June 16, 2017

Rice Vegetable Dhokli Recipe in Hindi

Rice Vegetable Dhokli Recipe in Hindi

चावल की ढोकली

कुछ दिनों से इडली, खम्मन, हांडवो..आदि से इतर भाप में पका हुआ कुछ नया बनाने/खोजने का मन कर रहा था। इसी दौरान चावल के आटे व सब्जियों के मिश्रण से इस डिश को ट्राई किया। खाने में अच्छी लगी इसलिए  आपके साथ भी रेसिपी शेयर कर रही हूँ। सबसे अच्छी बात यह है कि इसे बनाने के लिए प्री प्लानिंग की जरुरत नहीं है। चावल का आटा उपलब्ध हो तो जब भी इच्छा हो इसे तुरंत बना सकते हैं। इसके अलावा सब्जियां जो खासकर बच्चों को यूँ पसंद नहीं आती, उन्हें भी इस डिश के रूप में आराम से खाया जा सकता है। भाप में पके होने के कारण यह पौष्टिक भी है।

सामग्री :

कद्दूकस हरी शिमला मिर्च : ¼ कप

एकदम बारीक कटी हरी मिर्च या हरी मिर्च का पेस्ट : ¼ कप

कद्दूकस प्याज : ½ कप (वैकल्पिक)

कद्दूकस टमाटर : ½ कप

कद्दूकस अन्य सब्जियां : 1-1 कप ( यहाँ घर में उपलब्ध कद्दूकस की जा सकने वाली सब्जियां जैसे लौकी, टिंडे, आलू, कच्चा केला, गाजर, पत्ता गोभी...आदि में से दो या अधिक अपनी पसंद की सब्जियां ले सकते हैं। )

चावल का आटा : आवश्यकता अनुसार (अलग-अलग सब्जियां अलग-अलग मात्रा में पानी छोड़ती है, इसलिए उसी अनुरूप चावल का आटा मिलाने की जरुरत पड़ेगी।)

हल्दी : ¼ छोटा चम्मच

सौंफ का पाउडर : ½ छोटा चम्मच

नमक : स्वादानुसार

राई के दाने : ½ छोटा चम्मच

हींग : चुटकी भर

घी (पिघला हुआ) : ¼ से ½ कप के बीच ( जिन्हें घी से परहेज हो वे तेल भी इस्तेमाल कर सकते हैं। घी ढोकली को नर्म बनाने का काम करता है। मिश्रण की मात्रा के अनुसार इसकी मात्रा को कम-ज्यादा किया जा सकता है।)

विधि : सबसे पहले एक बर्तन में सभी कद्दूकस की हुई सब्जियां ले लें। अब इसमें नमक, सौंफ पाउडर और हल्दी मिलाकर अच्छी तरह से मिक्स कर लें। अब एक छोटी सी कड़ाई में घी लेकर उसे गर्म करें। घी में राई के दाने और हींग तड़काकर इसे सब्जी वाले मिश्रण में डाल दे और फिर से इसे मिक्स कर दें। अब चावल का आटा एक-एक बड़ा चम्मच करके इतनी मात्रा में डाले कि मिश्रण को अच्छी तरह से मिलाने के बाद उससे आराम से टिक्की (ढोकली) बन सके। मिश्रण को 5 मिनट के लिए ढककर रख दें। अब थोड़ा-थोड़ा मिश्रण हाथ में लेकर उसे लड्डू की तरह गोल-गोल बांधते हुए बीच में से दबाकर टिक्की का आकार दे दें। अब इडली या खम्मन के स्टैंड में नीचे पानी डालकर ऊपर जालीनुमा प्लेट रखकर सभी ढोकली उसमें रख दें। ऊपर से ढककर माध्यम आंच पर 15-20 मिनट तक पका लें। स्टैंड न होने पर एक पतीली में पानी लेकर, जालीनुमा प्लेट रखकर, ऊपर एक ऊंचे ढक्कन से ढककर भी इसे पकाया जा सकता है।

इसे दूध, चाय, लस्सी या छाछ के साथ यूँ ही नाश्ते के रूप में परोसा जा सकता है। हरी चटनी और टमाटर सॉस के साथ खाया जा सकता है। इसके अलावा हल्के डिनर के तौर पर करी या तुअर-मसूर की दाल के साथ भी खाया जा सकता है।

Monika Jain ‘पंछी’
(16/06/2017)

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June 14, 2017

Essay on Criticism in Hindi

ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर

13/06/2016 - वह जो सिर्फ असहमतियों के लिए प्रकट होता था।
वह जो सिर्फ आलोचना की गुंजाईश देखता था।
वह जो सिर्फ विरोध के अवसर ढूंढता था।
उसका विरोध विचारों से नहीं मुझसे था। बहरहाल आलोचनाएँ हँसा भी सकती है। :)

14/06/2017 - कोई जो आपके शब्द-शब्द, विचार-विचार, भाव-भाव, कर्म-कर्म को आलोचनात्मक दृष्टिकोण से पकड़ता है और फिर उनके आधार पर बुरे निष्कर्ष निकालता है, वह कुछ भी कर सकता है लेकिन आपसे प्रेम नहीं कर सकता। और यह भी तय है कि बहुत ज्यादा जजमेंटल बनने की प्रक्रिया में वह आपके विचारों, शब्दों या भावों के सही अर्थ तक भी नहीं पहुँच सकता, आपको समझना तो बहुत दूर की कोड़ी है।

जन्म से लेकर ही बहुत लम्बे समय तक (लगभग पूरे विद्यार्थी जीवन में) मैं बहुत अन्तर्मुखी और शर्मीली थी। बात करने की पहल नहीं कर पाती थी और बहुत ज्यादा बातें भी नहीं होती थी करने को। कुछ अपवाद थे इसमें भी। जो पहल कर लेते थे, उनमें से ही किसी के क्लोज हूँ या किसी के साथ बहुत सहज हूँ तो उससे कभी-कभी बहुत बातें हो जाती थी। और इसके अलावा पब्लिक स्पीकिंग में भी कभी दिक्कत नहीं आई। कई लोग मेरी प्रकृति समझ जाते थे और किसी ख़ास परिचय के बिना भी उनका स्नेह रहता था हमेशा। उन सभी को बहुत मासूम लगती थी। कुछ लोग यह भी मानते थे कि मैं पढ़ाई और अन्य गतिविधियों में अव्वल रहती हूँ, इसलिए बहुत घमंडी हूँ और इसलिए ही ज्यादा बात नहीं करती किसी से।

एक बार नयी स्कूल में मेरी पुरानी स्कूल से क्लास में कोई नहीं था और लड़कियों का एक बड़ा ग्रुप किसी कॉमन स्कूल से ही था, जो सभी पहले से दोस्त थे। उसी ग्रुप में कॉम्पीटिटर भी थी और उस पूरे ग्रुप के पूर्वाग्रह थे मेरे प्रति। और कभी-कभी उनमें से कुछ बेवजह मुझे परेशान करते थे, छेड़ते थे।...और तब मुझे विरोध करना नहीं आता था। ज्यादा से ज्यादा उसके प्रति बस उदासीन हो जाती थी। सिटिंग अरेंजमेंट बदलने के दौरान उसी ग्रुप में से किसी के साथ बैठना हुआ। कुछ ही दिनों में दोस्ती हुई, जो तमाम असमानताओं के बावजूद भी; स्कूल, कॉलेज, शहर...सब बदलने के बावजूद भी; सालों साल गहरी से गहरी होती रही और इस बीच कभी उसने ही बताया था कि वह मुझसे परिचय से पहले मेरे बारे में बहुत गलत सोचती थी, मुझे बहुत घमंडी समझती थी। यह बात जीवन के अलग-अलग समय में कुछ और लोगों ने भी कही है। हम किसी को भी नापसंद न रहें, यह तो संभव है ही नहीं। लेकिन जो लोग किसी पूर्वाग्रह या ग़लतफ़हमी के तहत नापसंद करते हैं, बिना किसी ठोस वजह के नापसंद करते हैं, वे समझ पाए इसके लिए तो उन्हें बहुत बातें करनी होगी, निकट आना होगा, साथ में समय गुजारना होगा...और समस्या यह है कि वर्तमान में मैं एक ओर तो कुछ बहुत गंभीर वजहों से और दूसरी ओर अनासक्ति की वजह से किसी से बहुत ज्यादा परिचय बढ़ा नहीं पाती। ना काहूँ से दोस्ती, ना काहूँ से बैर वाला मामला हो रहा है। :)

खैर! मेरे लिए प्रेम न तो सामान्य परिचय का और न ही किसी प्रगाढ़ परिचय का मोहताज है। परिचित हैं तो भी अच्छा, नहीं है तो भी अच्छा। इसके अलावा कोई हमें बहुत अच्छा समझे तब भी कुछ (कम/ज्यादा) कमियां तो हम सभी में होती ही है। जो प्रेम करते हैं वे कमियों के साथ स्वीकार कर लेते हैं। जरुरी बातें बताते भी हैं, गलतियों पर टोकते भी हैं और प्रेम में ही अच्छे बदलाव भी ले आते हैं। लेकिन जो मन ही मन द्वेष रखते हैं, उनका उद्देश्य सिर्फ कमियां खोजना ही होता है। ऐसे में कुछ अच्छा हो तो वे उसमें भी कमी निकाल लेंगे। वे जो कर रहे होते हैं इस बात का उन्हें भी पता नहीं होता है। पता होने के लिए, प्रेम होने के लिए...खुद को निष्पक्षता से देखने की जरुरत है। पूर्वाग्रहों को छोड़ने की जरुरत है। अपनी कोई प्रच्छन्न अपेक्षा या कुंठा है तो उसे देखने की जरुरत है। कोई नाराजगी है, ग़लतफ़हमी है तो बात करके दूर करने की जरुरत है। बाकी यह सामने वाले से अधिक सिर्फ खुद को पीड़ा देते रहना है। नफ़रत/द्वेष/ईर्ष्या दूसरों पर असर बाद में करेगी, सबसे पहले तो यह इसी बात को दर्शाती है कि कुछ है जो हमारे साथ ही ठीक नहीं।

Monika Jain ‘पंछी’

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June 11, 2017

Essay on Caste System Discrimination in Hindi

श्रेणीकरण एक छलावा

11/06/2017 - एक बार ननिहाल गयी हुई थी। उन दिनों वहां पानी लाने के लिए हैंडपंप हुआ करते थे। उसके आसपास घूम रही थी मैं। गाँव की कुछ महिलाएं वहां पानी भर रही थी। मेरा नया चेहरा देखकर उत्सुकता से उन्होंने मुझसे वहां की स्थानीय भाषा में पूछा, 'का रे तू बाण्या (बनिया) की ह की?' मुझे यह शब्द इतना ज्यादा ख़तरनाक लगा कि मैंने तुरंत बड़ी सी ना में सर हिला दिया। फिर मेरे वहां से चल देने के दौरान वे थोड़े अचरच में बातें कर रही थी कि मैं मना क्यों कर रही हूँ। इसके कई सालों बाद तक भी मुझे इस शब्द का मतलब नहीं पता था। कुछ ही सालों पहले मुझे इसका अर्थ पता चला और मतलब पता चलने के बाद भी मुझे यह शब्द कभी पसंद नहीं आया। सिर्फ जैसे हमें कोई नाम पसंद नहीं होता, यही बात मुख्य रूप से मेरे साथ बनिया शब्द को लेकर भी थी। और अर्थ पता चलने के बाद आंशिक तौर पर इस शब्द का प्रयोग किसी पर किये जाने वाले कटाक्ष को लेकर भी।

गांधीजी को बनिया कहे जाने पर बनिया शब्द के पोस्टमार्टम के बाद आज वापस मुझे तो यही बात समझ में आई कि श्रेणीकरण कितना बड़ा छलावा है। देखा जाए तो दुनिया में हर एक प्राणी व्यापारी ही है। बस विचार, भावना और कर्म के आधार पर उसके स्तर अलग-अलग होते हैं और हम फिर उन्हें अच्छी-बुरी, उच्च-निम्न श्रेणी में डाल देते हैं। बाकी हर क्षण हमारा लेन-देन चलता है – श्वास के रूप में भी। कोई पति-पत्नी भी सामान्यत: एक दूसरे की पूजा करने के लिए नहीं बनता। वहां भी लेन-देन ही होता है। बस यहाँ पर लेन-देन को हम रिश्तों के रूप में सुंदर-सुंदर नाम दे देते हैं। कुछ बेहतर भावनाएं जुड़ जाती है इसलिए।

लेकिन जातियां बनाना हम इंसानों की फितरत है। हम हिन्दू (ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य, शुद्र), मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई नहीं बनायेंगे तो आस्तिक और नास्तिक बना देंगे; वामपंथ और दक्षिणपंथ बना देंगे; शिक्षित और अनपढ़ बना देंगे...and so on. हमने कई ऐसे मापदंड बना लिए है जो भेदभाव को पोषित करते हैं, किसी को बेहतर तो किसी को कमतर सिद्ध करते हैं। और जहाँ भी यह कम-ज्यादा आएगा वहां शोषण होगा ही। सारी समस्यायों की जड़ हमारी सोच में है, जिस पर कई कारकों का प्रभाव पड़ता है। हम जैसे वातावरण में रहेंगे वैसी ही हमारी सोच होगी। फेसबुक पर भी कई बुद्धिजीवी हैं जो हर बात में जाति, नस्ल, दलित-सवर्ण, ब्राह्मणवाद-अम्बेडकरवाद को घुसेड़ देते हैं। अपने पूरे स्कूल और कॉलेज जीवन में कभी भी किसी सहपाठी की जाति पर मेरा विशेष ध्यान नहीं गया। कई सरनेम पहली बार सुनते हैं और किसी के साथ लम्बा समय गुजर गया लेकिन यह पता करने की कभी उत्सुकता हुई ही नहीं कि वह किस श्रेणी में आता है। आज भी नहीं पता। लेकिन फेसबुक के समाज सुधारक और उद्धारक बहुत कुछ सिखा रहे हैं। जो खुद को जाति विरोधी दिखाते हैं वे भी जातिवाद को चरम पर पहुँचाने में मदद कर रहे हैं।

हम वाकई समाधान चाहते हैं तो बात प्यार, समझ और स्वस्थ विरोध से ही बनेगी, गन्दी राजनीति से तो बिल्कुल भी नहीं। इसलिए कूड़ा-करकट कम से कम परोसें। क्योंकि चेतन तौर पर न सही लेकिन अवचेतन तौर पर कौन-कौन सी चीजें भीतर प्रवेश कर जाती हैं, हमें पता भी नहीं चलता। ऐसे में प्रभावों से बचना वाकई एक बड़ी चुनौती है...सबसे बड़ी। बहुत कम लोग होते हैं जो अपने परिवेश से प्रभावित हुए बिना अपनी अलग सोच और दृष्टि बना पाते हैं। हमें बस उसी सोच और दृष्टि को विकसित करने की जरुरत है जो सम्यक हो, भेदभाव से रहित हो, मानव को सबसे पहले मानव समझे।

सांसारिक व्यवस्थाओं के लिए सुविधा के तौर पर श्रेणीकरण ठीक है, लेकिन किसी भी तरह के विभाजन को अपने डीएनए में रचा-बसा लेना और पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित करते जाना सिर्फ अपनी जड़ता को पोषण देना है। बाकी बनिया शब्द को छोड़िये...मुझे जैन शब्द से भी ज्यादा जुड़ाव नहीं, स्त्री शब्द से भी ज्यादा जुड़ाव नहीं, मनुष्य शब्द से भी ज्यादा जुड़ाव नहीं...इसलिए मैं कई बार प्राणी कहती हूँ...वैसे प्राणी शब्द से भी ज्यादा जुड़ाव नहीं। जुड़ाव के अन्य ढेर सारे क्षेत्र हैं, जिन्हें समझना और जानना बेहद जरुरी है। शब्द, प्रतीक और वर्ग जैसी चीजों से तो यह सबसे पहले छूट ही जाना चाहिए। प्रयास चालु आहे।

23/08/2015 - कुछ महापुरुषों को पढ़ना मन-मस्तिष्क में घटित होने वाली एक क्रांति के दौर से गुजरना है, जहाँ सब कुछ ध्वस्त होने लगता है। ऐसे तर्क जो हमारे सारे तर्कों को अतार्किक सिद्ध कर देते हैं। आदर्श के ऐसे स्तर जो हमारी सारी अच्छाईयों को बौना साबित कर देते हैं। ऐसी परिभाषाएं जो शब्दों के मायने ही बदल देती हैं। ऐसा ज्ञान जिसके सामने विकास की गाथा कहता सारा विज्ञान फेल नजर आता है। तब बरबस हंसी छूट पड़ती है हम लोगों की उन सब लड़ाईयों पर जिनमें एक आस्तिक, नास्तिक की फिक्र में मरा जा रहा है और एक नास्तिक, आस्तिक की। एक हिन्दू, मुसलमान को समझाने के पीछे पड़ा है और एक मुस्लिम, हिन्दू को। दुनिया का लगभग हर इंसान खुद को छोड़कर बाकी सबकी फिक्र में लगा है। जबकि जिन्हें अपनी फिक्र करना आ गया था वे तो सारे वाद, विभाजन और श्रेणियों से ही ऊपर उठ गए।

Monika Jain ‘पंछी’

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May 25, 2017

Poem on Save Earth in English

When Shimmer Turned Dark

Shimmering was the sky, sat I
Was glancing the sudden change in verge of high.

Suddenly!
Shimmer turned to black and dark
Clouds growled at me like some hungry shark.

Then I saw the crying earth
Which was expecting the end of birth.

Then I looked at the restless water
Sea was wild accompanied by breathtaking thunder.

The scene around me was scary and troublesome
I guessed some danger is about to come.

Then attracted sea again towards its condition
Now it was giant wave with great explosion.

I feared to see the height
Which was enough to drown a kite.

Then I looked towards sky to seek for mighty
I failed as a roof of water covered me.

Wave was approaching me and i was helpless
Then I realized it’s all we humans mess.

We disturb and harm mother nature
and expect her to stay calm and bear us butchers.

We seek birth and life from this earth
and selfishly forgot all its worth.

I was about to leave this world
It was then something I heard.

It was monotonous sound of nearby generator
Then I realized it was earth no water.

My eyes were wet with horror
A mingled feeling of relief and terror.

Though virtual but that scene taught me lesson of reality
We though humans but forgot humanity.

Just running after the wealth
Without thinking about nature's death.

Don’t dawdle, think briskly over the condition
Otherwise nature would think 100 times to grant us motion.
Nature would think 100 times to grant us motion.

Rishabh Goel
Kotdwar, Uttarakhand

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April 17, 2017

Anekantavada and Syadvada Theory of Jainism in Hindi

अनेकांतवाद व स्यादवाद का सिद्धांत

यूँ तो सभी की बातों में विरोधाभास होता ही है। क्योंकि हर बात का सन्दर्भ अलग होता है या कई बार चीजों को हम अज्ञान वश बहुत सीमित नजरिये से देख पाते हैं या स्वार्थ वश सीमित नजरिये से ही देखना चाहते हैं। लेकिन जाग्रत आत्माओं के उपदेश, अभिव्यक्तियाँ, सूत्र भी कई जगह बहुत विरोधाभासी नज़र आते हैं। तर्कशास्त्री उन्हें पागल, भ्रष्ट, और दोगले की उपाधि से नवाजते हैं। यूँ कोई पागल, दोगला या भ्रष्ट तो जाग्रत नहीं होता लेकिन जाग्रत व्यक्तियों का यह व्यवहार उनके छल से नहीं उनकी निश्चलता से निकलता है। उनका यह व्यवहार उनके अज्ञान से नहीं उनके ज्ञान से निकलता है, बाकी सन्दर्भ वाली बात तो है ही। वे नहीं चाहते कि हम किसी भी सहारे को पकड़कर बैठ जाएँ। फिर चाहे वह सहारा संसार हो या निर्वाण, राग हो या प्रेम, बंधन हो या मुक्ति। क्योंकि किसी भी सहारे को पकड़ना फिर से उलझ जाना है। सत्य है ही ऐसा कि वह शब्दों, विचारों या सहारों में समा ही नहीं सकता।

सिर्फ सत्य/प्रेम/ध्यान/समझ/जागरूकता ही है जो समस्त विरोधाभासों को खुद में समाहित कर सकते हैं। अगर ऐसा न होता तो अदृश्य जीवों के अस्तित्व में बाधा न बनने हेतु साँसों की भी मात्रा ध्यान में रखने वाले महावीर अनेंकांतवाद का सिद्धांत नहीं देते। कृष्ण जिन्होंने एक ओर भक्तियोग, ज्ञानयोग को मार्ग बताया वहीँ दूसरी ओर कर्मयोग को मार्ग बताकर अर्जुन द्वारा उस क्षण अपने कर्तव्य का पालन करने हेतु युद्ध का समर्थन न करते। शिव तो सभी विरोधाभासों को अपने में समाहित किये हुए ही हैं।

जिसने कभी विरोधाभासों की एकरूपता और मूल प्रकृति पर विचार किया ही नहीं, व्यष्टि और समष्टि दृष्टिकोण को समझा ही नहीं, सापेक्षता को नहीं जाना वह यह कैसे समझेगा कि किसी क्षण अपने अहंकार, सुरक्षा और स्वार्थ को ताक में रखकर किसी कीड़े के अस्तित्व को स्वीकार कर लेने में भी उसी निर्भयता की आवश्यकता है, जिस निर्भयता की आवश्यकता अपने प्राणों की परवाह किये बगैर किसी आतातायी से भिड़ जाने के लिए है। सही और गलत पूर्व निर्धारित नहीं हो सकते। भाषा, अभिव्यक्तियाँ, शब्द सबकी सीमायें हैं। वे सिर्फ संकेत हैं। बाकी किसी क्षण विशेष का सही और गलत सिर्फ वह क्षण और उस समय की जागरूकता और समझ ही (पूर्वाग्रह नहीं) निर्धारित कर सकती है, और कुछ नहीं। यह समूचा ब्रह्माण्ड ही विरोधाभासों पर टिका है। विरोधाभास न होते तो इसका अस्तित्व भी न होता। इन विरोधाभासों का मूल ही तो परम तत्व कहा जाता है जिसमें सब समाहित है या जो सबसे परे है।

सापेक्षता और सन्दर्भ के वजह से ही जैन दर्शन का एक बहुत प्रचलित सिद्धांत है - अनेकान्तवाद और स्यादवाद, जिसे आज हम सापेक्षता का सिद्धांत (Theory of Relativity) कहते हैं। अनेकांत का मतलब किसी भी बात को उसके सभी संभव दृष्टिकोणों से देखना और समझना है। स्यादवाद में सूक्ष्म मानसिक अहिंसा से बचने के लिए कई बार अपने वाक्यांशों के साथ ‘शायद’ शब्द का प्रयोग किया जाता है। यह कोई अनिश्चितता नहीं होती। यह बस अपने शब्दों को आग्रह (जोर) से मुक्त करना है। क्योंकि हर बात आंशिक सत्य ही होती है। वरना वह बात के रूप में हो नहीं सकती। अपनी साधना के दौरान सापेक्षता की वजह से होने वाली मानसिक/शाब्दिक हिंसा और आग्रह से बचने के लिए महावीर बारह वर्ष तक मौन रहे। कभी- कभी वे जब किसी के प्रश्न का उत्तर देते थे तब भी शायद हाँ और शायद नहीं का प्रयोग करते हुए सात तरह से समझाते थे जिसमें संभावित सभी दृष्टिकोण शामिल हो जाए। अपने मौन और बहुत सूक्ष्म स्तर पर अहिंसा को जीने की वजह से वे लोकप्रिय नहीं हुए। इसके अलावा यज्ञों में होने वाली बलि, हिंसा और आडम्बरों के बिल्कुल विपरीत चलने की वजह से उनका नाम ही इतिहास से मिटाने की पूरी कोशिश की गयी और बहुत यातनाएं दी गयी। लेकिन वे बहुत विस्मित कर देने वाले और पूर्ण वैज्ञानिक सोच वाले व्यक्तित्व रहे हैं।

अनेकांत और स्यादवाद को जो हम समझ लें तो शब्दों, विचारों, भावों और तर्कों को उतना ही महत्व देंगे जितना दिए जाने की जरुरत है। लेकिन हर विचार या भाव आंशिक सत्य है इसका तात्पर्य यह नहीं है कि सभी विचारों और भावों में सत्य और असत्य की मात्रा समान है। ज्यों-ज्यों विचार और भाव परिष्कृत होते जाते हैं उनमें सत्य का अंश बढ़ता जाता है और एक दिन परिष्कृत होते-होते-होते-होते वे विलीन हो जाते हैं, तब अवश्य ही परम सत्य उद्घाटित होता होगा। होता होगा इसलिए क्योंकि परम मेरी स्थायी अनुभूति का विषय नहीं है लेकिन अपने जीवन में मिले कई संकेतों और क्षणिक अनुभूतियों की वजह से यह मेरी श्रद्धा का विषय अवश्य है। वह श्रद्धा जो किसी के द्वारा थोपी हुई नहीं है और न ही कंडीशनिंग से मिली है। वह श्रद्धा जो सहज रूप से उत्पन्न हुई है। वह श्रद्धा जो आहत नहीं होती। आहत हमारा अहंकार या विश्वास होता है श्रद्धा नहीं।

Monika Jain ‘पंछी’
(30/12/2016)

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April 16, 2017

What to Study or Books to Read for Spiritual Growth (in Hindi)

अध्यात्म में प्रवेश के लिए अध्ययन

कई बार कुछ नास्तिक और आस्तिक मित्रों द्वारा पूछा जाता है कि तत्व ज्ञान की बातें बहुत गूढ़ हैं, कहाँ से और किस किताब से शुरू करें? हालाँकि ऐसे प्रश्नों के पूरी तरह योग्य नहीं हूँ लेकिन अपनी छोटी सी समझ से यही कहना चाहूंगी कि धर्म या अध्यात्म में अतिभोग के समर्थक मस्तिष्क प्रवेश न करें। यह बहुत ज्यादा भोगी दिमाग का ही काम है जिसने धर्म में जादू-टोना, चमत्कार, तंत्र-यंत्र, स्वर्ग-नरक, देवी-देवता, अप्सराएँ, हूर जैसी व्यर्थ बातों को मान्यता दे दी है और जो मूल उद्देश्य है धर्म का वह बिल्कुल विलुप्त हो गया है। ऐसे मस्तिष्क ही आतंकवादी और कट्टर बनते और बनाते हैं। क्योंकि इनका भोग मृत्यु के परे तक पहुँच जाता है। इसके अलावा जो लोग दुनिया में बदलाव लाने के लिए कुछ ज्यादा ही कट्टर रूप से इच्छुक हैं वे भी इस उद्देश्य से इसमें प्रवेश न करें। अध्यात्म का सम्बन्ध मूल रूप से खुद में बदलाव से है।

अगर आप वाकई इस अस्तित्व के बारे में, अपने बारे में, सबके बारे में कुछ जानने के इच्छुक हैं; या आप अपने जीवन में शांति, प्रेम, स्वतंत्रता और साहस चाहते हैं; या प्रकृति का बहुत ज्यादा चक्रमयी होना मतलब बाहर और अपने भीतर हर रोज कई चीजों के बार-बार रिपीट होने से ऊब गए हैं और कुछ समझ नहीं पा रहे हैं तो फिर आपको बिल्कुल पढ़ना चाहिए और जानना भी चाहिए। और इसके लिए युवावस्था सबसे अच्छी उम्र है। जो लोग ये सोचते हैं कि अध्यात्म वृद्धावस्था के लिए हैं उन्हें यही कहना है कि जब 60-70 वर्ष की उम्र में आकर भी दम्पत्तियों को छोटी-छोटी बातों के लिए हर रोज झगड़ते हुए देखती हूँ, बढ़े हुए चिड़चिड़ेपन, लालच, संग्रह प्रवृत्ति, ईर्ष्या, द्वेष, मोह, अति नकारात्मकता आदि के साथ देखती हूँ तो फिर यही लगता है कि अगर अध्यात्म का जीवन में पहले प्रवेश हुआ होता तो दृश्य कुछ और हो सकता था।

जहाँ तक क्या पढ़ें का सवाल है तो मूल धर्म ग्रंथों और धर्म शास्त्रों को शुरुआत में दूर रखा जाना चाहिए। अर्थ का अनर्थ होने की बहुत संभावनाएं हैं। आप कुछ अच्छे आध्यात्मिक गुरुओं को पढ़िए और जो उपलब्ध हैं उनसे सम्पर्क कीजिये। ओशो, आचार्य प्रशांत, कृष्णमूर्ति, सद्गुरु जग्गी वासुदेव...और भी होंगे। इन गुरुओं के ब्लॉग्स् से इतर ओशो की महावीर वाणी और हरमन हेस की सिदार्थ...ये किताबें मुझे बहुत अच्छी लगी। और भी कई सारी किताबें हैं, वे आपको अपनी अनुकूलता के अनुरूप चुननी होगी। इन गुरुओं को पढ़ते समय भी सावधानी की बहुत जरुरत है। क्योंकि हर गुरु कितनी भी सावधानी बरते लेकिन अपने स्तर से ही बात कर सकता है। ऐसे में आपको बहुत सारी विरोधाभासी बातें मिलेगी। वहां उचित सन्दर्भ और उद्देश्य को समझ पाने का स्तर हममें होना जरुरी है। कई बार ऐसी बातें इसलिए भी होती हैं क्योंकि अध्यात्म आपकी सभी धारणाओं को ध्वस्त करना चाहता है और आपको अनेकांत दृष्टि देना चाहता है, क्योंकि अध्यात्म की मंजिल ही सम्पूर्ण स्वीकार (सबसे प्रेम) है। ऐसे में पूर्वाग्रह पालने से बेहतर है मन में जो भी प्रश्न हो वह सम्बंधित उचित व्यक्ति से पूछ लिया जाए। किसी भी गुरु पर अंधश्रद्धा या अन्धविश्वास उचित नहीं, जिज्ञासाएं जरुरी हैं।

किसी को यह सोचकर डरने या घबराने की जरुरत नहीं है कि हमको सन्यासी बनना पड़ जाएगा। सन्यास इतनी आसानी से घटित होने वाली घटना नहीं है। वेश बदल लेने से भी यह घटित नहीं होता। बहुत समझ के साथ पढ़ने का परिणाम भी अक्सर बस इतना सा ही होता है कि आप पूरा नियंत्रण तो हासिल नहीं कर पाते लेकिन अपनी गलतियों और कमियों को जानने और पहचानने जरुर लग जाते हैं। थोड़ी सजगता और जागरूकता आ जाती है, कट्टरता कम हो जाती है, मुश्किलों का सामना करने का हौंसला आ जाता है और शुद्ध प्रेम को समझने लगते हैं।

इसके अलावा एक बहुत जरुरी बात - महावीर, बुद्ध, ओशो, सद्गुरु, आचार्य प्रशांत...ये वे व्यक्तित्व हैं जिनसे सीखने और समझने को बहुत कुछ मिला है तो एक कृतज्ञता की भावना का होना स्वाभाविक है। कल को अगर कोई पूरे गवाह और सबूतों के साथ इन्हें फ्रॉड सिद्ध कर दे या बिना कुछ जाने ही इनके लिए कुछ भी कहे तो भावनाएं आहत नहीं होगी। क्योंकि आप सिर्फ नाम को देख रहे हैं जबकि प्रेम, समझ और सत्य का नाम से कोई लेना देना नहीं है। सीखा कहीं से भी जा सकता है।

इसके अलावा सदियाँ लगती है तब कोई प्रेम (सत्य) का असल मतलब समझ पाता है और दुनिया में असल बदलाव लाता है। विडम्बना यह है कि जिसे वास्तव में प्रेम का मतलब समझ आता है उसे 90% लोग नहीं समझ पाते। और सबसे अच्छी बात यह है कि किसी के द्वारा न समझे जाने पर भी (बल्कि समाज तो कई बार क्रूरतम रहा है ऐसे लोगों के प्रति) उन्हें सिर्फ प्रेम ही समझ आता है।

अगर अपने जीवन में कोई कुछ वाकई बाँट सकता है या कुछ भी बांटने योग्य है तो वह सत्य ही है। इससे इतर सब कुछ सिर्फ व्यापार (लेन-देन)! हाँ, बस व्यापार में शुद्धता की मात्रता बदलती जाती है। कोई क्या है और क्या नहीं, मानता है या नहीं मानता, पा चुका या नहीं पाया...ऐसी किसी भी बात से सत्य कभी नहीं बदलता, यही सत्य की खूबसूरती है और कोई कितना भी कर ले सत्य विचारों के दायरे में नहीं आ पायेगा, यही सत्य की विशालता। विचार सिर्फ समझ और बोध के बढ़ने में सहायक बनते हैं वे स्वयं सत्य नहीं होते।

Monika Jain ‘पंछी’
(04/03/2017)

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April 8, 2017

Self Improvement Quotes in Hindi

Self Improvement Quotes

  • 08/04/2017 - दुनिया को बदलने के घोर उद्देश्य या घोषणा के साथ मैं कुछ भी नहीं करना चाहती। बातें और कर्म हमारे बोध, जागरूकता और स्पष्टता से निकलने चाहिए, कट्टरता की भावना से नहीं। इसके अलावा मेरे लिए सबसे अधिक जरुरी है यह देख और समझ पाना कि अभी इस क्षण मैं जिस भी व्यक्ति, वस्तु या प्राणी से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हूँ, संपर्क में हूँ, उसके साथ मेरा सम्बन्ध कैसा है? निश्चित रूप से यह सम्बन्ध मन, भावना, शरीर हर तल पर स्वस्थ होना चाहिए। जिस दिन से यह जागरूकता मैं हर क्षण कायम रख पायी, उस दिन से जीवन वाकई जीवन हो जाएगा। और कुछ भी सोचने की जरुरत है ही कहाँ? और कुछ सोचकर कुछ हो भी कैसे सकता है?
  • 05/03/2017 - सम्राट अशोक, अंगुलिमाल, वाल्मीकि, तीर्थंकर नेमिनाथ...इतिहास में ऐसे सैकड़ों किस्से मिल जाते हैं जहाँ एक घटना मात्र किसी के जीवन और ह्रदय को पूरी तरह परिवर्तित कर देती है।...मतलब सीधे छलांग। नेमिनाथ अपनी शादी में भोजन के लिए बाड़े में बंद किये गए पशुओं की चीत्कार सुनकर शादी ही कैंसिल कर देते हैं और सारा जमा कोष दान करके सीधे पर्वत पर पहुँच जाते हैं। अंगुलिमाल जो अँगुलियों की माला पहनता था, वह गौतम बुद्ध के कहने मात्र से रुक जाता है। वाल्मीकि परिवार से पूछे गए एक प्रश्न का उत्तर मिलने मात्र से डकैती छोड़ देते हैं। सम्राट अशोक को एक युद्ध बदल देता है। बस ये आजकल ही ह्रदय का मटेरियल बदल गया है क्या? किसी कलयुगी नेता या क्रिमिनल के बारे में ऐसी कोई कहानी सुनने की बहुत इच्छा हो रही है। कोई तो होगी ही?
  • 05/10/2016 - पुरानी कंडीशनिंग से बाहर निकलना जितना जरुरी है, उतना ही जरुरी है नयी कंडीशनिंग से बचे रहना। 
  • 18/09/2016 - समष्टि के दृष्टिकोण से देखें तो कोई भी सुधार सबसे पहले वहीं लागू होना चाहिए जहाँ उससे सम्बद्ध बुराई अपने शीर्ष पर है। लेकिन समस्या यह है कि बुराई के चरम पर इंसान अक्सर इतना ढीठ और जड़ होता है कि उसके कानों जू तक नहीं रेंगती। दूसरी ओर व्यष्टि दृष्टिकोण से जो लोग पहले से अच्छे होते हैं, उनकी संवेदनशीलता उन्हें और सुधार को प्रेरित करती है। खैर! आत्म सुधार की तो कोई सीमा होती ही नहीं। जितना हो उतना ही अच्छा है।...और सीमा हो तो भी वह शायद मुक्त होना ही होता है। ऐसे में भले ही एक क्षण को खाईयाँ बनती नज़र आये...लेकिन शायद यह भी प्रकृति के संतुलन का एक तरीका ही है।
  • 15/09/2016 - बहुत मतलबी हो गयी हूँ मैं! अक्सर खुद समझकर खुद के लिए ही लिख देती हूँ मैं।
  • 27/08/2015 - कोई भी प्रथा, कोई भी नियम, कोई भी कानून कितने भी अच्छे उद्देश्य से बनाया जाए मनुष्य उसका दुरूपयोग ढूंढ ही लेता है। यह हमेशा से होता रहा है, यह हमेशा होता रहेगा। क्योंकि सारी बीमारियाँ भीतर की है, अब यह भीतर चाहे किसी का भी हो। बाहर समाधान कभी मिलेंगे, मुश्किल लगता है। सिर्फ शोषण का चाबुक एक हाथ से दूसरे, दूसरे से तीसरे और तीसरे से चौथे में घूमता रहेगा।
  • 19/05/2015 - कुछ क्रूरताओं पर शब्द गुम हो जाते हैं...ठहर कर सोचना जरुरी है शायद इसलिए। शर्मिंदा होना समाधान नहीं है। क्योंकि जिस समाज का हिस्सा हैं हम उस पर कुछ नियंत्रण तो हमारा भी है। हम अपने हिस्से के शर्मिंदा न हो उतना भी काफी होगा न! 
  • कई बार मैंने पढ़ा है कि दूसरों के लिए खुद को नहीं बदलना चाहिए। मुझे समझ नहीं आता कि अगर बदलाव जरुरी हो और अच्छे के लिए हो तो खुद को बदलने में बुरा क्या है? हम पत्थर नहीं है जीवित हैं, इसलिए अच्छे बदलाव के लिए हमें हमेशा तैयार रहना चाहिए। क्योंकि सच तो यह है कि हम सिर्फ खुद को बदल सकते है दूसरों को नहीं। 
  • शब्दों, वाक्यों, घटनाओं, संदेशों, शिक्षाओं, जीवन, मृत्यु, हर चीज के जब सही और गहरे अर्थ समझ में आने लगते हैं तो व्यक्ति खुद-ब-खुद ही बदलने लगता है। बाकी लोग बस इन्हें सतही तौर पर पकड़े हुए दूसरों को बदलने की कोशिश में लगे रहते है।
  • किसी भी अच्छे भले व्यक्तित्व का नाम लो तो कुछ लोगों का सबसे पहला काम उसके जाति, धर्म, संप्रदाय, क्षेत्र की खबर लेना रहेगा। इनमें कुछ अनुकूल न मिला तो कुछ लोग आलोचना के बहाने खोजने लगेंगे और कुछ विरले लोग इन सबसे बेखबर उस व्यक्तित्व के गुणों की ओर आकृष्ट होंगे। यह पूरी तरह से हमारी चेतना के स्तर और ग्राह्यता पर निर्भर करता है कि हम किसी बेहतर व्यक्तित्व में अपने स्वार्थ और अहंकार को पोषित करने वाले तत्व खोजते हैं या फिर आत्म सुधार और आत्म विकास का मार्ग प्रशस्त करने वाले तत्व। 
  • धर्म/अध्यात्म मूल रूप से आत्म सुधार के लिए होते हैं, समाज सुधार के लिए नहीं। हाँ, आत्म सुधार जरुर समाज सुधार का मार्ग प्रशस्त करता है। 
  • दूसरों की नजरों में अच्छा बनने की चाह रखने से पहले हमें खुद की नजरों में अच्छा बनना चाहिए। 
  • पलायन की भी बड़ी विचित्र परिभाषा है लोगों के जेहन में। खैर! मुझे लगता है, बाहर के शत्रुओं को पराजित करने वाला फिर भी पलायनवादी हो सकता है, लेकिन भीतरी शत्रुओं को पराजित करने वाला कदापि नहीं!
  • स्वयं पर विजय का आनंद सिर्फ वही समझ सकता है जो इस पर ध्यान देना शुरू करता है और इस दिशा में आगे बढ़ना भी। सिर्फ वही महसूस कर सकता है कि इस विजय के सामने दुनिया-जहाँ की हर विजय तुच्छ है। 
  • मनुष्यों द्वारा तो सिर्फ कानून/नैतिक व्यवस्था हो सकती है न्याय नहीं। असल न्याय तो प्रकृति के हिस्से ही है और उसी के हिस्से रहेगा। एक सीमाहीन, आत्मानुशासित विश्व निसंदेह एक श्रेष्ठतम कल्पना है। यह कल्पना मुझे भी बेहद पसंद है। लेकिन एक सच यह भी है कि यह आदर्श व्यक्तिगत स्तर पर संभव हो सकता है...समूह पर लागू नहीं किया जा सकता। क्योंकि जहाँ-जहाँ लागू करने की बात आई वहां आत्म-अनुशासन रहा ही कैसे? यह तो चेतना के स्तर का विषय है, जिसे एक जैसा कोई कैसे बना सकता है? व्यक्तिगत रूप से सभी को एक जैसा अनुभूत करना निसंदेह संभव है...लेकिन इसे सभी अनुभव करे ही करे यह उद्देश्य लेकर चलना उस आदर्श विश्व के सिद्धांत का ही खंडन है। इसलिए समूह के हाथ में व्यवस्था है एक देश के रूप में, एक समाज के रूप में, कानून के रूप में... बाकी का काम हर एक व्यक्ति को अपने स्तर पर करना है - नैतिकता की बजाय अपनी चेतना को निखारने का काम, जिसमें सहयोगी निसंदेह हम सब लोग हो सकते हैं। 

Monika Jain ‘पंछी’

Feel free to add your views about these hindi quotes on self improvement.

April 6, 2017

How to Show HTML Codes, Javascripts in Hindi Blogger Posts

How to Show HTMl Codes, Javascripts in Blogger Posts for Hindi Blogs

  • Blogger Dashboard > Theme > Edit HTML पर जाइए। 
  • Theme/Template के Code Box के अंदर क्लिक कीजिये। अब Ctrl+F के द्वारा एक Search Box ओपन कीजिये। 
  • सर्च बॉक्स में यह कोड डालकर सर्च कीजिये : ]]></b:skin>
  • अब इस कोड लाइन के ऊपर की ओर नीचे दिया गया कोड पेस्ट कर दीजिये।
/*--Code View--------------*/
code {
color: #0000ff;
font: 108% &quot;Courier new&quot;,Courier,mono;
padding: 0 2px;
white-space: nowrap;
}
pre code {
-moz-box-shadow: 0 0 10px #DDDDDD;
background: repeat scroll 0 0 #FFFFFF;
border: 2px solid #CCCCCC;
clear: both;
color: #333333;
display: block;
font-size: 12px;
line-height: 15px;
margin: 10px auto 10px 30px;
overflow: auto;
padding: 15px;
white-space: pre;
width: 85% !important;
word-wrap: break-word;
}
code .comment {
color: #888;
}
code .class, code .rules {
color: #ff00ff;
font-size: 100%;
}
code .value,  code .title, code .string {
color: #0000FF;
}
code .tag {
color: #0000ff;
}
code .keyword {
color: #0000ff;
}
.html .attribute {
color: #006600;
}
  • अब Save Theme पर क्लिक कर दीजिये।
  • किसी भी Blogger Post  में कोई भी HTML Code Show करने के लिए सबसे पहले उसे Encode/Parse करना होगा। इसके लिए आप नीचे दिए गए टूल का प्रयोग कर सकते हैं। 

 
 
  • अब इस टूल से जो Code का जो Encoded Form प्राप्त होगा, उसे Blog Post के HTML Mode में जाकर <pre> <code> (यहाँ) </pre></code> के बीच में Paste कर दीजिये। 
  • इस तरह आप किसी भी HTML/Javascript Code को अपनी Blog Posts में एक Code Box में उचित तरीके से दिखा सकते हैं। 
Feel free to add your queries regarding this post on showing HTML Codes and Javascripts in a proper way in a blogger post.

March 28, 2017

How to Add Pages Tabs in Blogger on Hindi Blogs

How to Add Pages Tabs in Blogger on Hindi Blogs

    Add Page Widget or Tabs in Blogger
      • Blogger Dashboard > Layout पर जाईये।
      • Add a Gadget पर क्लिक कीजिये। 
      • अब जो Pages Gadget नज़र आ रहा है उसे Add कर लीजिये।


      Create New Pages in Blogger  
      • Blogger Dashboard > Pages > New Page पर जाइये। 
      • जैसे आप 'About Us' Page बनाना चाहते हैं तो टाइटल और बॉडी में तुरंत About Us लिखकर एक बार पब्लिश कर दीजिये। यह Page Url बनाने के लिए है। जैसे : http://monikajainpanchhi.blogspot.com/p/about.html. जो भी शब्द आप /p/ के बाद चाहते हैं वे लिखकर Page बनाये। 
      • अब Edit ऑप्शन पर जाकर पेज में जो भी कंटेंट लिखना है वह लिखकर अपडेट कर दीजिये। 
      • इस तरह आप अलग-अलग कई Pages बना सकते हैं। 
       
      Set Up External Links as a Page
      • Blogger Dashboard > Layout  में Page Widget के Edit ऑप्शन पर क्लिक कीजिये। 
      • अब Add External Link पर क्लिक कीजिये। 
      How to Set Up External Links as a Page in Blogger
      • Page Title में जो भी आप Page का नाम रखना चाहें वह फिल कर दीजिये। 
      • Web Address (URL) में जो भी Link आप Add करना चाहते हैं उसका URL डाल दीजिये और Save Link पर क्लिक कर दीजिये।
      How to Add External Links as a Page in Blogger
      • Pages to Show में आप वे पेज select कर सकते हैं जिन्हें आप अपने Blog पर दिखाना चाहते हैं। और List Order में जिस भी क्रम में दिखाना चाहते हैं उस तरह से आर्डर कर दीजिये। 
      • अब Save पर क्लिक कर दीजिये। 
       
      How to Add Email Subscription or Subscribe Button as a Static Page 
      • External link add करने की प्रक्रिया बिल्कुल ऊपर की तरह ही है। 
      • Page Title में आप Subscribe लिख दीजिये और URL में आपको अपना Feed Address (नीचे चित्र में दिखाए अनुसार) देना है। बाकी सारी प्रक्रिया पूर्ववत है।
      How to Add Email Subscription or Subscribe Button as a Static Page
       
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      March 26, 2017

      How to Transfer Domain from One Host to Another for Hindi Blogs

      How to Transfer Domain from One Host to Another for Hindi Blogs

      बीते दिनों HindiThoughts.Com का डोमेन Name.com से GoDaddy.com पर ट्रान्सफर किया। ट्रांसफर करने से पहले कुछ नहीं पता था कि कैसे क्या करना है। ब्लॉग कहीं गुम न हो जाए इसकी आशंका थी। पर आशंका को दरकिनार रखकर गूगल पर स्टेप्स पढ़े और ट्रांसफर कर दिया। स्टेप्स पूरे नहीं थे...जिसके चलते बहुत समस्या आई, दो दिन तक इन्टरनेट पर ब्लॉग गायब रहा। लेकिन अंतत: दिमाग ने साथ दिया और सब कुछ सही हो गया। सोचा यहाँ सरल शब्दों में प्रोसेस समझा दूँ ताकि भविष्य में किसी को ऐसी समस्या न आये।

      जब भी आप अपनी वेबसाइट या ब्लॉग का Domain Name किसी अन्य रजिस्ट्रार को ट्रान्सफर करें तो उससे पहले आपको कुछ बातें ध्यान में रखना जरुरी है : 
      • यदि आपने अभी-अभी ही अपना डोमेन रजिस्टर किया है या ट्रान्सफर किया है तो अगले 60 दिनों तक आप अपने Domain Name को ट्रान्सफर नहीं कर सकते हैं।
      • पिछले रजिस्ट्रार से Domain Issue की अवधि खत्म होने से लगभग 15-20 दिन पहले ही ट्रान्सफर की प्रक्रिया कर लेनी चाहिए। क्योंकि ट्रान्सफर पूरा होने में भी 8-10 दिन लग जाते हैं। 

      इन सब बातों के बाद डोमेन को ट्रान्सफर करने के लिए निम्न प्रक्रिया की जरुरत है। यहाँ मैं Name.Com और GoDaddy का उदहारण देकर समझा रही हूँ। सभी रजिस्ट्रार के साथ लगभग यही प्रक्रिया रहती है :
      How to Transfer Domain from One Host to Another for Hindi Blogs
      • सबसे पहले अपने वर्तमान रजिस्ट्रार (Name.Com) के अकाउंट में लॉग इन कीजिये। My Domain पर जाकर जिस डोमेन को आपको ट्रान्सफर करना है उस पर क्लिक कीजिये। Contact पर क्लिक करके अपने डोमेन के लिए जो Administrator’s Contact Information आपने दे रखी है उसे चेक कीजिये। ट्रान्सफर से सम्बंधित जो भी ईमेल आपको भेजे जायेंगे वे यहाँ लिखे ईमेल आई डी पर ही भेजे जायेंगे इसलिए अगर अपडेट करने की जरुरत हो तो कर लीजिये।
      • अब Details पर क्लिक कीजिये। यहाँ डोमेन के बारे में जो डिटेल्स दी गयी हैं उनमें से Unlock पर क्लिक कीजिये। यदि Whois Privacy द्वारा Protected Registration है तो उसे भी कैंसिल करना होगा। इसके बाद Show Code पर क्लिक कीजिये। जो कोड आता है उसे अपने पास कॉपी करके रख लीजिये। इसे Authorization Code, EPP Code या Transfer Key भी कहते हैं।
      • अब जिस नए रजिस्ट्रार पर आप अपना डोमेन ट्रान्सफर करना चाहते हैं उसके Domain Transfer पेज पर जाइए। जैसे GoDaddy में इस तरह से पेज होगा :
      How to Transfer Domain from Name.Com to GoDaddy
      • यहाँ पर अपना डोमेन नेम फिल करके खरीदने की प्रक्रिया पूरी कीजिये। 
      • आपके ईमेल आई डी पर कुछ समय पश्चात् Godaddy से कुछ ईमेल्स आयेंगे। जिनमे से एक में Transaction Id और Security Code दिया जाएगा। यह आपके ट्रान्सफर को Authorize करने के काम आएगा। 
      • आप अपने GoDaddy (नए रजिस्ट्रार) के अकाउंट में लॉग इन कीजिये। 
      • Domains > Manage पर क्लिक करिए। अब Domain Menu से Transfer पर क्लिक कीजिये। 
      • यहाँ पर Transaction Id और Security Code फिल करना होगा । इसके बाद पुराने रजिस्ट्रार से जो Authorization Code आपने कॉपी करके रखा है अपने पास वह यहाँ पर फिल कर दीजिये। जरुरी स्टेप्स पूरे करने के बाद Finish पर क्लिक कर दीजिये। इसके बाद आपको इस तरह से स्टेटस दिखाई देगा। यहीं पर आप प्रोसेस की प्रोग्रेस चेक करते रहिये। 8-10 दिन में यह पूरी हो जायेगी। 
      How to Transfer Domain from Name.Com to GoDaddy in Hindi

      प्रोसेस के पूरा होते ही आपको कुछ और सेटिंग्स करनी होगी : 

      DNS (Domain Name System) Settings for Blogger Domains
      • आप अपने GoDaddy (New Registrar) के अकाउंट में लॉग इन कीजिये। 
      • Manage My Domains > DNS > Manage Zones पर जाइए। 
      • अपना Domain Name डालकर सर्च कीजिये। 
      • अब नीचे दिए अनुसार  Records फिल कर दीजिये। 
       
      Creating CNAME, A, MX, NS Records for Custom Blogger Domains

      Creating CNAME, A, MX, NS Records for Custom Blogger Domains
      • बस अब कुछ ही देर में आपका Domain नए रजिस्ट्रार पर काम करने लगेगा। 
       
      Feel free to add your queries regarding this post on Transferring Domain from One Host to Another and their DNS Settings.

      March 25, 2017

      Ayodhya Ram Temple and Babri Mosque Demolition Dispute Essay in Hindi

      रहने दो आसमां के नसीब में जमीं का टुकड़ा कोई

      अयोध्या मंदिर और बाबरी मस्जिद पर चल रहे विवाद पर कल एक पोस्ट की : सबसे अच्छा तो होता न मंदिर बनता न मस्जिद। इतनी सदियों से बना-बनाकर कौनसे तीर मार (नहीं उखाड़) लिए। :p

      कई आक्रामक प्रतिक्रियाएं आई इस पोस्ट पर। कई सारी को जिक्र करने योग्य नहीं पाती। लेकिन जिस तरह डराने की कोशिश की गयी तो सिर्फ आपकी ख़ुशी के लिए कह देती हूँ डर गयी मैं। :O अब तो बोलना ही पड़ेगा 'जय श्री राम!' और इससे पहले कि दूसरी पार्टी भी आ जाए 'या अल्लाह...' (आगे मुझे नहीं आता) भी कह देती हूँ। :)

      लोग कह रहे थे - जिनकी राम में आस्था नहीं वे जन्मभूमि के महत्व को नहीं समझते।...और मेरी भूमि में इतनी आस्था है कि मैं सोच रही थी भूमि ही रहने दो। :p

      लोग कह रहे थे - तरस खाता हूँ उन मूर्खों की बुद्धि पर जिन्हे अपने पुरखों व अपनी विरासत पर गर्व नही होता है।...हाँ मुझे गर्व तो नहीं लेकिन इस बात का सुकून जरुर है कि जिन-जिन महापुरुषों में मेरी श्रद्धा है उनके सारे मंदिर व मूर्तियाँ न रहे तब भी मुझे कोई फर्क पड़ेगा नहीं। यह बात भी उन महापुरुषों ने ही सिखाई है। खैर! पुरखों पर गर्व करने वाले भद्र जनों के बहुत अत्याचार और पत्थर तो उन्हें भी खाने पड़े, फिर मैं कौनसे खेत की मूली हूँ। और श्रद्धा गर्व के लिए नहीं होती, जिन पर श्रद्धा है उन्हें आत्मसात करने के लिए होती है। :)

      किसी ने यह भी पूछा ‘जैन’ शब्द भी तो आपको पूर्वजों से प्रतीक के रूप में ही मिला है। हाँ, ‘जैन’ शब्द रूप में एक प्रतीक ही है। लेकिन भाव रूप में मुझे यह प्रेरणा देता है। ‘जैन’ शब्द ‘जिन’ धातु से बना है, जिसका अर्थ है – जिन्होंने अपने आंतरिक शत्रुओं को जीत लिया है। फिर चाहे वे किसी भी पंथ के हों। वैसे जितने भी जैन तीर्थंकर हैं वे सभी क्षत्रीय ही रहे हैं। और उसके बाद भी जो बड़े-बड़े गुरु हुए हैं वे भी अधिकांशत: पूर्व में जैन परंपरा से नहीं रहे। दलित या पिछड़े वर्ग में जिन्हें शामिल किया जाता है वे भी गुरु रहे हैं।

      यूँ जैन धर्म के भी वर्तमान तथाकथित स्वरुप में मेरी कोई रूचि नहीं है और न ही बड़े नाम मेरी कोई पसंद है। बल्कि कई बार मैं सोचती हूँ ये फेसबुक एक शब्द में नाम लिखने की सुविधा क्यों नहीं देता? लेकिन ये तीन शब्द भी मुझे तीन आयामों से ही जोड़ते हैं। मोनिका, मनुष्य जगत से; जैन, मुक्त आत्माओं से; और पंछी, पशु जगत से। सभी को अपने नाम में ऐसे ही कुछ अर्थ मिल सकते हैं। क्योंकि शब्द तो सिर्फ शब्द है। हाँ, ध्वनि का महत्व होता है। लेकिन शब्दों को सांप्रदायिक या कोई भी और रंग हम ही देते हैं। तो शब्दों में कोई समस्या है नहीं, हमें बस इतना देखना है कि जिन प्रतीकों पर हम इतना जोर दे रहे हैं, उनके पीछे हमारे असल भाव क्या है? और यहाँ प्रतिक्रियाओं में जो भाव उजागर होते हैं उससे हर किसी की आस्था का असल चेहरा सामने आ जाता है।

      मंदिर विज्ञान जानने के लिए कहा गया तो मंदिर का विज्ञान मुझे पता है। प्राचीनकाल में मंदिर किसी पूजा-प्रार्थना के स्थल के रूप में नहीं बल्कि ध्यान और ऊर्जा के एक ऐसे केंद्र के रूप में बनाये जाते थे जहाँ जाकर भौतिकता हल्की हो सके। पूजा-प्रार्थना भी अगर वाकई प्रार्थना है सिर्फ याचना नहीं तो बहुत अच्छी ही चीज है। लेकिन आज देश भर में इतने मंदिर हैं फिर भी भौतिकता आसमान छू रही है। बल्कि अधिकांश मंदिर खुद भौतिकता, व्यापार और शोषण के गढ़ बने हुए हैं। बाकी शौक से सब कुछ की तरह बनाते रहिये मंदिर भी। आसमान को जिस दिन नीचे ताकने को जमीन का कोई भी टुकड़ा नसीब न होगा उस दिन वह खुद ही सब मिटा देगा।

      वैसी भी जिस देश में मंदिर, मस्जिद के आसपास भी न फटकने वाले महापुरुषों के भी ढेरों प्रतीक सिर्फ दिखावे के लिए बना दिए जाते हैं। उस देश में 'मंदिर-मस्जिद' के बारे में कुछ कहना मतलब...हे भूमि देवी! अब तुम ही मुझे शरण दो। ;)

      Monika Jain ‘पंछी’
      (23/03/2017)

      Feel free to add your views about this article on Ayodhya Temple and Babri Mosque Demolition Dispute and Communalism.

      March 24, 2017

      How to Add Related Posts Widget in Blogger for Hindi Blogs

      How to Add Related Posts Widget in Blogger for Hindi Blogs
      How to Add Related Posts Widget in Blogger for Hindi Blogs

      • Blogger Dashboard में Theme/Template > Edit HTML पर जाइये। 
      • Theme/Template के कोड बॉक्स में क्लिक कर Ctrl+F द्वारा सर्च बॉक्स ओपन कर </head> टैग सर्च कीजिये। 
      • अब नीचे दिया गया कोड इस टैग के ऊपर पेस्ट कर दीजिये।
      <!--Related Posts Scripts and Styles Start-->
      <style>
      #related-posts {
      float : left;
      width : 550px;
      margin-top:20px;
      margin-left : 0px;
      margin-bottom:20px;
      font : 14px Verdana;
      margin-bottom:10px;
      }
      
      #related-posts ul {
      border : medium none;
      margin : 10px;
      padding : 0;
      }
      </style>
      
      <script type='text/javascript'>
      //<![CDATA[
      var relatedTitles = new Arrayundefined);
      var relatedTitlesNum = 0;
      var relatedUrls = new Arrayundefined);
      function related_results_labelsundefinedjson) {
      for undefinedvar i = 0; i < json.feed.entry.length; i++) {
      var entry = json.feed.entry[i];
      relatedTitles[relatedTitlesNum] = entry.title.$t;
      for undefinedvar k = 0; k < entry.link.length; k++) {
      if undefinedentry.link[k].rel == 'alternate') {
      relatedUrls[relatedTitlesNum] = entry.link[k].href;
      relatedTitlesNum++;
      break;
      }
      }
      }
      }
      function removeRelatedDuplicatesundefined) {
      var tmp = new Arrayundefined0);
      var tmp2 = new Arrayundefined0);
      forundefinedvar i = 0; i < relatedUrls.length; i++) {
      ifundefined!containsundefinedtmp, relatedUrls[i])) {
      tmp.length += 1;
      tmp[tmp.length - 1] = relatedUrls[i];
      tmp2.length += 1;
      tmp2[tmp2.length - 1] = relatedTitles[i];
      }
      }
      relatedTitles = tmp2;
      relatedUrls = tmp;
      }
      function containsundefineda, e) {
      forundefinedvar j = 0; j < a.length; j++) if undefineda[j]==e) return true;
      return false;
      }
      function printRelatedLabelsundefined) {
      var r = Math.floorundefinedundefinedrelatedTitles.length - 1) * Math.randomundefined));
      var i = 0;
      document.writeundefined'<ul>');
      while undefinedi < relatedTitles.length && i < 20) {
      document.writeundefined'<li><a href="' + relatedUrls[r] + '">' + relatedTitles[r] + '</a></li>');
      if undefinedr < relatedTitles.length - 1) {
      r++;
      } else {
      r = 0;
      }
      i++;
      }
      document.writeundefined'</ul>');
      document.writeundefined);
      }
      //]]>
      
      </script>
      • अब Ctrl+F द्वारा खोले गए सर्च बॉक्स में <b:includable id='postQuickEdit' var='post'>  डालकर सर्च करिए। 
      •  इसके ऊपर </b:includable> नज़र आएगा। इस टैग के ऊपर नीचे दिया गया कोड पेस्ट कीजिये।
      <!-- Related Posts with Thumbnails Code Start-->
      <b:if cond='data:blog.pageType == &quot;item&quot;'>
      <div id='related-posts'>
      <font face='Arial' size='3'><b>Related Posts: </b></font><font color='#FFFFFF'><b:loop values='data:post.labels' var='label'><data:label.name/><b:if cond='data:label.isLast != &quot;true&quot;'>,</b:if><b:if cond='data:blog.pageType == &quot;item&quot;'>
      <script expr:src='&quot;/feeds/posts/default/-/&quot; + data:label.name + &quot;?alt=json-in-script&amp;callback=related_results_labels&amp;max-results=5&quot;' type='text/javascript'/></b:if></b:loop> </font>
      <script type='text/javascript'> removeRelatedDuplicatesundefined); printRelatedLabelsundefined);
      </script>
      </div>
      </b:if>
      <!-- Related Posts with Thumbnails Code End-->
      • अब Ctrl+F द्वारा सर्च बॉक्स में <b:if cond='data:top.showMobileShare'> डालकर सर्च कीजिये। 
      • इस कोड के नीचे स्क्रॉल करके 4th नंबर वाला </div> टैग तलाश करिए। 
      • अब इस चौथे </div> टैग के नीचे नीचे दिया गया कोड पेस्ट कर दीजिये।  
      <br>
          <div style='float:left;'>
          <!-- Related Posts with Thumbnails Code Start-->
          <b:if cond='data:blog.pageType == &quot;item&quot;'>
          <div id='related-posts'>
          <font face='Arial' size='3'><b>Related Posts: </b></font><font color='#FFFFFF'><b:loop values='data:post.labels' var='label'><data:label.name/><b:if cond='data:label.isLast != &quot;true&quot;'>,</b:if><b:if cond='data:blog.pageType == &quot;item&quot;'>
          <script expr:src='&quot;/feeds/posts/default/-/&quot; + data:label.name + &quot;?alt=json-in-script&amp;callback=related_results_labels&amp;max-results=5&quot;' type='text/javascript'/></b:if></b:loop> </font>
          <script type='text/javascript'> removeRelatedDuplicatesundefined); printRelatedLabelsundefined);
          </script>
          </div>
          </b:if>
          <!-- Related Posts with Thumbnails Code End-->
            </div></br>
      
      • अब Save Theme पर क्लिक कीजिये। अब आपको हर पोस्ट के नीचे Related Posts नज़र आने लगेगी, बशर्ते आपने Post Labels में उचित Labels डाले हों। Related Posts का निर्धारण अलग-अलग पोस्ट्स में डाले गए इन्हीं Common Labels के आधार पर होता है।
      Feel free to add your queries regarding this post of adding related posts widget in blogger.

      March 22, 2017

      How to Add Contact Us Form Page in Blogger for Hindi Blogs

        How to Add Contact Us Form Page in Blogger for Hindi Blogs

        Blogspot Platform पर ‘Contact Us’ फॉर्म को एक पेज के रूप में जोड़ने के लिए निम्न स्टेप्स फॉलो कीजिये : 
        • सबसे पहले अपने Blogger Dashboard में Layout पर जाइए।
        • वहां +Add a Gadget पर क्लिक करिए। 
        • यहाँ पर More Gadgets पर क्लिक करिए। यहाँ आपको नीचे चित्र के अनुसार एक Contact Form नज़र आएगा, जिसे Add करना है। 
        How to Add Contact Us Form Page in Hindi Blogger
        • इसे आप Layout में जहाँ भी रखना चाहें वहां रखकर Save Arrangement पर क्लिक कर दीजिये।
        • अब चूकिं हमें इसे एक पेज के रूप में जोड़ना है इसलिए साइडबार या फुटर एरिया से इसे छिपाना होगा। इसके लिए Blogger Dashboard > Theme/Template पर जाइए। (किसी भी परिवर्तन से पहले आप अपनी वर्तमान Templete/Theme का Backup लेकर रख सकते हैं। 
        • अब Edit HTML पर क्लिक कीजिये। 
        • Theme/Template के Code Box के अंदर क्लिक कीजिये। अब Ctrl+F के द्वारा एक Search Box ओपन कीजिये। 
        • सर्च बॉक्स में यह कोड डालकर सर्च कीजिये : ]]></b:skin> 
        • अब इस कोड लाइन के ऊपर की ओर नीचे दिया गया कोड पेस्ट कर दीजिये।
          div#ContactForm1 {
            display: none !important;
          }
            How to Add Contact Us Form Page in Hindi Blogger
            • अब Save Theme पर क्लिक कर दीजिये। अब आपका Contact Form साइडबार या फुटर एरिया में नहीं दिखाई देगा।
            • अब हमें ‘Contact Us / Contact Me / Contact’ पेज बनाना है। इसके लिए Blogger Dashboard में Pages पर क्लिक करिए। 
            • अब New Page पर क्लिक करके तुरंत Title और Body वाले हिस्से में ‘Contact Us / Contact Me / Contact’ में से जो भी आप पेज का Url रखना चाहें वह पेस्ट कर पेज को Publish कर दीजिये। अब View पर क्लिक कर Page Url चेक कर लीजिये। जैसे मेरा Url है : http://monikajainpanchhi.blogspot.com/p/contact.html. यह वापस बदला नहीं जा सकता इसलिए यह प्रक्रिया सावधानी पूर्वक कीजिये। इसके बाद वापस Edit पर क्लिक कर पेज को ओपन कीजिये। 
            • अब Html पर क्लिक कर Compose से Html Mode में आईये। अब माउस या कीबोर्ड की मदद से जो भी कोड यहाँ पहले से है उसे क्लियर कर दीजिये। 
            • अब नीचे दिया गया कोड पेस्ट कर दीजिये :
              <div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on">
              <br />
              <style>
                  .panchhi_blogger_cntct_form_wrap {
                    margin: 0 auto;
                    max-width: 840px;
                    padding: 0 10px;
                    position: relative;
                    background-color: #FDFDFD;
                  }
                  .panchhi_blogger_cntct_form_wrap:after, .panchhi_blogger_cntct_form_wrap:before {
                    content: '';
                    display: table;
                    clear: both;
                  }
                  /*----Change Contact Form Background Color Here----*/
                  div#panchhi_blogger_cntct_form {
                    padding: 20px 20px 10px 20px;
                    background: #52acff;
                    border-radius: 2px;
                    margin: 20px auto 20px;
                    color: #FFF;
                    font-size: 16px;
                    max-width: 260px;
                  }
                  input#ContactForm1_contact-form-name, .contact-form-email, .contact-form-email:hover, .contact-form-email:active, .contact-form-email-message, .contact-form-email-message:active, .contact-form-email-message:hover {
                    padding: 5px;
                    box-shadow: none!Important;
                    min-width: 186px;
                    max-width: 260px;
                    width: 100%;
                    border: 0 !important;
                    line-height: 1em;
                    min-height: 31px;
                    background: #FCFCFC;
                    margin-bottom: 15px;
                  }
                  /**** Submit button style ****/
                  .contact-form-button-submit {
                    background: #52acff;
                    font-size: 20px;
                    letter-spacing: 2px;
                    cursor: pointer;
                    outline: none!important;
                    color: #FFFFFF;
                    border: 2px solid rgbaundefined255,255,255,1);
                    border-radius: 50px;
                    min-width: 186px;
                    max-width: 260px;
                    width: 100%;
                    text-transform: uppercase;
                    height: 46px;
                    margin-top: 10px!important;
                    transition: all 300ms ease-;
                    -webkit-transition: all 300ms ease-in-out;
                    -moz-transition: all 300ms ease-in-out;
                  }
                  /**** Submit button on mouse hover ****/
                  .contact-form-button-submit:hover {
                    border: 2px solid;
                    color: #FFFFFF;
                    background: #0000ff !important;
                  }
                  /**** Submit button on Focus ****/
                  .contact-form-button-submit:focus, .contact-form-button-submit.focus {
                    border-color: #FFFFFF;
                    box-shadow: none !important;
                  }
                  /**** Error message and Success Message ****/
                  .contact-form-error-message-with-border .contact-form-success-message {
                    background: #f9edbe;
                    border: 1px solid #f0c36d;
                    bottom: 0;
                    box-shadow: 0 2px 4px rgbaundefined0,0,0,.2);
                    color: #666;
                    font-size: 12px;
                    font-weight: bold;
                    padding-bottom: 10px;
                    line-height: 19px;
                    margin-left: 0;
                    opacity: 1;
                    position: static;
                    text-align: center;
                  }
                  </style>
                  <br />
              <br />
              <div class="panchhi_blogger_cntct_form_wrap">
              <div id="panchhi_blogger_cntct_form">
              <form name="contact-form">
              Your Name<br />
              <input class="contact-form-name" id="ContactForm1_contact-form-name" name="name" placeholder="Enter your name here..." size="30" type="text" value="" /><br />
              <br />
              Your Email*<br />
              <input class="contact-form-email" id="ContactForm1_contact-form-email" name="email" placeholder="Enter your email here..." size="30" type="text" value="" /><br />
              <br />
              Your Message*<br />
              <textarea class="contact-form-email-message" cols="25" id="ContactForm1_contact-form-email-message" name="email-message" placeholder="Write your message here..." rows="5"></textarea><br />
              <input class="contact-form-button contact-form-button-submit" id="ContactForm1_contact-form-submit" type="button" value="Submit" /><br />
              <div style="max-width: 260px; text-align: center; width: 100%;">
              <div class="contact-form-error-message" id="ContactForm1_contact-form-error-message">
              </div>
              <div class="contact-form-success-message" id="ContactForm1_contact-form-success-message">
              </div>
              </div>
              </form>
              <br /></div>
              </div>
              </div>
                • ऊपर कोड में कहीं कलर आदि से सम्बंधित कोई परिवर्तन करना हो तो आप कर सकते हैं। इसके बाद पेज को Save कर दीजिये। अब खुद को मैसेज भेजकर चेक कर सकते हैं कि Message Box सही से कार्य कर रहा है या नहीं।
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                  March 19, 2017

                  Seeking Truth and Need of Spirituality Essay in Hindi

                  अध्यात्म की जरुरत क्या है?

                  यूँ मैं कोई भी बात किसी पर थोपने के लिए नहीं लिखती। मूलत: अपने लिए ही लिखती हूँ। कुछ चीजें अभिव्यक्त होना चाहती है तो हो जाती है। पर जब भी अध्यात्म या मुक्ति की बात की जाती है तो कुछ लोग कहते हैं - तुम प्रेम, मुक्ति और शांति की बात कैसे कर सकते हो? ये निरी कपोल कल्पनाएँ हैं। मन का वहम है, बौद्धिक विलास है, शब्दों की कलाबाजी है, उच्च कोटि की बकवास है, गांजे की तरह एक नशा है, पागलपन है, एब्नार्मल होना है...इससे मानवता का क्या भला है? इनकी जरुरत क्या है?

                  अब जरुरत तो किसी भी चीज की नहीं है। दुनिया के होने की जरुरत क्या है? जबकि यहाँ सब कुछ हिंसा पर खड़ा है। हमारा जन्म लेना हमारे हाथ में नहीं था। बिना हमारी परमिशन के हम टपक गए थे। पांच इन्द्रियां और एक मन कहीं से खैरात में मिल गया हमें। यह तक चुनने का अवसर नहीं था कि जन्म कौनसे देश में लें, किस घर में लें, अंगुलियाँ कितनी होनी चाहिए, हाथ-पैर-आँखें-कान...सब कितने होने चाहिए? उसके बाद आगे की सारी घटनाएं भी सीधे-सीधे हमारी मर्जी से नहीं होती। सब स्कूल जाते हैं इसलिए स्कूल तो जाना ही है। सब जन्मदिन पर कैंडल बुझाते हैं इसलिए वह तो बुझाना ही है। सब नौकरी करते हैं इसलिए वह तो करना ही है। सब शादी करते हैं इसलिए वह भी करना ही है। सब बच्चे पैदा करते हैं इसलिए वो क्यों नहीं करेंगे? इंग्लिश नहीं आएगी तो आगे बढ़ने के अवसर नहीं। 2 और 2 चार ही होता है, नहीं तो मार्क्स कट जायेंगे। पार्टी में नए कपड़े ही पहन कर जाते है। पटाखे या बम कोई भी फोड़े सुनना सबको पड़ेगा। मतलब कोई अंत ही नहीं। कोई भी काम क्यों कर रहे हैं कुछ भी नहीं पता। मनुष्य भले ही अपने आप को तीस मार खां समझता हो लेकिन उसके हाथ में मोटे और सीधे तौर पर कुछ भी नहीं है। 99 % काम सिर्फ प्रभाव में होते हैं। अधिकांश लोगों के लिए ये प्रश्न प्रकट रूप में कोई प्रश्न नहीं है। लेकिन कुछ लोगों के लिए यह जीवन-मरण का प्रश्न बन जाता है। सत्य उनके लिए सब कुछ बन जाता है। वे झूठ और भ्रम के साथ नहीं जी सकते। बस इसलिए वे सत्य की खोज करते हैं। और जिन्हें मिल जाता है वे सत्य बाँटते हैं। और मेरी नज़र में सत्य को बाँटने के अतिरिक्त और कुछ भी बाँटना है ही नहीं। यह परम उपकार है उन कुछ तत्व ज्ञानियों का जो हमें सत्य तक पहुँचने का रास्ता बताते हैं। परम मित्र, परम गुरु, परम प्रेमी...अगर कोई हैं तो वे ही हैं जो हमें हमारे निकट लेकर आते हैं।

                  मुझसे कभी-कभी कहा जाता है कि आप अक्सर सर्वश्रेष्ठ की बात करती हैं। बुद्ध और महावीर से कभी नीचे ही नहीं उतरती। हालाँकि ऐसा है नहीं क्योंकि मेरी कोशिश जितनी मेरी क्षमता है उतना सभी प्राणियों के अस्तित्व को स्वीकार करने की होती है। और यह बात भी बुद्ध और महावीर से बेहतर कौन सिखा सकता है? असल बात यह है कि बुद्ध और महावीर ऐसी अवस्थाएं हैं जिन पर पूरा भरोसा किया जा सकता है। ये वे लोग हैं जिन्होंने झूठ या भ्रम के साथ रहना स्वीकार नहीं किया या दूसरे शब्दों में अंधी दौड़ का हिस्सा नहीं बने और पूर्णता को प्राप्त किया। रास्ता हर किसी का अपना होगा लेकिन मूल सत्य और उसके रास्ते की मूल समस्याएं तो नहीं बदल सकती न? यहाँ सभी लोग अपनी-अपनी पसंद की समस्याओं पर बात तो करते हैं। क्रांति और बदलाव का हवाला भी देते हैं लेकिन जब भी रूट्स की बात आती है तो सभी गोल-मोल कर जाते हैं। क्योंकि सत्य स्वार्थ को बहुत मुश्किल लगता है। सत्य कैसे किसी को भायेगा? लेकिन मात्र शिफ्टिंग भी समस्याओं का कोई समाधान है नहीं। 99% मामलों में यही होता है कि समस्यायों की सिर्फ शिफ्टिंग की जाती है। मतलब आकाश से गिरे खजूर पर अटके या यहाँ से उठाकर वहां रख दो।...और वास्तविक समस्या यही है कि लोगों को यह बात या तो पता ही नहीं होती या पता होते हुए भी 1% वाले हिस्से में आने का साहस ही नहीं होता। लेकिन खुद समस्या बनकर समाधान कैसे किये जा सकते हैं? मेरे साथ यह है कि जहाँ बात मेरी क्षमता से बाहर है और मेरी जिजीविषा उसकी इजाजत नहीं देती तब भी मैं सत्य को नकारुंगी नहीं। मतलब सिर्फ इस वजह से कि हमारी क्षमता से बाहर की कोई चीज हो, वह विरोध या हंसी का पात्र तो नहीं बन सकती न?

                  ग्लोबल वार्मिंग, पर्यावरण प्रदूषण, जनसँख्या वृद्धि, जीवों के अस्तित्व के प्रति आया संकट, भोजन, पानी, हवा सबकी गुणवत्ता में आई कमी...अधिकांश लोगों के लिए यह कोई समस्या नहीं है। जैसे जनसँख्या वृद्धि पर कुछ लोगों का कहना है : बच्चे जितने चाहे पैदा करना हमारा अधिकार है। मिलावट पर लोगों का कहना है कि संसाधनों की कमी है। मनुष्य को अपनी भूख और तृष्णा नज़र नहीं आती, संसाधनों की कमी नज़र आ जाती है। जबकि ये समस्याएं ऐसी हैं जो किसी एक की नहीं सामूहिक हिंसा का कारण बनती है। लेकिन किसी भी समस्या के मूल में जाओ और समाधान की बात करो तो संत, साधु, सन्यासी जैसे शब्द तानों के रूप में तैयार मिलते हैं।

                  बाकी यह बड़ी स्वाभाविक सी बात है कि अध्यात्म की ओर आकर्षित वही होंगे जो आंतरिक और बाह्य स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता चाहते हैं। जो जीवन के घोर कष्टों को झेल या समझ चुके हैं और जानते हैं कि संसारिकता उनका समाधान नहीं है। जिनके मन में अस्तित्व को लेकर प्रश्न, शंका, दुविधा हो। जो प्रकृति की चक्रीय गति, जीवन में रोज-रोज दोहराए जाने वाले घटनाक्रमों से ऊब चुके हों। या जो सांसारिक क्रियायों और भोगों में पग-पग पर होने वाली हिंसाओं को लेकर संवेदनशील हों। अब जैसे कुछ ही दिन पहले की बात है। पड़ोस के एक दो घरों में पत्तियों से होने वाले कचरे की वजह से कुछ पेड़ों के बीच के तने को छोड़कर सारी शाखाएं कटवा दी गयी। पेड़ को कटते देखना अच्छा नहीं लग रहा था। व्यक्ति की समस्या छोटी लग रही थी। लेकिन जब व्यक्ति की समस्या छोटी न हो तब भी समस्या भले ही समाधान खोज लेती है लेकिन फिर भी यह प्रश्न तो रह ही जाता है कि खुद को चुने या पेड़ को। एक बछिया है जो विशेष रूप से रोज घर पर 5-6 बार चारा या खाना खाने के लिए आती है। उसकी मासूमियत जीत जाती है और रोज उसे चारा या रोटी मिल जाती है। लेकिन तब भी मेरी समझ में नहीं आता कि मुझे चारे को चुनना चाहिए था या बछिया को। एक दिन उसकी आँखों में आंसू देखे। बहुत देर तक उसे देखती रही। पेड़े खाने की इच्छा गायब हो गयी। हमारे भोजन, मनोरंजन और सुविधाओं के लिए के लिए पशुओं पर जो भयंकर अत्याचार होते हैं वह सब याद आ गया। उस बछिया के जीवन का उद्देश्य क्या है? मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है? ये सब प्रश्न फिर से मेरे दिमाग में आ गए।

                  हम मनुष्य तो मूलभूत जरूरतें छोड़ो विकास के नाम पर भी हर समय किसी भी तरह प्रकृति और इसके जीवों का दोहन करने में ही लगे रहते हैं। अपने दैनिक जीवन में जितनी भी चीजें काम आती है उनके पीछे की कहानी जानने लगें तो फिर इस विकास का इतना विद्रूप रूप सामने आएगा कि खुद से ही नफरत होने लगेगी। मनुष्य तात्कालिक समस्यायों के समाधान ढूढ़कर बहुत ख़ुश हो जाता है लेकिन वास्तविकता यही है कि वे समस्याएं निर्दोष जीवों पर या भविष्य में विकराल रूप में स्थानांतरित कर दी जाती है। हर विकास चाहे वह किसी भी तरह का हो उसके पीछे या आगे यही कहानी मिलेगी। जानवर जो प्रकृतिस्थ हैं कम से कम वे इस तरह से दोहन तो नहीं करते। वे तो अगले दिन का खाना तक संचय करके नहीं रखते। बाकी बुद्धत्व जीने का श्रेष्ठतम तरीका है। बीच में झूलता हुआ इंसान अक्सर बाधा ही बनता है। प्रवृत्ति के नाम पर अब तक हमने बहुत ऊटपटांग काम किये हैं। प्रवृत्ति के नाम पर अच्छे काम करना तो अच्छी बात है। पर वह बहुत सलेक्टिव हो जाता है और फिर क्रिया की विपरीत प्रतिक्रिया भी होती है। मतलब वही कि जब आप बिल्ली का जीवन बचाते हैं तो साथ-साथ चूहों के जीवन को भी ख़तरे में डालते हैं। ऐसे में प्रकृति (समग्र) के दृष्टिकोण से आपका किया हुआ काम महत्वपूर्ण नहीं होता। सिर्फ और सिर्फ आपकी जागरूकता और भावना महत्वपूर्ण होती है। भावना में वे सारी भावनाएं शामिल हो जाती है जो उस प्रक्रिया के दौरान किसी भी रूप में और किसी के भी प्रति उत्पन्न हुई। तो अपनी प्रकट और अप्रकट भावनाओं और विचारों को लेकर सजग होना बेहद जरुरी है।

                  प्रवृत्ति से पूरी तरह से नहीं बचा जा सकता और अच्छे काम अच्छी भावना के साथ तो किये ही जाने चाहिए लेकिन साथ-साथ निवृत्ति को अपनाया जाना बेहद जरुरी है। अपने दैनिक जीवन में हमें ऐसी हजारों चीजें मिल जायेगी जिन्हें सहज रूप से छोड़ (दमन के रूप में नहीं) सकते हैं। और छोड़कर हल्का ही महसूस होता है। निवृत्ति बेहतर इसलिए है क्योंकि ऐसे में हमारा प्रेम एक ही समय में प्रकृति, पर्यावरण, समस्त जीवों और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को प्राप्त होता है। और चीजों के साथ-साथ अधिक जरुरी यह है कि ईर्ष्या, द्वेष, लोभ, असुरक्षा, क्रोध, अहंकार आदि मन के विविध विकारों से भी हम निवृत्त होते रहें। हर समस्या कि असल जड़ ये विकार ही हैं। और इन विकारों को दूर करने के लिए ही प्रयास भीतर और बाहर दोनों ओर से चलते रहने चाहिए।

                  अब यहाँ पर कई प्रश्न उठेंगे कि ऐसे तो भाषा का विकास भी नहीं होता, हम लोग आदिमानव ही रह जाते...और भी बहुत कुछ। तो ऐसा है कि इन सब चीजों पर किसी एक जीव का नियंत्रण हो ही नहीं सकता। इस संसार को वासना (इच्छा) चाहे वह किसी भी रूप में हो वही चलायमान रखती है। तो यह सब तो होना ही था और आगे भी अनंत काल तक होता ही रहेगा। कोई भी प्रलय जीवन को हमेशा के लिए नहीं खत्म करने वाला और न ही ऐसा रहा होगा कि किसी दिन अचानक से जीवन अस्तित्व में आ गया था। यह एक अनंत चक्र है। हम नहीं जानते लेकिन न जाने कितनी बार सब कुछ खत्म होकर वापस से शुरू हुआ होगा। और यह भी नहीं जानते कि ब्रहमांड में न जाने कितनी जगह ऐसी ही कोई कहानी चल रही होगी। लेकिन जो लोग वासना और इच्छा के इस चक्र की व्यर्थता को जिस भी क्षण समझ जायेंगे उनके भीतर मुक्ति की चाह जरुर उठेगी। वैसे मुक्ति या सत्य जीवमात्र की आकांक्षा है। बस वह रास्ता गलत चुन लेता है। बाकी कोई कितना भी बड़ा अपराधी हो, उसकी भी गहन से गहन इच्छा मुक्ति ही है। अंत में वापस यही कहूँगी कि यह सारा प्रवचन किसी पर कुछ भी थोपने के लिए नहीं है। लिखना भी (मुक्त आत्माओं को छोड़कर) सभी की निजी जरुरत और इच्छा ही है पर लगता है जब लिख ही रहे हैं तो अधिकांशत: ऐसा ही लिखा जाए जो हमारी कमियों को स्वीकारते हुए भी भ्रमों को दूर करने में सहायक ही हो।

                  Monika Jain ‘पंछी’ 
                  (19/03/2017)

                  Feel free to add your views about this essay on need of spirituality and seeking truth.

                  March 18, 2017

                  Leftist vs Rightist Ideology in Hindi

                  वामपंथ बनाम दक्षिणपंथ

                  कल गुरमेहर कौर को बलात्कार की धमकी दिए जाने के विरोध में एक स्टेटस डाला था :

                  “बलात्कार की धमकी और बलात्कार दोनों सिर्फ तुम्हारी नामर्दी के बारे में ही सूचना देते हैं, और कुछ नहीं। मतलब तुम लोगों से ज्यादा डरपोक और कौन होगा भला?”

                  स्टेटस पर कुछ आपत्तियां दर्ज की गयी। मसलन आप कौनसी विचारधारा से हैं? राष्ट्र की अस्मिता के साथ जो बलात्कार हो रहा है वह नज़र क्यों नहीं आता? आपको राजनीति की समझ नहीं, आप मुर्ख हैं। गुरमेहर ने युद्ध के सम्बन्ध में जो टिपण्णी की उस पर भी काफी कुछ कहा गया। राष्ट्रद्रोहियों के साथ संवेदनशीलता नहीं बरती जा सकती...और भी बहुत कुछ।

                  कोई भी प्रकरण कुछ लिखने को प्रेरित कर सकता है पर इसका क्या यह मतलब हो जाता है क्या कि हम किसी गुट या संगठन के समर्थक या सदस्य हो गए? हाँ, मुझे राजनीति नहीं समझ आती और मुझे समझनी भी नहीं...पर अब क्या बलात्कार का विरोध करने के लिए भी मेरा वामी या दक्षिणपंथी होना जरुरी है क्या? वे सभी विचारधाराएँ जो बहुत पहले से तय कर ली जाती है और फिर कट्टरता का आवरण ओढ़ लेती है, उनमें से मैं किसी की पक्षधर नहीं। किसी भी समय पर परिस्थितियों को देखते हुए जो अधिक उचित है और व्यापक हित में है उसी का पक्ष लिया जाना चाहिए। इस नाते कभी युद्ध जरुरी भी हो सकता है और कभी गैर-जरुरी भी।

                  दूसरा पक्ष यह तो कह देता है कि 'युद्ध ने मारा' लेकिन यह नहीं देखता कि बात यहाँ खत्म नहीं होती बल्कि बात यहीं से शुरू होती है और इसकी गहराई में जाना जरुरी है जहाँ कारण भी मिलेंगे और समाधान भी। अब कोई आप पर आक्रमण कर दे तो क्या आप बचाव नहीं करेंगे? क्या आपके या आपके परिवार के कोई विरोधी नहीं होते? उनसे भी आप हमेशा इतना ही स्नेह रख पाते हैं जितना कभी-कभी पाकिस्तान के लिए होता है? हाँ, यह कह सकते हैं कि कुछ लोगों की ख़ुराफ़ात का भुगतान सब क्यों करे?

                  बड़े स्तर पर जो भी अपराध या संहार होते हैं कुछ लोग ही उनके मास्टर माइंड होते हैं। हालाँकि किसी का मास्टर माइंड होना भी सिर्फ और सिर्फ उसका दोष नहीं है। लेकिन एक सामाजिक व्यवस्था को बनाये रखने के लिए सीधे-सीधे मुख्य दोषी को खोज निकालना और उसे उचित सजा दिया जाना बिल्कुल जरुरी है। सद्भावना सबसे पहले उनके लिए ही होनी चाहिए जो प्रत्यक्ष तौर पर निर्दोष नज़र आ रहे हैं। लेकिन दोषियों को खोज निकालना और उन पर कार्यवाही कर देना भी एक तात्कालिक समाधान ही है। क्योंकि हिटलर या स्टालिन के मरने के बाद भी फिर हिटलर और स्टालिन पैदा हो ही जाते हैं। बहुत सो को तो बस मौका नहीं मिलता। हालाँकि तात्कालिक समाधान भी बेहद जरुरी है। फ़िलहाल तो ये ही नहीं होते। लेकिन साथ ही स्थायी या लॉन्ग टर्म समाधानों के लिए यह सोचा और समझा जाना जरुरी है कि कोई भी व्यक्ति हिटलर या स्टालिन क्यों बनता है?

                  जिनका उद्देश्य ही सत्ता और नियंत्रण हासिल करना है उन चुनिन्दा वामपंथियों को तो छोड़िये जो अच्छे वामपंथी हैं वे भी सिर्फ सतही बातें करते हैं। गहराई में जो दर्शन ले जाता है वह उसे ऊंचे दर्जे की बकवास और पागलपन कहकर उसकी खिल्ली उड़ाते हैं। एक ओर आप पदार्थ और भौतिकता को अंतिम सत्य मानते हैं और दूसरी ओर आपकी आपत्तियां भी अप्रत्यक्ष तौर पर भौतिकता के विरोध में ही है। मतलब यह समझ ही नहीं आता कि आप लोग आखिर चाहते क्या हैं? क्या सीमा या संगठन रहित विश्व संभव लगता है? विश्व का तो छोड़िये आप तो खुद ही संगठन बनाये बैठे हैं। सीमाओं से परे जाना सिर्फ व्यक्तिगत तौर पर संभव है और वह भी जब तक शरीर है तब तक सिर्फ भीतर से ही।

                  और दक्षिणपंथी जो धर्म/अध्यात्म का समर्थन तो बहुत करता है लेकिन कर्म में अक्सर यह नज़र ही नहीं आता। आपके लिए देश में रहने वाले इंसान महत्वपूर्ण नहीं है, आपके लिए सिर्फ भौगोलिक सीमायें और प्रतीक महत्वपूर्ण है। और देश की अस्मिता और अखंडता को बचाए रखने के कुछ लोगों के तरीके भी बड़े विचित्र हैं। देश में कोई ढंग की शिक्षा व्यवस्था नहीं, कानून व्यवस्था नहीं, चिकित्सा नहीं...हर जगह बस शोषक और शोषित का चैप्टर चल रहा है लेकिन इन सब चीजों का देश की अस्मिता से कोई लेना देना ही नहीं। बस देश के बारे में कोई कुछ बोल न दे। जो बोले वह देशद्रोही हो गया और उसकी किसी को भी कुटाई कर देनी चाहिए इतने सुन्दर आपके विचार हैं। और कई बार तो आपका व्यक्ति विशेष के प्रति अँधा प्रेम ही बस देश प्रेम बन जाता है।

                  कोई अगर वाकई में देश के विरोध में कार्य कर रहा है तो उसके लिए समुचित कार्यवाही का समर्थन कीजिये न! अस्मिता तो तभी बचेगी। इसके साथ ही विकास के नाम पर देश को विश्व परिदृश्य में प्रतिस्पर्धा में बाद में धकेलियेगा सबसे पहले इसकी भीतरी स्थितियों का संज्ञान ले लीजिये। विश्व पटल पर दिखावे से ज्यादा महत्वपूर्ण है यह देखना कि देश में रहने वाले लोग शांति या सुकून से जी पा रहे हैं या नहीं। ये दिखावा बड़ी भयंकर बीमारी है। व्यक्ति, परिवार, समाज और देश कोई इससे अछूता नहीं। और आखिरी बात यह कि बात सिर्फ उन्हीं के लिए है जिन पर लागू है। क्योंकि कल दक्षिणपंथ से जुड़ाव रखने वाले कई व्यक्तियों ने बहुत तर्कसंगत तरीके से भी अपने विचार रखे हैं। उन सभी को साधुवाद। विचारधारा विशेष से आप दोनों का लगाव थोड़ा कम हो जाए तो पायेंगे कि दोनों ही ओर लोग ऐसे भी हैं जो एक ही दिशा में सोचते हैं और अच्छा सोचते हैं। पर यह विचारधारा विशेष आड़े आ जाती है जो किसी भी तरह से धारा नहीं लगती बस उलझती और उलझाती रहती है।

                  Monika Jain ‘पंछी’
                  (01/03/2017)

                  Feel free to add your views about this article on leftist and rightist parties of India and their ideology.

                  March 17, 2017

                  Essay on Child Abuse in Hindi

                  मारपीट तो बस बहाना है

                  2014 के एक अख़बार में एक ख़बर कुछ यूँ थी -

                  11/11/2014 : ये ख़त है सिरोही जिले के मोरली गाँव के 12 वर्षीय जिगर का, जिसने घर की रसोई में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।

                  “मैं अपनी मजबूरी की वजह से अपनी जान दे रहा हूँ। मेरे घरवालों को मालूम नहीं है कि स्कूल में पंद्रह दिन से रोज एक-एक घंटे तक मुझे लकड़ी के डंडे से मारा जाता है। मैं अक्टूबर माह में बहुत बीमार रहा था। इसलिए मैं अपना स्कूल का काम नहीं कर पाया। दिवाली की छुट्टियों में मैंने अपना पहले का काम खत्म कर दिया। इसी बीच दिवाली का काम भूल गया। मैंने दिवाली के बाद सारा काम खत्म करने की बहुत कोशिश की, लेकिन खत्म ही नहीं हो रहा था। हमारे स्कूल के दो सर तारजी और भरत जी सर मेरी बात सुने बगैर मुझे सुमेरसिंह सर के पास भेजते थे। वो मुझे लोहे की स्केल से पीटते थे। मार खाने के बाद जब मैं क्लास में आता तो एक-एक घंटे तक मुझे लकड़ी के मोटे डंडे से मारते थे और बोलते थे कि घर पे कहा तो मारूंगा। मैं तेरे मम्मी-पापा से नहीं डरता। हमारी स्कूल में कई बार शराब भी लाई जाती है। हमारे भरत जी सर हमारी लाइन के लड़कों को बहुत मारते हैं। वो भी बिना किसी गलती के। पूछने पर वे कहते हैं - मुझे मजा आता है और गालियाँ देते हैं। इनके साथ मिलकर कुछ लड़के हैं जो पूरा दिन बहुत परेशान करते थे। वो हमेशा मुझे गालियाँ देते हैं और झूठ बोलकर मुझे सर से पिटवाते हैं। कृपया उन्हें कम से कम तीन साल की सजा हो। उन टीचरों के नाम भरत जी, तारजी सर उनको कम से कम पांच साल की सजा हो। मेरी आखिरी इच्छा है, मैं कोर्ट से निवेदन करूँगा कि उन्हें सजा दो।”

                  ख़बर की सच्चाई कितनी है और कितनी नहीं और जैसा कि कई लोगों द्वारा कहा जाता है कि बच्चे भी कम नहीं होते...इन बातों पर मैं इस लेख में नहीं लिख रही हूँ। उस पर हम अलग से बात कर सकते हैं। लेकिन इस ख़बर को पढ़ने के बाद मुझे भी स्कूल के समय की कुछ घटनाएं याद आ गयी। जहाँ तक पढ़ाई का सवाल है तो हमेशा स्कूल और डिस्ट्रिक्ट टॉप करती थी। पब्लिक स्पीकिंग में भी बहुत अच्छी थी। लेकिन व्यक्तिगत संपर्क के मामले में बहुत शर्मीली और अंतर्मुखी थी। बहुत छोटी सी थी, शायद 2nd या 3rd क्लास में तब एक बार स्कूल में प्रवेश करते समय एक अध्यापिका को गुड मोर्निंग विश करना भूल गयी थी। टीचर ने मुझे वापस बुलाया था और एक बहुत जोरदार चांटा गाल पर पड़ा था।

                  इसी तरह 10th क्लास में जब वैसे ही पढ़ाई और सारे टीचर्स की ओर से मेरिट लाने की अपेक्षाओं का बोझ बहुत ज्यादा था तब टीचर्स का अनाप-शनाप होमवर्क देना बहुत खलता था। हिंदी की जो टीचर थी उन्होंने दीपावली गृहकार्य में ढेर सारे निबंध, पत्र, ग्रामर...इन सब के साथ-साथ पूरी किताब के सारे क्वेश्चन-आंसरर्स वापस एक अलग से कॉपी में करके लाने को कहा था। यूँ तो अधिकांश टीचर्स को कुछ नहीं आता था। लेकिन इतना सा दिमाग भी नहीं होता था कि बच्चे छुट्टियों में मस्ती करेंगे, बोर्ड एग्जाम की तैयारी करेंगे या फिर हाथों में भयंकर दर्द पैदा कर देने वाला सारे विषयों का ढेर सारा होमवर्क करेंगे। जैसे-तैसे कांट-छांट कर होमवर्क किया। कुछ बच्चों ने होमवर्क नहीं किया और बाकी ने कांट-छांटकर किया। मेम को पता चल गया। गुस्से का पारा सातवें आसमान पर था। घंटे भर से भी ज्यादा समय तक पूरी क्लास को हाथ ऊपर करवाकर खड़े रखा और उसके बाद हाथ के पीछे और आगे बहुत सारे डंडे भी पड़े। पूरा सही से याद नहीं लेकिन उस दिन बहुत कठोर सजा मिली थी।

                  सजा के मामले में ऐसी ही कुछ और घटनाएँ भी हैं। अधिकांश मामलों में शिक्षक मारपीट के द्वारा बस अपनी कुंठा और हिंसा को बाहर निकालते हैं। बच्चे उनके लिए अच्छे शिकार होते हैं। आजकल अधिकांश जगहों पर मारपीट कम हो गयी है लेकिन फिर भी शोषण के तरीके तो कई सारे हैं। जैसे मुझे टॉपर होने की वजह से बच्चों की कॉपीज चेक करने के अलावा घंटों तक ब्लैकबोर्ड पर लिखना भी पड़ा है। जिन शिक्षकों या माता-पिता को लगता है कि मारपीट पढ़ाई करवाने या सुधार की प्रक्रिया का एक जरुरी हिस्सा है, उनके लिए अपने कुछ निजी अनुभव शेयर करना चाहती हूँ।

                  मार्क्स पर फोकस्ड वर्तमान अति प्रतिस्पर्धा पूर्ण शिक्षा प्रणाली के अब मैं बहुत ख़िलाफ़ हूँ। लेकिन जो स्थितियां हैं उन्हें तुरंत बदला नहीं जा सकता और अगर जीना है तो कई चीजें स्वीकार करते हुए चलना पड़ता है। यूँ स्कूल हो या कॉलेज जब-जब जिस-जिस क्लास में रही उस क्लास के परिचित-अपरिचित सभी सहपाठियों की पढ़ाई में मदद की है। कॉलेज में तो एक दोस्त को रात भर जागकर भी पढ़ाया है और एक को सुबह-सुबह नींद में ही कॉल करने पर एग्जाम की वजह से पढ़ाया है। लेकिन एक रेगुलर स्टूडेंट के रूप में भी मेरी पहली स्टूडेंट मेरी ही क्लास (8th) की एक लड़की थी। वह गणित में बहुत कमजोर थी। हमारा डिस्ट्रिक्ट बोर्ड था तो उसके पेरेंट्स ने उसे कुछ महीनों के लिए मेरे पास पढ़ने भेजा था। जिला बोर्ड में मुझे फर्स्ट मेरिट मिली थी और वह लड़की भी क्लियर हो गयी थी।

                  प्रोफेशनल कोर्सेज के स्टूडेंट्स के साथ भी अच्छे अनुभव रहे हैं लेकिन यहाँ मैं सिर्फ स्कूल स्टूडेंट्स की बात करुँगी। उन बच्चों में से आज तक जितने भी बच्चों को पढ़ाया है...किसी के पेरेंट्स द्वारा विशेषाधिकार दिए जाने के बावजूद भी आज तक कभी किसी स्टूडेंट पर हाथ नहीं उठाया, कोई सजा विशेष जैसा कुछ नहीं दिया और डांट भी बहुत रेयरली ही लगाई है। लेकिन फिर भी इतने परिणाम तो मिले ही हैं कि जो बच्चे बात-बात में चीटिंग करते थे, उन्होंने चीटिंग करना छोड़ दिया। जो किसी सब्जेक्ट (विशेष रूप से प्रैक्टिकल सब्जेक्ट्स) से दूर भागते थे, उनका वह सबसे पसंदीदा सब्जेक्ट बन गया। 10th, 11th, 12th क्लास तक पहुँच कर भी जिन्हें जोड़-बाकी, गुणा-भाग नहीं आता वे अच्छे अंकों से पास हुए।...और जो किसी सब्जेक्ट और एग्जाम को लेकर बहुत ही डर और घबराहट में होते थे, जिन्हें हर एक सवाल बताना पड़ता था उन्हें भी कुछ समय बाद बहुत आत्मविश्वासी बनते देखा है। जहाँ फिर ज्यादा कुछ समझाने की जरुरत नहीं रहती और वह खुद से ही सब हल करने लगते हैं। कुछ परिवर्तन तो मुझे भी हैरत में डालने वाले होते थे।

                  एक स्टूडेंट थी। बहुत कमजोर थी गणित में। उसकी एक बात दिल को छू गयी। उसने कहा, ‘मैं आज तक जिस भी टीचर से पढ़ी हूँ, उनसे कोई प्रश्न दौबारा पूछ लो तो वे भड़क जाती हैं, थप्पड़ लगा देती हैं या फिर बताती ही नहीं। आप ऐसी पहली टीचर हो जिससे एक ही चीज भूल जाने पर 20-30 बार पूछ लो तब भी हर बार आप उतने ही प्यार से समझा देती हैं, कभी डांटती ही नहीं।’ अगले साल जब वह वापस पढ़ने आई थी तब उसकी गणित देखकर मैं खुद हैरान थी। पूरे आत्मविश्वास के साथ वह अब सब हल करने लगी थी।

                  एक और स्टूडेंट जो घर से बाहर बहुत अंतर्मुखी, डरपोक और शर्मीली थी, घबराकर एग्जाम में कुछ आते हुए भी गलत कर आती थी। 30%-50% जिसके मार्क्स आते थे। धीरे-धीरे उसका आत्मविश्वास इतना बढ़ गया कि एक दिन 100% मार्क्स लेकर आई और बहुत चहकते हुए मुझे अपनी शीट दिखाई। डर कम हो गया और बहुत सहज भी हो गयी थी।

                  इसी तरह एक स्टूडेंट था। 9th मैथ में 55% मार्क्स थे। 10th में उनकी लगभग पूरी क्लास मेरे पास पढ़ी थी। कोर्स हो जाने के बाद हर रोज नए टेस्ट पेपर्स बनाती थी और उन्हें हल करवाती थी। सबका रिजल्ट अच्छा रहा था। विशेष रूप से वह स्टूडेंट जो सीधे 55% से 85% पर पहुंचा था और उसने मेरे तरीकों को कुछ ज्यादा ही नोटिस किया था...वह बहुत ज्यादा ख़ुश था। रिजल्ट के बाद जब अपने सहपाठियों के साथ मिलने आया था तो पाँव छूकर ढेर सारी तारीफ कर गया था।

                  खैर! बहुत से ऐसे उदाहरण हैं और यह सब बताने का उद्देश्य यह है कि कुछ अपवादों को छोड़कर (क्योंकि कई बच्चे इस तरह की पढ़ाई के लिए बिल्कुल भी नहीं बने होते, उनके लिए कुछ और सोचा जाना जरुरी है और कुछ बच्चे जन्मजात या पालन-पोषण की गलतियों की वजह से बहुत ढीठ हो जाते हैं) ज्यादातर बच्चे पढ़ाई में अच्छा करते हैं, बस शिक्षक को अपना 100% देना पड़ता है। बेसिक्स पर काम किया जाना बहुत जरुरी है। बहुत बड़ी क्लास में भी जिन बच्चों को जोड़-बाकी, गुणा-भाग नहीं आते, मैंने 15-20 दिन तक लगातार सिर्फ उनके बेसिक्स पर काम किया था। एक बार बेसिक्स क्लियर हो जाए तो ऐसा हो ही नहीं सकता कि वह सब्जेक्ट उन्हें अच्छा ना लगे या फिर उसमें उन्हें कोई डर या घबराहट रहे। इसके अलावा कुछ बच्चों को कोई सब्जेक्ट समझाने के लिए कुछ अलग ही तरह के तरीकों की जरुरत होती है। व्यवहारिक जीवन के उदाहरण दिए जाने चाहिए। बच्चों और उनके दोस्तों को प्रॉब्लम में इन्वोल्व करना चाहिए। सख्त व्यवहार (हाथ-पाँव वाला नहीं) भी जरुरी है तो कभी-कभी थोड़ा हंसी-मजाक भी। हाँ, बच्चे सर पर ना चढ़े इसका ख़याल रखना भी जरुरी है और इसके साथ ही जितना संभव हो पाए उन्हें प्रतिस्पर्धा वाली भावना से दूर रखा जाना चाहिए। प्रतिस्पर्धा हो तो सिर्फ खुद से।

                  टीचिंग मेथड्स पर एक पोस्ट और लिखूंगी। आज बस इतना ही कि अपने भीतर की भड़ास और गुस्सा निकालने के लिए अगर कभी बहुत जरुरी हो तो भाषण दे लो, चिल्ला लो लेकिन हाथ-पाँव ना ही चलाओ तो बेहतर है। अनुभव कहता है कि प्यार के साथ-साथ कभी-कभी जरुरी होने पर भाषण का असर भी अच्छा होता है। लेकिन बहुत ज्यादा मार खाने वाले बच्चे इतने ढीठ बन जाते हैं कि उनके सुधरने की जो बची-कुची गुंजाईश होती है वह भी खत्म हो जाती है।

                  इस बात पर एक मजेदार बात याद आई। ऐसा नहीं है कि हमने कभी मम्मी-पापा से मार नहीं खायी लेकिन हाँ, पढ़ाई के लिए घर पर मार या डांट तो दूर कभी यह भी नहीं सुना कि ‘जा, पढ़ाई कर!’ हाँ, इसका उल्टा जरुर होता था। माँ (पापा नहीं) हम भाई-बहनों की पढ़ाई की अति से दु:खी रहती थीं और एग्जाम टाइम में तो पापा भी देर रात जलती लाइट को देखकर कह ही देते थे, ‘सो जा अब!’ खैर! अब तो मैं भी बचपन में एग्जाम में भी बहुत ज्यादा पढ़ने को कोई अच्छी बात नहीं मानती।

                  यह तो रही पढ़ाई की बात। बाकी विषय इतना विशाल है कि यहाँ बच्चों के पालन-पोषण, उनके माता-पिता द्वारा उन्हें प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर बिगाड़ने और फिर खुद ही शिकायत करने, खुद बच्चों की ही मूल-जन्मजात प्रवृत्ति, शिक्षकों द्वारा और कहीं-कहीं खुद शिक्षकों का ही शोषण जैसे कई जुड़े हुए मुद्दे हैं जिन पर भी बात किया जाना जरुरी है। शेष फिर कभी। :)

                  Monika Jain ‘पंछी’
                  (17/03/2017)

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                  March 16, 2017

                  Gora by Rabindranath Tagore Summary in Hindi


                  पुस्तक परिचय : गोरा ~ रवीन्द्रनाथ टैगोर

                  बहुत कम किताबें होती हैं जो बाँध पाती है और आश्चर्य यह कि मुक्ति का द्वार भी उन्हीं से मिलता है। ह्रदय के भीतर उत्सुकता, कंपकंपी, स्मृतियाँ, छटपटाहट, प्रेम, मोह, आशा-निराशा...दुनिया जहाँ के सारे भाव जगाती हुई अंत में आंसू की धारा के साथ सबका निस्तारण भी कर देती है। अज्ञेय द्वारा अनुवादित रवीन्द्रनाथ टैगोर की ‘गोरा’ एक ऐसी ही पुस्तक के रूप में सामने आई।
                   
                  कितनी विचित्र बात है - जिन चीजों को सत्य समझकर हम ताउम्र पकड़े और झकड़े रहते हैं। खुद उलझकर दूसरों को भी उलझाने का उपक्रम करते रहते हैं, सत्य तो उनसे कितना विपरीत हमारे ही भीतर सहज, सरल और प्रेममय रूप में प्रकाशमान रहता है। जाति, समाज, परिवार यहाँ तक कि धर्म को भी हम अपने अहंकार की सामग्री बनाये फिरते हैं। जबकि धर्म का अहंकार से कोई साम्य ही नहीं। बल्कि अहंकार का घटते जाना ही धर्म में प्रवेश पाते जाना है।

                  आनंदमाई और परेशबाबू जैसे सुलझे हुए व्यक्तित्वों से साक्षात्कार कितनी शांति देने वाला था। आनंदमाई जिनका पढ़ने-लिखने से कोई सम्बन्ध था नहीं उनका सरल और प्रेममय व्यक्तित्व जो उस अति जातिवादी युग में भी अपने स्नेह की धारा से सारी रेखाओं को मिटा देने वाली ‘माँ’ के रूप में प्रकाशमान होता है, उनके स्नेह का आँचल पाकर निश्चय ही गोरा धन्य था। वहीँ परेशबाबू जैसे शांत, निर्मल, स्थिर व्यक्तित्व जिन्होंने कभी कुछ अपनी बेटियों पर थोपा नहीं बल्कि हमेशा उनकी खुद की सोच और समझ को विकसित होने का वातावरण दिया, पिता के कद को बहुत ऊंचा उठा जाते हैं।

                  कहानी की शुरुआत में विनय सुचरिता की ओर आकर्षित होता है लेकिन कुछ ही देर में यह संकेत मिल जाते हैं कि विनय को ललिता और गोरा को सुचरिता पूर्ण करते हैं। विनय का आचारों-विचारों और मतों की तुलना में मनुष्य को अधिक महत्व देना उसे कई दुविधाओं से गुजारता है। मत और मनुष्य में से किसी एक को चुनना हो तब तो मनुष्य को चुनना उसके लिए आसान था लेकिन इन्हीं मतों को लेकर अलग-अलग खड़े मनुष्य-मनुष्य में से किसी एक को चुनना कितना कष्टप्रद होता है यह विनय के धरातल पर खड़े होकर देखा जा सकता है। किसी एक पक्ष को न चुन पाने के पीछे उसमें स्पष्टता और दृढ़ता का जो अभाव था, भावनाओं में बहकर तुरंत फैसला ले लेने और अगले ही पल उस फैसले के गलत होने के डर से उस पर स्थिर न रह पाने जैसी जो चंचल वृत्ति थी उनमें ललिता जैसी स्वाभिमानी और बेबाक लड़की का साथ ही उसकी शक्ति बन सकता था।

                  दूसरी ओर गोरा जिसने अपने एक विदेशी की संतान होने के तथ्य से बिल्कुल अनभिज्ञ होने के चलते देश के उत्थान और अंग्रेजों के विरुद्ध अपनी लड़ाई के लिए हिंदुत्व को इस कट्टरता से ओढ़ लिया था कि उसमें साफ़-साफ़ नज़र आने वाले छेदों को भी वह आखिर तक नज़रन्दाज करता रहा, वहां सुचरिता की नम्रता, कोमलता, करुणा और साफ़गोई भी उसके अंतस की भूमि को आने वाले कठोर सत्य का सामना करने के लिए लचीला बनाती रही। गोरा का उद्देश्य, उसकी कल्पनाओं का भारत निश्चय ही बहुत पवित्र था लेकिन उसकी हठधर्मिता, गलत बातों को भी पकड़े रहने की जिद और दूसरों पर हावी होना जैसी जो कमजोरियां थी वहां सुचरिता का समर्पण, स्नेह और नम्रता ही उसकी ताकत बन सकते थे।

                  हरानबाबू, वरदासुंदरी, हरिमोहिनी, अविनाश, कैलाश...जैसे अन्य व्यक्तित्व मानव मन की कमजोरियों, स्वार्थ, लालच, अहंकार आदि के प्रतिनिधि बनकर उभरते हैं। काले, धुंधले बादल कुछ समय तक सूर्य के तेज और चन्द्रमा की शीतल किरणों के मार्ग के लिए बाधा बन सकते हैं, हमेशा के लिए नहीं और लम्बे अंधकार के बाद प्रकाश की अनुभूति और अभिव्यक्ति का जो रस, परिपूर्णता और आनंद है वहां इन पूर्व बाधाओं का होना भी तो जरुरी ही है, निखार इनके बिना आयेगा भी कैसे?

                  यूँ कभी किसी पुस्तक पर लिखना बहुत कम होता है। लेकिन ‘गोरा’ पर कुछ लिखे बिना खुद को रोक नहीं पायी। अनेकों स्मृतियों की यात्रा करवाता हुआ...कुछ व्यक्तित्वों में खुद को और दूसरों को खोजता हुआ...अंत में आंसुओं के बह जाने के साथ मन को एकदम हल्का करता हुआ यह उपन्यास एक अच्छा मित्र साबित हुआ। रवींद्रनाथ टैगोर का प्रकृति चित्रण फिर चाहे वह कथा के पात्रों का हो या फिर हमारे चारों ओर फैली प्रकृति का विस्मय से भर देता है। वहीँ अज्ञेय द्वारा हिंदी में किया अनुवाद हिंदी भाषा की समृद्धता को फिर एक बार बोध में ले आता है। पुस्तक पर मेरा कुछ कहना सूरज को दीपक दिखाने जैसा है पर अपने मन में फैले उजास को बिखेरने से रोक पाना भी तो संभव न था।

                  Monika Jain ‘पंछी’
                  (20/11/2016)

                  Feel free to add your views about this summary on novel 'Gora' written by Rabindranath Tagore and translated in hindi by Agyeya. 

                  March 8, 2017

                  Essay on Women's Freedom in Hindi

                  सहजता शरीर की

                  14/06/2014 - ‘शोषण, उत्पीड़न, दमन, भेदभाव, पुरुष प्रधानता’ नारी परतंत्रता के इन तमाम रूपों से मुक्ति पाने के लिए कई वर्षों से स्त्रियों का संघर्ष जारी है। अच्छा लगता है यह देखना कि नारी स्वतंत्रता, सम्मान और अधिकारों की बातें हो रही है। पितृ सत्ता के उन्मूलन की बातें हो रही हैं। कई पुरुष सच्चे सहयोगी बनकर आ रहें हैं। पर नारी स्वतंत्रता के बोये इन पौधों के बीच उग आ रही उस खरपतवार का क्या, जो बढ़ चढ़ कर नारी अधिकारों के पक्ष में बोल तो रहे हैं पर उनके ज़ेहन में तो नारी आज भी केवल उनकी कामेच्छाओं को पूरा करने वाला हाड़-मांस का शरीर भर है। बल्कि नारी विमर्श को तो उन्होंने महिलाओं को आकर्षित करने के एक नए हथकंडे के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। इस खरपतवार को पहचानना मुश्किल जरुर है पर नामुमकिन नहीं। लेकिन समस्या वहां पैदा होती है जहाँ नारी खुद भी स्वयं को एक देह से ऊपर नहीं समझ पाती, और यह समस्या अनपढ़ या गाँव की महिलाओं की नहीं बल्कि पढ़ी-लिखी शहरी मॉडर्न महिलाओं की ज्यादा है। नारी तब तक स्वतंत्र हो ही नहीं सकती जब तक वह अपने विचारों, अपनी बुद्धि, अपनी क्षमताओं और अपने गुणों को अपने बाहरी रूप सौन्दर्य से ज्यादा महत्व ना देने लगे।

                  08/03/2017 - बात बड़ी नागवार गुजरने वाली है लेकिन सौन्दर्य प्रसाधनों का त्याग महिला स्वतंत्रता की दिशा में एक बहुत महत्वपूर्ण कदम लगता है (जिन पुरुषों पर लागू है उनके लिए भी)। स्वतंत्रता वही से शुरू होती है जब हम अपने शरीर को सहज रूप से लेना शुरू करते हैं। कुछ ही दिन पहले देखा एक 8-9 साल की लड़की जो घुटनों से ऊपर की फ्रॉक पहने हुए है, वह बैठे-बैठे हर पांच मिनट में अपनी फ्रॉक को जबरन घुटनों तक खींचने की कोशिश कर रही थी। सोचने वाली बात है कि कैसा समाज बना दिया है हमने?...बच्चे तक अपने शरीर को लेकर सहज नहीं है। इसके अलावा महिलाओं का 1-2 घंटे बैठकर मेकअप करना, हमेशा अपने लुक्स को लेकर फिक्रमंद रहना यह यही दिखाता है कि वे अपने प्राकृतिक रूप रंग को लेकर बिल्कुल सहज नहीं है। अगर स्त्री खुद सहज रहेगी जैसी भी वह है उसके साथ तो खुद-ब-खुद पुरुष भी उसे उसी तरह स्वीकार करने लगेगा। क्योंकि कई जगह यह भी होता है कि महिलाएं सिर्फ पुरुषों की नज़र में अधिक सुन्दर दिखने के लिए तैयार होती है। बाकी खुद स्त्रियाँ भी कई बार इसी आधार पर तुलना करती है। सौन्दर्य प्रसाधनों को छोड़ना मैं इसलिए उचित समझती हूँ ताकि सभी अपने शरीर को लेकर सहज हो सके। यह बेहद जरुरी है सम्बंधित भेदभाव और कुंठा को मिटाने की दिशा में।

                  इसके अलावा कृत्रिम सौन्दर्य प्रसाधनों का त्याग स्त्री मुक्ति के साथ-साथ मानव मुक्ति की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है। सौन्दर्य को महसूस कर पाने का ह्रदय और आँखें हम खो चुके हैं। वरना अपने प्राकृतिक रूप में तो सौन्दर्य चरम पर होता है। दुनिया को कोई प्राणी मेकअप नहीं करता लेकिन उसकी संरचना कितनी पूर्ण और सुन्दर नजर आती है। प्रकृति खुद अपने नदी, झरनों, पेड़ों, पहाड़ों के साथ कितनी सुन्दर लगती है। बचपन से ही सजने संवरने का बहुत ज्यादा शौक नहीं रहा। हाँ, अकेजनली तैयार हो जाते थे। लेकिन पिछले 2 साल से सौन्दर्य प्रसाधनों और किसी भी तरह के आभूषण का प्रयोग जब पूरी तरह से हमेशा के लिए बंद कर चुकी हूँ तो एक अलग ही स्वतंत्रता का अहसास होता है। हर किसी को इस स्वतंत्रता को महसूस करना ही चाहिए। स्त्रियाँ जो आज भी अधिकांशत: देह ही समझी जाती है, उनके लिए तो यह बहुत जरुरी कदम है।

                  Monika Jain ‘पंछी’

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                  February 16, 2017

                  April Fool Funny Story in Hindi

                  April Fool Funny Story of Moorkhistan in Hindi
                  मूर्खिस्तान का मूर्ख दिवस
                  {नन्हें सम्राट, मूर्खिस्तान विशेषांक में प्रकाशित}

                  मूर्खिस्तान का मूर्ख दिवस आ चुका था। मूर्ख दिवस मूर्खिस्तान का सबसे बड़ा त्यौहार माना जाता है। कई महीनों पहले से ही जोर-शोर से इसकी तैयारियां शुरू हो जाती है। इस दिन कई प्रतियोगिताओं का आयोजन होता है और इसके साथ ही साल भर की मूर्खताओं के आधार पर मूर्खिस्तान के महामूर्ख सम्मान की घोषणा भी की जाती है। इस अवार्ड को पाने के लिए पूरे साल मूर्खिस्तान के निवासियों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा चलती रहती है।

                  मूर्खिस्तान के सबसे चर्चित भिखारी भीखालाल को इस बार मूर्ख दिवस का निमंत्रण पत्र बांटने का काम सौंपा गया था। भीखालाल लोगों के हाथ-पैर पकड़-पकड़कर भीख मांगने के लिए प्रसिद्द था। निमंत्रण पत्र देने के लिए वह घर-घर पहुँचता और पुकारता – अल्लाह के नाम पर निमंत्रण लेले रे बाबा। मौला के नाम पर निमंत्रण लेले।

                  कुछ लोग तो भीखालाल द्वारा अपने हाथ-पाँव पकड़े जाने के डर से बाहर नहीं निकले लेकिन मन में निमंत्रण पत्र पाने की लालसा तो थी। कुछ लोग जो खुद को रोक नहीं पाए और बाहर निकल गए, पहले भीखालाल उनके हाथ-पैर पकड़कर मनमानी भीख वसूलता और उसके जाने के बाद आसपास के लोग जो पहले बाहर नहीं निकले थे दौड़ते हुए उसके घर की ओर आते और फिर वे निमंत्रण पत्र देखने के लिए उसके हाथ-पाँव पकड़ते।

                  मूर्ख दिवस के दिन मूर्खिस्तान के सभी मोटे व्यक्तियों के लिए एक दौड़ प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था। सभी मोटे लोग, दर्शक, आयोजक और जज महोदय आयोजन स्थल पर पहुँच चुके थे। लेकिन यह प्रतियोगिता दौड़ प्रतियोगिता कम और आराम प्रतियोगिता ज्यादा लग रही थी। सभी थककर बीच-बीच में आराम करने बैठ जाते थे। जब तक कोई नियत स्थल पर पहुंचा तब तक बोर होकर आयोजक, दर्शक, जज सभी गायब हो चुके थे।

                  एक जगह चित्रकला प्रतियोगिता का आयोजन हो रहा था। वहां सब लोग एक दूसरे की जगह पर दौड़ लगाते नज़र आ रहे थे। अपनी चित्रकारी पर किसी को भरोसा न था इसलिए वे दूसरे की जगह पहुँच-पहुंचकर उसकी शीट पर अपनी चित्रकारी कर आते ताकि उसे इनाम न मिले।

                  एक दूसरी जगह पर अपनी-अपनी मूर्खताओं का बखान करती कविता प्रतियोगिता का आयोजन चल रहा था। सभी बढ़ा-चढ़ाकर अपनी मूर्खताएं सुना रहे थे। जब भुलक्कड़ दास की बारी आई तो वे सब भूल गए। लेकिन बिना कुछ बोले ही उन्होंने होठ, हाथ-पाँव सब हिलाना जारी रखा। वे जब वापस अपनी जगह आकर बैठना भी भूल गए और वहीँ अड़े रहे तो उन्हें विजेता का पुरस्कार प्रदान कर अपनी जगह पर लाया गया। आखिर उन्होंने बिना कुछ भी बोले अपनी मूर्खता का परिचय जो दिया था।

                  फिर थकान से चूर होकर सब भोजन स्थल पर पहुंचे। भुक्कड़दास को इस बार मूर्खभोज के आयोजन का काम सौंपा गया था। भोजन स्थल के अन्दर से तरह-तरह के पकवानों की ख़ुशबू आ रही थी। लेकिन तभी सबकी नज़र एक नोटिस पर पड़ी। वहां बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था – आप सभी आयोजन के पश्चात् अपने-अपने घरों पर खाना खाने पधारें। अगर कोई अथिति हमें अनुग्रहित करना चाहे तो वह भीतर आ सकता है। इस अनुग्रह के बदले भुक्कड़दास उनके घर पर एक दिन का मेहमान बनने का सौभाग्य प्रदान करेंगे।

                  भुक्कड़दास की मेहमाननवाजी का ख़याल करते ही सारे के सारे लोग सरपट अपने घरों की ओर दौड़े। खाना खाने के बाद थकान के कारण सबको नींद आने लगी। महामूर्ख सम्मान समारोह में थोड़ी देर बाद जाने की सोचकर सब सो गए। इधर महामूर्ख सम्मान की घोषणा करने वाले मूर्खिस्तान के अध्यक्ष अटपटेलाल ने जब खुद को आयोजन स्थल पर अकेला पाया तो मौके का लाभ उठाकर खुद को ही जूतों की माला पहनाकर महामूर्ख सम्मान से नवाज दिया। और इस तरह मूर्खिस्तान का मूर्ख दिवस मनाया गया।

                  मोनिका जैन ‘पंछी’
                  (16/02/2017)

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