December 3, 2017

Story on Fear (Snake Phobia) in Hindi

भय 

हम मनुष्य कभी-कभी कितने बेकार के डर पाल लेते हैं। कभी जानकारी और जागरूकता की कमी के चलते तो कभी कुछ खो देने की आशंका के चलते। मैंने गहरे चिंतन की मुद्रा में कहा। 

एक लम्बी यात्रा रही है मनुष्य के विकास की। आनुवंशिकता, परिवेश, परिवार, मूल प्रकृति, परस्पर प्रभाव...बहुत सी चीजें हैं। मनुष्य अपने और दूसरों के लिए जितना अच्छा हो सकता है, वह उतना ही बुरा भी हो सकता है। उसने बात आगे बढ़ाते हुए कहा। 

हाँ, यह विकल्प बस मनुष्य के ही पास है। 

मेरा एक सहपाठी था। उसे रास्ते में चलते हुए हमेशा साँप के काट खाने का भय रहता था। उसे लगता था कि अभी अचानक कहीं से सांप आ जाएगा और उसे काट खायेगा। उसके इस डर के चलते कुछ लोग उसका मजाक भी उड़ाते थे। 

इस तरह मजाक उड़ाना तो गलत है न! हम सभी मनुष्यों के जीवन में न्यूनाधिक कोई न कोई भय विद्यमान रहते ही हैं। हाँ, यह अतिरिक्त रूप से पाला-पोसा गया भय था। क्या उसे या उसके किसी परिचित को बचपन या कभी और किसी सांप ने काटा था? 

हाँ, उसके साथ बचपन में सर्पदंश की घटना हुई थी और तभी से यह डर उसके साथ हर रास्ते (विशेष रूप से सुनसान) पर चलता था। 

अवचेतन में बैठे कुछ डर बचपन की किसी घटना या दृश्य से संबंधित ही होते हैं। तुमने उसे समझाया नहीं कि इस तरह डरना फ़िजूल है? इस तरह तो वह हर रोज उस घटना को जी रहा है। 

मैंने समझाया था। उसने कहा कि वह सब कोशिशें कर चुका है, लेकिन पूरी तरह इस डर को काबू नहीं कर पाता। 

शायद उसे किसी जानकार के परामर्श की जरुरत है। बाकी मुझे लगता है उसे अपने मन में सांप के साथ थोड़ा सहज-सतर्क रिश्ता कायम करने की कोशिश करनी चाहिए कि बेवजह काटना उसका शौक नहीं। वह खुद भी तो भय और असुरक्षा के चलते ही काटता है। वह हमारा शत्रु नहीं है। हम मनुष्यों के पास जरूर यह विकल्प होता है कि हम अपने भयों से छुटकारा पा सकते हैं। कम से कम अतिरिक्त भयों से तो पा ही सकते हैं। 

अच्छा जैसे तुम्हें तो सांप से डर लगता ही नहीं। उसने हंसकर मुझे चिढ़ाते हुए कहा। 

मैंने कहा तो सबके अपने-अपने न्यूनाधिक डर रहते हैं। मेरे भी कुछ थे और कुछ हैं। सांप से भी लगता है। पर इस तरह साथ नहीं रहता। सांप के बच्चों से तो नहीं लगता। कभी-कभी बारिश के दिनों में घर में भी आ जाते थे और तब मैं उन्हें बाहर छोड़ आती थी। पर एक बार माँ ने बाहर सड़क पर थोड़ा दूर एक बड़े से सांप को बहुत तेज रेंगते हुए देखा था और अंदर आकर मुझे बताया था। मैं उत्सुकता से उसे देखने बाहर आयी तब तक वह सांप हमारे घर की सीढ़ियों के बिल्कुल पास से गुजर रहा था। वह बहुत लम्बा, मोटा और इतने गहरे काले रंग का था कि उसे देखते ही मन में डर की एक लहर कौंध पड़ी। मैंने जरा सा ध्यान हटाया जितने में वह जाने कहाँ चला गया। फिर कुछ देर में मैंने बाहर की फाटक खोली तो अचानक एक लहराता हुआ फन मेरे करीब आया। वह फाटक से सटी दीवार में बनी ताक में बैठा था। मैं तुरंत पीछे हट गयी और फाटक बंद कर दी। कुछ देर बाद वह चला गया। पर बाद में मैं यह सोच रही थी कि शुरू में जब मैंने उसे सड़क पर घर के पास से गुजरते हुए देखा था तब मुझमें डर की लहर क्यों कौंधी थी? जबकि वह तो उस समय मेरे साथ कुछ कर भी नहीं रहा था। कंडीशनिंग ही सही पर यह अनावश्यक भय है न! और तब मैंने सोचा था कि अगली बार मैंने सांप को सिर्फ गुजरते देखा तो कोशिश करुँगी कि डरूं नहीं। 

हाँ, बहादुर हो तुम तो। फिर थोड़ी देर चुप रहकर वह बोला - अरे! तुम्हारे पीछे साँप! 

मैंने थोड़ा चौंक कर पीछे देखा। और फिर आगे मुड़ी तो उसे हँसता हुआ देख मुंह बनाकर उसके साथ खिलखिलाकर हंस पड़ी। 

Monika Jain ‘पंछी’
(03/12/2017)

December 1, 2017

Quotes on Dreams in Hindi

Dream Quotes

  • 01/12/2017 - सपने कई तरह के होते हैं। सामान्यत: स्वप्न हमारे भय, इच्छाओं, दृश्यों और विचारों पर आधारित होते हैं। इनमें से कुछ ऐसे स्वप्न होते हैं जो अवचेतन में बैठे किसी पुराने गहरे डर से पैदा होते हैं और डर का कारण खत्म हो जाने के बावजूद भी समय-समय पर अलग-अलग दृश्यों का रूप लेकर आते रहते हैं। जैसे कोई व्यक्ति हैं, उन्हें बचपन में गणित से इतना डर लगता था कि अब औपचारिक पढ़ाई खत्म होने के बाद भी उन्हें गणित की परीक्षा, उसका पेपर छूट जाने, सवाल न आने, टीचर की डाँट और ऐसे ही संबंधित स्वप्न आते रहते हैं। और हर बार डरकर नींद खुलती है। मनोविज्ञान इसे कैसे लेता है मुझे जानकारी नहीं। लेकिन मैं सोचती हूँ, इन सपनों से छुटकारा पाने का एक उपाय यह है कि जो भ्रम पैदा हो गया है, उस भ्रम को दूर कर देने वाले सत्य को गहराई से आत्मसात कर लिया जाए। जैसे ऊपर वाले उदाहरण में दो चीजें हो सकती हैं। या तो व्यक्ति खुद को यह पक्का यकीन दिला दे कि अब उसे कोई गणित की परीक्षा नहीं देनी है, इसलिए ऐसा कभी होना नहीं है। जब भी यह स्वप्न आये तब तो उसे खुद को यह यकीन दिलाना ही है, इसके अलावा सामान्य रूप से भी। या वह गणित से जो उसका डर है उसे ही दूर कर दे, गणित में रूचि लेकर, उसे अपने लिए सरल बनाकर और साथ ही यह भावना भी कि एक विषय और उसकी परीक्षा पूरा जीवन नहीं है।
  • 15/07/2017 - हर उम्मीद को एक दिन टूटना होता है। हर स्वप्न को एक दिन छूटना होता है। अपनी ओर मोड़ने का परम का शायद यही तरीका है। जरुरी बस यह कि उम्मीद के साथ नाउम्मीदी भी टूटे और सुस्वप्न के साथ दु:स्वप्न भी छूटे। 
  • 24/12/2016 - ...और जब पता चले कि ये सारी कायनात स्वप्न है उस स्वप्नातीत का। 
  • 07/10/2015 - कल रात एक विचित्र स्वप्न देखा। वैसे नींद में आते सपने अक्सर विचित्र ही होते हैं। जीवन के तमाम हिस्से अचानक से एक ही जगह आकर मिल बैठते हैं। नाम किसी और शख्स का होता है तो चेहरा किसी और का। बचपन, स्कूल, कॉलेज यहाँ तक की फेसबुक व अन्य सोशल मीडिया के मित्रों को एक ही जगह एक ही समय इकट्ठे करने का काम सिर्फ सपने ही कर सकते हैं, जहाँ सब एक ही क्लास में लेक्चर सुन (नहीं) रहे होते हैं।...और अगर जागती आँखों से देखे सपनों की बात करूँ तो जीवन के तमाम हिस्सों को तय करने का काम जागते हुए सपने ही तो करते हैं। सपने ज़िन्दगी का कोलाज है। 
  • 10/03/2015 - आँखों के कुछ ख़्वाब, अरमान और ख्वाहिशें ऐसी होती हैं कि बुलबुलों सी स्वत: ही फट जाए तो बेहतर है। क्योंकि जब ख्वाबों को जबरन तोड़ना पड़ता है तो एक और जहाँ असहनीय दर्द से गुजरना होता है, वहीँ दूसरी और इस प्रक्रिया में रिस कर सूख जाता है वह पानी भी जो ह्रदय और आँखों को जीवन देता है, उन्हें पत्थर बनने से रोकता है।...और पानी चाहे आँख का हो या ग्लास का, बचे रहना जरुरी है। 
  • 28/01/2015 - बहुत छोटी सी थी मैं जब दुनिया से कोई खास परिचय भी नहीं था, तब अक्सर एक कल्पना किया करती थी कि ये इतने सारे अलग-अलग घर क्यों बनाये जाते हैं? काश! सारी दुनिया को मिलाकर एक घर बना लिया जाता। उसी के पैरेलल एक बड़ा सा मैदान और उसी के पैरेलल एक बड़ी सी नदी। फिर हम सब अपनी-अपनी पसंद वाले काम करते और एक दूसरे की जरूरतें पूरी हो जाती। कोई लड़ाई-झगड़ा होता ही नहीं। सब मस्ती करते रहते। लम्बे समय तक यह सपना जीवित रहा। हालाँकि फिर समझ आ गया कि कितना बेतुका सपना था। :p 
  • यह जानते हुए भी कि यह संभव नहीं इन आसुँओं को भी तो इंतजार रहता है किसी की मौजूदगी का...और इस इंतजार में कब ये खुद को ही पीना सीख जाते हैं पता भी नहीं चलता।

Monika Jain ‘पंछी’

November 29, 2017

Science and Religion Essay in Hindi

अध्यात्म और विज्ञान

29/11/2017 - “One thing may be true but may not be real true. We can only know relative truth.The absolute truth is only known by universal observer.” 

अगर यह आइंस्टीन द्वारा कहा गया है तो मैं सोचती हूँ अगर आइंस्टीन बुद्ध का ‘परस्परावलंबी सहवर्धन’ और महावीर का ‘अनेकांत व स्याद्वाद’ पढ़ते तो शायद उनके चेहरे पर एक मुस्कुराहट जरूर खिल कर आती। क्योंकि जो जानते हैं, वे मुस्कुराते हैं। वैसे विपरीत भी हो सकता है, अगर आइंस्टीन की समझ महावीर और बुद्ध से मेल ना खाये। क्योंकि दोनों का जानना अलग-अलग स्तर पर है। वैसे बुद्ध सिर्फ ‘परस्परावलंबी सहवर्धन’ और महावीर सिर्फ ‘अनेकांत-स्याद्वाद’ तक नहीं रुकते। उससे कहीं आगे बढ़कर बुद्ध और महावीर हो जाना वह निरपेक्ष दृष्टा हो जाना है जिसका जिक्र ऊपर हुआ है। जो ‘एक सब में और सब एक में’ को देख पाता है। 

बुद्ध के जीवन का एक किस्सा है। एक बार वे अपनी देशना शुरू कर रहे थे, तभी कुछ बच्चे उनके लिए कमल के कुछ पुष्प भेंट के लिए लाये और आकर सभा में बैठ गए। बुद्ध ने एक कमल पुष्प को उसकी डंडी से उठाया और बहुत देर तक ध्यान से उसे देखते रहे और फिर मुस्कुराने लगे। बुद्ध के बाद सबसे पहले उन्हीं के पास खड़े उनके एक वरिष्ठ शिष्य महाकाश्यप भी बुद्ध और उस पुष्प को ध्यान से देखकर मुस्कुराये। सभा में बैठे अन्य लोग विस्मय से दोनों को देख रहे थे और सोच रहे थे कि बुद्ध क्या समझाना चाहते हैं? उसी देशना में बैठा एक भिक्षु स्वास्ति भी कुछ देर उलझन में रहा और फिर मुस्कुराया। मन के संकल्पों-विकल्पों को भूलकर पुष्प के माध्यम से उन्होंने सत्य की अनुभूति की थी एक निरपेक्ष दृष्टा की तरह। 

वैसे एक बहुत प्यारी बात यह है कि कोई बुद्ध या महावीर को कहे कि आप लोगों को पागल बना रहे हैं, भ्रम में डाल रहे हैं, आप कोई सत्य-वत्य नहीं जानते; सब दिखावा, पागलपन और ढोंग है, तो यह सब सुनकर भी वे दोनों मुस्कुरा ही जाएंगे। कारण वही कि जानने वाला मुस्कुराता है। और यह मुस्कान उपहास पूर्ण नहीं करुणा पूर्ण होती है। वैसे जानने वाले की आँखों में किसी और स्थिति में आँसू भी आ सकते हैं, लेकिन वे आँसू भी विचलन के नहीं करुणा के होते हैं। और बिल्कुल यह भी हो सकता है कि जानने वाला मौन ही रहे। अभिव्यक्ति के स्तर पर तो सापेक्षता तब भी काम करेगी ही। 

27/10/2017 - ब्रह्माण्ड जो किसी भी बिंदु से शुरू हुआ होगा (वैसे शुरुआत और अंत भी मन की एक अवधारणा है), उसी के विस्तार का एक अंश हम भी हैं। किसी को सृष्टा मान लेने से भी कोई हल नहीं मिलता क्योंकि सृष्टा की सृष्टि का प्रश्न यथावत रहता है। बस अनंत में एक स्टेप और बढ़ जाता है। समस्या वहां से खड़ी होती है जहाँ ब्रह्माण्ड के विस्तार (विस्तार के साथ-साथ संकुचन अवश्य चलता होगा) के फलस्वरूप हम बन गए और फिर हमने बाकी सबसे खुद को अलग मान लिया। और फिर कई मुद्दों और बातों के लिए कहा कि यह प्रकृति की व्यवस्था है। प्रकृति क्या? हम खुद भी तो प्रकृति ही हैं। हमारे अहंकार (हमारे आकार) या मन के प्रक्षेपण ने हमें बस इस भ्रम में डाला कि हम कुछ अलग हैं। 

अध्यात्म इस भेद को मिटाकर बस उस अभेद को अनुभूत कर पाने का मार्ग है, उस मूल बिंदु तक पहुँचने का मार्ग, जहाँ से कभी हम आकार के रूप में शुरू हुए थे। वह बिंदु जो वास्तव में कुछ है नहीं, मतलब शून्य। शून्य हमारा वही मूल स्वभाव है और विस्तार/विनाश हमारी प्रकृति या वृत्ति। अब जब किसी को उस अभेद को महसूस करना होगा तो जाहिर सी बात है कि उसे खुद शून्य होना पड़ेगा या यूँ कहूं कि उसके मन को खाली होना पड़ेगा। क्योंकि मन का प्रक्षेपण मिटेगा तभी अभेद की अनुभूति हो सकती है। आपको जब मूल तक लौटना है तो रास्ता उल्टा ही अख्तियार करना होगा। वह रास्ता जो वृत्ति विस्तार से ऊपर उठाये। वह रास्ता जो अहंकार का पूर्ण शमन करे। वह रास्ता जिसे अध्यात्म के विरोध में विज्ञान प्रेमी प्रकृति के विरुद्ध जाना कहते हैं। 

प्रकृति या प्रवृत्ति में सिर्फ काम वासना शामिल नहीं है। ईर्ष्या, द्वेष, लोभ, मोह, सुख, हर्ष, क्रोध...मन के अच्छे-बुरे जो भी भाव हैं सब शामिल हैं। जिन सबों को मिलाकर हम मन कह सकते हैं। ब्रह्मचर्य का सम्बन्ध भी सिर्फ यौनेच्छा के शमन से नहीं है, पूरे मन से है। ब्रह्मचर्य शब्द से ही स्पष्ट है ब्रह्म जैसी चर्या अर्थात जो भी हमारा मूल है (शून्य) उस सा होना। यह पोस्ट ब्रह्मचर्य की वकालत में नहीं, यह पोस्ट अपनी समझ के अनुरूप बुद्धत्व/आत्मबोध को समझने का प्रयास भर है। प्रकृति और मूल का बस यही अंतर है। प्रकृति भटक जाना या खुद को भूल जाना है, स्वभाव वापस खुद तक लौट आना है। अल्बर्ट आइंस्टीन यूँ ही नहीं कहते कि कामयाबी और उसके साथ आने वाली बेचैनी के बजाय एक शांत और विनम्र जीवन आपको अधिक ख़ुशी देगा। ईमानदार हैं वे। बाकी अपने घर, अपने केंद्र पर लौटने (अवस्थित होने) से बड़ा कोई सुकून होता भी नहीं। लेकिन मुझे हैरत होती है, जब मैं देखती हूँ कि अध्यात्म प्रेमी (तथाकथित बाबा नहीं) विज्ञान के साथ कोई विरोध महसूस नहीं करते, क्योंकि वे जानते हैं कि अध्यात्म खुद एक विज्ञान है लेकिन नास्तिक विज्ञान प्रेमियों के साथ अक्सर यह बात सत्य नहीं। तब जबकि विज्ञान की ही विभिन्न शाखाओं में से मनोविज्ञान सबसे महत्वपूर्ण शाखा है। मन ना हो तो इस तरह से अन्य शाखाएं अस्तित्व में आये ही ना और ना ही उनकी जरूरत शेष है। सारा खेल ही मन का है। वह चाहे सकल ब्रह्मांडीय चेतना हो या मानव मन। इति। 

Monika Jain ‘पंछी’

November 21, 2017

Poem on Gautam Buddha (Buddha Purnima) in Hindi

बुद्ध 

सुनो बुद्ध -

हो चुके होंगे तुम मुक्त
अभी मनुष्यों ने नहीं दिया है निर्वाण तुम्हें
आये दिन तुम खड़े होते हो मुजरिम बनकर
किसी न किसी गृहस्थ प्रबुद्ध के कटघरे में।
कसूर वही चिरंतन स्त्री पलायन।

पर तुम समझते हो
सिद्धार्थ भी तो अटका था दो ही चीजों में
धन और काम
इन ही दो पाटों के बीच पिस जाते हैं
सभी सांसारिक बोधिसत्व।
पर तुम कह तो सकते हो
वो तुम नहीं सिद्धार्थ था
चलो मैं कह देता हूँ।

सुनो गृहस्थ प्रबुद्धों -

कोई बुद्ध नहीं करता पलायन
सिद्धार्थ ही करते हैं।
बुद्ध पकड़ते ही नहीं
तो त्यागने का प्रश्न नहीं
सिद्धार्थ को लगता है
कि उसने पकड़ा है
सो वो ही त्यागता है
फिर सभी कुछ तो त्यागता है वो भी
तुम ही क्यूँ अटक जाते हो स्त्री पर?

फिर ये भी तो बताओ
कि लौट आये थे बुद्ध!
हर सिद्धार्थ का बुद्ध जब जन्मता है
तो स्वीकारता है वो सब
जो भूल गया था सिद्धार्थ
नि:शब्द खड़े सुनते भी तो हैं
यशोधरा के व्यथित ह्रदय को
क्या सिद्धार्थ सुन पाता?

बुद्ध के शून्य में ही समा पाता है
हर यशोधरा का प्रेम; जानती है
सिद्धार्थ में कुछ तो भोग था ही
अब यशोधरा भी समर्पित है भिक्षुणी होकर।

बस मानवों तुम्हारा ही शूल नही निकलता
पूछो अपने अंदर के सिद्धार्थ से
कितना बुद्ध पनपा है अभी
उत्तर में पाओगे स्वयं को नतमस्तक
बुद्ध के बुद्धत्व के सम्मुख
और वो शांत होंगे सदा की भाँति
इक मद्धिम मुस्कान लिए।

Sushil Kumar

November 10, 2017

Essay on Truth in Hindi

सत्य

07/03/2017 - बीते एक साल से ऐसा लगभग हर दूसरे दिन होता है कि इस अस्तित्व को लेकर मेरे मन में कोई प्रश्न खड़ा होता है और अगले ही पल या कुछ समय बाद मेरे सामने उसी से जुड़ी कोई बात पढ़ने को आ जाती है। जैन दर्शन में मैंने कालचक्र की अवधारणा पढ़ी थी। जिसके अनुसार सम्पूर्ण कालचक्र को दो भागों में बाँटा जाता है - उत्सर्पिणी (आरोही) काल और अवसर्पिणी (अवरोही) काल। दोनों हिस्सों के 6 भाग हैं। हर आधे चक्र में 63 शलाका पुरुष होते हैं। जिनका सम्बन्ध धर्म की स्थापना और मनुष्यों को संसार चक्र से मुक्त कराने से होता है। हिन्दू दर्शन में भी कालचक्र की ऐसी ही मिलती-जुलती अवधारणा है। बाकी पंथों का मुझे पता नहीं। यह अवधारणा कितनी सही है या गलत इस बारे में मुझे बिल्कुल नहीं पता। धर्म का जो विद्रूप रूप कभी-कभी सामने आता है, उसे देखकर मन कभी-कभी बेवजह के कर्म-कांडों के प्रति वितृष्णा से भी भर उठता है। सरलता और  गहनता मुझे पसंद है, लेकिन अगर कुछ पलों के लिए सही माने तो कालचक्र की यह अवधारणा पढ़कर मन में यही विचार आया कि इसका मतलब सब कुछ एक निश्चित नियम से अनन्त काल से चल रहा है। फिर अगला प्रश्न यह कि जब सबको मुक्त ही होना है तो फिर ये बेवजह की नौटंकी क्यों चल रही है? हर जीव के लिए कितना संघर्ष है यहाँ और हासिल तो कुछ भी नहीं। कल यही सोच रही थी, फिर आज सुबह अचानक पढ़ने में आया कि माया सत्य की शक्ति है स्वयं को भूल जाने की। सत्य पूर्ण है। सत्य की प्रत्येक शक्ति अपरीमित है, असीमित। और उसे प्रत्येक शक्ति हासिल है। प्रत्येक शक्ति उसी से है, उसी में निहित है, उसी की है। जब उसे सारी शक्तियां और सारे अधिकार हैं तो उसे यह भी अधिकार है न कि वह खुद को भूल जाए। बस सत्य का खुद को भूल जाना ही संसार का रूप ले लेता है।

कालचक्र की इस तरह से अवधारणा को मैं अभी सच नहीं मानती। और क्योंकि पता नहीं तो पूरी तरह नकार भी नहीं सकती। लेकिन जैसे समय, स्थान और बाकी सब चीजें सापेक्ष हैं तो चिंतन के तौर पर यह विश्वास पक्का हुआ जाता है कि पूर्ण सत्य की अनुभूति समय और स्थान की सीमाओं से परे जाने पर होती ही होगी। अनंत और शून्य का जिक्र भी इस सन्दर्भ में समझ आता है।

अक्सर नास्तिकों द्वारा यह सवाल उठता है कि आपका ईश्वर इतना बेरहम क्यों है जो यह सब होने देता है? सवाल वाजिब है। और आस्तिक कहते हैं कि ईश्वर की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता मतलब सब कुछ उसकी ही मर्जी से होता है। मैं यहाँ पर बस इतना कहूँगी कि ईश्वर (सत्य) अलग से कोई व्यक्ति नहीं है। वह आप, मैं या जो कुछ भी इस दुनिया में है और नहीं है...सब कुछ है। बात मुझे अब सही भी लगती है कि सत्य अच्छे-बुरे या उचित-अनुचित की सीमाओं में बंध ही कैसे सकता है? बंध सकता होता तो सत्य कैसे होता? वह तो माया के रूप में इन्हें समाहित करता हुआ भी इनसे परे (अछूता) ही होगा। तो पूर्ण सत्य जैसा कुछ होना तो चाहिए ही। मुख्य बात यह है कि हमें उसकी स्थायी अनुभूति कब होती है। 

10/11/2017 - कई लोगों को लगता है कि सापेक्षता को समझते हुए निरपेक्षता की ओर कदम बढ़ना (जो कि स्वत: ही होता है, समझ के अनुपात में) उदासीनता है, समस्यायों से मुंह चुराना है, पल्ला झाड़ना है, पलायन है और कुछ लोगों के दृष्टिकोण से असंवेदनशीलता भी। लेकिन वास्तव में निरपेक्षता की ओर बढ़ना जागरूकता ही है। बस इतना अंतर है कि हर व्यक्ति/स्तर/क्षण की अपनी-अपनी समस्याएं होती है और उसी अनुरूप समाधान और जागरूकतायें भी। आवेश दो प्रकार के होते हैं : धनात्मक, ऋणात्मक और इसके अलावा एक स्थिति आवेश रहित होती है : उदासीन। मन के विचार/भाव भी तीन प्रकार के होते हैं : सकारात्मक, नकारात्मक और उदासीन। शब्दों और भाषा की सीमा है, लेकिन वास्तव में निरपेक्षता उदासीनता नहीं है। यह जागरूकता है तीनों के प्रति भी और तीनों से परे भी। 

भूखा पेट भगवान नहीं समझता, उसे रोटी की ही जरुरत होगी - यह सच है। उसे रोटी खिलाना या अपनी रोटी कमाने में सक्षम बनाना संवेदनशीलता है। लेकिन एक सच यह भी है कि जो ईश्वर के निकटतम हो, उसे कोई भी भूख विचलित नहीं करती। मुझे यह संवेदना की पराकाष्ठा लगती है। हम भावुकता को संवेदनशीलता समझने लगते हैं, इसलिए धोखा खा जाते हैं। बाकी ऐसा व्यक्ति तो किसी के भी और सबके ही प्रति सबसे अधिक संवेदनशील होगा। इन दोनों स्थितियों के बीच मन की एक लम्बी यात्रा है। पहला सच हम सभी समझते हैं, उसे जीते हैं, बल्कि अलग-अलग रूपों और मात्राओं में जीते हैं। उसे ही जीते-जीते मर भी जाते हैं। लेकिन दूसरे सच को समझने और जीने की चाह पहले वाले सच से पलायन नहीं, बल्कि स्थायी समाधान तक पहुँचने की चाह है। 

कुछ लोगों को मेरा अध्यात्म पर लिखना अखरता है। हालाँकि मैंने कई बार कहा है कि मैं कोई बुद्ध, प्रबुद्ध, मनीषी या ज्ञानी नहीं हूँ। सीख रही हूँ। भौतिकता से पूरी तरह दूर भी नहीं। कई कमियां भी होंगी। लेकिन अध्यात्म मुझे कुछ गंभीर व्यक्तिगत समस्यायों को समभाव से लेना सिखाता है, जिनका समाधान किसी के पास नहीं है। इसलिए इस पर मेरी अभिव्यक्ति विशेष रूप से स्वाभाविक है, सहज है, इरादतन नहीं। लिखते-पढ़ते मैंने खुद में कई बेहतर बदलाव महसूस किये हैं। अपनी जरूरतों और अपेक्षाओं को कम से कम होते देखा है। निश्छलता और निर्दोषिता के सौंदर्य को सजगता से महसूस किया है। इसके अलावा जब आप क्रिया-प्रतिक्रिया के इस खेल को कुछ-कुछ समझने लगते हैं तो विचारों की चक्की घूम-फिरकर एक ही बात पर पहुँचती है। आस्तिकों की कट्टरता से मेरा कोई वास्ता नहीं है, तो मैं नास्तिक कट्टरता (बात जिन पर लागू बस उनके लिए ही) का भी समर्थन नहीं कर सकती। श्रेणियों के साथ यह ख़तरा सदैव ही रहता है। लेकिन श्रेणीकरण सुविधा के लिए होता है, वह सत्य नहीं होता। क्योंकि किसी भी विषय का कोई स्वतंत्र अस्तित्व संभव ही नहीं। 

Monika Jain ‘पंछी’

November 8, 2017

भक्ति योग ~ Essay on Devotion in Hindi

भक्ति जागरूकता की ही एक अवस्था है

भक्ति (अपने चरम और शुद्ध रूप में) का जो अर्थ मैंने समझने का प्रयास किया, वह है कृतज्ञता, श्रद्धा और समर्पण। जो भी हमारे पास है, जो भी हमें अस्तित्व से मिला है/मिल रहा है, उसके लिए कृतज्ञता। भक्ति व्यक्ति/प्रतीक केंद्रित हो तब भी यह कृतज्ञता सारे अस्तित्व के प्रति ही होती है। बस वहां अस्तित्व का नाम भर बदल जाता है। बाकी कृतघ्नता ही तो हमारी असल समस्या है। कृतज्ञता की तो बेहद जरुरत है हमें। श्रद्धा भी, लेकिन यह वैसी ही श्रद्धा है जैसी किसी नास्तिक में भी आत्म तत्व के प्रति हो सकती है। यह कुछ ऐसा है जैसे चाहे जैसी भी स्थिति आये पर यह श्रद्धा उस स्थिति का दृढ़ता से सामना करने के लिए तैयार रखेगी। भय नहीं होगा, चाहे हम रहे न रहे, चाहे हमारे साथ कुछ भी हो जाए। लेकिन यहाँ भय नहीं तो अहंकार भी नहीं होता। भय और अहंकार सम्बंधित हैं। 

समर्पण इस अर्थ में कि जो वास्तव में भक्त होते हैं, वे परम/मूल तत्व के साथ एक हो जाना चाहते हैं। यह कुछ-कुछ वैसा ही समपर्ण है जो कोई नास्तिक भी किसी काम को करते समय खुद को पूरी तरह भूल जाता है। यह कितना अच्छा अनुभव होता है, हम सब जानते हैं। हाँ, भक्त का समपर्ण स्थायी रूप से खुद को खोना चाहता है। अस्तित्व/प्रकृति/परम तत्व को ईश्वर कह देना वास्तव में बस शब्द का अंतर भर ही तो है। अब आगे जो रुढ़ियां या अनावश्यक चीजें जुड़ती हैं, उसमें शब्द का कोई दोष नहीं, वह तो लोगों पर निर्भर करेगा। इसके अलावा इसका अकर्मण्यता से कोई सम्बन्ध नहीं है, क्योंकि अपनी समझ और परिस्थतियों के अनुरूप जो करने की जरुरत है, वह सब किया ही जाएगा। हाँ, अकर्ता हो जाने से जरूर है। क्योंकि वास्तव में हम सभी कुछ करते हुए भी अकर्ता ही हैं। कार्य-कारण की अनंत दिशाओं से अनंत श्रृंखलाएं हैं, इसलिए कर्ता सारे अस्तित्व (जिसका ही एक नाम ईश्वर है) को मान लिया जाता है। विज्ञान में Free Will पर जो चर्चाएं होती हैं, कर्ता-अकर्ता से सम्बंधित बात ही है। शुद्ध परिभाषा बस समझने के लिए, लेकिन जो लोग सामान्यत: खुद को भक्त समझते हैं, या जिन्हें भक्त कहा जाता है, या जो किसी को भक्त कहते हैं, मुझे नहीं लगता उनमें से अधिकांश लोगों का इस परिभाषा के आसपास से दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध है। हाँ, क्षणिक या अस्थायी तौर पर ऐसा कुछ हो सकता है, होता रहता है, क्योंकि भावों की दशा सदा बदलती रहती है। लेकिन राजनीति, अहंकार, उत्पात, आतंकवाद, अपनी रूढ़ियों से जड़ता की हद तक मोह, अज्ञान, मूर्खता, अन्धविश्वास, बस मनोकामनाएं ही मनोकामनाएं, किसी व्यक्ति विशेष का अंधप्रशंसक होना, कट्टरता जो दूसरों पर भी कुछ मानने का अनावश्यक दबाव डाले...इनका भक्ति से दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं है। भक्ति जागरूकता की ही एक अवस्था है। 

नोट : मैं भक्त नहीं हूँ, ज्ञानी नहीं हूँ, सीख रही हूँ, सीखने की राह पर हूँ। 

Monika Jain ‘पंछी’
(08/11/2017)

November 4, 2017

Courage and Fear Quotes in Hindi

Courage and Fear Quotes

  • 28/09/2017 - नरक की कल्पना की कभी जरुरत ही नहीं पड़ी। मुझे तो स्वर्ग की कल्पना भी डराती है। मरने के बाद अगर ऐसा कोई सिस्टम हुआ तो मैं तो विद्रोह कर दूँगी। 
  • 25/09/2017 - भय बहुत तरह के होते हैं, जिसमें ये सत्ताधारियों का भय तो अति कुंठित भय है। कातरता/गलत का लाठी उठाना हमेशा एक अलग ही तरह से हैरान करता रहा मुझे। ऐसे नमूने आसपास भी हैं, हर जगह मिल जायेंगे। विमर्श से, समस्यायों को सुलझाने से, अपने ही देश के लोगों के हितों से इतना डरते हैं ये लोग! इतने कमजोर हैं कि खुद में सुधार कर नहीं सकते, बस इसलिए बाकी सब कुछ भी बिगाड़ देना चाहते हैं। कुछ लोगों की भाषा ही बस डर/लालच होती है। बस डराते हैं और अफ़सोस कि उन पर असर भी सिर्फ डर ही करता है।
  • 16/09/2017 - जब कुछ खो देने का डर न रहे, तो निर्णय करना कितना आसान हो जाता है।
  • 04/09/2017 - ...और फिर एक समय ऐसा आता है जब हर चिंतन और हर मंथन का निष्कर्ष एक ही निकलता है। और मैं कभी-कभी सोचती हूँ - जब तक अदम्य साहस न हो, प्रकृति ऐसा निष्कर्ष किसी को ना दे। पर शायद यह भी है कि यह निष्कर्ष ही वह अदम्य साहस दे सकता है। 
  • 16/01/2017 - लुटेरे और चोर का अंतर बस इतना है कि एक के भय ने अँधेरे का रूप धरा और एक के भय ने बन्दूक का। 
  • 14/06/2017 - सबसे साहसी निर्णय वे होते हैं, जो खुद (अहंकार) को खोने के लिए लिये जाते हैं। 
  • 19/09/2016 - किसी भी सद्गुण के ठहरने की जमीं निर्भयता ही तैयार करती है। अभय पहला सद्गुण है।
  • 11/07/2016 - अभय वही दे सकता है...जो खुद भयभीत न हो।
  • 07/02/2016 - जिस व्यक्ति के समक्ष बोलते समय आपको शब्द-शब्द के प्रति अतिसजग रहना पड़े, उसके साथ न आप ज़िन्दगी बिता सकते हैं और न ही दोस्ती निभा सकते हैं। 
  • 13/12/2015 - डरो नहीं! क्योंकि कुछ खो देने का डर वाकई में खो देता है।
  • 19/11/2015 - वह कोई भी कार्य साहस, निर्भयता या पराक्रम नहीं हो सकता जो हमारी आत्मा को पतन के मार्ग पर धकेलता हो। 
  • 24/08/2014 - बुरे के बुरे वक्त में पानी पी-पीकर उसे बुरा-बुरा कहकर कोसने वाले हजारों चूहे बिलों से निकल आते हैं, पर अफ़सोस ऐसे शेर नज़र नहीं आते जो बुरे के अच्छे वक्त में भी उसके खिलाफ बोल सके। 
  • अच्छाई किसी भय के अधीन नहीं होनी चाहिए, फिर चाहे वह ईश्वर का भय ही क्यों न हो। अच्छाई तो स्वाभाविक होनी चाहिए, जो ईश्वर के अस्तित्व या कर्म फल से अप्रभावित होती है। 
  • अभयदान से बड़ा दान और क्या हो सकता है? इसमें हम वहीँ देते हैं जो हमारा है या यूँ कहें कि जो खुद हम हैं। बाकी के सारे दान में हम वह देते हैं जो हमारा होता ही नहीं। 
  • कोई भी सद्गुण अपने साथ अतीव साहस और आत्मनिर्भरता की मांग करता है। क्योंकि दौर ऐसा है कि ईमानदारी भी शक की नज़र से देखी जा सकती है।

Monika Jain ‘पंछी’

November 1, 2017

Meditation (Awareness) (Devotion) Quotes in Hindi

Meditation / Awareness / Devotion Quotes 

  • 01/11/2017 - किसी भी चीज को सम्पूर्णता से देखने/समझने का बस एक ही तरीका है - वह चीज हो जाना। बाकी हर रास्ता, हर मार्ग, हर विषय...एक दूरी, एक विभेद बनाये ही रखेगा। 
  • 20/10/2017 - उन्माद (बेहोशी) के जिन क्षणों को हम उत्सव मानते हैं, उन क्षणों को बस इतना ही सोचने की जरुरत है कि कुछ लोगों के लिए ध्यान कैसे उत्सव बन जाता है? लम्बी यात्रा है बीच में। वैसे बचपन में मेरे लिए दिवाली, जन्मदिन और कुछ अन्य त्योहारों का जो सबसे ख़ास अर्थ होता था, वह था महीने भर पहले से अपने दोस्तों और कुछ टीचर्स के लिए ग्रीटिंग कार्ड्स बनाने में जुट जाना। और तब मैं इतनी अंतर्मुखी थी कि अच्छा सा ग्रीटिंग कार्ड बन जाने के बाद भी उसे अपनी टीचर को देने में मुझे झिझक होती थी, और कभी-कभी मैं अपनी दोस्त से यह करने को कहती थी। कुछ समय बाद उत्सव के ख़ास अर्थ में मिठाई (खासकर लड्डू) और खाने-पीने की बहुत सी अन्य चीजें बनाना भी शामिल हुआ। दोस्तों और मेहमानों के घर आने पर जब वे किसी चीज की तारीफ करके पूछते थे, तब यह बताना अच्छा लगता था कि यह मैंने बनाया। ग्रीटिंग कार्ड्स बनाना कुछ सालों से नहीं होता। आखिरी बार दिन-रात लगकर एक साथ किसी के एक ही जन्मदिन के लिए इतने सारे ग्रीटिंग कार्ड्स बनाये थे कि वह उस शौक का चरम और अंत था, क्योंकि उसके बाद एक दो बार कोशिश करने पर भी उतना सुन्दर कुछ नहीं बना। उन कार्ड्स की कोई तस्वीर भी नहीं थी मेरे पास कि वापस प्रेरित होती। लड्डू बनाना मुझे अभी भी पसंद है कभी-कभी। बेहोशी और होश के बीच रास्ते में मैं भी कहीं फंसी हूँ, लेकिन कुछ सालों से इतना तो जान चुकी हूँ कि असल ग्रीटिंग्स जीवन में तब आती है, असल लड्डू तब फूटते हैं, जब ध्यान (होश) पूरी तरह से उत्सव बन जाता है। यही सबसे बड़ी शुभकामना हो सकती है किसी के भी लिए। हाँ, ऐसा होने पर तथाकथित सारे धर्म (जो हमेशा ख़तरे में ही रहते हैं) वाकई मर जाते हैं, लेकिन असल धर्म का पता भी लग जाता है।
  • 15/09/2017 - ...और फिर एक समय ऐसा आता है, जब हर चिंतन का एक ही निष्कर्ष निकलता है।
  • 23/02/2017 - I don’t want god to be always with me, rather I want to be always with god. ईश्वर (परम तत्व) को अपने अनुकूल बनाने से कई बेहतर है...परम तत्व के अनुकूल बन जाना। हम परम तत्व को निर्देश न दें, बल्कि उससे निर्देश लें। यही भक्ति है, यही प्रार्थना है...और यही है ध्यान।
  • 22/02/2017 -...कि जब उसे घास लाने को कहा गया और वह देर तक नहीं लौटा तो उसकी खोज शुरू हुई। वह घास के मैदान में मिला। उससे जब कारण पूछा गया तो उसने कहा, 'मैं घास हो गया था।'...मतलब कितने निर्दोष से किस्से हैं...आँखें भीग जाती हैं...मुस्कुराहट दौड़ कर होंठों पर तैरने लगती है। कुछ बेहद जरुरी...नहीं बेहद नहीं...सबसे जरुरी याद आ जाता है। उस दिन मैंने जिक्र किया था न?...कि कृष्णमूर्ति पूछते हैं - क्या आपने कभी किसी पेड़ को देखा है? पेड़ को देखने के लिए पेड़ हो जाना पड़ता है...हाँ, पेड़ ही हो जाना पड़ता है...और कोई उपाय ही नहीं। :) 
  • 21/01/2017 - कृत्य चाहे कोई भी हो उससे कुछ हिंसा तो होगी ही। मुख्य बात यह है कि वह कृत्य हमारे अहंकार से उपजा है या फिर हमारे होश, समर्पण और ध्यान से। 
  • 12/01/2017 - मीरा को पागल कहने वालों की बुद्धिमानी पर खेद होता है। 
  • 18/12/2016 - सामान्यत: हर चीज का कारण तो होता है, लेकिन उस कारण का भी कारण खोजते-खोजते-खोजते-खोजते...वह हमेशा अकारण तक ही पहुँचता है। ईश्वर उस अकारण से भिन्न और क्या है? जिसमें सारे कारण विलय हो जाते हैं। और भक्ति, प्रेम, ध्यान? वह बस उस अकारण के प्रति समर्पण और अपने ईश्वरत्व को उपलब्ध हो जाने का मार्ग है। 
  • 15/11/2016 - भक्ति तो सहज ध्यान है, लेकिन जो सबसे सहज है उसके लिए ही हम सहज नहीं। इस समूचे अस्तित्व के प्रति समर्पण ही भक्ति है, लेकिन हमारा अहंकार समर्पण नहीं करना चाहता। 'भक्त' शब्द व्यंग्य के रूप में बहुत प्रचलित है यहाँ।...पर सच यह भी तो है कि हमारे सारे प्रयास अनजाने में ही सही उस आनंद की खोज में ही है जो 'भक्त' को प्राप्त है। बात बस इतनी सी है कि जब तक प्रयास है भक्त हो जाना मयस्सर ही नहीं। 
  • 11/09/2016 - सहज भक्ति/प्रेम/ध्यान को उपलब्ध हो जाना...इससे बड़ी उपलब्धि और क्या हो सकती है?
  • 21/06/2016 - लेखक/वक्ता के रूप में जब कदम-कदम पर शब्दों की सीमा का भान होने लगता है...और पाठक/श्रोता के रूप में जब चंद शब्द ही असीमित की झलक देने लगते हैं...तब-तब हमारी यात्रा की दिशा स्वयं की ओर होती है।
  • 22/10/2015 - जब हम किसी कार्य को पूरी तरह समर्पित होकर करते हैं (खुद को पूरी तरह भुलाकर) तो जो परिणाम आता है वह इतना अप्रत्याशित होता है कि कर्ता को विश्वास ही नहीं होता कि यह काम उसने किया है। मनुष्य की क्षमताओं के रास्ते का सबसे बड़ा बाधक उसका 'मैं' ही होता है। इसलिए सफलता हो, प्रेम हो, चाहे मुक्ति...समर्पण पहली शर्त है। 
  • 10/09/2015 - सारी समस्यायों का कारण ध्यान (एकाग्रता) है। सारी समस्यायों का समाधान भी ध्यान (होश) ही है। निर्भर करता है ध्यान कहाँ लगाया जा रहा है। 
  • अंधसमर्थक या अंधविरोधी भक्त नहीं होते। भक्ति तो जागरूकता के एक विशेष स्तर पर घटित होती है। प्रेम का चरम है भक्ति। इसमें समर्थन या विरोध के लिए कोई स्थान है ही कहाँ? यह तो पूर्ण स्वीकार की अवस्था है। 
  • जैसे-जैसे हम सापेक्षता को समझेंगे हम जानेंगे कि पूर्ण रूप से सही और गलत जैसा कुछ भी नहीं होता। तब बस एक ही चीज की जरुरत होती है – जागरूकता की कि इस समय क्या करना थोड़ा अधिक सही रहेगा और क्या करना थोड़ा कम गलत।

Monika Jain ‘पंछी’

October 30, 2017

Essay on Religious Books (Scripture) in Hindi

समस्या धर्मग्रन्थ नहीं

धर्मग्रंथों के साथ एक विडम्बना है कि इन्हें कट्टर लोगों द्वारा अंतिम सत्य मान लिया जाता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि इन्हें अंतिम सत्य मानकर भी पूरी तरह अंतिम सत्य माना नहीं जाता। यह बात अच्छी होती अगर धर्म ग्रंथों को एक सामान्य पुस्तक की तरह जागरूकता और निष्पक्षता के साथ पढ़ा जाता। लेकिन यही बात बहुत बुरी हो जाती है जब उन्हें जागरूकता और निष्पक्षता के साथ नहीं पढ़ा जाता। दरअसल होता यह है कि पूर्वाग्रह हम पर अक्सर हावी होते हैं। और हम वही हिस्सा पढ़ते हैं जो जाने-अनजाने पढ़ना चाहते हैं। 

गीता पढ़ते समय मैंने यह महसूस किया कि इस पुस्तक में सभी को अपने काम की चीजें मिल सकती है। गीता में राष्ट्रवादी आस्तिकों का प्रिय वाक्य है - आवश्यकता होने पर हिंसा भी धर्म है। वैसे बात गलत नहीं है, लेकिन निर्भर करेगा। इसके अलावा भक्ति वाली बात भी है। यह शब्द वैसा है नहीं जैसा इसे समझा और उपयोग में लाया जाता है। इस शब्द के लिए समय/वर्तमान को देखना भी बहुत जरुरी है। इस पर आगे कभी चर्चा करुँगी। नास्तिकों के काम के शब्द भी हैं इसमें जिनके आधार पर इसे कोरी गप्प घोषित किया जा सकता है। वे भी अपनी जगह गलत नहीं है। मुझे भी अपने काम के और अपनी जिज्ञासा को शांत करने वाले शब्द खोजने थे और सार रूप में मुझे तीन शब्द मिले : ध्यानयोग, ज्ञानयोग और कर्मयोग। मेरी आदत है चीजों को लिंक करने की तो मेरा ध्यान जैन (निर्ग्रन्थ) दर्शन के त्रिरत्नों पर गया, जो हैं : सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन और सम्यक चरित्र। सम्यक ज्ञान को ज्ञानयोग कह सकते हैं, सम्यक दर्शन को ध्यान योग और सम्यक चरित्र को कर्मयोग। बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग : सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाक, सम्यक कर्म, सम्यक जीविका, सम्यक प्रयास, सम्यक स्मृति, सम्यक समाधि...में भी सब कुछ मिलता जुलता ही है। बाइबल और कुरान मैंने बिल्कुल भी नहीं पढ़ी है। लेकिन हाँ, वहां भी काम की कुछ चीजें मिल ही जाएगी। जिन्हें ज्ञान, दर्शन और चरित्र से लिंक किया जा सकता है। बाकी विसंगतियां भी जितना पूर्वाग्रह से मुक्त रहेंगे नज़र आ जायेगी। 

कहना यह था कि अच्छा-बुरा हर पुस्तक में खोजा जा सकता है। इसके अलावा किसी भी बात को देश-काल- परिस्थिति के सन्दर्भ में देखा जाना जरुरी है। समस्या पुस्तकों में इतनी नहीं जितनी हमारे उद्देश्य में है। जो जाने-अनजाने घर, परिवार, परिवेश, हमारी जन्मजात प्रकृति, परिस्थतियों सबसे प्रभावित होता है। विज्ञान की पुस्तकों के साथ यह बात अच्छी है कि वहां सामान्यत: गप्प नहीं मिलेगी, लेकिन दुरूपयोग विज्ञान का भी होता है। ज्ञान, दृष्टि, चरित्र जब तक सम्यक न हो जाने-अनजाने दुरूपयोग हर चीज का हो सकता है, होता है। धर्म/अध्यात्म का दुरूपयोग अधिक घृणित नज़र आता है क्योंकि यहाँ पवित्रता, ईश्वर जैसे शब्दों की आड़ ली जाती है और यहाँ यौन शोषण से जुड़े मामले भी मिलते हैं। विज्ञान के दुरूपयोग तर्क/विकास को कम, समझ और अनुभव को अधिक नज़र आते हैं और आते भी हैं तो मजबूरी में नज़रअंदाज करने पड़ते हैं। बाकी हिंसा में विज्ञान के दुरूपयोग का भी कोई कम योगदान नहीं। पर गलत ज्ञान नहीं, गलत इनका दुरूपयोग है। 

तो हमारे समाज की मूल समस्या धर्मग्रन्थ नहीं है। जो भी अपने-अपने धर्म की कट्टर होकर वकालत करते हैं, उनमें से कई लोगों ने धर्मग्रन्थ पढ़े भी नहीं होते हैं। वे उन्हें पूजते ज्यादा हैं। हमारे समाज की समस्या समझ, जागरूकता, निर्भयता और संवेदनशीलता की कमी है। जिसका फायदा धर्म के ठेकेदार उठाते हैं और अन्य विषयों के पारंगत भी। स्वार्थ और अज्ञान हावी है जो येन-केन-प्रकारेण सिद्ध होना चाहता है और सिद्ध होने के लिए धर्म, राजनीति, विज्ञान, संस्कृति, परंपरा, वाम, दक्षिण...किसी की भी आड़ ले सकता है।

Monika Jain ‘पंछी’
(30/10/2017)

October 26, 2017

Quotes on Tradition in Hindi

Tradition Quotes

  • 26/10/2017 - मुझे कई परम्पराएं और रीति-रिवाज रास नहीं आते। ऐसे में जब मैं कभी अपनी होने वाली सास का ख़याल करती थी तो यह सोचती थी कि अगर मुझे कोई परम्परा बिल्कुल पसंद नहीं होगी और मुझे मानने का मन नहीं होगा तो मैं अपनी सास को एक लव लेटर लिखूंगी। उसमें शामिल होने वाली कुछ बातें जो मुझे याद है अभी, उनमें से एक यह कि मैं आपके बेटे को आपसे कभी दूर नहीं करुँगी। :p जरुरत होने पर आपका पूरा ख़याल रखूंगी। आपकी बाहर जाकर कभी भी बुराई नहीं करुँगी। :p परिवार के सभी लोगों को प्यार और सम्मान दूँगी, लेकिन मुझे इन सब परम्पराओं और रीति-रिवाजों को मानने के लिए फाॅर्स नहीं करिये। और फिर मुझे पढ़ाई के अलावा भी इतनी सारी चीजें और काम आते हैं, तो इतनी प्यारी बहु को तो आप प्यार करेंगी ही और उसकी भावनाओं का सम्मान भी। :D 
  • 22/10/2017 - कुछ विकृत परम्पराओं से मुक्ति के लिए इस देश के हर घर, गली, मोहल्ले, गाँव और शहर को हर उम्र के अनुकूल इंडोर-आउटडोर खेलों और प्रकृति से जुड़े मनोरंजन की सख्त जरुरत है। कुछेक को छोड़कर परम्पराओं और उत्सवों में मैं बहुत ज्यादा भागीदार नहीं रही कभी, लेकिन जैसी जगह, मोहल्ला और साथ के बच्चे थे, वहां पढ़ने के अलावा बाकी ज्यादातर समय खेलों में बीता। लिस्ट बनाने बैठूं कि क्या-क्या खेला है तो 100 से भी ऊपर लिस्ट जायेगी और हम लोग बहुत से इनोवेटिव आइडियाज और प्री प्लानिंग को शामिल करते हुए खेला करते थे। खेल अभी भी पूरी तरह नहीं छूटे हैं। अपने लिए नहीं पर आसपास या परिवार के बच्चों के लिए ही सही। यहाँ बात यह नहीं है कि खेल मुझे पसंद थे। लगभग सभी को पसंद होते हैं। बात यह है कि ये शारीरिक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक...सभी कारणों से भी बेहद जरुरी हैं - सिर्फ बच्चों के लिए नहीं, सभी के लिए। इसके अलावा जब हम रोजमर्रा के कामों में भी हर तरह से प्रकृति और पर्यावरण को नुकसान पहुँचाते हैं तो उत्सवों और पर्वों के रूप में खेलों से इतर भी हम ऐसी परम्पराएं क्यों नहीं विकसित कर सकते जो उस नुकसान की भरपाई भी करे, सरल हो और सभी के मनोरंजन और जुड़ाव में सहयोगी भी। हर परिवार यह पहल कर सकता है। साथ मिलकर किया गया हर काम अच्छा ही लगता है। उत्सव और परंपरा के रूप में किसी अच्छे कार्य को शामिल कर लेना तो सबसे ज्यादा कारगर हो सकता है। हमारी व्यक्तिगत मनोकामनाएं और आस्थाएं व्यापक हितों में क्यों नहीं बदल सकती?
  • प्रेम? नहीं शायद अहंकार और स्वार्थ अँधा होता है...फिर चाहे वह अपनी परम्पराओं, संस्कृति, रीति-रिवाजों और कर्मकांडों से हो या तथाकथित स्वछन्द फूहड़ आधुनिकता से। क्योंकि यह इनके नाम पर घुस आने वाली विकृति, आतंकवाद, हिंसा, शोषण, अराजकता, अन्याय और असंवेदनशीलता को देख नहीं पाता। और फिर आजकल तो परंपरा और आधुनिकता दोनों का वह कॉकटेल दिखाई पड़ता है जिसने चमक और धमक की अति के पीछे अपने सारे आधारों को खोखला कर देने की ठानी है, पर इस अहंकार और स्वार्थ के वशीभूत लोगों को भला वह खोखलापन नजर क्यों आने लगा? 
  • मेरी बातों से बहुत से लोग ये आशय लगा लेते हैं कि मैं नास्तिक हूँ और धर्म तथा परम्पराओं की विरोधी हूँ...पर न तो मैं नास्तिक हूँ और न ही धर्म तथा परम्पराओं की विरोधी हूँ। हाँ, बस मैं अन्धविश्वासी नहीं हूँ और आडम्बरों और अंधविश्वासों से मुक्त जीवन चाहती हूँ। ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं यह बात मुझे परेशान नहीं करती, पर ईश्वर के नाम को कलंकित होते देखना...यह मुझसे नहीं होता। धर्म की आड़ में हो रहे अपराध मुझे दूसरे अपराधों से ज्यादा घृणित लगते हैं। देखा है मैंने...कैसे आडम्बरों के चलते गरीब लोग जिन्हें दो वक्त का खाना भी नसीब नहीं होता अपने खून पसीने की मेहनत से कमाया हुआ धन जादू टोने और टोटकों में खर्च कर आते हैं। कई लोग अंधविश्वासों के चलते अपने जीवन तक से हाथ धो बैठते हैं। धर्म की आड़ में चल रहे अय्याशों के अड्डे सिर्फ एक-दो नहीं....ज्यादातर में इनकी भरमार है। सिर्फ और सिर्फ पैसे कमाने के लिए न जाने कितनी धर्म की दुकानें चल रही है। धर्म के इस अपराधीकरण को स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसलिए बहुत ज्यादा जरुरी लगता है कि आज के युग की आवश्कताओं के अनुसार धर्म और परम्पराओं में आमूलचूल परिवर्तन किये जाएँ। हर युग की अपनी आवश्यकताएं है और यह जरुरी नहीं है कि हजारों लाखों वर्षों से जो परम्पराएँ चली आ रही है वे सभी आज के युग में प्रासंगिक हों। 
  • लोग हमेशा इतिहास के पीछे क्यों पड़े रहते हैं? आप कितनी भी कोशिश कर लें उन घटनाओं की पूरी सच्चाई नहीं जान सकते, जो आपके अस्तित्व से हजारों सालों पहले की हैं। राम, रावण, दुर्गा, महिषासुर, कृष्ण, दुर्योधन, पांडव किसने क्या किया, कौन सही था, कौन गलत...कोई था भी या नहीं...क्या अब इन बातों से फर्क पड़ना चाहिए? जो नहीं हैं उनके लिए जो हैं...क्या उनको लड़-कट के मरना चाहिए? तब की परिस्थितियाँ और आज की परिस्थितियाँ क्या बिल्कुल एक सी है? कोई ये क्यों नहीं समझ पाता कि कोई भी व्यक्तित्व सबके लिए, सब परिस्थितयों में पूर्ण रूप से आदर्श नहीं हो सकता। उसकी सभी बातों का समर्थन नहीं किया जा सकता, पर अंधभक्ति तो बड़ी प्यारी है मेरे देश के लोगों को। पूजना इतना जरुरी हो गया है कि उसके लिए तो जिसे पूजा जा रहा है, जिस कारण पूजा जा रहा है, उन्हीं आदर्शों की बलि देने में नहीं हिचकते लोग। जो अदृश्य है उसके लिए जो दिखाई दे रहा है, उसे काट डालने में शर्म नहीं आती किसी को। कभी-कभी लगता है सब कुछ मनोरंजन के लिए करते हैं लोग। लड़ना शायद बेहद पसंद है इसलिए नित नए बहाने ढूंढते हैं लोग। 
  • हर्षोल्लास और आमोद प्रमोद के लिए पर्वों का मनाया जाना बेशक जरुरी है पर उनके मनाये जाने की सार्थकता तभी है जब उनमें छिपे सन्देश को आंशिक तौर पर ही सही हम अपने जीवन में उतारें। 

Monika Jain ‘पंछी’

September 26, 2017

Quotes on Respect in Hindi

Respect Quotes

  • 26/09/2017 - पदों के प्रति कोई विशेष सम्मान कभी रहा ही नहीं। उम्र, डिग्री, यश, धन...आदि के मामले में भी ऐसा ही है। कुछ दिन पहले एक गधे की फोटो डाली गयी थी। बहुत होहल्ला मचा था। देखा था उस पोस्ट को, पर ध्यान न पोस्टकर्ता पर गया और ना ही जिस पर पोस्ट की गयी थी उस पर। मेरी नज़र सीधी उस जानवर की आँखों में गयी। क्योंकि निर्दोषिता (बोध) और मासूमियत (अबोध) दोनों ही आकर्षित करती है मुझे। लेकिन हम एक ऐसे समय में है जहाँ पर स्वस्थ चर्चा, विमर्श, संवाद, सीखना, निश्छलता, समझ, तर्क, बोध...आदि के कोई मायने नहीं है। हमारे लिए चिढ़ना-चिढ़ाना, मार-पीट, गाली-गलौच, नीचा दिखाना, डराना-धमकाना, कुतर्क...बस यही समर्थन और विरोध के आधार रह गए हैं। सुनना कोई नहीं चाहता, सभी सुनाना चाहते हैं। और अपने निजी और सामाजिक जीवन में हम महत्व भी तो कितनी बेतुकी चीजों को देते हैं। बच्चे की सही बात पर भी उसे उम्र का हवाला देकर डांट-डपटकर कर चुप करवा दिया जाता है। लड़की को कोई छेड़े तो उसे ही घर में बंद रहने की सीख दे दी जाती है। किसी गरीब, मजदूर, किसान को बस उसकी आर्थिक स्थिति की वजह से नज़रन्दाज कर दिया जाता है। डिग्री की दौड़ में समझ, चरित्र, ज्ञान सब मिट्टी में मिल जाते हैं। हालाँकि बच्चा, लड़की और किसान... होना सही का प्रमाण पत्र नहीं है। बात यह है कि हम महत्व किन चीजों को देते हैं। पग-पग पर हमनें भेदभाव को शह दी है। अपनी कमियों को स्वीकारते हुए अगर हम सही चीजों को महत्व देंगे तो सही लोग ही सही पदों पर भी पहुंचेंगे। समझ की कमी हम सबमें प्राकृतिक है, वह वास्तव में इतनी परेशानी वाली बात नहीं है। समस्या हमारी अपनी कमियों के प्रति अस्वीकार्यता में है। स्वीकार ही सुधार की दिशा में पहला कदम होता है। जब लड़ाई खुद से और अपनों से ही है तो चिढ़ने और चिढ़ाने से बात बनने वाली है नहीं।
  • 09/06/2017 - सबसे पहली जरुरत तो समाज में हर तरह के श्रम के प्रति सम्मान होने की है। इसमें भी जो हमारी मूलभूत जरूरतें पूरी करते हैं - फिर चाहे वह गृहिणी हो, खेतों में अन्न उगाने वाला किसान हो, निर्माण कार्य से जुड़ा मजदूर हो या अन्य कोई...इनके प्रति तो सहज ही सम्मान होना चाहिए। वैसे मैं जीव-मात्र के प्रति सम्मान भाव की पक्षधर हूँ। कोई सड़क पर चलते कुत्ते को बेवजह लतिया जाए या गाय के बच्चे को परेशान करे तो यथासंभव उसकी ख़बर लेती हूँ। और मुझे कभी घर के बाहर आये किसी पशु को हटाना हो तो अक्सर पानी के छींटों का इस्तेमाल करती हूँ। सामान्यत: न मारकर भगाती हूँ और न किसी को मारने देती हूँ।
  • 23/04/2016 - सामान्यतया मेरा किसी के प्रति सम्मान उसके पद, ओहदे, यश, डिग्री, ख्याति, रूप, रंग आदि का मोहताज नहीं है। हाँ यह उसके कुछ विशेष आंतरिक गुणों-अवगुणों और निर्दोषिता-दोष से प्रभावित जरुर हो सकता है। और अगर बात आदर्श की हो तो सम्मान सिर्फ व्यक्तियों का नहीं, यथासंभव सभी प्राणियों का और वस्तुओं का भी होना चाहिए। इसके अलावा कोई भी हमारा अपमान तब तक नहीं कर सकता जब तक हम उस अपमान को स्वीकार न करें। 
  • 06/04/2016 - विरोधी का भी सम्मान करना और विरोधी होकर भी सम्मान पा लेना...दोनों ही अद्भुत गुण हैं। 
  • काश! यहाँ सबको स्वस्थ चर्चा का मतलब पता होत। इसी के चलते न्यूज़ फीड में आने वाली वे सभी पोस्ट्स जिनसे सहमति नहीं होती उन पर कुछ भी विचार व्यक्त करना तो लगभग-लगभग छोड़ दिया था...पर अब जब हमारी अपनी पोस्ट पर आये कमेंट्स के प्रत्युत्तर में जरा सी असहमति भी बर्दाश्त नहीं कर पाते लोग तो लगता है किसी को व्यक्तिगत रूप से असहमति जताने का कोई मतलब रहा ही नहीं। यहाँ जो दिन रात प्रेम और विनम्रता की बातें करते हैं, उनका अहंकार भी जरा सी असहमति से भयंकर क्षतिग्रस्त हो जाता है और कुतर्कों का कोई अंत ही नहीं। ऐसे आरोप जो समझ ही नहीं आता खुद पर लगा रहे हैं या सामने वाले पर। काश! कभी ऐसी चर्चाएँ भी देखने को मिलती जहाँ मुख्य उद्देश्य कुछ नया सृजित करना होता। जहाँ हार या जीत कोई प्रश्न नहीं होती और न ही खुद को किसी भी कीमत पर सही सिद्ध करने की होड़। जहाँ सामने वाले को नीचा दिखाने की भावना नहीं होती और न ही जरा सी असहमति की वजह से किसी के पूरे जीवन, चरित्र और भविष्य के निर्धारण के उद्घोष। काश! चर्चाएँ कुछ नया सीखने-सिखाने, समझने और समझाने के लिए ही होती...और अगर चर्चा किसी सहमति या निर्णय पर खत्म न हो पाए तब ससम्मान अपने-अपने विचारों के साथ उसका अंत। पर ये काश! अक्सर काश ही रह जाते हैं न! 

Monika Jain ‘पंछी’

September 19, 2017

Peace (Silence) Quotes in Hindi

Peace (Silence) Quotes

  • 19/09/2017 - सबकी अपनी-अपनी रूचि है पर मेरे लिए किसी भी लेखक के लेखन की उत्कृष्टता न शब्दों में निहित है और ना ही शब्दों के निहितार्थ में। यह निहितार्थ से परे स्रोत से प्रस्फुटित प्रेम, शांति, समझ और निश्चलता से है। किसी भी लेखक का यह पाठक को सबसे बड़ा उपहार होता है और यही पाठक द्वारा सबसे बड़ा प्रति उपहार भी है। ऐसे लेखक या लेखन के समक्ष मन स्वत: ही छोटा कृतज्ञ बालक बन जाता है। 
  • 08/09/2017 - हर घटना, हर दुर्घटना, हर मौत पर यहाँ राजनीति होती है। आरोप-प्रत्यारोप का वीभत्स खेल चलता है। गैर जिम्मेदार पोस्ट्स की बाढ़ आ जाती है। प्रेम, शान्ति, स्वस्थ चर्चा और समाधान किसी को नहीं चाहिए। फेसबुक मिल तो गयी है सबको अपनी-अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नॉन स्टॉप पोस्ट्स की निकासी के लिए, लेकिन सच यही है कि हम भारतीय किसी चीज के लायक नहीं। बस कोलाहल, कोलाहल और कोलाहल...यही हमारी पहचान है।
  • 02/09/2017 - आत्म कल्याण हो चाहे जगत कल्याण...हमें शून्यता को ही बढ़ाना होता है, सभी द्वैतों की तीव्रता को कम करके। यह शून्यता ही महावीर की अहिंसा, बुद्ध की करुणा और मीरा का प्रेम है।
  • 31/08/2017 - जो नाराज़ होती तो शायद मान भी जाती, पर कुछ टूट/छूट गया था उस दिन और मुझे बहुत हल्का महसूस हुआ था। अब चाहकर भी कुछ कर नहीं सकती। 
  • 29/08/2017 - हालाँकि कहानी प्रतीकात्मक रही होगी, लेकिन सीता ने जिस पल धरती को पुकारा होगा उसकी गोद में समा जाने के लिए, वह शायद उनके जीवन का सबसे सुकून वाला पल रहा होगा। 
  • 12/02/2017 - रिश्ता-ए-सुकून नहीं तो फिर रिश्ता कैसा?
  • 08/01/2017 - दुनिया के लिए अगर कोई कुछ भी बेहतर कर सकता है तो वह बस यही है कि वह स्वयं शांत(मुक्त) हो और उसकी शांति दूसरों तक पहुंचे (इसके लिए भी वह कुछ करे यह बहुत जरुरी नहीं। यह स्वत: ही होगा।) 
  • 21/11/2016 - विश्व शांति में फेसबुकियों का योगदान देखते ही बनता है। 
  • 17/09/2016 - जब भी 'मैं' बहुत 'मैं-मैं' करने लगे तो घर से बाहर निकलकर आकाश में चांदनी बरसाते चाँद की छटा में कुछ देर नहा लेना चाहिए। सूरज की रौशनी में खुद को कुछ सुखा लेना चाहिए। पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों से कुछ देर बातें कर लेनी चाहिए। मिट्टी में खेल लेना चाहिए। पर्वतों, पहाड़ों, चट्टानों, नहरों, झरनों, सागर, घाटियों, जंगलों...तक खुद या मन को पहुँचा देना चाहिए। अस्तित्व की प्रक्रियायों, ब्रह्माण्ड के चल-चित्रों, जीवन-मृत्यु के इस विस्मित कर देने वाले खेल के बारे में कुछ देर सोच लेना चाहिए। मैं 'क्यों' हूँ और 'कौन' हूँ...ऐसे ही कुछ रहस्यमयी प्रश्नों पर विचार कर लेना चाहिए। इस कदर अनंत विराटता, विशालता और रहस्य है हमारे चारों ओर कि 'मैं' के पास अपनी बोलती बंद करने के सिवा और कोई चारा है नहीं। वैसे यहाँ तो अगर फेसबुक पर आते ही सबसे पहले न्यूज़ फीड पढ़ ली जाए तब भी अक्सर बोलती बंद हो जाती है। :p बाकी प्रकृति की गोद...हम हैं ही क्या, अहसास करा जाती है।...और जितना अहसास उतनी ही शांति भी दे जाती है। 
  • 04/09/2016 - कभी-कभी हमारे पास बहुत सटीक ज़वाब होता है...फिर भी मौन रहना अधिक तार्किक होता है। 
  • 08/06/2016 - जितना अर्थ को जाना, शब्द उतने ही खोते चले गए। 
  • 19/01/2016 - बहुत जरुरी है यह सीख जाना कि कब बोलना है और कब चुप रहना है। 
  • 04/12/2014 - मौन जहाँ कई समस्यायों का कारण बनता है, वहीं मौन कई संभावित समस्यायों का निवारण/बचाव भी है। बस हमें इतना पता हो कि कब मौन रहना है और कब मुखर। 
  • जब-जब मैंने (अहम् ने) कुछ भी सोचा, कहा और किया तब-तब मैंने (दृष्टा ने) जाना मौन ही अंतिम समाधान है। हमारा कुछ भी करना पहले वाले 'मैं' की अभिव्यक्ति है, तब तक जब तक वह मिट नहीं जाता और सिर्फ दूसरा 'मैं' बच नहीं जाता। हमारा प्रयास बस यह रहे कि पहला 'मैं' दूसरे 'मैं' की निगरानी में रहे। क्योंकि दूसरे 'मैं' की निगरानी में रहा पहला 'मैं' यथासंभव किसी को नुकसान नहीं पहुँचाता। वह सिर्फ अपनी जरुरत तक सीमित रहता है। शेष वह सिर्फ प्रेम और शान्ति जानता है। 
  • लोग जैसे है उन्हें वैसे ही स्वीकार करना विवादों की सम्भावना को कम कर देता है। (अपवाद शामिल नहीं)
  • सुकूं-ए-तलाश में हमने तलाशी है बेचैनियां।

Monika Jain ‘पंछी’

September 11, 2017

Mind and Thinking Quotes in Hindi

Mind and Thinking Quotes

  • 23/09/2017 - बहुत सरल सा सूत्र है अहिंसा, प्रेम और करुणा का। लेकिन जितना सरल है उतना ही व्यापक, सूक्ष्म और गहन भी। किसी और को खंड-खंड रूप में शामिल करने की जरुरत ही नहीं। सापेक्ष व्यवहार तो चलते रहेंगे लेकिन उस हर सापेक्षता में भी अपनी दृष्टि यथासम्भव अपने भावों और विचारों पर रहे और सूक्ष्म से सूक्ष्म भाव/विचार भी शामिल हो सके इसमें। भावों/विचारों का ऊपर उठना ही हमें ऊपर उठाता है। भावों/विचारों का नीचे गिरना ही हमें भी पतित करता है। कहा भी तो है : एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय। और इस एक को साधना ही तो जीवन का सबसे चुनौतीपूर्ण कार्य है।
  • 06/09/2017 - अपने से इतर सभी विचारधाराएँ और विचारधारी नहीं रहेंगे तो फिर अकेले क्या अपनी विचारधारा का अचार डालोगे?
  • 15/01/2017 - किसी के मन में कोई विचार उठा और उसने शेयर कर दिया, इसमें कोई समस्या नहीं है। बहुत सारे विरोधी विचारों को पढ़कर ही तो समझ आता है कि विचार सिर्फ विचार हैं और सापेक्ष हैं। लेकिन बात यहाँ उनके लिए है जो हावी होने की कोशिश करते हैं। जिन्हें लगता है कि दुनिया में एकमात्र सही सिर्फ वे ही हैं और बाकी सबको उनका अनुसरण करना चाहिए और ऐसा करवाकर वे सारी दुनिया को बदल देंगे। समस्या कट्टरता और तानाशाही में है।
  • 19/03/2017 - एक ही बात पर कुछ लोग ख़ुश होते हैं, कुछ उदास, कुछ गुस्सा, कुछ क्या, कुछ कुछ नहीं...बस यहीं से मुझे ये 'मन' नामक प्राणी संदिग्ध लगने लगता है। 
  • 08/01/2017 - प्रेम के मार्ग का बस एक ही काँटा है : वृत्तियाँ। सामान्य और सरल से सरलतम को भी मानव मन की ग्रंथियां कितना जटिल और जटिलतम बना देती है। 
  • 13/06/2016 - किसी का ख़याल भर और उसका प्रकट हो जाना...बड़े ख़तरनाक हैं ये ख़याल। :p :) 
  • 05/06/2016 - फ्रॉक पहनकर कितनी छोटी हो जाती हूँ मैं...फिर खेलने का मन करने लगता है। ^_^ (तितली मन!) 
  • 02/06/2016 - अतीत के चलचित्र वर्तमान के चलचित्रों से मिल बैठते हैं और फिल्म बिगड़ जाती है। (मन तू होजा कोरा कागज।) 
  • 28/04/2016 - जब तक कुछ भी नया पढ़कर और जानकर हमारी सोच बेहतर न बनें और चीजों को देखने और समझने का नजरिया विस्तृत न हो, तब तक हमने कुछ नया जाना और सीखा नहीं है। 
  • 17/04/2016 - तुम्हारा मुझे इतने दिनों बाद अचानक कुछ लिख भेजना अनायास ही न था। कुछ ही देर पहले मन की गहराईयों ने तुम्हें याद किया था। 
  • 16/04/2016 - लोग अक्सर द्वैत के बारे में विचार करते हैं। जबकि 'कुछ होने' से 'कुछ न होने' तक का सफ़र बहुत लम्बा है। किसी क्षण कोई बीच रास्ते में कहीं पर भी हो सकता है, जहाँ प्रगमन और प्रतिगमन दोनों ही संभावनाएं हैं। 
  • 10/04/2016 - तुम्हारा दृष्टिकोण तुम्हारे बारे में बहुत कुछ बता देता है।
  • 17/03/2016 - जरुरत से अधिक सक्रिय दिमाग और जाग्रत मन में अंतर है। एक जहाँ राय कायम करने और निष्कर्षों की जल्दबाजी में सोये हुए जड़ मन की तरह ही पूर्वाग्रहों, धारणाओं, अंधविश्वासों और रूढ़ियों की गठरी बन सकता है, वहीँ दूसरा इन सबसे मुक्त हो सकता है। 
  • 04/01/2016 - न आस्तिक कहलाने की जरुरत है...न नास्तिक कहलाने की। जरुरत बस खुले दिमाग की है। किसी श्रेणी से बंध जाना अक्सर उन असीम क्षमताओं से दूर कर देता है जो हमारे भीतर विद्यमान है। कम से कम जो विज्ञान प्रेमी है उसे तो ऐसा नहीं ही करना चाहिए। 
  • 26/09/2015 - शब्दों के मनमाने अर्थ और व्याख्याएं नहीं बदल सकते सच्चाईयाँ। जिसे जानना हो सच उसे मन के धरातल पर उतरना पड़ता है। 
  • 13/08/2015 - किसी से आपका एक विचार मिलता है, अच्छी बात। दूसरा भी मिलता है, और भी अच्छी बात। तीसरा भी मिलता है, कुछ ज्यादा ही अच्छी बात। पर चौथा भी मिलना ही चाहिए यह अपेक्षा ज्यादती है। 
  • 18/03/2015 - इंसान का मन अक्सर चेहरे पर झलकने लगता है। बस पढ़ने का हुनर चाहिए।
  • छोटी-छोटी सी बातों पर दंगे क्यों भड़क जाते हैं? विचार संक्रमण इसका मुख्य कारण है। जब विचारों, मन और आवेशों पर नियंत्रण ना हो, सतर्कता और जागरूकता की अनुपस्थिति हो तो ऐसे में किसी नकारात्मक विचार का आग की तरह फैलना और सब कुछ तबाह कर देना संभव है। 
  • शब्द, विचार और भाव इतने ज्यादा सापेक्ष हैं कि जो सन्दर्भ न समझा तो सब मिथ्या हो जाता है। 
  • बनावटी और झूठे शब्द अक्सर साफ-साफ पकड़ में आ जाते हैं, बस जाहिर नहीं करती। इनोसेंट होने का मतलब बेवकूफ होना नहीं होता। :) हालाँकि, बेवकूफियों के भी अपने अलग किस्से हैं...एक ही मन में हमारे कितने हिस्से हैं। 

Monika Jain ‘पंछी’

September 9, 2017

Essay on Desire (Ambition) in Hindi

महत्वकांक्षा की कीमत 

माँ अक्सर एक वृद्धा को खाने पर बुलाती हैं। उनकी कहानी कुछ यूँ हैं कि उनकी अपनी कोई संतान नहीं थी। 16 वर्ष पहले उनके पति की मृत्यु हो गयी थी और तब उनमें प्रचलित परंपरा के अनुसार वृद्धा के देवर के एक बेटे को गोद लिया गया था। वह वृद्धा के साथ रहने लगा। उनके लिए एक पुरानी सी छोटी सी कोठरी छोड़कर बाकी सारे घर को हड़प लिया और उस पर अपना नव निर्माण कर लिया। उन्हें खाना भी नहीं खिलाया जाता है। वे घर-घर आटा मांगकर लाती हैं और उसे बेचकर अपना निर्वाह करती हैं। जब भी ऐसी कहानियां देखती और सुनती हूँ तो अक्सर सोचती हूँ कि जिसे हम आगे बढ़ना (तथाकथित वाला) कहते हैं, उसकी हम क्या-क्या कीमत चुकाते हैं? ढेर सारी कीमतें हैं, लेकिन जो सबसे बड़ी हैं वे हैं संवेदना, भरोसा और आज़ादी। 

मेरी जन्मजात वृत्ति बहुत आसानी से किसी पर भी भरोसा कर लेने वाली रही है। पढ़ाई के दौरान की ही बात है मैं एक बड़े बिल्कुल अनजान शहर में दो-तीन महीने के लिए अकेली थी। शुरुआतो दिनों में कोई पहचान वाला भी नहीं था उस समय तक और क्लास से आते हुए किन्हीं बिल्कुल अनजान अंकल ने मुझे रोककर मेरे बारे में कुछ सवाल पूछे...मसलन क्या करती हूँ और कहाँ से हूँ...और मैंने बड़ी ही आसानी से सब बता दिया। मुझे उसी रास्ते से रोज आना-जाना था। उस बेवकूफी विशेष का तो कोई खामियाजा भुगतना नहीं पड़ा लेकिन अब बहुत सी छोटी-मोटी बेवकूफियों के बाद मैं जब दुनिया को जानने लगी हूँ, तो मुझे कभी-कभी बहुत घुटन महसूस होती है, जब छोटी-छोटी सी बातों के लिए भी मुझे यह सोचना पड़ता है कि मैं किसी पर भरोसा कर सकती हूँ या नहीं। 

क्योंकि बचपन ऐसा रहा है कि कस्बे में हर रोज रात को लाइट्स चली जाया करती थी लेकिन हम पूरे मोहल्ले के बच्चे (लड़के-लड़की सब) रात के 9-9:30 बजे तक अँधेरे में भी छिपा-छिपी खेला करते थे और फिर घर आकर सो जाते थे। न घर वालों को कोई टेंशन होती थी और ना ही हमारी आज़ादी को कुछ सोचना पड़ता था। मैं तो 2-3 साल की उम्र में भी अपनी हम उम्र सहेली के साथ रोज सबसे छिप-छिपाकर घूमने निकल जाती थी और हम रोज खो जाते थे, लेकिन रोज सही सलामत मिल भी जाते थे। कई बार अनजान शहर में अकेले अँधेरा होने के बाद भी कई जगह आना-जाना हुआ है। रात भर जागकर लड़कों के साथ पढ़ना और पढ़ाना भी हुआ है। तो ऐसे में कुछ छिटपुट घटनाओं के बावजूद भी भरोसे के मामले में आदत बहुत बुरी रही है। वास्तव में फेसबुक पर आने के बाद ही मैंने धीरे-धीरे दुनिया को समझना शुरू किया है। और जितना समझा है उतना ही बंधन में महसूस किया है खुद को। किसी पर भरोसा न कर पाना मुझे परेशान करता है। 

इस शहर में कुछ सालों पहले जब शिफ्ट किया था तो आसपास के बहुत सारे बच्चे हर रोज शाम को मेरे पास आ जाते थे और मुझे कोई खेल खिलाने को कहते थे। कई बार अपने जरुरी काम छोड़कर भी सिर्फ उनका मन रखने के लिए मैं उन्हें खिलाती थी। यह सिलसिला चलता रहा और फिर एक दिन अचानक एक लड़की की मम्मी मेरे घर आई और मुझ पर बरस पड़ी कि ये सब तो बच्चे हैं, लेकिन आपको तो समझना चाहिए। अब मैं उन्हें कैसे बताती कि मैं भी अभी तक कोई बड़ी नहीं हुई हूँ। उन्होंने कहा कि समय कितना ख़राब है। आते जाते हुए बच्चों के साथ किसी ने कुछ गलत कर दिया तो जिम्मेदारी कौन लेगा? आप इन्हें जब भी ये बाहर दिखे तो तुरंत घर भेज दिया करो। वो मुझे सुनाकर चली गयी और मैं बहुत देर तक ये सोचती रही कि ये समय ऐसा क्यों है कि बच्चे बेफिक्र होकर खेल भी नहीं सकते? हालाँकि मैं बच्चों के घर जाते समय देर तक बाहर खड़े रहकर पूरा-पूरा ध्यान देती थी लेकिन फिर भी समय ख़राब है वाला सवाल मुझे बहुत इरीटेट करता रहा। वैसे बाद में भी बच्चों का आना जारी रहा और बच्चों के बहुत फोर्स करने पर सबकी मम्मियों से परमिशन के बाद ही मैंने उन्हें अपने यहाँ रुकने दिया। लेकिन आज एक बच्चे की बेरहमी से हत्या की ख़बर चल रही है, तो बहुत बच्चों के चेहरे सामने आ रहे हैं और बार-बार यह सवाल मन में आ रहा है कि अब और कितनी संवेदना, भरोसा और आज़ादी खोने वाले हैं हम? बहुत बड़ी कीमत है यह। सबसे बड़ी कीमत।

Monika Jain ‘पंछी’
(09/09/2017)

September 6, 2017

Essay on Nonviolence in Hindi

अंतस का बदलना जरुरी है

05/09/2017 - जैन समाज द्वारा बकरों को खरीद-खरीद कर बचाने की मुहिम मूर्खता और अहंकार से ज्यादा नहीं नज़र आती। हिंसा और जड़ता बाहर-बाहर से नहीं खत्म होती, अंतस का बदलना जरुरी है।

06/09/2017 - फेसबुक पर की गयी उपर्युक्त पोस्ट पर मूर्खता शब्द पर कुछ मित्रों ने आपत्ति दर्ज की है। कोई इस शब्द से आहत हुआ है तो उसके लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूँ। लेकिन यह वक्तव्य जल्दबाजी वाला नहीं था। मूर्खता से मेरा आशय अबोधता से ही था और किसी को मूर्ख या अहंकारी कह देने का तात्पर्य यह बिल्कुल भी नहीं कि मैं मूर्खता या अहंकार से मुक्त हो चुकी हूँ। बल्कि अक्सर मेरा द्वंद्व खुद के साथ यही चलता है कि जब मैं मन के विकारों से पूर्ण रूप से मुक्त हूँ ही नहीं तो मुझे किसी और को कुछ कहने का अधिकार है ही कहाँ? यहाँ मैं इस बात से भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो पाती कि मैं मन के विकारों को विषय या तीव्रता के आधार पर अलग-अलग खांचों में बाँट लूं कि जिस जड़ता विशेष से मैं मुक्त हूँ, उस पर कह सकती हूँ। मेरे लिए मन के विकार मन के विकार हैं फिर वे चाहे आत्मघाती हो या परघाती हो, कम हो या ज्यादा हो, कुछ मामलों में हो और कुछ मामलों में न हो। लम्बे समय बाद भी अगर किसी दिन मुझे तेज गुस्सा आया है या किसी मामले में मैं ज्यादा भावुक हुई हूँ और कोई मूर्खता या गलती कर दी है तो मुझे अपनी सारी की सारी तपस्या व्यर्थ नज़र आती है। लेकिन मैं कुछ कृष्ण की गीता और कुछ अपने मौलिक अधिकारों व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से अपने मन को बहला लेती हूँ और मेरा लिखना और कहना इस बहलाव में जारी रहता है। जिसका उद्देश्य यहाँ किसी पर कुछ थोपना बिल्कुल नहीं है। अभिव्यक्ति मेरी अपनी जरूरत है।

अब आते हैं पिछली पोस्ट के मुद्दे पर। किसी व्यक्ति विशेष द्वारा संवेदना के चलते किसी जानवर को बचाना या किसी की कैद से मुक्त करवाना एक अलग बात है और किसी समाज या संगठन द्वारा सम्पूर्ण समाज के योगदान से जानवरों की रक्षार्थ किसी मुहिम को चलाना एक दूसरी बात। पहले मामले में भी समझ जरुरी है लेकिन कृत्य के पीछे के भाव और उद्देश्य ज्यादा महत्वपूर्ण है, लेकिन दूसरे मामले में बात को हर दृष्टिकोण से देखा और समझा जाना ज्यादा जरुरी हो जाता है, तब जबकि आपकी मुहिम एक ऐसी रूढ़ि के विरुद्ध है जो किसी समाज विशेष का अनिवार्य हिस्सा बन चुकी है। जानवरों को खरीद कर, उनके जीवन पर्यंत पालन-पोषण का जिम्मा उठाकर आप उन जानवरों को बचा लेंगे, यह अच्छी बात है लेकिन इसके दूरगामी और अप्रत्यक्ष प्रभाव क्या होंगे यह समझा जाना जरुरी है।

जब कोई प्रथा या कोई जरुरत किसी समाज का अनिवार्य हिस्सा बन चुकी हो तो ऐसे में पूर्ति को कम कर देना लोगों को उसके अप्राकृतिक उत्पादन को बढ़ावा देने की ओर अग्रसर करता है। अक्सर मेरी आँखों के सामने हिलने-डुलने का एक इंच भी स्पेस न दी गयी मुर्गियां, सूअर और अन्य जानवर नज़र आते हैं। सामान की तरह भरे गए या एक कोने से दूसरे कोने में जोर से पटके गए जानवर नज़र आते हैं। जबरदस्ती दूध, बच्चे या अंडे पैदा करवाने के लिए किये गए अप्राकृतिक कृत्य नज़र आते हैं...और भी ऐसी कई चीजें...बस यही सोचकर मुझे इस कदम में कोई सार्थकता नज़र नहीं आई, बल्कि यह मुझे जानवरों और प्रकृति के विरुद्ध जाता नज़र आता है। मनुष्य बहुत चालाक और धूर्त प्राणी है, उस पर ये तरीके काम नहीं करते। उसे अपनी जनसँख्या की चिंता नहीं रहती लेकिन जानवरों की जनसँख्या की चिंता रहती है इसलिए वह उन्हें जबरदस्ती पैदा करवाता है और बिल्कुल गैर जरुरी कारणों से भी मारता है। यहाँ मैं पिछली पोस्ट पर आये मनीष जी के कॉमेंट को भी पोस्ट कर रही हूँ :

“कुछ सालों पहले तक अपने कुछ परिचित काफी समय से पर्युषण, संवत्सरी व अनंत चतुर्दशी पर बहेलियों से कबूतर, तीतर, तोते...आदि आजाद कराते थे। मालूम हुआ कि उन लोगों को इन त्योहारों की जानकारी पहले से होने लगी और उनका सारा परिवार कबूतर, तीतर, तोते पकड़ कर इकट्ठे करता (उनकी बिक्री की जरूरत से कई गुना ज्यादा) क्योंकि उनको पता था कि उनके मुंह मांगे पैसों से उनका माल बिकेगा और हमारे जैन बंधु इस बात से ही मुग्ध कि हम कितना महान कार्य कर रहे हैं, जीव दया कर रहे हैं। जबकि वो हमारे ही निमित्त अधिक कबूतर तीतर तोते आदि पकड़ते थे। बकरे काटने वाले कसाईयों को उनकी दिन भर की कमाई देकर उनसे वादा करवाते थे कि इन दिनों वो हिंसा नहीं करेंगे, लेकिन वो दुकान के शटर बन्द रख कर अपना कार्य जारी रखते थे। उस सब का दोषी कौन? क्या आज तक कसाई और बहेलियों ने अपना व्यवसाय बदल लिया?”

जैन समाज में ही कई संत ऐसे हुए हैं जिन्होंने कई जगह बलि प्रथा बंद करवायी है। एक हमारे आसपास का ही एक स्थान है जहाँ माता जी के मंदिर में हर साल भैंसों की बलि दी जाती थी। वहां एक साध्वी जी गयीं और मंदिर में बलि वाले स्थान पर खड़े होकर उन्होंने कहा कि इन्हें मारने से पहले मेरी बलि देनी होगी। हालाँकि कुछ लोग इस तरीके से भी सहमत नहीं होंगे, लेकिन मैं इसे व्यक्तिगत निर्णय और व्यक्तिगत साहस मानती हूँ। अच्छी बात यह कि उस समय और बाद में उन्होंने कई सालों तक वहां चातुर्मास करके अपने प्रवचनों के माध्यम से जागरूकता फैलाई और वहां बलि प्रथा पूरी तरह से बंद हो गयी। सभी धर्मों की बलि प्रथाओं के विरोध में अगर कानून बने तो मैं उससे सहमत हूँ। लेकिन कानून भी बस बहुत थोड़ी सी मदद ही करता है, बाकी का सारा काम जागरूकता ही करती है।

Monika Jain ‘पंछी’

September 4, 2017

Poem on Truth in Hindi


सत्य

(1)

सत्य तुम रुकना नहीं 
सत्य तुम झुकना नहीं
हो भले असत्य की 
काली घटाएं सामने 
बन के सूरज तुम चमकना 
पर कभी छिपना नहीं 
सत्य तुम रुकना नहीं। 

है अंधेरों से भरे 
दूर तक ये रास्ते 
बाट जोहते हैं तुम्हारी 
रोशनी के वास्ते 
इन अंधेरों से कभी 
सत्य तुम डरना नहीं 
सत्य तुम रुकना नहीं। 

बढ़ रहा असत्य का 
साम्राज्य चहुँ ओर ही 
अन्याय और अनीति की 
फैली हवा सब ओर ही 
बन के खुशबू तुम महकना 
पर कभी खोना नहीं 
सत्य तुम रुकना नहीं।

Monika Jain 'पंछी'
(30/01/2013)

(2)

बुद्ध जानते थे शब्दों के ख़तरे
इसलिए कई प्रश्नों पर मौन रहे
महावीर जानते थे प्रसिद्धि के भी ख़तरे
तो 12 वर्षों तक वे भी कुछ ना बोले
पर दोनों यह भी तो जरुर जानते होंगे न! 
कि राजनीति सिर्फ शब्दों पर नहीं
मौन पर भी हो जाया करती है।
सत्य न जानने वालों के लिए 
सत्य भी कितना बेबस है 
कि उसकी अभिव्यक्ति भी ख़तरा है 
और उसका मौन भी। 

Monika Jain 'पंछी'
(04/09/2017)

September 2, 2017

Prejudgement (Being Judgemental) Quotes in Hindi

Prejudgement (Being Judgemental) Quotes

  • 18/11/2017 - जो दूसरों को लेकर पूर्वाग्रही हो वह अपने सम्बन्ध में पूर्वाग्रही न हो, यह नामुमकिन है।
  • 02/11/2017- जो हम किसी सन्दर्भ में बिल्कुल भी नहीं सोच रहे होते, वह भी कोई हमारे द्वारा सोचा हुआ मान लेता है। पूर्वाग्रह, मिथ्या धारणाओं, पूर्वनिष्कर्षों और शक…इन्हें संतुष्ट करने वाला कोई शख़्स आज तक पैदा नहीं हुआ। समझ, सुकून, शान्ति और मैत्री के लिए इन्हें कम से कम होकर अंतत: खत्म ही होना पड़ता है।
  • 03/09/2017 - या तो ओवरएस्टीमेट करेंगे, या तो अंडरएस्टीमेट करेंगे। गणित आती ही कहाँ है किसी को।
  • 29/08/2017 - हर रोज जीवन-मृत्यु के झूले, भयंकर दर्द और संघर्ष से गुजरने वाले व्यक्ति से भी कुछ लोग यह अपेक्षा रख सकते हैं कि वह सारी दुनिया की समस्यायों (नामकरण सहित) के समाधान में रूचि ले। वैसे उन लोगों के लिए समाधान या संवेदना का मतलब अक्सर भड़ास निकालना होता है। नहीं होता तो ऐसे किसी व्यक्ति से इतनी अनावश्यक अपेक्षाएं और उम्मीदें होती भी नहीं। बाकी पर पीड़ा समझने वाला व्यक्ति चाहे खुद कितनी भी भयंकर पीड़ा से गुजर रहा हो, वह पर पीड़ा समझता है। उसके अंदर बस स्वाभाविक रूप से सामान्यत: भड़ास नहीं पैदा होती। वह जहाँ कुछ कर सकता है या जिस मामले की उसे समझ होती है, वही बोलना उचित समझता है। अन्यथा उसकी सबसे बड़ी चुनौती ही अपनी अनगिनत पीड़ाओं के बावजूद भी ह्रदय में दूसरों के लिए प्रेम और समझ को कायम रख पाना है। वैसे यह हर किसी के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। और यह कितना मुश्किल होता है इसका अंदाजा सिर्फ और सिर्फ अपेक्षाएं पालने वाले लोग नहीं लगा सकते। जीवन सबके लिए समान नहीं होता। परिस्थितयां सबके लिए एक सी नहीं होती। ऐसे में सतही तुलनाएं बेमानी है। जो गहराई से सब कुछ समझ पाए तो भड़ास और पूर्वाग्रह खुद-ब-खुद कम होते जायेंगे। 
  • 22/08/2017 - अनित्यता की समझ कई दु:खों को दूर कर देती है। मसलन कोई व्यक्ति मेरे लिए बहुत पूर्वाग्रह रखता हो, ग़लतफ़हमी पालता हो और उससे मेरा थोड़ा भी जुड़ाव है तो मैं दु:खी हो जाती हूँ। इन पूर्वाग्रहों को दूर करने का कोई तरीका ना हो तो फिर मैं खुद को इस तरह समझाती हूँ कि कौनसा मुझे हमेशा जिंदा रहना है। न तो इस रूप में मैं हमेशा रहने वाली हूँ और ना ही वे पूर्वाग्रह।
  • 06/08/2017 - पूर्वाग्रही प्राणियों का प्रिय शगल है अपने काम के शब्दों को चुनकर अपने पूर्वाग्रहों को पोषण देना। ऐसे में दूरी मेन्टेन करने का आशय यह जरुरी नहीं कि वे नापसंद हों या उनसे नाराजगी ही हो। कभी-कभी यह सिर्फ भीतर के प्रेम के संरक्षण के लिए भी जरुरी होता है और कभी-कभी अपनी सुरक्षा के लिए भी। मेरे मन में सांप के लिए कितना भी प्रेम हो, लेकिन अगर वह सामने आएगा तो मुझे सतर्क रहना ही होगा, दूरी बनानी ही पड़ेगी। क्योंकि अभी तक न तो उसे हैंडल करना आता है मुझे और न ही मेरे प्रेम में वह शक्ति है कि वह मेरे लिए अपनी वृत्ति बदल दे। 
  • 10/04/2016 - बर्तन साफ़ करते समय मेरी आदत है - एक बार सारे बर्तनों की अतिरिक्त गन्दगी हटाने के लिए पहले कोरे पानी से साफ़ कर लेती हूँ, उसके बाद डिश सोप/लिक्विड लगाती हूँ और फिर पानी से साफ़ करती हूँ। मेरे ख़याल से ज्यादातर लोग ऐसा ही करते होंगे। एक बार हुआ यूँ कि मैं अपना फर्स्ट स्टेप कर रही थी तो एक थोड़ी परिचित लड़की मुझे अजीब नज़रों से देख रही थी। मैंने पूछा क्या हुआ? वह हैरान होकर बोली, तुम बिना सोप के बस ऐसे ही बर्तन साफ़ करती हो? :o मैंने कहा, 'आगे देख तो लो लड़की!' फिर कुछ देर बाद उसकी हैरानी नार्मल हुई। :) Moral of the Story : पूर्वाग्रहों से बचें। ;) 
  • 02/04/2016 - कभी-कभी लगता है सूचना के साधन जितने बढ़े और विकसित हुए हैं अज्ञान उतना ही गहराने लगा है। यह अति सक्रिय मस्तिष्क का दौर है। सोशल मीडिया जिसमें आग में घी की भूमिका निभा रहा है। बिना सोचे-समझे और जाने हर ओर बस गैरजिम्मेदार निष्कर्षों का ढेर पसर रहा है। इन तुरत-फुरत की धारणाओं और पूर्वाग्रहों से बचना बेहद जरुरी है। 

Monika Jain ‘पंछी’

August 28, 2017

Appo Deepo Bhava : Be a Light unto Yourself Essay in Hindi

अप्प दीपो भव:

जब आसाराम काण्ड हुआ था तो उस समय मेरे पास एक ईमेल आया था, जिसमें किसी के बारे में यह लिखा था कि वह आसाराम पर बहुत श्रद्धा रखता था और इसी श्रद्धा के चलते उसने सभी कुव्यसनों को छोड़ रखा था। लेकिन अब जब सच सामने आया है तो उसकी श्रद्धा तो पूरी तरह तार-तार हो जायेगी। ऐसे में क्या वह बुरी आदतों को छोड़ पाना जारी रख पायेगा? ऐसा ही होता रहा तो लोगों का सच्चाई और अच्छाई पर भरोसा ही उठ जाएगा। 

मैंने जो जवाब दिया था उसका आशय यह था कि कोई भी अनुकरणीय बात किसी के प्रति श्रद्धा की मोहताज क्यों हों? हमारा बेहतर होना हमारी अपनी जिम्मेदारी पर होना चाहिए। मुझे भी महावीर और बुद्ध से विशेष प्रेम है। हालाँकि ऐसा कभी हो नहीं सकता लेकिन फिर भी एक पल के लिए मान लें कि कभी कोई रहस्य उद्घाटित हो और यह सामने आये कि ये दोनों तो पूरी तरह फ्रॉड थे तो मुझे थोड़ा बहुत दुःख हो सकता है लेकिन ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा और ना ही जो मैंने इनसे सीखा है वह कुछ भी छूटेगा। कुछ आध्यात्मिक गुरुओं (जो अभी तक ईमानदार नज़र आते हैं) के सन्दर्भ में भी मेरी यही सोच है। हम सीख किसी से भी सकते हैं, लेकिन ग्रहणशीलता तो हमारी ही होती है। हमारे कुछ विश्वास उधार के हो सकते हैं, लेकिन जो कुछ सजग अनुभूतियाँ होती है वे तो हमारी ही होती है। धोखा, अविश्वास, भरोसे का टूटना ये चीजें वहां ज्यादा दुःख देती है जहाँ हमारा अति लगाव, मोह और जुड़ाव होता है। जहाँ वाकई सत्य के प्रति समझ होती है वहां पर व्यक्ति विशेष या नाम बहुत मायने नहीं रखते। प्रेम होता भी है तो वह समझ वाला होता है। और जहाँ परस्पर समझ होती है वहां विश्वास टूटा भी नहीं करते। 

बुद्ध और महावीर के प्रति इस प्रेम और समझ के चलते ही मैंने जीवनयापन के लिए समाज पर निर्भर सन्यास मार्ग का कभी सार्वजनिक विरोध नहीं किया, क्योंकि वे तो भिक्षुक थे और यह अहंकार के विसर्जन के लिए था। इसके साथ ही उनकी आवश्यकताएं बहुत सीमित थी, ऐसे में वैसे ही वे उपलब्ध संसाधनों पर आम व्यक्ति की तुलना में बहुत कम भार डाल रहे थे। वैसे इस मामले में मैं थोड़ी दुविधा में रहती हूँ। हालाँकि घर में मैं कई बार माँ को कहती हूँ कि ये सामान्य जीवन से अलग समाज पर आश्रित साधू, सन्यासी बनना अब बंद होना चाहिए। मतलब जिसे भी जो भी करना है, वो अपने घर पर, एकांत में या कहीं भी, अपना काम खुद करते हुए करे। हालाँकि यह कोई समाधान तो नहीं है। क्योंकि जो वृत्तियाँ है मनुष्य की वे तो रहेंगी ही। हाँ, उन्हें थोड़ी अनुकूलता कम मिले। लेकिन फिर कोई अगर वाकई में ईमानदार है तो उसके प्रति यह गलत हो जाएगा। हाँ, इस बारे में कुछ विशेष नियम बन सके तो वे बनने चाहिए। लेकिन फिर उनकी पालना भी बाकी नियमों जैसी ही रहेगी। ऐसे में समाधान क्या हो? 

समाधान यही है कि हर किसी को अपना आदर्श मत बनाओ। जब हम एक पाखंडी को अपना आदर्श बनाते हैं तो शोषण की संभावनाएं बहुत बढ़ जाती है। जब एक सच्चे और ईमानदार व्यक्ति को अपना आदर्श बनाते हैं जिसने अभी यात्रा शुरू ही की हो तो उस पर अपेक्षाओं और जिम्मेदारियों का बहुत बड़ा बोझ डाल देते हैं। आदर्श ऐसे व्यक्ति को बनाना चाहिए जो अपनी मंजिल पा चुका हो या पाने वाला हो, वरना अपने साथ-साथ हम उसके भटकने का कारण भी बन सकते हैं। वैसे निर्भरता, श्रद्धा या आस्था की दृष्टि से यह सबसे मुश्किल समय है। यहाँ किसी ऐसे का मिलना जिस पर इस मामले में भरोसा किया जा सके बहुत मुश्किल है। यहाँ विश्वास और निर्भरता बाहर नहीं भीतर खोजने की जरुरत है। 

‘अप्प दीपो भव:’ एक बहुत जरुरी चीज है जो हम सभी को समझना जरुरी है। जिनसे भी हम कुछ सीखते हैं उनके प्रति कृतज्ञता एक स्वाभाविक बात है। यह होनी भी चाहिए। लेकिन यह बात बस जरुरी कृतज्ञता तक ही सीमित रहनी चाहिए। यह अंध समर्थन में कभी भी तब्दील नहीं होनी चाहिए। जे. कृष्णमूर्ति ने एक बहुत अच्छी टर्म दी है : क्वेश्चन अथॉरिटी। जहाँ भी, जो भी (व्यक्ति, विचार, संस्था, संगठन...कुछ भी) हमें संचालित कर रहा है, उसके प्रति अपने विचारों पर निष्पक्ष प्रश्न किये जाते रहना चाहिए। कई चीजें क्लियर होती जाती है। वैसे कितने भी बाबा काण्ड होते रहे मेरी ज्ञान, दर्शन और चरित्र पर पोस्ट होती रहेंगी। मैं स्वार्थी हूँ। ये सब किसी के लिए भी कोई उपदेश की तरह नहीं होते और ना ही किसी बदलाव का उद्देश्य लेकर होते हैं। बातों को दोहराने से मुझे उन्हें अधिक से अधिक गहराई और गहन सूक्ष्मता के तल पर आत्मसात करने में मदद मिलती है। क्योंकि रास्ता इतना व्यापक और गहन है यह कि कुछ समय भी इन चीजों से अलग रहना कभी-कभी हमें सतह पर ला देता है। इसके अलावा अभिव्यक्त होना भी एक जरुरत होती है। दूसरों के व्यूज भी जानने को मिलते हैं। जिन्हें चिढ़ होती हो, या जो बोरियत महसूस करते हों, उसके लिए वे फेसबुक/ब्लॉग द्वारा दिए गए आवश्यक कदम उठा सकते हैं। हाँ, जहाँ कुछ भी गलत लगता है, कुछ नकारात्मक लगता है, अपना कोई पक्ष रखना हो तो वे सीधे मुझसे पोस्ट पर बात करेंगे तो मुझे ज्यादा अच्छा लगेगा। हम मिलकर कुछ बेहतर सीख सकेंगे। सच्चा गुरु मिलने के लिए यह दुर्लभ समय है, लेकिन हम सच्चा विद्यार्थी बनने का प्रयास तो कर ही सकते हैं। 

Monika Jain ‘पंछी’
(28/08/2017)

August 25, 2017

Materialism vs. Spiritualism Essay in Hindi

अध्यात्म बनाम भौतिकवाद 

मनुष्य कितने बड़े भ्रम में जीता है इसका पता उसे उसी दिन से लगना शुरू हो जाता है जब वह अपने मन, विचारों और कार्यों पर एक सजग और निष्पक्ष दृष्टि रखने लगता है। अक्सर व्यक्ति प्रवाह में बह जाते हैं। भीड़ और भेड़ चाल ही उनकी पसंद और नापसंदगी तय करने लगती है। मनोरंजन, ख़ुशी, सफलता, समर्थन, विरोध, नैतिकता और अनैतिकता के मापदंड भी यहीं से तय होने लगते हैं। विरले ही होते हैं जो हाथ पकड़ कर अपनी ओर खींच लेने वाली भीड़ के शोर में अपने अंतर्मन की आवाज़ सुन पाते हैं। बाकी सब सिर्फ दुनियादारी में मुखौटें बदलते रह जाते हैं।

लेकिन इस भौतिकवादी दुनिया में जहाँ हमारा पूरा जीवन बाहर की ओर जाता है खुद को आंतरिक यात्रा पर ले आना इतना आसान काम नहीं होता। यह जानते हुए भी कि बाहर की यात्रा में हम चाहे चाँद पर पहुँच जाए, चाहे मीलों की दूरियों को चंद क्षणों में बदल दें, चाहे अपार सम्पदा अर्जित कर लें, कितनी ही क्रांतियाँ कर लें...संतुष्टि, सुख या पूर्णता जैसी चीज स्थायी रूप में कहीं नहीं मिलेगी। पूर्णता और आनंद शाश्वत रूप में कहीं अगर मिल सकता है तो वह भीतर ही है। लेकिन यह वह समय भी नहीं जहाँ बाह्य परिस्थितयों और माहौल को पूरी तरह नकारा जा सके। यह बहुत मुश्किल समय है। विज्ञान, सभ्यताओं और परम्पराओं ने एक ओर जहाँ बहुत कुछ सरल किया है तो दूसरी ओर जीवन को अतिसुविधापूर्ण बनाने के चक्कर में न जाने कितनी जटिलताएं और निर्भरता भी खड़ी कर दी है। ऊपर से किसी की व्यक्तिगत मुसीबतें और परिस्थितयां जाने कितनी सीमायें खड़ी कर देती है। 

मैं जब आध्यात्मिक विषयों पर कुछ लिखती हूँ तो कुछ दोस्तों के सुझाव आते हैं कि किस चक्कर में पड़ गयी हो, ऐसे तो रचनात्मकता पूरी तरह ही खत्म हो जायेगी। मैं भी यह अच्छी तरह जानती हूँ कि कौनसे विषय हैं जिन पर मेरा लिखा हुआ बहुत ज्यादा पसंद किया जाता है। किन शब्दों को अपनी आवाज़ देने पर वे अधिक सराहे जायेंगे। कौनसा लेखन सफलता की ऊंचाईयों तक पहुँचा सकता है। लेकिन मन बार-बार अध्यात्म की ओर ही जाता है। एक लेखक की मुसीबतें तो ऐसे में हजार गुना बढ़ जाती है। जब तक उसके मन में अपने अस्तित्व को बचाए रखने की जरा सी भी चाह हो तब तो बहुत ज्यादा। और तब अपने कुछ विरोधाभासों को भी स्वीकार करना पड़ता है। इस आशा के साथ कि किसी दिन हम इतना साहस अर्जित कर पायेंगे कि उनसे भी मुक्ति पा सकें। जब न कदम पूरी तरह आध्यात्मिकता की ओर बढ़ाये जा सके और ना ही भौतिकता को पूरी तरह छोड़ा जा सके तब संतुलन का रास्ता ही चुनना होता है।

लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जो सिर्फ आपकी कमियां देखने के लिए आप पर इस कदर दृष्टि गढ़ाए रहते हैं कि उन्हें कमी के सिवा कुछ नज़र आता ही नहीं। अध्यात्म में रूचि जाग जाने का मतलब उनके लिए ये हो जाता है कि मुझे तत्काल सब कुछ छोड़-छाड़ कर भीख का कटोरा हाथ में ले लेना चाहिए। जो व्यक्ति खुद कभी लिखकर पैसा कमाना चाहते थे, बहुत भावुक कहानियां लिखकर उसकी किताब छपवाते हैं, बेचते हैं, कहानियों की पीड़ा पर वाहवाही मिलने पर ख़ुश भी होते हैं, वही दूसरों पर संवेदनाओं को बेचने का आरोप लगाते हैं। पता नहीं कुछ लोगों के लिए ऐसा क्यों है कि उन्हें नृत्य का बिकना नहीं अखरता, संगीत का बिकना नहीं अखरता, अभिनय का बिकना नहीं अखरता, अन्य कलाओं का बिकना नहीं अखरता और दुनिया में जहाँ लगभग सब कुछ व्यापार ही है किसी ना किसी रूप में (फेसबुक पर लिखना भी) वह नहीं अखरता लेकिन अगर किसी को लिखने के ऐवज में कुछ पैसे मिल रहे होंगे या कोई लेखन को प्रोफेशन चुने तो वह अखर जाता है। हाँ, कोई कुछ ऐसा लिख रहा है जिससे दुनिया का नुकसान हो रहा हो तो बात अलग है। फिर उसका विरोध बनता है।

बाकी लिखना मेरे लिए एक मानसिक जरुरत ज्यादा है। अगर आर्थिक उद्देश्य ही होता तो खुद को मिले ढेर सारे अवसरों और विकल्पों, जिन पर चलकर बहुत कुछ अर्जित किया जा सकता था को मैं नहीं ठुकराती। कुछ दोस्त तो प्रत्यक्ष प्रमाण हैं इसके। लेकिन आर्थिक मामले में मैं बहुत सीमित रहना चाहती हूँ, सिर्फ अपनी मूलभूत जरूरतों तक, शेष मुझे अध्यात्म की ओर ही बढ़ना है। मेरे ज्यादातर लेख मेरा खुद से ही संवाद होते हैं। दूसरों में बदलाव का उद्देश्य लेकर मैं नहीं लिखती। वैसे सामान्यत: कोई भी ऐसा नहीं होता कि वो पूरी तरह से बदलाव के लिए लिखता है। यह होना भी नहीं चाहिए। क्योंकि बहुत बड़ा अहंकार है यह। खुद में कमियां रहते हुए केवल और केवल दूसरों में बदलाव के लिए कैसे लिखा जा सकता है? लगभग सभी की मानसिक जरुरत होती ही है किसी न किसी तरह की अभिव्यक्ति। बाकी मुझे लगता है अगर समझ से लिखूंगी तो स्वत: ही अच्छा प्रभाव होगा ही। हाँ, कुछ पुरानी रचनाओं से अब पूरी तरह सहमत नहीं हो पाती, बच्चों जैसी हैं, तब सोच भी कुछ-कुछ अलग थी, लेकिन अब वे लेखन यात्रा का हिस्सा हैं तो हैं। उन्हें मिटा देना तो हल है नहीं। हालाँकि अनेकान्तवाद को अगर हम समझे तो किसी भी दृष्टिकोण से पूरी तरह सहमत या असहमत हो ही नहीं सकते। और जो कभी लिखा था वह उस समय के मेरे विचार थे ही। खैर! किसी दिन लिखना भी छूट ही जाएगा। वैसे भी जीवन में बहुत कुछ छोड़ चुकी हूँ। पर हाँ, जो एक-दो चीजें बची हैं वे भी छुड़वाकर ही मानेंगे लोग। अच्छा भी है मेरे लिए। बंधी नहीं रहूंगी किसी चीज से। लेकिन बदलाव-बदलाव की बात करने वाले लोगों की असंवेदनशीलता देखकर बहुत आश्चर्य होता है। जब आप उस व्यक्ति के प्रति संवेदनशीलता और समझ नहीं रख सकते जो आपके सामने है तो फिर सारी दुनिया-जहाँ की बात कर भी लें तो क्या मतलब? कोई ग़लतफ़हमी है भी तो पूरा स्पेस देती हूँ क्लियर कर लेने का लेकिन वह नहीं करनी है और सिर्फ पूर्वाग्रह पालने हैं। उन पूर्वाग्रहों का असल कारण क्या है अपने मन में वह नहीं स्वीकार करना है। 

मैं खुद बहुत सजग रहती हूँ महत्वकांक्षाओं से बचने के प्रति। दूसरों को इतना सोचने की जरुरत है ही नहीं क्योंकि मुझे खुद इतनी फंसावट महसूस होती है कि मैं खुद ही अपने आप को निस्सहाय महसूस करती हूँ और बहुत छोटी-छोटी सी बातों में अपराध बोध पाल लेती हूँ। बाकी जिसे आलोचना के लिए इस छोटे से मामले में पैसे नज़र आते हैं, जाने-अनजाने वह खुद पैसे को बहुत ज्यादा महत्व दे रहा है। बाकी पैसा तो सिर्फ एक साधन है जीवनयापन का। बस कम-ज्यादा सभी को जरुरत होती है आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए। इससे ज्यादा महत्व दिया भी नहीं जाना चाहिए इसे। मैं भी खरीदती हूँ किताबें, लेकिन मन में कभी किसी के लिए ऐसे ख़याल नहीं आते। अति-भौतिक युग की मजबूरियां हैं यह। जो वाकई में संत हो, समाज में रहे तो वह भी पूरी तरह अलग नहीं हो सकता इससे। जरुरी बस इतना होता है कि कट्टर जुड़ाव न रहे किसी भी चीज को लेकर और सिर्फ उसी के पीछे हम ना भागते रहें। 

बाकी जब कोई कहता है कि अज्ञानता एक वरदान है, तब वह इस मायने में बहुत सही कहता है कि एक जड़ जीवन, एक बंधा-बंधाया जीवन जीना आसान होता है। संघर्ष होते हैं लेकिन परिचित और सीमित तभी तो पशु-पक्षी दुनिया जहाँ की चिंताओं से मुक्त खुद में ही मग्न नज़र आते हैं। लेकिन जिसकी चेतना धीरे-धीरे जागने लगती है जाने कितने अपरिचित द्वन्द और संघर्ष उसका इंतजार कर रहे होते हैं। और ऐसे में बाहरी और व्यक्तिगत जीवन की परिस्थितियाँ जब पूरी तरह से प्रतिकूल हो तब तो कहना ही क्या? पर इन प्रतिकूलताओं में भी जो आत्मिक उत्थान के लिए अनुकूलता खोज लेता है असली विजेता वही होता है। परम तत्व बस वह शक्ति दे कि मैं भी खोज सकूँ। 

Monika Jain ‘पंछी’
(03/01/2016)

August 17, 2017

Save Nature Quotes in Hindi

Save Nature Quotes

  • 25/05/2017 - कल नदियों को बचाने से सम्बंधित एक आर्टिकल पढ़ रही थी। बहुत सी बातें निकल कर आई। घर में तो पानी खर्च को लेकर हम सामान्यत: अच्छे से ख़याल रखते हैं, चाहे जितना भी उपलब्ध हो। लेकिन मम्मा की अच्छी बातों में से एक बात है - कहीं भी, कभी भी पानी व्यर्थ बह रहा होगा तो घर की ही तरह मम्मा को फ़िक्र होती है। लोग बोरवेल या मोटर चलाकर भुलक्कड़, कुम्भकर्ण या दुनिया के सबसे व्यस्त आदमी बन जाएँ, लेकिन माँ बिना किसी संकोच के उन्हें घर पर कह आती हैं। दुनिया-जहाँ के सारे मुद्दे हमें याद रहते हैं, लेकिन कभी-कभी हवा, पानी, पशु-पक्षी और पेड़-पौधें जो सबसे जरुरी हैं, उन्हें भी याद कर लेना चाहिए। क्योंकि पानी आँख का हो चाहे ग्लास का...बचे रहना जरुरी है।
  • 20/05/2017 - हमारे भारत में कुछ भी संभव है। मसलन एक डॉक्टर (आयुर्वेदिक) अपने घर में लगे घने छायादार पेड़ को पत्तियों से होने वाले कचरे की वजह से कटवाकर, फिर अपनी गाड़ी की धूप से सुरक्षा के लिए दूसरे घरों के बाहर लगे पेड़ों की शरण स्थली खोजता है।
  • 06/05/2017 - कुछ दिन पहले घर में शौकिया तौर पर मिट्टी का एक प्याला लाया गया था। उसे देखते ही मैंने कहा इसमें तो दही जमायेंगे। आज किचन में काम करते समय वह पास में ही रखा था तो माँ ने कहा, इसी में साफ़ कर लेती हूँ सब्जी तो मेरे मुंह से बरबस निकल पड़ा, 'इसे क्यों दु:खी कर रही हो?' और इसके बाद हम लोग न जाने कितनी देर तक हँसते ही रहे। मैंने ऐसा क्यों कहा मुझे समझ नहीं आया। लेकिन हाँ जिन चीजों से सदा-सदा का नाता लगता है उनमें से मिट्टी भी एक है। 
  • 17/04/2017 - सब कुछ कितना सरल हो सकता था लेकिन जटिल हृदयों और जटिल बुद्धियों से निकले धर्म और कर्म सब जटिल ही होने हैं। एक तो पहले से ही ये दुनिया गोल, ऊपर से ये मनुष्य इतने गोले (जाल) बनाता है कि उनमें गोल-गोल घूमते-घूमते जो असल गोल (शांति और सुकून) है वह पूरी तरह गोल हो जाता है। और पता है जोक ऑफ़ द सेंचुरी क्या है? इतने तामझाम के बाद भी लोगों का यह कहना कि वे बोर हो रहे हैं। और जब नन्हें-नन्हें से बच्चे भी थोड़ी-थोड़ी देर में कहते पाए जाते हैं कि वे बोर हो रहे हैं, तो फिर मानव जाति की सारी सफलता अपनी असफलता की कहानी कहने लगती है। छोटे से बच्चों का बोर होना बहुत बड़े ख़तरे की घंटी है। काश! मनुष्य यह समझ पाता कि अपनी जड़ों (प्रकृति) से कटकर वह कोई समाधान कभी नहीं पा सकता।
  • 07/10/2016 - नन्हीं-नन्हीं खेती करना अच्छा लगता है।
  • 09/02/2017 - किसी पेड़ को कटते देखना कुछ-कुछ खुद को कटते देखना है।
  • 28/01/2017 - कितना अच्छा होता न!...गर हम सारी दुनिया के प्राणी अपनी-अपनी मूलभूत जरूरतें पूरी होने के बाद...गिल्ली डंडा खेलते, कंचे खेलते, पहाड़ों पर चढ़ते, झरनों में नहाते, बारिश में नाचते, प्रकृति का संगीत सुनते, जंगल में पकड़नी और छिपा-छिपी खेलते...और भी बहुत कुछ। प्रकृति के पास तो इतना सारा आनंद है। कितना अच्छा होता...न यह कंप्यूटर होता और न मुझे यह पोस्ट लिखनी पड़ती। इससे अच्छा तो मैं कंचे में जीतने के बाद सबको वापस खेलने के लिए कंचे बाँट रही होती। (कोई लूटता भी नहीं फिर तो।) :p ^_^
  • 11/09/2016 - अजीब है न! हमें लगभग हर एक उत्सव को इको फ्रेंडली मनाने की अपील जारी करनी पड़ती है...और हम उन्हें उत्सव कहते हैं। 
  • 04/09/2016 - मिट्टी का जब-जब स्पर्श हुआ तब वह इतनी अपनी लगी कि बाकी सब अजनबी हो गए।
  • 01/09/2016 - पौधे की पत्तियां तोड़ने की उसकी तीव्र इच्छा को देखते हुए मैं उसे रोक तो नहीं पायी...पर मैंने कहा, 'बाबू, बस थोड़ी सी तोड़ना।' उसने पूछा, 'क्यों?' मैंने कहा, 'पौधे को भी दर्द होता है न!'...और वह टूटी हुई पत्ती को वापस पौधे पर जोड़ने लगी। :) बच्चे तो शायद ऐसे ही होते हैं। लेकिन कुछ दृश्य कितना कुछ कह जाते हैं।
  • 20/04/2016 - डिअर पेरेंट्स! आपके बच्चों के साथ हुए वार्तालाप को सुनकर कभी-कभी समझ नहीं आता कि आप कुछ बना रहे हैं या बिगाड़ रहे हैं। प्रकृति कैसे कृत्रिम बना दी जाती है, यह देखना हो तो एक बच्चे को बड़ा होते हुए देखिये। 
  • 18/09/2015 - यहाँ लोगों की लाउड स्पीकर वाली भक्ति ने प्रकृति से पंछियों की सुरीली चहचहाहट के साथ शुरू होने वाली सुबहों को भी छीन लिया। कहीं तो, कभी तो, कुछ तो प्राकृतिक रहने दिया होता, प्रकृति के सबसे बुद्धिमान (?) प्राणी!
  • हम जब प्रकृति के संरक्षण की बात कहते हैं तो हम अपने ही संरक्षण की बात कह रहे होते हैं। बाकी मनुष्य रहे न रहे...प्रकृति या इस पूरे ब्रह्माण्ड को रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ने वाला। 
  • यहाँ एक ओर परंपरा, धर्म और संस्कृति का शोर सुनाई देता है जो मात्र दिखावा बनकर रह गये हैं, तो दूसरी ओर पाश्चात्य संस्कृति हावी है, जो मात्र भ्रम लगती है। इन दोनों से इतर कोई प्रकृति की बात क्यों नहीं करता? कितना आकर्षित करती है वह। 
  • प्रकृति के संरक्षण के लिए मिट्टी के गणेश जी के विसर्जन की बात चल रही है। बहुत अच्छी बात है। (बुरी बात यह है कि पहले आग लगाओ और फिर कुआँ खोदो) खैर! यहाँ तो मिट्टी ही गणेश जी है। विसर्जित क्या करें? 
  • सारी कायनात में मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी है जो समूची प्रकृति और इसके समस्त जीवों का क्रूर से क्रूरतम तरीके से शोषण करता है।...और ताज्जुब यह है कि इसी शोषण के आधार पर वह प्रकृति के सबसे श्रेष्ठ और बुद्धिमान प्राणी होने का दंभ भरता है। मनुष्य नामक प्राणी होने के नाते चारो तरफ यह जितना भी विकास है...कई बार इसे देखकर मुझे आत्मग्लानि महसूस होती है। प्रकृति को निचोड़-निचोड़ कर अपने अधीन कर लेने का मनुष्य का सपना तो हमेशा सपना ही रहना है, क्योंकि इस सपने को पूरा होते हुए देखने के लिए वह शेष रहेगा नहीं। पर काश! वह समझ पाता कि अपने अहंकार और महत्वकांक्षाओं के चलते किसी और का अपराधी वह खुद को माने न माने लेकिन खुद अपना तो सबसे बड़ा अपराधी है ही।
  • बारिश के बाद पेड़-पौधों की ख़ुशी देखते ही बनती है। पत्ते-पत्ते से झलकता है प्रकृति का अनुपम सौन्दर्य!... तिस पर इस सौन्दर्य को चार चाँद लगाती कोयल की स्वर लहरियां और मयूरों का अद्भुत नृत्य; नदियों, झीलों, पोखरों में भर आये स्वच्छ जल की कल-कल और पहाड़ों की निराली छटा…! ऐसा लगता है मानों प्रकृति का कण-कण प्रेम से अभिभूत होकर आसमां की ओर अपनी कृतज्ञता प्रकट कर रहा हो। बस यहाँ-तहाँ हम मनुष्यों द्वारा फैलाये गए कूड़ा-करकट, प्लास्टिक, पॉलीथिन आदि यह संकेत जरुर देते नज़र आते हैं कि हम मनुष्य प्रकृति की सबसे नालायक औलादें हैं।

Monika Jain ‘पंछी’

August 14, 2017

Quotes on Change in Hindi

Change Quotes

  • 14/08/2017 - कुछ ही दिन पहले पास में एक मॉल खुला था। वॉशरूम, पानी की अच्छी व्यवस्था थी वहां, लेकिन फिर भी कुछ लोगों ने टॉयलेट गन्दा कर रखा था। एक कोने में बच्चों के डायपर गिराए हुए थे। स्वच्छता और साफ़-सफाई की उम्मीद हम करते हैं, लेकिन उसके योग्य बनने के बारे में नहीं सोचते। जिस देश के लोगों में सही व्यवस्थाओं की कद्र ही ना हो वहां व्यवस्था सही हो भी कैसे?
  • 12/08/2017 - कुछ महीनों पहले यह ख़याल आया था कि मनोविज्ञान (संवेदना पर आधारित) एक ऐसा विषय है जो बहुत जरुरी है और इसे बचपन से ही पाठ्यक्रम में किसी ना किसी रूप में शामिल होना चाहिए। बड़े होने के बाद बदलाव मुश्किल होते हैं, आदतों और कंडीशनिंग से छुटकारा भी मुश्किल, लेकिन बचपन वह समय होता है जब अगर सही शिक्षा मिले तो बहुत कुछ बदल सकता है। नैतिक शिक्षा और उससे जुड़ी कहानियां पर्याप्त नहीं है। कहानियों से इतर भी बहुत सरल रूप में कांसेप्ट क्लियर करते हुए इस विषय का समावेश होना चाहिए। हर अपराध, लापरवाही, क्रूरता के पीछे मन की विकृतियाँ ही काम करती हैं और इनके बारे में जितना जल्दी और जितना ज्यादा इंसान समझे और जाने उतना ही बेहतर है। पाठ्यक्रम में कैसे आ सकती हैं इसका मुझे आईडिया नहीं लेकिन गिफ्ट्स के रूप में बच्चों को ऐसी पुस्तकें देने का प्रचलन शुरू होना चाहिए।
  • 21/05/2017 - केवल समस्यायों के एक, दो, हजार, दस हजार और लाख रूप गिनाने से हल नहीं मिलेगा। सभी समस्यायों के मूल में असंवेदनशीलता और जागरूकता का अभाव है। जब तक हम इन पर काम नहीं करेंगे, तब तक समाधान भी फौरी और इधर से उधर शिफ्टिंग वाले ही होंगे। 
  • 16/02/2017 - मुझे हैरानी होती है। कितनी सारी चीजें हैं जिन पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगना चाहिए...मसलन पटाखे, शराब, सिगरेट, तम्बाकू, गुटखा...आदि आदि। नशेड़ियों को तो क्या कहा जाए (किसी और दिन अच्छे से कहूँगी) लेकिन राजस्व के लिए ये सब चलने देना...मतलब पागलपंती की भी कोई सीमा होती है।
  • 23/01/2017 - यहाँ हम घर में कुल तीन सदस्य हैं। जब कभी भी घर में किसी को बर्तन साफ़ करने के लिए रखा जाता है तब भी मम्मी और मेरा ख़याल हमेशा यही रहता है कि बर्तन कम से कम हो। अभी जो आती हैं, वे बुजुर्ग हैं तो थोड़ा एक्स्ट्रा ख़याल रहता है। उनका मेहनताना, समय-समय पर दी जाने वाली खाने-पीने की चीजें और पहनने के कपड़े देना ये सब तो बहुत आम सी बातें हैं। मुझे जो चीज अच्छी लगती है वो है मम्मा द्वारा बराबर उनका हालचाल और परेशानियाँ पूछते रहना। उनका हल बताते रहना। एक दिन बर्तन साफ़ करते समय उनके हाथों में हल्की सी खरोंच आ गयी तो मम्मा अपने हाथों से उनको दवाई लगा रही थी और पट्टी बाँध रही थी। मैं सीढ़ियों से नीचे आ रही थी। पता नहीं क्यों उस दृश्य में अद्भुत सा सम्मोहन था। दोनों के एक्सप्रेशन्स देखते ही बनते थे। जैसे माँ-बेटी हों। मेरी आँखें ऐसे दृश्यों के लिए कैमरे का काम करती है। :) कभी-कभी सोचती हूँ : क्रांति और सुधार के हौव्वे से इतर सभी को कितनी छोटी-छोटी सी चीजों को समझ लेने की जरुरत भर है।
  • 01/09/2016 - जिस क्षण हमने खुद को बदला...उस क्षण सारी दुनिया बदली।
  • 11/03/2016 - प्रकृति के मूल तत्व/स्रोत से जुड़े बिना भेद समाप्त हो ही नहीं सकते। एक जगह से धुंधले होंगे तो दूसरी जगह उभर आयेंगे। बाहर की क्रांतियाँ कभी-कभी ठीक होती है, लेकिन उससे पहले जरुरत भीतरी क्रांति की है। भीतर जो बदलेगा वह स्वाभाविक और स्थायी होगा। केवल बाहर जो बदलेगा वह बस रूप बदलेगा। 
  • 13/03/2015 - किसी भी इमेज में सिर्फ इसलिए बंधकर रहना क्योंकि आपकी वह स्थापित छवि है...सही नहीं है। समय के साथ-साथ विचार बदलते हैं, धारणाएं बदलती है, हमारे सपने, हमारी रुचियाँ बदलती है और उसी के अनुसार बदलते हैं हम भी। और इन सब बदलावों के लिए हमें बाहर के शोर को नहीं अपने भीतर की आवाज़ को सुनना होता है, और यह भीतर तब तक रहता है जब तक हम रहते हैं। तो बदलने की प्रक्रिया भी तब तक जारी रहती है जब तक हमारा अस्तित्व है। तो खुद को इतनी सीमाओं में क्यों बाँधना? हाँ, बस अवसरवादी बनकर बार-बार रंग नहीं बदलना है। 
  • 03/03/2015 - दूसरों की बजाय अपने विचारों, अपने व्यवहार और अपने कार्यों की निगरानी रखना हमनें जिस दिन से शुरू कर दिया, त्वरित बदलाव की प्रक्रिया शुरू हो जायेगी। 
  • 14/12/2013 - लोग कहते हैं लिखने से क्या होता है? बिल्कुल लिखने से कुछ नहीं होता पर पढ़ने से होता है, बिल्कुल होता है। और अगर दुनिया की 7 अरब की आबादी में से 1 इंसान की सोच भी अगर कुछ पढ़कर सकारात्मक दिशा में बढ़ती है तो लिखना सार्थक है। शत प्रतिशत सार्थक है। 
  • शब्दों की विचार परिवर्तन में अहम् भूमिका है। हम जो पढ़ते हैं, सुनते हैं, उनका हमारे विचारों पर प्रभाव पड़ता है। वैसे तो हम कुछ सोचे उसके लिए भी किसी भाषा की जरुरत तो होती ही है। रही बात संकीर्णता की, तो जैसा हम सोचेंगे, जो हमारे विचार होंगे वही हमारे व्यवहार और कार्यों में भी परिलक्षित होंगे। तो यह सोचना कि कहने से क्या होगा, गलत है। सही दिशा में सोचना भी जरुरी है, कहना भी और करना भी।
  • बाहर तो जब-जैसा अवसर मिल जाए। कभी-कभी जरुरी होने पर बीच सड़क भी बहस की है। लेकिन घर में हम कुल तीन सदस्य हैं तो वर्जनाओं और सीमाओं को तोड़ने को लेकर मेरी आध्यात्मिक चर्चाएँ सबसे अधिक माँ के साथ होती है। उसके बाद जब-जब अवसर मिलता है तो बच्चों के साथ और कभी-कभी बाकियों के साथ भी। वर्जनाओं और सीमाओं को टूटते हुए भी देखा है। समाज सुधार के लिए किसी हौव्वे की जरुरत नहीं होती। आप जिस क्षण दुनिया के जिस स्थान पर खड़े या बैठे हैं वहां ही आपके पास कई अवसर होते हैं। 
  • नौकर मालिक बन सकता है और मालिक नौकर। स्त्री पुरुष की जगह पा सकती है और पुरुष स्त्री की। सवर्ण दलित बन जायेंगे और दलित सवर्ण। लेकिन समानता हमेशा एक दिवा स्वप्न ही रहेगी।...तब तक, जब तक कि मालकियत और नियंत्रण की भावना खत्म नहीं हो जाती।
  • हर क्षण आदमी एक नया आदमी होता है। वो जो भी होता है...हर आदमी के लिए वह अलग-अलग होता है। यही सापेक्षता है।

Monika Jain ‘पंछी’

August 11, 2017

Help (Charity) Quotes in Hindi

Help (Charity) Quotes

  • 22/07/2017 - वो वाला हवन तो कभी किया नहीं और आगे भी करने का कोई इरादा नहीं। लेकिन ‘हवन करते हाथ जलना’ वाली कहावत बहुत चरितार्थ हो रही है कुछ समय से। :’( सच्ची! सब मोह माया है। :/
  • 18/02/2017 - बस यही तो अजीब है न!...कि जो बड़े वाले फैन होने का दावा करते हैं, जो प्यार का दावा करते हैं, जो हमेशा साथ देने का दावा करते हैं, जो बड़ी-बड़ी तारीफें करते हैं, इसकी-उसकी-न जाने किस-किस की उपाधियों से नवाजते हैं...अक्सर वे एक छोटी सी मदद या समस्या के समय भी घोर लापरवाह बन जाते हैं।...और दूसरी ओर कभी-कभी कोई घोर अज़नबी जिसे लेना-देना नहीं...कौन मोनिका, कहाँ की मोनिका, कैसी मोनिका, होगी कोई मोनिका...वे भी बहुत बड़ी वाली मदद कर देते हैं। ये भी शायद एक वजह हो सकती है (हालाँकि है नहीं :p ) कि क्यों मुझे चींटी, कीड़े-मकोड़े, छिपकली, चिड़िया, कबूतर....सबमें अपने दोस्त और रिश्तेदार नज़र आते हैं।
  • 14/01/2017 - वास्तव में परमार्थ क्या है, इसे समझने के लिए और इसके होने के लिए बेहद सूक्ष्म दृष्टि चाहिए...बेहद सूक्ष्म। महावीर, बुद्ध, जीसस, नानक, मीरा...जो भी मुक्त हुए उनके पास यही दृष्टि थी। 
  • 14/10/2016 - दान (दाता भाव के अभाव में) अपने आप में एक आनंद है। उससे किसी अतिरिक्त फल की आशा उसे महज व्यापार बना देती है। 
  • 28/12/2014 - हम नहीं जानते देने का सुख। हम सिर्फ पाना चाहते हैं।...और यही सारी समस्यायों की जड़ है। अक्सर लोग सोचते हैं उन्हें यह मिल जाए, वह मिल जाए, वह भी और वह भी...पर बहुत कम देखा है किसी को कहते हुए कि वह देना चाहता है। हम प्यार चाहते हैं, देना नहीं। हम सम्मान चाहते हैं, करना नहीं। हम चाहते हैं हमें समझा जाए पर हम दूसरों को समझना नहीं चाहते। हमारी गलतियाँ नजरंदाज की जाए पर दूसरों की गलतियाँ हम भूलते नहीं। सारी ख्वाहिशें, सारी इच्छाएं और सारे सपने जब 'मैं' से आगे बढ़ ही नहीं पाते तो उनका होना न होना मायने ही कहाँ रखता है? 
  • 25/07/2014 - जब कोई व्यक्ति हमसे मदद चाहता है, तो हमें इसे एक अवसर के रूप में देखना चाहिए। क्योंकि हमारे ना करने के बावजूद भी अरबों की आबादी की इस दुनिया में उस व्यक्ति को निश्चित रूप से कोई और मदद करने वाला मिल ही जाएगा (अपवादों को छोड़कर)। अपने अहंकार, ईर्ष्या, आलस, स्वार्थ या अन्य किसी भी वजह से पूर्ण सक्षम होते हुए भी अगर हम किसी की छोटी सी मदद भी जान-बूझकर नहीं करते, तो यह निश्चित रूप से हमारा दुर्भाग्य है। 
  • 02/10/2012 - कुछ लोग बिना मांगे मदद करने आते हैं और फिर मदद करने की कुछ अप्रत्यक्ष शर्तें भी बताते हैं, और खुद को मददगार भी कहते हैं। भई, चाहे जो हो पर शर्तों वाली मदद तो बिल्कुल भी नहीं चाहिए और ना ही ऐसे मददगार। दुनिया की कोई भी समस्या इतना कमजोर कभी नहीं बना सकती कि दूसरों की उन शर्तों पर मदद लेनी पड़े, जिन्हें मानने को दिल नहीं कहता। फिर चाहे शर्त टिन्नी-मिन्नी सी ही क्यों ना हो। 
  • ऐसा सबके साथ कभी ना कभी जरुर हुआ होगा - किसी समस्या को लेकर मन बहुत परेशान है, उससे उभरने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा...तभी अचानक कोई अजनबी हमारी सारी परेशानी छू कर जाता है। बिना किसी अपेक्षा के, बिना किसी रिटर्न की चाह के, ज़िन्दगी के रास्तों में हमें ऐसे ढेर सारे अजनबी मिलते हैं, जो हमारी कई छोटी-मोटी समस्यायों को सुलझाते हुए, हमें जाने-अनजाने आगे बढ़ने का हौसला देते हैं, हमारे रास्तों को आसान बना देते हैं। कई बार उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का हमें मौका नहीं मिल पाता। पर क्या आपको नहीं लगता, उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का सबसे अच्छा तरीका है कि हम भी किसी के लिए ऐसे अजनबी दोस्त बन जाएँ। नफा-नुकसान, जान-पहचान, जाति-धर्म, ऊँच-नीच का आकलन किये बिना दूसरों की मदद के लिए तत्पर रहें। अब ये न कहियेगा कि मौका नहीं मिला। मौके तो हमें घर बैठे भी हजार मिलते हैं, बस जरूरत है मौके को पहचानने और उसे भुनाने की।
 
Monika Jain ‘पंछी’

August 2, 2017

Religion (Religious Fanaticism) Quotes in Hindi

Religion (Religious Fanaticism) Quotes

  • 27/05/2017 - एक ऐसा सॉफ्टवेयर बना दो कोई जिसमें किसी धर्म विशेष की कोई कुरीति फीड करो तो उससे मिलीजुली समस्त धर्मों की कुरीतियों का विवरण आ जाए। वो क्या है न कि हमें जड़ता के मामले में भी प्रतिस्पर्धा और तुलना करनी होती है।...मतलब वो कुएं में कूद रहा है तो क्या मैं तालाब में भी न कूदूँ?
  • 24/05/2017 - मूर्ति स्थापना को लेकर मर रहे हैं और मार रहे हैं, जुलूसों के लिए मर रहे हैं और मार रहे हैं, मंदिर जाने और रोकने के लिए मर रहे हैं और मार रहे हैं...प्रतिस्पर्धा, राजनीति और असुरक्षा का इससे विकृत रूप और क्या हो सकता है भला? मतलब असल समस्याएं जाएँ घी-तेल लेने...हम तो नयी-नयी अजीबोगरीब समस्याएं पैदा करेंगे और उन्हें एन्जॉय करेंगे। बड़ी स्तर हीनता है। लोगों को शर्म भी नहीं आती कि वे किन चीजों के लिए मर और मार रहे हैं। संस्कृति और परंपरा पर गर्व करने और इसकी माला फेरने वाले यौद्धा! और उनके ही नक़्शे कदम पर चलने वाले समानता के लिए संघर्षरत वीरों! भारत को सिर्फ बुतों, पुतलों, प्रतीकों और मूर्तियों का देश बना देने में कोई कसर न छोड़ना। जय...! (अब जय के बाद संबोधन के लिए इतने प्रतीक हैं यहाँ कि जो मन पड़े भर लेना।)
  • 30/08/2016 - जितना आसान है विज्ञान का विद्यार्थी बनना...उतना ही मुश्किल है वैज्ञानिक चिंतन का विकसित होना और उससे भी अधिक मुश्किल है सहज धर्म का उदय होना।
  • 07/04/2016 - बाहर नैतिकता बचा सकते हो, कानून बचा सकते हो, व्यवस्था बचा सकते हो और संप्रदाय भी। लेकिन धर्म एक ऐसी चीज है जिसे बस भीतर ही बचाया जा सकता है...और कोई तरीका नहीं। पर हाँ, जब यह भीतर बचने लगता है तब बाहर स्वत: ही प्रतिबिंबित होने लगता है।
  • 07/02/2016 - कट्टरता का आलम तो देखिये...लोग 'अहिंसा' शब्द को पकड़कर 'हिंसक' बन जाते हैं और 'सकारात्मकता' शब्द को पकड़कर घोर नकारात्मक।
  • 10/03/2016 - धर्म उसी दिन सफल होगा जब वह स्थापित मान्यताओं और रास्तों को थोपने की बजाय लोगों में सहज जिज्ञासा उत्पन्न करेगा। उनमें ऐसे प्रश्न उत्पन्न करेगा जिसे वे एक जड़ जीवन को जीते हुए अपने आसपास फटकने भी नहीं देते...और उन प्रश्नों के समाधान के लिए अपनी योग्यता और रूचि के अनुरूप रास्ता चुनने की स्वतंत्रता भी देगा। बाकी असफलता के लिए सिर्फ नाम और प्रतीकों को बचाने और मिटाने की जंग जारी रखी जा सकती है। 
  • 18/07/2015 - किन विषयों पर लिखना पसंद है? निसंदेह 'प्रेम और धर्म' पर। लेकिन जिस दिन धर्म प्रेम बन जाएगा और प्रेम धर्म, उस दिन लिखने की जरुरत भी ना रहेगी। उस दिन बस इन्हें जी भर के जीया जाएगा।
  • 05/07/2015 - 'धर्म' और 'प्रेम' दो ऐसे शब्द हैं जिन पर मानव जाति ने सबसे ज्यादा अत्याचार किया है। 
  • 04/12/2014 - धर्म तो स्वभाव में होना चाहिए। आत्मा में झलकता हुआ, कार्यों और व्यवहार से छलकता हुआ, रोम-रोम में बसा हुआ। उसके लिए बाह्य कर्म कांडों की क्या जरूरत? 
  • 21/08/2014 - मंदिर कहते समय मस्जिद, गुरुद्वारा न कहा तो शामत। ईश्वर कहते समय खुदा, अल्लाह न कहा तो शामत। हिन्दू से जुड़ी बात कर दी, मुस्लिम की न की तो शामत। उफ़! ये धार्मिक लोग। एक और शामत को निमंत्रण देने वाली थी पर अच्छा हुआ याद आ गया। मस्जिद कहते समय मंदिर न कहा तो शामत। खुदा कहते समय भगवान न कहा तो शामत। मुस्लिम कहते समय हिन्दू को भूल गयी तो शामत।...शामत ही शामत। 
  • अजीब इत्तेफाक है न!...जो अपने धर्म, अल्लाह/ईश्वर और संप्रदाय के प्रति जितना कट्टर है, उसके मुंह से उतने ही ज्यादा फूल बरसते हैं। इनकी जुबान से निकले शब्द पढ़कर तो इनका अल्लाह/ईश्वर भी शर्म से पानी-पानी हो जाता होगा। जिनका धर्म उन्हें बोलने की तहजीब तक न सिखा पाया, उनसे और कोई उम्मीद बेमानी है। हाँ, ये अपने ही धर्म के सबसे बड़े दुश्मन जरुर है। 
  • जब भी कोई मेरा विश्वास तोड़ता है या मेरे दिल को ठेस पहुंचाता है तो मैं खुद से एक वादा करती हूँ कि मैं पूरी कोशिश करुँगी कि ऐसा किसी के साथ ना करूँ...अच्छे और सच्चे लोगों के साथ तो बिल्कुल भी नहीं। क्योंकि मेरे लिए धर्म किसी पत्थर के सामने हाथ जोड़कर अपने सुख, समृद्धि और सफलता के गिड़गिड़ाना नहीं है। मेरे लिए धर्म लोगों के साथ वैसा ही आचरण और व्यवहार करना है जैसा मैं खुद के लिए उनसे चाहती हूँ। अच्छाई की ओर कदम बढ़ाने की प्रेरणा के लिए मुझे किसी अच्छे इंसान की तलाश कभी नहीं करनी पड़ती। बुराई और बुरे लोग मेरे लिए उत्प्रेरक का कार्य करते हैं।
  • हमारी सबसे बड़ी समस्या यह है कि हमने कुछ शब्दों, कुछ प्रतीकों को बहुत गहरे से पकड़ लिया है। तथ्य यह है कि बाहरी किसी भी चीज पर पकड़ जब बहुत गहरी हो जाती है तो वहां धर्म के अलावा सारे काम होने लगते हैं। 
  • धर्म वहां है जहाँ सभी प्राणी निर्भयता पूर्वक विचरण कर सकते हैं। जहाँ किसी की उपस्थिति किसी की उपस्थिति से बाधित नहीं।
  • जो सच में धार्मिक होते हैं वे अपना मंदिर-मस्जिद अपने साथ लेकर चलते हैं। उन्हें किसी मंदिर या मस्जिद के बनने और टूटने से फर्क नहीं पड़ता। 
  • कुछ भी कहो, ये धार्मिक कट्टरों के तर्क (कुतर्क) बड़े रोचक होते हैं। लाखों जानवरों की बलि ना दी जाए तो इस्लाम पर मुसीबत आ पड़ेगी। पटाखों के धमाके न हो, रावण और होलिका को न जलाया जाए तो हिन्दुत्व खतरे में पड़ जाएगा। और हाँ, मुस्लिम फलां काम करते हैं तो हिन्दू ढीमका काम क्यों ना करे? हाँ, वो कुएँ में कूदे तो तुम्हें भी नदी में तो बिल्कुल कूदना ही चाहिए, आखिर अपने-अपने धर्म और इज्जत का सवाल है। जिसके लिए तो किसी की भी जान ले लेना, लड़-कटकर मर जाना भी बहुत छोटी सी बात है, तो फिर ये टिन्नी-मिन्नी सी बातें तो मायने ही कहाँ रखती हैं?
  • बुद्ध पुरुषों की अनुभूति एक हो तब भी अभिव्यक्ति अलग-अलग होती है। क्योंकि अनुभूति के समय कर्ता का अभाव होता है लेकिन अभिव्यक्ति के समय कर्ता उपस्थित रहता है। अभिव्यक्ति सिर्फ अनुभूति की झलक देती है। अभिव्यक्ति को अनुभूति मान लेना ही कट्टरता का कारण है।
 
Monika Jain ‘पंछी’