May 28, 2017

Essay on Superstitions (Blind Faith) in Hindi

धर्म, संस्कृति, परंपरा और अन्धानुकरण

(1)

01/06/2017 - अभी पूरी ख़बर सही से पढ़ी। वैसे मोर-मोरनी पर की गयी टिप्पणी केवल जज महोदय की व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं है। अभी गूगल पर देखा कि यह मैसेज कई सालों से सोशल मीडिया और इन्टरनेट पर अस्तित्व में है। उनके भी पास ऐसे ही पहुँचा होगा। यह धार्मिक चमत्कारों का देश है तो ऐसी कई सैकड़ों बातें हैं जो हमारे समाज का हिस्सा हैं, जिनका वास्तविकता से लेना-देना नहीं है, बस पीढ़ी-दर-पीढ़ी हंस्तान्तरित हो रही है। सिर्फ प्रचलित बाजारी शिक्षा किसी को इन चीजों से मुक्त कर देगी यह अपेक्षा बेमानी है। कंडीशनिंग बहुत गहरी है। किसी न किसी मात्रा में जो हँस रहे हैं वे भी शिकार हैं। मैं जो लिख रही हूँ वह भी। व्हाट्स एप, फेसबुक इन्हें फ़ैलाने में और भी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। हँसने का कोटा पूरा हो जाए तो उसके बाद कुछ चीजें हम सभी को सोचने की जरुरत है।

धार्मिक विश्वासों पर जो हमारी कट्टरता है उसे ढीला करना बेहद जरुरी है। चमत्कारों के प्रति जो हमारा आकर्षण है उसे खत्म करना भी जरुरी है। स्रोत (शून्य) भले ही अकारण हो लेकिन उसके आगे जितनी भी चीजें हैं उनका कोई न कोई कारण होता ही है। किसी विषय पर शोध भले ही न हुए हों लेकिन चमत्कारी दृष्टि से चीजों को देखने की भारतीय वृत्ति का उन्मूलन देश हित में जरुरी लगता है। यूँ अद्भुत तो सभी कुछ है लेकिन उतना ही सामान्य भी। उसे इतनी नकली चमत्कारी सजावट करके परोसने से तो किसी का हित नहीं सधने वाला...और न ही जबरदस्ती किसी भी धार्मिक बात को सत्य साबित करने के लिए उसमें विज्ञान मिलाकर परोस देने से। हिंदुत्व, इस्लाम, जैनिज़्म, बुद्दिज्म, ईसाइयत...इन सबके बचने से कई ज्यादा जरुरी है, हमारी समझ और चेतना बची रहे। वह बची रही तो फिर कुछ भी बचाने के लिए इतनी मेहनत नहीं करनी पड़ेगी और बहुत सम्भावना है कि यह सब बचाए रखने की आवश्यकता ही शेष न रहे। लेकिन फ़िलहाल बिना सोचे किसी भी मैसेज को फॉरवर्ड करने से हम बचें। बिना जाने इन पर भरोसा करने से भी बचें।

(2)

28/05/2017 - किसी भी देश के धर्म, अध्यात्म और संस्कृति का स्तर मोटे-मोटे रूप में वहां पर होने वाले प्रकट और अप्रकट अपराधों की दर और वहां के लोगों के मानिसक स्तर से नापा जा सकता है। भारत का हाल किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में अपने इतिहास, संस्कृति और परम्पराओं के नाम पर कोई कब तक अपने मन को बहला सकता है, यह मेरे लिए अचरच का विषय है। निश्चित रूप से बोरियत और भागदौड़ से भरे जीवन में ऐसी चीजें क्षणिक रूप से मन को बहुत ख़ुश कर देती है, इसलिए कोई विरोध का स्वर सुन भी नहीं पाता लेकिन अगर यह क्षणिक स्थायी या लम्बे समय तक लोगों के मन पर सकारात्मक परिवर्तन नहीं छोड़ता तो समझो फिर मामला संदिग्ध है। बहुत समझदार नज़र आने वाले लोग भी यहाँ सिर्फ प्रत्यक्ष और बहुत सतही तल पर चीजों को देखने के आदी हैं। जबकि घटना कोई भी हो उसके प्रभाव व्यापक होते हैं सिर्फ व्यक्तिगत नहीं और वही देश का एक सकल चरित्र और स्वरुप बनाते हैं। बाकी अपवाद तो हर जगह होते हैं और कोई जब देश या दुनिया के बारे में सोचता हैं तो सिर्फ खुद से तुलना नहीं कर सकता...ऐसे में खुद को सबमें शामिल करना होता है। कुछ महीनों से मुझे उन देशों के रहन-सहन और जीवन को जानने की उत्सुकता हो रही है, जहाँ पर अपराधों की दर न्यूनतम है और जहाँ के लोग ख़ुशहाल और शांत जीवन जी रहे हैं। कहीं कुछ सही जानकारी मिले तो पढ़ना है। लेकिन इतना तो तय है कि वहां के लोगों के जीवन में अनावश्यक ड्रामा नहीं ही होता होगा। व्यक्ति हो या समाज, जहाँ भी अनावश्यक चीजें जितनी ज्यादा बढ़ती है, वहां का चैन और सुकून उतना ही खत्म होता जाता है।

(3)

30/03/2013 - लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ मीडिया को समाज में जागरूकता फ़ैलाने, अन्धविश्वास और कुरीतियों का खात्मा करने और साक्षरता का प्रचार प्रसार करने की भूमिका के रूप में देखा जाता है लेकिन वर्तमान समय में मीडिया अपनी इस भूमिका का कितना निर्वहन कर रहा है ये हम सब जानते हैं।

कोई भी टीवी चैनल चला लें डरावना सा रूप धारण किये हुए बाबा दर्शकों को शनि, राहु, केतु, गृह दोष, मंगल दोष और ना जाने कैसे-कैसे दोषों से डराते हुए और लौकेट, धन लक्ष्मी वर्षा यन्त्र, लक्ष्मी कुबेर यन्त्र, इच्छापूर्ति कछुआ, लाल किताब, गणपति पेंडेंट, नज़र रक्षा कवच आदि की दूकान लगाकर बैठे मिल जायेंगे जो कोड़ियों के दाम की चीजों को महंगे दामों पर बेच कर अपनी जेबें भर रहें हैं। इसके अलावा फ़ोन और एस एम एस के जरिये समस्याओं का समाधान बताने के बहाने मोटी-मोटी कॉल दरें चार्ज की जा रही है।

आज हर आम आदमी किसी ना किसी समस्या से जूझ रहा है। बस इसी बात का फायदा उठाकर अन्धविश्वास की अपनी दूकान चलाने के लिए मीडिया का सहारा लिया जा रहा है क्योंकि मीडिया ही एक ऐसा माध्यम है जिसके जरिये कोई भी बात सीधे-सीधे लाखों करोड़ों लोगों तक पहुंचाई जा सकती है और मीडिया के जरिये किसी भी बात को दिमाग में अच्छे से बैठाया भी जा सकता है।

पत्र-पत्रिकाएं भी ऐसे विज्ञापनों को धड़ल्ले से छाप रही है। मुझे समझ नहीं आता कि प्यार में असफल व्यक्ति को कोई ज्योतिष या तांत्रिक उसका प्यार कैसे दिला सकता है ? निसंतान दंपत्ति को अगर ऐसे बाबा या तांत्रिक के उपाय अपनाने पर ही संतान मिल जाती है तो फिर मेडिकल की पढ़ाई की क्या जरुरत है ? अगर कोई यन्त्र खरीदकर कोई रातों रात अमीर बन सकता है तो फिर सुबह से रात तक ऑफिस में सर खपाने की क्या जरुरत है ?

कुल मिलाकर दुखी, हारे हुए और परेशान लोगों को ठगने का एक बड़ा जाल फैलाया जा चुका है जिसकी चपैट में फँस कर कई लोग अपनी जेबे खाली करवा रहें हैं।

Monika Jain ‘पंछी’

May 25, 2017

Poem on Save Earth in English

When Shimmer Turned Dark

Shimmering was the sky, sat I
Was glancing the sudden change in verge of high.

Suddenly!
Shimmer turned to black and dark
Clouds growled at me like some hungry shark.

Then I saw the crying earth
Which was expecting the end of birth.

Then I looked at the restless water
Sea was wild accompanied by breathtaking thunder.

The scene around me was scary and troublesome
I guessed some danger is about to come.

Then attracted sea again towards its condition
Now it was giant wave with great explosion.

I feared to see the height
Which was enough to drown a kite.

Then I looked towards sky to seek for mighty
I failed as a roof of water covered me.

Wave was approaching me and i was helpless
Then I realized it’s all we humans mess.

We disturb and harm mother nature
and expect her to stay calm and bear us butchers.

We seek birth and life from this earth
and selfishly forgot all its worth.

I was about to leave this world
It was then something I heard.

It was monotonous sound of nearby generator
Then I realized it was earth no water.

My eyes were wet with horror
A mingled feeling of relief and terror.

Though virtual but that scene taught me lesson of reality
We though humans but forgot humanity.

Just running after the wealth
Without thinking about nature's death.

Don’t dawdle, think briskly over the condition
Otherwise nature would think 100 times to grant us motion.
Nature would think 100 times to grant us motion.

Rishabh Goel
Kotdwar, Uttarakhand