April 17, 2017

Anekantavada and Syadvada Theory of Jainism in Hindi

अनेकांतवाद व स्यादवाद का सिद्धांत

यूँ तो सभी की बातों में विरोधाभास होता ही है। क्योंकि हर बात का सन्दर्भ अलग होता है या कई बार चीजों को हम अज्ञान वश बहुत सीमित नजरिये से देख पाते हैं या स्वार्थ वश सीमित नजरिये से ही देखना चाहते हैं। लेकिन जाग्रत आत्माओं के उपदेश, अभिव्यक्तियाँ, सूत्र भी कई जगह बहुत विरोधाभासी नज़र आते हैं। तर्कशास्त्री उन्हें पागल, भ्रष्ट, और दोगले की उपाधि से नवाजते हैं। यूँ कोई पागल, दोगला या भ्रष्ट तो जाग्रत नहीं होता लेकिन जाग्रत व्यक्तियों का यह व्यवहार उनके छल से नहीं उनकी निश्चलता से निकलता है। उनका यह व्यवहार उनके अज्ञान से नहीं उनके ज्ञान से निकलता है, बाकी सन्दर्भ वाली बात तो है ही। वे नहीं चाहते कि हम किसी भी सहारे को पकड़कर बैठ जाएँ। फिर चाहे वह सहारा संसार हो या निर्वाण, राग हो या प्रेम, बंधन हो या मुक्ति। क्योंकि किसी भी सहारे को पकड़ना फिर से उलझ जाना है। सत्य है ही ऐसा कि वह शब्दों, विचारों या सहारों में समा ही नहीं सकता।

सिर्फ सत्य/प्रेम/ध्यान/समझ/जागरूकता ही है जो समस्त विरोधाभासों को खुद में समाहित कर सकते हैं। अगर ऐसा न होता तो अदृश्य जीवों के अस्तित्व में बाधा न बनने हेतु साँसों की भी मात्रा ध्यान में रखने वाले महावीर अनेंकांतवाद का सिद्धांत नहीं देते। कृष्ण जिन्होंने एक ओर भक्तियोग, ज्ञानयोग को मार्ग बताया वहीँ दूसरी ओर कर्मयोग को मार्ग बताकर अर्जुन द्वारा उस क्षण अपने कर्तव्य का पालन करने हेतु युद्ध का समर्थन न करते। शिव तो सभी विरोधाभासों को अपने में समाहित किये हुए ही हैं।

जिसने कभी विरोधाभासों की एकरूपता और मूल प्रकृति पर विचार किया ही नहीं, व्यष्टि और समष्टि दृष्टिकोण को समझा ही नहीं, सापेक्षता को नहीं जाना वह यह कैसे समझेगा कि किसी क्षण अपने अहंकार, सुरक्षा और स्वार्थ को ताक में रखकर किसी कीड़े के अस्तित्व को स्वीकार कर लेने में भी उसी निर्भयता की आवश्यकता है, जिस निर्भयता की आवश्यकता अपने प्राणों की परवाह किये बगैर किसी आतातायी से भिड़ जाने के लिए है। सही और गलत पूर्व निर्धारित नहीं हो सकते। भाषा, अभिव्यक्तियाँ, शब्द सबकी सीमायें हैं। वे सिर्फ संकेत हैं। बाकी किसी क्षण विशेष का सही और गलत सिर्फ वह क्षण और उस समय की जागरूकता और समझ ही (पूर्वाग्रह नहीं) निर्धारित कर सकती है, और कुछ नहीं। यह समूचा ब्रह्माण्ड ही विरोधाभासों पर टिका है। विरोधाभास न होते तो इसका अस्तित्व भी न होता। इन विरोधाभासों का मूल ही तो परम तत्व कहा जाता है जिसमें सब समाहित है या जो सबसे परे है।

सापेक्षता और सन्दर्भ के वजह से ही जैन दर्शन का एक बहुत प्रचलित सिद्धांत है - अनेकान्तवाद और स्यादवाद, जिसे आज हम सापेक्षता का सिद्धांत (Theory of Relativity) कहते हैं। अनेकांत का मतलब किसी भी बात को उसके सभी संभव दृष्टिकोणों से देखना और समझना है। स्यादवाद में सूक्ष्म मानसिक अहिंसा से बचने के लिए कई बार अपने वाक्यांशों के साथ ‘शायद’ शब्द का प्रयोग किया जाता है। यह कोई अनिश्चितता नहीं होती। यह बस अपने शब्दों को आग्रह (जोर) से मुक्त करना है। क्योंकि हर बात आंशिक सत्य ही होती है। वरना वह बात के रूप में हो नहीं सकती। अपनी साधना के दौरान सापेक्षता की वजह से होने वाली मानसिक/शाब्दिक हिंसा और आग्रह से बचने के लिए महावीर बारह वर्ष तक मौन रहे। कभी- कभी वे जब किसी के प्रश्न का उत्तर देते थे तब भी शायद हाँ और शायद नहीं का प्रयोग करते हुए सात तरह से समझाते थे जिसमें संभावित सभी दृष्टिकोण शामिल हो जाए। अपने मौन और बहुत सूक्ष्म स्तर पर अहिंसा को जीने की वजह से वे लोकप्रिय नहीं हुए। इसके अलावा यज्ञों में होने वाली बलि, हिंसा और आडम्बरों के बिल्कुल विपरीत चलने की वजह से उनका नाम ही इतिहास से मिटाने की पूरी कोशिश की गयी और बहुत यातनाएं दी गयी। लेकिन वे बहुत विस्मित कर देने वाले और पूर्ण वैज्ञानिक सोच वाले व्यक्तित्व रहे हैं।

अनेकांत और स्यादवाद को जो हम समझ लें तो शब्दों, विचारों, भावों और तर्कों को उतना ही महत्व देंगे जितना दिए जाने की जरुरत है। लेकिन हर विचार या भाव आंशिक सत्य है इसका तात्पर्य यह नहीं है कि सभी विचारों और भावों में सत्य और असत्य की मात्रा समान है। ज्यों-ज्यों विचार और भाव परिष्कृत होते जाते हैं उनमें सत्य का अंश बढ़ता जाता है और एक दिन परिष्कृत होते-होते-होते-होते वे विलीन हो जाते हैं, तब अवश्य ही परम सत्य उद्घाटित होता होगा। होता होगा इसलिए क्योंकि परम मेरी स्थायी अनुभूति का विषय नहीं है लेकिन अपने जीवन में मिले कई संकेतों और क्षणिक अनुभूतियों की वजह से यह मेरी श्रद्धा का विषय अवश्य है। वह श्रद्धा जो किसी के द्वारा थोपी हुई नहीं है और न ही कंडीशनिंग से मिली है। वह श्रद्धा जो सहज रूप से उत्पन्न हुई है। वह श्रद्धा जो आहत नहीं होती। आहत हमारा अहंकार या विश्वास होता है श्रद्धा नहीं।

Monika Jain ‘पंछी’
(30/12/2016)

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April 16, 2017

What to Study or Books to Read for Spiritual Growth (in Hindi)

अध्यात्म में प्रवेश के लिए अध्ययन

कई बार कुछ नास्तिक और आस्तिक मित्रों द्वारा पूछा जाता है कि तत्व ज्ञान की बातें बहुत गूढ़ हैं, कहाँ से और किस किताब से शुरू करें? हालाँकि ऐसे प्रश्नों के पूरी तरह योग्य नहीं हूँ लेकिन अपनी छोटी सी समझ से यही कहना चाहूंगी कि धर्म या अध्यात्म में अतिभोग के समर्थक मस्तिष्क प्रवेश न करें। यह बहुत ज्यादा भोगी दिमाग का ही काम है जिसने धर्म में जादू-टोना, चमत्कार, तंत्र-यंत्र, स्वर्ग-नरक, देवी-देवता, अप्सराएँ, हूर जैसी व्यर्थ बातों को मान्यता दे दी है और जो मूल उद्देश्य है धर्म का वह बिल्कुल विलुप्त हो गया है। ऐसे मस्तिष्क ही आतंकवादी और कट्टर बनते और बनाते हैं। क्योंकि इनका भोग मृत्यु के परे तक पहुँच जाता है। इसके अलावा जो लोग दुनिया में बदलाव लाने के लिए कुछ ज्यादा ही कट्टर रूप से इच्छुक हैं वे भी इस उद्देश्य से इसमें प्रवेश न करें। अध्यात्म का सम्बन्ध मूल रूप से खुद में बदलाव से है।

अगर आप वाकई इस अस्तित्व के बारे में, अपने बारे में, सबके बारे में कुछ जानने के इच्छुक हैं; या आप अपने जीवन में शांति, प्रेम, स्वतंत्रता और साहस चाहते हैं; या प्रकृति का बहुत ज्यादा चक्रमयी होना मतलब बाहर और अपने भीतर हर रोज कई चीजों के बार-बार रिपीट होने से ऊब गए हैं और कुछ समझ नहीं पा रहे हैं तो फिर आपको बिल्कुल पढ़ना चाहिए और जानना भी चाहिए। और इसके लिए युवावस्था सबसे अच्छी उम्र है। जो लोग ये सोचते हैं कि अध्यात्म वृद्धावस्था के लिए हैं उन्हें यही कहना है कि जब 60-70 वर्ष की उम्र में आकर भी दम्पत्तियों को छोटी-छोटी बातों के लिए हर रोज झगड़ते हुए देखती हूँ, बढ़े हुए चिड़चिड़ेपन, लालच, संग्रह प्रवृत्ति, ईर्ष्या, द्वेष, मोह, अति नकारात्मकता आदि के साथ देखती हूँ तो फिर यही लगता है कि अगर अध्यात्म का जीवन में पहले प्रवेश हुआ होता तो दृश्य कुछ और हो सकता था।

जहाँ तक क्या पढ़ें का सवाल है तो मूल धर्म ग्रंथों और धर्म शास्त्रों को शुरुआत में दूर रखा जाना चाहिए। अर्थ का अनर्थ होने की बहुत संभावनाएं हैं। आप कुछ अच्छे आध्यात्मिक गुरुओं को पढ़िए और जो उपलब्ध हैं उनसे सम्पर्क कीजिये। ओशो, आचार्य प्रशांत, कृष्णमूर्ति, सद्गुरु जग्गी वासुदेव...और भी होंगे। इन गुरुओं के ब्लॉग्स् से इतर ओशो की महावीर वाणी और हरमन हेस की सिदार्थ...ये किताबें मुझे बहुत अच्छी लगी। और भी कई सारी किताबें हैं, वे आपको अपनी अनुकूलता के अनुरूप चुननी होगी। इन गुरुओं को पढ़ते समय भी सावधानी की बहुत जरुरत है। क्योंकि हर गुरु कितनी भी सावधानी बरते लेकिन अपने स्तर से ही बात कर सकता है। ऐसे में आपको बहुत सारी विरोधाभासी बातें मिलेगी। वहां उचित सन्दर्भ और उद्देश्य को समझ पाने का स्तर हममें होना जरुरी है। कई बार ऐसी बातें इसलिए भी होती हैं क्योंकि अध्यात्म आपकी सभी धारणाओं को ध्वस्त करना चाहता है और आपको अनेकांत दृष्टि देना चाहता है, क्योंकि अध्यात्म की मंजिल ही सम्पूर्ण स्वीकार (सबसे प्रेम) है। ऐसे में पूर्वाग्रह पालने से बेहतर है मन में जो भी प्रश्न हो वह सम्बंधित उचित व्यक्ति से पूछ लिया जाए। किसी भी गुरु पर अंधश्रद्धा या अन्धविश्वास उचित नहीं, जिज्ञासाएं जरुरी हैं।

किसी को यह सोचकर डरने या घबराने की जरुरत नहीं है कि हमको सन्यासी बनना पड़ जाएगा। सन्यास इतनी आसानी से घटित होने वाली घटना नहीं है। वेश बदल लेने से भी यह घटित नहीं होता। बहुत समझ के साथ पढ़ने का परिणाम भी अक्सर बस इतना सा ही होता है कि आप पूरा नियंत्रण तो हासिल नहीं कर पाते लेकिन अपनी गलतियों और कमियों को जानने और पहचानने जरुर लग जाते हैं। थोड़ी सजगता और जागरूकता आ जाती है, कट्टरता कम हो जाती है, मुश्किलों का सामना करने का हौंसला आ जाता है और शुद्ध प्रेम को समझने लगते हैं।

इसके अलावा एक बहुत जरुरी बात - महावीर, बुद्ध, ओशो, सद्गुरु, आचार्य प्रशांत...ये वे व्यक्तित्व हैं जिनसे सीखने और समझने को बहुत कुछ मिला है तो एक कृतज्ञता की भावना का होना स्वाभाविक है। कल को अगर कोई पूरे गवाह और सबूतों के साथ इन्हें फ्रॉड सिद्ध कर दे या बिना कुछ जाने ही इनके लिए कुछ भी कहे तो भावनाएं आहत नहीं होगी। क्योंकि आप सिर्फ नाम को देख रहे हैं जबकि प्रेम, समझ और सत्य का नाम से कोई लेना देना नहीं है। सीखा कहीं से भी जा सकता है।

इसके अलावा सदियाँ लगती है तब कोई प्रेम (सत्य) का असल मतलब समझ पाता है और दुनिया में असल बदलाव लाता है। विडम्बना यह है कि जिसे वास्तव में प्रेम का मतलब समझ आता है उसे 90% लोग नहीं समझ पाते। और सबसे अच्छी बात यह है कि किसी के द्वारा न समझे जाने पर भी (बल्कि समाज तो कई बार क्रूरतम रहा है ऐसे लोगों के प्रति) उन्हें सिर्फ प्रेम ही समझ आता है।

अगर अपने जीवन में कोई कुछ वाकई बाँट सकता है या कुछ भी बांटने योग्य है तो वह सत्य ही है। इससे इतर सब कुछ सिर्फ व्यापार (लेन-देन)! हाँ, बस व्यापार में शुद्धता की मात्रता बदलती जाती है। कोई क्या है और क्या नहीं, मानता है या नहीं मानता, पा चुका या नहीं पाया...ऐसी किसी भी बात से सत्य कभी नहीं बदलता, यही सत्य की खूबसूरती है और कोई कितना भी कर ले सत्य विचारों के दायरे में नहीं आ पायेगा, यही सत्य की विशालता। विचार सिर्फ समझ और बोध के बढ़ने में सहायक बनते हैं वे स्वयं सत्य नहीं होते।

Monika Jain ‘पंछी’
(04/03/2017)

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April 8, 2017

Self Improvement Quotes in Hindi

Self Improvement Quotes

  • 08/04/2017 - दुनिया को बदलने के घोर उद्देश्य या घोषणा के साथ मैं कुछ भी नहीं करना चाहती। बातें और कर्म हमारे बोध, जागरूकता और स्पष्टता से निकलने चाहिए, कट्टरता की भावना से नहीं। इसके अलावा मेरे लिए सबसे अधिक जरुरी है यह देख और समझ पाना कि अभी इस क्षण मैं जिस भी व्यक्ति, वस्तु या प्राणी से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हूँ, संपर्क में हूँ, उसके साथ मेरा सम्बन्ध कैसा है? निश्चित रूप से यह सम्बन्ध मन, भावना, शरीर हर तल पर स्वस्थ होना चाहिए। जिस दिन से यह जागरूकता मैं हर क्षण कायम रख पायी, उस दिन से जीवन वाकई जीवन हो जाएगा। और कुछ भी सोचने की जरुरत है ही कहाँ? और कुछ सोचकर कुछ हो भी कैसे सकता है?
  • 05/03/2017 - सम्राट अशोक, अंगुलिमाल, वाल्मीकि, तीर्थंकर नेमिनाथ...इतिहास में ऐसे सैकड़ों किस्से मिल जाते हैं जहाँ एक घटना मात्र किसी के जीवन और ह्रदय को पूरी तरह परिवर्तित कर देती है।...मतलब सीधे छलांग। नेमिनाथ अपनी शादी में भोजन के लिए बाड़े में बंद किये गए पशुओं की चीत्कार सुनकर शादी ही कैंसिल कर देते हैं और सारा जमा कोष दान करके सीधे पर्वत पर पहुँच जाते हैं। अंगुलिमाल जो अँगुलियों की माला पहनता था, वह गौतम बुद्ध के कहने मात्र से रुक जाता है। वाल्मीकि परिवार से पूछे गए एक प्रश्न का उत्तर मिलने मात्र से डकैती छोड़ देते हैं। सम्राट अशोक को एक युद्ध बदल देता है। बस ये आजकल ही ह्रदय का मटेरियल बदल गया है क्या? किसी कलयुगी नेता या क्रिमिनल के बारे में ऐसी कोई कहानी सुनने की बहुत इच्छा हो रही है। कोई तो होगी ही?
  • 05/10/2016 - पुरानी कंडीशनिंग से बाहर निकलना जितना जरुरी है, उतना ही जरुरी है नयी कंडीशनिंग से बचे रहना। 
  • 18/09/2016 - समष्टि के दृष्टिकोण से देखें तो कोई भी सुधार सबसे पहले वहीं लागू होना चाहिए जहाँ उससे सम्बद्ध बुराई अपने शीर्ष पर है। लेकिन समस्या यह है कि बुराई के चरम पर इंसान अक्सर इतना ढीठ और जड़ होता है कि उसके कानों जू तक नहीं रेंगती। दूसरी ओर व्यष्टि दृष्टिकोण से जो लोग पहले से अच्छे होते हैं, उनकी संवेदनशीलता उन्हें और सुधार को प्रेरित करती है। खैर! आत्म सुधार की तो कोई सीमा होती ही नहीं। जितना हो उतना ही अच्छा है।...और सीमा हो तो भी वह शायद मुक्त होना ही होता है। ऐसे में भले ही एक क्षण को खाईयाँ बनती नज़र आये...लेकिन शायद यह भी प्रकृति के संतुलन का एक तरीका ही है।
  • 15/09/2016 - बहुत मतलबी हो गयी हूँ मैं! अक्सर खुद समझकर खुद के लिए ही लिख देती हूँ मैं।
  • 27/08/2015 - कोई भी प्रथा, कोई भी नियम, कोई भी कानून कितने भी अच्छे उद्देश्य से बनाया जाए मनुष्य उसका दुरूपयोग ढूंढ ही लेता है। यह हमेशा से होता रहा है, यह हमेशा होता रहेगा। क्योंकि सारी बीमारियाँ भीतर की है, अब यह भीतर चाहे किसी का भी हो। बाहर समाधान कभी मिलेंगे, मुश्किल लगता है। सिर्फ शोषण का चाबुक एक हाथ से दूसरे, दूसरे से तीसरे और तीसरे से चौथे में घूमता रहेगा।
  • 19/05/2015 - कुछ क्रूरताओं पर शब्द गुम हो जाते हैं...ठहर कर सोचना जरुरी है शायद इसलिए। शर्मिंदा होना समाधान नहीं है। क्योंकि जिस समाज का हिस्सा हैं हम उस पर कुछ नियंत्रण तो हमारा भी है। हम अपने हिस्से के शर्मिंदा न हो उतना भी काफी होगा न! 
  • कई बार मैंने पढ़ा है कि दूसरों के लिए खुद को नहीं बदलना चाहिए। मुझे समझ नहीं आता कि अगर बदलाव जरुरी हो और अच्छे के लिए हो तो खुद को बदलने में बुरा क्या है? हम पत्थर नहीं है जीवित हैं, इसलिए अच्छे बदलाव के लिए हमें हमेशा तैयार रहना चाहिए। क्योंकि सच तो यह है कि हम सिर्फ खुद को बदल सकते है दूसरों को नहीं। 
  • शब्दों, वाक्यों, घटनाओं, संदेशों, शिक्षाओं, जीवन, मृत्यु, हर चीज के जब सही और गहरे अर्थ समझ में आने लगते हैं तो व्यक्ति खुद-ब-खुद ही बदलने लगता है। बाकी लोग बस इन्हें सतही तौर पर पकड़े हुए दूसरों को बदलने की कोशिश में लगे रहते है।
  • किसी भी अच्छे भले व्यक्तित्व का नाम लो तो कुछ लोगों का सबसे पहला काम उसके जाति, धर्म, संप्रदाय, क्षेत्र की खबर लेना रहेगा। इनमें कुछ अनुकूल न मिला तो कुछ लोग आलोचना के बहाने खोजने लगेंगे और कुछ विरले लोग इन सबसे बेखबर उस व्यक्तित्व के गुणों की ओर आकृष्ट होंगे। यह पूरी तरह से हमारी चेतना के स्तर और ग्राह्यता पर निर्भर करता है कि हम किसी बेहतर व्यक्तित्व में अपने स्वार्थ और अहंकार को पोषित करने वाले तत्व खोजते हैं या फिर आत्म सुधार और आत्म विकास का मार्ग प्रशस्त करने वाले तत्व। 
  • धर्म/अध्यात्म मूल रूप से आत्म सुधार के लिए होते हैं, समाज सुधार के लिए नहीं। हाँ, आत्म सुधार जरुर समाज सुधार का मार्ग प्रशस्त करता है। 
  • दूसरों की नजरों में अच्छा बनने की चाह रखने से पहले हमें खुद की नजरों में अच्छा बनना चाहिए। 
  • पलायन की भी बड़ी विचित्र परिभाषा है लोगों के जेहन में। खैर! मुझे लगता है, बाहर के शत्रुओं को पराजित करने वाला फिर भी पलायनवादी हो सकता है, लेकिन भीतरी शत्रुओं को पराजित करने वाला कदापि नहीं!
  • स्वयं पर विजय का आनंद सिर्फ वही समझ सकता है जो इस पर ध्यान देना शुरू करता है और इस दिशा में आगे बढ़ना भी। सिर्फ वही महसूस कर सकता है कि इस विजय के सामने दुनिया-जहाँ की हर विजय तुच्छ है। 
  • मनुष्यों द्वारा तो सिर्फ कानून/नैतिक व्यवस्था हो सकती है न्याय नहीं। असल न्याय तो प्रकृति के हिस्से ही है और उसी के हिस्से रहेगा। एक सीमाहीन, आत्मानुशासित विश्व निसंदेह एक श्रेष्ठतम कल्पना है। यह कल्पना मुझे भी बेहद पसंद है। लेकिन एक सच यह भी है कि यह आदर्श व्यक्तिगत स्तर पर संभव हो सकता है...समूह पर लागू नहीं किया जा सकता। क्योंकि जहाँ-जहाँ लागू करने की बात आई वहां आत्म-अनुशासन रहा ही कैसे? यह तो चेतना के स्तर का विषय है, जिसे एक जैसा कोई कैसे बना सकता है? व्यक्तिगत रूप से सभी को एक जैसा अनुभूत करना निसंदेह संभव है...लेकिन इसे सभी अनुभव करे ही करे यह उद्देश्य लेकर चलना उस आदर्श विश्व के सिद्धांत का ही खंडन है। इसलिए समूह के हाथ में व्यवस्था है एक देश के रूप में, एक समाज के रूप में, कानून के रूप में... बाकी का काम हर एक व्यक्ति को अपने स्तर पर करना है - नैतिकता की बजाय अपनी चेतना को निखारने का काम, जिसमें सहयोगी निसंदेह हम सब लोग हो सकते हैं। 

Monika Jain ‘पंछी’

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April 6, 2017

How to Show HTML Codes, Javascripts in Hindi Blogger Posts

How to Show HTMl Codes, Javascripts in Blogger Posts for Hindi Blogs

  • Blogger Dashboard > Theme > Edit HTML पर जाइए। 
  • Theme/Template के Code Box के अंदर क्लिक कीजिये। अब Ctrl+F के द्वारा एक Search Box ओपन कीजिये। 
  • सर्च बॉक्स में यह कोड डालकर सर्च कीजिये : ]]></b:skin>
  • अब इस कोड लाइन के ऊपर की ओर नीचे दिया गया कोड पेस्ट कर दीजिये।
/*--Code View--------------*/
code {
color: #0000ff;
font: 108% &quot;Courier new&quot;,Courier,mono;
padding: 0 2px;
white-space: nowrap;
}
pre code {
-moz-box-shadow: 0 0 10px #DDDDDD;
background: repeat scroll 0 0 #FFFFFF;
border: 2px solid #CCCCCC;
clear: both;
color: #333333;
display: block;
font-size: 12px;
line-height: 15px;
margin: 10px auto 10px 30px;
overflow: auto;
padding: 15px;
white-space: pre;
width: 85% !important;
word-wrap: break-word;
}
code .comment {
color: #888;
}
code .class, code .rules {
color: #ff00ff;
font-size: 100%;
}
code .value,  code .title, code .string {
color: #0000FF;
}
code .tag {
color: #0000ff;
}
code .keyword {
color: #0000ff;
}
.html .attribute {
color: #006600;
}
  • अब Save Theme पर क्लिक कर दीजिये।
  • किसी भी Blogger Post  में कोई भी HTML Code Show करने के लिए सबसे पहले उसे Encode/Parse करना होगा। इसके लिए आप नीचे दिए गए टूल का प्रयोग कर सकते हैं। 

 
 
  • अब इस टूल से जो Code का जो Encoded Form प्राप्त होगा, उसे Blog Post के HTML Mode में जाकर <pre> <code> (यहाँ) </pre></code> के बीच में Paste कर दीजिये। 
  • इस तरह आप किसी भी HTML/Javascript Code को अपनी Blog Posts में एक Code Box में उचित तरीके से दिखा सकते हैं। 
Feel free to add your queries regarding this post on showing HTML Codes and Javascripts in a proper way in a blogger post.