June 14, 2017

Essay on Criticism in Hindi

ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर

13/06/2016 - वह जो सिर्फ असहमतियों के लिए प्रकट होता था।
वह जो सिर्फ आलोचना की गुंजाईश देखता था।
वह जो सिर्फ विरोध के अवसर ढूंढता था।
उसका विरोध विचारों से नहीं मुझसे था। बहरहाल आलोचनाएँ हँसा भी सकती है। :)

14/06/2017 - कोई जो आपके शब्द-शब्द, विचार-विचार, भाव-भाव, कर्म-कर्म को आलोचनात्मक दृष्टिकोण से पकड़ता है और फिर उनके आधार पर बुरे निष्कर्ष निकालता है, वह कुछ भी कर सकता है लेकिन आपसे प्रेम नहीं कर सकता। और यह भी तय है कि बहुत ज्यादा जजमेंटल बनने की प्रक्रिया में वह आपके विचारों, शब्दों या भावों के सही अर्थ तक भी नहीं पहुँच सकता, आपको समझना तो बहुत दूर की कोड़ी है।

जन्म से लेकर ही बहुत लम्बे समय तक (लगभग पूरे विद्यार्थी जीवन में) मैं बहुत अन्तर्मुखी और शर्मीली थी। बात करने की पहल नहीं कर पाती थी और बहुत ज्यादा बातें भी नहीं होती थी करने को। कुछ अपवाद थे इसमें भी। जो पहल कर लेते थे, उनमें से ही किसी के क्लोज हूँ या किसी के साथ बहुत सहज हूँ तो उससे कभी-कभी बहुत बातें हो जाती थी। और इसके अलावा पब्लिक स्पीकिंग में भी कभी दिक्कत नहीं आई। कई लोग मेरी प्रकृति समझ जाते थे और किसी ख़ास परिचय के बिना भी उनका स्नेह रहता था हमेशा। उन सभी को बहुत मासूम लगती थी। कुछ लोग यह भी मानते थे कि मैं पढ़ाई और अन्य गतिविधियों में अव्वल रहती हूँ, इसलिए बहुत घमंडी हूँ और इसलिए ही ज्यादा बात नहीं करती किसी से।

एक बार नयी स्कूल में मेरी पुरानी स्कूल से क्लास में कोई नहीं था और लड़कियों का एक बड़ा ग्रुप किसी कॉमन स्कूल से ही था, जो सभी पहले से दोस्त थे। उसी ग्रुप में कॉम्पीटिटर भी थी और उस पूरे ग्रुप के पूर्वाग्रह थे मेरे प्रति। और कभी-कभी उनमें से कुछ बेवजह मुझे परेशान करते थे, छेड़ते थे।...और तब मुझे विरोध करना नहीं आता था। ज्यादा से ज्यादा उसके प्रति बस उदासीन हो जाती थी। सिटिंग अरेंजमेंट बदलने के दौरान उसी ग्रुप में से किसी के साथ बैठना हुआ। कुछ ही दिनों में दोस्ती हुई, जो तमाम असमानताओं के बावजूद भी; स्कूल, कॉलेज, शहर...सब बदलने के बावजूद भी; सालों साल गहरी से गहरी होती रही और इस बीच कभी उसने ही बताया था कि वह मुझसे परिचय से पहले मेरे बारे में बहुत गलत सोचती थी, मुझे बहुत घमंडी समझती थी। यह बात जीवन के अलग-अलग समय में कुछ और लोगों ने भी कही है। हम किसी को भी नापसंद न रहें, यह तो संभव है ही नहीं। लेकिन जो लोग किसी पूर्वाग्रह या ग़लतफ़हमी के तहत नापसंद करते हैं, बिना किसी ठोस वजह के नापसंद करते हैं, वे समझ पाए इसके लिए तो उन्हें बहुत बातें करनी होगी, निकट आना होगा, साथ में समय गुजारना होगा...और समस्या यह है कि वर्तमान में मैं एक ओर तो कुछ बहुत गंभीर वजहों से और दूसरी ओर अनासक्ति की वजह से किसी से बहुत ज्यादा परिचय बढ़ा नहीं पाती। ना काहूँ से दोस्ती, ना काहूँ से बैर वाला मामला हो रहा है। :)

खैर! मेरे लिए प्रेम न तो सामान्य परिचय का और न ही किसी प्रगाढ़ परिचय का मोहताज है। परिचित हैं तो भी अच्छा, नहीं है तो भी अच्छा। इसके अलावा कोई हमें बहुत अच्छा समझे तब भी कुछ (कम/ज्यादा) कमियां तो हम सभी में होती ही है। जो प्रेम करते हैं वे कमियों के साथ स्वीकार कर लेते हैं। जरुरी बातें बताते भी हैं, गलतियों पर टोकते भी हैं और प्रेम में ही अच्छे बदलाव भी ले आते हैं। लेकिन जो मन ही मन द्वेष रखते हैं, उनका उद्देश्य सिर्फ कमियां खोजना ही होता है। ऐसे में कुछ अच्छा हो तो वे उसमें भी कमी निकाल लेंगे। वे जो कर रहे होते हैं इस बात का उन्हें भी पता नहीं होता है। पता होने के लिए, प्रेम होने के लिए...खुद को निष्पक्षता से देखने की जरुरत है। पूर्वाग्रहों को छोड़ने की जरुरत है। अपनी कोई प्रच्छन्न अपेक्षा या कुंठा है तो उसे देखने की जरुरत है। कोई नाराजगी है, ग़लतफ़हमी है तो बात करके दूर करने की जरुरत है। बाकी यह सामने वाले से अधिक सिर्फ खुद को पीड़ा देते रहना है। नफ़रत/द्वेष/ईर्ष्या दूसरों पर असर बाद में करेगी, सबसे पहले तो यह इसी बात को दर्शाती है कि कुछ है जो हमारे साथ ही ठीक नहीं।

Monika Jain ‘पंछी’

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