February 16, 2017

April Fool Funny Story in Hindi

April Fool Funny Story of Moorkhistan in Hindi
मूर्खिस्तान का मूर्ख दिवस
{नन्हें सम्राट, मूर्खिस्तान विशेषांक में प्रकाशित}

मूर्खिस्तान का मूर्ख दिवस आ चुका था। मूर्ख दिवस मूर्खिस्तान का सबसे बड़ा त्यौहार माना जाता है। कई महीनों पहले से ही जोर-शोर से इसकी तैयारियां शुरू हो जाती है। इस दिन कई प्रतियोगिताओं का आयोजन होता है और इसके साथ ही साल भर की मूर्खताओं के आधार पर मूर्खिस्तान के महामूर्ख सम्मान की घोषणा भी की जाती है। इस अवार्ड को पाने के लिए पूरे साल मूर्खिस्तान के निवासियों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा चलती रहती है।

मूर्खिस्तान के सबसे चर्चित भिखारी भीखालाल को इस बार मूर्ख दिवस का निमंत्रण पत्र बांटने का काम सौंपा गया था। भीखालाल लोगों के हाथ-पैर पकड़-पकड़कर भीख मांगने के लिए प्रसिद्द था। निमंत्रण पत्र देने के लिए वह घर-घर पहुँचता और पुकारता – अल्लाह के नाम पर निमंत्रण लेले रे बाबा। मौला के नाम पर निमंत्रण लेले।

कुछ लोग तो भीखालाल द्वारा अपने हाथ-पाँव पकड़े जाने के डर से बाहर नहीं निकले लेकिन मन में निमंत्रण पत्र पाने की लालसा तो थी। कुछ लोग जो खुद को रोक नहीं पाए और बाहर निकल गए, पहले भीखालाल उनके हाथ-पैर पकड़कर मनमानी भीख वसूलता और उसके जाने के बाद आसपास के लोग जो पहले बाहर नहीं निकले थे दौड़ते हुए उसके घर की ओर आते और फिर वे निमंत्रण पत्र देखने के लिए उसके हाथ-पाँव पकड़ते।

मूर्ख दिवस के दिन मूर्खिस्तान के सभी मोटे व्यक्तियों के लिए एक दौड़ प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था। सभी मोटे लोग, दर्शक, आयोजक और जज महोदय आयोजन स्थल पर पहुँच चुके थे। लेकिन यह प्रतियोगिता दौड़ प्रतियोगिता कम और आराम प्रतियोगिता ज्यादा लग रही थी। सभी थककर बीच-बीच में आराम करने बैठ जाते थे। जब तक कोई नियत स्थल पर पहुंचा तब तक बोर होकर आयोजक, दर्शक, जज सभी गायब हो चुके थे।

एक जगह चित्रकला प्रतियोगिता का आयोजन हो रहा था। वहां सब लोग एक दूसरे की जगह पर दौड़ लगाते नज़र आ रहे थे। अपनी चित्रकारी पर किसी को भरोसा न था इसलिए वे दूसरे की जगह पहुँच-पहुंचकर उसकी शीट पर अपनी चित्रकारी कर आते ताकि उसे इनाम न मिले।

एक दूसरी जगह पर अपनी-अपनी मूर्खताओं का बखान करती कविता प्रतियोगिता का आयोजन चल रहा था। सभी बढ़ा-चढ़ाकर अपनी मूर्खताएं सुना रहे थे। जब भुलक्कड़ दास की बारी आई तो वे सब भूल गए। लेकिन बिना कुछ बोले ही उन्होंने होठ, हाथ-पाँव सब हिलाना जारी रखा। वे जब वापस अपनी जगह आकर बैठना भी भूल गए और वहीँ अड़े रहे तो उन्हें विजेता का पुरस्कार प्रदान कर अपनी जगह पर लाया गया। आखिर उन्होंने बिना कुछ भी बोले अपनी मूर्खता का परिचय जो दिया था।

फिर थकान से चूर होकर सब भोजन स्थल पर पहुंचे। भुक्कड़दास को इस बार मूर्खभोज के आयोजन का काम सौंपा गया था। भोजन स्थल के अन्दर से तरह-तरह के पकवानों की ख़ुशबू आ रही थी। लेकिन तभी सबकी नज़र एक नोटिस पर पड़ी। वहां बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था – आप सभी आयोजन के पश्चात् अपने-अपने घरों पर खाना खाने पधारें। अगर कोई अथिति हमें अनुग्रहित करना चाहे तो वह भीतर आ सकता है। इस अनुग्रह के बदले भुक्कड़दास उनके घर पर एक दिन का मेहमान बनने का सौभाग्य प्रदान करेंगे।

भुक्कड़दास की मेहमाननवाजी का ख़याल करते ही सारे के सारे लोग सरपट अपने घरों की ओर दौड़े। खाना खाने के बाद थकान के कारण सबको नींद आने लगी। महामूर्ख सम्मान समारोह में थोड़ी देर बाद जाने की सोचकर सब सो गए। इधर महामूर्ख सम्मान की घोषणा करने वाले मूर्खिस्तान के अध्यक्ष अटपटेलाल ने जब खुद को आयोजन स्थल पर अकेला पाया तो मौके का लाभ उठाकर खुद को ही जूतों की माला पहनाकर महामूर्ख सम्मान से नवाज दिया। और इस तरह मूर्खिस्तान का मूर्ख दिवस मनाया गया।

मोनिका जैन ‘पंछी’
(16/02/2017)

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February 11, 2017

Comedy (Comic) Story in Hindi

Comedy (Comic) Story in Hindi
फिसड्डीलाल की महानता
(नन्हें सम्राट, मूर्खिस्तान विशेषांक में प्रकाशित)

फिसड्डीलाल बचपन से ही महान बनना चाहते थे। महान बनने का भूत उन पर कुछ इस कदर सवार था कि वे हर समय महान बनने के किसी अचूक नुस्खे की तलाश में लगे रहते थे। इसके लिए उन्होंने एक-एक करके इतिहास में जन्में सभी महान पुरुषों के किस्से और कहानियां इकठ्ठा करना शुरू किया और उन्हें पढ़-पढ़कर वे महान बनने की कोशिश में लगे रहते थे।

एक दिन वे महात्मा गाँधी के जीवन के किस्से पढ़ रहे थे। महात्मा गाँधी के स्वच्छता अभियान और उससे सम्बंधित किस्सों को पढ़कर उन्हें महान बनने का एक आईडिया आया। उन्होंने खिड़की से बाहर सड़क पर नज़र दौड़ाई। लेकिन रोज सुबह ही सफ़ाई हो जाया करती थी इसलिए वहां कोई कचरा नहीं दिख रहा था।

पहले तो फिसड्डीलाल यह देखकर दु:खी हुए पर फिर थोड़ी ही दूरी पर रखे कचरा पात्र पर उनकी नज़र गयी और उनके चेहरे पर गर्वीली मुस्कान उभर आई। वे एक खाली बाल्टी लेकर डस्टबिन के पास पहुंचे और उससे कचरा निकालकर बाल्टी में भरने लगे। दिन का समय था...सब लोग अपने घरों में आराम कर रहे थे। बस कुछ बच्चे उन्हें बाहर नज़र आ गए, जो कहीं खेलने की जगह तलाश रहे थे।

फिसड्डीलाल ने उन बच्चों को पास बुलाया और कहा, ‘मैं तुम सबको एक-एक टॉफ़ी दूंगा। बस तुम लोग जैसे ही मैं सड़क का झाड़ू निकालने लगूं तो सब पड़ोसियों को बाहर बुला लाना।’ बच्चों को सौदा बुरा नहीं लगा। फिसड्डीलाल इस बीच बाल्टी का कचरा आसपास के घरों और सड़क के बाहर डालने लगे। बच्चों को खेलने की जगह मिल गयी थी इसलिए वे थोड़ी जल्दी में थे। फिसड्डीलाल के झाड़ू निकालना शुरू करने से पहले ही वे सब पड़ोसियों को बाहर बुला लाये। पड़ोसियों ने जब देखा कि फिसड्डीलाल उनके घरों के बाहर और पूरी सड़क पर कचरा फैला रहे हैं तो सबने मिलकर उन्हें धर दबोचा। उन्हें तमाम लानतें और ताने देने के बाद इस शर्त पर छोड़ा कि वे तुरंत सारी सड़क की सफ़ाई करें। फिसड्डीलाल को सफाई भी करनी पड़ी और महानता का सर्टिफिकेट भी नहीं मिला। बल्कि सबसे तरह-तरह की गालियाँ जरुर सुनने को मिली।

कुछ दिनों बाद फिर से फिसड्डीलाल के मन में महान कहलाने का कीड़ा कुलबुलाने लगा। इस बार वे लाल बहादुर शास्त्री जी का कोई किस्सा पढ़ रहे थे। जब शास्त्री जी के घरवालों ने उनका कोट पुराना हो जाने पर एक टेलर को नए कोट का नाप लेने के लिए बुलाया था तो शास्त्री जी ने चुपके से पुराना कोट ही मरम्मत के लिए दे दिया और नया कोट सिलवाना कैंसिल कर दिया। फिसड्डीलाल के पास भी एक ही कोट था लेकिन वह अभी तक कहीं से फटा नहीं था तो फिसड्डीलाल कैंची लाये और उस कोट को एक-दो जगह से थोड़ा-थोड़ा काट दिया। उन्होंने सोचा था कि जब उनकी पत्नी फटा कोट देखेगी और नया सिलवाने को कहेगी तो वे शास्त्री जी की तरह ही अपनी महानता का परिचय देंगे। यह सोचकर वे सुबह-सुबह कोट पहनकर दफ्तर जाने के लिए तैयार होने लगे। पत्नी की नजर उनके कोट पर जा नहीं रही थी तो वे ही कुछ न कुछ बहाना करके पत्नी का कोट पर ध्यान आकर्षित करने की कोशिश करने लगे।

जब उन्होंने कहा, ‘तुम्हें याद है...यह कोट हमारी शादी में तुम्हारे घर से आया था।’ तो पत्नी पुरानी यादों को याद करते हुए एकदम ख़ुश होकर कोट को देखने लगी। लेकिन जैसे ही उसे वह एक दो जगह से कटा हुआ दिखाई दिया तो वह फिसड्डीलाल पर बरस पड़ी, ‘हाँ, अब समझ आया। यह मेरे पीहर से आया है इसलिए इसकी कोई वैल्यू नहीं है तुम्हारे लिए। तभी तो इतने लापरवाह रहते हो कि न जाने कहाँ उलझाकर इसे कटा लाये हो।’

पत्नी लगातार उन्हें ताने दिए ही जा रही थी। फिसड्डीलाल कहना चाहते थे कि वे नया कोट नहीं सिलवायेंगे। लेकिन ‘नया कोट’ शब्द उनके मुंह से निकलते ही पत्नी फिर बिफर पड़ी, ‘कोई नया-वया कोट नहीं। ये रही सूई और धागा! इसे बैठकर अभी ठीक करो...फिर तुम्हें खाना मिलेगा और फिर जाना तुम दफ्तर!’

फिसड्डीलाल का यह आईडिया भी फ्लॉप हो गया। लेकिन महान बनने का यह सपना उनसे ज्यादा दिन दूर नहीं रह पाया। एक दिन वे किसी महापुरुष के पशु-पक्षियों के प्रति प्रेम के बारे में पढ़ रहे थे। कुछ दिन बाद फिसड्डीलाल का पूरा मोहल्ला एक पिकनिक पर जाने वाला था। सबने अपने-अपने टिफ़िन ले लिए थे। पिकनिक स्पॉट पर पहुंचकर फिसड्डीलाल बराबर यही इंतजार कर रहे थे कि कोई जानवर, कुत्ता, गाय...कोई भी आ जाए तो वे सबके सामने अपना टिफ़िन उसे खिला देंगे और इस तरह वे भी पशु-पक्षियों से प्रेम करने वाले एक महान पुरुष बन जायेंगे। बड़ी देर बाद एक कुत्ता उन्हें कहीं दूर नज़र आया तो वे चुपके से उसे इशारे से पास बुलाने लगे। कुछ देर बाद कुत्ता जब पास आने लगा तो उत्साह और उल्लास में वे किसी और का टिफ़िन उठा लाये और सबको सुनाने के लिए थोड़ा तेज आवाज़ में बोले, ‘ यह बेचारा कुत्ता तो बड़ा भूखा लग रहा है।’ और यह कहते हुए टिफ़िन का पूरा खाना उसके सामने डाल दिया। टिफ़िन हठैतीलाल का था। अपने खाने की यह दुर्दशा देखकर वह गुस्से में दौड़ता हुआ आया और फिसड्डीलाल की जम कर धुनाई करने लगा। कचरे वाला किस्सा लोग भूले नहीं थे तो बाकी सब भी हठैतीलाल का साथ देने लगे। पिटते हुए बेचारे फिसड्डीलाल! उनके महान बनने का सपना बस सपना ही बनकर रह गया।

Monika Jain ‘पंछी’
(11/02/2017)

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