January 18, 2017

Essay on Spirituality in Hindi

अध्यात्म : भ्रम व निवारण

1. भ्रम : दुनिया में बदलाव की सोच छोड़कर मुक्ति की इच्छा एक बेहद स्वार्थी विचार है।

निवारण : 28/12/2016 - अक्सर हम लोग दुनिया को बदलने की बात करते हैं। लेकिन दुनिया में परिवर्तन और सुधार के लिए कुछ कर गुजरने की भावना जितनी गहरी होगी वह उतना ही बड़ा अहंकार होगा। आतंकवादी ऐसे ही तो होते हैं न? अपने नजरिये से तो वे भी दुनिया को सुधारने में ही लगे हैं। माया सिर्फ बिगाड़ने के नाम पर हम पर हावी नहीं होती, यह सुधारने के नाम पर भी हम पर हावी हो सकती है। बाकी यह ब्रह्माण्ड और इसका बोध इतना गहरा और विशाल है कि न तो हमारे किये कुछ होता है और न ही हमारे न करने से कुछ होता है। सम्पूर्ण तंत्र है यहाँ और जब सम्पूर्ण तंत्र काम करता है तो कोई जीव विशेष कर्ता रह ही नहीं जाता क्योंकि कार्य-कारण की एक अनन्त श्रृंखला चलती है। समष्टि को छोड़कर केवल व्यष्टि को भी स्थूल रूप से हम देखें तो हमारे शरीर के जो सबसे महत्वपूर्ण कार्य हैं उन पर हमारा कोई भी नियंत्रण नहीं। सूक्ष्म रूप से देखेंगे तब तो और भी बहुत कुछ नज़र आ जाएगा। ऐसे में ‘मेरे करने से ही होगा’ और ‘मेरे न करने से ही होगा’ दोनों में ही कर्ता भाव है। अकर्ता न ‘करता है’ और न ही ‘नहीं करता है’। अकर्मण्यता (आलस) और अकर्ता हो जाने (परम/सम्पूर्ण के प्रति समर्पण) में जमीन-आसमान का अंतर है। आध्यात्मिक प्रक्रिया चेतना को ब्रह्मांडीय चेतना के साथ एकाकार करती जाती है ऐसे में बस होता है : सहज, सरल, प्रवाहमय! और जो भी होता है वह उस बोध के अनुपात में सही होता है। इसलिए सबसे बड़ी सेवा मुक्त होना ही है या सबसे बड़ा सुधार आत्म सुधार ही है। हाँ, समाज सुधार इसका परिणाम अवश्य होगा। यह तो हम सबका अनुभव होता ही है।

बचपन से ही अपनी क्षमता और परिस्थितियों के अनुरूप परिचित-अपरिचित सभी की जितनी और जिस भी तरह से मदद करने में सक्षम हूँ मदद करने को तत्पर रही हूँ। कई व्यक्ति जो जीवन में जुड़ते हैं, वे कहकर भी जाते हैं कि आपसे जुड़कर जीवन में बहुत सकारात्मक परिवर्तन हुए हैं या जीवन में हमेशा याद रहोगी। हाँ, बंधने और बाँधने में कभी अधिक रूचि रही नहीं। जिसके कारण अक्सर वह मदद लोगों द्वारा विस्मृत हो जाती है। लेकिन जहाँ-जहाँ मोह वश मैंने रूचि ली, वहां भी कभी अच्छे परिणाम मिले नहीं तो एक स्वतंत्र मैत्री भावना सबसे बेहतर लगती है। जिसकी खासियत यह है कि यह सारे प्राणियों से स्थापित की जा सकती है। जितना किसी भी प्राणी के लिए कुछ कर सको उतना करो (स्वयं और उसे मोह से मुक्त रखते हुए) और अब तो यह भी समझने लगी हूँ कि हमारा किया कुछ भी हमारा कहाँ होता है? जो भी हमें मिला है वह इसी संसार से मिला है। हाँ, अहंकार के क्षणों में हम यह बात विस्मृत कर जाते हैं। और अफ़सोस यह है कि हमारा अधिकांश जीवन इन्हीं क्षणों (मैं, मेरा) में ही बीतता है। बाकी जिस क्षण किसी को परम मिलना शुरू होता है, उस क्षण से ही उसका बांटना शुरू हो जाता है। वह नहीं बांटेगा तो परम से भी दूर ही रहेगा। हाँ, एक जाग्रत व्यक्ति दुनिया को क्या और किस तरह बाँटता है इसे भौतिक दृष्टि वाले व्यक्ति नहीं समझ सकते। हाँ, उस मदद में जितनी मात्रा में वस्तुएं और पैसे होंगे वह तो उन्हें नजर आ जाएगा, बाकी नहीं नज़र आएगा। यहाँ एक बात और कि अधिकांश व्यक्ति जब भी पढ़ते हैं तो पूर्ण आदर्श बातों को किताबी बातें मानकर उपेक्षित कर देते हैं। लेकिन कोई भी आदर्श सिर्फ इतना बताता है कि अभी आपके पास आत्मिक विकास के लिए बहुत-बहुत लम्बा रास्ता है। कम से कम हम चलना तो शुरू करें।

2. भ्रम : मुक्ति पलायन है।

निवारण : 26/12/2016 - मुक्ति क्या है...इसे बस वही समझ सकता है जिसने कभी निर्दोषिता के आनंद को चखा हो। यह पलायन नहीं। पलायन तो संसार है, बंधन है। अपने मूल स्वभाव की ओर लौटना पलायन नहीं होता। हाँ, उससे दूर जाना और भटकना जरुर होता है। महावीर, बुद्ध जैसे कई महात्माओं के वन या हिमालय गमन को पलायन कहा जाता है। लेकिन किसी बीमारी से स्वास्थ्य की अवस्था तक पहुँचने के लिए जैसे कुछ परहेजों की जरुरत होती है। इसी तरह कषायों (मन के संस्कारों) से निर्दोषिता तक पहुँचने के लिए भी परहेज की जरुरत है। साधना को सुरक्षित रखने के लिए कुछ बचाव जरुरी होते हैं। जिसे आत्मबोध हो चुका है उसे तो कुछ भी प्रभावित नहीं कर सकता, लेकिन उससे पूर्व तो प्रभावों से ऊपर उठने के लिए प्रभावों से बचना भी होगा। यह केवल व्यक्तिगत हित की बात नहीं है, यह व्यापक हित की ही बात है। क्योंकि किसी के प्रभाव में आप अपने गुण-स्थान (अपनी चेतना के स्तर) से एक कदम भी नीचे सरके तो यह सिर्फ आपके लिए नुकसानदायक नहीं होगा, यह जीव मात्र के लिए नुकसानदायक है। सुसंगति और कुसंगति के असर की बातें इसलिए ही कही जाती है। बाकी हर महावीर और हर बुद्ध आत्मबोध के बाद अगर उनकी आयु शेष हो तो संसार के उद्धार के लिए वापस आते ही हैं। महावीर और बुद्ध ने तो 40 वर्षों तक यही काम किया। कोई न भी आये तब भी उससे इस प्रक्रिया तक बहुत कुछ हो चुका होता है।

हाँ, मुक्त होने के रास्ते अलग-अलग हो सकते हैं। अगर आपको पता चले कि जिस व्यक्ति/प्राणी से आप लड़ने वाले हो वह आप ही हैं तो तो या तो आप नहीं लड़ोगे जो कि बुद्ध और महावीर का मार्ग (अहिंसा) है, या फिर लड़ोगे लेकिन जीत और हार (फल) के प्रश्न को बिल्कुल दरकिनार रखकर बस उस क्षण की जरुरत को समझकर...जो कि कृष्ण का मार्ग है (कर्मयोग)। कहने को तो कृष्ण को भी रणछोर कहा जाता है। तो क्या करना है और क्या नहीं यह उस व्यक्ति के उस क्षण की जागरूकता, परिस्थितियों और समझ पर निर्भर करता है। एक मार्ग भक्ति भी है। कर्म-कर्म करने वालों को (जो कि निष्काम कर्म या कर्मयोग के जरा भी आसपास नहीं फटकते, क्योंकि जो फटकेगा वो तो चिड़ सकता ही नहीं) उन्हें भक्ति, ध्यान और ज्ञान में रत साधकों जैसे मीरा, महावीर, बुद्ध आदि से बेहद चिड़ होती है। लेकिन, जो बहुत आलसी हों उनसे वास्तविक भक्ति, ध्यान और साक्षी की साधना भी नहीं हो सकती। अध्यात्म में भिक्षु बन जाना (भिखारी नहीं) कोई छोटी बात नहीं। कोई आजीवन ध्यानमग्न बैठा हो वो भी एक असंभव के निकट सी बात है। सामान्यत: जो सबसे सरल और सबसे सहज होते हैं वहीँ भक्तिमय हो पाते हैं। अर्थात् भक्ति सबसे सरल प्राणियों का मार्ग है। (यह भक्ति वह वाली भक्ति नहीं जो फेसबुक पर कटाक्ष करने के लिए प्रचलित है। उससे इसका दूर-दूर तक कोई नाता नहीं। और वह भी नहीं जिसमें दिन-रात गाड़ी, बंगला, कार, पैसे, नौकरी...आदि मांगी जाती रहती है।) भक्ति के बाद ज्ञान थोड़े जटिल (जिज्ञासुओं) का मार्ग है और कर्मयोग (सेवा) थोड़े और जटिल व्यक्तियों का मार्ग है। इसके बाद बचे दुनिया के 99.99 % लोग जो सबसे अधिक जटिल होते हैं। जिन्हें अपने बंधनों का पता ही नहीं होता और ताउम्र उनकी अंधी दौड़ पद, सम्मान, पैसे, प्रतिष्ठा, शोहरत, मनोरंजन आदि के नाम पर बस बाहर की ओर होती है। उन्हें खुद तो कभी कुछ नहीं मिलता (मिलता होता तो दौड़ थम चुकी होती) लेकिन दूसरों को भी इसी दौड़ में शामिल कर लेना चाहते हैं। यहाँ यह समझना जरुरी है कि ज्ञान, भक्ति और कर्म के मार्ग में बहुत कुछ ओवरलैप भी करता रहता है। मतलब किसी भी व्यक्ति का मार्ग इन सभी के मिश्रण से ही बनता है, बात बस प्रधानता की हो जाती है। जो व्यक्ति आजीवन ध्यानमग्न है उस व्यक्ति ने तो इस सृष्टि के जीवमात्र को प्रेम, मुक्ति और अहिंसा दी है (बिल्कुल जैसे परमात्मा द्वारा हमें प्राप्त है)। वह तो परम तत्व के बहुत निकट है। शब्द, कार्य, उपदेश ये सब तो बहुत स्थूल चीजें हैं। जो सबसे मूल तत्व है (प्रेम या अहिंसा) वह तो बहुत सूक्ष्म बल्कि अदृश्य है। मुख्य कार्य तो वही करती है। इसलिए ही यह होता है कि बहुत से योगियों के पास हिंसक से हिंसक पशु-पक्षी भी अपनी हिंसा छोड़ देते हैं (अभी भी कई उदाहरण हम देखते ही हैं)। उनकी ऊर्जा का प्रभाव है। जैसे महावीर जिस रास्ते चलते थे वहां सामान्यत: बहुत लम्बी दूरी तक तक कोई हिंसक घटना नहीं होती थी। अजगर भी एकदम शांत और आनंदित होकर बैठ जाता था। इस दुनिया में जितना भी मोह रहित निस्वार्थ प्रेम है वह उन्हीं व्यक्तियों का परिणाम है जो-जो जिस-जिस मात्रा में मुक्त हुए हैं या परम के निकट हैं। यहाँ एक चीज बता देना आवश्यक है कि बाहरी आडम्बरों और क्रियाकलापों से यह आवश्यक नहीं है कि किसी के भीतर को भी पहचाना जा सके। कोई संसारी नज़र आते हुए भी भीतर मुक्त (अनछुआ) हो सकता है और कोई बहुत ज्यादा धार्मिक/आध्यात्मिक नज़र आते हुए भी गहरे बंधन में हो सकता है। बेहतर है आत्मनिरीक्षण की एक प्रणाली हम विकसित करें। जिस भी व्यक्ति (कुछ और भी हो सकता है) की निकटता में हममें निर्मलता, निच्छलता, शांति और सुकून बढ़े, वह फिर बाहर से कैसा भी नजर आये कोई फर्क नहीं पड़ता, उसे अपना गुरु/मित्र जानिये।

3. भ्रम : अध्यात्म कामचोरों का काम है।

निवारण : 18/01/2017 - कामचोरों के लिए नहीं है अध्यात्म। वास्तव में जो क्षमता होते हुए भी बहुत अधिक आलसी और अकर्मण्य हों, वह तो आध्यात्मिक हो ही नहीं सकता। हाँ, अध्यात्म हमें पसंद और नापसंद (सभी तरह के भेदों) से ऊपर उठाता है। लेकिन इसका मतलब यह जरुरी नहीं कि आप सारे ही तरह का काम करें। क्या करना है और क्या नहीं यह हमारे बोध और परिस्थितियों पर निर्भर करता है और उसी अनुरूप हमारे श्रम की दिशा और रूप तय होता है। फिर चाहे आप झाड़ू लगा रहे हों या किसी अन्तराष्ट्रीय संस्था में भाषण दे रहे हों या बैठकर ध्यान कर रहे हों, अगर समर्पण है (कार्य के दौरान फल और अहंकार की विस्मृति) तो सभी क्रियाएं आध्यात्मिक हो जाती है। समस्या दुनिया के साथ यह है कि यहाँ कर्म का मतलब ही बस यही है कि उससे कितना पैसा, कितनी इज्जत, कितना सम्मान मिलेगा या फिर अहंकार को कितनी तृप्ति मिलेगी।

हमारे घर में अक्सर कई घरेलु कार्य खुद ही किये जाते हैं। यहाँ सहायक ना मिलने के कारण या फिर काम सही से न करने के कारण किसी को रखना बहुत ज्यादा नहीं होता है। बचपन से ही पढ़ाई के साथ-साथ ढेर सारी अतिरिक्त गतिविधियाँ जीवन में समय-समय पर जुड़ती चली गयी। हाँ, जहाँ तक घरेलु कामों की बात है तो विशेष अवसरों वाली कुकिंग को छोड़कर बाकी कामों में रूचि नहीं थी। आते सभी थे। बहुत जरुरत होने पर किये भी जाते रहे। लेकिन फिर भी तुलना तो थी ही। लेकिन पिछले कुछ समय में मैंने जो अंतर महसूस किया है वह यह है कि कई बार ऐसा हुआ है जब मुझे चाहे लेखन से सम्बंधित कोई काम करना हो, पढ़ना हो, पढ़ाना हो, कोई असाइनमेंट, कोई भी अन्य रचनात्मक कार्य, झाड़ू लगाना हो, बर्तन साफ़ करने हो, कपड़े धोने हो, खाना बनाना हो, कोई अनाज साफ़ करना हो, खेलना हो या कोई भी अन्य काम...इन्हें करने के दौरान मैंने कोई विशेष अंतर महसूस नहीं किया। हालाँकि मैं बहुत आध्यात्मिक नहीं हूँ (बहुत शुरूआती स्तर समझ सकते हैं), लेकिन कुछ इतनी विलक्षण अनुभूतियाँ हैं कि यह स्वत: ही अपनी ओर खींचता है। उत्कृष्टता किसी कृत्य की मोहताज नहीं। और अध्यात्म कामचोरों का नहीं हरफनमौलाओं का क्षेत्र है।

3. भ्रम : भूख, गरीबी, बेरोजगारी जैसी समस्यायों के रहते अध्यात्म एक मजाक जैसा है।

निवारण : 15/1/2017 - भूखे पेट को समस्या किसने बनाया? भूखे मन ने। वरना क्या संसार में कुछ कमी थी खाने-पीने की? कुछ लोगों के मन की भूख ने बाकियों के पेट को भी न भरने दिया। और मन की यह भूख सिर्फ जरुरत लायक कुछ पैसों, घर, कपड़ों तक सीमित नहीं...बात नाम, शोहरत, इज्जत, देशों-प्रदेशों के नाम पर धरती और संसाधनों पर अधिकार... न जाने कहाँ-कहाँ तक पहुँचती है। और यह भूख ऐसी है कि मिटने का नाम लेती ही नहीं। इंसान मिट जाता है लेकिन यह भूख नहीं मिटती। मुझे बड़ा ताज्जुब होता है जब पेट की इस भूख का नाम लेकर अध्यात्म पर व्यंग्य किया जाता है। भई! अध्यात्म मन की भूख मिटाने का ही साधन है। यह आपके पेट के खिलाफ कहीं से भी और किसी भी तरह नहीं है। यह बात अलग है मन की भूख मिटने पर कुछ लोगों (अपवाद) के पेट की भूख भी गायब हो जाती है। बड़े भयंकर भ्रम है अध्यात्म को लेकर। पूर्वाग्रही मत बनिए, जिज्ञासु बनिए। भारत जिज्ञासुओं और खोजियों की भूमि के लिए ही जाना जाता रहा है। बाकी वास्तव में आध्यात्मिक जो भी होगा उसके द्वारा किसी न किसी न रूप में, कहीं न कहीं स्वत: ही समष्टि का कल्याण हो ही रहा होगा। वह हर सूचना आप तक पहुंचाए यह जरुरी नहीं। सच तो यह है कि वह अगर आजीवन एक जगह मौन बैठा हो तब भी यह कल्याण होगा। आप कितने भी बड़े जासूस हों तब भी नहीं समझ पायेंगे कि कैसे? समझने के लिए आपको इस तल पर उतरना ही होगा और अपनी दृष्टि को व्यापक भी करना होगा।

Monika Jain ‘पंछी’

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January 1, 2017

Quotes on Truth in Hindi

Truth Quotes

  • 12/02/2017 - मानो या न मानो...आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों, परसों नहीं तो तरसों...इस जन्म, अगले जन्म या अनंत जन्मों के बाद भी लौटना तो बुद्धत्व की ओर ही पड़ेगा। और तब हम कहेंगे : लौट के बुद्धू घर को आये। जब हम सब एक स्रोत से जन्मे हैं तो हमारी नियति अलग-अलग कैसे हो सकती है?
  • 30/12/2016 - हर बात आंशिक सत्य ही होती है। वरना वह बात के रूप में हो नहीं सकती। इस बात को जो हम समझ लें तो शब्दों, विचारों, भावों और तर्कों को उतना ही महत्व देंगे जितना दिए जाने की जरुरत है।
  • 28/09/2016 - जहाँ सन्दर्भ खत्म हो जाए...वहां सत्य प्रकट होता है।
  • 05/07/2016 - कई बार कुछ लिखने की सोच कर आती हूँ और फिर बिना लिखे ही चली जाती हूँ। शब्द झूठे...अनुभूति सच्ची। 
  • 22/04/2016 - सहजता और सरलता सबसे अधिक सरल और सहज ही है। यह बस हमारे मन की ग्रंथियां हैं जो सबसे सरल को सबसे मुश्किल और सबसे जटिल को सबसे आसान मान लेती है। किसने कहा झूठ बोलना आसान है? कोई उससे जाकर पूछे जिसने सहज सत्य का सुख चख लिया हो। 
  • 11/01/2016 - जो शब्दों में उलझकर रह जाते हैं...सत्य से दूर हो जाते हैं।
  • 15/12/2015 - अहंकार सच स्वीकार नहीं कर पाता, भय सच प्रकट नहीं कर पाता और स्वार्थ सच को भी झूठ सिद्ध कर देता है। 
  • 10/12/2015 - सत्य परंपरा से नहीं मिलता, सत्य सतही तर्कों से भी नहीं मिलता, सत्य सिर्फ अनुभूतियों से मिलता है।
  • 10/12/2015 - कुछ पंक्तियाँ अवचेतन मन से उतरती है...जादुई सी...शाश्वत सत्य सी...अनजाने में, जिन्हें पढ़कर यह अहसास होता है कि हम सब कुछ जानते हैं...सिर्फ भुलाये बैठे हैं।
  • 01/10/2015 - जिसने सत्य को जान लिया उसके लिए सत्य के विपरीत जाना असंभव है। लेकिन जिसे सत्य की आंशिक झलक भी नजर आई हो, उसके लिए भी ठहरना बहुत मुश्किल है।
  • 16/02/2015 - सच्चा प्यार, सच्चा धर्म, सच्चा दोस्त, सच्चा गुरु...ये सब शब्द यूँ ही तो अस्तित्व में नहीं आये होंगे। ज्यों-ज्यों पीढ़ी दर पीढ़ी कृत्रिमता बढ़ती गयी होगी...त्यों-त्यों ऐसे शब्द हमारे शब्द कोष में जुड़ते चले गए होंगे। आगे और जाने क्या-क्या जुड़ने वाला है। 
  • 11/02/2015 - देखा जाए तो आईडी फेक नहीं होती। उनमें भरा नाम और परिचय भी फेक नहीं होता। फेक तो बस कुछ इंसान होते हैं। फिर चाहे वे कोई भी रूप धरे...क्या फर्क पड़ता है? 
  • 04/01/2015 - ‘मैं हमेशा सच बोलता/बोलती हूँ’, यह कहना अपने झूठ में बस एक और इजाफा करना भर है। सत्य यह है कि जिस क्षण हम बोलना शुरू करते हैं, असत्य की हमारी यात्रा शुरू हो जाती है। व्यक्ति दर व्यक्ति इसमें मात्रात्मक भिन्नता हो सकती है, किन्तु असत्य की पूर्णतः अनुपस्थिति दुर्लभतम है। शायद इसलिए मौन को सर्वश्रेष्ठ तप कहा गया है। 
  • भावनाओं के प्रवाह (भौतिक) में जब भी शामिल होते हैं तो उनसे बड़ा सच और कोई नहीं लगता।...और जब खुद को अलग कर उस प्रवाह को देखते हैं तो उससे बड़ा झूठ भी और कोई नहीं लगता। 
  • सत्य तर्कातीत है। वह सभी विरोधाभासों को खुद में समाहित कर लेता है।
  • किसी भी शब्द, व्यक्ति, समूह, जाति, धर्म...से हम इतनी पहचान क्यों बनाये कि सत्य का सामना न कर सकें या उसे स्वीकार न कर सकें। क्योंकि एक सत्य यह भी है कि ये सारी की सारी पहचान उधार की है जो हमें बाहर से मिली है। हमारा खुद का इसमें कुछ भी नहीं है। 
  • अगर निष्कर्ष निकालना इतना ही जरुरी हो तो एक बार दूसरे पक्ष को जरुर जानें।
  • कल किसी ने भ्रम की बात की कि वास्तविक दुनिया से परे सब बातें भ्रम है। वैसे अनुभव यह कहता है कि जो चीजें आज हैं, कल नहीं होंगी...कल होंगी तो परसों नहीं रहेंगी...वे सारी चीजें भ्रम है। सत्य सिर्फ वही होता है जो हमेशा और हमेशा रहता है।
  • पूर्ण सत्य कभी भी लिखा नहीं जा सकता। जो भी लिखा जाएगा वह सापेक्ष ही होगा या किसी सन्दर्भ विशेष से सम्बंधित ही होगा। सत्य एक वृत्त (शून्य) की तरह है। हम केंद्र में है और हमारी दृष्टि किसी भी परिस्थति में सारे कोण नहीं देख सकती। शायद इसलिए ही पूर्ण सत्य को जानने के लिए हमें खुद शून्य होना होगा। 
  • अंध विरोध और अंध समर्थन अलग-अलग नहीं एक ही सिरा है अज्ञान का...जो ऊपर उठते-उठते कहीं सत्य (ज्ञान) तक पहुँचता है।
 
Monika Jain ‘पंछी’

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