February 22, 2017

Story on Mother in Hindi

 
माँ

माँ!...यह शब्द ईश्वर ने उसके लिए नहीं बुना था। माँ!...यह शब्द तो उसे खुद रचना था। जन्म लेते ही किसी को ‘माँ’ और ‘भाई’ कहने का अधिकार छिन गया था उससे। उसकी नन्हीं सी आँखें खुली भी न थी उससे पहले ही ‘माँ’ और साथ जन्मा जुड़वा ‘भाई’ ईश्वर के घर जा चुके थे। पर उससे तो कभी किसी ने यह भी नहीं कहा कि तुम्हारी माँ और भाई ईश्वर के घर चले गए हैं। उसके कानों पर तो जन्म लेते ही पहला ताना यही पड़ा था, ‘नासपीटी, पैदा होते ही खा गयी अपनी माँ और भाई को।’

उसे अभी इन शब्दों के मायने नहीं पता थे। इन्हें कह देने वाली ज़ुबान की कड़वाहट भी उसने अभी नहीं चखी थी। वह तो जिस भी गोद में जाती टुकुर-टुकुर उसकी आँखों में माँ को तलाशा करती थी, इस बात से बेफिक्र कि वह किसी गोद में फूल की तरह नहीं ली जा रही है। वह बस सर पर आ पड़ी जिम्मेदारी के एक बोझ की तरह थामी जा रही है।

फूल सभी को प्यारे लगते हैं। लेकिन कोई गर फूल को फूल समझे ही ना तो फूल का फूल रह पाना भी कितना मुश्किल हो जाता है। पर इस फूल को ना जाने किसका आशीर्वाद मिला था कि हजार ताने, लानते और चांटों के बावजूद भी इसकी आँखों की चमक फीकी न पड़ती थी। ‘माँ’ को तलाशती इस फूल की आँखें सदा तरल बनी रही।

दादी के हाथों मार खाते, रोते-पिटते यह फूल कब 5 साल का हो गया पता भी न चला। खेलने-कूदने के दिनों में यह फूल अक्सर घर का कोई काम करता नज़र आता था। दादा अपने हुक्के और हम उम्र लोगों की पंचायत में व्यस्त रहते थे। पिता रात देर से लौटते थे। उनके पास भी पैदा होते ही माँ और भाई को खा जाने वाली लड़की के लिए समय और स्नेह नहीं था। दरअसल माँ को खा जाने की बात एक बहाना थी। इन शब्दों के पीछे की हकीकत कुछ और थी।

उस दिन जब माँ को अस्पताल ले जाया जा रहा था तो उसकी आँखों में एक खौफ था। मन ही मन दिल प्रार्थना कर रहा था, ‘हे ईश्वर! गर लड़की है भीतर तो किसी भी तरह बदल दो उसे लड़के में। एक नन्हें से फूल की हत्या का भागी मत बनाओ मुझे। अपने ही हिस्से को किसी कूड़ेदान का हिस्सा बनता नहीं देख पाऊंगी।’

ईश्वर ने प्रार्थना सुन ली थी लेकिन किसी और तरह से। ‘दो जुड़वाँ बच्चे हैं – एक लड़का और एक लड़की।’ डॉक्टर से यही कहते सुना था। लड़के की आस में किसी तरह लड़की को स्वीकार कर लिया गया था। भाई ने अनजाने में ही सही राखी का फर्ज निभा दिया था।

लेकिन आगे चलकर यह सुनी गयी प्रार्थना बड़े ही भयानक रूप में साकार हुई। जन्म देते ही माँ चल बसी और कुछ ही देर बाद भाई भी। फूल बच गया था। किसी कूड़ेदान का हिस्सा बनने का ख़तरा अब भी मंडरा रहा था पर किसी रिश्तेदार की समझाइश पर जैसे-तैसे स्वीकार कर लिया गया। अब बात के फ़ैल जाने के ख़तरे भी अधिक थे, क़ानून का कुछ डर था, निर्दयता असीम नहीं हुई थी। इसलिए फूल बच गया था।

लेकिन बचे हुए फूल के हिस्से में अब सिर्फ कांटें थे। पल-पल मिलती दादी की झिड़क, पिता और दादा के स्नेह को तरसती आँखों की तड़प...बस यही उसके जीवन की कहानी थी। पिता की शादी के लिए माँ की मौत के कुछ ही समय बाद लड़की की तलाश शुरू कर दी गयी थी। एक संतान और वह भी लड़की के विधुर पिता के लिए अच्छा मालदार रिश्ता मिल पाना इतना आसान नहीं था। कई जगह बात बनती-बिगड़ती और तलाश-तलाश में पांच साल गुजर गए। लेकिन इस तलाश के साथ ही फूल के आँखों की चमक भी बढ़ रही थी। फूल का किसी को ‘माँ’ कह पाने का सपना अभी मुरझाया नहीं था।

एक दिन रिश्ता पक्का हो ही गया। नए क़दमों ने गृह प्रवेश किया था। आँखों में उल्लास और चमक लिए फूल दौड़ते हुए आया था। ‘माँ’ शब्द गले से बाहर आने को बेकरार था। लेकिन इस उल्लास में वह सीधे नए क़दमों से जोर से टकरा गया और उन नए क़दमों के हाथों से कोई सामान छूटकर गिर गया। एक तेज थप्पड़ गालों पर पड़ा था। ‘माँ’ शब्द गले के भीतर ही घुट कर रह गया था।

पहले सिर्फ दादी की झिड़क ही थी। वह झिड़क कुछ-कुछ अपनी सी तो लगती थी। लेकिन नए क़दमों की झिड़क और थप्पड़ों में तो अपनेपन का कोई नामों-निशान भी न था। सौतेली माँ को जाने क्यों बस सौतेला ही होना था।

दिन गुजरते गए, साल गुजरते गए। फूल पूरे 18 साल का हो गया था। घर में कोई नयी किलकारी नहीं गूंजी थी। नए क़दमों के लिए फूल भाग्यशाली था। घर के सारे कामों का भार तो ले ही लिया था। अब बच्चा न जन पाने का सारा दोष भी फूल की मनहूसियत पर मढ़ दिया गया था।

दादी पोते की आस लगाये-लगाए स्वर्ग सिधार गयी थी। दादी कैसी भी हो वह स्वर्ग ही जाती है। दादा बीमारी में अपने आखिरी दिन गिन रहे थे। इधर डॉक्टर के चक्कर लगाते-लगाते एक दिन घर में एक किलकारी गूंजी थी। नए क़दमों ने भी एक बच्ची को ही जन्म दिया था। बरसों तक बच्चा न हो पाने की वजह से इस बार लड़के-लड़की की जांच करवाने का ख़याल आया ही नहीं था। और शायद सभी यह भरोसा कर बैठे थे कि लड़का ही होगा। लेकिन जब लड़की ने जन्म लिया तो फिर एक निराशा घिर आई थी। लेकिन फूल की आँखों में अरसे बाद फिर से चमक आई थी। बस यह चमक पहले वाली चमक से थोड़ी अलग थी। पहले ‘माँ’ कह पाने की आशा थी। अब ‘माँ’ सुन पाने की आशा पनपने लगी थी। फूल लाख मनहूस थी लेकिन घर के लिए मुफ्त में मिली नौकरानी भी थी और बच्ची की आया भी। इसलिए फूल की शादी नहीं की जा सकती थी।

लेकिन फूल ने तो शादी के बारे में कभी कोई सपने बुने भी नहीं थे। जन्म से बस उसकी आँखों की चमक एक ही शब्द के इर्द-गिर्द घूमती रही थी। नए क़दमों को लड़की होने की वजह से अपने बच्चे के लालन-पालन में भी कोई खास आकर्षण नहीं था। हालाँकि सौतेलापन नहीं था, अधिकार पूरा था लेकिन कर्तव्य नहीं। नए क़दमों ने अगले बच्चे के रूप में लड़के के सपने बुनना शुरू कर दिया था और बच्ची की देखरेख का ज्यादातर काम फूल के भरोसे ही था। इसी वजह से फूल को बहुत सारा समय अपनी छोटी बहन के साथ गुजारने को मिल जाता था। नन्हीं बहन जब 3 बरस की हुई तो पहली बार उसने ‘माँ’ बोला था। नए क़दमों को नहीं उसने अनजाने में फूल को माँ बोला था। अनजाने में बच्चे अक्सर सही बात बोल जाते हैं। उस समय नए कदम आसपास नहीं थे। फूल के गले में घुटा हुआ शब्द जब उसके ही लिए किसी और के मुंह से बाहर आया तो आँखों की सारी चमक और तरलता नदी बनकर बहने लगी। पल भर के लिए ही सही फूल का सपना आज पूरा हो गया था। माँ!...यह शब्द ईश्वर ने उसके लिए नहीं बुना था। माँ!...यह शब्द तो उसे खुद रचना था।

Monika Jain ‘पंछी’
(22/02/2017)

February 20, 2017

Poem on Smile in Hindi


तुम और मुस्कुराहट

(1)

किताब के पन्ने पलटते
तुम्हारे शब्दों को पढ़ते
तुम्हारी भावनाओं को महसूस करते
और तुम्हारी संवेदनाओं को जीते…
एक दिन कब अचानक नज़र
किताब के पीछे बने
तुम्हारे अक्स पर जा टिकी
पता ही न चला।

कि आसान होता है
तस्वीरों को देर तक निहारना।
कि आसान होता है
तस्वीरों को अपना
हाल-ए-दिल सुना देना।
कि आसान होता है
तस्वीरों को चूम लेना भी...
और आसान होता है
उन्हें सीने से लगा लेना।

पर मेरे लिए इनमें से कुछ भी
आसान कहाँ था?
आसान था कुछ तो वो था
बस मुस्कुरा देना
और मुस्कुराते-मुस्कुराते
तुम्हारी किताब के कुछ पन्ने
और पलट देना।

Monika Jain ‘पंछी’
(20/02/2017)

(2)

मुस्कुरा जाती हूँ
कभी-कभी प्रतिवाद पढ़कर
कि एक दिन तुम मेरी जगह होंगे
और तुम्हारी जगह कोई और।
तब कुछ याद करके तुम भी बस
मुस्कुरा ही तो पाओगे। 

Monika Jain ‘पंछी’
(24/12/2016)

February 16, 2017

April Fool Funny Story in Hindi

April Fool Funny Story of Moorkhistan in Hindi
मूर्खिस्तान का मूर्ख दिवस
{नन्हें सम्राट, मूर्खिस्तान विशेषांक में प्रकाशित}

मूर्खिस्तान का मूर्ख दिवस आ चुका था। मूर्ख दिवस मूर्खिस्तान का सबसे बड़ा त्यौहार माना जाता है। कई महीनों पहले से ही जोर-शोर से इसकी तैयारियां शुरू हो जाती है। इस दिन कई प्रतियोगिताओं का आयोजन होता है और इसके साथ ही साल भर की मूर्खताओं के आधार पर मूर्खिस्तान के महामूर्ख सम्मान की घोषणा भी की जाती है। इस अवार्ड को पाने के लिए पूरे साल मूर्खिस्तान के निवासियों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा चलती रहती है।

मूर्खिस्तान के सबसे चर्चित भिखारी भीखालाल को इस बार मूर्ख दिवस का निमंत्रण पत्र बांटने का काम सौंपा गया था। भीखालाल लोगों के हाथ-पैर पकड़-पकड़कर भीख मांगने के लिए प्रसिद्द था। निमंत्रण पत्र देने के लिए वह घर-घर पहुँचता और पुकारता – अल्लाह के नाम पर निमंत्रण लेले रे बाबा। मौला के नाम पर निमंत्रण लेले।

कुछ लोग तो भीखालाल द्वारा अपने हाथ-पाँव पकड़े जाने के डर से बाहर नहीं निकले लेकिन मन में निमंत्रण पत्र पाने की लालसा तो थी। कुछ लोग जो खुद को रोक नहीं पाए और बाहर निकल गए, पहले भीखालाल उनके हाथ-पैर पकड़कर मनमानी भीख वसूलता और उसके जाने के बाद आसपास के लोग जो पहले बाहर नहीं निकले थे दौड़ते हुए उसके घर की ओर आते और फिर वे निमंत्रण पत्र देखने के लिए उसके हाथ-पाँव पकड़ते।

मूर्ख दिवस के दिन मूर्खिस्तान के सभी मोटे व्यक्तियों के लिए एक दौड़ प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था। सभी मोटे लोग, दर्शक, आयोजक और जज महोदय आयोजन स्थल पर पहुँच चुके थे। लेकिन यह प्रतियोगिता दौड़ प्रतियोगिता कम और आराम प्रतियोगिता ज्यादा लग रही थी। सभी थककर बीच-बीच में आराम करने बैठ जाते थे। जब तक कोई नियत स्थल पर पहुंचा तब तक बोर होकर आयोजक, दर्शक, जज सभी गायब हो चुके थे।

एक जगह चित्रकला प्रतियोगिता का आयोजन हो रहा था। वहां सब लोग एक दूसरे की जगह पर दौड़ लगाते नज़र आ रहे थे। अपनी चित्रकारी पर किसी को भरोसा न था इसलिए वे दूसरे की जगह पहुँच-पहुंचकर उसकी शीट पर अपनी चित्रकारी कर आते ताकि उसे इनाम न मिले।

एक दूसरी जगह पर अपनी-अपनी मूर्खताओं का बखान करती कविता प्रतियोगिता का आयोजन चल रहा था। सभी बढ़ा-चढ़ाकर अपनी मूर्खताएं सुना रहे थे। जब भुलक्कड़ दास की बारी आई तो वे सब भूल गए। लेकिन बिना कुछ बोले ही उन्होंने होठ, हाथ-पाँव सब हिलाना जारी रखा। वे जब वापस अपनी जगह आकर बैठना भी भूल गए और वहीँ अड़े रहे तो उन्हें विजेता का पुरस्कार प्रदान कर अपनी जगह पर लाया गया। आखिर उन्होंने बिना कुछ भी बोले अपनी मूर्खता का परिचय जो दिया था।

फिर थकान से चूर होकर सब भोजन स्थल पर पहुंचे। भुक्कड़दास को इस बार मूर्खभोज के आयोजन का काम सौंपा गया था। भोजन स्थल के अन्दर से तरह-तरह के पकवानों की ख़ुशबू आ रही थी। लेकिन तभी सबकी नज़र एक नोटिस पर पड़ी। वहां बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था – आप सभी आयोजन के पश्चात् अपने-अपने घरों पर खाना खाने पधारें। अगर कोई अथिति हमें अनुग्रहित करना चाहे तो वह भीतर आ सकता है। इस अनुग्रह के बदले भुक्कड़दास उनके घर पर एक दिन का मेहमान बनने का सौभाग्य प्रदान करेंगे।

भुक्कड़दास की मेहमाननवाजी का ख़याल करते ही सारे के सारे लोग सरपट अपने घरों की ओर दौड़े। खाना खाने के बाद थकान के कारण सबको नींद आने लगी। महामूर्ख सम्मान समारोह में थोड़ी देर बाद जाने की सोचकर सब सो गए। इधर महामूर्ख सम्मान की घोषणा करने वाले मूर्खिस्तान के अध्यक्ष अटपटेलाल ने जब खुद को आयोजन स्थल पर अकेला पाया तो मौके का लाभ उठाकर खुद को ही जूतों की माला पहनाकर महामूर्ख सम्मान से नवाज दिया। और इस तरह मूर्खिस्तान का मूर्ख दिवस मनाया गया।

मोनिका जैन ‘पंछी’
(16/02/2017)

February 11, 2017

Comedy (Comic) Story in Hindi

Comedy (Comic) Story in Hindi
फिसड्डीलाल की महानता
(नन्हें सम्राट, मूर्खिस्तान विशेषांक में प्रकाशित)

फिसड्डीलाल बचपन से ही महान बनना चाहते थे। महान बनने का भूत उन पर कुछ इस कदर सवार था कि वे हर समय महान बनने के किसी अचूक नुस्खे की तलाश में लगे रहते थे। इसके लिए उन्होंने एक-एक करके इतिहास में जन्में सभी महान पुरुषों के किस्से और कहानियां इकठ्ठा करना शुरू किया और उन्हें पढ़-पढ़कर वे महान बनने की कोशिश में लगे रहते थे।

एक दिन वे महात्मा गाँधी के जीवन के किस्से पढ़ रहे थे। महात्मा गाँधी के स्वच्छता अभियान और उससे सम्बंधित किस्सों को पढ़कर उन्हें महान बनने का एक आईडिया आया। उन्होंने खिड़की से बाहर सड़क पर नज़र दौड़ाई। लेकिन रोज सुबह ही सफ़ाई हो जाया करती थी इसलिए वहां कोई कचरा नहीं दिख रहा था।

पहले तो फिसड्डीलाल यह देखकर दु:खी हुए पर फिर थोड़ी ही दूरी पर रखे कचरा पात्र पर उनकी नज़र गयी और उनके चेहरे पर गर्वीली मुस्कान उभर आई। वे एक खाली बाल्टी लेकर डस्टबिन के पास पहुंचे और उससे कचरा निकालकर बाल्टी में भरने लगे। दिन का समय था...सब लोग अपने घरों में आराम कर रहे थे। बस कुछ बच्चे उन्हें बाहर नज़र आ गए, जो कहीं खेलने की जगह तलाश रहे थे।

फिसड्डीलाल ने उन बच्चों को पास बुलाया और कहा, ‘मैं तुम सबको एक-एक टॉफ़ी दूंगा। बस तुम लोग जैसे ही मैं सड़क का झाड़ू निकालने लगूं तो सब पड़ोसियों को बाहर बुला लाना।’ बच्चों को सौदा बुरा नहीं लगा। फिसड्डीलाल इस बीच बाल्टी का कचरा आसपास के घरों और सड़क के बाहर डालने लगे। बच्चों को खेलने की जगह मिल गयी थी इसलिए वे थोड़ी जल्दी में थे। फिसड्डीलाल के झाड़ू निकालना शुरू करने से पहले ही वे सब पड़ोसियों को बाहर बुला लाये। पड़ोसियों ने जब देखा कि फिसड्डीलाल उनके घरों के बाहर और पूरी सड़क पर कचरा फैला रहे हैं तो सबने मिलकर उन्हें धर दबोचा। उन्हें तमाम लानतें और ताने देने के बाद इस शर्त पर छोड़ा कि वे तुरंत सारी सड़क की सफ़ाई करें। फिसड्डीलाल को सफाई भी करनी पड़ी और महानता का सर्टिफिकेट भी नहीं मिला। बल्कि सबसे तरह-तरह की गालियाँ जरुर सुनने को मिली।

कुछ दिनों बाद फिर से फिसड्डीलाल के मन में महान कहलाने का कीड़ा कुलबुलाने लगा। इस बार वे लाल बहादुर शास्त्री जी का कोई किस्सा पढ़ रहे थे। जब शास्त्री जी के घरवालों ने उनका कोट पुराना हो जाने पर एक टेलर को नए कोट का नाप लेने के लिए बुलाया था तो शास्त्री जी ने चुपके से पुराना कोट ही मरम्मत के लिए दे दिया और नया कोट सिलवाना कैंसिल कर दिया। फिसड्डीलाल के पास भी एक ही कोट था लेकिन वह अभी तक कहीं से फटा नहीं था तो फिसड्डीलाल कैंची लाये और उस कोट को एक-दो जगह से थोड़ा-थोड़ा काट दिया। उन्होंने सोचा था कि जब उनकी पत्नी फटा कोट देखेगी और नया सिलवाने को कहेगी तो वे शास्त्री जी की तरह ही अपनी महानता का परिचय देंगे। यह सोचकर वे सुबह-सुबह कोट पहनकर दफ्तर जाने के लिए तैयार होने लगे। पत्नी की नजर उनके कोट पर जा नहीं रही थी तो वे ही कुछ न कुछ बहाना करके पत्नी का कोट पर ध्यान आकर्षित करने की कोशिश करने लगे।

जब उन्होंने कहा, ‘तुम्हें याद है...यह कोट हमारी शादी में तुम्हारे घर से आया था।’ तो पत्नी पुरानी यादों को याद करते हुए एकदम ख़ुश होकर कोट को देखने लगी। लेकिन जैसे ही उसे वह एक दो जगह से कटा हुआ दिखाई दिया तो वह फिसड्डीलाल पर बरस पड़ी, ‘हाँ, अब समझ आया। यह मेरे पीहर से आया है इसलिए इसकी कोई वैल्यू नहीं है तुम्हारे लिए। तभी तो इतने लापरवाह रहते हो कि न जाने कहाँ उलझाकर इसे कटा लाये हो।’

पत्नी लगातार उन्हें ताने दिए ही जा रही थी। फिसड्डीलाल कहना चाहते थे कि वे नया कोट नहीं सिलवायेंगे। लेकिन ‘नया कोट’ शब्द उनके मुंह से निकलते ही पत्नी फिर बिफर पड़ी, ‘कोई नया-वया कोट नहीं। ये रही सूई और धागा! इसे बैठकर अभी ठीक करो...फिर तुम्हें खाना मिलेगा और फिर जाना तुम दफ्तर!’

फिसड्डीलाल का यह आईडिया भी फ्लॉप हो गया। लेकिन महान बनने का यह सपना उनसे ज्यादा दिन दूर नहीं रह पाया। एक दिन वे किसी महापुरुष के पशु-पक्षियों के प्रति प्रेम के बारे में पढ़ रहे थे। कुछ दिन बाद फिसड्डीलाल का पूरा मोहल्ला एक पिकनिक पर जाने वाला था। सबने अपने-अपने टिफ़िन ले लिए थे। पिकनिक स्पॉट पर पहुंचकर फिसड्डीलाल बराबर यही इंतजार कर रहे थे कि कोई जानवर, कुत्ता, गाय...कोई भी आ जाए तो वे सबके सामने अपना टिफ़िन उसे खिला देंगे और इस तरह वे भी पशु-पक्षियों से प्रेम करने वाले एक महान पुरुष बन जायेंगे। बड़ी देर बाद एक कुत्ता उन्हें कहीं दूर नज़र आया तो वे चुपके से उसे इशारे से पास बुलाने लगे। कुछ देर बाद कुत्ता जब पास आने लगा तो उत्साह और उल्लास में वे किसी और का टिफ़िन उठा लाये और सबको सुनाने के लिए थोड़ा तेज आवाज़ में बोले, ‘ यह बेचारा कुत्ता तो बड़ा भूखा लग रहा है।’ और यह कहते हुए टिफ़िन का पूरा खाना उसके सामने डाल दिया। टिफ़िन हठैतीलाल का था। अपने खाने की यह दुर्दशा देखकर वह गुस्से में दौड़ता हुआ आया और फिसड्डीलाल की जम कर धुनाई करने लगा। कचरे वाला किस्सा लोग भूले नहीं थे तो बाकी सब भी हठैतीलाल का साथ देने लगे। पिटते हुए बेचारे फिसड्डीलाल! उनके महान बनने का सपना बस सपना ही बनकर रह गया।

Monika Jain ‘पंछी’
(11/02/2017)

February 1, 2017

Basant Panchami Letter to Friends in Hindi


क्या और कोई विकल्प होता है?

प्यारे दोस्तों,

ऋतुराज बसंत के आगमन की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं। मधुमास कई रूपों में प्रेम से जुड़ा है और आज का दिन भी कई लोगों द्वारा भारतीय संस्कृति का प्रेम दिवस कहा जाता है तो फिर आज बात प्रेम पर ही करते हैं। वैसे प्रेम पर बात हर रोज होनी चाहिए। बल्कि हर रोज, हर क्षण प्रेम ही होना चाहिए। इससे सहज और इससे सरल कुछ है ही नहीं पर हमने अपनी कारस्तानियों से इसे सबसे मुश्किल और जटिल बना दिया है।

एक बार एक दोस्त ने कई सम्बंधित प्रतिकूलताओं पर निजी स्वार्थ से परे मेरे सहर्ष स्वीकार भाव को देखते हुए कहा था, ‘तुम इतनी प्यारी क्यों हों?’ उस समय तो मैं बस मुस्कुरा दी थी। लेकिन मन में एक ख़याल उठा कि काश! मैं इस सवाल का जवाब दे पाती। विविध सापेक्षताओं को छोड़ दूँ तो इस प्रश्न के पूर्ण योग्य तो मैं नहीं। पर सोचिये, इस प्रश्न का सबसे बेहतर जवाब क्या हो सकता है? ‘तुम इतनी प्यारी या तुम इतने प्यारे क्यों हों?’ इस प्रश्न का सबसे बेहतर जवाब हो सकता है - क्या कोई और विकल्प होता है? सच! क्या प्रेम के अलावा कोई और विकल्प होता है? बस...बस इसी जवाब तक पहुँचना है हमें कि क्या प्रेम के अलावा कोई और भी विकल्प होता है?

अस्तित्व के पास प्रेम के अलावा कोई और विकल्प था ही नहीं इसलिए उसने हमें सब विकल्प दे डाले। प्रेम को छोड़कर हमने सब विकल्प चुने। हमने ईर्ष्या चुनी, हमने घृणा चुनी, हमने आसक्ति को चुना...लालच, लोभ, तृष्णा...सब कुछ चुना...हमने मित्र चुने, हमने शत्रु चुने, हमने अच्छा और बुरा चुना, सुख और दुःख चुना, ऊंच-नीच चुनी, सम्मान-अपमान चुना...हर कदम पर हमने द्वैत को चुना, तुलना को चुना...बस नहीं चुना तो प्रेम को।

क्यों चुन रहे हैं हम इतना सारा प्रतिरोध? क्यों चुन रहे हैं हम इतना मुश्किल रास्ता? क्यों चुन रहे हैं हम तमाम दुश्वारियां? इस आशा में ही न कि एक दिन सब ठीक होगा? सब ठीक होने के लिए क्या यह सब चुनना पड़ता है?

सब ठीक तो बस इस और इसी क्षण होता है। दरअसल हम सब ठीक को अक्सर चुनते ही नहीं। हाँ, उसकी आशा में सब गलत जरुर चुनते जाते हैं। खैर! बहुत ज्यादा दार्शनिक बातें तो नहीं करुँगी पर हाँ, क्या ऐसा नहीं हो सकता कि कुछ भी लिखने से पहले, कुछ भी बोलने से पहले या कुछ भी करने से पहले हम इस बात को अच्छी तरह से देखें कि इसमें प्रेम कितना है और बाकी मिलावट कितनी? मेरे कहने का आशय यह नहीं है कि हमेशा बस रसगुल्ले सी मिठास ही टपकनी चाहिए। कभी सख्ती या तल्खी की जरुरत लगती है तो वो भी ठीक है, लेकिन यह देखना जरुरी है कि क्या इसका आधार वाकई प्रेम है? बात प्रेम, होश और समझ से उठ रही है या आधार कोई कुंठा, ईर्ष्या, भय, अहंकार...आदि वृत्तियाँ हैं?

मुझे लगता है हर रोज कम से कम एक प्रेमपत्र लिखा ही जाना चाहिए। कहाँ, कैसे, किस तरह...मुखर या मौन...प्रकट या अप्रकट...यह हमारा चुनाव! यह पत्र मैंने अपने और आप सबके लिए लिखा है। क्योंकि प्रेम से बहुत दूर आ चुके हैं हम तो चलो! वापस अपने घर लौटते हैं।

सप्रेम।

Monika Jain ‘पंछी’
(01/02/2017)