो पानी खर्च को लेकर हम सामान्यत: अच्छे से ख़याल रखते हैं, चाहे जितना भी उपलब्ध हो। लेकिन मम्मा की अच्छी बातों में से एक बात है - कहीं भी, कभी भी पानी व्यर्थ बह रहा होगा तो घर की ही तरह मम्मा को फ़िक्र होती है। लोग बोरवेल या मोटर चलाकर भुलक्कड़, कुम्भकर्ण या दुनिया के सबसे व्यस्त आदमी बन जाएँ, लेकिन माँ बिना किसी संकोच के उन्हें घर पर कह आती हैं। दुनिया-जहाँ के सारे मुद्दे हमें याद रहते हैं, लेकिन कभी-कभी हवा, पानी, पशु-पक्षी और पेड़-पौधें जो सबसे जरुरी हैं, उन्हें भी याद कर लेना चाहिए। क्योंकि पानी आँख का हो चाहे ग्लास का...बचे रहना जरुरी है।
  • 20/05/2017 - हमारे भारत में कुछ भी संभव है। मसलन एक डॉक्टर (आयुर्वेदिक) अपने घर में लगे घने छायादार पेड़ को पत्तियों से होने वाले कचरे की वजह से कटवाकर, फिर अपनी गाड़ी की धूप से सुरक्षा के लिए दूसरे घरों के बाहर लगे पेड़ों की शरण स्थली खोजता है।
  • 06/05/2017 - कुछ दिन पहले घर में शौकिया तौर पर मिट्टी का एक प्याला लाया गया था। उसे देखते ही मैंने कहा इसमें तो दही जमायेंगे। आज किचन में काम करते समय वह पास में ही रखा था तो माँ ने कहा, इसी में साफ़ कर लेती हूँ सब्जी तो मेरे मुंह से बरबस निकल पड़ा, 'इसे क्यों दु:खी कर रही हो?' और इसके बाद हम लोग न जाने कितनी देर तक हँसते ही रहे। मैंने ऐसा क्यों कहा मुझे समझ नहीं आया। लेकिन हाँ जिन चीजों से सदा-सदा का नाता लगता है उनमें से मिट्टी भी एक है। 
  • 17/04/2017 - सब कुछ कितना सरल हो सकता था लेकिन जटिल हृदयों और जटिल बुद्धियों से निकले धर्म और कर्म सब जटिल ही होने हैं। एक तो पहले से ही ये दुनिया गोल, ऊपर से ये मनुष्य इतने गोले (जाल) बनाता है कि उनमें गोल-गोल घूमते-घूमते जो असल गोल (शांति और सुकून) है वह पूरी तरह गोल हो जाता है। और पता है जोक ऑफ़ द सेंचुरी क्या है? इतने तामझाम के बाद भी लोगों का यह कहना कि वे बोर हो रहे हैं। और जब नन्हें-नन्हें से बच्चे भी थोड़ी-थोड़ी देर में कहते पाए जाते हैं कि वे बोर हो रहे हैं, तो फिर मानव जाति की सारी सफलता अपनी असफलता की कहानी कहने लगती है। छोटे से बच्चों का बोर होना बहुत बड़े ख़तरे की घंटी है। काश! मनुष्य यह समझ पाता कि अपनी जड़ों (प्रकृति) से कटकर वह कोई समाधान कभी नहीं पा सकता।
  • 09/02/2017 - किसी पेड़ को कटते देखना कुछ-कुछ खुद को कटते देखना है।
  • 28/01/2017 - कितना अच्छा होता न!...गर हम सारी दुनिया के प्राणी अपनी-अपनी मूलभूत जरूरतें पूरी होने के बाद...गिल्ली डंडा खेलते, कंचे खेलते, पहाड़ों पर चढ़ते, झरनों में नहाते, बारिश में नाचते, प्रकृति का संगीत सुनते, जंगल में पकड़नी और छिपा-छिपी खेलते...और भी बहुत कुछ। प्रकृति के पास तो इतना सारा आनंद है। कितना अच्छा होता...न यह कंप्यूटर होता और न मुझे यह पोस्ट लिखनी पड़ती। इससे अच्छा तो मैं कंचे में जीतने के बाद सबको वापस खेलने के लिए कंचे बाँट रही होती। (कोई लूटता भी नहीं फिर तो।) :p ^_^
  • 11/09/2016 - अजीब है न! हमें लगभग हर एक उत्सव को इको फ्रेंडली मनाने की अपील जारी करनी पड़ती है...और हम उन्हें उत्सव कहते हैं। 
  • 04/09/2016 - मिट्टी का जब-जब स्पर्श हुआ तब वह इतनी अपनी लगी कि बाकी सब अजनबी हो गए।
  • 01/09/2016 - पौधे की पत्तियां तोड़ने की उसकी तीव्र इच्छा को देखते हुए मैं उसे रोक तो नहीं पायी...पर मैंने कहा, 'बाबू, बस थोड़ी सी तोड़ना।' उसने पूछा, 'क्यों?' मैंने कहा, 'पौधे को भी दर्द होता है न!'...और वह टूटी हुई पत्ती को वापस पौधे पर जोड़ने लगी। :) बच्चे तो शायद ऐसे ही होते हैं। लेकिन कुछ दृश्य कितना कुछ कह जाते हैं।
  • 20/04/2016 - डिअर पेरेंट्स! आपके बच्चों के साथ हुए वार्तालाप को सुनकर कभी-कभी समझ नहीं आता कि आप कुछ बना रहे हैं या बिगाड़ रहे हैं। प्रकृति कैसे कृत्रिम बना दी जाती है, यह देखना हो तो एक बच्चे को बड़ा होते हुए देखिये। 
  • 18/09/2015 - यहाँ लोगों की लाउड स्पीकर वाली भक्ति ने प्रकृति से पंछियों की सुरीली चहचहाहट के साथ शुरू होने वाली सुबहों को भी छीन लिया। कहीं तो, कभी तो, कुछ तो प्राकृतिक रहने दिया होता, प्रकृति के सबसे बुद्धिमान (?) प्राणी!
  • हम जब प्रकृति के संरक्षण की बात कहते हैं तो हम अपने ही संरक्षण की बात कह रहे होते हैं। बाकी मनुष्य रहे न रहे...प्रकृति या इस पूरे ब्रह्माण्ड को रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ने वाला। 
  • यहाँ एक ओर परंपरा, धर्म और संस्कृति का शोर सुनाई देता है जो मात्र दिखावा बनकर रह गये हैं, तो दूसरी ओर पाश्चात्य संस्कृति हावी है, जो मात्र भ्रम लगती है। इन दोनों से इतर कोई प्रकृति की बात क्यों नहीं करता? कितना आकर्षित करती है वह। 
  • प्रकृति के संरक्षण के लिए मिट्टी के गणेश जी के विसर्जन की बात चल रही है। बहुत अच्छी बात है। (बुरी बात यह है कि पहले आग लगाओ और फिर कुआँ खोदो) खैर! यहाँ तो मिट्टी ही गणेश जी है। विसर्जित क्या करें? 
  • सारी कायनात में मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी है जो समूची प्रकृति और इसके समस्त जीवों का क्रूर से क्रूरतम तरीके से शोषण करता है।...और ताज्जुब यह है कि इसी शोषण के आधार पर वह प्रकृति के सबसे श्रेष्ठ और बुद्धिमान प्राणी होने का दंभ भरता है। मनुष्य नामक प्राणी होने के नाते चारो तरफ यह जितना भी विकास है...कई बार इसे देखकर मुझे आत्मग्लानि महसूस होती है। प्रकृति को निचोड़-निचोड़ कर अपने अधीन कर लेने का मनुष्य का सपना तो हमेशा सपना ही रहना है, क्योंकि इस सपने को पूरा होते हुए देखने के लिए वह शेष रहेगा नहीं। पर काश! वह समझ पाता कि अपने अहंकार और महत्वकांक्षाओं के चलते किसी और का अपराधी वह खुद को माने न माने लेकिन खुद अपना तो सबसे बड़ा अपराधी है ही।
  • बारिश के बाद पेड़-पौधों की ख़ुशी देखते ही बनती है। पत्ते-पत्ते से झलकता है प्रकृति का अनुपम सौन्दर्य!... तिस पर इस सौन्दर्य को चार चाँद लगाती कोयल की स्वर लहरियां और मयूरों का अद्भुत नृत्य; नदियों, झीलों, पोखरों में भर आये स्वच्छ जल की कल-कल और पहाड़ों की निराली छटा…! ऐसा लगता है मानों प्रकृति का कण-कण प्रेम से अभिभूत होकर आसमां की ओर अपनी कृतज्ञता प्रकट कर रहा हो। बस यहाँ-तहाँ हम मनुष्यों द्वारा फैलाये गए कूड़ा-करकट, प्लास्टिक, पॉलीथिन आदि यह संकेत जरुर देते नज़र आते हैं कि हम मनुष्य प्रकृति की सबसे नालायक औलादें हैं।

Monika Jain ‘पंछी’

August 14, 2017

Quotes on Change in Hindi

Change Quotes

  • 14/08/2017 - कुछ ही दिन पहले पास में एक मॉल खुला था। वॉशरूम, पानी की अच्छी व्यवस्था थी वहां, लेकिन फिर भी कुछ लोगों ने टॉयलेट गन्दा कर रखा था। एक कोने में बच्चों के डायपर गिराए हुए थे। स्वच्छता और साफ़-सफाई की उम्मीद हम करते हैं, लेकिन उसके योग्य बनने के बारे में नहीं सोचते। जिस देश के लोगों में सही व्यवस्थाओं की कद्र ही ना हो वहां व्यवस्था सही हो भी कैसे?
  • 12/08/2017 - कुछ महीनों पहले यह ख़याल आया था कि मनोविज्ञान (संवेदना पर आधारित) एक ऐसा विषय है जो बहुत जरुरी है और इसे बचपन से ही पाठ्यक्रम में किसी ना किसी रूप में शामिल होना चाहिए। बड़े होने के बाद बदलाव मुश्किल होते हैं, आदतों और कंडीशनिंग से छुटकारा भी मुश्किल, लेकिन बचपन वह समय होता है जब अगर सही शिक्षा मिले तो बहुत कुछ बदल सकता है। नैतिक शिक्षा और उससे जुड़ी कहानियां पर्याप्त नहीं है। कहानियों से इतर भी बहुत सरल रूप में कांसेप्ट क्लियर करते हुए इस विषय का समावेश होना चाहिए। हर अपराध, लापरवाही, क्रूरता के पीछे मन की विकृतियाँ ही काम करती हैं और इनके बारे में जितना जल्दी और जितना ज्यादा इंसान समझे और जाने उतना ही बेहतर है। पाठ्यक्रम में कैसे आ सकती हैं इसका मुझे आईडिया नहीं लेकिन गिफ्ट्स के रूप में बच्चों को ऐसी पुस्तकें देने का प्रचलन शुरू होना चाहिए।
  • 21/05/2017 - केवल समस्यायों के एक, दो, हजार, दस हजार और लाख रूप गिनाने से हल नहीं मिलेगा। सभी समस्यायों के मूल में असंवेदनशीलता और जागरूकता का अभाव है। जब तक हम इन पर काम नहीं करेंगे, तब तक समाधान भी फौरी और इधर से उधर शिफ्टिंग वाले ही होंगे। 
  • 16/02/2017 - मुझे हैरानी होती है। कितनी सारी चीजें हैं जिन पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगना चाहिए...मसलन पटाखे, शराब, सिगरेट, तम्बाकू, गुटखा...आदि आदि। नशेड़ियों को तो क्या कहा जाए (किसी और दिन अच्छे से कहूँगी) लेकिन राजस्व के लिए ये सब चलने देना...मतलब पागलपंती की भी कोई सीमा होती है।
  • 23/01/2017 - यहाँ हम घर में कुल तीन सदस्य हैं। जब कभी भी घर में किसी को बर्तन साफ़ करने के लिए रखा जाता है तब भी मम्मी और मेरा ख़याल हमेशा यही रहता है कि बर्तन कम से कम हो। अभी जो आती हैं, वे बुजुर्ग हैं तो थोड़ा एक्स्ट्रा ख़याल रहता है। उनका मेहनताना, समय-समय पर दी जाने वाली खाने-पीने की चीजें और पहनने के कपड़े देना ये सब तो बहुत आम सी बातें हैं। मुझे जो चीज अच्छी लगती है वो है मम्मा द्वारा बराबर उनका हालचाल और परेशानियाँ पूछते रहना। उनका हल बताते रहना। एक दिन बर्तन साफ़ करते समय उनके हाथों में हल्की सी खरोंच आ गयी तो मम्मा अपने हाथों से उनको दवाई लगा रही थी और पट्टी बाँध रही थी। मैं सीढ़ियों से नीचे आ रही थी। पता नहीं क्यों उस दृश्य में अद्भुत सा सम्मोहन था। दोनों के एक्सप्रेशन्स देखते ही बनते थे। जैसे माँ-बेटी हों। मेरी आँखें ऐसे दृश्यों के लिए कैमरे का काम करती है। :) कभी-कभी सोचती हूँ : क्रांति और सुधार के हौव्वे से इतर सभी को कितनी छोटी-छोटी सी चीजों को समझ लेने की जरुरत भर है।
  • 11/03/2016 - प्रकृति के मूल तत्व/स्रोत से जुड़े बिना भेद समाप्त हो ही नहीं सकते। एक जगह से धुंधले होंगे तो दूसरी जगह उभर आयेंगे। बाहर की क्रांतियाँ कभी-कभी ठीक होती है, लेकिन उससे पहले जरुरत भीतरी क्रांति की है। भीतर जो बदलेगा वह स्वाभाविक और स्थायी होगा। केवल बाहर जो बदलेगा वह बस रूप बदलेगा। 
  • 13/03/2015 - किसी भी इमेज में सिर्फ इसलिए बंधकर रहना क्योंकि आपकी वह स्थापित छवि है...सही नहीं है। समय के साथ-साथ विचार बदलते हैं, धारणाएं बदलती है, हमारे सपने, हमारी रुचियाँ बदलती है और उसी के अनुसार बदलते हैं हम भी। और इन सब बदलावों के लिए हमें बाहर के शोर को नहीं अपने भीतर की आवाज़ को सुनना होता है, और यह भीतर तब तक रहता है जब तक हम रहते हैं। तो बदलने की प्रक्रिया भी तब तक जारी रहती है जब तक हमारा अस्तित्व है। तो खुद को इतनी सीमाओं में क्यों बाँधना? हाँ, बस अवसरवादी बनकर बार-बार रंग नहीं बदलना है। 
  • 03/03/2015 - दूसरों की बजाय अपने विचारों, अपने व्यवहार और अपने कार्यों की निगरानी रखना हमनें जिस दिन से शुरू कर दिया, त्वरित बदलाव की प्रक्रिया शुरू हो जायेगी। 
  • 14/12/2013 - लोग कहते हैं लिखने से क्या होता है? बिल्कुल लिखने से कुछ नहीं होता पर पढ़ने से होता है, बिल्कुल होता है। और अगर दुनिया की 7 अरब की आबादी में से 1 इंसान की सोच भी अगर कुछ पढ़कर सकारात्मक दिशा में बढ़ती है तो लिखना सार्थक है। शत प्रतिशत सार्थक है। 
  • शब्दों की विचार परिवर्तन में अहम् भूमिका है। हम जो पढ़ते हैं, सुनते हैं, उनका हमारे विचारों पर प्रभाव पड़ता है। वैसे तो हम कुछ सोचे उसके लिए भी किसी भाषा की जरुरत तो होती ही है। रही बात संकीर्णता की, तो जैसा हम सोचेंगे, जो हमारे विचार होंगे वही हमारे व्यवहार और कार्यों में भी परिलक्षित होंगे। तो यह सोचना कि कहने से क्या होगा, गलत है। सही दिशा में सोचना भी जरुरी है, कहना भी और करना भी।
  • बाहर तो जब-जैसा अवसर मिल जाए। कभी-कभी जरुरी होने पर बीच सड़क भी बहस की है। लेकिन घर में हम कुल तीन सदस्य हैं तो वर्जनाओं और सीमाओं को तोड़ने को लेकर मेरी आध्यात्मिक चर्चाएँ सबसे अधिक माँ के साथ होती है। उसके बाद जब-जब अवसर मिलता है तो बच्चों के साथ और कभी-कभी बाकियों के साथ भी। वर्जनाओं और सीमाओं को टूटते हुए भी देखा है। समाज सुधार के लिए किसी हौव्वे की जरुरत नहीं होती। आप जिस क्षण दुनिया के जिस स्थान पर खड़े या बैठे हैं वहां ही आपके पास कई अवसर होते हैं। 
  • नौकर मालिक बन सकता है और मालिक नौकर। स्त्री पुरुष की जगह पा सकती है और पुरुष स्त्री की। सवर्ण दलित बन जायेंगे और दलित सवर्ण। लेकिन समानता हमेशा एक दिवा स्वप्न ही रहेगी।...तब तक, जब तक कि मालकियत और नियंत्रण की भावना खत्म नहीं हो जाती।
  • हर क्षण आदमी एक नया आदमी होता है। वो जो भी होता है...हर आदमी के लिए वह अलग-अलग होता है। यही सापेक्षता है।
 
Monika Jain ‘पंछी’

August 11, 2017

Help (Charity) Quotes in Hindi

Help (Charity) Quotes

  • 22/07/2017 - वो वाला हवन तो कभी किया नहीं और आगे भी करने का कोई इरादा नहीं। लेकिन ‘हवन करते हाथ जलना’ वाली कहावत बहुत चरितार्थ हो रही है कुछ समय से। :’( सच्ची! सब मोह माया है। :/
  • 18/02/2017 - बस यही तो अजीब है न!...कि जो बड़े वाले फैन होने का दावा करते हैं, जो प्यार का दावा करते हैं, जो हमेशा साथ देने का दावा करते हैं, जो बड़ी-बड़ी तारीफें करते हैं, इसकी-उसकी-न जाने किस-किस की उपाधियों से नवाजते हैं...अक्सर वे एक छोटी सी मदद या समस्या के समय भी घोर लापरवाह बन जाते हैं।...और दूसरी ओर कभी-कभी कोई घोर अज़नबी जिसे लेना-देना नहीं...कौन मोनिका, कहाँ की मोनिका, कैसी मोनिका, होगी कोई मोनिका...वे भी बहुत बड़ी वाली मदद कर देते हैं। ये भी शायद एक वजह हो सकती है (हालाँकि है नहीं :p ) कि क्यों मुझे चींटी, कीड़े-मकोड़े, छिपकली, चिड़िया, कबूतर....सबमें अपने दोस्त और रिश्तेदार नज़र आते हैं।
  • 14/01/2017 - वास्तव में परमार्थ क्या है, इसे समझने के लिए और इसके होने के लिए बेहद सूक्ष्म दृष्टि चाहिए...बेहद सूक्ष्म। महावीर, बुद्ध, जीसस, नानक, मीरा...जो भी मुक्त हुए उनके पास यही दृष्टि थी। 
  • 14/10/2016 - दान (दाता भाव के अभाव में) अपने आप में एक आनंद है। उससे किसी अतिरिक्त फल की आशा उसे महज व्यापार बना देती है। 
  • 28/12/2014 - हम नहीं जानते देने का सुख। हम सिर्फ पाना चाहते हैं।...और यही सारी समस्यायों की जड़ है। अक्सर लोग सोचते हैं उन्हें यह मिल जाए, वह मिल जाए, वह भी और वह भी...पर बहुत कम देखा है किसी को कहते हुए कि वह देना चाहता है। हम प्यार चाहते हैं, देना नहीं। हम सम्मान चाहते हैं, करना नहीं। हम चाहते हैं हमें समझा जाए पर हम दूसरों को समझना नहीं चाहते। हमारी गलतियाँ नजरंदाज की जाए पर दूसरों की गलतियाँ हम भूलते नहीं। सारी ख्वाहिशें, सारी इच्छाएं और सारे सपने जब 'मैं' से आगे बढ़ ही नहीं पाते तो उनका होना न होना मायने ही कहाँ रखता है? 
  • 25/07/2014 - जब कोई व्यक्ति हमसे मदद चाहता है, तो हमें इसे एक अवसर के रूप में देखना चाहिए। क्योंकि हमारे ना करने के बावजूद भी अरबों की आबादी की इस दुनिया में उस व्यक्ति को निश्चित रूप से कोई और मदद करने वाला मिल ही जाएगा (अपवादों को छोड़कर)। अपने अहंकार, ईर्ष्या, आलस, स्वार्थ या अन्य किसी भी वजह से पूर्ण सक्षम होते हुए भी अगर हम किसी की छोटी सी मदद भी जान-बूझकर नहीं करते, तो यह निश्चित रूप से हमारा दुर्भाग्य है। 
  • 02/10/2012 - कुछ लोग बिना मांगे मदद करने आते हैं और फिर मदद करने की कुछ अप्रत्यक्ष शर्तें भी बताते हैं, और खुद को मददगार भी कहते हैं। भई, चाहे जो हो पर शर्तों वाली मदद तो बिल्कुल भी नहीं चाहिए और ना ही ऐसे मददगार। दुनिया की कोई भी समस्या इतना कमजोर कभी नहीं बना सकती कि दूसरों की उन शर्तों पर मदद लेनी पड़े, जिन्हें मानने को दिल नहीं कहता। फिर चाहे शर्त टिन्नी-मिन्नी सी ही क्यों ना हो। 
  • ऐसा सबके साथ कभी ना कभी जरुर हुआ होगा - किसी समस्या को लेकर मन बहुत परेशान है, उससे उभरने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा...तभी अचानक कोई अजनबी हमारी सारी परेशानी छू कर जाता है। बिना किसी अपेक्षा के, बिना किसी रिटर्न की चाह के, ज़िन्दगी के रास्तों में हमें ऐसे ढेर सारे अजनबी मिलते हैं, जो हमारी कई छोटी-मोटी समस्यायों को सुलझाते हुए, हमें जाने-अनजाने आगे बढ़ने का हौसला देते हैं, हमारे रास्तों को आसान बना देते हैं। कई बार उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का हमें मौका नहीं मिल पाता। पर क्या आपको नहीं लगता, उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का सबसे अच्छा तरीका है कि हम भी किसी के लिए ऐसे अजनबी दोस्त बन जाएँ। नफा-नुकसान, जान-पहचान, जाति-धर्म, ऊँच-नीच का आकलन किये बिना दूसरों की मदद के लिए तत्पर रहें। अब ये न कहियेगा कि मौका नहीं मिला। मौके तो हमें घर बैठे भी हजार मिलते हैं, बस जरूरत है मौके को पहचानने और उसे भुनाने की।
 
Monika Jain ‘पंछी’

August 2, 2017

Religion (Religious Fanaticism) Quotes in Hindi

Religion (Religious Fanaticism) Quotes

  • 27/05/2017 - एक ऐसा सॉफ्टवेयर बना दो कोई जिसमें किसी धर्म विशेष की कोई कुरीति फीड करो तो उससे मिलीजुली समस्त धर्मों की कुरीतियों का विवरण आ जाए। वो क्या है न कि हमें जड़ता के मामले में भी प्रतिस्पर्धा और तुलना करनी होती है।...मतलब वो कुएं में कूद रहा है तो क्या मैं तालाब में भी न कूदूँ?
  • 24/05/2017 - मूर्ति स्थापना को लेकर मर रहे हैं और मार रहे हैं, जुलूसों के लिए मर रहे हैं और मार रहे हैं, मंदिर जाने और रोकने के लिए मर रहे हैं और मार रहे हैं...प्रतिस्पर्धा, राजनीति और असुरक्षा का इससे विकृत रूप और क्या हो सकता है भला? मतलब असल समस्याएं जाएँ घी-तेल लेने...हम तो नयी-नयी अजीबोगरीब समस्याएं पैदा करेंगे और उन्हें एन्जॉय करेंगे। बड़ी स्तर हीनता है। लोगों को शर्म भी नहीं आती कि वे किन चीजों के लिए मर और मार रहे हैं। संस्कृति और परंपरा पर गर्व करने और इसकी माला फेरने वाले यौद्धा! और उनके ही नक़्शे कदम पर चलने वाले समानता के लिए संघर्षरत वीरों! भारत को सिर्फ बुतों, पुतलों, प्रतीकों और मूर्तियों का देश बना देने में कोई कसर न छोड़ना। जय...! (अब जय के बाद संबोधन के लिए इतने प्रतीक हैं यहाँ कि जो मन पड़े भर लेना।)
  • 30/08/2016 - जितना आसान है विज्ञान का विद्यार्थी बनना...उतना ही मुश्किल है वैज्ञानिक चिंतन का विकसित होना और उससे भी अधिक मुश्किल है सहज धर्म का उदय होना।
  • 07/04/2016 - बाहर नैतिकता बचा सकते हो, कानून बचा सकते हो, व्यवस्था बचा सकते हो और संप्रदाय भी। लेकिन धर्म एक ऐसी चीज है जिसे बस भीतर ही बचाया जा सकता है...और कोई तरीका नहीं। पर हाँ, जब यह भीतर बचने लगता है तब बाहर स्वत: ही प्रतिबिंबित होने लगता है।
  • 07/02/2016 - कट्टरता का आलम तो देखिये...लोग 'अहिंसा' शब्द को पकड़कर 'हिंसक' बन जाते हैं और 'सकारात्मकता' शब्द को पकड़कर घोर नकारात्मक।
  • 10/03/2016 - धर्म उसी दिन सफल होगा जब वह स्थापित मान्यताओं और रास्तों को थोपने की बजाय लोगों में सहज जिज्ञासा उत्पन्न करेगा। उनमें ऐसे प्रश्न उत्पन्न करेगा जिसे वे एक जड़ जीवन को जीते हुए अपने आसपास फटकने भी नहीं देते...और उन प्रश्नों के समाधान के लिए अपनी योग्यता और रूचि के अनुरूप रास्ता चुनने की स्वतंत्रता भी देगा। बाकी असफलता के लिए सिर्फ नाम और प्रतीकों को बचाने और मिटाने की जंग जारी रखी जा सकती है। 
  • 18/07/2015 - किन विषयों पर लिखना पसंद है? निसंदेह 'प्रेम और धर्म' पर। लेकिन जिस दिन धर्म प्रेम बन जाएगा और प्रेम धर्म, उस दिन लिखने की जरुरत भी ना रहेगी। उस दिन बस इन्हें जी भर के जीया जाएगा।
  • 05/07/2015 - 'धर्म' और 'प्रेम' दो ऐसे शब्द हैं जिन पर मानव जाति ने सबसे ज्यादा अत्याचार किया है। 
  • 04/12/2014 - धर्म तो स्वभाव में होना चाहिए। आत्मा में झलकता हुआ, कार्यों और व्यवहार से छलकता हुआ, रोम-रोम में बसा हुआ। उसके लिए बाह्य कर्म कांडों की क्या जरूरत? 
  • 21/08/2014 - मंदिर कहते समय मस्जिद, गुरुद्वारा न कहा तो शामत। ईश्वर कहते समय खुदा, अल्लाह न कहा तो शामत। हिन्दू से जुड़ी बात कर दी, मुस्लिम की न की तो शामत। उफ़! ये धार्मिक लोग। एक और शामत को निमंत्रण देने वाली थी पर अच्छा हुआ याद आ गया। मस्जिद कहते समय मंदिर न कहा तो शामत। खुदा कहते समय भगवान न कहा तो शामत। मुस्लिम कहते समय हिन्दू को भूल गयी तो शामत।...शामत ही शामत। 
  • अजीब इत्तेफाक है न!...जो अपने धर्म, अल्लाह/ईश्वर और संप्रदाय के प्रति जितना कट्टर है, उसके मुंह से उतने ही ज्यादा फूल बरसते हैं। इनकी जुबान से निकले शब्द पढ़कर तो इनका अल्लाह/ईश्वर भी शर्म से पानी-पानी हो जाता होगा। जिनका धर्म उन्हें बोलने की तहजीब तक न सिखा पाया, उनसे और कोई उम्मीद बेमानी है। हाँ, ये अपने ही धर्म के सबसे बड़े दुश्मन जरुर है। 
  • जब भी कोई मेरा विश्वास तोड़ता है या मेरे दिल को ठेस पहुंचाता है तो मैं खुद से एक वादा करती हूँ कि मैं पूरी कोशिश करुँगी कि ऐसा किसी के साथ ना करूँ...अच्छे और सच्चे लोगों के साथ तो बिल्कुल भी नहीं। क्योंकि मेरे लिए धर्म किसी पत्थर के सामने हाथ जोड़कर अपने सुख, समृद्धि और सफलता के गिड़गिड़ाना नहीं है। मेरे लिए धर्म लोगों के साथ वैसा ही आचरण और व्यवहार करना है जैसा मैं खुद के लिए उनसे चाहती हूँ। अच्छाई की ओर कदम बढ़ाने की प्रेरणा के लिए मुझे किसी अच्छे इंसान की तलाश कभी नहीं करनी पड़ती। बुराई और बुरे लोग मेरे लिए उत्प्रेरक का कार्य करते हैं।
  • हमारी सबसे बड़ी समस्या यह है कि हमने कुछ शब्दों, कुछ प्रतीकों को बहुत गहरे से पकड़ लिया है। तथ्य यह है कि बाहरी किसी भी चीज पर पकड़ जब बहुत गहरी हो जाती है तो वहां धर्म के अलावा सारे काम होने लगते हैं। 
  • धर्म वहां है जहाँ सभी प्राणी निर्भयता पूर्वक विचरण कर सकते हैं। जहाँ किसी की उपस्थिति किसी की उपस्थिति से बाधित नहीं।
  • जो सच में धार्मिक होते हैं वे अपना मंदिर-मस्जिद अपने साथ लेकर चलते हैं। उन्हें किसी मंदिर या मस्जिद के बनने और टूटने से फर्क नहीं पड़ता। 
  • कुछ भी कहो, ये धार्मिक कट्टरों के तर्क (कुतर्क) बड़े रोचक होते हैं। लाखों जानवरों की बलि ना दी जाए तो इस्लाम पर मुसीबत आ पड़ेगी। पटाखों के धमाके न हो, रावण और होलिका को न जलाया जाए तो हिन्दुत्व खतरे में पड़ जाएगा। और हाँ, मुस्लिम फलां काम करते हैं तो हिन्दू ढीमका काम क्यों ना करे? हाँ, वो कुएँ में कूदे तो तुम्हें भी नदी में तो बिल्कुल कूदना ही चाहिए, आखिर अपने-अपने धर्म और इज्जत का सवाल है। जिसके लिए तो किसी की भी जान ले लेना, लड़-कटकर मर जाना भी बहुत छोटी सी बात है, तो फिर ये टिन्नी-मिन्नी सी बातें तो मायने ही कहाँ रखती हैं?
  • बुद्ध पुरुषों की अनुभूति एक हो तब भी अभिव्यक्ति अलग-अलग होती है। क्योंकि अनुभूति के समय कर्ता का अभाव होता है लेकिन अभिव्यक्ति के समय कर्ता उपस्थित रहता है। अभिव्यक्ति सिर्फ अनुभूति की झलक देती है। अभिव्यक्ति को अनुभूति मान लेना ही कट्टरता का कारण है।
 
Monika Jain ‘पंछी’

July 25, 2017

Quotes on Life in Hindi


Life Quotes

  • 07/06/2017 - अपनी पुरानी, समय की धूल जम चुकी प्लेलिस्ट किसी से शेयर करना...जीवन का एक हिस्सा शेयर करना है। कुछ गाने बिल्कुल ऐसे ही होते हैं न!...जैसे ये तो बस हमें ही गाने थे।
  • 23/05/2017 - कभी-कभी बहुत छोटे से समय में जीवन अपने इतने सारे रंग या झलकें दिखा देता है कि फिर जो चीज सबसे अधिक आकर्षित करती है वह है पारदर्शिता। 
  • 06/05/2017 - जीवन का एक बड़ा हिस्सा जिसे लिख जाने की सबसे अधिक जरुरत थी, वह कभी लिखा नहीं गया। जो लिख जाता तो कुछ आँखों की आलोचना और ईर्ष्या शर्मिंदगी में बदल जाती। जो लिख जाता तो अपेक्षाओं से भरी कुछ आँखें संकोची हो जाती। जो लिख जाता तो उदासीन, शुष्क या खिल्ली उड़ाती कुछ आँखें नम हो जाती। जो लिख जाता तो पता चलता कि असीम दर्द को मुस्कुराहट, बेफिक्री और प्रेम में तब्दील कर देने के लिए कितनी हिम्मत की जरुरत होती है। जो लिख जाता तो फिर शायद कभी कुछ नहीं लिख पाती।
  • 22/02/2017 - जब आप किसी वस्तु, व्यक्ति या किसी से भी से रूबरू होते हैं और अक्सर ही आपके विचार इस दिशा में हो कि इससे क्या फायदा हो सकता है, या यह क्या काम आ सकता है, या इसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं, या प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से किसी भी तरह की कोई उम्मीद या अपेक्षा रहती है तो यह बहुत अधिक व्यापारी मस्तिष्क को इंगित करता है। इतनी सौदागिरी जीवन से बहुत दूर ले जाती है। 
  • 03/02/2017 - सिर्फ अधूरी इच्छाएं (अच्छी-बुरी) ही जन्म लेती है। प्रेम तो सदैव अजन्मा और अमर होता है। अपने अहंकार को खाद-पानी देते हम किसी दूसरे अहंकार से नफरत कर सकते हैं, लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि वह दूसरा अहंकार भी हमारी ही किसी अतीत की इच्छा का जन्म है। जिस क्षण हम अखंडित होंगे तभी हमें पता चलेगा कि दूसरा तो कोई होता ही नहीं। हर कदम पर हमारा सामना सिर्फ खुद से ही है। इसलिए समानुभूति के उस स्तर तक पहुँचने के लिए अक्सर मैं ’हम’ या ‘मैं’ शैली में लिखती हूँ। अहंकार के शमन के लिए 'मैं' को 'हम' और 'हम' को 'मैं' बना लेना एक अच्छा तरीका है और दोनों में ही यह जरुरी नहीं कि बात मेरे ही सन्दर्भ में हो। उस समय मन में यह ख़याल नहीं होता कि मूल मुद्दे पर ध्यान नहीं दिया जाएगा बल्कि व्यक्तिगत आंकलन किये जायेंगे, निष्कर्ष निकाले जायेंगे, पूर्वाग्रह पाले जायेंगे। लेकिन समानुभूति से बाहर निकलते ही पता चलता है कि हमारा खंड-खंड जीवन इसी के लिए अभिशप्त है। जितने ज्यादा हम खंडित उतने ही हमारे निष्कर्ष। जब-जब हमारा मन खंडित नहीं होगा, संस्कारों के प्रभाव में नहीं होगा...तब-तब वह सिर्फ प्रेम के बारे में ही सोचेगा। बल्कि सोचेगा क्या ‘प्रेम’ ही होगा। 
  • 06/01/2017 - हर उत्तर इंतजार कर रहा होता है अपने प्रश्न का। और हर प्रश्न की नियति है उसका गिर जाना है। 
  • 22/06/2016 - जिजीविषा को बहुत ज्यादा महत्व दिया जाता है। इसे एक प्रेरणास्पद गुण की तरह देखा जाता है। लेकिन जब भी मैं सोचती हूँ कि मेरी जीवेषणा न जाने कितनी मृत्युओं पर खड़ी है तो इस शब्द का आकर्षण एकदम छू हो जाता है। देखा जाए तो यह जीवेषणा सबको मारकर भी खुद को नहीं बचा सकती। पर इसका मतलब यह नहीं कि मैं मृत्यु-एषणा का समर्थन कर रही हूँ। सूक्ष्म रूप में मृत्यु-एषणा सिर्फ वहीं हो सकती है जहाँ सशर्त जीवेषणा है - शर्तें पूरी नहीं हुई इसलिए हमें नहीं जीना। यह जानते हुए कि एक समष्टि दृष्टिकोण से पृथ्वी पर जीवन का कोई उद्देश्य नहीं है...यह एक चक्र के सिवा और कुछ भी नहीं...जीने की जद्दोजहद और प्रतिस्पर्धा को इतना अधिक महत्व देना एक भ्रम में जीना लगता है। जीवन एक खेल से ज्यादा कुछ भी तो नहीं। काश! हम इसे बस एक खेल की तरह खेलना सीख पाते। पूर्ण सजगता और भागीदारी से शामिल होते हुए भी अनछुए और गंभीरता से मुक्त। 
  • 05/06/2016 - जीवन का उद्देश्य ही यह जान लेना है कि जीवन का कोई उद्देश्य नहीं, वह सिर्फ जीवन है। 
  • 06/01/2016 - कितना चक्रीय है यह जीवन!...और कितने दोहराव। चक्र को तोड़ने के कितने सारे मौके भी।...पर इतने साहस का अभाव। इस उबाऊ परिक्रमा से परे एक रौशनी का इंतजार! हम्म...वो सुबह कभी तो आएगी। 
  • 20/07/2015 - दुनिया नहीं जीने देती। अगर संघर्षों, मुश्किलों, ग़मों, तकलीफों, दर्द और तन्हाईयों के विशाल सागर से घिरे होते हुए भी आपको मुस्कुराना, चहकना और खिलखिलाना आ जाता है, तो बहुत सम्भावना है कि आपकी तकलीफों को नाटक करार दे दिया जाएगा। 
  • 15/03/2015 - ज़िन्दगी तो बार-बार आवाज़ देती है - यह तुम्हारे लिए नहीं है, नहीं है, नहीं है...बिल्कुल भी नहीं है। पर हम बाहरी दुनिया के शोर में ज़िन्दगी की आवाज़ को अनसुना कर बैठते हैं।
  • 09/02/2015 - कुछ लम्हों को कैद नहीं करना चाहिए. तस्वीरों में भी नहीं। उन्हें बस जी भर जी लेना चाहिए। 
  • असंतुष्टि और सुस्मृति भूत की, संचय और भय भविष्य के, वर्तमान कहीं नदारद है। जो वर्तमान में जीना आ जाता तो सही मायनों में जीना आ जाता। 
  • जीवन हमारे लिए क्या लेकर आएगा...यह भले ही हम तय न कर सकें, लेकिन उसका स्वागत हम कैसे करेंगे यह तय करना हमारे हाथ में है। 
  • कभी-कभी जिंदगी में सबसे आसान सवाल ही जवाब देने में सबसे मुश्किल लगने लगते हैं। 
  • रहस्यमयी अनुभवों के पहले भी कुछ हैरान नहीं करता था और रहस्यमयी अनुभवों के बाद भी अक्सर कोई हैरानी नहीं होती। क्योंकि जीवन है यही क्या कोई कम हैरानी वाली बात है। चमत्कारों से (असली हो चाहे नकली) इतना प्रभावित होने की जरुरत है ही नहीं। जब सृष्टि या ब्रह्मांड संभव है, जीवन संभव है तो हर चीज की सम्भावना स्वत: ही बन जाती है। नास्तिक कहलाने से आप वैज्ञानिक चिंतन वाले बन जायेंगे...बड़ी बेतुकी बात है। और आस्तिक कहलाने भर से कोई चमत्कार हो जायेंगे यह भी उतनी ही फर्जी बात। 
  • शीर्ष स्तर की सूक्ष्म-सूक्ष्म बातें यह आग्रह नहीं करती कि कोई सीधा छलांग लगाकर उन तक पहुँच जाए। यह सामान्यत: संभव है भी नहीं। अपनी कमियों और कमजोरियों को स्वीकार करते हुए उन्हें दूर करने हेतु वे जीवन को एक दिशा देती है। इसलिए उनका नित्य स्मरण जरुरी है। 
  • जितना मैं पढ़ती हूँ और समझती हूँ, उतना ही मेरा विश्वास पक्का हुआ जाता है कि सब कुछ तो लिखा जा चुका है। सब कुछ अनुभव किया जा चुका है। हम दोहराव से अधिक और कुछ भी तो नहीं।
  • प्यारे दोस्तों, अक्सर दो चरमों (extremes) के बारे में ही क्यों सोचते हो? भाषा की सीमा है कि वह द्वैत में ही बात करती है। लेकिन समझ के लिए ऐसी कोई सीमा नहीं है। कुछ होने और कुछ न होने के बीच में ही अधिकतर चीजें अलग-अलग जगहों पर विद्यमान होती है। जीवन-मृत्यु, सुख-दुःख, सफ़ेद-काला, प्रकाश-अंधकार दो छोर भले ही हो, लेकिन अधिकांश हिस्सा इनके बीच ही कहीं आता है।

Monika Jain ‘पंछी’

July 16, 2017

Attraction (Attachment) Quotes in Hindi

Attraction (Attachment) Quotes

  • 16/07/2017 - अनासक्ति की सबसे अच्छी बात यह है कि वहां सामने वाले की चोट पहुँचाने की सभी कोशिशें बेकार हो जाती हैं। जहाँ हर्ट होना चाहिए था, वहां भी हम मुस्कुरा जाते हैं। 
  • 04/06/2017 - धीरे-धीरे मैं समझने लगी थी कि आकर्षण एक काल्पनिक दूरी को पैदा करता है, जिसे पाटने का प्रयास आकर्षित पक्ष अपने-अपने तरीकों से करते हैं। अगर प्रकृति इस आकर्षण के विरोध में होती है तो यह काल्पनिक दूरी और भी बढ़ती जाती है। अगर प्रकृति इस आकर्षण के पक्ष में होती है तो यह काल्पनिक दूरी काल्पनिक निकटता में तब्दील हो जाती है। आकर्षण को विचार से अलग नहीं किया जा सकता। विचार को दूरी से अलग नहीं किया जा सकता। निकटता विचार का खत्म होना है। निकटता आकर्षण का खात्मा हो प्रेम व करुणा का उदय होना है।
  • 02/05/2017 - सजा अलग से क्या होगी? किसी भी तरह के बंधन में होना खुद एक सजा है। एक धूर्त के लिए उसकी धूर्तता ही सजा है और एक मुर्ख के लिए उसकी मूर्खता। 
  • 04/02/2017 - कुछ आकर्षण ख़ामोशी में शुरू होते हैं, ख़ामोशी में एक सफ़र तय करते हैं और ख़ामोशी में ही एक दिन भूल भी जाते हैं। मन चाहता है कुछ कह लेना, कुछ सुन लेना...पर ख़ामोशी!....शायद यही उनकी ख़ूबसूरती होती है। :) 
  • 17/06/2016 - जरा सी दुनिया और जीवन के प्रति आसक्ति बढ़ी नहीं कि एक तमाचा इंतजार कर रहा होता है...और फिर? फिर क्या...मोह भंग! 
  • यूँ तो आदर्श दृष्टिकोण से किसी भी तरह का मोह, आसक्ति या जुड़ाव सही नहीं होता। लेकिन किसी गलत व्यक्ति, वस्तु, आदत...आदि से जुड़ाव की गलती चक्रवृद्धि ब्याज की तरह फलित होती ही रहती है। आपका एक बार कहा गया ’आ बैल मुझे मार’ बैल द्वारा हमेशा के लिए रिकॉर्ड करके भी रखा जा सकता है। ताकि बार-बार, हजार बार सुना और सुनाया जा सके। और फिर एक बार की गलती की सजा आपको न जाने कितनी बार भुगतनी होती है। किसी की परिस्थितिजन्य मामूली सी गलती जो भोलेपन और अनजाने में हो गयी है उसका बार-बार मखौल उड़ाकर उसे गंभीर अपराध सिद्ध करने वाले लोग काश! यह समझ पाते कि वे कितनी बड़ी गलती और अपराध कर रहे हैं। 
  • 'मेरा' से 'मैं' तक का सफ़र कुछ जुड़ने का नहीं छूटने का सफ़र है। मेरा घर, मेरी किताब, मेरा पैसा, मेरी दोस्त, मेरा बच्चा, मेरा देश, मेरा शहर, मेरी जाति, मेरा धर्म, मेरा शरीर, मेरे विचार...न जाने कहाँ-कहाँ तक पहुँच जाता है मेरा विस्तार और मेरी पहचान। छोड़ने का मतलब हमेशा सब कुछ त्यागना नहीं होता। छूटना इन तमाम चीजों पर अधिकार, आसक्ति और मोह का छूटना है। छूटना उस पहचान का छूटना है जो हमारी है ही नहीं। छूटने का सम्बन्ध मुख्य रूप से भीतर से है। बाहर तो जब तक जीवन है ज़िन्दगी के रंगमंच पर किरदार निभाने ही होते हैं।
  • जो बांधेगा, उसका बंधना तय है।
  • हम समानता या विषमता की ओर आकर्षित नहीं होते...पूरक की ओर आकर्षित होते हैं, वह जो हमें पूर्ण बनाये। हालाँकि बाहर पूर्णता की यह तलाश अंतत: निरर्थक ही सिद्ध होती है, बिल्कुल कस्तूरी मृग की तरह। इसलिए जिस प्राणी का पर की ओर आकर्षण जितना कम होता है वह स्वयं में उतना ही पूर्ण होता है।...और यहाँ 'पर' से आशय सिर्फ स्त्री या पुरुष से नहीं, हर उस चीज से है जो हमारी आत्मा से परे है। 

Monika Jain ‘पंछी’

June 16, 2017

Rice Vegetable Dhokli Recipe in Hindi

Rice Vegetable Dhokli Recipe in Hindi

चावल की ढोकली

कुछ दिनों से इडली, खम्मन, हांडवो..आदि से इतर भाप में पका हुआ कुछ नया बनाने/खोजने का मन कर रहा था। इसी दौरान चावल के आटे व सब्जियों के मिश्रण से इस डिश को ट्राई किया। खाने में अच्छी लगी इसलिए  आपके साथ भी रेसिपी शेयर कर रही हूँ। सबसे अच्छी बात यह है कि इसे बनाने के लिए प्री प्लानिंग की जरुरत नहीं है। चावल का आटा उपलब्ध हो तो जब भी इच्छा हो इसे तुरंत बना सकते हैं। इसके अलावा सब्जियां जो खासकर बच्चों को यूँ पसंद नहीं आती, उन्हें भी इस डिश के रूप में आराम से खाया जा सकता है। भाप में पके होने के कारण यह पौष्टिक भी है।

सामग्री :

कद्दूकस हरी शिमला मिर्च : ¼ कप

एकदम बारीक कटी हरी मिर्च या हरी मिर्च का पेस्ट : ¼ कप

कद्दूकस प्याज : ½ कप (वैकल्पिक)

कद्दूकस टमाटर : ½ कप

कद्दूकस अन्य सब्जियां : 1-1 कप ( यहाँ घर में उपलब्ध कद्दूकस की जा सकने वाली सब्जियां जैसे लौकी, टिंडे, आलू, कच्चा केला, गाजर, पत्ता गोभी...आदि में से दो या अधिक अपनी पसंद की सब्जियां ले सकते हैं। )

चावल का आटा : आवश्यकता अनुसार (अलग-अलग सब्जियां अलग-अलग मात्रा में पानी छोड़ती है, इसलिए उसी अनुरूप चावल का आटा मिलाने की जरुरत पड़ेगी।)

हल्दी : ¼ छोटा चम्मच

सौंफ का पाउडर : ½ छोटा चम्मच

नमक : स्वादानुसार

राई के दाने : ½ छोटा चम्मच

हींग : चुटकी भर

घी (पिघला हुआ) : ¼ से ½ कप के बीच ( जिन्हें घी से परहेज हो वे तेल भी इस्तेमाल कर सकते हैं। घी ढोकली को नर्म बनाने का काम करता है। मिश्रण की मात्रा के अनुसार इसकी मात्रा को कम-ज्यादा किया जा सकता है।)

विधि : सबसे पहले एक बर्तन में सभी कद्दूकस की हुई सब्जियां ले लें। अब इसमें नमक, सौंफ पाउडर और हल्दी मिलाकर अच्छी तरह से मिक्स कर लें। अब एक छोटी सी कड़ाई में घी लेकर उसे गर्म करें। घी में राई के दाने और हींग तड़काकर इसे सब्जी वाले मिश्रण में डाल दे और फिर से इसे मिक्स कर दें। अब चावल का आटा एक-एक बड़ा चम्मच करके इतनी मात्रा में डाले कि मिश्रण को अच्छी तरह से मिलाने के बाद उससे आराम से टिक्की (ढोकली) बन सके। मिश्रण को 5 मिनट के लिए ढककर रख दें। अब थोड़ा-थोड़ा मिश्रण हाथ में लेकर उसे लड्डू की तरह गोल-गोल बांधते हुए बीच में से दबाकर टिक्की का आकार दे दें। अब इडली या खम्मन के स्टैंड में नीचे पानी डालकर ऊपर जालीनुमा प्लेट रखकर सभी ढोकली उसमें रख दें। ऊपर से ढककर माध्यम आंच पर 15-20 मिनट तक पका लें। स्टैंड न होने पर एक पतीली में पानी लेकर, जालीनुमा प्लेट रखकर, ऊपर एक ऊंचे ढक्कन से ढककर भी इसे पकाया जा सकता है।

इसे दूध, चाय, लस्सी या छाछ के साथ यूँ ही नाश्ते के रूप में परोसा जा सकता है। हरी चटनी और टमाटर सॉस के साथ खाया जा सकता है। इसके अलावा हल्के डिनर के तौर पर करी या तुअर-मसूर की दाल के साथ भी खाया जा सकता है।

Monika Jain ‘पंछी’
(16/06/2017)

June 14, 2017

Essay on Criticism in Hindi

ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर

13/06/2016 - वह जो सिर्फ असहमतियों के लिए प्रकट होता था।
वह जो सिर्फ आलोचना की गुंजाईश देखता था।
वह जो सिर्फ विरोध के अवसर ढूंढता था।
उसका विरोध विचारों से नहीं मुझसे था। बहरहाल आलोचनाएँ हँसा भी सकती है। :)

14/06/2017 - कोई जो आपके शब्द-शब्द, विचार-विचार, भाव-भाव, कर्म-कर्म को आलोचनात्मक दृष्टिकोण से पकड़ता है और फिर उनके आधार पर बुरे निष्कर्ष निकालता है, वह कुछ भी कर सकता है लेकिन आपसे प्रेम नहीं कर सकता। और यह भी तय है कि बहुत ज्यादा जजमेंटल बनने की प्रक्रिया में वह आपके विचारों, शब्दों या भावों के सही अर्थ तक भी नहीं पहुँच सकता, आपको समझना तो बहुत दूर की कोड़ी है।

जन्म से लेकर ही बहुत लम्बे समय तक (लगभग पूरे विद्यार्थी जीवन में) मैं बहुत अन्तर्मुखी और शर्मीली थी। बात करने की पहल नहीं कर पाती थी और बहुत ज्यादा बातें भी नहीं होती थी करने को। कुछ अपवाद थे इसमें भी। जो पहल कर लेते थे, उनमें से ही किसी के क्लोज हूँ या किसी के साथ बहुत सहज हूँ तो उससे कभी-कभी बहुत बातें हो जाती थी। और इसके अलावा पब्लिक स्पीकिंग में भी कभी दिक्कत नहीं आई। कई लोग मेरी प्रकृति समझ जाते थे और किसी ख़ास परिचय के बिना भी उनका स्नेह रहता था हमेशा। उन सभी को बहुत मासूम लगती थी। कुछ लोग यह भी मानते थे कि मैं पढ़ाई और अन्य गतिविधियों में अव्वल रहती हूँ, इसलिए बहुत घमंडी हूँ और इसलिए ही ज्यादा बात नहीं करती किसी से।

एक बार नयी स्कूल में मेरी पुरानी स्कूल से क्लास में कोई नहीं था और लड़कियों का एक बड़ा ग्रुप किसी कॉमन स्कूल से ही था, जो सभी पहले से दोस्त थे। उसी ग्रुप में कॉम्पीटिटर भी थी और उस पूरे ग्रुप के पूर्वाग्रह थे मेरे प्रति। और कभी-कभी उनमें से कुछ बेवजह मुझे परेशान करते थे, छेड़ते थे।...और तब मुझे विरोध करना नहीं आता था। ज्यादा से ज्यादा उसके प्रति बस उदासीन हो जाती थी। सिटिंग अरेंजमेंट बदलने के दौरान उसी ग्रुप में से किसी के साथ बैठना हुआ। कुछ ही दिनों में दोस्ती हुई, जो तमाम असमानताओं के बावजूद भी; स्कूल, कॉलेज, शहर...सब बदलने के बावजूद भी; सालों साल गहरी से गहरी होती रही और इस बीच कभी उसने ही बताया था कि वह मुझसे परिचय से पहले मेरे बारे में बहुत गलत सोचती थी, मुझे बहुत घमंडी समझती थी। यह बात जीवन के अलग-अलग समय में कुछ और लोगों ने भी कही है। हम किसी को भी नापसंद न रहें, यह तो संभव है ही नहीं। लेकिन जो लोग किसी पूर्वाग्रह या ग़लतफ़हमी के तहत नापसंद करते हैं, बिना किसी ठोस वजह के नापसंद करते हैं, वे समझ पाए इसके लिए तो उन्हें बहुत बातें करनी होगी, निकट आना होगा, साथ में समय गुजारना होगा...और समस्या यह है कि वर्तमान में मैं एक ओर तो कुछ बहुत गंभीर वजहों से और दूसरी ओर अनासक्ति की वजह से किसी से बहुत ज्यादा परिचय बढ़ा नहीं पाती। ना काहूँ से दोस्ती, ना काहूँ से बैर वाला मामला हो रहा है। :)

खैर! मेरे लिए प्रेम न तो सामान्य परिचय का और न ही किसी प्रगाढ़ परिचय का मोहताज है। परिचित हैं तो भी अच्छा, नहीं है तो भी अच्छा। इसके अलावा कोई हमें बहुत अच्छा समझे तब भी कुछ (कम/ज्यादा) कमियां तो हम सभी में होती ही है। जो प्रेम करते हैं वे कमियों के साथ स्वीकार कर लेते हैं। जरुरी बातें बताते भी हैं, गलतियों पर टोकते भी हैं और प्रेम में ही अच्छे बदलाव भी ले आते हैं। लेकिन जो मन ही मन द्वेष रखते हैं, उनका उद्देश्य सिर्फ कमियां खोजना ही होता है। ऐसे में कुछ अच्छा हो तो वे उसमें भी कमी निकाल लेंगे। वे जो कर रहे होते हैं इस बात का उन्हें भी पता नहीं होता है। पता होने के लिए, प्रेम होने के लिए...खुद को निष्पक्षता से देखने की जरुरत है। पूर्वाग्रहों को छोड़ने की जरुरत है। अपनी कोई प्रच्छन्न अपेक्षा या कुंठा है तो उसे देखने की जरुरत है। कोई नाराजगी है, ग़लतफ़हमी है तो बात करके दूर करने की जरुरत है। बाकी यह सामने वाले से अधिक सिर्फ खुद को पीड़ा देते रहना है। नफ़रत/द्वेष/ईर्ष्या दूसरों पर असर बाद में करेगी, सबसे पहले तो यह इसी बात को दर्शाती है कि कुछ है जो हमारे साथ ही ठीक नहीं।

Monika Jain ‘पंछी’

June 11, 2017

Essay on Caste System Discrimination in Hindi

श्रेणीकरण एक छलावा

11/06/2017 - एक बार ननिहाल गयी हुई थी। उन दिनों वहां पानी लाने के लिए हैंडपंप हुआ करते थे। उसके आसपास घूम रही थी मैं। गाँव की कुछ महिलाएं वहां पानी भर रही थी। मेरा नया चेहरा देखकर उत्सुकता से उन्होंने मुझसे वहां की स्थानीय भाषा में पूछा, 'का रे तू बाण्या (बनिया) की ह की?' मुझे यह शब्द इतना ज्यादा ख़तरनाक लगा कि मैंने तुरंत बड़ी सी ना में सर हिला दिया। फिर मेरे वहां से चल देने के दौरान वे थोड़े अचरच में बातें कर रही थी कि मैं मना क्यों कर रही हूँ। इसके कई सालों बाद तक भी मुझे इस शब्द का मतलब नहीं पता था। कुछ ही सालों पहले मुझे इसका अर्थ पता चला और मतलब पता चलने के बाद भी मुझे यह शब्द कभी पसंद नहीं आया। सिर्फ जैसे हमें कोई नाम पसंद नहीं होता, यही बात मुख्य रूप से मेरे साथ बनिया शब्द को लेकर भी थी। और अर्थ पता चलने के बाद आंशिक तौर पर इस शब्द का प्रयोग किसी पर किये जाने वाले कटाक्ष को लेकर भी।

गांधीजी को बनिया कहे जाने पर बनिया शब्द के पोस्टमार्टम के बाद आज वापस मुझे तो यही बात समझ में आई कि श्रेणीकरण कितना बड़ा छलावा है। देखा जाए तो दुनिया में हर एक प्राणी व्यापारी ही है। बस विचार, भावना और कर्म के आधार पर उसके स्तर अलग-अलग होते हैं और हम फिर उन्हें अच्छी-बुरी, उच्च-निम्न श्रेणी में डाल देते हैं। बाकी हर क्षण हमारा लेन-देन चलता है – श्वास के रूप में भी। कोई पति-पत्नी भी सामान्यत: एक दूसरे की पूजा करने के लिए नहीं बनता। वहां भी लेन-देन ही होता है। बस यहाँ पर लेन-देन को हम रिश्तों के रूप में सुंदर-सुंदर नाम दे देते हैं। कुछ बेहतर भावनाएं जुड़ जाती है इसलिए।

लेकिन जातियां बनाना हम इंसानों की फितरत है। हम हिन्दू (ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य, शुद्र), मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई नहीं बनायेंगे तो आस्तिक और नास्तिक बना देंगे; वामपंथ और दक्षिणपंथ बना देंगे; शिक्षित और अनपढ़ बना देंगे...and so on. हमने कई ऐसे मापदंड बना लिए है जो भेदभाव को पोषित करते हैं, किसी को बेहतर तो किसी को कमतर सिद्ध करते हैं। और जहाँ भी यह कम-ज्यादा आएगा वहां शोषण होगा ही। सारी समस्यायों की जड़ हमारी सोच में है, जिस पर कई कारकों का प्रभाव पड़ता है। हम जैसे वातावरण में रहेंगे वैसी ही हमारी सोच होगी। फेसबुक पर भी कई बुद्धिजीवी हैं जो हर बात में जाति, नस्ल, दलित-सवर्ण, ब्राह्मणवाद-अम्बेडकरवाद को घुसेड़ देते हैं। अपने पूरे स्कूल और कॉलेज जीवन में कभी भी किसी सहपाठी की जाति पर मेरा विशेष ध्यान नहीं गया। कई सरनेम पहली बार सुनते हैं और किसी के साथ लम्बा समय गुजर गया लेकिन यह पता करने की कभी उत्सुकता हुई ही नहीं कि वह किस श्रेणी में आता है। आज भी नहीं पता। लेकिन फेसबुक के समाज सुधारक और उद्धारक बहुत कुछ सिखा रहे हैं। जो खुद को जाति विरोधी दिखाते हैं वे भी जातिवाद को चरम पर पहुँचाने में मदद कर रहे हैं।

हम वाकई समाधान चाहते हैं तो बात प्यार, समझ और स्वस्थ विरोध से ही बनेगी, गन्दी राजनीति से तो बिल्कुल भी नहीं। इसलिए कूड़ा-करकट कम से कम परोसें। क्योंकि चेतन तौर पर न सही लेकिन अवचेतन तौर पर कौन-कौन सी चीजें भीतर प्रवेश कर जाती हैं, हमें पता भी नहीं चलता। ऐसे में प्रभावों से बचना वाकई एक बड़ी चुनौती है...सबसे बड़ी। बहुत कम लोग होते हैं जो अपने परिवेश से प्रभावित हुए बिना अपनी अलग सोच और दृष्टि बना पाते हैं। हमें बस उसी सोच और दृष्टि को विकसित करने की जरुरत है जो सम्यक हो, भेदभाव से रहित हो, मानव को सबसे पहले मानव समझे।

सांसारिक व्यवस्थाओं के लिए सुविधा के तौर पर श्रेणीकरण ठीक है, लेकिन किसी भी तरह के विभाजन को अपने डीएनए में रचा-बसा लेना और पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित करते जाना सिर्फ अपनी जड़ता को पोषण देना है। बाकी बनिया शब्द को छोड़िये...मुझे जैन शब्द से भी ज्यादा जुड़ाव नहीं, स्त्री शब्द से भी ज्यादा जुड़ाव नहीं, मनुष्य शब्द से भी ज्यादा जुड़ाव नहीं...इसलिए मैं कई बार प्राणी कहती हूँ...वैसे प्राणी शब्द से भी ज्यादा जुड़ाव नहीं। जुड़ाव के अन्य ढेर सारे क्षेत्र हैं, जिन्हें समझना और जानना बेहद जरुरी है। शब्द, प्रतीक और वर्ग जैसी चीजों से तो यह सबसे पहले छूट ही जाना चाहिए। प्रयास चालु आहे।

23/08/2015 - कुछ महापुरुषों को पढ़ना मन-मस्तिष्क में घटित होने वाली एक क्रांति के दौर से गुजरना है, जहाँ सब कुछ ध्वस्त होने लगता है। ऐसे तर्क जो हमारे सारे तर्कों को अतार्किक सिद्ध कर देते हैं। आदर्श के ऐसे स्तर जो हमारी सारी अच्छाईयों को बौना साबित कर देते हैं। ऐसी परिभाषाएं जो शब्दों के मायने ही बदल देती हैं। ऐसा ज्ञान जिसके सामने विकास की गाथा कहता सारा विज्ञान फेल नजर आता है। तब बरबस हंसी छूट पड़ती है हम लोगों की उन सब लड़ाईयों पर जिनमें एक आस्तिक, नास्तिक की फिक्र में मरा जा रहा है और एक नास्तिक, आस्तिक की। एक हिन्दू, मुसलमान को समझाने के पीछे पड़ा है और एक मुस्लिम, हिन्दू को। दुनिया का लगभग हर इंसान खुद को छोड़कर बाकी सबकी फिक्र में लगा है। जबकि जिन्हें अपनी फिक्र करना आ गया था वे तो सारे वाद, विभाजन और श्रेणियों से ही ऊपर उठ गए।

Monika Jain ‘पंछी’

May 28, 2017

Essay on Superstitions (Blind Faith) in Hindi

धर्म, संस्कृति, परंपरा और अन्धानुकरण

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01/06/2017 - अभी पूरी ख़बर सही से पढ़ी। वैसे मोर-मोरनी पर की गयी टिप्पणी केवल जज महोदय की व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं है। अभी गूगल पर देखा कि यह मैसेज कई सालों से सोशल मीडिया और इन्टरनेट पर अस्तित्व में है। उनके भी पास ऐसे ही पहुँचा होगा। यह धार्मिक चमत्कारों का देश है तो ऐसी कई सैकड़ों बातें हैं जो हमारे समाज का हिस्सा हैं, जिनका वास्तविकता से लेना-देना नहीं है, बस पीढ़ी-दर-पीढ़ी हंस्तान्तरित हो रही है। सिर्फ प्रचलित बाजारी शिक्षा किसी को इन चीजों से मुक्त कर देगी यह अपेक्षा बेमानी है। कंडीशनिंग बहुत गहरी है। किसी न किसी मात्रा में जो हँस रहे हैं वे भी शिकार हैं। मैं जो लिख रही हूँ वह भी। व्हाट्स एप, फेसबुक इन्हें फ़ैलाने में और भी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। हँसने का कोटा पूरा हो जाए तो उसके बाद कुछ चीजें हम सभी को सोचने की जरुरत है।

धार्मिक विश्वासों पर जो हमारी कट्टरता है उसे ढीला करना बेहद जरुरी है। चमत्कारों के प्रति जो हमारा आकर्षण है उसे खत्म करना भी जरुरी है। स्रोत (शून्य) भले ही अकारण हो लेकिन उसके आगे जितनी भी चीजें हैं उनका कोई न कोई कारण होता ही है। किसी विषय पर शोध भले ही न हुए हों लेकिन चमत्कारी दृष्टि से चीजों को देखने की भारतीय वृत्ति का उन्मूलन देश हित में जरुरी लगता है। यूँ अद्भुत तो सभी कुछ है लेकिन उतना ही सामान्य भी। उसे इतनी नकली चमत्कारी सजावट करके परोसने से तो किसी का हित नहीं सधने वाला...और न ही जबरदस्ती किसी भी धार्मिक बात को सत्य साबित करने के लिए उसमें विज्ञान मिलाकर परोस देने से। हिंदुत्व, इस्लाम, जैनिज़्म, बुद्दिज्म, ईसाइयत...इन सबके बचने से कई ज्यादा जरुरी है, हमारी समझ और चेतना बची रहे। वह बची रही तो फिर कुछ भी बचाने के लिए इतनी मेहनत नहीं करनी पड़ेगी और बहुत सम्भावना है कि यह सब बचाए रखने की आवश्यकता ही शेष न रहे। लेकिन फ़िलहाल बिना सोचे किसी भी मैसेज को फॉरवर्ड करने से हम बचें। बिना जाने इन पर भरोसा करने से भी बचें।

(2)

28/05/2017 - किसी भी देश के धर्म, अध्यात्म और संस्कृति का स्तर मोटे-मोटे रूप में वहां पर होने वाले प्रकट और अप्रकट अपराधों की दर और वहां के लोगों के मानिसक स्तर से नापा जा सकता है। भारत का हाल किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में अपने इतिहास, संस्कृति और परम्पराओं के नाम पर कोई कब तक अपने मन को बहला सकता है, यह मेरे लिए अचरच का विषय है। निश्चित रूप से बोरियत और भागदौड़ से भरे जीवन में ऐसी चीजें क्षणिक रूप से मन को बहुत ख़ुश कर देती है, इसलिए कोई विरोध का स्वर सुन भी नहीं पाता लेकिन अगर यह क्षणिक स्थायी या लम्बे समय तक लोगों के मन पर सकारात्मक परिवर्तन नहीं छोड़ता तो समझो फिर मामला संदिग्ध है। बहुत समझदार नज़र आने वाले लोग भी यहाँ सिर्फ प्रत्यक्ष और बहुत सतही तल पर चीजों को देखने के आदी हैं। जबकि घटना कोई भी हो उसके प्रभाव व्यापक होते हैं सिर्फ व्यक्तिगत नहीं और वही देश का एक सकल चरित्र और स्वरुप बनाते हैं। बाकी अपवाद तो हर जगह होते हैं और कोई जब देश या दुनिया के बारे में सोचता हैं तो सिर्फ खुद से तुलना नहीं कर सकता...ऐसे में खुद को सबमें शामिल करना होता है। कुछ महीनों से मुझे उन देशों के रहन-सहन और जीवन को जानने की उत्सुकता हो रही है, जहाँ पर अपराधों की दर न्यूनतम है और जहाँ के लोग ख़ुशहाल और शांत जीवन जी रहे हैं। कहीं कुछ सही जानकारी मिले तो पढ़ना है। लेकिन इतना तो तय है कि वहां के लोगों के जीवन में अनावश्यक ड्रामा नहीं ही होता होगा। व्यक्ति हो या समाज, जहाँ भी अनावश्यक चीजें जितनी ज्यादा बढ़ती है, वहां का चैन और सुकून उतना ही खत्म होता जाता है।

(3)

30/03/2013 - लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ मीडिया को समाज में जागरूकता फ़ैलाने, अन्धविश्वास और कुरीतियों का खात्मा करने और साक्षरता का प्रचार प्रसार करने की भूमिका के रूप में देखा जाता है लेकिन वर्तमान समय में मीडिया अपनी इस भूमिका का कितना निर्वहन कर रहा है ये हम सब जानते हैं।

कोई भी टीवी चैनल चला लें डरावना सा रूप धारण किये हुए बाबा दर्शकों को शनि, राहु, केतु, गृह दोष, मंगल दोष और ना जाने कैसे-कैसे दोषों से डराते हुए और लौकेट, धन लक्ष्मी वर्षा यन्त्र, लक्ष्मी कुबेर यन्त्र, इच्छापूर्ति कछुआ, लाल किताब, गणपति पेंडेंट, नज़र रक्षा कवच आदि की दूकान लगाकर बैठे मिल जायेंगे जो कोड़ियों के दाम की चीजों को महंगे दामों पर बेच कर अपनी जेबें भर रहें हैं। इसके अलावा फ़ोन और एस एम एस के जरिये समस्याओं का समाधान बताने के बहाने मोटी-मोटी कॉल दरें चार्ज की जा रही है।

आज हर आम आदमी किसी ना किसी समस्या से जूझ रहा है। बस इसी बात का फायदा उठाकर अन्धविश्वास की अपनी दूकान चलाने के लिए मीडिया का सहारा लिया जा रहा है क्योंकि मीडिया ही एक ऐसा माध्यम है जिसके जरिये कोई भी बात सीधे-सीधे लाखों करोड़ों लोगों तक पहुंचाई जा सकती है और मीडिया के जरिये किसी भी बात को दिमाग में अच्छे से बैठाया भी जा सकता है।

पत्र-पत्रिकाएं भी ऐसे विज्ञापनों को धड़ल्ले से छाप रही है। मुझे समझ नहीं आता कि प्यार में असफल व्यक्ति को कोई ज्योतिष या तांत्रिक उसका प्यार कैसे दिला सकता है ? निसंतान दंपत्ति को अगर ऐसे बाबा या तांत्रिक के उपाय अपनाने पर ही संतान मिल जाती है तो फिर मेडिकल की पढ़ाई की क्या जरुरत है ? अगर कोई यन्त्र खरीदकर कोई रातों रात अमीर बन सकता है तो फिर सुबह से रात तक ऑफिस में सर खपाने की क्या जरुरत है ?

कुल मिलाकर दुखी, हारे हुए और परेशान लोगों को ठगने का एक बड़ा जाल फैलाया जा चुका है जिसकी चपैट में फँस कर कई लोग अपनी जेबे खाली करवा रहें हैं।

Monika Jain ‘पंछी’

May 25, 2017

Poem on Save Earth in English

When Shimmer Turned Dark

Shimmering was the sky, sat I
Was glancing the sudden change in verge of high.

Suddenly!
Shimmer turned to black and dark
Clouds growled at me like some hungry shark.

Then I saw the crying earth
Which was expecting the end of birth.

Then I looked at the restless water
Sea was wild accompanied by breathtaking thunder.

The scene around me was scary and troublesome
I guessed some danger is about to come.

Then attracted sea again towards its condition
Now it was giant wave with great explosion.

I feared to see the height
Which was enough to drown a kite.

Then I looked towards sky to seek for mighty
I failed as a roof of water covered me.

Wave was approaching me and i was helpless
Then I realized it’s all we humans mess.

We disturb and harm mother nature
and expect her to stay calm and bear us butchers.

We seek birth and life from this earth
and selfishly forgot all its worth.

I was about to leave this world
It was then something I heard.

It was monotonous sound of nearby generator
Then I realized it was earth no water.

My eyes were wet with horror
A mingled feeling of relief and terror.

Though virtual but that scene taught me lesson of reality
We though humans but forgot humanity.

Just running after the wealth
Without thinking about nature's death.

Don’t dawdle, think briskly over the condition
Otherwise nature would think 100 times to grant us motion.
Nature would think 100 times to grant us motion.

Rishabh Goel
Kotdwar, Uttarakhand

April 17, 2017

Anekantavada and Syadvada Theory of Jainism in Hindi

अनेकांतवाद व स्यादवाद का सिद्धांत

यूँ तो सभी की बातों में विरोधाभास होता ही है। क्योंकि हर बात का सन्दर्भ अलग होता है या कई बार चीजों को हम अज्ञान वश बहुत सीमित नजरिये से देख पाते हैं या स्वार्थ वश सीमित नजरिये से ही देखना चाहते हैं। लेकिन जाग्रत आत्माओं के उपदेश, अभिव्यक्तियाँ, सूत्र भी कई जगह बहुत विरोधाभासी नज़र आते हैं। तर्कशास्त्री उन्हें पागल, भ्रष्ट, और दोगले की उपाधि से नवाजते हैं। यूँ कोई पागल, दोगला या भ्रष्ट तो जाग्रत नहीं होता लेकिन जाग्रत व्यक्तियों का यह व्यवहार उनके छल से नहीं उनकी निश्चलता से निकलता है। उनका यह व्यवहार उनके अज्ञान से नहीं उनके ज्ञान से निकलता है, बाकी सन्दर्भ वाली बात तो है ही। वे नहीं चाहते कि हम किसी भी सहारे को पकड़कर बैठ जाएँ। फिर चाहे वह सहारा संसार हो या निर्वाण, राग हो या प्रेम, बंधन हो या मुक्ति। क्योंकि किसी भी सहारे को पकड़ना फिर से उलझ जाना है। सत्य है ही ऐसा कि वह शब्दों, विचारों या सहारों में समा ही नहीं सकता।

सिर्फ सत्य/प्रेम/ध्यान/समझ/जागरूकता ही है जो समस्त विरोधाभासों को खुद में समाहित कर सकते हैं। अगर ऐसा न होता तो अदृश्य जीवों के अस्तित्व में बाधा न बनने हेतु साँसों की भी मात्रा ध्यान में रखने वाले महावीर अनेंकांतवाद का सिद्धांत नहीं देते। कृष्ण जिन्होंने एक ओर भक्तियोग, ज्ञानयोग को मार्ग बताया वहीँ दूसरी ओर कर्मयोग को मार्ग बताकर अर्जुन द्वारा उस क्षण अपने कर्तव्य का पालन करने हेतु युद्ध का समर्थन न करते। शिव तो सभी विरोधाभासों को अपने में समाहित किये हुए ही हैं।

जिसने कभी विरोधाभासों की एकरूपता और मूल प्रकृति पर विचार किया ही नहीं, व्यष्टि और समष्टि दृष्टिकोण को समझा ही नहीं, सापेक्षता को नहीं जाना वह यह कैसे समझेगा कि किसी क्षण अपने अहंकार, सुरक्षा और स्वार्थ को ताक में रखकर किसी कीड़े के अस्तित्व को स्वीकार कर लेने में भी उसी निर्भयता की आवश्यकता है, जिस निर्भयता की आवश्यकता अपने प्राणों की परवाह किये बगैर किसी आतातायी से भिड़ जाने के लिए है। सही और गलत पूर्व निर्धारित नहीं हो सकते। भाषा, अभिव्यक्तियाँ, शब्द सबकी सीमायें हैं। वे सिर्फ संकेत हैं। बाकी किसी क्षण विशेष का सही और गलत सिर्फ वह क्षण और उस समय की जागरूकता और समझ ही (पूर्वाग्रह नहीं) निर्धारित कर सकती है, और कुछ नहीं। यह समूचा ब्रह्माण्ड ही विरोधाभासों पर टिका है। विरोधाभास न होते तो इसका अस्तित्व भी न होता। इन विरोधाभासों का मूल ही तो परम तत्व कहा जाता है जिसमें सब समाहित है या जो सबसे परे है।

सापेक्षता और सन्दर्भ के वजह से ही जैन दर्शन का एक बहुत प्रचलित सिद्धांत है - अनेकान्तवाद और स्यादवाद, जिसे आज हम सापेक्षता का सिद्धांत (Theory of Relativity) कहते हैं। अनेकांत का मतलब किसी भी बात को उसके सभी संभव दृष्टिकोणों से देखना और समझना है। स्यादवाद में सूक्ष्म मानसिक अहिंसा से बचने के लिए कई बार अपने वाक्यांशों के साथ ‘शायद’ शब्द का प्रयोग किया जाता है। यह कोई अनिश्चितता नहीं होती। यह बस अपने शब्दों को आग्रह (जोर) से मुक्त करना है। क्योंकि हर बात आंशिक सत्य ही होती है। वरना वह बात के रूप में हो नहीं सकती। अपनी साधना के दौरान सापेक्षता की वजह से होने वाली मानसिक/शाब्दिक हिंसा और आग्रह से बचने के लिए महावीर बारह वर्ष तक मौन रहे। कभी- कभी वे जब किसी के प्रश्न का उत्तर देते थे तब भी शायद हाँ और शायद नहीं का प्रयोग करते हुए सात तरह से समझाते थे जिसमें संभावित सभी दृष्टिकोण शामिल हो जाए। अपने मौन और बहुत सूक्ष्म स्तर पर अहिंसा को जीने की वजह से वे लोकप्रिय नहीं हुए। इसके अलावा यज्ञों में होने वाली बलि, हिंसा और आडम्बरों के बिल्कुल विपरीत चलने की वजह से उनका नाम ही इतिहास से मिटाने की पूरी कोशिश की गयी और बहुत यातनाएं दी गयी। लेकिन वे बहुत विस्मित कर देने वाले और पूर्ण वैज्ञानिक सोच वाले व्यक्तित्व रहे हैं।

अनेकांत और स्यादवाद को जो हम समझ लें तो शब्दों, विचारों, भावों और तर्कों को उतना ही महत्व देंगे जितना दिए जाने की जरुरत है। लेकिन हर विचार या भाव आंशिक सत्य है इसका तात्पर्य यह नहीं है कि सभी विचारों और भावों में सत्य और असत्य की मात्रा समान है। ज्यों-ज्यों विचार और भाव परिष्कृत होते जाते हैं उनमें सत्य का अंश बढ़ता जाता है और एक दिन परिष्कृत होते-होते-होते-होते वे विलीन हो जाते हैं, तब अवश्य ही परम सत्य उद्घाटित होता होगा। होता होगा इसलिए क्योंकि परम मेरी स्थायी अनुभूति का विषय नहीं है लेकिन अपने जीवन में मिले कई संकेतों और क्षणिक अनुभूतियों की वजह से यह मेरी श्रद्धा का विषय अवश्य है। वह श्रद्धा जो किसी के द्वारा थोपी हुई नहीं है और न ही कंडीशनिंग से मिली है। वह श्रद्धा जो सहज रूप से उत्पन्न हुई है। वह श्रद्धा जो आहत नहीं होती। आहत हमारा अहंकार या विश्वास होता है श्रद्धा नहीं।

Monika Jain ‘पंछी’
(30/12/2016)

April 16, 2017

What to Study or Books to Read for Spiritual Growth (in Hindi)

अध्यात्म में प्रवेश के लिए अध्ययन

कई बार कुछ नास्तिक और आस्तिक मित्रों द्वारा पूछा जाता है कि तत्व ज्ञान की बातें बहुत गूढ़ हैं, कहाँ से और किस किताब से शुरू करें? हालाँकि ऐसे प्रश्नों के पूरी तरह योग्य नहीं हूँ लेकिन अपनी छोटी सी समझ से यही कहना चाहूंगी कि धर्म या अध्यात्म में अतिभोग के समर्थक मस्तिष्क प्रवेश न करें। यह बहुत ज्यादा भोगी दिमाग का ही काम है जिसने धर्म में जादू-टोना, चमत्कार, तंत्र-यंत्र, स्वर्ग-नरक, देवी-देवता, अप्सराएँ, हूर जैसी व्यर्थ बातों को मान्यता दे दी है और जो मूल उद्देश्य है धर्म का वह बिल्कुल विलुप्त हो गया है। ऐसे मस्तिष्क ही आतंकवादी और कट्टर बनते और बनाते हैं। क्योंकि इनका भोग मृत्यु के परे तक पहुँच जाता है। इसके अलावा जो लोग दुनिया में बदलाव लाने के लिए कुछ ज्यादा ही कट्टर रूप से इच्छुक हैं वे भी इस उद्देश्य से इसमें प्रवेश न करें। अध्यात्म का सम्बन्ध मूल रूप से खुद में बदलाव से है।

अगर आप वाकई इस अस्तित्व के बारे में, अपने बारे में, सबके बारे में कुछ जानने के इच्छुक हैं; या आप अपने जीवन में शांति, प्रेम, स्वतंत्रता और साहस चाहते हैं; या प्रकृति का बहुत ज्यादा चक्रमयी होना मतलब बाहर और अपने भीतर हर रोज कई चीजों के बार-बार रिपीट होने से ऊब गए हैं और कुछ समझ नहीं पा रहे हैं तो फिर आपको बिल्कुल पढ़ना चाहिए और जानना भी चाहिए। और इसके लिए युवावस्था सबसे अच्छी उम्र है। जो लोग ये सोचते हैं कि अध्यात्म वृद्धावस्था के लिए हैं उन्हें यही कहना है कि जब 60-70 वर्ष की उम्र में आकर भी दम्पत्तियों को छोटी-छोटी बातों के लिए हर रोज झगड़ते हुए देखती हूँ, बढ़े हुए चिड़चिड़ेपन, लालच, संग्रह प्रवृत्ति, ईर्ष्या, द्वेष, मोह, अति नकारात्मकता आदि के साथ देखती हूँ तो फिर यही लगता है कि अगर अध्यात्म का जीवन में पहले प्रवेश हुआ होता तो दृश्य कुछ और हो सकता था।

जहाँ तक क्या पढ़ें का सवाल है तो मूल धर्म ग्रंथों और धर्म शास्त्रों को शुरुआत में दूर रखा जाना चाहिए। अर्थ का अनर्थ होने की बहुत संभावनाएं हैं। आप कुछ अच्छे आध्यात्मिक गुरुओं को पढ़िए और जो उपलब्ध हैं उनसे सम्पर्क कीजिये। ओशो, आचार्य प्रशांत, कृष्णमूर्ति, सद्गुरु जग्गी वासुदेव...और भी होंगे। इन गुरुओं के ब्लॉग्स् से इतर ओशो की महावीर वाणी और हरमन हेस की सिदार्थ...ये किताबें मुझे बहुत अच्छी लगी। और भी कई सारी किताबें हैं, वे आपको अपनी अनुकूलता के अनुरूप चुननी होगी। इन गुरुओं को पढ़ते समय भी सावधानी की बहुत जरुरत है। क्योंकि हर गुरु कितनी भी सावधानी बरते लेकिन अपने स्तर से ही बात कर सकता है। ऐसे में आपको बहुत सारी विरोधाभासी बातें मिलेगी। वहां उचित सन्दर्भ और उद्देश्य को समझ पाने का स्तर हममें होना जरुरी है। कई बार ऐसी बातें इसलिए भी होती हैं क्योंकि अध्यात्म आपकी सभी धारणाओं को ध्वस्त करना चाहता है और आपको अनेकांत दृष्टि देना चाहता है, क्योंकि अध्यात्म की मंजिल ही सम्पूर्ण स्वीकार (सबसे प्रेम) है। ऐसे में पूर्वाग्रह पालने से बेहतर है मन में जो भी प्रश्न हो वह सम्बंधित उचित व्यक्ति से पूछ लिया जाए। किसी भी गुरु पर अंधश्रद्धा या अन्धविश्वास उचित नहीं, जिज्ञासाएं जरुरी हैं।

किसी को यह सोचकर डरने या घबराने की जरुरत नहीं है कि हमको सन्यासी बनना पड़ जाएगा। सन्यास इतनी आसानी से घटित होने वाली घटना नहीं है। वेश बदल लेने से भी यह घटित नहीं होता। बहुत समझ के साथ पढ़ने का परिणाम भी अक्सर बस इतना सा ही होता है कि आप पूरा नियंत्रण तो हासिल नहीं कर पाते लेकिन अपनी गलतियों और कमियों को जानने और पहचानने जरुर लग जाते हैं। थोड़ी सजगता और जागरूकता आ जाती है, कट्टरता कम हो जाती है, मुश्किलों का सामना करने का हौंसला आ जाता है और शुद्ध प्रेम को समझने लगते हैं।

इसके अलावा एक बहुत जरुरी बात - ओशो, सद्गुरु, आचार्य प्रशांत...ये वे व्यक्तित्व हैं जिनसे सीखने और समझने को बहुत कुछ मिला है तो एक कृतज्ञता की भावना का होना स्वाभाविक है। कल को अगर कोई पूरे गवाह और सबूतों के साथ इन्हें फ्रॉड सिद्ध कर दे या बिना कुछ जाने ही इनके लिए कुछ भी कहे तो भावनाएं आहत नहीं होगी। क्योंकि आप सिर्फ नाम को देख रहे हैं जबकि प्रेम, समझ और सत्य का नाम से कोई लेना देना नहीं है। सीखा कहीं से भी जा सकता है। हाँ, जो कोई ढोंगी हो इनमें से तो उसका सच जल्द से जल्द सामने आना ही चाहिए और उचित सजा भी मिलनी ही चाहिए।

बाकी बुद्ध और महावीर को देखें तो सदियाँ लगती है तब कोई प्रेम (सत्य) का असल मतलब समझ पाता है और दुनिया में असल बदलाव लाता है। विडम्बना यह है कि जिसे वास्तव में प्रेम का मतलब समझ आता है उसे 90% लोग नहीं समझ पाते। और सबसे अच्छी बात यह है कि किसी के द्वारा न समझे जाने पर भी (बल्कि अतीत में समाज कभी-कभी क्रूरतम रहा है ऐसे लोगों के प्रति) उन्हें सिर्फ प्रेम ही समझ आता है।

बाकी अगर अपने जीवन में कोई कुछ वाकई बाँट सकता है या कुछ भी बांटने योग्य है तो वह सत्य ही है। इससे इतर सब कुछ सिर्फ व्यापार (लेन-देन)! हाँ, बस व्यापार में शुद्धता की मात्रता बदलती जाती है। कोई क्या है और क्या नहीं, मानता है या नहीं मानता, पा चुका या नहीं पाया...ऐसी किसी भी बात से सत्य कभी नहीं बदलता, यही सत्य की खूबसूरती है और कोई कितना भी कर ले सत्य विचारों के दायरे में नहीं आ पायेगा, यही सत्य की विशालता। विचार सिर्फ समझ और बोध के बढ़ने में सहायक बनते हैं वे स्वयं सत्य नहीं होते।

Monika Jain ‘पंछी’
(04/03/2017)

April 8, 2017

Self Improvement Quotes in Hindi

Self Improvement Quotes

  • 08/04/2017 - दुनिया को बदलने के घोर उद्देश्य या घोषणा के साथ मैं कुछ भी नहीं करना चाहती। बातें और कर्म हमारे बोध, जागरूकता और स्पष्टता से निकलने चाहिए, कट्टरता की भावना से नहीं। इसके अलावा मेरे लिए सबसे अधिक जरुरी है यह देख और समझ पाना कि अभी इस क्षण मैं जिस भी व्यक्ति, वस्तु या प्राणी से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हूँ, संपर्क में हूँ, उसके साथ मेरा सम्बन्ध कैसा है? निश्चित रूप से यह सम्बन्ध मन, भावना, शरीर हर तल पर स्वस्थ होना चाहिए। जिस दिन से यह जागरूकता मैं हर क्षण कायम रख पायी, उस दिन से जीवन वाकई जीवन हो जाएगा। और कुछ भी सोचने की जरुरत है ही कहाँ? और कुछ सोचकर कुछ हो भी कैसे सकता है?
  • 05/03/2017 - सम्राट अशोक, अंगुलिमाल, वाल्मीकि, तीर्थंकर नेमिनाथ...इतिहास में ऐसे सैकड़ों किस्से मिल जाते हैं जहाँ एक घटना मात्र किसी के जीवन और ह्रदय को पूरी तरह परिवर्तित कर देती है।...मतलब सीधे छलांग। नेमिनाथ अपनी शादी में भोजन के लिए बाड़े में बंद किये गए पशुओं की चीत्कार सुनकर शादी ही कैंसिल कर देते हैं और सारा जमा कोष दान करके सीधे पर्वत पर पहुँच जाते हैं। अंगुलिमाल जो अँगुलियों की माला पहनता था, वह गौतम बुद्ध के कहने मात्र से रुक जाता है। वाल्मीकि परिवार से पूछे गए एक प्रश्न का उत्तर मिलने मात्र से डकैती छोड़ देते हैं। सम्राट अशोक को एक युद्ध बदल देता है। बस ये आजकल ही ह्रदय का मटेरियल बदल गया है क्या? किसी कलयुगी नेता या क्रिमिनल के बारे में ऐसी कोई कहानी सुनने की बहुत इच्छा हो रही है। कोई तो होगी ही?
  • 05/10/2016 - पुरानी कंडीशनिंग से बाहर निकलना जितना जरुरी है, उतना ही जरुरी है नयी कंडीशनिंग से बचे रहना। 
  • 18/09/2016 - समष्टि के दृष्टिकोण से देखें तो कोई भी सुधार सबसे पहले वहीं लागू होना चाहिए जहाँ उससे सम्बद्ध बुराई अपने शीर्ष पर है। लेकिन समस्या यह है कि बुराई के चरम पर इंसान अक्सर इतना ढीठ और जड़ होता है कि उसके कानों जू तक नहीं रेंगती। दूसरी ओर व्यष्टि दृष्टिकोण से जो लोग पहले से अच्छे होते हैं, उनकी संवेदनशीलता उन्हें और सुधार को प्रेरित करती है। खैर! आत्म सुधार की तो कोई सीमा होती ही नहीं। जितना हो उतना ही अच्छा है।...और सीमा हो तो भी वह शायद मुक्त होना ही होता है। ऐसे में भले ही एक क्षण को खाईयाँ बनती नज़र आये...लेकिन शायद यह भी प्रकृति के संतुलन का एक तरीका ही है।
  • 15/09/2016 - बहुत मतलबी हो गयी हूँ मैं! अक्सर खुद समझकर खुद के लिए ही लिख देती हूँ मैं।
  • 27/08/2015 - कोई भी प्रथा, कोई भी नियम, कोई भी कानून कितने भी अच्छे उद्देश्य से बनाया जाए मनुष्य उसका दुरूपयोग ढूंढ ही लेता है। यह हमेशा से होता रहा है, यह हमेशा होता रहेगा। क्योंकि सारी बीमारियाँ भीतर की है, अब यह भीतर चाहे किसी का भी हो। बाहर समाधान कभी मिलेंगे, मुश्किल लगता है। सिर्फ शोषण का चाबुक एक हाथ से दूसरे, दूसरे से तीसरे और तीसरे से चौथे में घूमता रहेगा।
  • 19/05/2015 - कुछ क्रूरताओं पर शब्द गुम हो जाते हैं...ठहर कर सोचना जरुरी है शायद इसलिए। शर्मिंदा होना समाधान नहीं है। क्योंकि जिस समाज का हिस्सा हैं हम उस पर कुछ नियंत्रण तो हमारा भी है। हम अपने हिस्से के शर्मिंदा न हो उतना भी काफी होगा न! 
  • कई बार मैंने पढ़ा है कि दूसरों के लिए खुद को नहीं बदलना चाहिए। मुझे समझ नहीं आता कि अगर बदलाव जरुरी हो और अच्छे के लिए हो तो खुद को बदलने में बुरा क्या है? हम पत्थर नहीं है जीवित हैं, इसलिए अच्छे बदलाव के लिए हमें हमेशा तैयार रहना चाहिए। क्योंकि सच तो यह है कि हम सिर्फ खुद को बदल सकते है दूसरों को नहीं। 
  • शब्दों, वाक्यों, घटनाओं, संदेशों, शिक्षाओं, जीवन, मृत्यु, हर चीज के जब सही और गहरे अर्थ समझ में आने लगते हैं तो व्यक्ति खुद-ब-खुद ही बदलने लगता है। बाकी लोग बस इन्हें सतही तौर पर पकड़े हुए दूसरों को बदलने की कोशिश में लगे रहते है।
  • किसी भी अच्छे भले व्यक्तित्व का नाम लो तो कुछ लोगों का सबसे पहला काम उसके जाति, धर्म, संप्रदाय, क्षेत्र की खबर लेना रहेगा। इनमें कुछ अनुकूल न मिला तो कुछ लोग आलोचना के बहाने खोजने लगेंगे और कुछ विरले लोग इन सबसे बेखबर उस व्यक्तित्व के गुणों की ओर आकृष्ट होंगे। यह पूरी तरह से हमारी चेतना के स्तर और ग्राह्यता पर निर्भर करता है कि हम किसी बेहतर व्यक्तित्व में अपने स्वार्थ और अहंकार को पोषित करने वाले तत्व खोजते हैं या फिर आत्म सुधार और आत्म विकास का मार्ग प्रशस्त करने वाले तत्व। 
  • धर्म/अध्यात्म मूल रूप से आत्म सुधार के लिए होते हैं, समाज सुधार के लिए नहीं। हाँ, आत्म सुधार जरुर समाज सुधार का मार्ग प्रशस्त करता है। 
  • दूसरों की नजरों में अच्छा बनने की चाह रखने से पहले हमें खुद की नजरों में अच्छा बनना चाहिए। 
  • पलायन की भी बड़ी विचित्र परिभाषा है लोगों के जेहन में। खैर! मुझे लगता है, बाहर के शत्रुओं को पराजित करने वाला फिर भी पलायनवादी हो सकता है, लेकिन भीतरी शत्रुओं को पराजित करने वाला कदापि नहीं!
  • स्वयं पर विजय का आनंद सिर्फ वही समझ सकता है जो इस पर ध्यान देना शुरू करता है और इस दिशा में आगे बढ़ना भी। सिर्फ वही महसूस कर सकता है कि इस विजय के सामने दुनिया-जहाँ की हर विजय तुच्छ है। 
  • मनुष्यों द्वारा तो सिर्फ कानून/नैतिक व्यवस्था हो सकती है न्याय नहीं। असल न्याय तो प्रकृति के हिस्से ही है और उसी के हिस्से रहेगा। एक सीमाहीन, आत्मानुशासित विश्व निसंदेह एक श्रेष्ठतम कल्पना है। यह कल्पना मुझे भी बेहद पसंद है। लेकिन एक सच यह भी है कि यह आदर्श व्यक्तिगत स्तर पर संभव हो सकता है...समूह पर लागू नहीं किया जा सकता। क्योंकि जहाँ-जहाँ लागू करने की बात आई वहां आत्म-अनुशासन रहा ही कैसे? यह तो चेतना के स्तर का विषय है, जिसे एक जैसा कोई कैसे बना सकता है? व्यक्तिगत रूप से सभी को एक जैसा अनुभूत करना निसंदेह संभव है...लेकिन इसे सभी अनुभव करे ही करे यह उद्देश्य लेकर चलना उस आदर्श विश्व के सिद्धांत का ही खंडन है। इसलिए समूह के हाथ में व्यवस्था है एक देश के रूप में, एक समाज के रूप में, कानून के रूप में... बाकी का काम हर एक व्यक्ति को अपने स्तर पर करना है - नैतिकता की बजाय अपनी चेतना को निखारने का काम, जिसमें सहयोगी निसंदेह हम सब लोग हो सकते हैं। 

Monika Jain ‘पंछी’

April 6, 2017

How to Show HTML Codes, Javascripts in Hindi Blogger Posts

How to Show HTMl Codes, Javascripts in Blogger Posts for Hindi Blogs

  • Blogger Dashboard > Theme > Edit HTML पर जाइए। 
  • Theme/Template के Code Box के अंदर क्लिक कीजिये। अब Ctrl+F के द्वारा एक Search Box ओपन कीजिये। 
  • सर्च बॉक्स में यह कोड डालकर सर्च कीजिये : ]]></b:skin>
  • अब इस कोड लाइन के ऊपर की ओर नीचे दिया गया कोड पेस्ट कर दीजिये।
/*--Code View--------------*/
code {
color: #0000ff;
font: 108% &quot;Courier new&quot;,Courier,mono;
padding: 0 2px;
white-space: nowrap;
}
pre code {
-moz-box-shadow: 0 0 10px #DDDDDD;
background: repeat scroll 0 0 #FFFFFF;
border: 2px solid #CCCCCC;
clear: both;
color: #333333;
display: block;
font-size: 12px;
line-height: 15px;
margin: 10px auto 10px 30px;
overflow: auto;
padding: 15px;
white-space: pre;
width: 85% !important;
word-wrap: break-word;
}
code .comment {
color: #888;
}
code .class, code .rules {
color: #ff00ff;
font-size: 100%;
}
code .value,  code .title, code .string {
color: #0000FF;
}
code .tag {
color: #0000ff;
}
code .keyword {
color: #0000ff;
}
.html .attribute {
color: #006600;
}
  • अब Save Theme पर क्लिक कर दीजिये।
  • किसी भी Blogger Post  में कोई भी HTML Code Show करने के लिए सबसे पहले उसे Encode/Parse करना होगा। इसके लिए आप नीचे दिए गए टूल का प्रयोग कर सकते हैं। 

 
 
  • अब इस टूल से जो Code का जो Encoded Form प्राप्त होगा, उसे Blog Post के HTML Mode में जाकर <pre> <code> (यहाँ) </pre></code> के बीच में Paste कर दीजिये। 
  • इस तरह आप किसी भी HTML/Javascript Code को अपनी Blog Posts में एक Code Box में उचित तरीके से दिखा सकते हैं। 

March 28, 2017

How to Add Pages Tabs in Blogger on Hindi Blogs

How to Add Pages Tabs in Blogger on Hindi Blogs

    Add Page Widget or Tabs in Blogger
      • Blogger Dashboard > Layout पर जाईये।
      • Add a Gadget पर क्लिक कीजिये। 
      • अब जो Pages Gadget नज़र आ रहा है उसे Add कर लीजिये।


      Create New Pages in Blogger  
      • Blogger Dashboard > Pages > New Page पर जाइये। 
      • जैसे आप 'About Us' Page बनाना चाहते हैं तो टाइटल और बॉडी में तुरंत About Us लिखकर एक बार पब्लिश कर दीजिये। यह Page Url बनाने के लिए है। जैसे : http://monikajainpanchhi.blogspot.com/p/about.html. जो भी शब्द आप /p/ के बाद चाहते हैं वे लिखकर Page बनाये। 
      • अब Edit ऑप्शन पर जाकर पेज में जो भी कंटेंट लिखना है वह लिखकर अपडेट कर दीजिये। 
      • इस तरह आप अलग-अलग कई Pages बना सकते हैं। 
       
      Set Up External Links as a Page
      • Blogger Dashboard > Layout  में Page Widget के Edit ऑप्शन पर क्लिक कीजिये। 
      • अब Add External Link पर क्लिक कीजिये। 
      How to Set Up External Links as a Page in Blogger
      • Page Title में जो भी आप Page का नाम रखना चाहें वह फिल कर दीजिये। 
      • Web Address (URL) में जो भी Link आप Add करना चाहते हैं उसका URL डाल दीजिये और Save Link पर क्लिक कर दीजिये।
      How to Add External Links as a Page in Blogger
      • Pages to Show में आप वे पेज select कर सकते हैं जिन्हें आप अपने Blog पर दिखाना चाहते हैं। और List Order में जिस भी क्रम में दिखाना चाहते हैं उस तरह से आर्डर कर दीजिये। 
      • अब Save पर क्लिक कर दीजिये। 
       
      How to Add Email Subscription or Subscribe Button as a Static Page 
      • External link add करने की प्रक्रिया बिल्कुल ऊपर की तरह ही है। 
      • Page Title में आप Subscribe लिख दीजिये और URL में आपको अपना Feed Address (नीचे चित्र में दिखाए अनुसार) देना है। बाकी सारी प्रक्रिया पूर्ववत है।
      How to Add Email Subscription or Subscribe Button as a Static Page

      March 26, 2017

      How to Transfer Domain from One Host to Another for Hindi Blogs

      How to Transfer Domain from One Host to Another for Hindi Blogs

      बीते दिनों HindiThoughts.Com का डोमेन Name.com से GoDaddy.com पर ट्रान्सफर किया। ट्रांसफर करने से पहले कुछ नहीं पता था कि कैसे क्या करना है। ब्लॉग कहीं गुम न हो जाए इसकी आशंका थी। पर आशंका को दरकिनार रखकर गूगल पर स्टेप्स पढ़े और ट्रांसफर कर दिया। स्टेप्स पूरे नहीं थे...जिसके चलते बहुत समस्या आई, दो दिन तक इन्टरनेट पर ब्लॉग गायब रहा। लेकिन अंतत: दिमाग ने साथ दिया और सब कुछ सही हो गया। सोचा यहाँ सरल शब्दों में प्रोसेस समझा दूँ ताकि भविष्य में किसी को ऐसी समस्या न आये।

      जब भी आप अपनी वेबसाइट या ब्लॉग का Domain Name किसी अन्य रजिस्ट्रार को ट्रान्सफर करें तो उससे पहले आपको कुछ बातें ध्यान में रखना जरुरी है : 
      • यदि आपने अभी-अभी ही अपना डोमेन रजिस्टर किया है या ट्रान्सफर किया है तो अगले 60 दिनों तक आप अपने Domain Name को ट्रान्सफर नहीं कर सकते हैं।
      • पिछले रजिस्ट्रार से Domain Issue की अवधि खत्म होने से लगभग 15-20 दिन पहले ही ट्रान्सफर की प्रक्रिया कर लेनी चाहिए। क्योंकि ट्रान्सफर पूरा होने में भी 8-10 दिन लग जाते हैं। 

      इन सब बातों के बाद डोमेन को ट्रान्सफर करने के लिए निम्न प्रक्रिया की जरुरत है। यहाँ मैं Name.Com और GoDaddy का उदहारण देकर समझा रही हूँ। सभी रजिस्ट्रार के साथ लगभग यही प्रक्रिया रहती है :
      How to Transfer Domain from One Host to Another for Hindi Blogs
      • सबसे पहले अपने वर्तमान रजिस्ट्रार (Name.Com) के अकाउंट में लॉग इन कीजिये। My Domain पर जाकर जिस डोमेन को आपको ट्रान्सफर करना है उस पर क्लिक कीजिये। Contact पर क्लिक करके अपने डोमेन के लिए जो Administrator’s Contact Information आपने दे रखी है उसे चेक कीजिये। ट्रान्सफर से सम्बंधित जो भी ईमेल आपको भेजे जायेंगे वे यहाँ लिखे ईमेल आई डी पर ही भेजे जायेंगे इसलिए अगर अपडेट करने की जरुरत हो तो कर लीजिये।
      • अब Details पर क्लिक कीजिये। यहाँ डोमेन के बारे में जो डिटेल्स दी गयी हैं उनमें से Unlock पर क्लिक कीजिये। यदि Whois Privacy द्वारा Protected Registration है तो उसे भी कैंसिल करना होगा। इसके बाद Show Code पर क्लिक कीजिये। जो कोड आता है उसे अपने पास कॉपी करके रख लीजिये। इसे Authorization Code, EPP Code या Transfer Key भी कहते हैं।
      • अब जिस नए रजिस्ट्रार पर आप अपना डोमेन ट्रान्सफर करना चाहते हैं उसके Domain Transfer पेज पर जाइए। जैसे GoDaddy में इस तरह से पेज होगा :
      How to Transfer Domain from Name.Com to GoDaddy
      • यहाँ पर अपना डोमेन नेम फिल करके खरीदने की प्रक्रिया पूरी कीजिये। 
      • आपके ईमेल आई डी पर कुछ समय पश्चात् Godaddy से कुछ ईमेल्स आयेंगे। जिनमे से एक में Transaction Id और Security Code दिया जाएगा। यह आपके ट्रान्सफर को Authorize करने के काम आएगा। 
      • आप अपने GoDaddy (नए रजिस्ट्रार) के अकाउंट में लॉग इन कीजिये। 
      • Domains > Manage पर क्लिक करिए। अब Domain Menu से Transfer पर क्लिक कीजिये। 
      • यहाँ पर Transaction Id और Security Code फिल करना होगा । इसके बाद पुराने रजिस्ट्रार से जो Authorization Code आपने कॉपी करके रखा है अपने पास वह यहाँ पर फिल कर दीजिये। जरुरी स्टेप्स पूरे करने के बाद Finish पर क्लिक कर दीजिये। इसके बाद आपको इस तरह से स्टेटस दिखाई देगा। यहीं पर आप प्रोसेस की प्रोग्रेस चेक करते रहिये। 8-10 दिन में यह पूरी हो जायेगी। 
      How to Transfer Domain from Name.Com to GoDaddy in Hindi

      प्रोसेस के पूरा होते ही आपको कुछ और सेटिंग्स करनी होगी : 

      DNS (Domain Name System) Settings for Blogger Domains
      • आप अपने GoDaddy (New Registrar) के अकाउंट में लॉग इन कीजिये। 
      • Manage My Domains > DNS > Manage Zones पर जाइए। 
      • अपना Domain Name डालकर सर्च कीजिये। 
      • अब नीचे दिए अनुसार  Records फिल कर दीजिये। 
       
      Creating CNAME, A, MX, NS Records for Custom Blogger Domains

      Creating CNAME, A, MX, NS Records for Custom Blogger Domains
      • बस अब कुछ ही देर में आपका Domain नए रजिस्ट्रार पर काम करने लगेगा।